सत्य का अनुसरण कैसे करें (7) भाग तीन

नंबर 11 : नवाचार क्षमता

व्यक्ति की काबिलियत का मूल्यांकन करने का ग्यारहवाँ मानक नवाचार क्षमता है। नवाचार क्षमता वह रचनात्मक क्षमता है जो किसी चीज के मूलतत्वों, सिद्धांतों और नियमों को जानने के बाद तुम्हें जो समझ प्राप्त होती है उसके आधार पर तुम्हारे पास होती है। इस रचनात्मक क्षमता का मतलब है इस चीज को उसके मूल आधार पर बेहतर बनाना, उसका विकास करना, उसके प्रभाव का दायरा बढ़ाना या उसे किसी विशेष चीज की नई पीढ़ी में बदल देना—इसे नवाचार क्षमता कहते हैं। विशिष्ट रूप से इसका मतलब है कि किसी निश्चित चीज के वस्तुपरक नियमों को सटीक रूप से गहराई से समझने के आधार पर तुम उन्हें वास्तविक जीवन में लागू कर सकते हो, उनके उपयोग का दायरा बढ़ा सकते हो और व्यापक बना सकते हो और इन मूलतत्वों और सिद्धांतों को जो चीजों के विकास के नियमों के अनुरूप हैं, ज्यादा लोगों की सेवा करने की अनुमति दे सकते हो ताकि ज्यादा लोगों को इससे लाभ और मदद मिले। एक बात यह है कि तुम इन मूलतत्वों और सिद्धांतों को बनाए रख रहे हो, लगातार उनके प्रभाव का दायरा और दर्शक बढ़ा रहे हो। इसके अलावा तुम उन्हें शाब्दिक प्रस्तुति से एक ऐसी मूर्त चीज में बदल रहे हो जिससे लोग ज्यादा व्यावहारिक तरीके से और एक कदम आगे जाकर वास्तविक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। नवाचार क्षमता होने का यही मतलब है। अगर कोई व्यक्ति अपने पारिवारिक परिवेश और विकास की पृष्ठभूमि और अपने द्वारा प्राप्त ज्ञान की नींव पर किसी चीज के मूलतत्वों, सिद्धांतों और विकास के नियमों को सटीक रूप से गहराई से समझ सकता है, यह जान सकता है कि इन मूलतत्वों और सिद्धांतों को कैसे लागू करना है और इन मूलतत्वों और सिद्धांतों को सिद्धांत से मूर्त चीजों में कैसे बदलना है—वह शब्दों और धर्म-सिद्धांतों के स्तर पर नहीं रुक जाता है, बल्कि उन्हें वास्तविक जीवन में लागू करता है, उन्हें लोगों के जीवन का हिस्सा बनाता है और उन्हें ऐसे नतीजों में बदल देता है जो लोगों की सेवा करते हैं, लोगों को उनसे लाभ और मदद प्राप्त करने देते हैं और लोगों के जीवन को ज्यादा सुगम और सुविधाजनक बनाते हैं—अगर कोई यह स्तर प्राप्त कर पाता है तो वह नवाचार क्षमता वाला व्यक्ति है और अच्छी काबिलियत वाला व्यक्ति है। कहने का यह मतलब है कि अगर तुम चीजों के विकास के नियमों और सत्य सिद्धांतों के मूलतत्वों को समझने के आधार पर किसी चीज के संवर्धन, विकास को बरकरार रखने, विस्तार या नवीनीकरण को वास्तविक बना सकते हो—अगर तुममें यह क्षमता है या तुम इनमें से किसी एक को पूरा कर सकते हो और किसी सकारात्मक चीज के मूलतत्वों और नियमों या सत्य के सिद्धांतों को लोगों के बीच कार्यान्वित करने, मूर्त रूप दिए जाने और विस्तारित करने की अनुमति दे सकते हो—तो इससे यह साबित होता है कि तुम्हारी काबिलियत अच्छी है। भले ही तुम इसे और गहरे स्तर पर न ला सको, कम-से-कम अगर तुम इसे बनाए रख सकते हो, विस्तारित कर सकते हो और मूर्त रूप दे सकते हो और इसके सकारात्मक प्रभाव को बढ़ा सकते हो, तो इससे यह साबित होता है कि तुम नवाचार क्षमता वाले व्यक्ति हो। अगर तुममें यह क्षमता नहीं है और तुममें सिर्फ सकारात्मक चीजों के नियम समझने की क्षमता है, लेकिन यह समझने की क्षमता सिर्फ शाब्दिक और सैद्धांतिक समझ के स्तर पर ही रहती है और तुम उन्हें लोगों के साथ लागू नहीं कर पाते हो या उन्हें मूर्त रूप नहीं दे पाते हो और न ही तुम उनसे लोगों की सेवा करवा पाते हो और लोगों को लाभ दिला पाते हो, तो तुममें नवाचार क्षमता नहीं है। तुम्हें व्यावहारिक रूप से मूलतत्वों, सिद्धांतों, कानूनों और नियमों को परिचालित करने और लागू करने में समर्थ होना चाहिए—तभी यह कहा जा सकता है कि तुममें नवाचार क्षमता है। जिन लोगों के पास यह क्षमता होती है सिर्फ वही अच्छी काबिलियत वाले लोग होते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ अगुआ और कार्यकर्ता या पर्यवेक्षक परमेश्वर के घर के सिद्धांतों और प्रावधानों को समझ लेते ही फौरन उन्हें कार्यान्वित कर सकते हैं। वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों के साथ कार्य की हर मद के सत्य सिद्धांतों को कार्यान्वित करते हैं, ज्यादा लोगों को सत्य समझने में मदद करते हैं और ऐसा करते हैं ताकि कलीसिया का कार्य व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़े—यानी ताकि सिद्धांतों के दायरे में सकारात्मक रूप से इसका चक्रीय परिचालन हो, किसी विचलन के बिना लगातार विकसित होता रहे और आगे बढ़ता रहे। लोग इससे क्या नतीजा देखते हैं? इस कार्य के दायरे में हर कोई वही करता है जो उसे करना चाहिए, हर कोई सिद्धांतों को समझता है और सिद्धांतों के अनुसार कार्य करता है, कार्य में कोई विचलन नहीं होते हैं और यह कार्य लगातार नए नतीजे या नई रचनाएँ प्रस्तुत करता रहता है। अगर प्रक्रिया में विशेष परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाएँ, तो भी पर्यवेक्षकों को यह पता होगा कि उन्हें कार्य के मूलतत्वों, प्रावधानों और सिद्धांतों के अनुसार लचीले ढंग से कैसे सँभालना है। उनकी अगुआई में यह कार्य व्यवस्थित तरीके से लगातार आगे बढ़ता रहता है और मूल रूप से रुकता नहीं है। यानी, चाहे कोई भी परिस्थिति उत्पन्न हो जाए, चाहे कोई भी व्यक्ति बाधा डालने या भ्रांति फैलाने आ जाए, इससे कार्य की व्यवस्थित प्रगति प्रभावित नहीं होगी; कार्य लगातार आगे बढ़ता रहता है। क्या यह कहा जा सकता है कि इस कार्य के मूलभूत तत्व और इस लिहाज से सत्य सिद्धांत लगातार बनाए रखे जा रहे हैं? (हाँ।) इस कार्य के मूलतत्वों और सिद्धांतों के कार्यान्वयन, इसके विकास को बनाए रखने और तरक्की के जरिये यह कार्य बाधित नहीं हुआ है; इसे लगातार व्यवस्थित तरीके से कार्यान्वित किया जाता और इसके विकास को बनाए रखा जाता है और साथ ही, विभिन्न अवधियों में अच्छे कार्य नतीजे निकलकर आते हैं। इन कार्य नतीजों का प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है और इनसे ज्यादा से ज्यादा लोगों को लाभ पहुँच रहा है। जिन लोगों को लाभ पहुँचता है, दरअसल उन्हें कार्य-व्यवस्थाओं के विभिन्न सिद्धांतों, मूलतत्वों और यहाँ तक कि उन कड़े प्रावधानों से भी लाभ पहुँचता है जिन्हें ये पर्यवेक्षक समझ सकते हैं और स्वीकार सकते हैं। नवाचार क्षमता होने का यही मतलब है। अच्छी काबिलियत वाला व्यक्ति जिन कार्य सिद्धांतों और सत्य सिद्धांतों को समझता है और स्वीकारता है वह उन्हें उस कार्य में लगातार कार्यान्वित कर सकता है जिसके लिए वह जिम्मेदार है और उन्हें सभी के साथ कार्यान्वित कर सकता है जिससे कार्य व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ने में सक्षम होता है। साथ ही, कार्य नतीजे समय-समय पर या अनियमित रूप से उत्पन्न किए जाएँगे; अविश्वासी लोग इसे “कार्यों का उत्पादन करना” कहते हैं—यानी, कार्य नतीजे लगातार दिखाई देंगे और इन कार्य नतीजों के दिखाई देने से बाद में ज्यादा प्रभाव आएगा और ये ज्यादा लोगों तक पहुँचेंगे। जिन लोगों के पास यह क्षमता है, वे अंत में कार्य नतीजों को लगातार बढ़ा सकते हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को लाभ पहुँचे। ऐसे लोग अच्छी काबिलियत वाले लोग होते हैं। अपनी नवाचार क्षमता से अपनी काबिलियत का मूल्यांकन करने के लिए यह देखना जरूरी है कि कार्य सिद्धांत, कार्य प्रावधान और सत्य सिद्धांत समझ लेने के बाद उन्हें कार्यान्वित करने, विकसित करने और विस्तार करने की तुम्हारी क्षमता कैसी है; यानी, इस कार्य के विकास को बनाए रखने की तुम्हारी क्षमता कैसी है। दूसरा, यह देखना जरूरी है कि तुम्हारे द्वारा किए गए कार्य से कितने लोगों तक पहुँचा जाता है, जिन तक पहुँचा जाता है उनका दायरा कितना बड़ा है, प्रभाव की मात्रा कितनी बड़ी है और तुम्हारे कार्य की कुशलता और नतीजे कैसे हैं। अगर तुम्हारी कार्य कुशलता उच्च है, तुम्हारे कार्य नतीजे अच्छे हैं और जिन लोगों तक पहुँचा जाता है उनका दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है, तो इसका मतलब है कि तुम्हारी काबिलियत अच्छी है। अगर पहुँचे गए लोगों की संख्या कम है, कार्य कुशलता निम्न है, नतीजे खराब हैं और लगातार नए सिरे से कार्य किया जा रहा है, अड़चनें आ रही हैं और खामियाँ दूर की जा रही हैं, तो इसका मतलब है कि तुम्हारी काबिलियत औसत है। अगर कोई व्यक्ति कार्य सिद्धांतों, कार्य-व्यवस्थाओं और दूसरे पहलुओं को काफी अच्छी तरह से और जल्दी समझ लेता है, लेकिन कार्यान्वयन में उसकी प्रगति बहुत धीमी है और उसकी कुशलता बहुत निम्न है—सामान्य हालातों में नतीजे एक महीने में उत्पन्न किए जा सकते हैं, लेकिन यहाँ उन्हें उत्पन्न करने में तीन या यहाँ तक कि छह महीने भी लग रहे हैं और उत्पन्न किए गए नतीजे अब भी बहुत औसत हैं, पहुँचे गए लोगों की संख्या कम है और लोगों को होने वाला लाभ महत्वपूर्ण नहीं है—ऐसा व्यक्ति औसत काबिलियत वाला होता है।

कुछ लोग कुछ सिद्धांतों या मूलतत्वों को समझ लेने के बाद उस समय उनका सिर्फ शाब्दिक अर्थ ही ग्रहण करते हैं और इसे अपने कार्य में उन लोगों, घटनाओं या चीजों से जोड़ नहीं पाते हैं जिनमें ये सिद्धांत या मूलभूत तत्व शामिल होते हैं। वे सिद्धांतों और मूलतत्वों को सिर्फ विनियमों या धर्म-सिद्धांतों के रूप में सुनते हैं और उन्हें सुनने के बाद वे अपने दिलों में कोई योजना नहीं बनाते हैं और वे नहीं जानते हैं कि उन्हें कैसे कार्यान्वित करना है या कार्य-व्यवस्थाओं और जिन मूलतत्वों या सिद्धांतों को वे समझते हैं उन्हें वास्तविक जीवन में कैसे लागू करना है। वे मूल रूप से वास्तविक जीवन और इन मूलतत्वों या सिद्धांतों के बीच कोई संबंध नहीं बना पाते हैं। जब वास्तविक जीवन या कार्य की बात आती है, तो वे सिद्धांतों, मूलतत्वों और चीजों के विकास के नियमों को एक तरफ रख देते हैं, उन्हें लागू करने में असमर्थ होते हैं और बस वही करते हैं जो वे करना चाहते हैं। चलो अभी के लिए हम इस बारे में बात न करें कि उनकी मानवता अच्छी है या बुरी या उनका चरित्र कैसा है या क्या वे किसी चीज को जानबूझकर नहीं करते हैं या क्या वे किसी चीज को नहीं करना चाहते हैं—बस काबिलियत के लिहाज से ऐसे लोगों की काबिलियत खराब होती है। चाहे वे कहीं भी जाएँ, वे बहुत सारे धर्म-सिद्धांत बोल सकते हैं, कुछ मूलतत्वों के बारे में बात कर सकते हैं और दूसरों के साथ चीजों के कुछ तथाकथित विकास के नियमों पर चर्चा कर सकते हैं। ऐसा लगता है कि उनके विचार का स्तर काफी उच्च है और उनमें समझने की क्षमता है और उन्हें देखकर लगता है कि उनमें कुछ काबिलियत है। लेकिन जब उन्हें कार्य की कोई मद सौंपी जाती है तो एक-दो महीने बिना किसी नतीजे के गुजर जाते हैं और उनसे कोई नई जानकारी सुनने को नहीं मिलती है। अपना संकल्प व्यक्त करते समय वे बहुत अच्छी तरह से बोले, लेकिन जब वास्तव में इसे करने की बात आती है तो वे नहीं जानते हैं कि क्या करना है। “ऊपरवाले ने सिद्धांत बहुत स्पष्ट रूप से समझाए, तो अब मुझे क्या करना चाहिए? मुझे किसे पर्यवेक्षक के रूप में और किसे उपदेशक के रूप में नियुक्त करना चाहिए और किसे बाहरी मामले सँभालने चाहिए? मुझे तो पता ही नहीं कि क्या करना है! लेकिन मैंने साहसिक दावे किए और अपना संकल्प व्यक्त किया, इसलिए मुझे यह करना ही पड़ेगा!” वे इतने बेचैन होते हैं कि उनके अंदर गर्मी पैदा हो जाती है और उनके मुँह में छाले पड़ जाते हैं, वे खा या सो नहीं पाते हैं जिससे वे अस्त-व्यस्त और अभिभूत हो जाते हैं, फिर भी उन्हें नहीं पता होता है कि क्या करना है। ये खराब काबिलियत वाले लोगों की अभिव्यक्तियाँ हैं। इस बात की परवाह मत करो कि जब उनके लिए कार्य की व्यवस्था की जाती है तो वे कैसे गंभीर सौगंध खाते हैं और अपना संकल्प व्यक्त करते हैं, ऐसी भावना से साहसिक और शानदार शब्द बोलते हैं—तुम्हें यह देखना होगा कि क्या वे कार्य कर सकते हैं, क्या उनके पास चरण और योजनाएँ हैं और क्या वे समझते हैं कि कार्य-व्यवस्थाओं को कैसे कार्यान्वित करना है और सिद्धांतों के अनुसार कैसे कार्य करना है। अगर वे इसे नहीं समझते हैं या नहीं कर पाते हैं तो इसका मतलब है कि उनमें खराब काबिलियत है। अगर वे सिर्फ धर्म-सिद्धांत समझते हैं लेकिन सिद्धांतों को लागू नहीं कर पाते हैं और बस आँख मूँदकर और बेतहाशा कार्य करते हैं तो यह भी खराब काबिलियत दर्शाता है। जब तक तुम सिद्धांतों, मूलतत्वों या चीजों के विकास के नियमों को प्रभावी रूप से और वास्तविक जीवन में कार्यान्वित नहीं कर पाते हो, तब तक चाहे तुम बेचैन और घबराए हुए हो या बेतहाशा गलत कर्म करते हो, ये खराब काबिलियत की अभिव्यक्तियाँ हैं। क्या ये शब्द सटीक हैं? (हाँ।) कुछ लोग आँख मूँदकर कार्य करते हैं, जबकि दूसरे लोग यह नहीं जानते हैं कि इसे कैसे करना है और वे ऐसा करने की हिम्मत नहीं करते हैं—उन्हें तो यह भी मालूम नहीं होता है कि कहाँ से शुरू करना है। खराब काबिलियत वाले लोगों की नवाचार क्षमता के लिहाज से उनकी विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ ये हैं कि उन्हें नहीं पता कि मूलतत्वों और सिद्धांतों को विशिष्ट, वास्तविक कार्य में कैसे लागू करना है; वे सिर्फ शब्दों को तोते की तरह रटने, धर्म-सिद्धांतों को सीखने और विनियमों को याद करने में समर्थ होते हैं। सिर्फ धर्म-सिद्धांतों और विनियमों को याद करना बेकार है और इससे यह प्रकट नहीं होता है कि तुममें नवाचार क्षमता है। तुममें नवाचार क्षमता है या नहीं, यह इस बात से जाहिर होती है कि क्या तुम इन मूलतत्वों, सिद्धांतों और विनियमों को वास्तविक जीवन में लागू कर पाते हो, क्या इन मूलतत्वों और सिद्धांतों से संबंधित कार्य को अच्छी तरह से कर पाते हो ताकि ये मूलभूत तत्व और सिद्धांत शब्द और धर्म-सिद्धांत, विनियम और सूत्र ही न रह जाएँ, बल्कि लोगों के जीवन में कार्यान्वित किए जाएँ और लोगों पर लागू किए जाएँ, जिससे लोग उनका उपयोग कर सकें और उनसे लाभ और सहायता प्राप्त कर सकें, वे जीवन में अभ्यास का एक मार्ग बनें या जीने के लिए एक मार्गदर्शक, दिशा और लक्ष्य बनें। अगर किसी व्यक्ति में यह नवाचार क्षमता नहीं होती है और वह सिर्फ शब्दों और धर्म-सिद्धांतों को बघारना और नारे लगाना जानता है और अपना कर्तव्य करने का समय आने पर इन सिद्धांतों और मूलतत्वों को उपयोग में लाने में असमर्थ होता है तो ऐसे अगुआ या पर्यवेक्षक का अनुसरण करने वाले लोग सत्य के इस पहलू में अभ्यास के सिद्धांत प्राप्त नहीं करेंगे। ऐसे अगुआ या पर्यवेक्षक खराब काबिलियत वाले, कार्य करने में असमर्थ लोग होते हैं और जैसे ही उनकी पहचान हो जाती है, उनकी रिपोर्ट कर देनी चाहिए और उन्हें हटा देना चाहिए। यह मूल्यांकन करने के लिए कि क्या कोई व्यक्ति कार्य की किसी मद की जिम्मेदारी उठा सकता है, तुम्हें सबसे पहले यह देखना चाहिए कि क्या वह कार्य-व्यवस्थाएँ पढ़ने और सत्य सिद्धांत समझने के बाद उन्हें व्यवस्थित और कार्यान्वित कर सकता है और कार्य शुरू कर सकता है। चाहे कलीसिया में कितने भी लोग हों, अगर वे कलीसिया के कार्य की सभी मदें शुरू करते हैं और चाहे वे कितने भी लोगों के कार्य के लिए जिम्मेदार हों—चाहे पचास लोगों के हों या सौ लोगों के—वे कार्य को फलता-फूलता बना सकते हैं, यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि हर किसी के पास अपनी जगह हो और वह सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर सके और अपना कर्तव्य कर सके, तो ऐसे व्यक्ति को अगुआ या पर्यवेक्षक के रूप में चुनने पर विचार किया जा सकता है। यकीनन तुम्हें यह भी देखना चाहिए कि उसका चरित्र कैसा है, क्या वह सही व्यक्ति है और क्या वह सत्य का अनुसरण करने वाला व्यक्ति है—ये चीजें पता होनी जरूरी हैं! अगुआ या कार्यकर्ता में कम-से-कम इन पहलुओं में काबिलियत और आध्यात्मिक कद होना ही चाहिए ताकि वह परमेश्वर के चुने हुए लोगों को सत्य वास्तविकता में ले जा सके और ताकि हर कोई कार्य-व्यवस्थाओं या सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर सके और अपना कर्तव्य कर सके—इस तरह से परमेश्वर के चुने हुए लोग उससे लाभ प्राप्त कर सकते हैं। अगर उसमें यह क्षमता नहीं है, तो उसे नहीं चुना जा सकता। अगर तुम ऐसा व्यक्ति चुनते हो तो हालाँकि हर रोज बिना कोई काम किए उसके पीछे-पीछे इधर-उधर घूमने से तुम्हारे देह को आराम मिल सकता है, लेकिन क्या तुम अपनी आत्मा में तृप्त महसूस करोगे? अगर तुम हर रोज कुछ घंटे सभाओं में बिताते हो और उसे धर्म-सिद्धांतों का उपदेश देते हुए सुनते हो, लेकिन कोई वास्तविक कार्य नहीं करते तो क्या यह तुम्हारा कर्तव्य करना है? (नहीं।) वह हर रोज तुम्हें धर्म-सिद्धांतों का उपदेश देता है और हालाँकि हो सकता है कि इससे तुम्हारे कान समृद्ध होते हों, लेकिन तुम अपना कर्तव्य नहीं कर रहे हो और उसके पीछे-पीछे चलते हुए सिर्फ व्यर्थ बातों में समय बर्बाद कर रहे हो। ऐसे में तुम उसके द्वारा गुमराह और बाधित किए गए हो। अगर तुम उसे वे शुष्क शब्द और धर्म-सिद्धांत बोलते हुए सुनते रहते हो, अंत में अपना कर्तव्य नहीं करते हो या निष्ठा नहीं दिखाते हो, तुम्हारे पास सत्य में कोई वास्तविक अनुभव नहीं होता है, परमेश्वर ने तुम्हें जो सौंपा है उसमें तुम निष्ठा नहीं देते हो और कार्य आगे नहीं बढ़ाते हो या कोई नतीजा प्राप्त नहीं करते हो—जिससे जब परमेश्वर लोगों से नतीजे माँगता है तो तुम्हारे पास पेश करने के लिए कुछ नहीं होता है—तो क्या तुम्हें नुकसान नहीं हुआ होगा? इसलिए अगर इससे पहले तुम सोचते थे कि ऐसे लोग अगुआ बनने के लिए उम्मीदवार हैं, तो अब जल्दी से अपना दृष्टिकोण बदल डालो और ऐसे लोगों को उम्मीदवारों की अपनी सूची से हटा दो। उन्हें अगुआ के रूप में नहीं चुना जाना चाहिए। खराब काबिलियत और बिना नवाचार क्षमता वाले लोग किस मामले में पीछे रह जाते हैं? वे इस मामले में पीछे रह जाते हैं कि वे सिर्फ आरामकुर्सी पर बैठे जनरलों की तरह कार्य करना जानते हैं जबकि उन्हें यह कभी पता नहीं होता है कि अपने विचार वास्तविक जीवन के कार्य में कैसे लागू करने हैं और इस कारण से वे वास्तविक कार्य नहीं कर सकते हैं। अगर ऐसे लोग अगुआ बन जाएँ तो क्या नतीजे होंगे? वे सिर्फ कार्य पूरी तरह से बिगाड़ देंगे। अगर वे मुख्यभूमि चीन में कलीसियाई अगुआ के रूप में सेवा करें तो वे पूरी कलीसिया को बरबादी की तरफ ले जाएँगे। न सिर्फ वे खुद सत्य प्राप्त करने में विफल होंगे बल्कि उन्होंने जिन लोगों की अगुआई की उनके जीवन को भी नुकसान उठाना पड़ेगा। अगर तुम ऐसे लोगों की तुरंत पहचान कर सको और उन्हें हटा सको, तो कुछ आपदाएँ रोकी जा सकेंगी और कलीसियाई कार्य को नुकसान नहीं उठाना पड़ेगा। लेकिन अगर तुम ऐसे लोगों के अधीन अनुयायी बने रहे और तुमने उनकी अगुआई स्वीकार ली, तो तुम्हारे उद्धार पाने की उम्मीद उनके कारण बरबाद हो सकती है और तब तुम्हारे उद्धार का अवसर चला जाएगा। इसलिए एक अगुआ या कार्यकर्ता या पर्यवेक्षक के लिए नवाचार क्षमता एक महत्वपूर्ण क्षमता है। अगर तुममें कार्य करने की बुनियादी काबिलियत और क्षमता नहीं है तो तुम्हें जरूर बिल्कुल सतर्क रहना चाहिए और जोश में आकर बस अँधाधुँध आगे नहीं बढ़ना चाहिए और हमेशा अलग से दिखाई देने की चाह नहीं रखनी चाहिए और हमेशा अगुआ या पर्यवेक्षक बनने की चाह नहीं रखनी चाहिए। ऐसा करने से न सिर्फ तुम अपने लिए अड़चन डालते हो, बल्कि दूसरों के उद्धार प्राप्त करने में भी अड़चन डालते हो। अगर तुम सिर्फ अपने लिए अड़चन डालते हो तो तुम बस अपनी मौत का कारण बनते हो, लेकिन अगर तुम भाई-बहनों के लिए अड़चन डालते हो तो क्या तुम कई लोगों को नुकसान नहीं पहुँचा रहे हो? हो सकता है कि तुम्हें अपनी जान की परवाह न हो, लेकिन दूसरों को तो अपनी जान की परवाह होती है। इसके अलावा, अपने दैनिक जीवन या आर्थिक सफलता में अड़चन डालना कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन कलीसिया के कार्य में अड़चन डालना कोई छोटी बात नहीं है। क्या तुम ऐसी जिम्मेदारी उठा सकते हो? अगर तुम सही मायने में जमीर वाले व्यक्ति हो और यह महसूस करते हो कि इस मामले में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी शामिल है, कि कलीसिया के कार्य में अड़चन डालना कोई ऐसी चीज नहीं है जिसके लिए तुम जवाबदेह हो सकते हो तो तुम्हें अगुआई के लिए दिखावा और होड़ करने के किसी भी हथकंडे का सहारा बिल्कुल नहीं लेना चाहिए। अगर तुममें काबिलियत और आध्यात्मिक कद नहीं है तो हमेशा अलग दिखाई देने का प्रयास मत करो। अधिकार की अपनी लालसा को संतुष्ट करने मात्र के लिए कलीसिया के कार्य में अड़चन मत डालो या परमेश्वर के चुने हुए लोगों के सत्य में प्रवेश करने और एक अच्छा गंतव्य प्राप्त करने में अड़चन मत डालो—यह अधर्म है! तुममें कुछ आत्म-जागरूकता होनी चाहिए। तुम जो करने में सक्षम हो, वही करो और हमेशा अगुआ बनने की आकांक्षा मत रखो। अगुआ बनने के अलावा भी ऐसे बहुत से दूसरे कर्तव्य हैं जो तुम कर सकते हो। अगुआ होना तुम्हारा विशिष्ट अधिकार नहीं है, न ही यह तुम्हारा लक्ष्य होना चाहिए। अगर तुममें अगुआ बनने की काबिलियत और आध्यात्मिक कद है और तुममें बोझ की भावना भी है तो बेहतर यह है कि तुम खुद को दूसरों को चुनने दो। इस अभ्यास से कलीसिया के कार्य और इसमें शामिल सभी लोगों को फायदा पहुँचता है। अगर तुममें अगुआ बनने की काबिलियत नहीं है तो तुम्हें कुछ दयालुता दिखानी चाहिए और दूसरों के भविष्यों के लिए कुछ जिम्मेदारी लेनी चाहिए। हमेशा अगुआ बनने की होड़ मत करो और दूसरों के लिए अड़चन मत डालो। खराब काबिलियत होने के बावजूद अगुआ बनने और कलीसिया के कार्य का प्रभारी बनने की चाह विवेक की कमी दर्शाता है। अगर तुममें काबिलियत और आध्यात्मिक कद की कमी है तो बस अपने कर्तव्य अच्छी तरह से निभाओ। सही मायने में अपने कर्तव्य पूरे करना दिखाता है कि तुम्हारे पास कुछ विवेक है। तुम अपनी क्षमता के अनुसार जो भी कार्य कर सकते हो, करो; महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ मत पालो। कलीसिया के कार्य के प्रति लापरवाह होते हुए सिर्फ अपनी व्यक्तिगत इच्छाएँ पूरी करने का प्रयास मत करो—इससे तुम्हें और कलीसिया दोनों को नुकसान पहुँचता है। नवाचार क्षमता के लिहाज से खराब काबिलियत वाले लोगों की यही अभिव्यक्ति होती है।

खराब काबिलियत वाले सभी लोगों में मूल रूप से नवाचार क्षमता नहीं होती है—फिर बिना काबिलियत वाले लोगों में तो यह क्षमता और भी कम होती है। ऐसे लोग जब चीजों के मूलभूत तत्व, विकास के नियम या सत्य सिद्धांत सुनते हैं, तो वे उन्हें बिल्कुल भी समझ नहीं पाते हैं। परमेश्वर के वचन पढ़ते समय भले ही वे देख सकते हों कि ये सत्य सिद्धांत हैं, लेकिन वे सिद्धांतों को उनके अनुप्रयोग के दायरे या उनसे जुड़े लोगों और मामलों से नहीं जोड़ पाते हैं। वे यह तक सोचते हैं, “सत्य पर यह संगति बहुत ही ब्योरेवार है और यह बहुत ज्यादा है। ये शब्द सुनकर मैं समझ सकता हूँ कि ये सिद्धांत हैं, लेकिन मैं यह नहीं जानता कि सिद्धांतों की परिभाषा क्या है या सिद्धांत किस दायरे को सीमांकित करते हैं।” अगर उन्हें सिद्धांतों की परिभाषा तक नहीं मालूम तो वे निश्चित रूप से नहीं जानते कि उन्हें कैसे कार्यान्वित करना है या उनका अभ्यास कैसे करना है। उदाहरण के लिए, जब ऐसा कुछ होता है जिसे सँभालने की जरूरत होती है तो दूसरे लोग उनसे कहते हैं : “तुम्हें सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करना चाहिए।” वे कहते हैं : “मुझे तो यह भी नहीं पता कि सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास कैसे करना है। मैं नहीं जानता कि यह मामला किस सिद्धांत से संबंधित है।” जब दूसरे उन्हें यह समझा देते हैं कि इस मामले को सँभालने में उन्हें किस सिद्धांत का अभ्यास करना चाहिए, उसके बाद भी उन्हें नहीं पता होता कि क्या करना है। ऐसे लोगों की काबिलियत बेहद खराब होती है; वे मानव भाषा तक नहीं समझ पाते हैं और इससे भी ज्यादा यह कि वे उपयोग के अयोग्य होते हैं। क्या यह नहीं दिखाता कि ऐसे लोग इतने अयोग्य होते हैं कि उनकी मदद नहीं की जा सकती? जो लोग असहाय रूप से अक्षम हैं उनके पास सामान्य मानवता की सोच और चीजें समझने की क्षमता नहीं होती है, फिर सोचने-विचारने के तर्क की बात ही छोड़ दो। इसलिए, जो लोग सत्य सिद्धांत या विभिन्न मूलभूत तत्व और नियम समझते हैं, उनके पास उन लोगों से बातचीत करने का कोई तरीका नहीं होता है जिनमें काबिलियत की कमी होती है; वे किसी सहमति पर नहीं पहुँच पाते हैं और यकीनन उनकी कोई साझा भाषा नहीं होती है। वे बातचीत क्यों नहीं कर सकते हैं? यहाँ मूलभूत समस्या यह है कि इन दो प्रकारों के लोगों की विभिन्न चीजों का संज्ञान होने, उन्हें पहचानने, उनके बारे में राय बनाने, उन्हें समझने और स्वीकारने की क्षमताएँ एक ही स्तर या एक ही पथ पर नहीं होती हैं—वे दो समानांतर रेखाओं की तरह होती हैं जो एक दूसरे को कभी भी नहीं काटेंगी। यह कुछ हद तक अमूर्त शब्दों में बोलना है। इसे ठोस रूप में कहा जाए तो इन दो प्रकारों के लोगों की काबिलियत में जमीन-आसमान का फर्क होता है और वह एक ही स्तर पर नहीं होती है। इसलिए, उनमें आकलन करने की क्षमता, चीजों को पहचानने की क्षमता या एक ही मामले को लेकर संज्ञानात्मक क्षमता कभी भी एक समान नहीं होगी। यानी, अच्छी काबिलियत या औसत काबिलियत वाले लोग जो पहचान सकते हैं, उसे बिना काबिलियत वाले लोग बिल्कुल भी नहीं पहचान पाते हैं—इससे भी अधिक वे इस मामले में मानक से नीचे रह जाते हैं और वे हमेशा पीछे रहेंगे, मानो उनमें वह प्रकार्य है ही नहीं। उदाहरण के लिए, जब मुर्गी बड़ी हो जाती है तो वह स्वाभाविक रूप से अंडे देती है। भले ही उसका उत्पादन कम हो, फिर भी वह अंडे देगी क्योंकि उसमें वह प्रकार्य है। लेकिन, मुर्गे को चाहे कितना भी अच्छा खिलाया जाए, वह अंडे नहीं दे सकता क्योंकि उसमें वह प्रकार्य नहीं है। मुर्गा कहता है : “हालाँकि मुझमें अंडे देने का प्रकार्य नहीं है, लेकिन मैं सुबह बाँग दे सकता हूँ!” चाहे तुम कितनी भी बार बाँग दो या तुम्हारी आवाज कितनी भी ऊँची क्यों न हो, इसका यह मतलब नहीं है कि तुम अंडे दे सकते हो। जबकि मुर्गी बाँग नहीं देती है लेकिन उसके पास अंडे देने का प्रकार्य है। मैं तुम लोगों को यह उदाहरण क्यों दे रहा हूँ? क्योंकि बिना काबिलियत वाले लोग इस तरह के विकृत, भ्रामक, बेतुके तर्क बोलेंगे—इसे बिल्कुल काबिलियत नहीं होना कहते हैं। इसलिए, जब अच्छी काबिलियत, औसत काबिलियत या यहाँ तक कि खराब काबिलियत वाले लोग उन लोगों से बातचीत और चर्चा करते हैं जिनमें कोई काबिलियत नहीं होती है, तो यह अजीब महसूस होता है। खराब काबिलियत वाले लोगों से तुम फिर भी कुछ सरल और आसानी से समझ आने वाले मामलों पर बातचीत कर सकते हो। लेकिन जिन लोगों में कोई काबिलियत नहीं होती है, उनके साथ कोई भी बातचीत नहीं कर सकता है क्योंकि उनमें समझने की कोई क्षमता नहीं होती है और किसी चीज के बारे में कोई विचार या दृष्टिकोण नहीं होते हैं। यह बिना काबिलियत वाले लोगों का वर्णन या स्पष्टीकरण है। जब तुम उन्हें किसी चीज के बारे में बताते हो तो भले ही तुम इसे पूरी तरह से और स्पष्ट रूप से समझाते हो और हो सकता है कि वे कहते हों कि वे समझते हैं, फिर भी जब वही चीज दोबारा होती है तो वे अब भी नहीं समझते हैं और दोबारा विकृत, भ्रामक तर्क देते हैं। मुझे बताओ, क्या ऐसे लोग सत्य समझ सकते हैं? (नहीं।) उनमें चीजें पहचानने या उनका संज्ञान होने की कोई क्षमता नहीं होती है—वे सत्य कैसे समझ सकते हैं? यह कहना सिर्फ बकवास ही होगा कि वे सत्य समझ सकते हैं। बिना काबिलियत वाले लोगों में नवाचार क्षमता की कमी होती है, इसलिए इस संबंध में उनकी अभिव्यक्तियाँ ऐसी होती हैं। क्योंकि वे कोई मूलभूत तत्व या सिद्धांत नहीं समझते हैं, इसलिए वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें उनकी कोई योजना नहीं होती है। उनके मन में कोई योजना या चरण नहीं होते हैं और इससे भी बड़ी बात यह कि वे कोई मूलभूत तत्व या सिद्धांत कार्यान्वित नहीं कर सकते हैं। वे जो भी करते हैं वह पूरा गड़बड़ होता है, पूरी अव्यवस्था होती है। ऐसे लोग सिर्फ शारीरिक श्रम कर सकते हैं और शारीरिक कार्य कर सकते हैं। वे मुश्किल से एक आसान, एकल काम कर सकते हैं; आखिर वे साधारण लोग हैं, जो एक ही काम में लग सकते हैं, लेकिन जब परिस्थिति कार्य की किसी मद को हाथ में लेने के स्तर तक बढ़ जाती है, तो वे अब इसके लिए सक्षम नहीं रह जाते हैं। ऐसे लोग कोई भी कीमती या तकनीकी रूप से विशिष्ट कौशल वाला कार्य करने में अक्षम होते हैं। वे जैसे-तैसे सिर्फ कुछ छोटे-मोटे काम ही सँभाल सकते हैं, जैसे कि शारीरिक श्रम, खेती का काम या पशुपालन और तब भी उनकी देखरेख और सहायता करने के लिए उन्हें अपने आसपास एक पर्यवेक्षक की जरूरत होती है। कभी-कभी जब उनका मिजाज खराब होता है तो किसी को उनका मार्गदर्शन करने की जरूरत पड़ती है; और कभी-कभी जब वे विकृतियों में फँस जाते हैं या नकारात्मक हो जाते हैं तो किसी को उन्हें उनके सोचने के तरीकों पर सलाह देनी पड़ती है। यहाँ तक कि छोटे-मोटे कामों के लिए भी किसी को यह जाँचने की जरूरत होती है कि वे क्या करते हैं; नहीं तो समस्याएँ और गलतियाँ पैदा हो जाएँगी और कार्य फिर से करना पड़ेगा। अगर वे सामग्री बरबाद नहीं कर रहे होते हैं, तो वे ऊर्जा या पानी, बिजली और गैस बर्बाद कर रहे होते हैं। पश्चिमी देशों में लगातार दूसरे लोगों द्वारा उनकी रिपोर्ट की जाती है और पुलिस द्वारा उन पर जुर्माना लगाया जाता है। यहाँ तक कि वे बिना किसी की निगरानी के छोटे-मोटे काम भी उचित रूप से नहीं कर सकते हैं—वे बस इतने ही मुश्किलें पैदा करने वाले और दयनीय होते हैं। ये बिना काबिलियत वाले लोगों की अभिव्यक्तियाँ हैं। क्या ऐसे लोग बस बेकार और बेवकूफ नहीं हैं? क्या अब भी उनका मनुष्यों के रूप में उपयोग किया जा सकता है? दरअसल परमेश्वर के घर में ऐसे लोग सिर्फ थोड़ा-सा शारीरिक श्रम कर सकते हैं। जब कलीसियाई कार्य की बात आती है, तो वे इसे नहीं कर सकते हैं; वे कुछ भी करने में अक्षम हैं। यहाँ तक कि जिन कामों के लिए शारीरिक श्रम की जरूरत होती है, उन्हें भी वे स्वतंत्र रूप से पूरा नहीं कर पाते हैं और वे जो भी करते हैं उसके लिए अब भी उन्हें निर्देश देने, निगरानी करने और जाँच करने के लिए दूसरों की जरूरत होती है। लेकिन जब वे ऐसे काम करते हैं जिनके लिए शारीरिक श्रम की जरूरत होती है, तो उन्हें अब भी लगता है कि यह उनकी प्रतिभाओं से कमतर है, वे अधिक योग्य हैं, और वे उद्दंड हो जाते हैं, यहाँ तक कि शिकायत भी करते हैं : “उन लोगों को देखो जो तकनीकी कंप्यूटर कार्य कर रहे हैं, लेख लिख रहे हैं, गा रहे हैं और नृत्य कर रहे हैं या अभिनय कर रहे हैं—वे कितने दिलकश हैं! लेकिन मैं सिर्फ मेजबानी और खाना पकाने का काम सँभाल सकती हूँ, सारा दिन चिकनाई और धुएँ से निपटती रहती हूँ। कुछ वर्षों में मैं एक थकी-हारी महिला में बदल जाऊँगी। देखो मैं कितनी दयनीय हूँ!” वे यह कार्य करते हुए काफी दयनीय महसूस करते हैं, लेकिन वे कभी यह सोचने के लिए रुकते नहीं हैं कि वे सिर्फ इसी तरह का कार्य ही क्यों कर सकते हैं। वे यह नहीं मापते हैं कि क्या वे सही मायने में दूसरे कार्य सँभालने में सक्षम हैं। क्योंकि उनकी काबिलियत खराब है इसलिए वे कुछ ऐसे काम करते समय हमेशा परेशान हो जाते हैं जिनमें शारीरिक श्रम की जरूरत होती है। अगर सही मायने में उनकी काबिलियत अच्छी होती तो वे परेशान नहीं होते। उनकी काबिलियत पहले से ही इतनी खराब है कि वे सिर्फ शारीरिक काम ही कर सकते हैं, फिर भी उन्हें लगता है कि यह उनकी प्रतिभाओं से कमतर है। क्या वे बेवकूफ नहीं हैं? ऐसे लोग सही मायने में बेवकूफ होते हैं! इस तरह के लोग ऐसे काम भी उचित रूप से नहीं कर पाते हैं जिनके लिए शारीरिक श्रम की जरूरत होती है। खाना पकाते समय वे या तो बहुत ही ज्यादा या बहुत ही कम खाना पकाते हैं और चाहे वे कितनी भी देर तक खाना क्यों न पकाएँ, फिर भी उन्हें यह नहीं पता होता कि ऐसा करते समय उन्हें किन नियमों का पालन करना चाहिए। फिर भी उन्हें अब भी लगता है कि ऐसे काम उनकी प्रतिभाओं से कमतर हैं, वे अधिक योग्य हैं और वे सोचते हैं कि उन्हें ऐसे काम नहीं करने चाहिए जिनमें शारीरिक श्रम की जरूरत होती है। वे मानते हैं कि उन्हें किसी कार्यालय में सचिव के रूप में कार्य करना चाहिए, परमेश्वर के घर में कार्य की किसी मद की जिम्मेदारी उठानी चाहिए या कम-से-कम एक कलीसियाई अगुआ के रूप में सेवा करनी चाहिए। क्या यह पूरी तरह से सूझ-बूझ की कमी नहीं है? मुझे बताओ, तुम किस कार्य के लिए सक्षम हो? अगर तुम किसी भी तरह के कार्य के लिए सक्षम नहीं हो और तुम्हें ऐसे काम दिए जाते हैं जिन्हें करने के लिए शारीरिक श्रम की जरूरत होती है जबकि परमेश्वर का घर अब भी तुम्हारा भरण-पोषण करता है, तो क्या यह तुम्हारा उन्नयन नहीं है? और फिर भी तुम असंतुष्ट रहते हो। क्या तुम्हारी सूझ-बूझ बहुत ही ज्यादा कमजोर नहीं है? (हाँ।) क्या सूझ-बूझ और काबिलियत के बीच कोई संबंध है? (हाँ।) खुद को नहीं जानना, यह नहीं जानना कि अपनी काबिलियत किस स्तर पर है, हमेशा यह सोचना कि अपनी काबिलियत ऊँची है—क्या ये खराब काबिलियत की अभिव्यक्तियाँ नहीं हैं? (हाँ।) अच्छी काबिलियत वाले लोगों को यह पता होगा कि अपना मूल्यांकन कैसे करना है और मूल्यांकन करने के बाद वे अपनी काबिलियत का स्तर जान जाएँगे। एक बार जब वे यह तय कर लेंगे कि उनकी काबिलियत क्या है तो वे कलीसिया में अपनी जगह ढूँढ़ निकालने में समर्थ हो जाएँगे। वे जो भी करेंगे उसमें उन्हें सहजता महसूस होगी और वे अपने कर्तव्य को तर्कसंगत ढंग से करने में समर्थ होंगे। भले ही उन्हें ऐसे कार्य सौंपे जाएँ जिनमें शारीरिक श्रम की जरूरत पड़ती है, तो भी वे ऐसा करने में शांति और जायज महसूस करेंगे; वे अपने दिलों की गहराई से इसके प्रति समर्पण करेंगे और इससे सहमत होंगे, यह काम और यह जिम्मेदारी स्वीकार करेंगे। इसे तार्किकता होना कहते हैं। अगर कोई व्यक्ति अपना कर्तव्य करते समय कभी भी सहज नहीं रहता है, हमेशा दुखी रहता है और सोचता है कि उसे जो भी करने के लिए कहा जाता है वह चीज उसकी प्रतिभाओं से कमतर होती है, तो क्या उसमें सूझबूझ की कमी नहीं है? (हाँ।)

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