सत्य का अनुसरण कैसे करें (6) भाग छह
नंबर 9 : फैसला लेने की क्षमता
आओ अब नौवीं क्षमता, फैसला लेने की क्षमता पर नजर डालें। फैसला लेने की क्षमता व्यक्ति की काबिलियत को काफी हद तक परखती है; औसत व्यक्ति में यह क्षमता नहीं होती। जिन लोगों में सच में काबिलियत और फैसला लेने की क्षमता होती है, वे ही फैसला लेने के स्तर पर होते हैं। तो फैसला लेने की क्षमता मुख्य रूप से किसे संदर्भित करती है? यह इसे संदर्भित करती है कि जब विभिन्न लोग, घटनाएँ और चीजें सामने आती हैं और ज्यादातर लोग उनकी असलियत नहीं जान सकते, तब कैसे कुछ लोग परमेश्वर के वचनों और सत्य के आधार पर विभिन्न प्रकार की समस्याओं का भेद पहचान सकते हैं और उन्हें सँभाल सकते हैं, और विभिन्न प्रकार के लोगों को सँभाल सकते हैं। समस्याएँ सँभालने की इस क्षमता को फैसला लेने की क्षमता कहते हैं। जिन लोगों में चीजों को सँभालने की यह क्षमता होती है उनमें फैसला लेने की क्षमता होती है; जिन लोगों में चीजों को सँभालने की यह क्षमता नहीं होती उनमें फैसला लेने की क्षमता नहीं होती। फैसला लेने की क्षमता में क्या-क्या शामिल है? इसमें लोगों की बोध क्षमता, निर्णय लेने की क्षमता, चीजों को पहचानने की क्षमता और चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता शामिल होती है। इन्हें सामूहिक रूप से फैसला लेने की क्षमता कहते हैं। जिन लोगों में फैसला लेने की क्षमता होती है, वे समस्याओं के सार का आकलन और समस्याओं के गुणधर्मों की पहचान दोनों कर सकते हैं। बेशक, इससे भी महत्वपूर्ण चीज यह है कि वे विभिन्न समस्याएँ सँभालने के सिद्धांत और दिशा समझ सकते हैं। जो लोग ये काम कर सकते हैं, सिर्फ वे ही ऐसे लोग होते हैं जिनमें फैसला लेने की क्षमता होती है। उदाहरण के लिए, मान लो कि एक के बाद एक हर कोई कई परिघटनाओं, तथ्यों और साथ ही मौजूदा कारकों, परिस्थितियों, स्थितियों आदि के बारे में बात कर रहा है। जिन लोगों के पास फैसला लेने की क्षमता होती है वे उपर्युक्त विभिन्न कारकों और स्थितियों के आधार पर अंततः यह तय करते हैं कि वास्तव में कैसे कार्य करना है, उस कार्य के साधन और दिशा क्या होनी चाहिए, सर्वोत्तम प्राप्य स्तर क्या है और न्यूनतम स्वीकार्य स्तर क्या है—उनके पास एक आधार-रेखा होती है। फिर, वे जो सत्य सिद्धांत समझते हैं उनके आधार पर वे समस्याएँ सँभालते हैं। जिनके पास यह क्षमता होती है वे फैसला लेने की क्षमता वाले लोग होते हैं और ऐसे लोग सबसे अच्छी काबिलियत वाले लोग होते हैं। वे चाहे किसी भी तरह के पेशेवर कौशल का सामना कर रहे हों या किसी भी तरह की समस्या सँभाल रहे हों, और चाहे खोजी गई समस्या एकल-आयामी हो या बहु-आयामी, सरल हो या जटिल, वे समस्या के सार का आकलन करने के लिए तमाम पहलुओं से आने वाली विभिन्न सूचनाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं, फिर समस्या के मूल कारण का विश्लेषण कर सकते हैं और अंत में समस्या और मौजूदा स्थितियों के आधार पर निर्णय ले सकते हैं कि कैसे कार्य करना है। यह निर्णय मुख्य रूप से इस आधार पर किया जाता है कि मौजूदा स्थितियों में क्या हासिल किया जा सकता है, और जो कार्य-पथ वे तय करते हैं वह सर्वोत्तम समाधान होता है। जो लोग इस तरह से समस्याएँ सँभाल सकते हैं वे फैसला लेने की क्षमता वाले लोग होते हैं। फैसला लेने की ऐसी क्षमता वाले लोग बहुत अच्छी काबिलियत वाले होते हैं। ऐसे लोग ही अगुआ बनने और फैसला लेने वाले समूह में कर्तव्य निभाने के लिए उपयुक्त होते हैं। खराब काबिलियत वाले या औसत काबिलियत वाले लोग किसी तरह की समस्या से सामना होने पर खुद को मामले तक ही सीमित रख सकते हैं और कुछ सतही शब्द कह सकते हैं और वे समस्या हल करने में पूरी तरह से असमर्थ होते हैं। अगर वे दूसरों से सलाह लेकर समस्या पर गौर करते हैं, तो भी वे अंततः किसी परिभाषा पर नहीं पहुँच सकते और नहीं जानते कि कार्य कैसे करना है। यह फैसला लेने की क्षमता नहीं होना है। चाहे वर्तमान स्थिति कितनी भी जटिल हो या वर्तमान में जिस समस्या को सँभालने की जरूरत है वह कितनी भी कठिन हो और ऐसा करने में कितनी भी बड़ी बाधा आए, फैसला लेने की क्षमता वाले लोग उसे सिद्धांतों के अनुसार ठीक से सँभाल सकते हैं और उनका उसे सँभालना अपेक्षाकृत उपयुक्त और विश्वसनीय होता है। ऐसे लोग वे होते हैं जिनमें फैसला लेने की क्षमता होती है। फैसला लेने की औसत क्षमता वाले लोग साधारण स्थितियों और कलीसिया में कुछ सामान्य घटनाओं से सामना होने पर उन्हें सँभाल सकते हैं। लेकिन अगर उनका कुछ विशेष लोगों, घटनाओं और चीजों से सामना होता है तो वे भ्रमित हो जाते हैं, उन्हें पता नहीं होता कि उनका सामना कैसे करें या उन्हें कैसे सँभालें। बहुत सोच-विचार के बाद भी वे स्पष्ट निर्णय नहीं ले पाते या किसी निर्णय पर नहीं पहुँच पाते। फैसला लेने की क्षमता वाले लोग समस्या के मूल को लक्षित करने वाले सत्य सिद्धांत खोजना जानते हैं। फैसला लेने की क्षमता से रहित लोग नहीं जानते कि समस्या का मूल कहाँ है, कैसे खोजना है या क्या खोजना है। उनके बीच यही अंतर है। अगर खोज के जरिये कोई यह जान जाता है कि क्या करना है, तो यह दर्शाता है कि उसकी काबिलियत औसत है। जहाँ तक खराब काबिलियत वाले लोगों की बात है, अगर वे खोज के जरिये कुछ सत्य सिद्धांत समझ लें और उस समय महसूस करें कि वे जानते हैं कि मामले को कैसे सँभालना है, तो भी वे उसे सँभालने का वक्त आने पर ऐसा नहीं कर सकते। वे हैरान हो जाते हैं : “मैं वे सत्य सिद्धांत लागू क्यों नहीं कर सकता जिन्हें मैंने अभी समझा है? मैं क्या चूक कर रहा हूँ?” एक बार फिर वे भ्रमित महसूस करते हैं, और अंत में वे अब भी समस्या का समाधान नहीं कर सकते। यह फैसला लेने की क्षमता नहीं होना है; यह खराब काबिलियत होना है। सबसे खराब काबिलियत वाले लोग बस वही करते हैं जो तुम उनसे करने के लिए कहते हो। अगर तुम उन्हें नहीं बताते कि क्या करना है तो वे नहीं जानते कि कार्य कैसे करना है। जब फैसला लेने के स्तर के लोग उन्हें कोई कार्य करने के लिए अधिकृत करते हैं और आदेश या निर्देश देते हैं तब वे उसे सिर्फ वैसे ही करने में समर्थ होंगे जैसे उन्हें करने के लिए कहा गया है। लेकिन जहाँ तक इस बात का प्रश्न है कि कार्य ठीक उसी तरीके से क्यों किया जाना है, कार्य से क्या परिणाम प्राप्त होने हैं या अगर ऐसी अप्रत्याशित स्थितियाँ उत्पन्न हो जाएँ जो मूल परिदृश्य से भिन्न हों तो क्या करना है और उन्हें कैसे सँभालना है, तो वे इनमें से कोई भी चीज नहीं जानते और उन्हें पूछना पड़ता है और समस्या हल करने के लिए दूसरों की मदद का इंतजार करना पड़ता है। यह फैसला लेने की क्षमता नहीं होना है। ऐसे लोग रोबोट की तरह होते हैं—उन्हें सिर्फ दूसरों द्वारा चालाकी से प्रभावित और नियंत्रित किया जा सकता है और उनके पास स्वायत्तता नहीं होती। ऐसे व्यक्ति में फैसला लेने की क्षमता होने का सवाल ही नहीं उठता जिसमें काबिलियत नहीं होती है—वह फैसला लेने की क्षमता से बहुत दूर होता है, वह इस क्षमता तक नहीं पहुँचता। फैसला लेने की क्षमता को सिर्फ तीन स्तरों में विभाजित करने की जरूरत है : उच्च, मध्यम और निम्न। उच्च, मध्यम और निम्न क्रमशः अच्छे, औसत और खराब होने के समान हैं। जब ऐसे लोगों की बात आती है जिनमें कोई काबिलियत नहीं होती तो फैसला लेने की क्षमता के बारे में बात करना भी बेकार है; चाहे वे कुछ भी कर रहे हों, वे निर्णय नहीं ले सकते। उदाहरण के लिए, वे नहीं जानते कि जब पतझड़ का मौसम आता है और मौसम ठंडा हो जाता है तो वास्तव में क्या पहनना उपयुक्त है और जब सर्दी आती है और मौसम ठंडा हो जाता है तो क्या पहनना उपयुक्त है—उनमें यह सबसे बुनियादी सामान्य ज्ञान भी नहीं होता, इसलिए क्या उन्हें कलीसिया के कार्य से संबंधित प्रमुख मामलों में फैसला लेने के लिए कहना मजाक नहीं होगा? जिन लोगों में काबिलियत नहीं होती उनमें फैसला लेने की क्षमता होने का सवाल ही नहीं उठता। फैसला लेने की क्षमता मुख्य रूप से उन लोगों पर लागू होती है जो अगुआओं, कार्यकर्ताओं और पर्यवेक्षकों के स्तर पर होते हैं। ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जिनमें फैसला लेने की उच्च क्षमता होती है। फैसला लेने की क्षमता में और क्या शामिल होता है? इसमें उस मामले के नतीजे शामिल होते हैं जिस पर तुम निर्णय लेते हो—वे नतीजे लोगों के लिए फायदेमंद होंगे या उन पर नकारात्मक प्रभाव डालेंगे और क्या उनका लोगों के सत्य समझने या सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा—तुम्हें यह पता लगाना होगा। ऐसा नहीं है कि सिर्फ फैसला लेने, निर्णायक होने और तुरंत अंतिम निर्णय लेने में सक्षम होना फैसला लेने की क्षमता होने के समान है। यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि तुमने जिन समाधानों, और जिन लक्ष्यों और दिशाओं का फैसला लिया है, वे सही हैं या नहीं। अगर प्राप्त नतीजे सकारात्मक हैं तो तुममें वास्तव में फैसला लेने की क्षमता है। अगर प्राप्त नतीजे नकारात्मक हैं—लोगों को गुमराह करते हैं, उन्हें बहुत नुकसान पहुँचाते हैं या उन्हें बर्बाद करते हैं—तो यह किसी भी तरह की फैसला लेने की क्षमता नहीं है। इसलिए, लोगों का यह मानना कि सभी अग्रणी हस्तियों और प्रमुख हस्तियों में फैसला लेने की क्षमता होती है और सभी अग्रणी हस्तियों में अपेक्षाकृत उच्च काबिलियत और फैसला लेने की अपेक्षाकृत उच्च क्षमता होती है, कोई सटीक दृष्टिकोण नहीं है; यह पूरी तरह से गलत मत है। तुम्हारे द्वारा लिए गए निर्णय सही हैं या नहीं, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि उनके पीछे कौन-से सिद्धांत, लक्ष्य और दिशाएँ हैं। अगर लक्ष्य और दिशाएँ मानवजाति के लिए लाभदायक हैं और अगर वे लोगों के स्व-आचरण, सत्य के अभ्यास, उद्धार की प्राप्ति, स्वभावगत बदलाव और परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने में सकारात्मक मदद प्रदान करते हैं और लाभ पहुँचाते हैं तो फैसला लेने की तुम्हारी क्षमता वास्तव में उच्च है। लेकिन अगर तुम बिना सोचे-समझे ऐसे निर्णय लेते हो जिनसे लोगों को गंभीर चोट पहुँचती है, उन्हें बहुत नुकसान पहुँचता है, जिससे वे पथभ्रष्ट हो जाते हैं, परमेश्वर से दूर हो जाते हैं और अपनी दिशा खो देते हैं, तो यह लोगों को नुकसान पहुँचाना है और तुम्हारे बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि तुममें फैसला लेने की क्षमता है। फैसला लेने की क्षमता पर हमारी चर्चा यहीं समाप्त होती है।
नंबर 10 : चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता
अगली क्षमता है चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता। क्या तुम लोग जानते हो इसका क्या मतलब है? यह एक असामान्य विषय है। चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता का मतलब है कि किसी व्यक्ति, घटना या चीज से पेश आते समय क्या उस जानकारी से जिसे तुम देख और समझ सकते हो, तुम उसकी खूबियों, गुणों और कीमती पहलुओं का मूल्यांकन कर सकते हो और उनका मूल्य पहचान सकते हो और फिर उन्हें अपने जीवन और अपने स्व-आचरण और क्रियाकलापों में लागू कर सकते हो। अगर तुम किसी चीज का मूल्यांकन नहीं कर सकते और मूल्य नहीं पहचान सकते तो तुम यह नहीं बता पाओगे कि उसके गुण और कमियाँ क्या हैं, तुम उसकी कुंजी नहीं समझ पाओगे और तुम उससे कोई लाभ प्राप्त नहीं कर पाओगे। इसका मतलब है कि तुममें चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता नहीं है। लेकिन अगर तुम चीजों का मूल्यांकन कर सकते हो और उनका मूल्य पहचान सकते हो और कुछ मामलों से कोई उपयोगी चीज सीख सकते हो और उसे अपने वास्तविक जीवन में लागू कर सकते हो और अगर तुमने जो सीखा है वह तुम्हारे मानव-जीवन में और तुम्हारे जीवन-पथ के चयन में कुछ हद तक सहायता प्रदान कर सकता है, तो इससे साबित होता है कि तुममें चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की एक निश्चित क्षमता है। इस संबंध में तुम्हारी क्षमता जितनी ज्यादा होगी, उतना ही यह साबित होगा कि तुममें अच्छी काबिलियत है। आओ एक सरल उदाहरण लेते हैं : किसी पेंटिंग को देखना। अगर तुमने कला का अध्ययन नहीं किया है तो भी अगर तुम किसी पेंटिंग की संरचना देख सकते हो और मानवता के परिप्रेक्ष्य से उसमें निहित अर्थ समझ सकते हो—और साथ ही तुम्हारा परिप्रेक्ष्य बहुत सटीक और मानव होने से संबंधित है—और तुम इसके भीतर कुछ ठोस चीजें देख सकते हो जो मानव होने से संबंधित हैं और फिर उन चीजों को अपने जीवन या काम पर लागू करते हो तो यह अभिव्यक्ति साबित करती है कि तुममें चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता है। चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता का दायरा कुछ अपेक्षाकृत ठोस चीजों को संदर्भित करता है, अमूर्त चीजों को नहीं। अमूर्त चीजों में रंग, कलाकृतियाँ आदि शामिल होते हैं। चूँकि ये चीजें मानव होने से संबंधित नहीं हैं, पर्याप्त ठोस नहीं हैं और सामान्य इंसानी सोच और मानव-जीवन में मौजूद कुछ चीजों से बहुत दूर हैं और जीवन से निकटता से संबंधित नहीं हैं, इसलिए हम उन्हें चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता के दायरे की श्रेणी में वर्गीकृत नहीं करते। जहाँ तक कुछ ऐसी चीजों का संबंध है जो जीवन के अपेक्षाकृत करीब हैं, जिनमें कुछ छिपे हुए अर्थ हैं या जो मनुष्य होने से संबंधित हैं, अगर तुम उनका आकलन करने, उनका भेद पहचानने और उन्हें लागू करने में सक्षम हो; अगर तुम उनके गुणों के साथ-साथ उनकी कमियाँ भी देख सकते हो और उनके बारे में तुम्हारे अपने विचार और दृष्टिकोण हैं और तुम उन पहलुओं को समझ सकते हो जो लोगों की मानवता के लिए फायदेमंद हैं; और अगर तुम ऐसे विकृत और गैर-लचीले तत्त्वों के मौजूद होने पर जो सत्य के विरुद्ध जाते हैं, उनका भेद पहचान सकते हो; तो इसे चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता होना कहा जाता है। अगर तुम इन चीजों का आकलन नहीं कर सकते और किसी ठोस चीज को देखकर तुम सिर्फ सिद्धांत के लिहाज से उसकी खूबियों और कमियों का भेद पहचान सकते हो लेकिन यह नहीं देख सकते कि यह वास्तव में दैनिक जीवन में मानवता के किन पहलुओं से संबंधित है तो चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की तुम्हारी क्षमता औसत है। अगर तुम किसी कलाकृति को देखते हो और उसकी बार-बार जाँच करने के बाद भी यह नहीं समझ पाते कि यह क्या व्यक्त करने की कोशिश कर रही है या कलाकार ने इसे इस तरह क्यों बनाया है और चाहे कलाकृति मानवता से संबंधित हो या नहीं हो, तुम यह नहीं देख सकते कि इसमें क्या सारभूत चीजें हैं और तुम उसकी कुंजी नहीं देख सकते, तो इसका मतलब है कि तुममें चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता नहीं है। चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता नहीं होने का मतलब है कि किसी भी चीज पर तुम्हारे कोई दृष्टिकोण नहीं हैं और तुम सामाजिक रुझानों या लोगों द्वारा समर्थित कुछ नकारात्मक चीजों से आसानी से गुमराह हो जाते हो—यानी तुम किसी ऐसी चीज को सकारात्मक मान सकते हो जो स्वाभाविक रूप से नकारात्मक है और उसे स्वीकार सकते हो। इसका नतीजा यह होगा कि तुम उससे कलुषित हो जाओगे और अगर वह चीज लंबे समय तक तुम्हारे अंदर बनी रहती है और तुम्हारे भीतर गहराई तक जड़ें जमा लेती है तो वह तुम्हारे सत्य स्वीकारने में बाधा उत्पन्न करेगी और उसमें दखल देगी। आओ, चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता के संबंध में एक और उदाहरण देते हैं। उदाहरण के लिए, मान लो किसी फिल्म का कच्चा फुटेज तीन घंटे का है और संपादन के बाद फिल्म की लंबाई दो घंटे चालीस मिनट बैठती है। क्या आमतौर पर कोई फिल्म इतनी लंबी होती है? (नहीं।) यह क्या दर्शाता है? (यह दर्शाता है कि फिल्म-निर्माताओं में चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता नहीं है।) चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता नहीं होने का किसी फिल्म के लिए विशेष रूप से क्या मतलब है? (इसका मतलब है कि वे बेहतर फुटेज का चयन नहीं कर सकते और इस बारे में सटीक निर्णय नहीं ले सकते कि कौन-सी फुटेज रखनी चाहिए और कौन-सी हटा देनी चाहिए।) वे नहीं जानते कि फिल्म क्या थीम संप्रेषित करना चाहती है या कौन-से दृश्य थीम से निकटता से संबंधित हैं। नतीजतन, वे तय नहीं कर पाते कि क्या रखना है और क्या हटाना है। यानी वे नहीं जानते कि कौन-से दृश्य या कथानक-बिंदु अनावश्यक हैं और थीम से सतही तौर पर ही संबंधित हैं और उन्हें हटाया जा सकता है, और कौन-से दृश्य या कथानक-बिंदु थीम से सबसे ज्यादा जुड़े हुए हैं और उन्हें रखने की जरूरत है। चूँकि उनमें चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता नहीं होती, इसलिए संपादन के दौरान वे यह महसूस करते हुए “दया दिखाते हैं” कि यह नहीं काटा जा सकता और वह नहीं काटा जा सकता। अंत में, काफी प्रयास के बाद वे सिर्फ स्पष्ट समस्याओं वाले दृश्य या खराब तरीके से शूट किए गए फुटेज ही हटाते हैं। जो सामग्री थीम से निकटता से संबंध नहीं रखती उसे वे फिल्म में रहने देते हैं। यह चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता नहीं होना है। उन्हें फिल्म की परिभाषा की स्पष्ट समझ नहीं होती; फिल्म के विशिष्ट रूपों और अभिव्यंजक तकनीकों और प्रत्येक दृश्य के बीच के संबंध के साथ-साथ कौन-से दृश्य वास्तव में फिल्म के दृश्य हैं, वे इनमें से कुछ नहीं समझते। यह चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता न होना है। इसलिए, फिल्मांकन के दौरान वे आत्मविश्वास से भरे होते हैं; संपादन के दौरान उनके चेहरे पर परेशानी साफ दिखाई देती है; और जब समीक्षा की बात आती है तो वे बेहद चिंतित होते हैं। समीक्षा के बाद वे आगे बढ़ने के बारे में बहुत आश्वस्त महसूस करते हैं क्योंकि ऊपरवाले के मार्गदर्शन के जरिये उन्होंने सीख लिया होता है कि किन दृश्यों को हटाना है, और फिर साहसपूर्वक उन्हें काट देते हैं। अंत में वे फिल्म को काटकर कितनी छोटी कर देते हैं? वे उसे काटकर एक घंटे चालीस मिनट की लंबाई तक छोटी कर देते हैं। कैमरामैन काफी परेशान महसूस करता है : “क्या यह हमारे परिश्रम के फल की बर्बादी नहीं है? हमने इतने फुटेज फिल्माने में छह महीने तक कड़ी मेहनत की, लेकिन तुमने निर्दयतापूर्वक इतना कुछ काट दिया—क्या यह अभी भी एक फिल्म है?” मेरा जवाब है कि इतना ज्यादा काटना बिल्कुल सही है—फिल्म ऐसी ही होनी चाहिए। तुम्हारे पास जो था वह एक फिल्म नहीं थी; ज्यादा से ज्यादा वह एक टीवी नाटक था। सत्य चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की खराब क्षमता वाले लोगों से परे है—उनके साथ सत्य पर संगति करने से कोई नतीजे प्राप्त नहीं होंगे। जब किन्हीं चीजों या किन्हीं विचारों और दृष्टिकोणों की बात आती है तो वे यह मूल्यांकन नहीं कर सकते कि उनमें से क्या-क्या सामान्य मानवता की जरूरतों और मानकों के अनुरूप हैं, कौन-सी चीजें सामान्य मानवता के खिलाफ हैं, कौन-सी चीजें वास्तविक और व्यावहारिक हैं, कौन-सी चीजें खोखली और कल्पित हैं, कौन-सी चीजें परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप हैं और कौन-सी चीजें परमेश्वर के इरादों के खिलाफ हैं। जब फिल्म की बात आती है, तो कौन-से दृश्य थीम में सहायक भूमिका निभाते हैं, सीधे मुद्दे पर आते हैं और सीधे थीम को संप्रेषित करते हैं और थीम के केंद्रीय बिंदु को व्यक्त करने के लिए आवश्यक हैं, और कौन-से दृश्य असंगत या अनावश्यक हैं—वे इन चीजों का पता नहीं लगा सकते और इनमें से किसी को भी समझ नहीं सकते। जब संपादन की बात आती है तो वे हमेशा “दया दिखाते हैं” और फुटेज काटने के अनिच्छुक होते हैं। यह चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता न होना है। सामग्री फिल्माने के बाद अगर तुम, फिल्म जिन विचारों को संप्रेषित करना चाहती है और जो दिशा वह दिखाना चाहती है, इन पर विचार करके जान जाते हो कि कौन-से दृश्य शामिल नहीं किए जाने चाहिए, कौन-से दृश्य पर्याप्त प्रभाव नहीं छोड़ते और कौन-से दृश्य बैकअप-शॉट्स हैं जिन्हें इस्तेमाल करना कभी अभीष्ट नहीं था बल्कि जिन्हें विशेष परिस्थितियाँ उत्पन्न होने पर बैकअप के रूप में इस्तेमाल करने के लिए फिल्माया गया था—अगर तुमने अपने दिल में इन मामलों पर विचार किया है और उन्हें सँभालने के लिए तुम्हारे पास योजनाएँ और समाधान हैं, तो इसे चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता होना कहा जाता है। अगर तुम इनमें से कुछ नहीं कर सकते और समस्याओं पर विचार करने और उन्हें देखने के लिए तुम जो परिप्रेक्ष्य और तरीके इस्तेमाल करते हो उनका कोई आधार नहीं होता और अंत में तुम कोई सही निष्कर्ष नहीं निकाल सकते तो इसका मतलब है कि तुममें चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता नहीं है। बेशक, कलीसिया में ज्यादातर लोगों में चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता नहीं होती। चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता सिर्फ इस बारे में नहीं होती कि तुम किसी रचनात्मक कार्य, कलात्मक रचना या आध्यात्मिक पोषण का काम करने वाली किसी चीज की, या लोगों की मानवता के बारे में किसी दार्शनिक सिद्धांत की कितनी असलियत देख सकते हो—मुख्य बात यह है कि इन चीजों के बारे में तुम्हारा दृष्टिकोण भी सटीक होना चाहिए। एक ओर, तुम्हारा दृष्टिकोण तथ्यों और मानवता की जरूरतों के अनुरूप होना चाहिए। दूसरी ओर, तुम जो समझते-बूझते हो, वह सकारात्मक चीजों और सभी चीजों के नियमों के अनुरूप होना चाहिए; वह खोखला या विकृत नहीं होना चाहिए, और अंततः वह सत्य सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए। अगर तुम न सिर्फ यह देख सकते हो कि कौन-से विचार और दृष्टिकोण व्यक्त किए जा रहे हैं, अगर तुम सिर्फ उसी स्तर पर अटके नहीं रहते हो बल्कि यह भी देख सकते हो कि क्या ये विचार और दृष्टिकोण वास्तव में सही हैं, क्या वे वास्तव में मानवता की जरूरतों के अनुरूप हैं, क्या वे वास्तव में शुद्ध हैं और क्या वे वास्तव में सत्य के अनुरूप हैं—अगर तुम ये सभी चीजें कर सकते हो—तो तुम चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता वाले व्यक्ति हो। चीजों का मूल्यांकन करने और मूल्य पहचानने की अच्छी क्षमता वाले लोग अच्छी काबिलियत वाले होते हैं। अगर तुम ये सभी चीजें हासिल नहीं कर सकते या उन्हें सिर्फ औसत स्तर तक ही हासिल कर सकते हो तो चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की तुम्हारी क्षमता सिर्फ औसत है। अगर तुम मूलभूत रूप से ये मामले नहीं समझ सकते—उदाहरण के लिए, अगर तुम किसी दृश्य-श्रव्य कार्य, साहित्यिक और कलात्मक कार्य, कलाकृति आदि को नहीं समझ सकते, चाहे वे अमूर्त हों या ठोस, और तुम्हें वे किसी विदेशी भाषा की तरह पूरी तरह से समझ से परे लगते हैं, और तुम्हारी मानवता के भीतर ऐसी चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता नहीं है, तो तुममें चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता नहीं है; तुम बिना काबिलियत वाले व्यक्ति हो। अगर किसी दृश्य में किसी चरित्र की चाल-ढाल या मनोवैज्ञानिक स्थिति और मानसिक स्थिति की समग्र अभिव्यक्ति को कुछ रंगों, कुछ रोशनी और एक निश्चित परिवेश के साथ देखकर तुम यह बता सकते हो कि इस दृश्य का दर्शक के मन पर क्या प्रभाव पड़ेगा, तो तुममें चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता है। लेकिन चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता से रहित लोग यह नहीं देख सकते। वे कहते हैं, “रोशनी मंद होने या न होने या रंग सुंदर होने या नहीं होने से क्या फर्क पड़ता है? क्या किरदार फिर भी वैसा ही नहीं रहता? तुम कैसे बता सकते हो कि उसकी मानसिक स्थिति क्या है? मैं इसे क्यों नहीं देख सकता?” यह चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता न होना है। चाहे तुम उन्हें इसे कैसे भी समझाओ, भले ही वे दावा करें कि वे समझते हैं, लेकिन वास्तव में अपने दिल में वे इसे अभी भी नहीं समझते। यह क्षेत्र उनके लिए हमेशा अपरिचित ही रहेगा। जिन लोगों में चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता नहीं होती, चाहे वे किसी भी तरह का काम करते हों या किसी भी तरह का साहित्यिक या कलात्मक कार्य देखते हों, वे अपने विचार और दृष्टिकोण व्यक्त करने में असमर्थ रहते हैं। खास तौर पर ऐसे कार्य या रचनाओं के मामले में, जिनमें गहरा अर्थ व्यक्त करने, कोई थीम व्यक्त करने या आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करने की आवश्यकता होती है, वे इसे अच्छी तरह से नहीं कर सकते और ऐसे कार्यों के लिए सक्षम नहीं हो सकते। अगर तुममें चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता है और इसके अलावा, तुम सत्य भी समझते हो तो परमेश्वर के घर के फिल्म, साहित्य और कला से जुड़े काम के मामले में, जिसमें चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता शामिल होती है, तुम इसे अच्छी तरह से कर सकते हो, इसके लिए सक्षम हो सकते हो और इस तरह का कर्तव्य निभा सकते हो। अगर तुममें चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता नहीं है तो तुममें खराब काबिलियत है और तुम ऐसे काम के लिए सक्षम नहीं हो सकते। कुछ लोग कहते हैं, “मैं बहुत सालों से सत्य सुनता आया हूँ और मैं सत्य सिद्धांत समझता हूँ। क्या इसका मतलब यह है कि मैं ऐसे काम के लिए सक्षम हो सकता हूँ?” इससे भी काम नहीं चलेगा। अगर तुम कुछ सत्य समझते हो तो भी पूरक के रूप में चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता के बिना तुम सिर्फ सुसमाचार का प्रचार करने या कलीसिया का सिंचन करने जैसे कार्य ही कर सकते हो। लेकिन जिस काम में चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता शामिल हो, उसके लिए तुम सक्षम नहीं होगे। इसलिए अगर कुछ लोगों को गलती से ऐसे काम के लिए चुन लिया गया हो और अब उन्हें एहसास होता हो कि उनमें इस क्षेत्र में कोई भावी क्षमता नहीं है और वे सहज रूप से चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता से रहित हैं तो उन्हें यह कहते हुए तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए, “मैं यह काम नहीं कर सकता। मेरी मानवता में चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता नहीं है।” भले ही तुममें चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता हो या नहीं हो, यह बेशक व्यक्ति की काबिलियत का मूल्यांकन करने का एक मानक है। हालाँकि यह प्राथमिक मानक नहीं है, फिर भी कुछ विशेष कार्यों के लिए चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता भी आवश्यक है। चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता पर हमारी संगति यहीं समाप्त होती है। एक क्षमता और है, नवाचार क्षमता, जिस पर हम अगली बार संगति करेंगे।
क्या इस तरह संगति करने से तुम लोगों के लिए चीजें ज्यादा स्पष्ट होती हैं? (हाँ।) अगर मैं यह कहते हुए सिर्फ सामान्य शब्दों में बात करता, “व्यक्ति की काबिलियत का मूल्यांकन चीजें करने में उसकी दक्षता और प्रभावशीलता से किया जाता है,” तो तुम सिर्फ इस धर्म-सिद्धांत को दोहरा पाते, लेकिन तुम्हें फिर भी स्पष्ट न होता कि काबिलियत किन विशिष्ट पहलुओं को संदर्भित करती है। बाद में मैंने सोचा कि ज्यादा विशिष्ट रूप से संगति करना बेहतर होगा; जब तुम लोग इस विषय पर स्पष्टता प्राप्त कर लोगे तो तुम अपनी काबिलियत का सटीक मूल्यांकन कर उसे स्पष्ट रूप से समझ पाओगे। इससे तुम लोगों को अपनी उचित जगह पर रहने और अपनी क्षमताएँ बढ़ा-चढ़ाकर नहीं आँकने में मदद मिलेगी। अपनी क्षमताएँ स्पष्ट रूप से देखना और समझना, यह निर्धारित करना कि तुम्हारी काबिलियत अच्छी है, औसत है, खराब है या है ही नहीं और यह पहचानना कि तुम किस समूह से संबंधित हो—इस तरह अपना उचित स्थान ढूँढ़ना, तुम लोगों को मर्यादित तरीके से कार्य और आचरण करने में सक्षम बनाता है। एक ओर यह तुम्हें अपने बारे में सटीक समझ रखने में सक्षम बनाता है। दूसरी ओर तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव हल करने के मामले में यह तुम्हारा अहंकारी स्वभाव बदलने में भी कुछ हद तक सहायता प्रदान करता है। क्या यह सही नहीं है? (हाँ, है।) चलो आज संगति यहीं समाप्त करते हैं। अलविदा!
4 नवंबर 2023
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?