सत्य का अनुसरण कैसे करें (6) भाग पाँच
नंबर 8 : चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता
इसके बाद हम आठवीं क्षमता, चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता, पर चर्चा करेंगे। चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता यह है कि व्यक्ति किसी मामले से कैसे निपटता है—चाहे वह मामला पहले ही घटित हो चुका हो या अचानक घटित हुआ हो, या उस मामले के विभिन्न कारक बदल गए हों, व्यक्ति उस मामले से कैसे निपटता है, यह उसकी चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता है। तो चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता मुख्य रूप से किस चीज को संदर्भित करती है? यह किसी मामले को पहचानने, उसका आकलन करने, उससे पेश आने और उसे सँभालने की तुम्हारी क्षमता को संदर्भित करती है। जब तुम्हारा सामना किसी व्यक्ति, घटना या चीज से होता है तो उसकी प्रकृति क्या होती है? क्या वह सकारात्मक चीज है या नकारात्मक चीज? ऐसी चीज का सामना कैसे करना चाहिए और उसे कैसे सँभालना चाहिए? जब वह अचानक घटित होती है तो क्या सबक सीखना चाहिए? परमेश्वर के अच्छे इरादे क्या हैं? अगर ऐसी चीज कलीसिया के कार्य को नुकसान पहुँचा सकती है तो उसे उस तरीके से कैसे सँभालना चाहिए जो सिद्धांतों के अनुरूप हो और जो इसकी वजह से हुई क्षति के नतीजे ठीक करे, ताकि वह कलीसिया के कार्य को और नुकसान न पहुँचाए, साथ ही नकारात्मक प्रभाव बढ़ने से रोके? अगर किसी व्यक्ति, घटना या चीज से सामना होने पर तुम—स्वयं द्वारा समझे गए भेद पहचानने के सिद्धांतों और उन सत्य सिद्धांतों के आधार पर जिन्हें तुम जानते हो—ऐसे मामलों के सार और मूल कारण का सही-सही आकलन कर सकते हो और उन्हें सँभालने के सिद्धांतों और योजना का पता लगा सकते हो तो तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसमें चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता है, जिसका यह अर्थ भी है कि तुम अच्छी काबिलियत वाले व्यक्ति हो। उदाहरण के लिए, जब कोई मामला अचानक तुम्हारे सामने घटित हो तो तुम्हें उसका सामना कैसे करना चाहिए? पहले, तुम्हें स्पष्ट रूप से यह देखना चाहिए कि वह किस दिशा में विकसित हो सकता है, अगर वह विकसित होता रहा तो इसके क्या परिणाम होंगे, उसके होने का मूल कारण कहाँ निहित है, उसका सार क्या है—तुम्हें इन तमाम चीजों का भेद पहचानने और स्पष्ट रूप से देखने में सक्षम होना चाहिए। भेद पहचानने की क्षमता के जरिये मामले का निरूपण करो और फिर तुरंत उसे सँभालने के लिए एक योजना खोजो। मामले को कैसे सँभालना चाहिए, सरगना कौन है, अनुयायी कौन है, मुख्य रूप से जिम्मेदार पक्ष कौन है, मुख्य जिम्मेदारी किसे उठानी चाहिए, जिम्मेदार पक्षों को कैसे सँभालना है—तुम्हें इन सभी मुद्दों का पता लगाना होगा। इसके अलावा, समस्याएँ सँभालते समय तुम्हें नुकसान को न्यूनतम करना होगा और कर्मियों को पुनर्व्यवस्थित और समायोजित करना होगा। सिर्फ इसी तरह से त्रुटियाँ समय पर ठीक की जा सकती हैं, समस्याएँ पूरी तरह से हल की जा सकती हैं और स्थिति सुधारी जा सकती है, जिससे चीजें सही, लाभकारी दिशा में विकसित हो सकें। संक्षेप में, अगर तुम इस मामले में शामिल तमाम विभिन्न कारकों पर विचार कर सकते हो और फिर उसे सँभालने के लिए सही और सटीक सिद्धांतों के साथ उससे निपटने का सही तरीका अपना सकते हो, तो इसे चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता होना कहा जाता है और इसका मतलब है कि तुम अच्छी काबिलियत वाले व्यक्ति हो। बेशक, मामले से निपटने का यह तरीका और इसे सँभालने के सिद्धांत वे निष्कर्ष और परिभाषाएँ हो सकती हैं जिन पर तुम इस स्थिति के जानकार लोगों के साथ संपर्क और संगति के जरिये पहुँचते हो या हर व्यक्ति के साथ सहयोग और चर्चा के जरिये पहुँचते हो। अगर तुम वास्तविक स्थिति की गहन जाँच‑पड़ताल करके और फिर ऐसे मामले को समझने वाले भाई-बहनों से सुझाव माँगकर अंततः एक परिभाषा पर आ सकते हो, एक निष्कर्ष निकाल सकते हो, एक समाधान निर्धारित कर सकते हो और समस्या ठीक से सँभाल सकते हो, कर्मियों का समायोजन पूरा कर सकते हो, इस मामले से होने वाले नुकसान की भरपाई कर सकते हो और फिर कलीसिया के कार्य को समायोजित कर सकते हो ताकि वह अब हानिकारक दिशा में विकसित न हो, तो इसे चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता होना कहा जाता है। अगर तुम इस स्तर तक मामले सँभाल सकते हो तो तुम्हें अच्छी काबिलियत वाला माना जा सकता है। बेशक, अच्छी काबिलियत वाला होने का मतलब यह नहीं कि व्यक्ति किसी मामले का सामना करने पर तुरंत उसकी असलियत देख सकता है, तुरंत निर्णय ले सकता है और उसे व्यापक और उपयुक्त तरीके से सँभाल सकता है—यह जरूरी नहीं है। लोगों को समस्याएँ सँभालने के लिए एक प्रक्रिया की आवश्यकता होती है; चीजों के सार की असलियत देखने के लिए उन्हें मामले के विभिन्न पहलू समझना आवश्यक है। लोग मांस और खून से बने हैं, वे मानवता के दायरे में काम करते हैं और उन्हें एक प्रक्रिया की आवश्यकता होती है। यह परमेश्वर के आत्मा के कार्य करने से भिन्न है—परमेश्वर का आत्मा पूरी पृथ्वी की व्यापक जाँच करता है; परमेश्वर हमेशा सभी चीजों और सभी समस्याओं का सार और मूल कारण देख सकता है। जब लोग मामलों के पीछे छिपी चीजों की असलियत देखने में असमर्थ होते हैं तो वे आसानी से धोखा खा जाते हैं और अंधे हो जाते हैं। ठीक इसी वजह से, लोगों को मामलों के पीछे की वास्तविक स्थिति की गहन जाँच‑पड़ताल करने की जरूरत होती है। मामले के पीछे छिपी वास्तविक स्थितियाँ समझने के बाद अगर तुम समय पर समस्याएँ सँभाल सकते हो, विचलन दूर कर सकते हो, जो लोग सीधे तौर पर प्रभारी हैं उन्हें और कर्मियों को उपयुक्त रूप से समायोजित कर सकते हो और कार्य के सामान्य संचालन की गारंटी दे सकते हो तो यह साबित करता है कि तुममें चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता है। खास तौर से आकस्मिक घटनाओं का सामना करते समय अगर तुम विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों को सिद्धांतों के अनुसार सँभाल सकते हो तो यह साबित करता है कि तुम अच्छी काबिलियत वाले व्यक्ति हो। चीजों पर प्रतिक्रिया करने की औसत क्षमता वाले लोग नियमित और सामान्य परिस्थितियों का सामना करने पर प्रक्रियाओं का पालन करके और नियमित तरीके से कुछ चीजें कर सकते हैं, लेकिन जो नतीजे वे प्राप्त करते हैं वे औसत होते हैं—वे किसी सफलता तक नहीं पहुँचते या महत्वपूर्ण प्रगति नहीं करते। जैसे ही वे विशेष परिस्थितियों या आकस्मिक घटनाओं का सामना करते हैं, वे हक्के-बक्के रह जाते हैं और उन्हें सँभाल नहीं पाते। उदाहरण के लिए, जब कुछ लोग सुसमाचार का प्रचार करते हैं तो वे सामान्य परिस्थितियों में हर महीने कुछ लोगों को प्राप्त कर सकते हैं। यह औसत काबिलियत दर्शाता है और उनके सुसमाचार-प्रचार के परिणाम भी औसत होते हैं, विशेष रूप से अच्छे नहीं होते। अगर कलीसिया में मसीह-विरोधियों द्वारा लोगों को गुमराह करने की कोई घटना अचानक सामने आती है तो ये सुसमाचार-कार्यकर्ता भ्रमित हो जाते हैं और नहीं जानते कि क्या किया जाए। सुसमाचार-कार्य रुक जाता है और वे नहीं जानते कि उन्हें प्रचार जारी रखना चाहिए या कार्य-व्यवस्थाओं की प्रतीक्षा करनी चाहिए। वे सुसमाचार-प्रचार के कार्य के सिद्धांत खोजना नहीं जानते। परमेश्वर के घर की कार्य-व्यवस्थाओं में अक्सर कहा जाता है, “सुसमाचार-कार्य किसी भी समय या किसी भी परिस्थिति में रुकना नहीं चाहिए।” फिर भी, मसीह-विरोधियों द्वारा लोगों को गुमराह करने की घटना का सामना होने भर से वे सुसमाचार-कार्य बंद कर देते हैं। क्या वे अपना कर्तव्य निष्ठा से निभा रहे होते हैं? वे इस पर खरे नहीं उतरते। क्या वे परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करते हैं? वे इस पर भी खरे नहीं उतरते। जब उनका सामना उन मसीह-विरोधियों या नकली अगुआओं से होता है जो लापरवाही से दुष्कर्म करते हैं और विघ्न-बाधा पैदा करते हैं तो वे भ्रमित हो जाते हैं। वे उन लोगों से पूछना नहीं जानते जो सत्य समझते हैं कि उन्हें इस मामले को कैसे सँभालना चाहिए जिसका वे सामना कर रहे हैं, और परमेश्वर के वचनों में अभ्यास के सिद्धांत और अभ्यास के मार्ग ढूँढ़ना तो वे और भी कम जानते हैं। उनमें चीजों पर प्रतिक्रिया करने की यह क्षमता नहीं होती। कलीसिया के कुछ अगुआ जब किसी मसीह-विरोधी को लोगों को गुमराह करने के लिए भ्रांतियाँ फैलाते देखते हैं तो वे भ्रांतियों का खंडन करने के लिए सत्य पर संगति करना नहीं जानते। वे नहीं जानते कि क्या करें लेकिन प्रार्थना करते रहते हैं, “हे परमेश्वर, कृपया शैतान को बाँधो, कृपया शैतान का मुँह बंद करो और उसे लोगों को गुमराह करने के लिए भ्रांतियाँ फैलाने से रोको। कृपया उन अज्ञानी और मूर्ख लोगों को बचाओ और उन्हें मसीह-विरोधी द्वारा गुमराह होने से रोको। हे परमेश्वर, कृपया उन्हें वापस लाओ!” सिर्फ प्रार्थना करना और सत्य न खोजना—क्या इससे समस्या हल हो सकती है? अगर लोग सहयोग नहीं करते और अपना कर्तव्य नहीं निभाते तो बेकार है। ऐसी कई चीजें हैं जो लोगों को करनी चाहिए। पहले, उन्हें यह देखना चाहिए कि इस मसीह-विरोधी की पृष्ठभूमि कैसी है, वह कौन-सी विशेषताएँ प्रदर्शित करता है और लोगों को गुमराह करने के लिए वह किस चीज पर निर्भर करता है; उन्हें यह भी देखना चाहिए कि क्या गुमराह किए गए लोगों के बीच अच्छी काबिलियत वाले कोई ऐसे लोग हैं जो सत्य स्वीकार सकते हों, और जल्दी से उन्हें पुनः प्राप्त करना चाहिए। यह वह काम है जो पहले करना चाहिए। लेकिन कलीसिया के ये अगुआ यह नहीं जानते और वे इस तरह से काम करना भी नहीं जानते। वे बस भ्रमित हो जाते हैं, चिंता में अपने पैर पटकते हैं। यहाँ तक कि कुछ बेकार लोग चिंता के मारे रो पड़ते हैं। रोने का क्या फायदा? क्या रोने से गुमराह किए गए लोग पुनः प्राप्त किए जा सकते हैं? रोना काम करना नहीं है, न ही यह दर्शाता है कि तुम कोई बोझ उठा रहे हो। यह अक्षमता की अभिव्यक्ति है। काबिलियत वाले लोग जब ऐसे मामलों का सामना करते हैं तो पहले शांत होते हैं। प्रार्थना करने, खोजने, विश्लेषण और आकलन करने और फिर संगति करने के बाद वे अंततः निर्णय लेते हैं। खराब काबिलियत वाले लोग जब मामलों का सामना करते हैं तो हक्के-बक्के रह जाते हैं : वे प्रार्थना करना और खोजना नहीं जानते, न ही वे संगति करने के लिए कुछ ऐसे लोगों को ढूँढ़ना जानते हैं जो सत्य समझते हों; वे बस निष्क्रिय रूप से प्रतीक्षा करते हैं। इससे मामलों में सबसे ज्यादा देरी होती है। तुम्हारे पास कोई समाधान नहीं है लेकिन शायद दूसरों के पास हो—तो क्यों न मदद लेने के लिए दूसरों को ढूँढ़ा जाए? होशियार लोग प्रतीक्षा करते समय भी अपना कर्तव्य और जिम्मेदारी निभाना नहीं भूलते। यह कर्तव्य और जिम्मेदारी निभाना सक्रिय होता है, निष्क्रिय नहीं। यह परमेश्वर द्वारा आदेश जारी करने या स्थिति बदलने के लिए परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से कार्य करने की प्रतीक्षा करना नहीं है। इसके बजाय, यह प्रतीक्षा अवधि के दौरान उन लोगों को पुनः प्राप्त करने का हर संभव प्रयास करना है, जिन्हें पुनः प्राप्त किया जा सकता है। जहाँ तक उन लोगों का सवाल है जिन्हें पुनः प्राप्त नहीं किया जा सकता—जैसे कि भ्रमित मूर्ख, वे लोग जो बुरी आत्माओं के वश में हैं और छद्म-विश्वासी जो सिर्फ समूह में शामिल होकर खाने का कूपन पाने के लिए परमेश्वर में विश्वास करते हैं—उनसे परेशान नहीं होना चाहिए। जो लोग अंधे नहीं हुए हैं उनके लिए जल्दी से किसी ऐसे व्यक्ति की व्यवस्था करनी चाहिए जो उनके साथ सत्य पर संगति कर मसीह-विरोधी का भेद पहचानने के बारे में बात करे। क्या यह स्थिति सँभालने की योजना नहीं है? यह एक प्रतिक्रिया उपाय है। खराब काबिलियत वाले लोगों के पास ऐसे प्रतिक्रिया उपाय नहीं होते; वे सिर्फ रोना और शिकायत करना जानते हैं। यह चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता न होना है। अगर साधारण परिस्थितियों में व्यक्ति सामान्य रूप से काम करने में सक्षम है लेकिन विशेष परिस्थितियों का सामना करने पर वह भौचक्का और हक्का-बक्का रह जाता है तो ऐसे व्यक्ति की चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता ज्यादा से ज्यादा औसत होती है। अगर व्यक्ति साधारण परिस्थितियाँ तक नहीं सँभाल सकता तो ऐसे व्यक्ति में चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता नहीं होती। उदाहरण के लिए, अगर उसे कलीसिया के अगुआ के चुनाव का आयोजन करने के लिए किसी कलीसिया में भेजा जाता है तो वह नहीं जानता कि किस तरह के व्यक्ति को चुनना है या लोगों को एक-साथ इकट्ठा करके चुनाव का आयोजन कैसे करना है। यहाँ तक कि वह चुनाव की बुनियादी प्रक्रियाएँ भी नहीं समझता। इसके अलावा, कलीसिया में कुछ ऐसे लोग होते हैं जिनमें अत्यधिक भ्रष्ट स्वभाव होते हैं—जो दबंगों, बदमाशों और लफंगों की श्रेणी के होते हैं—और ये लोग चुनाव बाधित करने के लिए मौके का फायदा उठाते हैं। ऐसी स्थिति में, जिन लोगों में चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता नहीं होती, वे उसे सँभालने में और भी ज्यादा अक्षम होते हैं, वे बस बंदी बना लिए जाते हैं और आत्मसमर्पण कर देते हैं। अंत में वे भाई-बहनों से सिर्फ यह कह पाते हैं, “तुम लोग खुद चुन लो। तुम जिसे भी चुनोगे, हम उसे ही मान लेंगे।” ये किस तरह के प्राणी हैं? क्या ये निकम्मे नहीं हैं? यह चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता न होना है। जिन लोगों में चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता नहीं होती, उनमें काम करने की क्षमता भी नहीं होती। चाहे सामान्य परिस्थितियों में हो या विशेष परिस्थितियों में, जब कुछ होता है तो वे टूट जाते हैं और पीछे हट जाते हैं; जब कुछ होता है तो वे हक्के-बक्के रह जाते हैं और रोने लगते हैं। जब कुछ नहीं होता तो वे कुछ शब्द और धर्म-सिद्धांत बोल सकते हैं, लेकिन जब कुछ होता है और उनसे समस्या सँभालने के लिए कहा जाता है तो वे ऐसा नहीं कर पाते। उदाहरण के लिए, जब कुछ व्यक्ति अपना कर्तव्य निभाने में लापरवाह होते हैं तो चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता न रखने वाले लोग यह कहते हुए उनके साथ इस पर सिर्फ चर्चा करना ही जानते हैं : “कृपया लापरवाही मत करो—कृपया अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाओ!” क्या इससे उन व्यक्तियों की समस्या हल हो सकती है? उन्हें उन व्यक्तियों के साथ लापरवाह होने की समस्या के बारे में संगति करनी चाहिए। अगर वे व्यक्ति सत्य नहीं समझते और अपनी समस्या नहीं पहचान सकते तो उन्हें उनके साथ सत्य पर संगति करनी चाहिए। अगर वे व्यक्ति यह जानते हुए भी कि यह गलत है, इस तरह से काम करते हैं तो उन्हें उनका गहन-विश्लेषण और काट-छाँट करनी चाहिए। अगर यह किसी अन्य समस्या के कारण हो तो उन्हें उस समस्या के आधार पर संगति करनी चाहिए। उन्हें उत्पन्न हुई समस्या के आधार पर उचित कार्रवाई निर्धारित करनी चाहिए और फिर उसके अनुसार कार्य करना चाहिए। अगर तुम ऐसा नहीं कर सकते तो तुममें चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता नहीं है। क्या तुम समझते हो? (हाँ।) किसी मामले से सामना होने पर अगर तुम्हारे पास कोई समाधान नहीं होता, उससे निपटने का कोई तरीका नहीं होता और उसे सँभालने के लिए कोई सिद्धांत नहीं होते, तो तुममें चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता नहीं है। क्या ऐसे लोगों में चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता सबसे खराब नहीं होती? (हाँ, होती है।)
चीजों पर प्रतिक्रिया करने की सर्वोत्तम क्षमता वाले लोग वे होते हैं जो कुछ विशेष मामलों या आकस्मिक स्थितियों से सामना होने पर समय पर उनका आकलन और पहचान कर सकते हैं और फिर उन्हें सँभालने के लिए अपेक्षाकृत उपयुक्त योजनाएँ बना सकते हैं। चीजों पर प्रतिक्रिया करने की औसत क्षमता वाले लोग सामान्य, नियमित मामलों से सामना होने पर उन्हें सँभाल सकते हैं। वे स्थिति को सुगमता से चलाते रहने और उसका प्रबंधन करने के लिए प्रक्रियाओं का पालन करके काम कर सकते हैं या कर्मियों का समायोजन कर सकते हैं और उन्हें बदल सकते हैं—वे इस तरह का काम ठीक-ठाक कर लेते हैं। लेकिन जब उनका आकस्मिक स्थितियों से सामना होता है तो वे उन्हें नहीं सँभाल पाते। अगर उन्हें सिद्धांत बता दिए जाएँ तो भी वे उन्हें लागू नहीं कर सकते; अगर उन्हें अधिकार दे दिया जाए और मामला सँभालने के लिए कहा जाए तो भी वे ऐसा करने में असमर्थ रहते हैं। यह चीजों पर प्रतिक्रिया करने की औसत क्षमता होना है। चीजों पर प्रतिक्रिया करने की खराब क्षमता वाले लोग सामान्य मामले भी अच्छी तरह से नहीं सँभालते। वे सिर्फ धर्म-सिद्धांत बोलना और विनियमों से चिपके रहना ही जानते हैं, और अंत में समस्या का मूल कारण बिल्कुल भी हल नहीं होता। विघ्न पैदा करने और लोगों को गुमराह करने वाला एक मसीह-विरोधी ही उनसे सुसमाचार का प्रचार करना छुड़वाने के लिए पर्याप्त होता है; बकवास करने वाला एक नकली अगुआ भी उनसे सुसमाचार-कार्य बंद करवाने के लिए पर्याप्त होता है। क्या ये वे लोग हैं जो परमेश्वर की इच्छा का पालन करते हैं? वे इस पर खरे नहीं उतरते। ऐसे लोगों की चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता बहुत खराब होती है। चाहे जो भी स्थिति उत्पन्न हो, चीजों पर प्रतिक्रिया करने की खराब क्षमता वाले लोग उसे सँभाल नहीं पाते। उदाहरण के लिए, अगर किसी कमरे में आग लग जाती है तो वे घबरा जाते हैं और जल्दी से आग बुझाने वाला यंत्र खोजते हैं। आग बुझाने वाला यंत्र खोजने के बाद वे नहीं जानते कि उसका इस्तेमाल कैसे करना है और उन्हें निर्देश खोजने पड़ते हैं। नतीजतन, आग और ज्यादा फैल जाती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वे नहीं जानते कि आग बुझाने वाले यंत्र का इस्तेमाल कैसे करना है और इस तरह से चीजों में देरी कर देते हैं, और यह उनमें चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता नहीं होने के कारण भी होता है। वे आग लगने जैसी जरूरी स्थिति सँभालने तक में असमर्थ रहते हैं; यह चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता नहीं होना है। एक और उदाहरण देता हूँ, अगर खाना खाते समय किसी बच्चे के गले में खाना अटक जाता है और वह साँस नहीं ले पाता और उसकी आँखें ऊपर की ओर चढ़ जाती हैं तो ये लोग घबरा जाते हैं। वे नहीं जानते कि बच्चे को अस्पताल ले जाना है या नहीं और यह भी नहीं जानते कि बच्चे को पानी पिलाना है या नहीं। वे इतने चिंतित हो जाते हैं कि उन्हें पसीना आ जाता है और उनका चेहरा लाल हो जाता है, लेकिन वे नहीं जानते कि क्या करना है। थोड़ी देर बाद बच्चा खाँसता है और आखिरकार फिर से साँस लेने लगता है। वे बहुत देर तक घबराते रहे लेकिन समस्या से निपटने का कोई उपाय उनके पास नहीं था। सौभाग्य से, बच्चा भाग्यशाली था; वरना वह उनकी देखरेख में मर ही जाता। खराब काबिलियत वाले लोगों में कोई क्षमता नहीं होती और वे कुछ भी अच्छी तरह से नहीं कर सकते। जो थोड़े-बहुत धर्म-सिद्धांत वे समझते हैं वे विनियमों और नारों से ज्यादा कुछ नहीं होते। जब सामान्य परिस्थितियों और विशेष परिस्थितियों दोनों की बात आती है तो वे उन्हें सँभालने या उनसे निपटने में समान रूप से अक्षम होते हैं। इसलिए, ऐसे लोग चीजों पर प्रतिक्रिया करने की उनकी क्षमता के मामले में और भी ज्यादा पूरी तरह से रहित होते हैं—उनके पास कोई क्षमता नहीं होती। उनका जिस भी स्थिति से सामना होता है उस पर वे प्रतिक्रिया नहीं कर सकते या उसे सँभाल नहीं सकते—वे इन मामलों को नहीं समझ सकते। उन्हें लगता है कि कुछ शब्द और धर्म-सिद्धांत बोल पाना और कुछ नारे लगा पाना ही काफी है, कि इसका मतलब है कि उनके पास पूँजी है और वे अपने जीवन में संतुष्ट हैं। वास्तव में, जब कुछ होता है तो जो धर्म-सिद्धांत वे जानते हैं वे किसी काम नहीं आते। फिर भी, वे यह महसूस करने में विफल रहते हैं कि यह खराब काबिलियत दर्शाता है—उनकी काबिलियत बहुत खराब होती है लेकिन वे इससे अनभिज्ञ रहते हैं। क्या यह बेहद खराब काबिलियत नहीं है? (हाँ, है।) क्या ऐसे लोग मूर्ख नहीं हैं? (हाँ, हैं।) मूर्ख लोग ताश की पूरी गड्डी में कुछ पत्ते कम होते हैं। “ताश की पूरी गड्डी में कुछ पत्ते कम होने” का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि चाहे वे कितने भी धर्म-सिद्धांत समझते हों या कितने ही विनियमों का पालन करते हों, जब कुछ घटित होता है तो इनमें से कोई भी विनियम या धर्म-सिद्धांत वास्तविक समस्या का समाधान नहीं कर सकता। फिर भी वे इसे समझ नहीं पाते और सोचते हैं, “ये धर्म-सिद्धांत और विनियम बेअसर क्यों हैं?” अगर वे अपना दिमाग खपाएँ तो भी इसका कोई फायदा नहीं होता—चाहे वे कैसे भी विचार करें, फिर भी वे यह नहीं समझ पाते कि समस्या कैसे सँभालें या कैसे हल करें। कुछ लोग मसीह-विरोधी घटनाओं को सँभालते समय पहले मसीह-विरोधियों द्वारा गुमराह किए गए लोगों को नहीं बचाते, न ही वे मसीह-विरोधियों द्वारा गुमराह किए जाने के कारण नकारात्मक हुए और सभाओं में आने के लिए अनिच्छुक लोगों को प्रोत्साहित करते हैं। वे पहले क्या करते हैं? वे इस बारे में बात करने के लिए बड़ी सभाएँ आयोजित करते हैं कि मसीह-विरोधियों की क्या-क्या अभिव्यक्तियाँ होती हैं, किस तरह के लोग मसीह-विरोधी होते हैं, मसीह-विरोधियों और मसीह-विरोधियों के स्वभाव वाले लोगों के बीच क्या अंतर होता है, मसीह-विरोधियों का भेद ठीक से कैसे पहचाना जाए, मसीह-विरोधियों के स्वभाव वाले लोगों का भेद ठीक से कैसे पहचाना जाए—जब तक वे इन सब पर संगति समाप्त करते हैं, तब तक मसीह-विरोधियों द्वारा गुमराह किए गए कुछ लोग बहुत पहले ही कलीसिया छोड़ चुके होते हैं और कुछ जो नकारात्मक और कमजोर होते हैं वे अब सभाओं में नहीं आते। उन्होंने इन लोगों को बचाने का सबसे अच्छा समय गँवा दिया है, जिससे उन्हें वाकई बहुत नुकसान हुआ है! संक्षेप में, खराब काबिलियत वाले लोगों में चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता के मामले में भी एक बड़ा दोष होता है—वे इससे पूरी तरह रहित होते हैं। यह मत देखो कि व्यक्ति सामान्य परिस्थितियों में कितना वाक्पटु है या वह कितनी अच्छी तरह शब्द और धर्म-सिद्धांत बोल सकता है और धर्मशास्त्र के बारे में बात कर सकता है—बस यह देखो कि वास्तविक परिस्थितियों से सामना होने पर उसमें समस्याएँ सँभालने की क्षमता है या नहीं; खासकर जब आकस्मिक घटनाएँ होती हैं तो देखो कि क्या उसमें निर्णय लेने की क्षमता और चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता है, क्या उसके पास समस्याएँ सँभालने और हल करने की योजनाएँ हैं। अगर हैं तो इससे साबित होता है कि वह ऐसा व्यक्ति है जिसकी अपनी राय होती है और जो जानता है कि चीजों के बारे में कैसे सोचना है। लेकिन अगर उसमें चीजों को पहचानने की क्षमता और निर्णय लेने की क्षमता नहीं है और जब कुछ होता है तो वह घबरा जाता है और चिंतित हो जाता है और सिर्फ बड़े-बड़े धर्म-सिद्धांत बोलने और नारे लगाने में सक्षम होता है तो यह व्यक्ति समस्याएँ हल नहीं कर सकता और बेकार है। चाहे किसी और के पास कितनी भी कठिनाइयाँ, समस्याएँ या खामियाँ हों, यह व्यक्ति उन्हें बताने और उनसे निपटने के लिए सिद्धांतों का वही समुच्चय इस्तेमाल करता है और इस तरह से उनके साथ संगति करता रहता है, लेकिन कभी समस्याएँ हल नहीं कर पाता—यह चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता पूरी तरह से न होना है। समस्याएँ सँभालने की क्षमता न होना वास्तव में चीजों पर प्रतिक्रिया करने की अक्षमता है। जिन लोगों में चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता नहीं होती, वे काबिलियत से रहित होते हैं। आम शब्दों में, वे मूर्ख, बेवकूफ और मानसिक रूप से कमजोर होते हैं। चाहे वे कितने भी धर्म-सिद्धांत बोल सकते हों, यह बेकार है—उनका उपयोग नहीं किया जा सकता। आठवीं क्षमता, चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता पर हमारी संगति यहीं समाप्त होती है।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?