सत्य का अनुसरण कैसे करें (6) भाग दो

नंबर 4 : चीजों को स्वीकारने की क्षमता

चौथी क्षमता क्या है? चीजों को स्वीकारने की क्षमता। चीजों को स्वीकारने की क्षमता में चीजों को समझने की क्षमता और बोध क्षमता से कुछ भिन्नताएँ होती हैं। चीजों को स्वीकारने की क्षमता में यह शामिल है कि नई चीजें सामने आने पर क्या तुम यह भेद पहचान सकते हो कि वे सकारात्मक हैं या नकारात्मक, और तुम्हारे जीवन, कार्य और अस्तित्व के लिए उनसे क्या लाभ या हानि है, साथ ही यह भी कि तुम उन्हें कैसे देखते हो, उनके साथ कैसे पेश आते हो और उन्हें कैसे लागू करते हो। अगर तुम अच्छी काबिलियत वाले हो तो नई चीजें सामने आने पर तुम विशेष रूप से संवेदनशील और विशेष रूप से सूझबूझ रखने वाले होगे। किसी नई चीज के बारे में झटपट जानकारी प्राप्त करने के बाद तुम यह पहचानने में सक्षम रहोगे कि लोगों के लिए इसके लाभ या हानि या इसकी कमियाँ क्या हैं। अगर यह तुम्हारे वास्तविक जीवन में किसी निश्चित समस्या के लिए लाभदायक है तो तुम तुरंत इसकी ताकतों का उपयोग कर सकते हो; अगर यह हानिकारक है तो तुम लोगों के लिए इसका नुकसान या कमियाँ टाल भी सकते हो। यानी, तुम नई चीजों के प्रति एक निश्चित सीमा तक स्वीकृति रखते हो और जल्दी से उन नई चीजों की असलियत जान सकते हो जो नकारात्मक हैं, लोगों के लिए हानिकारक हैं और जिनमें कमियाँ हैं—यह चीजों को स्वीकारने की क्षमता होना है। चीजों को स्वीकारने की क्षमता और चीजों को समझने की क्षमता और बोध क्षमता के बीच का अंतर इसी में निहित है। चीजों को स्वीकारने की क्षमता मुख्य रूप से व्यक्ति की नई चीजों के प्रति संवेदनशीलता और उनका भेद पहचानने की क्षमता को संदर्भित करती है। अगर तुम नई चीजों का भेद जल्दी पहचान लेते हो, उनकी ताकतें और लाभ जल्दी से स्वीकार लेते हो और उन्हें अपने जीवन या कार्य में काम आने के लिए वास्तविक जीवन में लागू कर लेते हो और फिर उन पुरानी चीजों को छोड़ देते हो या हटा देते हो जिनकी जगह इन नई चीजों ने ले ली है, तो इसका मतलब है कि तुममें चीजों को स्वीकारने की क्षमता है और तुम अच्छी काबिलियत वाले व्यक्ति हो। इसके बाद औसत काबिलियत वाले लोग आते हैं। ऐसे लोग उन कुछ नई चीजों को जो पहले ही पुरानी चीजों की जगह ले चुकी होती हैं, और साथ ही नए मतों और नई प्रौद्योगिकियों को भी स्वीकारने में विशेष रूप से धीमे होते हैं। यह “धीमापन” किसे संदर्भित करता है? यह इस तथ्य को संदर्भित करता है कि जब कोई नई चीज पहले ही व्यापक हो चुकी हो, बहुत व्यापक रूप से इस्तेमाल की जा रही हो और उसका नाम बहुत आम हो गया हो, तभी वे उसे स्वीकार सकते हैं। उन्हें नई चीजों का कोई बोध नहीं होता और वे यह भेद नहीं पहचान पाते कि वे सकारात्मक चीजें हैं या नकारात्मक चीजें। यहाँ तक कि जब सकारात्मक नई चीजें सामने आती हैं, तब भी वे उनके प्रति प्रतिरोधी होते हैं और अपने दिलों में उनके प्रति तिरस्कार की भावना रखते हैं; उनकी हमेशा अपनी धारणाएँ और अपने रवैये होते हैं और वे हमेशा सांसारिक प्रवृत्तियों के अनुरूप रहते हैं और नई चीजों के प्रति बंद और उन्हें स्वीकार नहीं करने वाले होते हैं, उन्हें खारिज कर देते हैं। जब कोई नई चीज व्यापक रूप से फैल जाती है और बहुत-से लोग उसके लाभों का अनुभव और एहसास कर लेते हैं और लोग उससे लाभान्वित हो जाते हैं, तभी वे उसे स्वीकारना और लागू करना शुरू करते हैं। यह औसत काबिलियत वाला होना है। ऐसे लोगों की नई चीजों के प्रति स्वीकृति बहुत निष्क्रिय होती है; वह सक्रिय स्वीकृति नहीं होती। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि एक ओर उनमें नई चीजों के प्रति कोई संवेदनशीलता नहीं होती; वे सुन्न, पिछड़े और बंद होते हैं। दूसरी ओर, ऐसा इसलिए भी होता है कि उनके पास नई चीजों के बारे में कुछ धारणाएँ और मत होते हैं, वे नई चीजों के प्रति तिरस्कार और घृणा का रवैया रखते हैं। इसका व्यक्तिपरक कारण यह होता है कि उनकी काबिलियत औसत होती है, और चीजों को स्वीकारने की उनकी क्षमता औसत होती है जो उन्हें बहुत सुन्न कर देती है; जब नई चीजें उनके सामने आती हैं तो उनमें कोई जागरूकता नहीं होती, कोई भावना नहीं होती और उन्हें सक्रिय रूप से स्वीकारने का रवैया नहीं होता। इसके अलावा, वे नैसर्गिक तौर पर विशेष रूप से पिछड़े और खास तौर से सुन्न और मंदबुद्धि होते हैं। ये दो कारण उन्हें नई चीजें स्वीकार करने में धीमा बनाते हैं। जब बहुत-से लोग पहले से ही किसी चीज का इस्तेमाल कर रहे होते हैं, इस बारे में बात कर रहे होते हैं कि उसके क्या लाभ हैं, उससे क्या सुविधा है, उसका लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता है और वह लोगों को क्या लाभ पहुँचाती है, और उन्होंने यह सब अपनी आँखों से देखा होता है—और अपने आस-पास के लोगों को कुछ हद तक व्यक्तिगत रूप से इसका अनुभव करते हुए भी देखा होता है—तभी वे धीरे-धीरे उसे अपने दिलों में स्वीकारते हैं और फिर उसका इस्तेमाल करना शुरू करते हैं। यह किस तरह की काबिलियत का संकेत देता है? ऐसे लोगों की चीजों को स्वीकारने की क्षमता औसत होती है। चीजों को स्वीकारने की औसत क्षमता होने का मतलब है कि व्यक्ति की काबिलियत औसत है। उदाहरण के लिए, सुसमाचार का प्रचार करने या कुछ पेशेवर काम करने में कुछ भाई-बहन नई पद्धति या पेशेवर तकनीक आजमाने और लागू करने में अग्रणी भूमिका निभाते हैं। उन्हें जल्दी ही लगता है कि इस पेशेवर तकनीक का इस्तेमाल करना बहुत अच्छा है क्योंकि इसके साथ अपना कर्तव्य निभाने में उनकी प्रभावशीलता बहुत अच्छी रहती है और उनकी दक्षता भी बढ़ जाती है। फिर वे तुरंत इस नई तकनीक या तरीके को बढ़ावा देते हैं, अन्य भाई-बहनों को उसे सीखने और लागू करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। अच्छी काबिलियत वाले लोग अपना कर्तव्य निभाने में नई तकनीकें और तरीके खोजने में माहिर होते हैं। बहुत जल्दी वे नई चीज को स्पष्ट रूप से समझकर उसका सही-सही आकलन कर सकते हैं और इस अवसर का लाभ उठा सकते हैं, नई तकनीक या तरीके को पूरी तरह से स्वीकार सकते हैं और उसे वास्तविक जीवन के कार्य में लागू कर सकते हैं। उस नई चीज की ताकतें और कमजोरियाँ क्या हैं और वे क्या परिणाम प्राप्त कर सकती हैं, इस बारे में वे लगातार निष्कर्ष निकाल सकते हैं और फिर समायोजन कर सकते हैं। खोजबीन के दौर से गुजरते हुए वे धीरे-धीरे समझ जाते हैं कि इस तकनीकी विशेषज्ञता या जानकारी के कौन-से पहलू कलीसिया के कार्य में लागू किए जा सकते हैं और कौन-से नहीं। इसके बाद वे सिद्धांतों और परमेश्वर के घर की अपेक्षाओं के अनुसार अपने काम में इस नई चीज में उत्तरोत्तर सुधार करते हैं। जितना ज्यादा वे इस नई चीज में सुधार करते हैं, वह उतनी ही बेहतर होती जाती है और अंततः फल देती है। यह अच्छी काबिलियत की अभिव्यक्ति है। लेकिन कुछ लोग सुसमाचार का प्रचार करते समय अभी भी मूल तरीके से चिपके रहकर या तो एक व्यक्ति के आगे या दो व्यक्तियों के आगे प्रचार करते हैं, या मात्र संख्या पर निर्भर रहते हैं। वे सुन्न और मंदबुद्धि होते हैं और उन्नत तरीका स्वीकारने में धीमे होते हैं। हालाँकि वे मौखिक रूप से स्वीकारते हैं कि उन्नत तरीका बहुत अच्छा लगता है और व्यवहार्य है, लेकिन अपने दिल में उन्हें लगातार संदेह होते हैं। वे डरते हैं कि अगर वे यह तरीका लागू करते हैं तो यह खराब परिणाम देगा, इसलिए वे उसे आजमाने की हिम्मत नहीं करते। दूसरे लोग उन्हें यह कहते हुए मनाते हैं, “तुम्हें इन सब चीजों के बारे में चिंता करने की जरूरत नहीं है। हमने इसे पहले ही आजमा लिया है; इस तरह से अभ्यास करने से विशेष रूप से अच्छे परिणाम मिलते हैं।” लेकिन वे अभी भी उसे आजमाने की हिम्मत नहीं करते और मूल तरीके को ही पकड़े रहते हैं। जब बहुत-से लोग सुसमाचार का प्रचार करने के लिए नए तरीके का इस्तेमाल करते हैं, हर महीने ज्यादा लोगों को प्राप्त करते हैं और दक्षता बढ़ाते हैं, तभी वे अनिच्छा से उसे आजमाने का फैसला करते हैं, लेकिन वे अभी भी सिर्फ छोटे कदम उठाते हैं और अपनी योजनाएँ और रणनीतियाँ पूरी तरह से बदलने की हिम्मत नहीं करते। यह नई चीजों को स्वीकारने में बहुत धीमा होना है; यह औसत काबिलियत का होना है। खराब काबिलियत वाले लोगों में चीजों को स्वीकारने की क्षमता और भी खराब होती है। वे किसी नई चीज को स्पष्ट रूप से नहीं समझ सकते, उसका आकलन नहीं कर सकते और नहीं जानते कि उसके साथ कैसे पेश आएँ। अपने दिलों में वे प्रतिरोधी होते हैं, सोचते हैं कि जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें नई चीजें, नई जानकारी और प्रौद्योगिकियाँ स्वीकार नहीं करनी चाहिए। देखो, वे काफी बंद होते हैं। कुछ संप्रदायों के लोग आज भी बिजली का इस्तेमाल नहीं करते, टेलीविजन नहीं देखते और कंप्यूटर या किसी अन्य इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद का उपयोग नहीं करते। बाहर जाते समय वे आधुनिक परिवहन का इस्तेमाल नहीं करते; वे साइकिल भी नहीं चलाते। वे किस सवारी का इस्तेमाल करते हैं? बैलगाड़ियों और घोड़ागाड़ियों का, जो धूल के बादल उड़ाती चलती हैं। कुछ लोग पूछते हैं, “तुम साइकिल क्यों नहीं चलाते या कार में क्यों नहीं जाते?” वे कहते हैं, “वे चीजें मनुष्य द्वारा बनाई गई हैं। हमें डर है कि अगर हम उनका इस्तेमाल करेंगे तो परमेश्वर इसे पसंद नहीं करेगा।” यह चीजों को स्वीकारने की खराब क्षमता है। चीजों को स्वीकारने की खराब क्षमता वाले लोग कई चीजों को गलत तरीके से देखते हैं। वे अपने पुराने तरीकों से चिपके रहते हैं, अपने ही दृष्टिकोणों पर अड़े रहते हैं, तमाम नई चीजों के प्रति प्रतिरोधी होते हैं। उनका प्रतिरोधी होना अपने आप में उनकी सोच और उनके मन की समस्या है। ऐसी समस्या होना क्या दर्शाता है? रूढ़िवादी तरीके से कहें तो, यह दर्शाता है कि ऐसे लोगों की काबिलियत बहुत औसत होती है। अगर वे लगातार नई चीजें स्वीकार नहीं कर पाते तो उनकी काबिलियत खराब होती है और वे गैर-लचीले मन वाले होते हैं। वे मानते हैं कि परमेश्वर का कार्य अपरिवर्तनशील है और परमेश्वर ने जो भी वचन बोले हैं, वह सदैव वे ही वचन बोलेगा और परमेश्वर ने जो भी कार्य किया है, परमेश्वर सदैव केवल वही कार्य करेगा। जहाँ तक इस मानवजाति और इस युग की बात है, वे मानते हैं कि उन्होंने जो शुरू में देखा और अनुभव किया, वह हमेशा अपरिवर्तित रहेगा और हमेशा ऐसा ही रहेगा। उदाहरण के लिए, 20-30 साल पहले लोगों की कपड़ों के बारे में अपनी समझ के संबंध में एक निश्चित धारणा थी। वे मानते थे कि सूती सामग्री विशुद्ध रूप से प्राकृतिक होती है और सभी प्रकार के सूती वस्त्र अच्छे होते हैं; चाहे सूत की गद्देदार जैकेट हो या टी-शर्ट या अंडरवियर, अगर वह सूत से बनी है तो वह सिंथेटिक फाइबर से बेहतर है। वे बस इस विश्वास पर दृढ़ता से कायम रहे। लेकिन 20-30 साल बाद कपड़ा उद्योग विकसित हो गया है और सूती कपड़े जैसे कई कपड़े और साथ ही विभिन्न सिंथेटिक फाइबर वस्त्र सामने आ गए हैं। ऐसे कई वस्त्र हैं जो सूती कपड़ों से बेहतर हैं; वे ज्यादा हवादार होते हैं, गर्मी तेजी से भगा देते हैं, नमी तेजी से सोख लेते हैं और चाहे उन्हें कैसे भी धोया जाए, उनका आकार नहीं बिगड़ता, वे सिकुड़ते नहीं या उनका रंग फीका नहीं पड़ता। इसके अलावा, वे पहनने में विशेष रूप से आरामदेह और हलके होते हैं, त्वचा को कोई नुकसान नहीं पहुँचाते। लेकिन कुछ लोग अभी भी सिंथेटिक फाइबर को स्वीकार नहीं सकते। वे अभी भी मानते हैं कि सिर्फ सूती कपड़े ही अच्छे होते हैं क्योंकि कपास जमीन में उगाया जाता है, परमेश्वर द्वारा निर्मित है और प्राकृतिक होता है, जबकि सिंथेटिक फाइबर मानव-निर्मित होते हैं। वे यह समझने में विफल रहते हैं कि हालाँकि कपास परमेश्वर द्वारा तैयार किया गया है और सबसे अच्छा है, लेकिन भूमि प्रदूषित हो चुकी है और कपास में लगने वाले कपास के कीड़े हर पीढ़ी के साथ मजबूत होते गए हैं। साधारण कीटनाशक इस समस्या का समाधान नहीं कर सकते। अंततः कपास को विशेष कीटाणुशोधन उपचारों से गुजरना होता है ताकि उसे पहनने से खुजली न हो। अगर अच्छी तरह उपचार किया जाता है तो कपड़े की कीमत ज्यादा हो जाती है जिससे बिक्री-मूल्य बहुत बढ़ जाता है। अगर अच्छी तरह उपचार नहीं किया जाता है तो वह सिंथेटिक फाइबर के कपड़े पहनने जितना अच्छा नहीं होता। देखो, आजकल सिंथेटिक फाइबर के कपड़ों की गुणवत्ता विशेष रूप से अच्छी होती है; कई पेशेवर एथलीट उन्हें पहनते हैं और उनके बारे में फीडबैक सर्वथा काफी सकारात्मक है। लेकिन कुछ लोग यह सुनने के बाद भी उन्हें नहीं स्वीकारते और आश्वस्त रहते हैं कि सूती वस्त्र बेहतर हैं। क्या ऐसे लोग अज्ञानी और जिद्दी नहीं हैं? (हाँ, हैं।) यह अज्ञानता और जिद्दीपन उनकी मानवता की समस्या है। तो उनकी काबिलियत कैसी होती है? (उनकी काबिलियत अच्छी नहीं होती।) जब कोई नई चीज किसी के सामने आती है तो यह आकलन करने में कि यह सही है या गलत—यह तय करने के लिए कि इसे स्वीकार करना है या अस्वीकार—उनका रवैया उनकी काबिलियत पर निर्भर करता है। अगर ज्यादातर लोगों को लगता है कि नई चीज सही है और वे भीड़ का अनुसरण करते हैं और निष्क्रिय रूप से उसे स्वीकार लेते हैं तो ऐसा व्यक्ति ज्यादा से ज्यादा औसत काबिलियत वाला होता है। अगर वे यह भेद नहीं पहचान पाते कि नई चीज सही है या गलत, वह लोगों के लिए फायदेमंद है या नहीं और पुरानी चीजों की तुलना में, जिन पर वे पहले दृढ़ता से विश्वास करते थे, उसमें क्या ताकतें और कमियाँ हैं, वे नई और पुरानी चीजों के बीच का भेद पहचानने या उनमें भेद करने में असमर्थ रहते हैं—अगर वे इनमें से किसी का भी आकलन नहीं कर सकते तो यह साबित होता है कि उनमें नई चीजों को स्वीकारने की क्षमता नहीं है; यानी उनमें कोई बोध क्षमता नहीं है। ऐसे लोग खराब काबिलियत वाले होते हैं। शुरू में जब कुछ नया दिखाई देता है तो उनमें एक हद तक बोध की कमी होती है। जब वे उस चीज के बारे में सुनते हैं तो उनमें उसे स्वीकारने की क्षमता भी बिल्कुल नहीं होती। अंत में अगर वे अनिच्छा से नई चीज स्वीकारते भी हैं तो यह सिर्फ दूसरों की मदद और समझाने-बुझाने से होता है, जिन्हें नई चीज के लाभों और ताकतों की तुलना तक पुरानी चीजों से करनी पड़ती है, ताकि ये लोग अपनी आँखों से देख लें कि नई चीज और पुरानी चीजों के बीच स्पष्ट अंतर हैं और नई चीज स्पष्ट रूप से पुरानी चीजों से बेहतर है, तभी वे उसे स्वीकार पाते हैं। लेकिन अपने दिलों में ये लोग अभी भी स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते कि कई अन्य नई चीजों में क्या अच्छा है और अभी भी महसूस करते हैं कि पुरानी चीजें अच्छी हैं और उन्हें बनाए रखना चाहिए। सिर्फ ऐसी परिस्थितियों में जब उनके पास कोई और विकल्प नहीं होता, वे अनिच्छा और निष्क्रियता से नई चीजें स्वीकारते हैं। ये लोग खराब काबिलियत वाले होते हैं। औसत काबिलियत वाला व्यक्ति वह होता है जो कुछ संकेतों से तुरंत समझ जाता है, यह महसूस करते हुए कि वह चीजों को विकृत, पुराने तरीके से देख रहा था। यह औसत काबिलियत वाला होना है। दूसरी ओर, खराब काबिलियत वाले व्यक्ति को बार-बार संकेतों और अनुबोधनों और सभी लोगों से सामूहिक मान-मनौवल की आवश्यकता होती है—साथ ही कुछ तथ्यों और ठोस उदाहरणों की भी, जो यह दर्शाते हों कि व्यापक रूप से अपनाए जाने के बाद यह नई चीज लोगों को कैसे लाभ पहुँचाएगी—तभी वे उसे अनिच्छा से स्वीकारते हैं और उसका इस्तेमाल करते हैं। हालाँकि निजी तौर पर वे अभी भी पुरानी चीज ही चुनते हैं। यह बहुत खराब काबिलियत वाला व्यक्ति होता है। खराब काबिलियत वाला होने का मतलब है कि वह लगातार नई चीजें आने से लोगों पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभावों को पहचानने में विफल रहता है और नई और पुरानी चीजों के बीच अंतर नहीं देख पाता और लगातार नई चीजों के फायदे और उन्नत गुण और पुरानी चीजों की कमियाँ और पिछड़ापन खोजने या पता लगाने में विफल रहता है और यह भी कि वह हमेशा अपने पुराने विचारों और दृष्टिकोणों पर ही अड़ा रहता है; इसलिए उसकी चीजों को स्वीकारने की क्षमता बहुत खराब होती है। चीजों को स्वीकारने की खराब क्षमता वाले लोग खराब काबिलियत वाले होते हैं। खराब काबिलियत वाले लोग समस्याओं का सार या जड़ नहीं देख सकते, चाहे तुम उन्हें चीजें कैसे भी समझाओ। लोगों के उस हिस्से के बारे में जिसमें सबसे खराब काबिलियत होती है, यह तक नहीं कहा जा सकता कि उसमें चीजों को स्वीकारने की कोई क्षमता है—नई चीजों का सामना करने पर बात यह नहीं होती कि वे उन्हें सीखने और स्वीकारने के लिए व्यक्तिपरक ढंग से तैयार हैं या नहीं; बल्कि मुद्दा यह है कि उन्हें उनका कोई बोध बिल्कुल नहीं होता। वास्तविक जीवन में हो या कर्तव्य निभाते हुए, चाहे कोई भी नई चीज सामने आए, कोई भी चीज आगे बढ़े या कोई भी चीज बेहतर हो, उन्हें कोई बोध नहीं होता और कोई जागरूकता नहीं होती। क्या इन चीजों के बारे में उनकी अज्ञानता समाचार या समाचारपत्र न पढ़ने के कारण होती है? नहीं, ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उनकी काबिलियत में चीजों को स्वीकारने की क्षमता ही नहीं होती। यह ऐसा है मानो उनमें ग्रहण करने की बौद्धिक क्षमताएँ ही न हों। जहाँ तक नई चीजें आने का संबंध है, वे सुन्न, मंदबुद्धि होते हैं और उनमें बोध नहीं होता। भले ही वे किसी हलचल भरे शहर में रहते हों, ऐसा लगता है मानो वे किसी दूरदराज के पहाड़ी गाँव में रह रहे हों। वे मानव-जीवन में होने वाली किसी भी छोटी-बड़ी घटना से पूरी तरह अनजान रहते हैं। इसलिए उनके जीवन के दायरे में ऐसी कोई नई चीज नहीं होती जो उनके खाने, कपड़े, आवास और परिवहन को प्रभावित कर सके। वे बस जानवरों की तरह होते हैं। उनके विचार के दायरे में मौजूद चीजें उनके जीवन के दायरे में मौजूद चीजों की छोटी-सी सीमा तक सीमित रहती हैं, वे चीजें जिन्हें वे उस उम्र से जानते हैं जब वे दुनिया में विभिन्न चीजें देखना सीख रहे थे। इसके परे, बाहरी दुनिया की किसी भी चीज का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता और उन्हें उसमें कोई दिलचस्पी नहीं होती। ये किस तरह के लोग होते हैं? क्या वे मानसिक रूप से कमजोर होते हैं? (हाँ।) बेशक हम यहाँ जिन मामलों के बारे में बात कर रहे हैं वे दैनिक जीवन के बहुत छोटे, तुच्छ पहलू हैं; हम राष्ट्रीय मामलों या प्रमुख वैश्विक समाचारों का उल्लेख नहीं कर रहे हैं। यहाँ तक कि किसी बहुत छोटी नई चीज का दिखना भी ऐसी चीज होती है जिसके बारे में वे अनजान होते हैं और बिल्कुल भी स्वीकृति नहीं दिखाते। यह “स्वीकृति” इस बात को संदर्भित करती है कि कैसे किसी नई चीज का दिखना उनके विचार और दृष्टिकोण बदल देता है, उनके जीवन में कुछ सुधार लाता है—जिसमें जीवनशैली, बुनियादी जीवन-ज्ञान आदि शामिल हैं—और जीवन में समस्याएँ सँभालने की उनकी क्षमता में कुछ सुधार और प्रगति करता है। जिन लोगों में चीजों को स्वीकारने की क्षमता नहीं होती वे हमेशा अपनी दिनचर्या, जीने का मूल तरीका बनाए रखते हैं। उदाहरण के लिए, पहले लोग अक्सर कहते थे कि पालक के साथ पकाया गया टोफू अच्छी चीज होती है जो आयरन और कैल्शियम दोनों प्रदान करती है, और मान लो एक व्यक्ति उसे इस तरह से खाकर बड़ा हुआ। बाद में कुछ लोगों ने कहा कि खाद्य-शोधकर्ताओं ने पाया है कि पालक में ऑक्सैलिक अम्ल होता है और उसे लंबे समय तक टोफू के साथ खाने से शरीर में आसानी से पथरी बन सकती है। यह सुनने के बाद यह व्यक्ति सोचता है, “ऑक्सैलिक अम्ल क्या होता है? पालक में ऑक्सैलिक अम्ल कभी किसने देखा है? मैंने इसे इतने सालों से खाया है और कुछ नहीं हुआ। मैं इसे खाता रहूँगा!” वे इसे नहीं स्वीकारते। यह वह व्यक्ति है जिसमें नई चीजों या नए दृष्टिकोणों के प्रति कोई स्वीकृति नहीं है। इसके विपरीत, चीजों को स्वीकारने की क्षमता वाले लोग यह पुष्टि कर लेने के बाद कि पालक में ऑक्सैलिक अम्ल होता है, ऑक्सैलिक अम्ल हटाने के बारे में सोचेंगे, और इसके बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त करके वे पाते हैं कि पालक को उबलते पानी में उबालने से ऑक्सैलिक अम्ल निकल जाता है। चीजों को स्वीकारने की क्षमता वाले लोग नई जानकारी के बारे में सुनकर पूछताछ करके उस जानकारी की सच्चाई और वह लोगों के लिए फायदेमंद है या नहीं, यह भेद पहचानेंगे और फिर तय करेंगे कि उसे स्वीकारना है या अस्वीकार कर देना है। वे सवाल पूछेंगे, उसमें शामिल विवरणों के बारे में जानेंगे और फिर इस जानकारी को वास्तविक जीवन में लागू करेंगे, जिससे उस नई चीज की कमियों से या उसके कारण लोगों को होने वाले नुकसान से बचा सकें। दूसरी ओर, वे भ्रमित लोग जिनमें चीजों को स्वीकारने की क्षमता का पूरी तरह से अभाव होता है, चाहे कोई भी नई जानकारी सुनें, न तो उसकी परवाह करते हैं और न ही उसके बारे में पूछताछ करते हैं, बल्कि सीधे उसे अस्वीकार कर देते हैं, सिर्फ पुरानी, अप्रचलित चीजों को ही पकड़े रहते हैं। यह अंततः उनकी काबिलियत की समस्या के कारण होता है। जब नई चीजों की बात आती है तो वे नहीं जानते कि उनके साथ कैसे पेश आया जाए या उन्हें कौन-से सिद्धांत समझने चाहिए, न ही वे इस बात पर विचार करते हैं कि नई चीजें अस्वीकार करने के उनके जीवन या कार्य में क्या परिणाम हो सकते हैं। संक्षेप में, वे हमेशा नई चीजों और नई जानकारी के प्रति संदेह का रवैया रखते हैं, उन्हें स्वीकारने की हिम्मत नहीं करते। ऐसे लोग खराब काबिलियत वाले होते हैं।

खराब काबिलियत वाले लोग जीवन में आने वाली समस्याओं का स्वतंत्र रूप से समाधान नहीं कर सकते, चाहे वे समस्याएँ कितनी भी हों। ऐसे व्यक्तियों में स्वतंत्र जीवन जीने की क्षमता नहीं होती। चाहे जो भी मामला हो, उन्हें अपने पूर्वजों से काम करने का जो तरीका विरासत में मिला होता है, वे उसी तरीके से काम करते रहते हैं; वे कुछ भी नहीं बदलते और अंत तक उसी पर अड़े रहते हैं। अगर तुम यह कहते हुए उनकी आलोचना करते हो कि इस तरह से चीजें करना गलत है तो वे तुम्हारी बात नहीं सुनेंगे, यहाँ तक कि बेहद जिद्दी हो जाएँगे और तुमसे बहस करेंगे : “हमारे पूर्वजों से यह इसी तरह से चला आ रहा है। मेरे दादा की पीढ़ी और मेरे माता-पिता की पीढ़ी सभी ने इसे इसी तरह से किया था और यह इसी तरह से विरासत में मिला है!” क्या विरासत में मिली चीजें जरूरी तौर पर सही होती हैं? वे इस सवाल पर विचार नहीं करते, जो उनकी खराब काबिलियत साबित करता है। अगर उनमें सामान्य व्यक्ति की काबिलियत होती तो वे इस सवाल के बारे में सोचते। नई चीजों के बारे में जानकारी सुनकर वे एक निश्चित हद तक स्वीकृति प्रदर्शित करते हैं। अगर वे ये अभिव्यक्तियाँ नहीं दिखाते तो इसका मतलब है कि उनमें स्वीकृति कतई नहीं है। ऐसे लोगों में स्वतंत्र रूप से जीने की क्षमता का अभाव होता है। चाहे वे कितने भी बूढ़े हो जाएँ, हमेशा यही कहते हैं, “मेरे पिता के समय में ऐसा ही था। मेरे दादा और परदादा के समय में भी ऐसा ही था। इसलिए मेरी पीढ़ी में भी ऐसा ही होना चाहिए।” ये लोग स्पष्ट रूप से जीवाश्म होते हैं। ये लकड़ी के सड़े-गले लट्ठों जैसे होते हैं—दकियानूस! उनमें कोई भी नई चीज स्वीकारने की क्षमता नहीं होती, जो दर्शाता है कि वे बहुत खराब काबिलियत वाले हैं। चाहे तुम नई चीजों की उन्नत बातें कैसे भी समझाओ, वे उन्हें नहीं स्वीकारेंगे। ऐसे लोगों में स्वतंत्र रूप से जीने की क्षमता नहीं होती। हो सकता है ऊपर से वे अपना खाना, पहनना, आवास और परिवहन अपने दम पर सँभालते दिखें, लेकिन जो तरीके और पद्धतियाँ वे इस्तेमाल करते हैं, वे घटिया होती हैं। वे अपनी जीवनशैली समय के साथ या मानवजाति द्वारा अर्जित सहज बुद्धि और ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में विकास के अनुसार नहीं ढालते। ऐसे लोग खराब काबिलियत वाले होते हैं। हालाँकि वे भूखे नहीं मर रहे होते, ठंड से जम नहीं रहे होते और उन्हें कोई बड़ी बीमारी नहीं हुई होती, लेकिन उत्तरजीविता के बारे में उनके परिप्रेक्ष्य और उनकी जीवनशैली से आँकें तो, ऐसे लोग बस भ्रमित तरीके से जीते हैं और उन्हें मानसिक रूप से कमजोर, मूर्ख या बेवकूफ के रूप में वर्गीकृत भी किया जा सकता है। कुछ लोग मानसिक रूप से कमजोर या मूर्ख कहे जाने पर असहज महसूस करते हैं, लेकिन अगर वे असहज महसूस करते हैं तो भी यह सच है। उनकी काबिलियत वास्तव में इतनी कमजोर होती है। मैं बेशक ऐसा कुछ कहना चाहूँगा जो तुम्हें सहज महसूस कराए, लेकिन तुममें इसके लिए काबिलियत ही नहीं है। तुममें हर पहलू में क्षमता की कमी है और तुम्हारे पास किसी भी मामले के प्रति कोई सही, सटीक विचार या दृष्टिकोण नहीं है जो सामान्य मानवता की सोच के अनुरूप हो। क्या यह काबिलियत की कमी होना नहीं है? तुम्हें बेकार व्यक्ति नहीं कहना ही काफी अनुग्रहपूर्ण है। ऐसा व्यक्ति जिसमें कोई काबिलियत नहीं होती, मानसिक रूप से विकलांग होने से बस एक कदम दूर होता है। मानसिक रूप से विकलांग व्यक्तियों में अपना खयाल रखने तक की क्षमता नहीं होती, वे पूरी तरह से दूसरों की सहायता पर निर्भर रहते हैं। भोजन के समय उनके माता-पिता को अभी भी उन्हें एक-एक निवाला खिलाना पड़ता है और उन्हें यह भी पता नहीं चलता कि उनका पेट भर गया है या नहीं। खराब काबिलियत वाले लोग मानसिक रूप से कमजोर होते हैं; वे मूर्ख होते हैं और मानसिक रूप से विकलांग होने से बस एक कदम दूर होते हैं। उनकी काबिलियत इतनी खराब होती है। मुझे बताओ, क्या ऐसे लोग दयनीय नहीं होते? क्या वे बहुत नागवार नहीं होते? खराब काबिलियत वाले लोगों में सीखने की क्षमता नहीं होती, चीजों को समझने की क्षमता नहीं होती, बोध क्षमता नहीं होती; उनमें चीजों को स्वीकारने की क्षमता तो बिलकुल भी नहीं होती—उनमें किसी भी पहलू में कोई क्षमता नहीं होती। चाहे तुम उन्हें किसी भी तरह से समझाओ या उदाहरण दो, वह उनके भेजे में नहीं घुसता या वे कही गई बात समझ नहीं सकते। क्या यह मानसिक कमजोरी नहीं है? चाहे तुम उन्हें किसी भी तरह से समझाओ, वे नहीं समझ सकते। भले ही तुम बहुत स्पष्ट रूप से बोलो और पूरी तरह से समझाओ, फिर भी वे नहीं समझ सकते, यहाँ तक कि तुम्हारी बातें उन्हें बहुत अजीब लगती हैं। उनमें सामान्य मानवता की सोच का अभाव होता है और तुम्हारी बात का खंडन करने के लिए वे कई तरह की भ्रांतियाँ भी पेश कर देते हैं। ऐसे लोगों के साथ तर्क करना असंभव है; बस उनसे तीन शब्द कहो : “तुम तर्कातीत हो!” उनकी काबिलियत इतनी खराब होती है। क्या तुम उनसे चिंतित और नागवार महसूस नहीं कर सकते? तुम ऐसे लोगों से चाहे कुछ भी कहो, वह बेकार होता है। तुम उन्हें चाहे कैसे भी समझाने की कोशिश करो, वे नहीं समझते। यहाँ तक कि किसी छोटी-सी बात के लिए भी उन्हें प्रबुद्ध करने में पूरा दिन लग जाता है और अगर तुम थोड़ी और गहराई से बात करते हो तो वे नहीं समझेंगे; तुम्हें सबसे सतही शब्दों का इस्तेमाल करना होगा और बहुत कुछ कहना होगा, तभी वे समझ पाएँगे। एक मामला समझ जाने के बाद भी, कोई वैसा ही मुद्दा उठने पर वे उसे नहीं समझ पाते। क्या यह मानसिक कमजोरी नहीं है? लेकिन ऐसे मानसिक रूप से कमजोर व्यक्ति को नहीं लगता कि वे मूर्ख हैं। वे कहते हैं, “यह मत समझो कि मैं मूर्ख हूँ। मुझे दस युआन या दस अमेरिकी डॉलर देने की पेशकश करके देखो कि मैं क्या चुनता हूँ—मैं निश्चित रूप से अमेरिकी डॉलर चुनूँगा क्योंकि मैं जानता हूँ कि वे ज्यादा मूल्यवान हैं।” दूसरे लोग कहते हैं, “तुम अभी भी मूर्ख हो।” दूसरे लोग क्यों कहते हैं कि ऐसे लोग मूर्ख हैं? क्योंकि कोई साधारण व्यक्ति यह साबित करने के लिए कि वह मूर्ख नहीं है, ऐसा उदाहरण नहीं देगा, न ही वह इसे प्रदर्शित करने के लिए ऐसा घटिया तरीका इस्तेमाल करेगा। चूँकि ऐसे लोगों की काबिलियत बहुत खराब होती है, उनके पास किसी व्यक्ति, घटना या चीज का मूल्यांकन करने के लिए कोई मानक नहीं होते और वे उनका मूल्यांकन करना नहीं जानते, सटीक रूप से यही कारण है कि वे कभी खुद को मूर्ख नहीं मानते। असली चतुर लोग, लोगों के किसी समूह के बीच तीन से पाँच वर्षों तक लगातार प्रयास और परिश्रम करने के बाद महसूस करेंगे कि हर समूह में उनसे बेहतर लोग हैं, ऐसे लोग हैं जो उनसे आगे निकल जाते हैं। उन्हें हमेशा लगता है कि उनकी काबिलियत पर्याप्त अच्छी नहीं है, उनकी क्षमताएँ और बुद्धिमत्ता पर्याप्त अच्छी नहीं है। वे हमेशा अपनी खामियाँ खोजने में सक्षम रहते हैं, जानते हैं कि दूसरों की तुलना में वे कहाँ कमतर हैं और अपनी समस्याएँ पहचानते हैं; वे हमेशा दूसरों की मजबूतियाँ देख सकते हैं। ऐसा व्यक्ति चतुर होता है और उसमें काबिलियत होती है। वहीं बिना काबिलियत वाले लोग जब लोगों के समूह में रहते हैं तो हमेशा यही महसूस करते हैं कि दूसरे उनसे कमतर हैं। वे देखते हैं कि कुछ लोगों को कुछ शब्दों की वर्तनी तक नहीं आती या वे टाइप नहीं कर सकते, और वे उन्हें खराब काबिलियत वाला मानकर उनका तिरस्कार करते हैं। वे इन तुच्छ, छोटी-छोटी चीजों का, जिन्हें वे खुद कर सकते हैं, इस्तेमाल इस बात की पुष्टि करने के लिए करते हैं कि उनकी काबिलियत अच्छी है। ऐसे लोग भी होते हैं जो यह देखकर कि दूसरे लोग अपनी स्वच्छता के बारे में कम सतर्क रहते हैं या अच्छे कपड़े पहनना नहीं जानते, कहते हैं कि उनमें खराब काबिलियत है। वे खुद थोड़े साफ-सुथरे होते हैं, परिष्कार का दिखावा कर सकते हैं या उनमें कुछ ज्ञान और विशेष कौशल होते हैं, इसलिए वे अपनी काबिलियत अच्छी मानते हैं। ऐसे लोग चतुर होते हैं या मूर्ख? वे मूर्ख होते हैं। ध्यान दो कि चतुर लोग कैसे बोलते हैं : “मैंने फिर से गड़बड़ी क्यों कर दी? मैं समझता हूँ कि मैं मूर्ख हूँ!” जो लोग अक्सर कहते हैं कि वे मूर्ख हैं और उनमें खामियाँ हैं, वे सच में चतुर हैं। जो लोग कभी मूर्ख होना स्वीकार नहीं करते और हमेशा कहते हैं, “तुम मुझे मूर्ख समझते हो? मुझसे पैसे माँगने की कोशिश करो और देखो मैं तुम्हें देता हूँ या नहीं!” वे सच में मूर्ख होते हैं। बोलचाल की भाषा में मूर्खता को “ताश की पूरी गड्डी में कुछ पत्ते कम होना” कहा जाता है। उनका ऐसी मूर्खतापूर्ण बातें कह पाना क्या मूर्खता नहीं है? क्या यह “कुछ पत्ते कम होना” नहीं है? (हाँ, है।) जब वे किसी ऐसे व्यक्ति को देखते हैं जिसमें कुछ खामियाँ या दोष होते हैं या जिसके काम में कुछ कमी रह जाती है तो वे उसके पीठ पीछे हँसते हुए कहते हैं, “वह इतना मूर्ख कैसे हो सकता है?” जब वे किसी ऐसे व्यक्ति को देखते हैं जो फायदा उठाने के लिए जोड़-भाग और धूर्ततापूर्ण योजनाओं से भरा होता है तो वे उसे चतुर और अच्छी काबिलियत वाला मानते हैं। असली चतुर लोग व्यक्ति की विभिन्न क्षमताओं के आधार पर उसकी काबिलियत की गुणवत्ता का और इस बात का मूल्यांकन करते हैं कि वह चतुर है या मूर्ख। लेकिन मूर्ख लोग सिर्फ यह देखते हैं कि कौन जोड़-भाग करने वाला है, कौन फायदे उठाता है और हमेशा नुकसान से बचता है और कौन चालाकी से खुद को लाभ पहुँचाने में माहिर है, और यह मानते हैं कि ऐसे सभी लोग चतुर और अच्छी काबिलियत वाले होते हैं। वास्तव में, ऐसे सभी लोग मूर्ख होते हैं। किसी व्यक्ति की काबिलियत की गुणवत्ता का मूल्यांकन उसके जोड़-भाग करने वाला होने के आधार पर करना—ऐसे लोग खुद मूर्ख होते हैं। अभी कुछ समय पहले हमने सबसे मूर्खतापूर्ण अभिव्यक्तियों में से एक का उल्लेख किया था : वे कहते हैं, “मुझे दस युआन या दस अमेरिकी डॉलर देने की पेशकश करके देखो कि मैं क्या चुनता हूँ—मैं निश्चित रूप से युआन नहीं चुनूँगा—यह मत सोचो कि मुझे नहीं पता कि अमेरिकी डॉलर ज्यादा मूल्यवान हैं! तुम मुझे मांस या टोफू देकर देखो कि मैं उनमें से क्या खाता हूँ। क्या तुम्हें लगता है कि मैं इतना मूर्ख हूँ कि मांस के बजाय टोफू खाऊँगा? मुझे पता है कि मांस का स्वाद बेहतर होता है!” ऐसे लोग वास्तव में मूर्ख होते हैं। अगर तुम वाकई नहीं चाहते कि दूसरे तुम्हारी मूर्खता देखें तो तुम्हें ऐसे उदाहरण बिल्कुल नहीं देने चाहिए। समझे? (हाँ।) क्या मूर्ख लोग अक्सर यह गलती करते हैं? (हाँ।) वे यह तक सोचते हैं, “देखो मैं उदाहरण देने में कितना अच्छा हूँ! देखो मैं कितना चतुर हूँ? क्या मैं तुम्हें मूर्ख लगता हूँ? मूर्ख तुम हो!” सबसे मूर्ख किस्म के व्यक्ति के मुख से मूर्खता हमेशा टपकती रहती है। इसके साथ ही इस क्षमता पर संगति समाप्त होती है : चीजों को स्वीकारने की क्षमता।

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें