सत्य का अनुसरण कैसे करें (6) भाग एक

किसी व्यक्ति की काबिलियत का मूल्यांकन करने के 11 मानक

पिछली सभा में हमने सत्य के अनुसरण से संबंधित एक प्रमुख विषय पर संगति की थी, “अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाएँ और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता छोड़ देना।” इस प्रमुख विषय के भीतर हमने परमेश्वर के कार्य के बारे में इंसानी धारणाएँ और कल्पनाएँ छोड़ देने के बारे में बात की थी जिसमें लोगों की जन्मजात स्थितियों, मानवता और भ्रष्ट स्वभावों से संबंधित विषय शामिल थे और इन विषयों के भीतर काबिलियत से संबंधित मुद्दों का जिक्र किया गया था। पिछली बार हमने लोगों की धारणाओं के एक हिस्से का समाधान करते हुए काबिलियत से संबंधित मुद्दों के बारे में थोड़ी संगति की थी। उसे सुनने के बाद क्या तुम लोगों के पास इसकी सटीक परिभाषा है कि काबिलियत क्या होती है? काबिलियत वास्तव में क्या होती है? काबिलियत को कैसे समझा जाना चाहिए? कोई कैसे निर्णय कर सकता है कि किसी व्यक्ति की काबिलियत अच्छी है, औसत है या खराब है? इसका निर्णय किन पहलुओं के आधार पर किया जाना चाहिए? क्या तुम लोगों ने इन सवालों पर खोज और चिंतन किया है? (मैंने इन पर थोड़ा चिंतन किया है। पिछली सभा में परमेश्वर ने संगति की थी कि व्यक्ति की काबिलियत आँकने के लिए हमें चीजें करने में उसकी दक्षता और प्रभावशीलता देखनी होगी। पहले मुझे इस संबंध में बहुत समझ नहीं थी और मैं विशेष कौशलों को गलती से काबिलियत समझ लेता था। उदाहरण के लिए, जब मैं किसी व्यक्ति को विशेष रूप से अच्छे शैक्षिक परिणाम प्राप्त करते या कई भाषाओं में पारंगत होते देखता था तो मैं सोचता था कि यह इस बात का संकेत है कि उसमें अच्छी काबिलियत है। परमेश्वर की संगति सुनकर ही मुझे यह स्पष्ट निर्णय मिला कि कौन-सी चीजें वास्तव में अच्छी काबिलियत हैं और कौन-सी सिर्फ कुछ विशेष कौशल हैं। अगर कोई व्यक्ति बाहरी तौर पर काफी चतुर लगता है लेकिन कर्तव्य निभाने में उसकी दक्षता बहुत कम है और वह हमेशा सत्य सिद्धांतों को समझने में असमर्थ रहता है तो उसकी काबिलियत अपेक्षाकृत खराब होती है।) चीजें करने में व्यक्ति की दक्षता और प्रभावशीलता से उसकी काबिलियत आँकना—यह इसे व्यापक रूप से कहने का एक तरीका है। चीजें करने में व्यक्ति की दक्षता और प्रभावशीलता देखने से परे, उसकी काबिलियत आँकने के विशिष्ट मानक हैं : पहला, उसकी सीखने की क्षमता। दूसरा, उसकी चीजों को समझने की क्षमता। तीसरा, उसकी बोध क्षमता। चौथा, उसकी चीजों को स्वीकारने की क्षमता। पाँचवाँ, उसकी संज्ञानात्मक क्षमता। छठा, उसकी आकलन करने की क्षमता। सातवाँ, उसकी चीजों को पहचानने की क्षमता। आठवाँ, उसकी चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता। नौवाँ, उसकी फैसला लेने की क्षमता, जिसे उसकी कार्यान्वित करने की क्षमता के रूप में भी संदर्भित किया जा सकता है। दसवाँ, उसकी चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता। ग्यारहवाँ, उसकी नवाचार क्षमता। क्या तुमने इन्हें ध्यान में रखा है? (हाँ।) ये कुल कितने हैं? (ग्यारह।) इन्हें जोर से पढ़ो। (एक, सीखने की क्षमता। दो, समझने की क्षमता। तीन, बोध क्षमता। चार, चीजों को स्वीकारने की क्षमता। पाँच, संज्ञानात्मक क्षमता। छह, आकलन करने की क्षमता। सात, चीजों को पहचानने की क्षमता। आठ, चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता। नौ, फैसला लेने की क्षमता। दस, चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता। ग्यारह, नवाचार क्षमता।) किसी व्यक्ति की काबिलियत का निर्णय करने के लिए आम तौर पर तुम्हें ये दो पहलू देखने होंगे : चीजें करने में उसकी दक्षता और प्रभावशीलता। खास तौर पर, चीजें करने में उसकी दक्षता और प्रभावशीलता का आकलन करने के लिए तुम्हें इन ग्यारह मानकों के आधार पर एक व्यापक निर्धारण करना होगा। इस तरह तुम यह सटीक रूप से निर्णय कर पाओगे कि किसी व्यक्ति की काबिलियत वास्तव में कैसी है। बेशक किसी व्यक्ति की काबिलियत का आकलन करने के लिए पहला कदम विभिन्न पहलुओं में उसकी समग्र क्षमताएँ और फिर चीजें करने में उसकी दक्षता और प्रभावशीलता देखना है। अगर उसमें विभिन्न पहलुओं में काबिलियत और क्षमता है तो वह निश्चित रूप से दक्षता और प्रभावशीलता दोनों के साथ काम करेगा। अगर चीजें करने में व्यक्ति की दक्षता अधिक है और उसकी प्रभावशीलता अच्छी है तो जब तुम ग्यारह मानकों के अनुसार प्रत्येक क्षेत्र में उसकी क्षमताओं का मूल्यांकन करोगे तो वे भी निश्चित रूप से अच्छी होंगी। इन ग्यारह क्षमताओं में से कोई भी, अलग से लेने पर, यह पूरी तरह से निर्धारित नहीं कर सकती कि व्यक्ति की काबिलियत अच्छी है या नहीं—उसका निर्णय व्यापक रूप से किया जाना चाहिए। बेशक इन ग्यारह क्षमताओं में से कौन-सी क्षमताएँ सबसे महत्वपूर्ण हैं? सबसे महत्वपूर्ण क्षमताएँ हैं आकलन करने की क्षमता, चीजों को पहचानने की क्षमता, चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता और फैसला लेने की क्षमता—इनमें किसी निश्चित सिद्धांत को समझने के बाद व्यक्ति की कार्य करने की क्षमता शामिल है। बाकी क्षमताएँ बोध और सीखने से संबंधित हैं, जिनमें मानव मन शामिल होता है। आगे हम इन ग्यारह क्षमताओं पर एक-एक करके संगति करेंगे।

नंबर 1 : सीखने की क्षमता

पहली है सीखने की क्षमता। सीखने की क्षमता का मतलब सिर्फ ज्ञान के किसी क्षेत्र को सीखना नहीं है; इसमें कोई भाषा सीखना, कोई खास तकनीकी कौशल सीखना, कोई नई चीज सीखना और उसे स्वीकारना वगैरह भी शामिल हैं—ये सब सीखने की क्षमता के दायरे में आते हैं। उदाहरण के लिए, सामान्य परिस्थितियों में तकनीकी कौशल सीखते हुए कोई व्यक्ति मूल रूप से उसमें छह महीने के भीतर महारत हासिल कर सकता है और फिर स्वतंत्र रूप से उसमें संलग्न हो सकता है। अगर तुम भी इसे छह महीने सीखने के बाद इसमें महारत हासिल कर इसमें स्वतंत्र रूप से संलग्न हो सकते हो तो इसे सीखने की क्षमता माना जाता है। अगर तुम्हें इसे सीखने में औसत व्यक्ति से दोगुना समय लगता है—अगर छह महीने के बाद भी तुम उसमें महारत हासिल नहीं कर पाते और उसे सीखने के लिए तुम्हें छह महीने और चाहिए—तो यह खराब काबिलियत दर्शाता है। यानी, सीखने की क्षमता के मामले में, अगर तुम सामान्य समय-सीमा के भीतर तकनीकी कौशल या ज्ञान में महारत हासिल कर लेते हो तो इसका मतलब है कि तुम्हारी काबिलियत औसत या औसत से ऊपर है। लेकिन अगर तुम इस समय-सीमा को पार कर जाते हो और तकनीकी कौशल या ज्ञान सीखने में तुम्हें दूसरों की तुलना में दोगुना या तीन गुना तक समय लगता है तो तुम्हारी काबिलियत खराब है। अगर तुम औसत व्यक्ति की तुलना में दो या तीन गुना अधिक समय लगाते हो और फिर भी उसे नहीं सीख पाते और तुममें सीखने की क्षमता की कमी है तो यह तुम्हारी काबिलियत के बारे में क्या कहता है? सीखने की क्षमता के बिना तुम सामान्य इंसानी काबिलियत होने का सामान्य मानक भी पूरा नहीं करते। तुम खराब काबिलियत होने से भी बदतर हो—तुममें बिल्कुल भी काबिलियत नहीं है। काबिलियत नहीं होना किस श्रेणी में आता है? काबिलियत नहीं होने का मतलब है कि व्यक्ति मानसिक रूप से कमजोर और मूर्ख लोगों की श्रेणी में आता है, जिसमें सीखने की क्षमता बिल्कुल नहीं है। सीखने की क्षमता में यही शामिल है।

नंबर 2 : चीजों को समझने की क्षमता

दूसरी है चीजों को समझने की क्षमता। चीजों को समझने की क्षमता का मतलब है व्यक्ति जिस चीज को देखता है या जिसका अक्सर सामना करता है, उसमें निहित सिद्धांतों और युक्ति को समझने का सामर्थ्य। उदाहरण के लिए, कोई पेशेवर कौशल सीखते समय अगर तुम सैद्धांतिक निर्देश सुनते हो और व्यावहारिक प्रदर्शन देखते हो, और एक सामान्य समय-सीमा के भीतर तुम उस कौशल से जुड़ी युक्ति और सिद्धांतों को समझ सकते हो तो इसे अच्छी काबिलियत और चीजों को समझने की एक निश्चित क्षमता का होना माना जाता है। अगर तुम उसे तुरंत नहीं समझ सकते, यहाँ तक कि अगर कोई तुम्हारे साथ दोबारा संगति करे तब भी तुम नहीं समझ सकते; और उनके बार-बार संकेत देने पर भी तुम यह नहीं समझ सकते कि उस काम को करने की युक्ति क्या है और उसमें कौन-से सिद्धांत शामिल हैं—तो चीजों को समझने की तुम्हारी क्षमता खराब है। हो सकता है कुछ समय बाद तुम वास्तविक अभ्यास के जरिये धीरे-धीरे टटोलते हुए थोड़ा सीख लो, लेकिन यह यहीं तक सीमित है। चाहे तुम कितना भी समय लगाओ—चाहे तीन साल लगाओ या पाँच साल—अगर तुम जो समझ सकते हो वह एक सीमित दायरे तक ही सीमित रहता है और चीजें करते समय तुम उनमें शामिल मूल सिद्धांतों को समझे बिना और उन्हें वास्तविक अभ्यास में लागू किए बिना, कुछ निश्चित विनियमों और नियमों का ही पालन करते हो तो इसका मतलब है कि चीजों को समझने की तुम्हारी क्षमता खराब है; ऐसे लोगों की काबिलियत खराब होती है। उदाहरण के लिए, कुछ लोग कलीसिया का कार्य करते हैं और तुम्हारे द्वारा उनके साथ सत्य सिद्धांतों के बारे में संगति किए जाने पर उन्हें लगता है कि तुमने जो कहा वह सही है और तुमने जो संगति की है उसके बारे में उन्हें कोई संदेह नहीं होता। लेकिन वे यह नहीं समझ पाते कि चीजें इस तरह से क्यों की जानी चाहिए और वे इसमें शामिल सिद्धांतों को समझने में असमर्थ रहते हैं। खासकर वास्तविक जीवन में या अपना कर्तव्य निभाते समय विभिन्न समस्याओं या विशेष परिस्थितियों का सामना करने पर वे नहीं जानते कि सिद्धांत कैसे लागू किए जाएँ या अपने सामने आने वाली समस्याओं से सिद्धांतों के अनुसार कैसे पेश आया जाए और कैसे उन्हें सँभाला जाए। यह चीजों को समझने की क्षमता की कमी दर्शाता है। जिन लोगों में चीजों को समझने की क्षमता की कमी होती है, वे सत्य के बारे में संगति सुनने के बाद भी नहीं समझते और हमेशा ऐसे अनुरोध करते हैं “क्या तुम कोई अन्य उदाहरण दे सकते हो?” या “क्या तुम इसे और विस्तार से समझा सकते हो?” तुम्हारे द्वारा उदाहरण देने और विस्तार से समझाने के बाद ही वे थोड़ा समझ पाते हैं। लेकिन अगर तुम किसी गहरी बात पर संगति करते हो तो वे एक बार फिर नहीं समझ पाएँगे और तुमसे कोई अन्य उदाहरण देने के लिए कहेंगे। वे तुमसे बार-बार उदाहरण देने के लिए क्यों कहते हैं? यह इसलिए है कि तुम वास्तविक जीवन में समान स्थितियों को उदाहरणों के जरिये समझाओ, ताकि वे काम सँभालने का कोई निश्चित तरीका या कोई विनियम याद रख सकें। वे ऐसा क्यों करते हैं? इसलिए क्योंकि चीजों को समझने की उनकी क्षमता बहुत खराब होती है—तुम यह भी कह सकते हो कि उनमें चीजों को समझने की कोई क्षमता नहीं होती; वे नहीं जानते कि वास्तविक जीवन में या अपना कर्तव्य निभाते समय सिद्धांत कैसे लागू किए जाएँ। चाहे तुम उनके साथ कैसे भी संगति करो, चाहे तुम कितने भी विशिष्ट उदाहरण दो और कितने भी सिद्धांत स्पष्ट रूप से समझाओ, यहाँ तक कि विशेष स्थितियाँ सँभालने के सिद्धांत भी समझाओ, वे दिन भर सुनकर भी उसे नहीं समझ सकते। उन्हें लगता है कि तुम जो कह रहे हो वह सिर्फ सिद्धांत है और वे अभी भी नहीं जानते कि वास्तविक जीवन में सामने आने वाली विभिन्न समस्याओं को कैसे सँभालें। यह चीजों को समझने की क्षमता की कमी दर्शाता है। चाहे दूसरे लोग उन्हें चीजें कैसे भी समझाएँ, जिन लोगों में चीजों को समझने की क्षमता की कमी होती है, वे उसे नहीं समझ सकते—यह खराब काबिलियत होना है। क्या खराब काबिलियत वाले लोगों की चीजें करने में दक्षता और प्रभावशीलता भी खराब होती है? (हाँ।) अगर व्यक्ति की चीजों को समझने की क्षमता खराब है तो चीजें करने में उसकी दक्षता और प्रभावशीलता निश्चित रूप से खराब होगी; जब उसका किसी चीज से सामना होगा तो उसे नहीं पता होगा कि इसमें कौन-से सिद्धांत शामिल हैं और वह नहीं जानता होगा कि वास्तविक जीवन में सिद्धांतों को कैसे लागू किया जाए। यह खराब काबिलियत दर्शाता है। एक और प्रकार का व्यक्ति होता है जो दूसरों की संगति जितनी विस्तृत और विशिष्ट होती है, उतना ही ज्यादा भ्रमित हो जाता है और उसे समझने में असमर्थ रहता है। उदाहरण के लिए, जब परमेश्वर का घर नकली अगुआओं और मसीह-विरोधियों का भेद पहचानने के बारे में संगति करता है तो उसे सुनने के बाद वह कहता है, “मैं इसे क्यों नहीं समझ पा रहा? सिद्धांतों पर संगति होती है, उदाहरण दिए जाते हैं और विशेष स्थितियाँ सूचीबद्ध की जाती हैं, लेकिन यह सब मुझे बहुत गड्ड-मड्ड लगता है। यहाँ वास्तव में कहा क्या जा रहा है? हमसे किस तरह के लोगों को सँभालना अपेक्षित है? हमें नकली अगुआओं को सँभालना है या मसीह-विरोधियों को? क्या हमारी कलीसिया का अगुआ मसीह-विरोधी है? वह व्यक्ति थोड़ा बुरा लगता है—उसकी अभिव्यक्तियाँ भ्रष्ट स्वभाव के कारण हैं या बुरी मानवता के कारण? आखिर वह इनमें से क्या है, नकली अगुआ या मसीह-विरोधी? मैं अभी भी नहीं समझता।” वह यह तक नहीं समझता कि तुम जिन सत्य सिद्धांतों के बारे में संगति करते हो वे क्या हैं; जितना ज्यादा वह सुनता है, उतना ही ज्यादा भ्रमित हो जाता है। न सिर्फ वह इन सत्य सिद्धांतों को वास्तविक स्थितियों से जोड़ने में विफल रहता है, बल्कि वह इतना भ्रमित हो जाता है कि वह यह भी नहीं जानता कि तुम जो कह रहे हो उसका विषय क्या है। क्या यह चीजों को समझने की क्षमता की कमी नहीं दर्शाता? (हाँ, दर्शाता है।) उदाहरण के लिए, ऐसी स्थिति की कल्पना करो जिसमें सभी लोग एक ही विषय पर संगति करने के लिए एकत्र हुए हैं और प्रत्येक व्यक्ति अपने विचार प्रस्तुत कर रहा है। तुम अपनी समझ के बारे में संगति करते हो, मैं उसके बारे में अपनी समझ व्यक्त करता हूँ; एक व्यक्ति एक प्रश्न करता है, दूसरा व्यक्ति एक अलग प्रश्न करता है—सब इसी विषय पर केंद्रित होते हैं। बिना काबिलियत वाले लोग इस तरह की चर्चा सुनते हैं और उसे समझ नहीं पाते। अपने दिल में वे सोचते हैं, “तुम सभी लोग किस बारे में बात कर रहे हो? मैं इसे क्यों नहीं समझ पा रहा?” वे उलझ जाते हैं। वे दूसरों द्वारा किए गए उचित प्रश्नों के पीछे का अंतर्निहित तर्क नहीं समझ पाते या यह कि ये प्रश्न क्यों उठाए जा रहे हैं—वे इसके पीछे के कारणों का पता नहीं लगा सकते; वे महज दर्शक से भी बदतर होते हैं। काबिलियत वाले लोग किनारे से देखकर भी बता सकते हैं कि कौन सही है और कौन गलत है, कोई व्यक्ति कोई खास सवाल क्यों पूछ रहा है, सवाल गहरे हैं या उथले, सवालों के जवाब कैसे दिए जा रहे हैं—लेकिन बिना काबिलियत वाले लोग इनमें से कुछ नहीं समझ सकते और न इनके पीछे का तर्क ही समझ सकते हैं। इससे पता चलता है कि उनमें चीजों को समझने की क्षमता नहीं होती। जब दूसरे लोग किसी चीज के बारे में संगति करते हैं तो वे सुनने के बाद भेद नहीं पहचान सकते। वे नहीं जानते कि जो कहा गया वह सत्य और वस्तुनिष्ठ है या नहीं, न ही वे मामले की पृष्ठभूमि और उसका सार समझ पाते हैं—वे पूरी तरह से किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं। जहाँ तक इन बातों का संबंध है कि इस विषय पर चर्चा क्यों की जा रही है, इस विषय में शामिल सिद्धांतों पर बार-बार जोर देने की आवश्यकता क्यों है और साथ ही किसके सवाल इन सिद्धांतों से संबंधित हैं और किसके नहीं, वे इनमें से किसी को भी नहीं समझ सकते या उसका अर्थ नहीं निकाल सकते। जैसे-जैसे वे सुनते रहते हैं, वे उनींदे हो जाते हैं; वे खुद को इस संगति में महज दर्शक समझने लगते हैं और उनके दिलों में धुंध छा जाती है। दूसरे लोगों के साथ सत्य सिद्धांतों पर जितनी ज्यादा संगति की जाती है, उनके मन उतने ही साफ और स्पष्ट होते जाते हैं। लेकिन बिना काबिलियत वाले लोग जितना ज्यादा सुनते हैं, उतने ही ज्यादा उलझते जाते हैं और उनके विचार उतने ही ज्यादा धुँधले होते जाते हैं। यह चीजों को समझने की क्षमता की कमी दर्शाता है। क्या यह बेहद खराब काबिलियत नहीं दर्शाता? ऐसे लोगों को बिना काबिलियत वाले लोग भी कहा जा सकता है। बिना काबिलियत वाले लोग कैसे होते हैं? (मानसिक रूप से कमजोर लोग।) मानसिक रूप से कमजोर, मूर्ख, बेवकूफ—यह सबसे खराब काबिलियत वाले लोगों की श्रेणी है। यह दूसरा पहलू है : चीजों को समझने की क्षमता।

नंबर 3 : बोध क्षमता

तीसरा पहलू है बोध क्षमता। बोध क्षमता चीजों को समझने की क्षमता के समान ही है लेकिन एक कदम आगे जाती है। इनके बीच क्या अंतर है? बोध क्षमता इस बात पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करती है कि सत्य के सिद्धांतों और अभ्यास के मार्गों को समझने और इनमें महारत हासिल करने के बाद इन सिद्धांतों और मार्गों को वास्तविक जीवन की विभिन्न समस्याओं के अनुरूप कैसे किया जाए और फिर इन्हें वास्तविक कार्य में कैसे लागू किया जाए। अंतर यहीं पर है। बोध क्षमता वाले लोग किसी चीज की मूलभूत बातों और सिद्धांतों को समझने के बाद अपने दिलों में अभ्यास का एक मार्ग और एक सटीक दायरा, एक दिशा और एक लक्ष्य रखते हैं। वे जानते हैं कि ये मूलभूत बातें और सिद्धांत कैसे लागू किए जाएँ और वे कुछ विशेष स्थितियों में शामिल अभ्यास के सिद्धांत भी जानते हैं। मान लो, कुछ सत्य सिद्धांतों पर संगति सुनने के बाद व्यक्ति कुछ समस्याओं का सार पहचान सकता है और फिर वास्तविक जीवन में कुछ ठोस समस्याएँ हल करने के लिए सत्य का उपयोग कर सकता है। यानी, ये सिद्धांत सुनने के बाद वह तुरंत समझ जाता है कि उसे पिछली स्थिति के जवाब में कैसे अभ्यास करना चाहिए था, और जब स्थितियाँ फिर से आती हैं तो वह यह भी जानता है कि उनसे निपटने के लिए सिद्धांत कैसे लागू किए जाएँ, और उसके दिल में तुरंत अभ्यास का मार्ग होता है; सिद्धांतों और मूलभूत बातों का उसका बोध एक मार्गदर्शक प्रकाश की तरह काम करता है जो उसे झटपट यह जानने में सक्षम बनाता है कि जीवन या कार्य में विभिन्न समस्याएँ कैसे सँभालनी हैं और वह उसे अभ्यास का मार्ग, दिशा और सिद्धांत रखने में सक्षम बनाता है। उस स्थिति में, ऐसे व्यक्ति में बोध क्षमता होती है, जो बेशक अच्छी काबिलियत की अभिव्यक्ति है। मान लो कोई व्यक्ति सत्य सिद्धांतों पर कुछ संगति सुनने के बाद जान जाता है कि उसे अपने वास्तविक जीवन की उन चीजों का अभ्यास कैसे करना चाहिए और उन्हें कैसे सँभालना चाहिए जो सामान्य और सार्वभौमिक हैं या जिन्हें उसने अनुभव किया है। लेकिन वह नहीं जानता कि ये सत्य सिद्धांत उन विशेष, जटिल स्थितियों, अप्रत्याशित स्थितियों या असामान्य समस्याओं और प्रघटनाओं पर कैसे लागू किए जाएँ जिनका उसने अनुभव नहीं किया है और उसे अभी भी यह जानने से पहले कि उन्हें कैसे सँभाला और हल किया जाए, एक सटीक उत्तर या अभ्यास की एक विशिष्ट योजना प्राप्त करने के लिए खोज और पूछताछ करने की जरूरत होती है। वरना सत्य सिद्धांतों को सुनने के बाद भी वह नहीं जानता कि ऐसे मामलों या समस्याओं को कैसे सँभालना है। यह दर्शाता है कि उसमें औसत बोध क्षमता है; या यह भी कहा जा सकता है कि ऐसा व्यक्ति औसत काबिलियत वाला है। कुछ लोगों ने दस या बीस साल तक काम किया होता है और कुछ कार्य-अनुभव और परमेश्वर के घर से सत्य सिद्धांतों की स्पष्ट संगति के साथ वे जानते हैं कि सामान्य परिस्थितियाँ कैसे सँभालनी हैं और उन्होंने इस बात की पुष्टि प्राप्त कर ली होती है कि उन्हें इस तरह से सँभालना सही है। लेकिन कुछ जटिल, विशेष, असामान्य समस्याओं से सामना होने पर, जिनका उन्होंने अपने काम में कभी अनुभव नहीं किया होता है, वे नहीं जानते कि उन्हें कैसे सँभालना है और इससे पहले कि वे उन्हें सँभालना शुरू करें, उन्हें पूछताछ करके स्पष्ट उत्तर प्राप्त करना पड़ता है। अगर स्थिति बदल जाती है और उनकी कल्पना या उनके द्वारा ज्ञात परिस्थितियों से ज्यादा जटिल हो जाती है तो वे भ्रमित हो जाते हैं, वे नहीं जानते कि उन्हें उनका कैसे सामना करना चाहिए और यह तो बिल्कुल नहीं जानते कि उन्हें सिद्धांतों के अनुरूप कैसे अभ्यास करना चाहिए और कैसे उन्हें सँभालना चाहिए। जब वे नहीं जानते कि अभ्यास कैसे करना है, चाहे वे अपनी कल्पनाओं, अपनी महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं के आधार पर कार्य करें या बस उसे एक तरफ रखकर अनदेखा कर दें—चाहे वे कैसे भी कार्य करें—यह तथ्य कि ऐसी स्थिति से सामना होने पर वे भ्रमित हो जाते हैं और यह नहीं जानते कि उसे सँभालने के लिए सिद्धांत कैसे लागू किए जाएँ, यह साबित करता है कि उनकी काबिलियत बहुत औसत है। अगर कोई व्यक्ति सामान्य स्थितियाँ सँभाल सकता है लेकिन विशेष स्थितियाँ सँभालना नहीं जानता तो यह औसत काबिलियत दर्शाता है। अगर कुछ विशेष स्थितियों से सामना होने पर वे इतने भ्रमित हो जाते हैं कि उन समस्याओं को भी नहीं सँभाल पाते जिन्हें वे सामान्य रूप से सँभाल सकते हैं, तो यह खराब काबिलियत दर्शाता है। खराब काबिलियत वाले व्यक्ति की बोध क्षमता भी खराब होती है। क्या खराब बोध क्षमता वाले व्यक्ति और समुचित बोध क्षमता वाले व्यक्ति के बीच कोई अंतर होता है? (हाँ।)

कुछ लोग सिद्धांतों पर पकड़ नहीं बना सकते, दूसरे लोग चाहे कैसे भी संगति करें। वे सिर्फ धर्म-सिद्धांतों और विनियमों को समझते हैं और कुछ नारे लगा सकते हैं, लेकिन वे नहीं जानते कि वास्तविक कार्य कैसे करें और समस्याएँ कैसे हल करें। तुम देखो, संगति सुनने के बाद वे बहुत स्पष्टता और विन्यास के साथ बोलते हैं, मानो वे वास्तव में समझते हों। लेकिन असल में जो कहा गया था उसे उन्होंने बिल्कुल भी नहीं समझा होता। जब ठोस कार्य करने की बात आती है तो वे भ्रमित हो जाते हैं, वे नहीं जानते कि कहाँ से शुरू करें। समस्याओं का सामना करते समय वे नहीं जानते कि उन्हें कैसे हल किया जाए। वे अभी भी ठोस कार्य नहीं कर सकते। विभिन्न लोगों और मामलों के साथ पेश आने और उन्हें सँभालने में उनमें अभी भी सिद्धांतों की कमी होती है। अपने दिल में वे सोचते हैं, “धर्मोपदेश सुनते समय मैंने सत्य सिद्धांत समझे थे—मैं उन्हें वास्तविक जीवन के परिवेशों में लागू क्यों नहीं कर सकता? ऐसा क्यों है कि जो मैं समझता हूँ और जिसके बारे में अक्सर बात करता हूँ वह काम नहीं करता?” वे फिर से हैरान हो जाते हैं। खराब काबिलियत वाले लोग सिर्फ धर्म-सिद्धांतों के बारे में बात करना और विनियमों का पालन करना जानते हैं, लेकिन परिस्थितियों से सामना होने पर वे उन्हें स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते, वे जो धर्म-सिद्धांत बोल सकते हैं वे पूरी तरह से बेकार होते हैं, वे विनियमों का पालन तक नहीं कर सकते और किसी समस्या का समाधान नहीं कर सकते। वे नहीं जानते कि कठिनाइयाँ आने पर उन्हें कैसे अभ्यास करना चाहिए। उदाहरण के लिए, जब कोई बेतुकी बातें कहते हुए कलीसिया के कार्य में गड़बड़ करता है और बाधा डालता है तो वे भेद नहीं पहचान पाते कि इस मामले की प्रकृति क्या है। वे नहीं जानते कि कौन-सी चीजें विघ्न-बाधाएँ मानी जाती हैं या उनकी प्रकृति क्या है; फिर यह तो दूर की बात है कि समस्या का समाधान कैसे किया जाना चाहिए। कोई उनसे पूछता है, “क्या तुम नहीं जानते कि बुरे लोगों का भेद कैसे पहचाना जाए? बुरे लोगों को सँभालने की बात आने पर तुम्हारे पास सिद्धांतों की कमी क्यों होती है?” वे जवाब देते हैं, “मैं इन धर्म-सिद्धांतों को समझता हूँ लेकिन मैं यह नहीं जानता कि वे किन समस्याओं को हल करने के लिए उपयुक्त हैं या किन लोगों पर लागू करने के लिए उपयुक्त हैं।” यह बोध क्षमता की कमी दर्शाता है, है ना? (हाँ।) तुम देखो, सिद्धांतों को सुनने के बाद वे उनके शाब्दिक अर्थ के अनुसार उनका बहुत अच्छी तरह बिंदुवार सारांश प्रस्तुत करने, उन्हें काफी सटीक रूप से याद रखने, यहाँ तक कि उनका धाराप्रवाह ढंग से पाठ करने में भी सक्षम थे, वे एक भी शब्द नहीं भूलते थे। लेकिन दुर्भाग्य से वास्तविक जीवन में जब लोगों और चीजों को देखने और आचरण और क्रियाकलाप करने की बात आती है तो उनके पास अभ्यास का कोई मार्ग बिल्कुल नहीं होता, वे सिर्फ नारे लगाना, धर्म-सिद्धांतों के बारे में बात करना और विनियमों का पालन करना जानते हैं। चाहे वास्तविक जीवन में हो या अपना कर्तव्य निभाने में, किसी भी चीज का सामना करने पर वे नहीं जानते कि सत्य कैसे खोजें या सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास कैसे करें। यह बोध क्षमता की कमी दर्शाता है। जिन लोगों में बोध क्षमता की कमी होती है, हालाँकि वे अक्सर परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं, लेकिन वे यह नहीं समझ सकते कि परमेश्वर के वचनों में सत्य क्या है या सिद्धांत क्या हैं। इसलिए जब कुछ होता है तो वे उसका भेद पहचानने और उसे हल करने के लिए परमेश्वर के प्रासंगिक वचन नहीं खोज पाते और दूसरों को उनके लिए परमेश्वर के प्रासंगिक वचन खोजने पड़ते हैं। परमेश्वर के वचन पढ़ते समय वे हमेशा किस चीज पर ध्यान केंद्रित करते हैं? वे यह तलाशते हैं कि मामला समझाने के लिए विशिष्ट उदाहरण हैं या नहीं। अगर उदाहरण नहीं होते तो वे परमेश्वर के वचनों का अर्थ नहीं समझ सकते। उदाहरण के लिए, परमेश्वर के जो वचन लोगों का प्रकृति सार उजागर करते हैं, अगर उनके बारे में कोई उदाहरण नहीं दिया जाता तो वे उन्हें समझ नहीं सकते। वे परमेश्वर के वचनों के साथ अपनी अवस्थाओं की तुलना करके भेद पहचानने का अभ्यास नहीं कर सकते। अगर कोई सत्य पर संगति करे और उनकी वास्तविक दशाओं के अनुसार उनका भेद पहचाने और गहन-विश्लेषण करे, तभी वे समझ सकते हैं। ऐसी संगति के बिना वे परमेश्वर के वचनों को नहीं समझ सकते। ऐसे लोग परमेश्वर के वचनों को पढ़ते समय हमेशा यह कहते हुए शिकायत करते हैं, “इनमें विशिष्ट उदाहरण क्यों नहीं हैं? मैं इसे खुद से कैसे जोड़ सकता हूँ? इन वचनों को समझना बहुत कठिन है; मैं चाहे इन्हें कैसे भी पढ़ूँ, मैं इनका अपने से मिलान नहीं कर सकता!” इससे पता चलता है कि वे परमेश्वर के वचनों को नहीं समझ सकते, सत्य समझना या परमेश्वर के वचनों को वास्तविक जीवन में उतारना तो दूर की बात है। वे सिर्फ सरल धर्म-सिद्धांत और विनियम ही समझते हैं, लेकिन ये धर्म-सिद्धांत और विनियम वास्तविक जीवन में बेकार होते हैं। जब चीजें घटित होती हैं तो अब भी उनके पास अभ्यास का कोई मार्ग नहीं होता। यह दर्शाता है कि उनमें बोध क्षमता नहीं है। क्या बिना बोध क्षमता वाले लोग खराब काबिलियत वाले होते हैं? (हाँ।) सबसे खराब काबिलियत वाले लोग वे होते हैं जिनमें बिल्कुल भी काबिलियत नहीं होती; ऐसे लोग सुने गए विभिन्न सिद्धांतों को समझ नहीं सकते; वे नहीं जानते कि फलाँ-फलाँ उदाहरण क्यों दिए जाते हैं, विशेष बातें क्यों कही जाती हैं या लोगों में कुछ निश्चित अभिव्यक्तियाँ क्यों होती हैं—वे ऐसी चीजें नहीं समझ सकते, ये चीजें उनकी समझ से परे होती हैं। यहाँ तक कि अगर तुम उन्हें कुछ उदाहरण दो तो भी उन्हें ऐसा लगता है कि तुम बस कहानियाँ या चुटकुले सुना रहे हो, मानो वे बच्चे हैं जो कोई कहानी सुन रहे हैं और वह उन्हें दिलचस्प और मनोरंजक लग रही है। अगर कोई उनसे पूछे कि जो उन्होंने सुना है क्या वे उसे समझते हैं तो वे कहते हैं कि वे समझते हैं, और यहाँ तक कि वे दूसरों के शब्दों के हास्य की नकल उतार सकते हैं या इस बात की नकल कर सकते हैं कि उन्होंने लोगों को कैसे डाँटा था। अगर तुम उनसे पूछो, “क्या तुम वे प्रासंगिक सिद्धांत जानते हो जिनका लोगों को पालन करना चाहिए?” तो वे जवाब देते हैं, “हैं? उसमें सिद्धांत भी हैं? मुझे यह समझ में नहीं आया।” क्या ऐसे लोगों में बोध क्षमता होती है? (नहीं।) उनमें बोध क्षमता नहीं होती और वे परमेश्वर के वचन नहीं समझ सकते। जिन लोगों में बोध क्षमता नहीं होती वे रोज नियमित तरीके से और समय-सारणी के अनुसार परमेश्वर के वचनों के कुछ अंश या अध्याय खाते-पीते हैं, और वे निर्धारित समय पर भजन भी सीखते हैं और सभाओं में भी शामिल होते हैं। लेकिन जब वे अपनी किताबें या अपने भजनों की रिकॉर्डिंग बंद कर देते हैं तो उन्होंने जो खाया-पीया था, उसमें से कुछ आध्यात्मिक वाक्यांश और कुछ मृत शब्द ही उन्हें याद रह जाते हैं, जैसे कि वे वाक्यांश जिन्हें लोग अक्सर कहते हैं—“परमेश्वर हर चीज पर संप्रभु है,” और “सभी चीजों में परमेश्वर के प्रति समर्पण करो”; या “मनुष्य का भाग्य परमेश्वर द्वारा निर्धारित किया जाता है,” और “बस परमेश्वर से प्रेम करने का अभ्यास करो।” पीड़ा की वास्तविक स्थितियों में वे सिर्फ छद्म आध्यात्मिक वाक्यांश ही बोल पाते हैं, जैसे कि “मैं भावनाओं के कारण कष्ट उठा रहा हूँ” या “मैं देह के कारण पीड़ा भोग रहा हूँ।” जहाँ तक स्व-आचरण, दैनिक जीवन, कार्य से संबंधित सिद्धांतों और सत्य के अन्य विभिन्न सिद्धांतों की बात है, वे उनमें से किसी को भी न तो जानते हैं और न ही समझते हैं। ये चीजें उनके दिलों से गायब रहती हैं और उनके भीतर समा नहीं सकतीं। ये चीजें समा क्यों नहीं सकतीं? क्योंकि अपनी काबिलियत के संदर्भ में ऐसे लोग इन सत्य सिद्धांतों को समझ ही नहीं सकते और ये सत्य सिद्धांत उनकी समझ से परे होते हैं; इसलिए ये चीजें उनके दिलों में जड़ नहीं जमा सकतीं। व्यक्ति के पास आंतरिक रूप से जो होता है और जिसे वह स्वीकारने में सक्षम होता है, वह यह सत्यापित करता है कि वह क्या समझ सकता है और क्या उसकी समझ से परे नहीं है। अगर व्यक्ति में काबिलियत बिल्कुल नहीं है, उसमें बोध क्षमता का अभाव है और वह परमेश्वर के वचनों का सटीक अर्थ नहीं समझ सकता तो उसे स्वर्ग या तीसरे स्वर्ग में रखने पर भी क्या वह परमेश्वर के वचन समझ सकता है? क्या वह सत्य को अभ्यास में ला सकता है? क्या वह परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकता है? (नहीं।) वह बिल्कुल वैसा ही बना रहेगा जैसा वह है। उसकी काबिलियत वैसी ही रहेगी जैसी हमेशा रही है। खराब काबिलियत वाले लोग बहुत सीमित दायरे में ही चीजें समझ सकते हैं। अच्छी काबिलियत वाले लोग ज्यादा गहराई के साथ और ज्यादा उच्च स्तर पर, ज्यादा समझ सकते हैं। औसत काबिलियत वाले लोग अच्छी काबिलियत वाले लोगों की तुलना में बहुत कम समझते हैं; जो कुछ वे समझ सकते हैं वह एक औसत दायरे तक ही सीमित होता है और वह इस दायरे से आगे नहीं जा सकता क्योंकि उनकी काबिलियत उन्हें सीमित करती है। सबसे बुरे वे होते हैं जिनमें काबिलियत बिल्कुल नहीं होती। सिर्फ उनकी काबिलियत के लिहाज से देखा जाए तो ऐसे लोगों में कोई बोध क्षमता नहीं होती। इसलिए वास्तविक जीवन में और अपना कर्तव्य निभाने में उनकी अभिव्यक्ति यह होती है कि वे कुछ नहीं समझते; चाहे वे दस साल से, बीस साल से, यहाँ तक कि बुढ़ापे तक परमेश्वर में विश्वास करते रहे हों, परमेश्वर में विश्वास से संबंधित धर्म-सिद्धांत और आध्यात्मिक वाक्यांश जिनके बारे में वे बात करते हैं, अभी भी वही पुरानी चीजें होती हैं जिन्हें उन्होंने तब समझा था जब उन्होंने पहली बार विश्वास करना शुरू किया था। चाहे वे कितने भी साल विश्वास करें, वे कोई प्रगति नहीं करते। वे प्रगति क्यों नहीं करते? क्योंकि उनमें बोध क्षमता नहीं होती, और चाहे वे कितने भी साल परमेश्वर में विश्वास करें, जो चीजें वे ग्रहण कर सकते हैं वे सिर्फ मृत शब्द ही होते हैं। कई वर्षों तक विश्वास करने के बाद भी उनकी सीखने की क्षमता, चीजों को समझने की क्षमता, बोध क्षमता और अन्य क्षमताएँ नहीं सुधरतीं। वे किस तरह के लोग होते हैं? वे अत्यंत खराब काबिलियत वाले लोग होते हैं। चूँकि उनकी काबिलियत खराब होती है और उनकी विभिन्न क्षमताएँ नहीं सुधरतीं, इसलिए भले ही ऐसे लोग चालीस, पचास, साठ या सत्तर साल के होने तक जीवित रहें, फिर भी अपना ख्याल रखने की उनकी क्षमता बहुत कमजोर होगी। उनकी जीवित रहने की क्षमता और अपना ख्याल रखने की उनकी क्षमता देखकर तुम बता सकते हो कि ऐसे लोगों की काबिलियत कैसी है। ऐसा व्यक्ति मानसिक रूप से कमजोर, मूर्ख और बेवकूफ होता है और अपना ख्याल रखने की उसकी क्षमता बहुत खराब होती है। मैं क्यों कहता हूँ कि अपना ख्याल रखने की उसकी क्षमता खराब होती है? चूँकि उसकी सीखने की क्षमता, चीजों को समझने की क्षमता और बोध क्षमता सब खराब हैं, इसलिए जीवन में चीजें करने का जो अनुभव, सामान्य ज्ञान, प्रतिमान और युक्तियाँ वह हासिल करता है, वे बहुत सीमित होती हैं। साठ-सत्तर साल की उम्र में भी वह वैसा ही बना रहता है। अच्छी काबिलियत वाले लोग जब तक अपनी उम्र के तीसरे दशक में पहुँचते हैं तब तक वे जीवन में और अपने जीवन-पथ पर आने वाली विभिन्न समस्याओं के बारे में कुछ ज्ञान प्राप्त कर चुके होते हैं, उन्हें इन चीजों की कुछ समझ, अंतर्दृष्टि और अनुभव प्राप्त हो चुका होता है। इस अनुभव के जरिये वे जानते हैं कि विभिन्न समस्याओं का सामना करने पर उन्हें क्या करना चाहिए, ताकि वे बेहतर जीवन जी सकें और खुद को ज्यादा प्रभावी ढंग से सुरक्षित रख सकें। लेकिन जहाँ तक खराब काबिलियत वाले लोगों का संबंध है, चूँकि सभी पहलुओं में उनकी क्षमताएँ कमजोर होती हैं, इसलिए चाहे वे कितनी भी उम्र के हो जाएँ, उनकी जीवित रहने की क्षमता बहुत खराब रहती है। वह कितनी खराब रहती है? वह इतनी खराब रहती है कि उनमें स्वतंत्र रूप से जीने की क्षमता नहीं होती। कुछ लोग कह सकते हैं, “देखो, वे दिल खोलकर खाते हैं, चैन की नींद सोते हैं और उनका शारीरिक स्वास्थ्य अच्छा है—तुम कैसे कह सकते हो कि उनमें स्वतंत्र रूप से जीने की क्षमता नहीं है?” हम जिस जीने की क्षमता की बात कर रहे हैं उसका संबंध इस बात से नहीं है कि कोई खा या सो सकता है या नहीं। अगर किसी व्यक्ति को खाने का समय होने पर खाने की सुध तक नहीं है तो वह सामान्य व्यक्ति नहीं है, बल्कि मानसिक रूप से विकलांग है—ऐसे लोगों की काबिलियत पर विचार करने की जरूरत तो और भी कम है। लोगों की काबिलियत के हमारे मूल्यांकन के दायरे में मुख्य रूप से वे लोग आते हैं जिन्हें बाहरी तौर पर सामान्य माना जाता है। इसमें शारीरिक विकलांगता, मानसिक विकलांगता, मानसिक बीमारी या अपना ख्याल रखने की क्षमता की कमी वाले लोग नहीं आते। हम अक्सर कुछ ऐसे लोगों को देखते हैं जो अपने भोजन, वस्त्र, आवास और परिवहन के प्रबंधन में चीजें करने के लिए कोई प्रतिमान, सिद्धांत या युक्ति तक नहीं खोज पाते। चाहे वे कितनी भी उम्र के हो जाएँ, वे नहीं जानते कि जीवन के इन पहलुओं को उस तरह से कैसे सँभालें जो सिद्धांतों और मानवता के अनुरूप हो। उदाहरण के लिए, वे नहीं जानते कि अलग-अलग मौसमों के लिए कौन-से कपड़े सबसे उपयुक्त हैं और वे बस दूसरों का अनुसरण करते हैं। जब बाहर ठंड होती है तो वे बहुत पतले कपड़े पहन लेते हैं और उन्हें जुकाम हो जाता है, फिर भी उन्हें समझ नहीं आता कि ऐसा क्यों हुआ; या वे अस्वच्छ खाना खाने से बीमार पड़ जाते हैं लेकिन यह नहीं जानते कि इसका क्या कारण है। वे इन अनुभवों से कोई निष्कर्ष नहीं निकाल पाते। क्या वे मानसिक रूप से कमजोर नहीं हैं? क्या उनमें स्वतंत्र रूप से जीने की क्षमता का अभाव नहीं है? (हाँ, है।) चाहे वे कितने भी साल के क्यों न हों, वे नहीं जानते कि कैसे जीना है और बस भ्रम में जीवन गुजारते रहते हैं। जहाँ तक किसी सामान्य व्यक्ति की बात है, जब उसका पहला बच्चा होता है तब उसके पास अनुभव की कमी हो सकती है लेकिन जब तक उसका दूसरा बच्चा होता है तब तक उसे इस बारे में कुछ अनुभव प्राप्त हो जाता है कि अपने बच्चे की देखभाल कैसे की जाए और कैसे उसको खिलाया-पिलाया जाए। लेकिन कुछ लोगों को दो-तीन बच्चे होने के बाद भी कोई अनुभव नहीं होता। जब उनसे पूछा जाता है कि वे अपने बच्चों की देखभाल कैसे करते हैं तो वे कहते हैं, “पता नहीं, मैं तो बस जैसे-तैसे काम चला लेता हूँ। वैसे भी, जब बच्चे भूखे होते हैं तो मैं उन्हें खाना खिला देता हूँ और जब उनका पेट भर जाता है तो बस हो गया।” उनके हाथों में सौंपा गया कोई भी बच्चा बच जाए तो भाग्यशाली होगा। उनके जीवित रहने की क्षमता के स्तर को देखते हुए, उनकी देखरेख में एक भी बच्चा जीवित नहीं बचेगा। कुछ लोग यह नहीं समझते कि जीवन में या जीवित रहने में आने वाली विभिन्न समस्याओं को कैसे सँभालना है। ऐसे लोगों में जीवित रहने की क्षमता नहीं होती। उदाहरण के लिए, जब एक ही समय में दो समस्याएँ पैदा हो जाती हैं तो वे भ्रमित हो जाते हैं और नहीं जानते कि क्या करें या कौन-सी समस्या पहले सँभालें। वे घबरा जाते हैं, बेचैन हो जाते हैं और डर जाते हैं, और यह कहते हुए शिकायत करते हैं, “ये दो समस्याएँ एक ही समय में क्यों उत्पन्न हो गईं? अब मुझे क्या करना चाहिए?” वे इतने चिंतित हो जाते हैं कि खा या सो भी नहीं सकते। वे अपनी उम्र के तीसरे दशक में भी ऐसे ही रहते हैं और छठे दशक में भी ऐसे ही रहते हैं। जब स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं और वे उनका समाधान नहीं खोज पाते तो वे रोने लगते हैं। दूसरे कहते हैं, “तुम रो क्यों रहे हो? यह कोई बड़ी बात नहीं है—ये कुछ सबसे आम समस्याएँ हैं। तुम्हें बस उन्हें महत्व के आधार पर प्राथमिकता देने और सँभालने की जरूरत है।” अगर कोई व्यक्ति इन मामलों को नहीं सँभाल पाता और इनके कारण उसका खाना और सोना छूट जाता है, यहाँ तक कि वह अपना जीवन समाप्त करने के बारे में भी सोचने लगता है तो क्या वह बहुत ही कायर नहीं है? यहाँ तक कि वह यह शिकायत भी करता है, “यह किसी और के साथ क्यों नहीं हुआ? यह मेरे साथ ही क्यों हुआ?” यह तुम्हारे साथ हुआ है, इसलिए इसे सँभालो। अगर तुम इसे नहीं सँभाल सकते तो अपने आस-पास के किसी ऐसे व्यक्ति से पूछो जो समझता हो। जब तुम यह समस्या स्पष्ट रूप से समझ लेते हो तो क्या तुम यह नहीं जान जाओगे कि इसे कैसे सँभालना है? जब कुछ नहीं हो रहा होता तो ऐसे लोग बहुत अच्छी तरह बात करते हैं, धर्म-सिद्धांतों का एक के बाद एक समुच्चय पेश करते हैं। लेकिन जब कुछ होता है तो वे घबरा जाते हैं, भ्रमित हो जाते हैं, रिरियाने लगते हैं, उनका दिमाग खाली हो जाता है और उनके समस्त विचार गड्ड-मड्ड हो जाते हैं—वे नहीं जानते कि क्या करें। अगर कोई युवा है, उसने जीवन में बहुत कुछ नहीं देखा है और उसमें अनुभव की कमी है, तो कुछ होने पर उसका घबरा जाना और डर जाना सामान्य है। लेकिन जब वह अपनी उम्र के तीसरे या चौथे दशक में पहुँचता है तो दुनिया में कई चीजों से गुजरने और अनुभव प्राप्त करने के बाद वह अपेक्षाकृत परिपक्व और अनुभवी हो जाता है और मामलों को ज्यादा स्थिरता और आत्मविश्वास के साथ सँभालता है। जो युवा लोग इसे देखते हैं वे प्रभावित होते हैं और सोचते हैं कि वे ऐसे लोगों पर भरोसा कर सकते हैं। अगर व्यक्ति में काबिलियत और जीवित रहने की क्षमता नहीं होती तो उसमें अपना ख्याल रखने की क्षमता भी नहीं होती। अपने आसपास अपनी सहायता और देखरेख करने वाले वयस्कों या अनुभवी लोगों के बिना वे जो कुछ भी सँभालते हैं वह पूरी तरह से गड़बड़ हो जाता है। ऐसे लोगों की काबिलियत पूरी तरह से खराब होती है। भला कुछ लोगों की काबिलियत कितनी खराब होती है? उदाहरण के लिए, कुछ गृहिणियों को लो, जो नहीं जानतीं कि कई लोगों के परिवार के लिए भोजन में कितना चावल या कितने व्यंजन चाहिए—कुछ गृहिणियाँ बीस-तीस साल से खाना बना रही हैं और फिर भी नहीं जानतीं कि प्रत्येक भोजन कितना बनाना है या व्यंजनों में कितना नमक होना चाहिए और कभी-कभी तो वे यह भी ठीक से नहीं समझ पातीं कि भोजन ठीक से पका है या नहीं। उनकी काबिलियत इतनी खराब होती है। क्या ऐसे लोगों में कार्यशील मस्तिष्क की कमी नहीं होती? उनमें सूअरों का दिमाग होता है! ऐसे लोगों में स्वतंत्र रूप से जीने की क्षमता नहीं होती। उनके पास कुछ भी करने का कोई मार्ग नहीं होता और वे आसानी से गलतियाँ कर बैठते हैं। जब कुछ होता है तो अगर उनके लिए चीजों की देखरेख करने वाला कोई न हो तो वे जो कुछ भी करते हैं वह पूरी तरह से अराजकता में बदल जाता है, सब-कुछ पूरी तरह से गड़बड़ हो जाता है। वे मूर्ख और मानसिक रूप से कमजोर होते हैं। ऐसे व्यक्ति, जिनकी बोध क्षमता सबसे खराब होती है, सत्य सिद्धांतों के बारे में चाहे कितनी भी संगति सुनें, वे सिर्फ धर्म-सिद्धांतों को ही समझते हैं। वास्तविक जीवन में वे फिर भी नहीं जानते कि इन सिद्धांतों को कैसे लागू किया जाए। दूसरे शब्दों में, जिन धर्म-सिद्धांतों को वे समझते हैं वे उन्हें वास्तविक जीवन में कोई लक्ष्य, दिशा या मार्ग प्रदान नहीं कर सकते। ये वे लोग हैं जिनकी बोध क्षमता सबसे खराब होती है। बोध क्षमता नामक तीसरी क्षमता पर हमारी संगति यहीं समाप्त होती है।

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