सत्य का अनुसरण कैसे करें (8) भाग एक
लोगों की काबिलियत का भेद पहचानने के लिए सिद्धांत
इन पिछले दिनों हमारी संगति इस विषय पर रही है कि विभिन्न पहलुओं में काबिलियत का भेद कैसे पहचाना जाए, है ना? (हाँ।) काबिलियत के विभिन्न पहलुओं और स्तरों की विशिष्ट अभिव्यक्तियों पर हमारी संगति के जरिये क्या तुम लोग यह निष्कर्ष निकाल सकते हो कि अच्छी काबिलियत क्या होती है, औसत काबिलियत क्या होती है, खराब काबिलियत क्या होती है और काबिलियत की पूरी कमी क्या होती है? हमने इस पहलू के बारे में काफी संगति की, इसलिए तुम लोगों को इस सामग्री का सारांश प्रस्तुत करने और फिर दैनिक जीवन में विशिष्ट अभिव्यक्तियों से इसका मेल करने में समर्थ होने की जरूरत है। इस तरीके से खुद का और दूसरों का तुम्हारा मूल्यांकन अपेक्षाकृत ज्यादा सटीक होगा। अगर तुम्हें यह नहीं पता कि सारांश कैसे प्रस्तुत करना है तो दैनिक जीवन में कुछ लोगों से सामना होने पर तुम उनका भेद नहीं पहचान पाओगे और तुम विभिन्न पहलुओं में अपनी खुद की अभिव्यक्तियों और प्रकाशनों का भी भेद नहीं पहचान पाओगे। क्या इसका मतलब यह नहीं होगा कि तुम्हारा सुनना बेकार गया? तुम्हें सारांश प्रस्तुत करने में निपुण होना पड़ेगा। सारांश प्रस्तुत करने का क्या मतलब है? इसका मतलब है इन सभी विभिन्न पहलुओं की विशिष्ट सामग्री में अलग-अलग प्रकार की चीजों का भेद पहचानने या उन्हें समझने के सिद्धांत ढूँढ़ निकालना। इस तरीके से सारांश प्रस्तुत करने का उद्देश्य हासिल किया जाता है। जब तुम्हें सिद्धांत मिल चुके होंगे, तो तुम लोगों और चीजों को देखने के लिए सत्य सिद्धांतों का उपयोग कर पाओगे और तुम दूसरों का भेद पहचानने और अपना भी भेद पहचानने में समर्थ होगे। इससे साबित होता है कि तुम सत्य समझते हो। जब तुम सत्य का एक पहलू समझते हो और उसे लागू कर पाते हो, तो तुम्हें इस पहलू में सत्य वास्तविकता में प्रवेश हासिल हो जाएगा। तो क्या हमें काबिलियत के विभिन्न पहलुओं की विशिष्ट सामग्री का सारांश पेश नहीं करना चाहिए? (हाँ।) हमें इसका सारांश प्रस्तुत करना होगा। सिर्फ इसी तरीके से तुम काबिलियत से संबंधित सत्य सिद्धांत स्पष्ट रूप से समझ सकते हो।
लोगों की काबिलियत का मूल्यांकन करने के लिए सत्य सिद्धांतों का उपयोग करना
I. अच्छी काबिलियत की अभिव्यक्तियाँ
अच्छी काबिलियत वाले लोगों का पूरा मूल्यांकन करने के लिए तुम्हें सिद्धांत जानने की जरूरत है, है ना? (सही कहा।) हमने इन विशिष्ट अभिव्यक्तियों का उपयोग करके बहुत-सी विशिष्ट अभिव्यक्तियों पर विस्तार से संगति की है ताकि यह मूल्यांकन कर सकें कि किसी व्यक्ति की काबिलियत कैसी है। तो अच्छी काबिलियत वाले लोगों की कुल मिलाकर क्या अभिव्यक्तियाँ हैं? उनके दिलों में आचरण करने और कार्य करने के लिए कुछ विशिष्ट सिद्धांत होते हैं। यहाँ तक कि जब वे सत्य नहीं समझते हैं या उन्होंने अभी तक सत्य नहीं सुना होता है, तब भी उनके पास लोगों और चीजों को देखने और साथ ही आचरण करने और कार्य करने के लिए कुछ सबसे मूलभूत सिद्धांत होते हैं। यानी अपने आत्म-आचरण के लिए उनकी कुछ सीमाएँ होती हैं। कुछ हद तक ये सीमाएँ सत्य सिद्धांतों के अपेक्षाकृत अनुरूप होती हैं या उनके करीब होती हैं और कम-से-कम मानवता के जमीर और विवेक के मानकों के करीब होती हैं। जब वे परमेश्वर के वचनों को खाकर और पीकर और परमेश्वर के वचनों की सिंचाई और प्रावधान स्वीकार कर कुछ सत्य समझने लगते हैं, उसके बाद भले ही उन्होंने कई मामलों या विशेष परिवेशों का अनुभव नहीं किया हो, फिर भी वे अपने दिलों में कुछ सत्य सिद्धांत समझ सकते हैं और उन पर पकड़ बना सकते हैं। फिर वे वास्तविक जीवन में विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों को सँभालने के लिए ये सिद्धांत लागू करने में समर्थ होते हैं। यकीनन जब वे विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों को सँभालते हैं, तब यह सिर्फ सरल, एकमुखी मुद्दे सँभालने के बारे में नहीं होता है। इसके बजाय जब उनका विभिन्न जटिल और आपस में जुड़े हुए लोगों, घटनाओं और चीजों से सामना होता है, तब वे उनसे पेश आने और उन्हें सँभालने के लिए परमेश्वर के वचन और सत्य सिद्धांत लागू कर सकते हैं। जब उन मामलों की बात आती है जिनमें सिद्धांत शामिल होते हैं, तब यह अच्छी काबिलियत वाले लोगों की एक अभिव्यक्ति है। क्योंकि उनकी काबिलियत अच्छी है, इसलिए वे परमेश्वर के वचनों के सिंचन और प्रावधान के जरिये विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों को देखने और सँभालने के लिए खुद परमेश्वर के वचनों में सिद्धांत ढूँढ़ सकते हैं। इस तरह की अच्छी काबिलियत वाले लोग स्वतंत्र रूप से कार्य का प्रभार ले सकते हैं, हर कार्य को स्वयं पूरा कर सकते हैं। यह अच्छी काबिलियत की एक अभिव्यक्ति है। मुख्य अभिव्यक्ति क्या है? (मुख्य अभिव्यक्ति यह है कि वे परमेश्वर के वचनों के सिंचन और प्रावधान के जरिये विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों को देखने और सँभालने के लिए खुद परमेश्वर के वचनों में सिद्धांत ढूँढ़ सकते हैं, समस्याएँ स्वयं हल करने में समर्थ हो सकते हैं और स्वतंत्र रूप से कार्य का प्रभार ले सकते हैं।) बिल्कुल—परमेश्वर के वचनों को खाकर और पीकर वे सत्य समझ सकते हैं और विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों को देखने और सँभालने के लिए सिद्धांत ढूँढ़ सकते हैं, अपने आप कार्य का बीड़ा उठा सकते हैं। अच्छी काबिलियत होने का सिर्फ यही मतलब है। इससे पहले हमने कहा कि कार्य का बीड़ा स्वयं उठाने में समर्थ होने के लिए विभिन्न क्षमताओं का होना जरूरी है। अब सत्य सिद्धांतों का उपयोग करके इसे मापने पर, यह अच्छी काबिलियत वाले लोगों की एक अभिव्यक्ति है।
II. औसत काबिलियत की अभिव्यक्तियाँ
औसत काबिलियत वाले लोगों की अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? वे निश्चित रूप से अच्छी काबिलियत वाले लोगों से कहीं बदतर हैं। लेकिन चाहे लोगों की काबिलियत अच्छी हो या औसत, परमेश्वर के वचनों का प्रावधान प्राप्त करने और सत्य समझने से पहले उनके पास आचरण करने के लिए सही सिद्धांत नहीं होंगे। आचरण के सिद्धांतों पर पकड़ प्राप्त करने का काम परमेश्वर के वचनों का प्रावधान प्राप्त करने और सत्य समझने लगने की नींव पर किया जाना चाहिए। सिर्फ वास्तविक अनुभवों के जरिये ही व्यक्ति धीरे-धीरे आचरण के सिद्धांत समझने लग सकता है। अगर यह कोई औसत काबिलियत वाला व्यक्ति है तो परमेश्वर के वचन पढ़ते समय वह सिर्फ परमेश्वर के वचनों में व्यक्त मूल अर्थ और अपेक्षित मानक ही समझ सकता है। वह इन चीजों को धर्म-सिद्धांत के लिहाज से समझता है, लेकिन परिस्थितियों से सामना होने पर वह अब भी सत्य सिद्धांत लागू करने में असमर्थ होता है। सिर्फ दूसरों के मार्गदर्शन और प्रावधान के जरिये या बहुत-सी चीजों का अनुभव करने के बाद ही वह कुछ मूलभूत सत्य सिद्धांत समझने लग सकता है। यहाँ “मूलभूत” का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि वह जो सिद्धांत समझता है और जिन पर पकड़ बनाता है, वे मुख्य रूप से एकमुखी और अपेक्षाकृत सरल सिद्धांत होते हैं और वे उसे साधारण समस्याएँ सँभालने और हल करने में सक्षम बनाते हैं, लेकिन जटिल परिस्थितियों या संदर्भों से सामना होने पर उसे यह नहीं पता होता कि सिद्धांतों के अनुसार कैसे कार्य करना है। उसे कुछ जटिल समस्याओं या अनेक पहलुओं वाले कामों से निपटने के लिए सत्य समझने वाले लोगों से मार्गदर्शन और मदद पर भरोसा करना पड़ता है। यही औसत काबिलियत वाले लोगों की अभिव्यक्तियाँ हैं। औसत काबिलियत वाले लोगों की अभिव्यक्तियों में क्या प्रमुख है? वे स्वतंत्र रूप से सत्य नहीं समझ पाते हैं या परमेश्वर के वचनों में अभ्यास के सिद्धांत नहीं ढूँढ़ पाते हैं। वे सटीकता से यह नहीं समझ पाते हैं कि सही मायने में परमेश्वर के अपेक्षित मानक क्या हैं। उन्हें एक ऐसे व्यक्ति की जरूरत पड़ती है जो उनके साथ संगति करे, उनका समर्थन करे और चीजों का पुनरीक्षण करने में मदद करे और उन्हें साफ-साफ बताए और याद दिलाए। सिर्फ इसी तरीके से वे जानते हैं : “यह एक सत्य सिद्धांत है। मुझे इसे याद रखना चाहिए। मुझे इसके अनुसार अभ्यास करना चाहिए। मुझे इस कार्य-व्यवस्था के अनुसार ही कार्य कार्यान्वित करना चाहिए।” यह उनकी समझ के लिहाज से है। दूसरी बात, कार्य करने के लिहाज से जब वे कोई ऐसा कार्य कर रहे होते हैं जिसके लिए उनके पास कोई अनुभव नहीं होता है, तो वे विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों को देखने या सँभालने के लिए सत्य सिद्धांतों को जल्दी से लागू नहीं कर पाते हैं। वे कुछ मूलभूत सत्य सिद्धांत समझने के आधार पर सिर्फ कोई एकमुखी कार्य ही सँभाल पाते हैं। अनेक सत्य सिद्धांतों से जुड़े जटिल कार्य से सामना होने पर उन्हें चीजों का पुनरीक्षण करने और समर्थन देने और उनका भरण-पोषण करने के लिए दूसरों की जरूरत होती है। यही औसत काबिलियत वाले लोगों की अभिव्यक्तियाँ हैं। व्यक्तिगत समझ के लिहाज से उन्हें अपने साथ संगति करने और चीजों का पुनरीक्षण करने में मदद करने के लिए दूसरों की जरूरत होती है। उन्हें बहुत सुनने की जरूरत होती है—सत्य का सिर्फ एक पहलू नहीं, बल्कि विभिन्न पहलू सुनने की जरूरत होती है और अंत में उन्हें किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत होती है जो उन्हें यह बताए कि सत्य के विभिन्न पहलुओं के मूल सिद्धांत क्या हैं ताकि वे उनमें से कुछ सिद्धांत अपने दिलों में समझ सकें। लेकिन जब वे जटिल परिस्थितियों का सामना करते हैं तो उन्हें फिर से यह नहीं पता होता कि कैसे समझना है और उन्हें फिर भी तलाश करने की जरूरत होती है। यह समझ के लिहाज से है। जहाँ तक कार्य में या वास्तविक जीवन में विभिन्न मामले सँभालने का प्रश्न है, समस्याएँ सँभालने की उनकी क्षमता केवल एकमुखी कार्य सँभालने के लिए सत्य सिद्धांतों का पालन करने के स्तर तक ही पहुँच पाती है। अनेक सत्य सिद्धांतों से जुड़े जटिल कार्य से सामना होने पर उन्हें यह कुछ हद तक मुश्किल लगता है और उन्हें तलाशने की जरूरत पड़ती है और किसी से चीजों का पुनरीक्षण करने के लिए कहना पड़ता है। वे खुद यह गारंटी नहीं दे पाते हैं कि वे कार्य अच्छी तरह से कर सकते हैं और यह तय नहीं कर पाते हैं कि क्या वे जो करते हैं वह सत्य सिद्धांतों के अनुरूप होता है। कभी-कभी उनके कार्य में विचलन होंगे। लेकिन ये विचलन सिर्फ विचलन ही हैं, विकृतियाँ नहीं हैं। अगर ये विकृतियाँ होतीं तो इससे खराब काबिलियत प्रकट होती। विचलनों और विकृतियों में अंतर है : विचलनों का मतलब है कि कार्य पूरी तरह से सत्य सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है, पर्याप्त रूप से नहीं किया गया है या इसमें पर्याप्त विचार नहीं है, लेकिन दिशा गलत नहीं है। बात सिर्फ इतनी है कि उनका कार्य पर्याप्त रूप से मानक-स्तर का नहीं होता है क्योंकि उनके पास अपर्याप्त कार्य अनुभव है या यूँ कहें कि सत्य की सतही समझ है और सत्य सिद्धांतों पर ऐसी पकड़ है जो पर्याप्त रूप से सटीक नहीं है। यह मानक-स्तर का होने के पास जा सकता है लेकिन फिर भी पूरी तरह से मानक-स्तर का होने के लिए इसमें सुधार की जरूरत होती है। ये औसत काबिलियत वाले लोगों की अभिव्यक्तियाँ हैं। इस तरह के व्यक्ति की मुख्य विशेषता क्या है? (वह यह है कि वह स्वतंत्र रूप से कार्य की कोई मद ठीक से नहीं कर सकता है; उसे कोई कार्य पूरा करने के लिए दूसरों की मदद और समर्थन की जरूरत होती है।) उसकी विशेषता यह है कि चाहे समझ के लिहाज से हो या अपना कर्तव्य करने के लिहाज से, वह अपेक्षाकृत हीन होता है। आमतौर पर वह स्वतंत्र रूप से कार्य की कोई मद ठीक से नहीं कर पाता है, उसे दूसरों से समर्थन, पुनरीक्षण और अनुबोधन की जरूरत होती है। इसलिए औसत काबिलियत वाले लोगों के पास जो मूलभूत विवेक होना चाहिए वह है चीजें करते समय ज्यादा तलाशना और ज्यादा प्रतीक्षा करना। जब वे किसी चीज की असलियत नहीं देख सकते हैं तो उन्हें फौरन और विनम्रता से तलाशना चाहिए—या तो आधार के रूप में कार्य करने के लिए परमेश्वर के वचनों में खुद सत्य सिद्धांत खोजने चाहिए या फिर ऊपर वालों से तलाशना चाहिए—और आँख मूँदकर या भ्रमित तरीके से कार्य नहीं करना चाहिए। कुछ समय कार्य करने के बाद अगर तुम कई चीजों के बारे में खुद को उलझन में पड़ा पाते हो तो फौरन उनका सारांश प्रस्तुत करो, उन्हें दर्ज करो और ऊपर वालों से तलाशो। इसका उद्देश्य है तुमसे ऊपर जो लोग हैं उनसे पुनरीक्षण करने और यह देखने के लिए कहना कि इस अवधि के दौरान तुमने जो कार्य किया है, उसमें कोई विचलन या कमी तो नहीं है। यह सोचकर बहुत ज्यादा आत्मतुष्ट मत हो कि तुम्हारे पास कार्य अनुभव है और अपने बारे में बहुत ज्यादा अच्छा महसूस मत करो। तुममें आत्म-जागरूकता होनी चाहिए। औसत काबिलियत की अभिव्यक्तियों पर पहले ही चर्चा की जा चुकी है, तो औसत काबिलियत वाले लोगों की विशेषताएँ क्या हैं? (वे स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर सकते हैं; उन्हें समर्थन, मदद और चीजों का पुनरीक्षण करने के लिए दूसरों की जरूरत होती है।) और परमेश्वर के वचनों को समझने के लिहाज से उनकी क्या विशेषताएँ हैं? (परमेश्वर के वचनों को समझने के लिहाज से वे सिर्फ कुछ मूलभूत सिद्धांत ही समझ सकते हैं लेकिन उन्हें कार्य में व्यावहारिक ढंग से लागू करने में असमर्थ होते हैं।) और कार्यक्षमता के लिहाज से उनकी क्या विशेषताएँ हैं? (कार्यक्षमता के लिहाज से औसत काबिलियत वाले लोग विभिन्न मुद्दों को देखने या सँभालने के लिए सत्य सिद्धांतों को जल्दी से लागू नहीं कर पाते हैं। इसके अतिरिक्त वे कार्य की सिर्फ एक ही मद को बनाए रख पाते हैं; जब कार्य की कई मदों की बात आती है तब वे सिद्धांतों पर पकड़ नहीं बना पाते हैं। वे कार्य की विभिन्न मदों को अच्छी तरह से पूरा करने के लिए उन्हें महत्व या जरूरत के आधार पर प्राथमिकता देने में असमर्थ होते हैं, फिर कार्य को उचित ढंग से व्यवस्थित करने की तो बात ही छोड़ दो। उनके पास कोई ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो चीजों का पुनरीक्षण करे, उन्हें दिशा बतलाए और लगातार उनकी मदद और उनका समर्थन करे।) सही कहा। औसत काबिलियत वाले लोग स्वतंत्र रूप से कोई एकमुखी कार्य कर सकते हैं या एक निश्चित स्तर का कार्य अनुभव होने के आधार पर कोई सरल कार्य सँभाल सकते हैं। लेकिन जटिल मुद्दों से, विशेष रूप से ऐसे कार्य से सामना होने पर जिसमें अनेक सत्य सिद्धांत शामिल हों, वे उलझन में पड़ जाते हैं और उन्हें पता नहीं होता कि अभ्यास कैसे करना है। एक पल वे सोचते हैं कि इसे इस तरीके से करना चाहिए और अगले ही पल सोचते हैं कि इसे उस तरीके से करना चाहिए, लेकिन उन्हें नहीं पता होता कि कौन-सा तरीका सत्य सिद्धांतों के अनुरूप है। वे उन नतीजों का मूल्यांकन करने में असमर्थ हैं जो कार्य पूरा किए जाने के बाद अंत में उत्पन्न हो सकते हैं। ऐसी परिस्थितियों में वे बिना किसी मार्ग के रह जाते हैं। औसत काबिलियत वाले लोग कार्य की एक ही मद के लिए योग्य हो सकते हैं, लेकिन कार्य की कई मदों या थोड़े ज्यादा जटिल कार्य से सामना होने पर वे उलझन में पड़ जाते हैं। उदाहरण के लिए, तुम लोगों में से कुछ अगुआओं और कार्यकर्ताओं को कार्य की एक मद सौंपे जाने पर वे उसे सँभाल सकते हैं, लेकिन अगर उन्हें कार्य की दो-तीन मदें सौंपी जाती हैं तो वे उनका प्रबंध नहीं कर सकते हैं। भले ही वे उन्हें अच्छी तरह से करना चाहते हों, लेकिन वे इसे हासिल नहीं कर सकते हैं। उनके कार्य में व्यस्त हो जाने पर, जैसे ही कोई व्यक्ति किसी भी तरह की कोई समस्या उठाता है, वे उलझन में पड़ जाते हैं और उन्हें नहीं पता होता कि इसे कैसे हल करना है। नतीजतन, कार्य की कोई भी मद अच्छी तरह से नहीं की जाती है। ये औसत काबिलियत वाले लोगों की अभिव्यक्तियाँ हैं। औसत काबिलियत वाले लोग एक साथ दो-तीन कार्य नहीं कर पाते हैं। खासतौर पर जटिल या विशेष परिस्थितियों का सामना करते समय, वे फौरन उलझन में पड़ जाते हैं और उन्हें नहीं पता होता कि क्या करना है। नतीजतन वे जो कार्य अच्छी तरह से कर सकते थे, वह अच्छी तरह से नहीं किया जाता है और कार्य की जिन मदों के लिए वे जिम्मेदार होते हैं उनमें परेशानी आ जाती है और देर हो जाती है। इसलिए औसत काबिलियत वाले लोग कार्य की दो-तीन मदों का बीड़ा नहीं उठा पाते हैं और वे कार्य की सिर्फ सरल, अलग-अलग मदों के लिए ही उपयुक्त होते हैं। कुछ अगुआ और कार्यकर्ता हमेशा कार्य करने को बहुत सरल समझते हैं। जब दूसरे लोग समस्याओं की तरफ ध्यान दिलाते हैं, तब वे हमेशा उदासीन रहते हैं और उन्हें समस्याओं की तरह नहीं देखते हैं, यहाँ तक कि वे यह भी सोचते हैं कि उन लोगों के दिमाग में कुछ गड़बड़ है और वे चीजों को बहुत ही ज्यादा जटिल बना रहे हैं। अंत में बड़ी समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं और वे उन्हें हल करने में असमर्थ होते हैं और सिर्फ उसके बाद ही वे ऊपर वालों को उनकी रिपोर्ट करते हैं। ऐसे अगुआओं और कार्यकर्ताओं के पास बहुत ही कम अनुभव होता है और उनमें अंतर्दृष्टि की कमी होती है। वे अपने कार्य में हमेशा यह मान लेते हैं कि सब कुछ सुचारू रूप से चलेगा, वे सिर्फ कुछ विनियमों का पालन करते हैं और हठपूर्वक एक ही मार्ग से चिपके रहते हैं। चाहे उत्पन्न होने वाली समस्याएँ कितनी भी गंभीर हों, वे उन्हें समझने में विफल होते हैं; इससे भी ज्यादा, वे यह समझने में विफल होते हैं कि अगर इन समस्याओं का समाधान नहीं किया गया तो समग्र कार्य में देरी हो जाएगी। ये औसत काबिलियत वाले लोगों की अभिव्यक्तियाँ हैं।
आमतौर पर अगर औसत काबिलियत वाले लोग अपनी मानवता के सभी पहलुओं में मानक-स्तर के हों तो मूल रूप से वे एकमुखी कार्य के लिए सक्षम हो सकते हैं। मैं इसलिए ऐसा कहता हूँ कि वे स्वतंत्र रूप से व्यापक कार्य पूरा नहीं कर सकते हैं क्योंकि उनकी काबिलियत उन्हें सिर्फ एकमुखी कार्य में ही अच्छा करने की अनुमति देती है। जब उनकी रुचियों, शौक और ताकतों से संबंधित किसी कार्य की बात आती है तो अपनी काबिलियत के लिहाज से वे इसके लिए सक्षम हो सकते हैं। लेकिन बहुमुखी कार्य की जटिलताओं से सामना होने पर वे उलझन में पड़ जाते हैं। अगर उनके पास कुछ व्यावहारिक अनुभव हो तो भी उनकी काबिलियत उस कार्य के लिए पर्याप्त नहीं होती है। कुछ लोग कहते हैं, “क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि मैं छोटा हूँ?” नहीं, ऐसी बात नहीं है। अगर तुम्हारी काबिलियत औसत है तो भले ही तुम चालीस-पचास वर्ष की आयु तक पहुँच जाओ, फिर भी तुम बहुमुखी कार्य का बीड़ा उठाने के लिए सक्षम नहीं होगे। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? कार्य का वास्तव में निर्वहन करने के माध्यम से कुछ अनुभव इकट्ठा करने के बाद तुम एकमुखी कार्य सँभालने में सक्षम हो सकते हो। लेकिन तुम स्वतंत्र रूप से अच्छी तरह से कार्य पूरा करने में सिर्फ उन परिस्थितियों में समर्थ होते हो जहाँ तुम्हारे पास मार्गदर्शन हो, चीजों का पुनरीक्षण करने के लिए कोई हो या दूसरों से अनुवर्ती कार्रवाई हो—तुम स्वतंत्र रूप से बहुमुखी कार्य का बीड़ा उठाने में हमेशा असमर्थ रहते हो। यह बताता है कि तुम औसत काबिलियत वाले हो। कुछ लोग बहुत-से वर्षों तक विभिन्न परिस्थितियों से गुजरकर कुछ अनुभव इकट्ठा करने के बाद और कुछ सत्य सिद्धांत समझने लगने के बाद भी बहुमुखी कार्य का बीड़ा नहीं उठा सकते हैं, खासकर ऐसे कार्य का जहाँ उन्हें स्वतंत्र रूप से उसका प्रभार लेना चाहिए। जब वे जटिल परिस्थितियों का सामना करते हैं, तब वे उलझन में पड़ जाते हैं और कार्यों को उनके महत्व या तात्कालिकता के आधार पर प्राथमिकता नहीं दे पाते हैं। ऐसे लोग निश्चित रूप से औसत काबिलियत वाले होते हैं। कार्य अनुभव व्यक्ति की कार्य क्षमता का सिर्फ एक पहलू दर्शाता है; यह प्रमुख कारक नहीं है। व्यक्ति की काबिलियत और विभिन्न पहलुओं में उसकी क्षमताएँ प्रमुख कारक होते हैं। कार्य अनुभव सिर्फ कुछ संदर्भ प्रदान करता है। यकीनन कार्य अनुभव भी कीमती है क्योंकि यह व्यक्तिगत अनुभव से उत्पन्न होता है, लेकिन यह व्यावहारिक कार्य अनुभव तुम्हें बहुमुखी कार्य के सिद्धांतों पर ज्यादा सटीकता से पकड़ बनाने में सक्षम नहीं बना सकता है। अगर तुम्हारी काबिलियत अच्छी है और तुम सही मायने में सत्य सिद्धांत समझते हो तो भले ही तुम्हारे पास कोई कार्य अनुभव न हो या तुम्हारा व्यक्तिगत अनुभव व्यापक न हो, फिर भी तुम अपने आप समग्र कार्य का बीड़ा उठा सकते हो और स्वतंत्र रूप से कार्य का प्रभार ले सकते हो। लेकिन औसत काबिलियत वाले लोग अपने आप समग्र कार्य पूरा नहीं कर सकते हैं; वे सिर्फ एकमुखी कार्य पूरा कर सकते हैं और उन्हें लगातार अनुबोधन, पुनरीक्षण, मदद और मार्गदर्शन की जरूरत होती है। इसलिए तुममें से जो लोग औसत काबिलियत वाले हो, तुम यह मत सोचो कि एकमुखी कार्य में अच्छा करने में समर्थ होने का मतलब है कि तुम बहुमुखी कार्य के लिए सक्षम हो सकते हो या स्वतंत्र रूप से कार्य का प्रभार ले सकते हो। यह एक वहम और गलत समझ है। अपने आप एकमुखी कार्य पूरा करने में समर्थ होने और अपने आप बहुमुखी कार्य पूरा करने में समर्थ होने में अंतर है—वह है स्वतंत्र रूप से कार्य का प्रभार लेने में समर्थ होना। यह कुछ ऐसा है जो तुम लोग अनुभव के जरिये धीरे-धीरे जानने लगोगे। हो सकता है कि ये शब्द समझने में आसान न हों—सिर्फ वे लोग ही इन्हें समझ सकते हैं जिन्होंने कई वर्षों तक अगुआओं या कार्यकर्ताओं के रूप में सेवा की है और जिनके पास व्यावहारिक अनुभव है। साधारण भाई-बहन शायद न समझें, है ना? जिन अगुआओं और कार्यकर्ताओं ने बहुमुखी कार्य का बीड़ा उठाया है उनके पास व्यावहारिक अनुभव है और वे इसमें अंतरों को समझते हैं—वे जिस तरीके से अपना कार्य करते हैं उसमें उनके सिद्धांत होते हैं। लेकिन औसत काबिलियत वाले लोग इसमें पीछे रह जाते हैं। तो इस प्रकार औसत काबिलियत वाले लोगों की अभिव्यक्तियाँ संक्षेप में पूरी तरह से प्रस्तुत कर दी गई हैं।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?