सत्य का अनुसरण कैसे करें (7) भाग दो
जब बात चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता की आती है, तो भले ही इसमें भ्रष्ट स्वभाव छोड़ देने के लिए सत्य का अनुसरण करने का मुद्दा शामिल न हो, खुद मानव जीवन के लिहाज से, अगर तुममें चीजों का मूल्य पहचानने की क्षमता नहीं है, तुम जो कुछ भी देखते हो उसके बारे में तुम्हारा कोई दृष्टिकोण नहीं होता है और न ही वैचारिक स्तर पर कोई राय होती है—तुम हर चीज को ऐसे देखते हो मानो तुम्हारी आँखों पर झीना पर्दा हो, तुम यह देखने में असमर्थ हो कि वहाँ कोई समस्या है—और तुम सिर्फ पूरी घटना के घटित होने की प्रक्रिया या इसमें शामिल लोगों, घटनाओं और चीजों के बारे में जानते हो, लेकिन तुम यह नहीं जानते कि समस्या का सार क्या है या लोगों के संबंधित विचार और दृष्टिकोण क्या हैं, तो यह दर्शाता है कि तुम खराब काबिलियत वाले व्यक्ति हो। इसका कारण यह है कि तुम्हारे पास अपने जीवन की सभी समस्याओं के संबंध में कोई भी विचार नहीं है। तुम्हें नहीं पता कि वैचारिक स्तर पर समस्याओं पर कैसे विचार करना है, सोचना है या उन्हें परिभाषित करना है। तुम्हें यह नहीं मालूम कि अपनी उम्र, अपनी मानवता की परिपक्वता या अपने पिछले अनुभवों के आधार पर यह कैसे विचार करना है कि कोई चीज वास्तव में किस तरह की समस्या है, तुम्हें इससे क्या सीखना चाहिए और क्या प्राप्त करना चाहिए, इसका तुम पर क्या प्रभाव पड़ता है, यह तुम्हारे लिए क्या सबक लाती है, तुम्हें इस प्रकार की समस्या को किस परिप्रेक्ष्य से देखना चाहिए और कैसे सँभालना चाहिए या अगर तुम इस प्रकार के मामले का दोबारा सामना करते हो तो तुम्हें कैसे कार्य करना चाहिए और क्या करने से बचना चाहिए। तुममें इन सभी विचारों की कमी है। चाहे तुम्हारे साथ कुछ भी हो जाए, तुम एक जानवर की तरह भोंदू व्यक्ति हो और तुम्हारा कोई दृष्टिकोण नहीं है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम कितनी उम्र तक जिंदा रहते हो या तुमने कितना अनुभव किया है, तुम्हें अब भी यह नहीं पता कि समस्याओं के बारे में कैसे सोचना है। तुम यह नहीं जानते कि विभिन्न पहलुओं में समस्याओं पर विचार करने के लिए अपने पिछले अनुभवों, अपने ज्ञान और तुमने जो सीखा है उसका कैसे उपयोग करना है। इस तरह के लोग खराब काबिलियत वाले होते हैं। खराब काबिलियत वाले लोगों के लिए सत्य में प्रवेश की तो बात ही छोड़ दो—यहाँ तक कि दैनिक जीवन के मामूली मामलों में भी, वे कोई भी पैटर्न व्युत्पन्न नहीं कर सकते हैं। भले ही वे चालीस, पचास, सत्तर या अस्सी वर्ष तक जिंदा रहें, वे तब भी भ्रमित लोग ही रहेंगे जो कोई भी अनुभव साझा नहीं कर सकते हैं। ऐसे व्यक्ति मंदबुद्धि लोग होते हैं जिनके पास कोई विचार नहीं होता है। क्योंकि उनकी काबिलियत खराब होती है और उनमें चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता नहीं होती है, चाहे ऐसे लोग कितनी भी उम्र तक जिंदा क्यों न रहें, वे कभी भी किसी भी चीज को वैचारिक स्तर पर नहीं देखते हैं। वे नहीं जानते हैं कि चीजों को कैसे देखना है और वे किसी भी चीज की असलियत नहीं जान पाते हैं। इसलिए किसी की काबिलियत का, विशेष रूप से इस बात का आकलन करते समय कि क्या उसमें चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता है, उसकी उम्र या उसके पिछले अनुभव मत देखो। बल्कि तुम्हें क्या देखना चाहिए? (हमें यह देखना चाहिए कि क्या उसके पास विचार हैं।) यानी तुम्हें यह देखना चाहिए कि क्या चालीस या पचास वर्षों तक विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों का अनुभव करने के बाद उसके पास वैचारिक स्तर पर कोई व्यक्तिगत समझ है और साथ ही क्या उसके पिछले अनुभवों में मानव जीवन का मूल्य, लोगों द्वारा अपनाए जाने वाला मार्ग या मानवीय विचारों की गहराई और उनकी आंतरिक मानसिक दुनिया से संबंधित चीजें शामिल हैं। अगर उनके अनुभव सिर्फ कुछ मामलों से संबंधित हैं और वैचारिक स्तर पर चीजों को शामिल नहीं करते हैं, तो उनमें चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता नहीं है। उदाहरण के लिए, कुछ लोग अक्सर कहते हैं, “हमारी पीढ़ी में हम जैसे-तैसे गुजारा किया करते थे। कोई अच्छी चीज खाना आसान नहीं था; हम सिर्फ नववर्ष या दूसरे त्योहारों पर थोड़ा-सा माँस खा पाते थे। हमारी पीढ़ी के लोग बहुत सीधे और निष्कपट थे और हम बहुत सादे कपड़े पहनते थे।” वे इस तरह की बातें करते रहते हैं। जिस पर दूसरे लोग कहते हैं, “तुम लोगों की पीढ़ी इतनी याद करने लायक क्यों है? क्या ऐसी चीजें हैं जिनसे हम नौजवान कुछ प्राप्त कर सकें और जिनके बारे में हम वैचारिक स्तर पर बातचीत कर सकें?” वे उत्तर देते हैं, “हमारे समय में जब हम जंग के मैदान में लड़ने जाते थे तो हम कई दिनों तक बिना सोए रहते थे क्योंकि हमें लगातार कूच करना पड़ता था। कभी-कभी हमें पूरा दिन एक बार का भोजन भी नहीं मिलता था। जब हम शिविर में पहुँचते थे, तो नए रंगरूट सीधा सोने चले जाते थे, लेकिन हम सैनिक पहले भोजन करते थे और फिर सोने जाते थे। नहीं तो हमें भोजन के समय के बाद जब फिर से चलना पड़ता, तो हम रास्ते में भूखे रह जाते।” दूसरे लोग कहते हैं, “यह तो बस एक घटना है; इसे वैचारिक स्तर पर कुछ नहीं माना जाता है। कुछ ऐसा बताओ जो हम नौजवानों के सीखने लायक हो या कुछ सबक बताओ जो भटकने से बचने में हमारी मदद कर सकें और हमें गलतियाँ करने या बेवकूफी के कारण निम्न स्तर की गलतियाँ करने से रोक सकें।” वे कहते हैं, “उस समय हम आजकल के नौजवानों जैसे नहीं थे जो आलसी और पेटू हैं और काम से नफरत करते हुए आराम पसंद करते हैं। उस जमाने में हम बस ज्यादा कष्ट सहना, ज्यादा काम करना चाहते थे और अच्छा प्रदर्शन करना चाहते थे ताकि हम अपने अगुआओं का ध्यान आकर्षित कर सकें और हमें तरक्की मिल सके।” क्या इन शब्दों में वैचारिक स्तर पर कोई चीज है? (नहीं।) यह सुनने के बाद क्या इससे तुम्हें लगता है कि ये किसी आध्यात्मिक उपदेशक के शब्द हैं, ये उस तरह की प्रेरणादायक बातें हैं जो अविश्वासी लोग कहते हैं? क्या यह तुम्हारी सोच को व्यापक बनाता है, तुम्हारे वैचारिक स्तर को उन्नत करता है, चीजों को जानने की तुम्हारी क्षमता को बढ़ाता है या तुम्हें कुछ नई चीजों या सही विचारों और दृष्टिकोणों की खोज करने में मदद करता है जिनके बारे में तुमने पहले कभी सोचा ही नहीं था? (नहीं।) तो क्या ऐसे लोगों में चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता होती है? तुम उनसे वैचारिक स्तर से जुड़े मामलों के बारे में चाहे कैसे भी क्यों न पूछो, तुम्हें उनसे कुछ नहीं मिलेगा। ऐसा वाकई नहीं है कि वे बोलने के अनिच्छुक हैं; बात यह है कि उनके अंदर कुछ है ही नहीं। खराब काबिलियत होने का यही मतलब है। जब वे पचास या साठ वर्ष के हो जाते हैं तब भी उनके पास कोई विचार या दृष्टिकोण नहीं होता है; वे बस बेतरतीब ढंग से जीवन जीते रहते हैं। उन्हें नहीं मालूम होता है कि जीना सिर्फ संभावनाओं, अच्छे परिवार, अच्छी नौकरी या अच्छे जीवन का अनुसरण करने के बारे में नहीं है, बल्कि वैचारिक स्तर पर भी ऐसे मामले हैं जिनके लिए दिल की गहराइयों में विचार करने, चिंतन करने और निरंतर आसवन करने की जरूरत पड़ती है। उन्हें नहीं मालूम होता है कि मानव जीवन के मार्ग पर लोग कई अनजान चीजों का सामना करेंगे और न ही वे यह जानते हैं कि उन्हें उनका सामना कैसे करना चाहिए। जब उनके साथ कुछ नहीं होता है, तो वे भटकने या गलत मार्ग पर चलने से बचने के लिए पहले से नहीं सोचते या चिंतन नहीं करते हैं। उन्हें यह भी नहीं पता होता है कि उन्होंने जिन कुछ चीजों का अनुभव किया है उनमें उन्होंने एक निश्चित तरीके से क्यों कार्य किया, क्या उस तरह से कार्य करना सही था या गलत या खुशी से जीने, मन की शांति के साथ जीने और निरर्थक जीवन की बजाय मूल्य वाला जीवन जीने के लिए आगे के मार्ग पर कैसे चलना चाहिए। चूँकि ऐसे लोग खराब काबिलियत वाले होते हैं, वे इन मुद्दों के बारे में नहीं सोचते हैं। जब ये लोग साठ वर्ष के हो जाते हैं तो वे बस याद करते हुए वहाँ बैठे रहते हैं, कहते हैं, “जब मैं छोटा था तो मैं सुंदर और प्रतिभाशाली था; मेरे पीछे कितने सारे लोग भागते थे! आह, मैं अपनी जवानी में...।” वे हमेशा सिर्फ अपने गौरव के दिनों की कहानियाँ शुरू कर देते हैं, ये ऐसी चीजें हैं जो जिक्र करने लायक नहीं होती हैं। खराब काबिलियत वाले लोग, चाहे वे कितनी भी उम्र तक जिंदा क्यों न रहें, मानव जीवन से संबंधित मुद्दों, लोगों द्वारा अपनाए जाने वाले मार्ग या इसके बारे में नहीं सोचते हैं कि लोगों को कैसे जीना चाहिए। वे इस बारे में नहीं सोचते हैं कि विभिन्न मामलों से निपटने के दौरान लोगों को किस प्रकार के दृष्टिकोण रखने चाहिए। नतीजतन, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कैसे जीते हैं, उनके विचारों का स्तर नहीं सुधरेगा, उनके विचारों में तत्व की कमी रहेगी, उनकी आंतरिक मानसिक दुनिया गरीब ही रहेगी और उनके पास कोई वास्तविक जीवन अनुभव नहीं होगा। खराब काबिलियत होने का यही मतलब है। जब तुम ऐसे लोगों से बातचीत करते हो तो बीस वर्ष की उम्र में वे काफी बचकाने और सीधे-सादे होते हैं, वे गर्ममिजाजी होते हैं और बदमिजाज होते हैं। जब वे तीस वर्ष के हो जाते हैं तब भी वे पुराने ढर्रे पर चल रहे होते हैं। पचास वर्ष की उम्र होने पर वे जिस तरीके से बोलते हैं, वह अब भी उसी स्तर का होता है—वे सिर्फ कुछ सरल वाक्यांश बोलना जानते हैं। उनके चेहरे पर ज्यादा झुर्रियाँ और उम्र के कारण धब्बे होते हैं और उनके बाल और सफेद हो चुके होते हैं। स्पष्ट रूप से उनकी कुछ उम्र हो चुकी होती है, लेकिन उनके पास कोई विचार या दृष्टिकोण नहीं होता है। दूसरों से बातचीत करते समय उनके पास कहने के लिए कभी भी कुछ नहीं होता है। उनके जीवन के ये सारे वर्ष बर्बाद हो चुके होते हैं और उन्होंने कोई प्रगति नहीं की होती है। खराब काबिलियत वाले लोग जीवन में ऐसे होते हैं और अगर वे परमेश्वर में विश्वास रखते हैं तो उनकी अभिव्यक्तियाँ शुरू से लेकर अंत तक एक जैसी होती हैं। जब वे अपनी बीस वर्ष की उम्र में पहली बार परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, तब वे ऐसे होते हैं। जब वे तीस या पचास वर्ष के हो जाते हैं, तब भी वे ऐसे ही होते हैं, उन्होंने बिल्कुल कोई प्रगति नहीं की होती है। वे जो बातें कहते हैं, वे अब भी पहले जैसी ही होती हैं। बस इतनी सी बात है कि उन्होंने परमेश्वर में विश्वास रखते हुए कुछ चीजों का अनुभव किया होता है, कुछ शब्दों और धर्म-सिद्धांतों को समझा होता है और वे आध्यात्मिक शब्दावली को और अधिक पूर्णता से बोल सकते हैं। लेकिन उनके पास कोई वास्तविक अनुभवजन्य समझ नहीं होती है। उनके विचारों में अब भी गहराई नहीं होती है, चीजों पर उनके दृष्टिकोण नहीं बदले होते हैं, परमेश्वर और सत्य के बारे में उनका ज्ञान नहीं बढ़ा होता है और उनके आत्म-ज्ञान में बढ़ोतरी नहीं हुई होती है। उनमें कोई बदलाव नहीं आया होता है, है ना? (सही कहा।) याददाश्त से या वर्षों के अनुभव से कुछ शब्दों और धर्म-सिद्धांतों या आध्यात्मिक शब्दावली को इकट्ठा करना बदलाव नहीं है, प्रगति नहीं है और यह निश्चित रूप से प्राप्ति नहीं है। खराब काबिलियत वाले लोगों की बिल्कुल यही अभिव्यक्ति है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कितने बड़े उतार-चढ़ावों से गुजरते हैं या कितनी रुकावटों, असफलताओं या निराशाओं का अनुभव करते हैं, वे कोई सबक नहीं सीखते हैं या कोई अनुभव प्राप्त नहीं करते हैं और कोई भी फायदेमंद चीज प्राप्त नहीं कर पाते हैं। एक बार जब कोई चीज समाप्त हो जाती है तो उनके लिए बस यह समाप्त हो जाती है—वे सिर्फ प्रक्रिया से गुजरते हैं और अंत में कुछ भी प्राप्त नहीं करते हैं। ऐसे लोगों को बहुत दयनीय कहा जा सकता है। हम सटीक रूप से इसलिए यह कहते हैं कि ऐसे लोगों की काबिलियत बहुत खराब होती है क्योंकि उनमें चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता नहीं होती है। यह तो कहा ही नहीं जा सकता कि उनमें सत्य समझने की कोई क्षमता होती है और न ही यह कहा जा सकता है कि उनमें कोई बदलाव आया है।
खराब काबिलियत वाले लोग चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता के लिहाज से स्तर के नहीं होते हैं। जहाँ तक बिना कोई काबिलियत वाले लोगों की बात है, तो उनमें चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता और भी कम होती है—वे चीजों का मूल्य नहीं पहचान सकते हैं और इससे भी ज्यादा वे उनका मूल्यांकन नहीं कर सकते हैं। जब तुम किसी चीज के बारे में अपने विचार और दृष्टिकोण साझा करते हो, तो खराब काबिलियत वाले लोग इसे सुनकर अवाक रह जाते हैं, वे कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाते हैं। वे अपने दिलों में सोचते हैं, “इसमें विचार और दृष्टिकोण हैं? मैं यह क्यों समझ नहीं पाया?” भले ही तुम जो कहते हो, वे उसमें से थोड़ा-सा समझ सकते हों, लेकिन वे इसे सिर्फ शब्दों और धर्म-सिद्धांतों या एक सूत्र के रूप में ही सुन सकते हैं। जहाँ तक बिना काबिलियत वाले लोगों की बात है, जब वे दूसरों को किसी चीज के भीतर के विचारों और दृष्टिकोणों के बारे में या समस्या के सार और लोगों को इसके संबंध में क्या रुख अपनाना चाहिए इस बारे में संगति करते हुए सुनते हैं, तो वे इसे समझ नहीं पाते हैं। उन्हें बस यही लगता है कि यह कुछ हद तक गहन है, लेकिन यह उनकी समझ से परे है। जितनी ज्यादा तुम विचारों और समझ के बारे में संगति करते हो, उतने ही ज्यादा वे भ्रमित हो जाते हैं। उन्हें लगता है, “यह साधारण मामला जटिल कैसे हो गया है? मैं विचारों, दृष्टिकोणों या रुखों का मतलब क्यों नहीं समझ पा रहा हूँ? कौन-सा रुख? हमें बस परमेश्वर में उचित रूप से विश्वास रखना है और अपने कर्तव्य उचित रूप से करने हैं और परमेश्वर स्वीकार करेगा। ऐसा क्यों है कि जितना ज्यादा समय कोई परमेश्वर में विश्वास रखता है, चीजें उतनी ही जटिल होती जाती हैं? तुम्हारी बात सुनकर ऐसा लगता है जैसे कोई भी राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता!” क्या तुम ऐसे लोगों से बात कर सकते हो? (नहीं।) न सिर्फ तुम उनसे बात नहीं कर सकते, बल्कि वे कुछ अनुचित बातें भी कह सकते हैं : “क्या तुमने जिन विचारों और दृष्टिकोणों का जिक्र किया वे वाकई इतने अच्छे और इतने सही हैं? मुझे ऐसा नहीं लगता! लोग पैसे के बिना कभी नहीं रह सकते। लोगों को हमेशा अच्छा भोजन करना चाहिए और अच्छी चीजों का आनंद लेना चाहिए। खर्च करने के लिए पैसे या खाने के लिए अच्छे भोजन के बिना कोई अपना कर्तव्य कैसे कर सकता है?” यह किस प्रकार का तर्क है? वे कहते हैं, “तुम हमेशा मानव जीवन, लोगों के मूल्यों, विचारों और दृष्टिकोणों तथा लोगों द्वारा अपनाए जाने वाले मार्ग के बारे में बात करते रहते हो। तुम खाने और पहनने के बारे में बात क्यों नहीं करते? तुम इस बारे में बात क्यों नहीं करते कि अपने शरीर की देखभाल कैसे करनी है ताकि तुम अपना कर्तव्य अच्छी तरह से कर सको?” वे इन्हीं चीजों के बारे में सोच रहे हैं—क्या वे अब भी सत्य समझ सकते हैं? तुम ऐसे लोगों से बात कर ही नहीं सकते। जब तुम उनसे बात करने का प्रयास करते हो तो वे बस पैसे कमाने की बात करते हैं। वे पैसे कमाने, अपना जीवन जीने, दुनिया का अनुसरण करने और अपना जीवन खाने-पीने और मौज-मस्ती में बिताने को मानव जीवन के मुख्य मामले और वह मार्ग मानते हैं जिस पर लोगों को चलना चाहिए। जहाँ तक यह प्रश्न है कि लोगों को परमेश्वर में विश्वास रखकर क्या अनुसरण करना चाहिए या क्या प्राप्त करना चाहिए, तो उनके विचारों या चेतना में इन चीजों का अस्तित्व नहीं होता है। वे मानते हैं कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोग कितने वर्ष परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, उन्हें अब भी खाने और जीने की जरूरत पड़ती है और अच्छी तरह से जीने के लिए तुम पैसे के बिना नहीं रह सकते—पैसा होने का मतलब है अच्छा जीवन होना और पैसे के बिना जीवन नहीं चल सकता। उनका यह तर्क है; ऐसे लोगों में विकृतियों की संभावना होती हैं। जिन लोगों में विकृतियों की संभावना होती है, उनके पास कोई सही विचार या दृष्टिकोण नहीं होता है; वे बिना आत्मा वाले लोगों जैसे होते हैं। ऐसे लोगों के जीवन और सूअरों या कुत्तों के जीवन के बीच क्या अंतर है? (कोई अंतर नहीं है।) अगर तुम किसी कुत्ते या बिल्ली को आज्ञाकारी बनाने और उनसे तमीजदार बच्चे की तरह व्यवहार करवाने के लिए शिक्षित करने का प्रयास करते हो तो क्या वे समझ सकते हैं? (वे नहीं समझ सकते।) कुत्ता ज्यादा-से-ज्यादा क्या समझ सकता है? अगर तुम उससे कहते हो “बैठो” और फिर उसे माँस का एक टुकड़ा देते हो तो वह याद रखेगा। उसके बाद जैसे ही तुम कहोगे “बैठो”, तो चाहे वह कितनी भी दूर क्यों न हो, वह तुरंत बैठ जाएगा और माँस खिलाने के लिए तुम्हारी प्रतीक्षा करेगा। कुत्ता इस मशीनी क्रियाकलाप को याद रख सकता है; जब तक तुम उसे बताते हो कि बैठने से इनाम मिलता है तब तक वह तुम्हारी बात मानेगा। उसके विचार इतने भोंदू होते हैं। तो, बिना काबिलियत वाले लोगों के विचारों और जानवरों के विचारों में कितना बड़ा अंतर होता है? (कोई खास अंतर नहीं होता।) जानवर हर रोज खाना खाने के बाद खेलने के लिए बाहर चले जाते हैं। जब फिर से खाने का समय होता है और तुम उन्हें वापस बुलाते हो, तो वे तुरंत दौड़कर चले आते हैं। चाहे तुम उन्हें बाँध दो या बिठा दो, वे तुम्हारी बात मानेंगे। ऐसा क्यों है? क्योंकि वहाँ खाने के लिए भोजन है। उस जरा-से भोजन की खातिर वे तुम्हारे आदेशों का खुशी-खुशी पालन करते हैं। जानवरों के विचार इतने आदिम होते हैं। उनके लिए ऐसे किसी विनियम या सूत्र का पालन करना ही पर्याप्त है जिससे उन्हें फायदा होता है; वे ज्यादा और कुछ नहीं सोचते। क्योंकि परमेश्वर जानवरों को जो सहज प्रवृत्तियाँ देता है, वे इन चीजों तक ही सीमित हैं, जो उनके जिंदा बचे रहने के लिए पर्याप्त हैं और परमेश्वर ने उन्हें कोई आदेश नहीं दिया है, इसलिए जानवरों को जीवन, भविष्य, अपने गंतव्य या अपनी जिम्मेदारियों और दायित्वों पर विचार करने की जरूरत नहीं पड़ती है। उन्हें यह भी विचार करने की जरूरत नहीं पड़ती है कि उन्हें कौन-सा मार्ग अपनाना है या सार्थक जीवन का अनुसरण करना है, वगैरह-वगैरह। लेकिन लोग अलग होते हैं। परमेश्वर ने लोगों को विभिन्न सहज प्रवृत्तियाँ प्रदान की हैं और सत्य भी दिया है ताकि वह उनका जीवन बने। इसलिए, परमेश्वर ने लोगों से मानकों की अपेक्षा की है। इस तरह से लोगों को इन मुद्दों पर विचार करना चाहिए; सिर्फ ऐसा करना ही उनके सत्य प्राप्त करने के अनुकूल है ताकि वह उनका जीवन बने। लोगों के पास यही जिम्मेदारी और दायित्व होना चाहिए और यकीनन यह उनका अधिकार भी है। लेकिन अगर तुम इस अधिकार का उपयोग नहीं कर सकते हो या तुममें मुद्दों के बारे में सोचने की यह क्षमता नहीं है तो इससे यह साबित होता है कि तुम्हारी काबिलियत बहुत खराब है। मनुष्यों के स्तर पर जीवित प्राणियों के बीच तुम खराब काबिलियत वाले लोगों की श्रेणी में आते हो। तुम अपने लिए नहीं सोच पाते हो और यहाँ तक कि जब दूसरे लोग तुम्हें चीजें समझाते हैं तब भी तुम समझ नहीं पाते हो। ज्यादा गंभीर मामलों में तुम दूसरों का प्रतिरोध करते हो, उनका मजाक उड़ाते हो, उन्हें ताने देते हो या यहाँ तक कि उनकी आलोचना भी करते हो। अगर तुम्हारी काबिलियत इस हद तक खराब है तो इसका मतलब है कि तुममें बिल्कुल कोई काबिलियत नहीं है। उदाहरण के लिए, एक बिना काबिलियत वाला व्यक्ति कोई अनुभवजन्य गवाही लेख पढ़ता है और तुम उससे पूछते हो, “क्या यह लेख अच्छा है?” वह कहता है, “यह काफी अच्छा है। हर अनुच्छेद को सटीक रूप से बाँटा गया है और विराम चिह्न ज्यादातर सटीक हैं। पहला अनुच्छेद समय और जगह बताता है, दूसरा अनुच्छेद किरदारों की पृष्ठभूमि देता है, तीसरा अनुच्छेद कहानी का घटनाक्रम बयान करना शुरू करता है और फिर यह चरमोत्कर्ष और निष्कर्ष पर पहुँच जाता है।” अगर तुम उससे पूछते हो कि लेखक के विचार और दृष्टिकोण क्या हैं तो वह कहता है, “इसमें विचार और दृष्टिकोण हैं? परमेश्वर के वचनों का वह भाग जिसका लेखक ने हवाला दिया है, वही विचार और दृष्टिकोण हैं।” तुम पूछते हो, “क्या उसने परमेश्वर के जिन वचनों का हवाला दिया है वे उपयुक्त हैं? क्या वह जो विचार और दृष्टिकोण व्यक्त करना चाहता है वे सटीक हैं?” वह कहता है कि उसे नहीं पता। फिर तुम ऐसे प्रश्न पूछते हो, “क्या लेखक ने जो समझ साझा की है वह सच्ची और व्यावहारिक है? क्या वह जो समझता है वह धर्म-सिद्धांत है या क्या यह वास्तविकता के करीब है? क्या यह दूसरों को नैतिक रूप से शिक्षित करता है या उनके लिए मूल्यवान है? क्या यह पाठकों को मदद या लाभ प्रदान करता है?” उन्हें इसमें से कुछ भी नहीं मालूम और वे इसे बूझ नहीं पाते हैं। बहुत खराब काबिलियत होने का यही मतलब है। अगर तुम उनके साथ लेख के विचारों और दृष्टिकोणों में गलतियों के बारे में और इस बारे में संगति करते हो कि इसके कौन-से भाग व्यावहारिक हैं और कौन-से नहीं, तो भी वे नहीं जानते हैं और उसे लेख से जोड़ नहीं पाते हैं। क्या यह काबिलियत की कमी दर्शाता है? (हाँ।) यहाँ तक कि जब दूसरे लोग मौजूदा समस्याओं के बारे में संगति करते हैं तो भी उन्हें नहीं पता होता है। क्या यह काबिलियत की कमी नहीं दर्शाता है? यह कुछ कलीसियाई अगुआओं जैसा है : जब कलीसिया में कुकर्मी या छद्म-विश्वासी दिखाई देते हैं तो उन्हें नहीं पता होता है कि इनसे कैसे निपटना है। तुम्हारे उनके साथ सत्य सिद्धांतों पर संगति कर लेने के बाद उन्हें समझ नहीं आता है और वे तुमसे उदाहरण देने के लिए कहते हैं। तुम्हारे एक उदाहरण देने के बाद भी उन्हें नहीं पता होता कि इनसे कैसे निपटना है। वे कहते हैं, “कृपया मुझे सिखाओ। मुझे उस व्यक्ति से आखिर कैसे निपटना चाहिए? क्या मुझे उसे किसी साधारण कलीसिया में रखना चाहिए, उसे बी समूह में रखना चाहिए या उसे बाहर निकाल देना चाहिए? मुझे उस व्यक्ति के साथ कैसे संगति करनी चाहिए? कृपया मुझे इसे शब्दशः समझाओ। मैं इसे रिकॉर्ड करूँगा और फिर परिस्थिति से निपटने के लिए इसका अक्षरशः पालन करूँगा—इस तरह, मैं इसे कर सकता हूँ।” जब वे इस तरह के हैं तो उनके साथ सिद्धांतों की संगति करने का क्या फायदा है? यहाँ तक कि जब तुम उदाहरण देते हो तो भी उन्हें समझ नहीं आता है और वे मामले से निपट नहीं पाते हैं। ऐसे लोगों में बस बोध क्षमता नहीं होती है। फिर भी वे अंत में पूछते हैं, “मुझे बताओ कि मुझे इस मौजूदा मुद्दे के बारे में क्या करना चाहिए और मैं वही करूँगा।” तुम उन्हें बताते हो कि इस मामले से निपटने के लिए कहाँ जाना है, इसे करवाने के लिए किससे क्या कहना है और इस मामले को पूरी तरह से हल हो चुका माने जाने के लिए इसे किस हद तक निपटाना है। जब तुम्हारे समझाना समाप्त करने के बाद लगता है कि वे समझ गए हैं, लेकिन फिर भी वे इससे निपट नहीं पाते हैं और तुम्हें इसे पूरा करने के लिए किसी ऐसे व्यक्ति को ढूँढ़ना पड़ता है जो उनका सहयोग करे। ऐसे लोग बेहद मंदबुद्धि होते हैं और उनमें काबिलियत नहीं होती है। उदाहरण के लिए, मान लो कि तुम नृत्य सीखने वाले लोगों से कहते हो कि किसी खास नृत्य के स्टेप बहुत अच्छे हैं और इन्हें सीखने के लिए तुम उन्हें एक वीडियो का अनुसरण करने के लिए कहते हो। कुछ दिन बाद जब तुम पूछते हो कि उन्होंने कैसी प्रगति की है तो कुछ मंदबुद्धि लोग कहते हैं कि वे यह नहीं बता पाए कि कौन-से स्टेप अच्छे हैं। भले ही उनके पास शिक्षण सामग्री हो, फिर भी वे इसे नहीं सीख पाते हैं। उन्हें नहीं पता कि कौन-से संचालन अच्छे हैं या कौन-से उपयोगी हैं और वे नहीं जानते कि कैसे चुनना है। आखिरकार वे क्या करते हैं? उनके पास एक तरकीब है; वे कहते हैं, “मुझे सीखने के लिए बस कुछ नृत्य स्टेप चुन दो और मैं उनका अनुसरण करूँगा—बात खत्म।” उनके पास यह हुनर है; हालाँकि वे सिद्धांत नहीं समझते हैं, उनमें थोड़ी-सी चालाकी होती है। क्या वे ठीक मशीनी मानवों जैसे नहीं हैं? उनके पास ज्ञान और शिक्षा हो सकती है, लेकिन उनमें चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता की कमी होती है—काबिलियत नहीं होने का यही मतलब है। उन्हें नहीं मालूम होता है कि तुम उन्हें जो सीखने के लिए कह रहे हो, वह उन्हें क्यों सीखना चाहिए। तुम उन्हें जो चीजें नहीं सीखने के लिए कहते हो उनके बारे में वे नहीं जानते हैं कि उनमें क्या गलत है या उन्हें वे चीजें क्यों नहीं सीखनी चाहिए। यहाँ तक कि उन्हें बताए जाने के बाद भी वे इसे देख नहीं पाते हैं। मुझे बताओ, क्या ऐसे लोगों में काबिलियत होती है? (नहीं।) अपने आप चीजों का जानकार होने की क्षमता नहीं होना और स्वतंत्र रूप से सही और गलत की पहचान करने और इनके बीच का भेद जानने की क्षमता नहीं होना—काबिलियत नहीं होने का यही मतलब है। मवेशियों या घोड़ों की तरह उन्हें हमेशा किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत होती है जो उनकी अगुआई करे—तो क्या वे सिर्फ औजार नहीं हैं? अगर तुम्हारे पास काबिलियत होती, तो क्या फिर भी तुम्हें किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत होती जो तुम्हारी अगुआई करता? तो फिर तुम्हारे पास दिमाग किसलिए है? तुम्हारा दिमाग बेकार है। सटीक रूप से कहा जाए तो तुममें कोई काबिलियत नहीं है। तुम्हें दूसरों की बात सुननी होगी और उनकी अगुआई में आगे बढ़ना होगा—तुम सिर्फ एक औजार हो। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस तरह के लोग किसी खास पेशे का कितना अध्ययन करते हैं या वे उससे जुड़े कितने सिद्धांत सुनते हैं, वे फिर भी उन्हें समझ नहीं पाते हैं या उनकी बारीकियाँ पकड़ नहीं पाते हैं। अंत में वे नहीं जानते हैं कि इन सिद्धांतों का कैसे उपयोग करना है या उन्हें कैसे कार्यान्वित करना है। ये सबसे खराब काबिलियत वाले लोग हैं—जिनमें कोई काबिलियत नहीं होती है। कुछ लोग कहते हैं, “यह मत सोचो कि सिर्फ इसलिए कि उनमें चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता नहीं होती है और वे हमेशा अपना कर्तव्य करने में तुम्हारी अगुआई का अनुसरण करते हैं, इसका यह मतलब है कि उनमें खराब काबिलियत है। दरअसल उनमें काबिलियत की कमी सिर्फ तब होती है जब सत्य समझने की बात आती है। जब उनके अपने हितों से जुड़े मामलों की बात आती है तो वे हर नुकसान से अपनी रक्षा करने के लिए हमेशा हर संभव तरीके के बारे में सोच लेते हैं। वे इन चीजों में तेज होते हैं—वे निश्चित रूप से मंदबुद्धि लोग नहीं हैं। कलीसिया में वे मंदबुद्धि लगते हैं, लेकिन अगर वे दुनिया में वापस लौट जाएँ तो वे मंदबुद्धि नहीं होंगे। वे जिन चीजों का आनंद लेते हैं उनमें उनके विचार और रचनात्मक कार्य होंगे; शायद उन्हें कुछ सफलता मिल सकती है।” ऐसे लोग भी हैं जो कलीसिया में बेतहाशा गलत कर्म करते हैं और हर कोई कहता है कि उनकी काबिलियत खराब है, लेकिन खुद उन्हें विश्वास नहीं है : “तुम कहते हो कि मेरी काबिलियत खराब है, लेकिन अगर मैं अविश्वासी दुनिया में होता, तो मैं अब भी पैसे और आजीविका कमा सकता था। मैं अब भी फल-फूल सकता था—यह बात पत्थर की लकीर नहीं है कि मैं दूसरों से बदतर करूँगा!” क्या अविश्वासी दुनिया हर चीज को सत्य सिद्धांतों से मापती है? क्या नींव के रूप में यह परमेश्वर के वचनों पर भरोसा करती है? अगर नहीं, तो भले ही उनके रचनात्मक कार्य अविश्वासी दुनिया में मान्य हो सकें, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता है कि उनमें काबिलियत है। उदाहरण के लिए, कुछ लोग चित्रकारी करते हैं और पहली नजर में ऐसा लगता है कि उनके चित्रों के रंग, संरचना, प्रकाश-व्यवस्था, आकृतियों के अनुपात और दूसरे पहलू काफी अच्छे हैं। लेकिन जब वे परमेश्वर के घर में कुछ प्राचीन संतों के चित्र बनाते हैं, तो समस्याएँ खड़ी हो जाती हैं। मैं कहता हूँ, “इस चित्रकार की कलाकृतियाँ अविश्वासियों के बीच काफी बिकती थीं और लोग उनकी सराहना करते थे। लेकिन मुझे अब्राहम, अय्यूब और नूह के उसके चित्रण इतने अजीब क्यों लगते हैं? अलग-अलग युगों के ये तीन लोग अंत में एक ही परिवार के सदस्यों जैसे कैसे दिखने लगे? वे प्राचीन इस्राएली थे और उनके चेहरे की अस्थि संरचना में उस जातीय समूह की विशेषताएँ दिखाई देनी चाहिए। भले ही वे हर आकृति के व्यक्तित्व को न जानते हों, कम-से-कम उन्हें यह तो समझना चाहिए कि उस जातीय समूह की कंकाल संरचना और विशेषताएँ कैसी हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे जिस व्यक्ति का चित्र बना रहे हैं वह किस युग का है, उसकी जातीय विशेषताओं पर जोर दिया जाना चाहिए और उन्हें उसके बालों, चेहरे की विशेषताओं, आँखों के रंग और चेहरे के आकार के जरिये स्पष्ट किया जाना चाहिए।” फिर भी ऐसा क्यों है कि उन्होंने इन विभिन्न युगों के जिन व्यक्तियों के चित्र बनाए वे अलग-अलग उम्र के होने के बावजूद सभी की अस्थि संरचना उनके जातीय समूह से मिलती-जुलती नहीं है? उन सभी के चेहरे आयताकार हैं; छोटी उम्र के लोगों में बस झुर्रियाँ कम हैं और उनके बाल काले हैं, जबकि बड़ी उम्र के लोगों में झुर्रियाँ ज्यादा हैं, त्वचा कांतिहीन है और उनके सफेद बाल ज्यादा हैं। इन आकृतियों की सारी विशेषताएँ मूल रूप से एक जैसी हैं : चौड़े, आयताकार चेहरे, लंबा कद और विशेष रूप से मजबूत गठन। मैं कहता हूँ, “ये सभी आकृतियाँ एक जैसी क्यों दिखती हैं? वे बहुत ज्यादा मिलती-जुलती हैं और उनमें विशिष्ट विशेषताओं की कमी है।” खुद चित्रकार को यह समस्या दिखाई नहीं देती है। शायद उसने इस तरह की बहुत ज्यादा कलाकृतियाँ बनाई हैं, उसकी तकनीक बहुत ज्यादा परिष्कृत हो गई है और उसकी शैली स्थिर हो गई है। जब भी वह आकृतियाँ बनाता है, तो पुरुषों के चेहरे का आकार लगभग हमेशा एक जैसा होता है और वह अलग-अलग किरदारों के चेहरे की अनोखी विशेषताओं को पकड़ नहीं पाता है। क्या उसकी चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता थोड़ी-सी खराब नहीं है? (हाँ।) चित्र पूरा करने के बाद उसे नहीं पता होता है कि उसने जिन चेहरे की विशेषताओं का चित्रण किया है वे उस जातीय समूह की कंकाल संबंधी विशेषताओं के साथ मेल खाती भी हैं या नहीं; वह उन विशेषताओं के बारे में निश्चित नहीं हैं। क्या तुम लोग कहोगे कि इस क्षेत्र में उसकी काबिलियत औसत है या खराब है? (खराब।) क्या दूसरों के सुझाव देने के बाद वह इसे ठीक कर सकता है? एक बार मैंने उसे सुझाव दिए थे लेकिन जब मैंने बाद में उसका कार्य देखा तो वह तब भी वैसा ही था। उस मौके पर कहने के लिए और कुछ नहीं था—आगे समझाना अब भी उसकी समझ से परे होता।
जब लोगों की चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता से संबंधित मुद्दों की बात आती है, तो ये काबिलियत के विभिन्न स्तरों पर लोगों की अभिव्यक्तियाँ हैं। अच्छी काबिलियत वाले लोग न सिर्फ चीजों का मूल्य पहचान सकते हैं, बल्कि वे उनका मूल्यांकन भी कर सकते हैं। इससे भी बेहतर काबिलियत वाले लोग सही विचारों और दृष्टिकोणों का सामना करने पर उनकी हिमायत करते हैं और उन्हें दूसरों के साथ साझा करते हैं या उन्हें प्रदान करते हैं और जब वे गलत विचारों और दृष्टिकोणों का सामना करते हैं, तो वे उन्हें पहचान सकते हैं और ठीक कर सकते हैं। औसत काबिलियत वाले लोगों में चीजों का मूल्य पहचानने की एक निश्चित क्षमता होती है, लेकिन उनमें चीजों का मूल्यांकन करने की क्षमता की कमी होती है—वे वैचारिक स्तर पर चीजों की पहचान नहीं कर पाते हैं। खराब काबिलियत वाले लोग वैचारिक स्तर पर चीजों को नहीं समझते हैं, इसलिए उनके बारे में यह नहीं कहा जा सकता है कि उनमें चीजों को पहचानने की कोई क्षमता है। बिना काबिलियत वाले लोग इन मामलों को बिल्कुल भी नहीं समझ पाते हैं। अगर कोई उन्हें ये समझा भी दे तो भी वे यह नहीं समझ पाते हैं कि जिन विचारों और दृष्टिकोणों पर चर्चा की जा रही है वे वास्तव में क्या हैं। उनके लिए यह किसी दूसरे ग्रह के बारे में कहानी सुनने जैसा है—यह उनकी समझ से बिल्कुल परे है। ये चीजों का मूल्यांकन करने और उनका मूल्य पहचानने की क्षमता के लिहाज से अलग-अलग काबिलियत वाले लोगों द्वारा प्रदर्शित की जाने वाली अलग-अलग विशेषताएँ हैं।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?