सत्य का अनुसरण कैसे करें (8) भाग दो

III. खराब काबिलियत की अभिव्यक्तियाँ

आओ, इसके बाद हम खराब काबिलियत वाले लोगों की अभिव्यक्तियाँ संक्षेप में प्रस्तुत करें। खराब काबिलियत वाले लोगों की अभिव्यक्तियाँ निश्चित रूप से औसत काबिलियत वाले लोगों से बदतर होती हैं। खराब काबिलियत वाले लोगों की अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? वे ये हैं कि हालाँकि वे परमेश्वर के वचनों की उनकी अपनी तलाश के माध्यम से या उन्हें खाने और पीने के माध्यम से शाब्दिक स्तर पर परमेश्वर के वचनों के हर वाक्य और अंश का मतलब—और साथ ही परमेश्वर के इरादे और अपेक्षाएँ क्या हैं इन्हें भी—समझ सकते हैं, वे सत्य सिद्धांत या परमेश्वर के अपेक्षित मानक बिल्कुल भी नहीं समझते हैं। यानी, वे लोगों और चीजों को कैसे देखना है या कैसे आचरण करना है और कैसे कार्य करना है इसके लिए परमेश्वर के अपेक्षित मानकों को नहीं समझते हैं और न ही वे यह समझते हैं कि इसमें शामिल सत्य सिद्धांत क्या हैं। जब वे अपने आप परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, तब वे इन चीजों को नहीं समझ सकते हैं, और दैनिक जीवन में लोगों, घटनाओं और चीजों के साथ अनुभव होने के बाद भी वे नहीं समझ सकते हैं। यहाँ तक कि संगति के बाद भी वे इस बारे में अस्पष्ट रहते हैं कि सत्य सिद्धांत क्या हैं। इस तरह के व्यक्ति की एक विशेषता होती है : वैसे तो वह नहीं समझता कि सत्य सिद्धांत क्या हैं, लेकिन वह अपनी भावनाओं पर भरोसा करके उन विनियमों को संक्षेप में प्रस्तुत कर सकता है जिनका उसे पालन करने की जरूरत है। जिन्हें वह याद रख सकता है वे हैं विनियम—एक तरह का सख्त सिद्धांत या नियमों का समूह। उदाहरण के लिए, परमेश्वर सत्य सिद्धांतों के एक पहलू पर संगति करता है, इस संबंध में लोगों की सकारात्मक अभिव्यक्तियों, नकारात्मक अभिव्यक्तियों, शुद्ध समझ और विकृत समझ वगैरह के उदाहरण देता है—खराब काबिलियत वाले लोग अंत में इससे क्या प्राप्त करते हैं? वे कहते हैं, “अब मुझे यह समझ आ गया है। परमेश्वर व्यक्ति को फलाँ-फलाँ चीजें करने की अनुमति नहीं देता है। परमेश्वर फलाँ-फलाँ चीजें खाने की अनुमति नहीं देता है। परमेश्वर फलाँ-फलाँ शब्द कहने या उन शब्दों का उपयोग करने की अनुमति नहीं देता है।” उन्हें यही बातें याद रहती हैं और वे सख्ती से इनका पालन करते हैं, वे सोचते हैं कि यही सत्य सिद्धांत हैं। उनका मानना है कि अगर वे इन विनियमों, कहावतों और कार्य करने के तरीकों का पालन करते हैं तो वे सत्य सिद्धांतों का पालन कर रहे हैं। चाहे तुम उनसे कितना भी कहो कि यह सिर्फ विनियमों का पालन करना है, वे इसे स्वीकार नहीं करेंगे। वे इन विनियमों का पालन करने पर अड़ जाते हैं, उनका मानना है कि यह परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करना और सत्य का अभ्यास करना है। जिन लोगों में कोई आध्यात्मिक समझ नहीं होती है उनसे निपटने का कोई तरीका नहीं है। अगर वे विनियमों का पालन करने को तैयार हैं तो उन्हें ऐसा करने दो—जब तक उनके इरादे गलत न हों तब तक कोई बात नहीं। उदाहरण के लिए, एक बार मैंने कहा, “जब तुम लोग प्रार्थना करते हो, तब तुम्हें भक्तिमय होना चाहिए; लापरवाही से प्रार्थना मत करना। उपयुक्त परिवेशों में प्रार्थना करने के लिए घुटने टेकना, प्रार्थना करने के लिए परमेश्वर के सामने खुद को दंडवत करना सबसे अच्छा है और प्रार्थना के दौरान तुम्हें परमेश्वर के सामने खुद को शांत करना चाहिए और एकाग्र दिल से प्रार्थना करनी चाहिए। यह भक्तिमय होना और अपने पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल होना है।” खराब काबिलियत वाले लोगों ने यह सुनने के बाद सिर्फ एक विनियम याद रखा : “भक्ति और परमेश्वर का भय मानने वाले दिल से प्रार्थना करने के लिए व्यक्ति को घुटने टेकने चाहिए।” उन्होंने प्रार्थना करने के लिए घुटने टेकने को एक सत्य सिद्धांत माना और उसी के अनुसार इसका पालन किया, उनका मानना था कि यह सत्य का अभ्यास करना है। इसलिए, चाहे परिवेश कोई भी हो, वे प्रार्थना करने के लिए घुटने टेकने पर अड़ जाते थे। यहाँ तक कि जब वे भोजन के समय प्रार्थना करना चाहते, तब भी वे प्रार्थना करने के लिए मेज के नीचे घुटने टेक लेते। खेतों में काम करते समय चाहे जमीन कितनी भी गंदी हो या मिट्टी में कुछ भी हो, वे प्रार्थना करने के लिए घुटने टेक लेते थे। यहाँ तक कि जब अविश्वासियों के बीच उनका आपदाओं या बड़ी घटनाओं से सामना होता था, तब भी अगर वे परमेश्वर से प्रार्थना करना चाहते तो उन्हें घुटने टेकने और प्रार्थना करने के लिए कोई गुप्त जगह ढूँढ़नी पड़ती थी। उनका मानना था कि सिर्फ इसी तरह से प्रार्थना करना ही परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है, इसलिए चाहे हालात कुछ भी हों, प्रार्थना करने के लिए उन्हें घुटने टेकने ही थे। वे सोचते थे कि ऐसा करके वे सत्य का अभ्यास कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त वे खुद को सबसे अधिक भक्तिमय लोगों के रूप में देखते थे, ऐसे लोगों के रूप में जो परमेश्वर के मार्ग का सबसे अधिक करीब से पालन करते हैं, जो सत्य से सबसे ज्यादा प्रेम करते हैं और जो सत्य और परमेश्वर के वचनों के प्रति सबसे ज्यादा समर्पण कर सकते हैं। देखा तुमने, ये खराब काबिलियत वाले लोगों की अभिव्यक्तियाँ हैं। समझ के लिहाज से इस तरह का व्यक्ति हीन और समस्यात्मक होता है। वह हमेशा एक वाक्य या विनियम पर सिद्धांतों को सख्ती से स्थिर कर देता है। वह सत्य समझने के लिए शब्द और ज्ञान समझने की विधि का उपयोग करता है और यकीनन वह विनियमों, शब्दों, कहावतों और औपचारिकताओं का पालन करके सत्य का अभ्यास भी करता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम सत्य सिद्धांतों के बारे में कैसे संगति करते हो, उन्हें सुनने के बाद वह उन्हें सिर्फ वाक्यों, विनियमों, कार्य करने के तरीकों या नारों के रूप में सोचता है। उसके लिए यह सिर्फ नियमों का पालन करने के बारे में है। वह सत्य का अभ्यास करने को इतना ही सरल मानता है, जैसे कि यह सिर्फ इस बात का पालन करना हो कि क्या किया जा सकता है और क्या नहीं किया जा सकता है, बस और कुछ नहीं।

खराब काबिलियत वाले लोग सभी चीजों को मापने और उनसे पेश आने के लिए विनियमों का उपयोग करते हुए लोगों और चीजों को देखते हैं, आचरण करते हैं और कार्य करते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बाहरी परिवेश और आस-पास के लोग, घटनाएँ और चीजें कैसे बदलती हैं, वे बिना किसी बदलाव के लगातार एक ही विनियम का पालन करते हैं। अगर तुम कहते हो कि वे सत्य से प्रेम नहीं करते हैं और सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं तो उन्हें अपने दिलों में लगता है कि उनके साथ अन्याय हुआ है। वे कहते हैं, “मैंने इतना त्याग किया है, इतना कष्ट सहा है, परमेश्वर के इतने सारे वचनों का पालन किया है और परमेश्वर के इतने सारे वचनों का अभ्यास किया है—तो तुम यह क्यों कहते हो कि मैं सत्य से प्रेम नहीं करता और सत्य का अभ्यास नहीं करता? तुम यह भी क्यों कहते हो कि मैं विनियमों का पालन करता हूँ? मेरे साथ अन्याय किया जा रहा है!” उनके द्वारा ऐसे शब्द कह पाना कौन-सी समस्या का संकेत देता है? खराब काबिलियत वाले लोगों की मुख्य अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? उनकी काबिलियत किस तरीके से खराब है? उनमें सत्य समझने की क्षमता बिल्कुल नहीं होती है, इसलिए चाहे सत्य के किसी भी पहलू पर कितनी भी संगति की जाए, उनके लिए अंत में यह सब कुछ एक सिद्धांत के बजाय कार्य करने का एक तरीका, एक नियम, एक वाक्यांश या एक औपचारिकता बनकर रह जाता है। अगर कोई ऐसा वाक्य कहता है या ऐसे शब्द का उपयोग करता है जो उनके उस नियम का उल्लंघन करता है, तो उनके लिए यह सत्य सिद्धांतों का उल्लंघन है। यह परेशानी वाली बात है। इसलिए एक बात तो यह है कि खराब काबिलियत वाले लोग यह निर्धारित करने के लिए विभिन्न विनियमों, औपचारिकताओं, सिर्फ शब्दों और कार्य करने के तरीकों का उपयोग करते हैं कि खुद उनके पास सत्य वास्तविकता है। इसके अलावा एक और परेशानी वाला मामला है : वे दूसरों को मापने के लिए और यहाँ तक कि परमेश्वर को मापने के लिए भी अक्सर उन धर्म-सिद्धांतों का उपयोग करते हैं जिन्हें वे बार-बार बोलते हैं और उन विनियमों और कार्य करने के तरीकों का उपयोग करते हैं जिनका वे अक्सर पालन करते हैं। मापने के अलावा वे अक्सर दूसरे लोगों और परमेश्वर के बारे में राय भी बनाते हैं और दूसरे लोगों और परमेश्वर को सीमांकित भी करते हैं। उदाहरण के लिए, एक बार मैंने कहा, “मैं आमतौर पर ठंडी चीजें खाने की हिम्मत नहीं करता। उन्हें खाने के बाद मेरा पेट खराब हो जाता है, इसलिए मैं मूल रूप से ये कच्ची और ठंडी खाने की चीजें नहीं खाता।” एक खराब काबिलियत वाले व्यक्ति ने यह सुन लिया और वह बोला, “अब मैं तुम्हें समझ गया। भविष्य में मुझे यह सुनिश्चित करना होगा कि मैं तुम्हें कच्ची और ठंडी खाने की चीजें न दूँ। किसी भी हालात में मैं तुम्हें कभी भी कच्ची और ठंडी खाने की चीजें खाने नहीं दूँगा।” लेकिन जब गर्मियों का मौसम आया और मौसम बेहद गर्म हो गया और खेत में स्ट्रॉबेरी पक गई, तो एक दिन मैंने खेत में दो स्ट्रॉबेरी खा लीं और इसे देखकर उसके मन में ये विचार आए : “क्या ऐसा नहीं है कि तुम कभी भी कच्ची और ठंडी चीजें नहीं खाते? क्या स्ट्रॉबेरी शीतल नहीं होतीं? क्या तुमने इससे पहले नहीं कहा था कि शीतल चीजें खाने से तुम्हारे पेट में परेशानी होने लगती है? तो फिर आज तुम स्ट्रॉबेरी क्यों खा रहे हो? क्या तुम झूठ नहीं बोल रहे हो?” उसने अपने दिल में यह सोचा; बस इतना था कि उसने इसे जोर से नहीं कहा। मुझे बताओ, क्या मामलों के बारे में उसका मत सही था? (नहीं।) यह कैसे गलत था? (परमेश्वर ने एक चीज जिस संदर्भ में कही थी उस संदर्भ का ध्यान रखे बिना उसने उस चीज को चीजें मापने के विनियम के रूप में ले लिया।) उसे नहीं पता था कि मेरे इन वचनों का क्या मतलब है। सामान्य हालातों में कच्ची और ठंडी चीजें खाने से मेरे पेट में परेशानी होने लगती है लेकिन इसके अपवाद भी हैं। उदाहरण के लिए, जब मैं शारीरिक कार्य कर रहा होता हूँ और मेरा शरीर गर्म हो जाता है और उसके साथ ही, मौसम भी गर्म हो जिसमें तापमान करीब तीस डिग्री तक पहुँच गया हो और तब वे कच्ची और ठंडी खाने की चीजें इतनी बर्फीली नहीं हों, तो ऐसे में मैं उन्हें थोड़ी मात्रा में खा सकता हूँ। ऐसा नहीं है कि मैं उन्हें बिल्कुल भी नहीं खा सकता। जब मैंने कहा “उन्हें नहीं खा सकता”, तो मेरा मतलब सामान्य हालातों से था; तपती गर्मी के मौसम में थोड़ी मात्रा में खाने से मुझे कुछ नहीं होता। खराब काबिलियत वाला व्यक्ति इन वचनों को समझ नहीं पाया। जब उसने उन्हें सुना तो वह उन्हें एक विनियम या सूत्र मान बैठा। जब विशेष हालात उत्पन्न हुए तब भी उसने उन्हें इस सूत्र में बिठाने का प्रयास किया। जब उसने देखा कि वे ठीक नहीं बैठ रहे हैं तो वह इसे समझ नहीं पाया : “क्या तुमने नहीं कहा था कि तुम कच्ची और ठंडी चीजें नहीं खा सकते? तो तुम अब उन्हें कैसे खा रहे हो? क्या तुम झूठ नहीं बोल रहे हो?” मेरे वचनों को समझने में उसकी असमर्थता के लिहाज से उसकी अपर्याप्तता कहाँ थी? (उसमें बोध क्षमता बिल्कुल नहीं थी।) उसकी अपर्याप्तता परिवेश और विशेष हालातों में बदलावों के आधार पर इस मामले के बारे में राय बनाने और समझने में असमर्थता में निहित थी। अगर पर्याप्त काबिलियत वाला व्यक्ति इसे देखता है तो वह जान जाएगा कि कार्य करने और मेरे शरीर के गर्म हो जाने के बाद और साथ ही मौसम के गर्म होने और फलों के बहुत ज्यादा ठंडे नहीं होने पर थोड़ी मात्रा में खाना मेरे लिए कोई समस्या नहीं है और यह बहुत ही सामान्य है। वे इस मामले को समझ सकते हैं और इसका मतलब निकाल सकते हैं। लेकिन खराब काबिलियत वाला व्यक्ति इसका मतलब नहीं निकाल सकता; वह इस बिंदु पर अटक जाता है और अपने दिल में धारणाएँ बना लेता है। एक बार धारणाएँ बन जाने पर क्या नतीजा होता है? यह आसानी से उसे राय बनाने और निंदा करने की तरफ ले जाता है। क्या यही बात नहीं है? (हाँ।) यकीनन यह छोटा मामला कोई बड़ा मुद्दा नहीं है, लेकिन अपने दिल में वह इसे जाने नहीं दे सकता : “क्या यह झूठ बोलना नहीं है? तो तुम भी झूठ बोलते हो!” देखा तुमने, वह इस बहुत छोटे-से मामले को भी सीमांकित करने और फैसला सुनाने में फुर्ती करता है। और यह प्रमुख मुद्दों का सामना करने से भी पहले है—उसने पहले से ही धारणाएँ बना ली हैं। खराब काबिलियत वाले लोग ऐसे छोटे मामलों की भी असलियत नहीं देख पाते हैं और उनमें जरा भी भेद पहचानने की क्षमता नहीं होती है। चाहे वे किसी भी मुद्दे को देख रहे हों, वे विनियमों को सख्ती से लागू करते हैं। उनका मानना है कि सत्य सिर्फ उन्हीं लोगों के पास होता है जो विनियमों का पालन कर सकते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारे शब्द और क्रियाकलाप सत्य सिद्धांतों से कैसे मेल खाते हैं, जब तक वे ऐसे लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं के खिलाफ जाते हैं और उन विनियमों से टकराते हैं जिन्हें ऐसे लोग पहचानते हैं, तब तक वे अपने दिलों में तुम्हारे बारे में राय बनाएँगे और तुम्हारी निंदा करेंगे। भले ही वे इसे जोर से न कहें, लेकिन वे तुम्हारे खिलाफ धारणाएँ या पूर्वाग्रह बनाएँगे। खराब काबिलियत वाले ये लोग चाहे कितने भी धर्मोपदेश सुनें या उनके साथ सत्य के किसी भी पहलू पर संगति की जाए, वे हमेशा हर चीज को एक कथन, कार्य करने के तरीके या विनियम तक सीमित कर देते हैं और वे इन कथनों, कार्य करने के तरीकों और विनियमों का बड़े जोश से पालन करते हैं; वे यह तक मानते हैं कि वे ऐसे लोग हैं जो सत्य का अभ्यास करते हैं और सही मायने में सत्य के प्रति समर्पण करते हैं और सही मायने में परमेश्वर का भय मानते हैं। यहाँ तक कि वे कभी-कभी खुद को भावुक करके रोने लगते हैं, सोचते हैं कि वे सही मायने में परमेश्वर से प्रेम करते हैं और दुनिया में उनसे ज्यादा परमेश्वर से प्रेम कोई नहीं करता। दरअसल वे सिर्फ एक ही विनियम या कार्य करने का एक ही तरीका अपनाते हैं। वे इस तरीके से अपना अभ्यास करते हैं और बिना किसी बदलाव के इसमें लगे रह सकते हैं, यह मानते हुए कि उन्होंने सत्य प्राप्त कर लिया है और वे परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जा चुके हैं। मुझे बताओ, क्या यह परेशानी वाली बात नहीं है? (हाँ।)

क्या तुम लोग अक्सर ऐसे उदाहरण देखते हो जहाँ लोग विनियमों का पालन करते हैं? (हाँ।) उदाहरण के लिए, तुम खाना पकाने वाले व्यक्ति से कहते हो कि मौसम गर्म हो रहा है, इसलिए उसे हर रोज कुछ ठंडक देने वाली हर्बल चाय बनानी चाहिए या कुछ ठंडा पेय बनाना चाहिए और खाना बनाते समय कुछ ठंडे पकवान परोसने चाहिए—जिसे पश्चिमी लोग सलाद कहते हैं—ताकि लोगों की भूख बढ़े। खराब काबिलियत वाला व्यक्ति इस बात को अच्छी तरह याद कर लेता है : जब मौसम बहुत गर्म होता है तो लोगों को ठंडे पकवान खाने चाहिए और ठंडे पेय पीने चाहिए। वह इसे अच्छी तरह से याद रखता है और इसका पूरी लगन से पालन करता है। लेकिन एक दिन जब तापमान गिरता है तो वह इस बात को अनदेखा कर देता है कि आज ठंड है या नहीं और सोचता है, “अभी गर्मियाँ हैं, इसलिए मुझे ठंडे पकवान और ठंडे पेय बनाने चाहिए। मैं उन्हें हर रोज बनाऊँगा ताकि तुम उनका भरपूर आनंद ले सको, ताकि तुम्हें पूरी तरह से ठंडक मिल सके। चाहे तापमान गिरे या न गिरे, मुझे इसकी परवाह नहीं!” वह न सिर्फ ठंडे पकवान बनाता है बल्कि नूडल्स भी ठंडे पानी में धोता है, फिर भोजन के बाद ठंडे पेय बनाता है, यहाँ तक कि उनमें कुछ बर्फ के टुकड़े भी डाल देता है। यह देखकर कुछ लोग कहते हैं : “आज इतनी ठंड है। फिर भी तुम ठंडे पकवान कैसे बना सकते हो? और यहाँ तक कि तुमने ठंडे पेय में बर्फ के टुकड़े भी डाले हैं—क्या तुम हमें जमा देने का प्रयास कर रहे हो?” खाना पकाने वाले व्यक्ति को बुरा लग जाता है और वह कहता है, “क्या मैं वाकई इतना दुर्भावनापूर्ण हूँ? गर्मियों में इतनी गर्मी है—क्या मैं यह सब सिर्फ इसलिए नहीं कर रहा हूँ ताकि सभी को ठंडक मिले और वे जरा-सा ज्यादा खाएँ? क्या यह सिद्धांतों का पालन करना और सभी के प्रति विचारशील होना नहीं है? मैं गलत कैसे हूँ? और अब तुम कहते हो कि मैं तुम्हें जमा देने का प्रयास कर रहा हूँ—क्या मुझमें सदाचार की वाकई इतनी कमी है? क्या मेरी मानवता वाकई इतनी खराब है? तुम सभी मेरे प्रति बहुत ही ज्यादा विचारशून्य हो!” क्या इस तरीके से खाना पकाकर वह सिद्धांतों का पालन कर रहा है? यहाँ क्या सिद्धांत है? यहाँ सिद्धांत है मौसम और तापमान के अनुसार भोजन और पेय को समायोजित करना। गर्मियों में जब मौसम गर्म होता है तो अपेक्षाकृत ठंडी खाने-पीने की चीजों का सेवन करना जो लोगों की भूख बढ़ा सकें—यह एक सिद्धांत है, है ना? यह एक सिद्धांत है। लेकिन तापमान में अचानक गिरावट के चलते अब इस सिद्धांत को कैसे लागू किया जाना चाहिए? (जब तापमान अचानक गिरता है तो खाना पकाने वाला व्यक्ति अब ठंडे पकवान या सलाद बनाने पर अड़ा नहीं रह सकता जैसे उसे पहले सलाह दी गई थी, बल्कि उसे मौसम के आधार पर समायोजन करना चाहिए और गर्म पकवान बनाने चाहिए। वह विनियमों का पालन नहीं कर सकता।) सही कहा। जब गर्मियों में कभी-कभार मौसम ठंडा हो जाता है तो तुम गर्मियों में ठंडे पकवान और ठंडे पेय बनाने पर अड़े नहीं रह सकते—तुम इस विनियम का पालन नहीं कर सकते। जब तापमान अचानक गिरता है, तो लोगों द्वारा सेवन की जाने वाली खाने-पीने की चीजें भी तुरंत बदल जानी चाहिए। ठंडे पकवान और ठंडे पेय अब और नहीं बनाए जाने चाहिए और बर्फ के टुकड़े तो निश्चित रूप से नहीं डाले जाने चाहिए। बल्कि तुम्हें गर्म पकवान पकाने चाहिए, कुछ गर्म नूडल्स बनाने चाहिए, तापमान और मौसम के अनुसार खाने-पीने की चीजें समायोजित करनी चाहिए। यही सिद्धांत है। लेकिन खराब काबिलियत वाला व्यक्ति तापमान या मौसम की स्थिति की परवाह किए बगैर जब तक गर्मियाँ हैं तब तक ठंडे पेय और ठंडे पकवान बनाने में लगा रहता है—यहाँ क्या समस्या है? (विनियमों का पालन करना।) यह विनियमों का पालन करना है, हालातों के अनुसार लचीले ढंग से सिद्धांतों को लागू करने में असमर्थ होना है। ये खराब काबिलियत वाले लोगों की इस लिहाज से अभिव्यक्तियाँ हैं कि वे आमतौर पर चीजें कैसे करते हैं—वे एक कथन याद रखते हैं और उसे एक विनियम मान लेते हैं जिसका उन्हें पालन करना है और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परिवेश, लोग, घटनाएँ और चीजें कैसे बदलती हैं, वे मामले सँभालने के लिए सिद्धांतों को लचीले ढंग से लागू नहीं कर पाते हैं। दरअसल, भोजन और पेय के संबंध में सिद्धांत स्थापित करने से जो नतीजा हासिल किया जाना है वह यह सुनिश्चित करना है कि लोग इस तरह से खाना खाएँ कि उनके शरीर को आराम महसूस हो। ऐसे सिद्धांत विनियम बिल्कुल भी नहीं होते हैं। लेकिन जो लोग विनियमों का पालन करते हैं, वे तापमान या मौसम का ध्यान रखे बिना और इस बात की परवाह किए बिना कि तुम्हें खाकर अच्छा महसूस होता है या नहीं, जब तक गर्मियाँ रहती हैं तब तक ठंडे पकवान और ठंडे पेय बनाते रहते हैं—इसे विनियमों का पालन करना कहते हैं। सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने का मतलब है कि की गई हर चीज वही अंतिम अच्छा नतीजा हासिल करने के इर्द-गिर्द घूमती है। लेकिन विनियमों का पालन करने से नतीजा नजरअंदाज हो जाता है और सिर्फ औपचारिकताओं और कार्य करने के तरीकों पर ध्यान केंद्रित रहता है। खराब काबिलियत वाले लोग ठीक इसी तरह से मुद्दे सँभालते हैं—इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन-सी चीजें उत्पन्न होती हैं, वे उन्हें सँभालने के लिए इसी नजरिए का उपयोग करते हैं।

खराब काबिलियत वाले लोग अपने रास्ते में आने वाली किसी भी चीज की असलियत नहीं देख पाते हैं। यहाँ तक कि परमेश्वर के वचन पढ़ते समय या धर्मोपदेश सुनते समय भी उनकी समझ में कुछ विकृति रहती है और उनमें अनिवार्य रूप से विचलन शामिल होते हैं। वे एक विनियम, कार्य करने के तरीके या अनुष्ठान का पालन कर रहे होते हैं जो सत्य सिद्धांतों से पूरी तरह से भिन्न होता है और नतीजतन कई विकृत चीजें उत्पन्न होती हैं। यह कहा जा सकता है कि किसी भी मामले के बारे में खराब काबिलियत वाले लोगों की समझ में कुछ हद तक विकृत प्रकृति हमेशा रहती है। वैसे तो वे सरल और आसानी से प्रबंधित करने योग्य चीजों में विकृति दिखाए बिना आज्ञाकारिता और समर्पण हासिल कर सकते हैं, लेकिन जब सिद्धांत-आधारित मामलों या अपेक्षाकृत जटिल मुद्दों की बात आती है तो वे सत्य सिद्धांतों पर पकड़ नहीं बना पाते हैं और उन्हें सिर्फ विनियमों का पालन करना आता है। तुम समझ रहे हो? (हाँ।) खराब काबिलियत वाले लोगों में सत्य समझने की पूरी तरह से कमी होती है और उन्हें सिर्फ विनियमों का पालन करना आता है। ऐसे लोग काफी परेशान करने वाले भी होते हैं। वे विनियमों का पालन करने में बहुत जोशभरे और दृढ़निश्चयी होते हैं। अगर तुम उनके साथ संगति करते हो और कहते हो, “तुम जो कर रहे हो वह विनियमों का पालन करना है, सत्य सिद्धांतों का पालन करना नहीं है” तो वे इसे स्वीकार नहीं कर सकते हैं। उन्हें लगता है : “मैं दृढ़तापूर्वक सिद्धांतों का पालन कर रहा हूँ और दूसरों के साथ समझौता नहीं कर सकता! दूसरे लोग सिद्धांतों का पालन नहीं करते हैं और इसके लिए उनकी निंदा की जाती है, लेकिन जब मैं उनका पालन करता हूँ तो मेरी भी निंदा की जाती है। यह अनुचित है!” देखो वे कितने जिद्दी हैं, तुम उन्हें मना ही नहीं सकते। क्या तुम लोगों का ऐसे लोगों से सामना हुआ है? (हाँ।) उदाहरण के लिए, मैं कुछ लोगों से कहता हूँ, “अगर तुम नृत्य सीखना चाहते हो तो तुम प्रशिक्षण लेने के लिए हर रोज दो घंटे अलग रख सकते हो जब कार्य की व्यस्तता न हो। अगर तुम एक अवधि तक लगे रहे तो तुम इसे सीख लोगे।” वे “हर रोज दो घंटे प्रशिक्षण में लगे रहो” वाक्यांश याद रखते हैं और मानते हैं कि ऐसा करना सत्य का अभ्यास करना है और सिद्धांतों पर कायम रहना है। इसके बाद वे जो कर्तव्य कर रहे हों वह भले ही कितना ही व्यस्तता भरा हो, वे हर रोज दो घंटे नृत्य के प्रशिक्षण में लगे रहते हैं। ऐसी समयावधि के दौरान जब कलीसियाई कार्य सुबह से शाम तक बहुत व्यस्तता भरा रहता है और जब उनके पास देने के लिए दिन में असल में दो घंटे भी नहीं होते हैं, तब भी वे दो घंटे नृत्य का प्रशिक्षण लेने पर अड़े रहते हैं। जब दूसरे लोग उन्हें याद दिलाते हैं कि इससे कलीसियाई कार्य में देरी हो सकती है तो वे सुनने से इनकार कर देते हैं और कहते हैं, “परमेश्वर ने मुझे हर रोज दो घंटे नृत्य का प्रशिक्षण लेने का निर्देश दिया है। मुझे यह करना ही होगा। अगर मैं ऐसा नहीं करता हूँ तो इसका मतलब है कि मैं अवज्ञाकारी हूँ और मुझमें कोई समर्पण नहीं है।” अगर तुम उन्हें ऐसा नहीं करने के लिए कहते हो तो वे अनिच्छुक होते हैं। वे कार्य की जरूरतों या परिवेश की जरूरतों के आधार पर चीजों को लचीले ढंग से सँभालने या मेरे वचनों को लचीले ढंग से लागू करने में असमर्थ होते हैं। वे नहीं समझते हैं कि उन्हें दो घंटे प्रशिक्षण क्यों लेना चाहिए, दो घंटे प्रशिक्षण लेने का क्या महत्व है या यह क्या नतीजा हासिल करने के लिए है। वे इन चीजों को नहीं समझते हैं और इनके बारे में अस्पष्ट होते हैं। उनके लिए सत्य का अभ्यास करने का सीधा-साधा मतलब है केवल एक कथन, एक विनियम या एक औपचारिकता का पालन करना—जो उनकी राय में सत्य का अभ्यास करना है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई नतीजा हासिल होता है या नहीं, या फिर वह नतीजा कैसा भी हो, वे अड़ियल ढंग से एक ही मार्ग पर चलने में लगे रहते हैं, चाहे कुछ भी हो जाए, यहाँ तक कि अगर उन्हें दस बैल खींचें तो भी वे वापस मुड़ने से इनकार कर देते हैं। भले ही वे अपने अभ्यास में भटक जाएँ, वे इसे लगातार उसी तरीके से करते रहेंगे। उन्हें यह बताए जाने पर भी कि वे बेतुके हो रहे हैं, वे ऐसा करने पर अड़े रहते हैं। क्या ऐसे लोग बहुत परेशान करने वाले नहीं होते हैं? उनके साथ चाहे कोई भी संगति करे, यह काम नहीं करता। जब तुम श्रमसाध्य तरीके से चीजों को स्पष्ट रूप से समझा देते हो, उसके बाद हो सकता है कि आज वे इस मामले को समझ जाएँ, लेकिन कल वे किसी दूसरे मामले में विनियमों का पालन करेंगे, हमेशा विनियमों का पालन करते रहेंगे और तुम्हें लगातार उन्हें सुधारना पड़ेगा। वे तेज़ी से या तो बाईं तरफ मुड़ रहे हैं या फिर दाईं तरफ और वे या तो इस तरह के मामले में या फिर उस तरह के मामले में भटक रहे हैं—वे बिना रुके लगातार भटकते रहते हैं। उन्हें देखकर तुम चिंतित हो उठते हो, लेकिन तुम कितना भी प्रयास कर लो, उन्हें ठीक नहीं कर सकते। क्यों? क्योंकि उनकी काबिलियत बहुत ही ज्यादा खराब होती है। वे कभी भी सकारात्मक और नकारात्मक चीजों, सही और गलत, ठीक और दोषपूर्ण, सत्य और विनियमों में अंतर नहीं कर सकते। उनके पास इन मामलों को सीमांकित करने का कोई मानक नहीं होता है, उनमें उन्हें सीमांकित करने की कोई क्षमता नहीं होती है और वे बस उन्हें सीमांकित कर ही नहीं सकते हैं। इसलिए, खराब काबिलियत वाले लोग सिर्फ विनियम-आधारित कार्य और कामकाज कर सकते हैं या ऐसा एकमुखी कार्य कर सकते हैं जिसमें सत्य सिद्धांत शामिल नहीं होते हैं, जैसे कि हर रोज एक नियमित कार्यक्रम का पालन करना, एक निश्चित समय पर एक चीज करना और दूसरे निर्धारित समय पर दूसरी चीज करना—यानी वे सिर्फ उन सरल कामों को सँभाल सकते हैं जिनमें कार्यक्रम का, औपचारिकताओं का और चीजें करने के एक तरीके का पालन करना कार्य का अच्छी तरह से निर्वहन करने के लिए पर्याप्त होता है। लेकिन वे ऐसा कार्य नहीं सँभाल सकते हैं जो जरा-सा ज्यादा जटिल हो। एक बार जब यह जरूरी हो जाता है कि वे सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करें और कुछ खास नतीजे प्राप्त करें, तो वे इसे पूरा करने में असमर्थ होते हैं। अगर तुम उन्हें कार्य की कोई ऐसी मद सौंपते हो जिसके लिए उन्हें सत्य सिद्धांतों को लचीले ढंग से लागू करने, विभिन्न मुद्दों को जैसे उचित हो वैसे सँभालने और परिवेश के अनुसार अनुकूल बनने की जरूरत हो तो वे उलझन में पड़ जाते हैं और उसे पूरा नहीं कर पाते हैं। उन्हें अपनी मदद करने और निर्देश देने के लिए कोई व्यक्ति चाहिए होता है; तुम उनसे स्वतंत्र रूप से कार्य को अच्छी तरह से करने की अपेक्षा नहीं कर सकते। ऐसे लोगों से कैसे पेश आना चाहिए? हालाँकि वे हर रोज नियमित रूप से अपना कर्तव्य करने में लगे रह सकते हैं, लेकिन अचानक आई परिस्थितियों से सामना होने पर उन्हें नहीं पता होता कि कैसे प्रतिक्रिया करनी है और यहाँ तक कि हो सकता है वे अपना कर्तव्य करना भी बंद कर दें। ऐसे लोगों के लिए यह जरूरी होता है कि उनके कार्य के बारे में बार-बार पूछताछ की जाए और उसका निरीक्षण किया जाए, यह पूछा जाए, “इस अवधि के दौरान क्या कलीसियाई कार्य में कोई गड़बड़ियाँ या विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न हुई हैं? क्या ऐसी कोई जटिल समस्या थी जिसे कैसे सँभालना है यह तुम्हें नहीं पता था?” इस पर सोच-विचार करने के बाद वे कहते हैं, “इस अवधि के दौरान सब कुछ अच्छा रहा है। हर कोई अपना कर्तव्य कर रहा है और सामान्य रूप से सभा कर सकता है और परमेश्वर के वचनों को खा और पी सकता है। किसी ने भी गड़बड़ नहीं की है या बाधा नहीं डाली है और मैंने किसी को भी दूसरों को गुमराह करने के लिए भ्रांतियाँ फैलाते नहीं सुना है।” वे किसी भी समस्या की पहचान नहीं कर सकते हैं और उन्हें नहीं पता होता कि क्या रिपोर्ट करना है और यहाँ तक कि वे सवाल भी नहीं उठा सकते हैं। इसलिए, तुम उनसे वास्तविक जीवन में या अपना कर्तव्य करते समय उत्पन्न होने वाले मुद्दे अपने आप सँभालने या हल करने की उम्मीद नहीं कर सकते। न ही तुम उनसे यह उम्मीद कर सकते हो कि जब उन्हें नहीं पता होगा कि किसी चीज को कैसे सँभालना है तो वे अपने से ऊपर वालों से मदद माँगेंगे या उनसे सवाल पूछेंगे। वे इनमें से कुछ भी हासिल नहीं कर सकते हैं क्योंकि उनकी काबिलियत अपर्याप्त है। अगर ऐसे लोग अपने से ऊपर वालों को समस्याओं की रिपोर्ट नहीं करते हैं तो दूसरे लोग यह सोच सकते हैं कि उन्हें कोई समस्या नहीं है। लेकिन ऐसा नहीं है। वे साधारण समस्याओं को भी पहचान नहीं सकते हैं, यहाँ तक कि जब उनके सामने समस्याओं का ढेर लग जाता है तो भी वे उन्हें समस्याओं की तरह नहीं देखते हैं। और इसलिए वे समस्याओं को हल भी नहीं करते हैं। उनके पास एक सिर होता है जिस पर दो आँखें और दो कान होते हैं; वे देख सकते हैं, सुन सकते हैं और बोल सकते हैं और फिर भी वे समस्याओं को पहचान नहीं सकते हैं या उन्हें हल नहीं कर सकते हैं। उनमें समस्याएँ पहचानने और उन्हें सँभालने की काबिलियत और क्षमता की पूरी तरह से कमी होती है, इसलिए वे दिखने में चाहे कितने भी घाघ क्यों न लगें, यह किसी काम का नहीं है। वे जो देखते या सुनते हैं, उसे ग्रहण नहीं कर सकते हैं और अपने मन में संसाधित नहीं कर सकते हैं ताकि यह सोच सकें और भेद पहचान सकें कि क्या ये समस्याएँ हैं या उन्हें कैसे सँभालना चाहिए। अगर वे सत्य सिद्धांतों से जुड़ी समस्याएँ सँभाल नहीं सकते हैं तो वे अपने से ऊपर के लोगों को उनकी रिपोर्ट भी नहीं करेंगे। वे इसमें से कुछ भी करने में पूरी तरह से असमर्थ होते हैं। क्या यह नहीं दर्शाता है कि उनमें खराब काबिलियत है? क्या ये खराब काबिलियत वाले लोगों की अभिव्यक्तियाँ नहीं हैं? (हाँ।) अगर तुम खराब काबिलियत वाले किसी व्यक्ति से पूछते हो, “क्या इस अवधि के दौरान कार्य में कोई समस्याएँ हुई हैं? क्या ऐसा कोई क्षेत्र है जहाँ तुम सिद्धांत नहीं समझते हो?” तो वे जवाब देते हैं, “कोई भी समस्या नहीं है; हर कोई व्यस्त रहा है और सब कुछ काफी अच्छा चल रहा है!” उनके लिए सब कुछ बिल्कुल अच्छा है। अगुआ या कार्यकर्ता के रूप में अगर तुम आसानी से उनका विश्वास कर लेते हो जब वे कहते हैं कि सब कुछ अच्छा है, तो तुम बहुत ही ज्यादा बेवकूफ हो और ठीक उतने ही खराब काबिलियत वाले व्यक्ति हो जितने कि वे हैं। अच्छी काबिलियत वाले लोग न सिर्फ समस्याओं के बारे में जानना जानते हैं, बल्कि उन्हें समस्याओं को अपने आप पहचानने में भी समर्थ होना चाहिए। वे समस्याओं को लक्षित करते हुए बातचीत कर सकते हैं और जैसे-जैसे वे बात करते जाते हैं, समस्याएँ स्वाभाविक रूप से सबके सामने आती जाती हैं। जब तुम कोई समस्या ढूँढ़ निकालते हो और किसी खराब काबिलियत वाले व्यक्ति से पूछते हो कि उसने इसे कैसे सँभाला, तो वह जवाब देता है, “कौन-सी समस्या? मेरा ध्यान इस पर कैसे नहीं गया?” खराब काबिलियत वाले लोग समस्याओं की पहचान नहीं कर पाते हैं, इसलिए कार्य करते समय तुम्हें समस्याओं के बारे में जानने और उन्हें पहचानने में कुशल होना चाहिए, समस्याओं को पकड़ लेना चाहिए, उन्हें जाने नहीं देना चाहिए और फिर उन्हें सँभालने और हल करने में सहायता करनी चाहिए। तुम्हें यह जानने की जरूरत है कि खराब काबिलियत वाले लोगों से सवाल पूछते हुए और गपशप करने के अंदाज में पूछताछ करते हुए कैसे बात करनी है, ताकि समस्याओं की पहचान की जा सके। जैसे-जैसे तुम गपशप करते जाओगे, वे अनजाने में खुद ही समस्याओं का जिक्र करने लगेंगे। इस तरह से गपशप किए बिना इन समस्याओं को पहचानना असंभव होगा। तुम उनसे इस तरह से गपशप करते हो, इसलिए वे प्रेरित होते हैं और अचानक इन समस्याओं को पहचान लेते हैं। अगर तुम स्थिति के बारे में जानने के लिए इस नजरिए का उपयोग नहीं करते हो तो वे जिन मामलों को देखते हैं उन्हें समस्या के रूप में नहीं बूझ पाएँगे। इसलिए जब तुम्हारी गपशप के दौरान समस्याओं का पता चलता है तो उन्हें थोड़ा-थोड़ा करके स्पष्ट किया जाना चाहिए, जैसे निचोड़कर टूथपेस्ट निकाला जाता है। जब सभी समस्याएँ हल हो जाएँगी तो वे बस कुछ हद तक शर्मिंदा महसूस करेंगे। क्या यह नहीं दर्शाता है कि उनमें खराब काबिलियत है? (हाँ।) ये खराब काबिलियत वाले लोगों की अभिव्यक्तियाँ हैं : समस्याएँ मौजूद होने पर भी वे उन्हें पहचान नहीं सकते हैं और क्योंकि वे समस्याओं की पहचान नहीं कर सकते हैं, इसलिए वे उनको सामने लाने या उन्हें हल करने में कभी समर्थ नहीं होते हैं। मुझे बताओ, अगर वे समस्याएँ नहीं पहचान सकते हैं, तो क्या वे अपना कार्य अच्छी तरह से कर सकते हैं? क्या वे विनियमों का पालन करके अपना कार्य अच्छी तरह से कर सकते हैं? (नहीं।) बिल्कुल नहीं। यह खराब काबिलियत होने की एक अभिव्यक्ति है। अगर तुम कहते हो कि उनकी काबिलियत खराब है, तो वे यह तक सोचते हैं, “मेरी काबिलियत उत्कृष्ट है! जब परमेश्वर कुछ कहता है, उसके बाद मैं कार्य करने के एक तरीके या विनियम पर तुरंत पकड़ बना लेता हूँ और मैं जीवन भर उसका पालन कर सकता हूँ। देखा? क्या मेरी काबिलियत अच्छी नहीं है? तुम सभी मुख्य बिंदुओं पर पकड़ बनाने में विफल हो जाते हो, लेकिन मैं यह कर पाता हूँ। उदाहरण के लिए, मुझे बताया गया था कि गर्मियों में मौसम गर्म होता है और हमें ठंडे पकवान खाने चाहिए। इसलिए, मैं ठंडे पकवान बनाता रहता हूँ और ठंडे पेय परोसता रहता हूँ—मैं इस निर्देश का पालन कर सकता हूँ। देखा तुमने, तुम लोगों में से कोई भी इसका पालन नहीं कर सकता और तुम हमेशा सिद्धांतों की बात करते रहते हो। क्या सिद्धांत बस विनियम नहीं होते हैं? अगर तुम विनियमों का पालन करते हो तो क्या यह सिद्धांतों का पालन करना नहीं है?” वे यह तक सोचते हैं कि उनकी काबिलियत अच्छी है, उनका मानना है कि वे मुद्दे के मुख्य बिंदुओं पर पकड़ बना सकते हैं और वे एक लंबे धर्मोपदेश से एक अकेला कथन, कार्य करने का तरीका, विनियम या यहाँ तक कि एक वाक्यांश या शब्द भी चुन सकते हैं जिसका उन्हें लगता है कि उन्हें पालन करना चाहिए। मुझे बताओ, क्या यह परेशानी वाली बात नहीं है? ऐसे लोग बहुत ज्यादा हैं। जब तुम सत्य के विभिन्न विवरणों के बारे में संगति करते हो तो वे समझ नहीं सकते हैं और यहाँ तक कह देते हैं, “क्या सिरदर्दी है! तुम बात करना बंद ही नहीं करते। क्या यह सिर्फ उन शब्दों को नहीं कहने या उस तरह की चीज नहीं करने के बारे में नहीं है? बस उस एक कथन का पालन करो और बात खत्म—यह सिर्फ एक कथन का मामला है। इसे इतना झंझट वाला क्यों बनाया जाए? तुम विभिन्न प्रकार के लोगों की दशाओं, परिवेशों और मानवता में भी अंतर करते हो और विकृत और शुद्ध समझ में अंतर करते हो। क्या वाकई इतने सारे विवरण शामिल हैं? इतना ब्योरेवार क्यों होना? तुम कितना मीन-मेख निकालते हो!” वे दूसरों की निंदा भी करते हैं। ये खराब काबिलियत वाले लोगों की अभिव्यक्तियाँ हैं।

खराब काबिलियत वाले लोगों की क्या विशेषताएँ हैं? वे सत्य सिद्धांत नहीं समझते हैं; यह सत्य सिद्धांतों का जो भी पहलू हो, वे इसे एक तरह का विनियम या सूत्र मानते हैं और फिर वे कभी न थकने वाले उत्साह से उसका पालन करते हैं। वे कई धर्म-सिद्धांत बोल सकते हैं और इसलिए उन्हें लगता है कि वे सत्य सिद्धांत समझते हैं, लेकिन वास्तव में वे सत्य बिल्कुल भी नहीं समझते। अगर तुम कार्य करने वाले अगुआओं और कार्यकर्ताओं के कुछ सिद्धांत समझाते हो, ऐसे लोगों से इन सिद्धांतों की समझ के आधार पर कार्य करने और विभिन्न समस्याएँ सँभालने के लिए कहते हो, तो खराब काबिलियत वाले ये लोग उन्हें लागू करने में पूरी तरह से असमर्थ होंगे। वे इन सत्य सिद्धांतों को नहीं समझते हैं और न ही वे कार्य करने के लिए इन सत्य सिद्धांतों को लागू कर पाते हैं। जब वे कार्य करने लगते हैं, तो यह पूरी तरह से विनियमों का पालन करना, प्रोटोकॉल का पालन करना और मशीनी ढंग से हठधर्मिता को लागू करना होता है। ऐसे कुछ लोग हैं जो सत्य सिद्धांतों का पालन करना चाहते हैं, लेकिन क्योंकि उनकी काबिलियत खराब होती है और वे सत्य की समझ प्राप्त नहीं कर सकते हैं, इसलिए वे सिद्धांतों का पालन करने में असमर्थ होते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे क्या कार्य करते हैं, समस्याओं से सामना होने पर वे हतप्रभ रह जाते हैं और यहाँ तक कि हड़बड़ा जाते हैं—वे कोई भी कार्य अच्छी तरह से करने में असमर्थ होते हैं। जब उनसे ऊपर वाले सिद्धांतों के बारे में संगति करते हैं, तो उन्हें लगता है कि वह सारा कुछ उन्हें समझ आ गया है, उन्होंने उसे आत्मसात कर लिया है, उस पर पकड़ बना ली है और उसे याद कर लिया है। लेकिन जब वास्तविक जीवन में उनका समस्याओं से सामना होता है, तो वे उलझन में पड़ जाते हैं क्योंकि उन्होंने जो धर्म-सिद्धांत और विनियम समझे हैं वे किसी काम के नहीं होते, इसलिए वे सोचते हैं : “अब मुझे क्या करना चाहिए?” उन्हें नहीं पता होता कि कार्य कहाँ से शुरू करना है, उन्हें नहीं पता होता कि कार्य करने के लिए किन विधियों का उपयोग करना है, उन्हें नहीं पता होता कि कार्य-व्यवस्थाओं को कैसे कार्यान्वित करना है और यह तो उन्हें बिल्कुल पता नहीं होता कि कलीसियाई कार्य की सामान्य प्रगति सुनिश्चित करने के लिए किन समस्याओं को ठीक अभी हल किया जाना चाहिए—उन्हें इसमें से कुछ भी नहीं पता होता है। नतीजतन, चाहे वे कितनी भी देर तक कार्य करें, कोई नतीजा नहीं निकलता है और कार्य-व्यवस्थाएँ कार्यान्वित नहीं की जा सकती हैं। यहाँ तक कि वे इस मुद्दे को भी हल नहीं कर पाते हैं कि कलीसियाई जीवन को कैसे अच्छा बनाया जाए। यहाँ तक कि वे सबसे मूलभूत कार्य भी कार्यान्वित नहीं कर पाते हैं और उन्हें यह भी नहीं पता होता है कि इसे कैसे कार्यान्वित करना है। वे सिर्फ लोगों को सिद्धांत सुना सकते हैं और उन्हें विनियमों का पालन करने के लिए कह सकते हैं। जब कार्य-व्यवस्थाओं को कार्यान्वित करने और ठोस कलीसियाई कार्य करने की बात आती है, तो वे उलझन में पड़ जाते हैं और ऐसा करने में असमर्थ होते हैं। वे मन ही मन सोचते हैं, “इन कार्य-व्यवस्थाओं को कैसे कार्यान्वित किया जाना चाहिए? किन विनियमों का पालन किया जाना चाहिए?” वे इन चीजों को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते हैं। लेकिन अभी भी उनके पास एक आखिरी उपाय होता है : उनका मानना है कि जब तक वे ज्यादा सभाएँ आयोजित करते हैं तब तक समस्याएँ हल की जा सकती हैं। इसलिए, उनका कार्य करने का तरीका ताबड़तोड़ सभाएँ आयोजित करना और ताबड़तोड़ धर्मोपदेश देना है। जब उनका उपदेश देना सभी में हलचल उत्पन्न करता है और उन्हें जोश से भर देता है, तो उन्हें लगता है कि सभी समस्याएँ हल हो गई हैं और अब कोई और समस्या नहीं बची है और जब तक सभी जोशपूर्ण हैं तब तक सारा कार्य उचित रूप से किया जाता है। लेकिन यह पता चलता है कि कई दिनों तक सभाएँ करने के बाद भी न सिर्फ वास्तविक समस्याएँ अनसुलझी रह जाती हैं और लोगों द्वारा किए जाने वाले कर्तव्य अब भी कोई नतीजा नहीं देते हैं, बल्कि कलीसियाई कार्य भी बिल्कुल भी प्रगति नहीं करता है। लेकिन अब भी उनमें उपदेश देने का मिजाज होता है। खराब काबिलियत वाले लोग चाहे कितनी भी देर तक कार्य करें, वे कोई नतीजे प्राप्त नहीं करते हैं और चाहे उन्हें कितना भी समय दिया जाए, वे कार्य-व्यवस्थाएँ कार्यान्वित नहीं कर सकते हैं—उनमें न तो कार्य कुशलता होती है और न ही प्रभावशीलता। ये खराब काबिलियत वाले लोगों की अभिव्यक्तियाँ हैं। खराब काबिलियत वाले लोगों की अभिव्यक्तियाँ वैसी ही होती हैं जैसा मैंने अभी-अभी बताया, बिना काबिलियत वाले लोगों की तो बात ही छोड़ दो। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कितने धर्मोपदेश सुनते हैं या दूसरे लोग उनके साथ सत्य पर कितनी संगति करते हैं, वे सत्य सिद्धांतों पर पकड़ नहीं बना पाते हैं और यहाँ तक कि उन सबसे मूलभूत विनियमों पर भी पकड़ नहीं बना पाते हैं जिनका पालन किया जाना चाहिए। जब किसी की काबिलियत इस हद तक खराब होती है तो सत्य सिद्धांत उसकी पहुँच से परे होते हैं। अगर दूसरे लोग उनके साथ सत्य पर संगति कर लें, तो भी वे अभ्यास का मार्ग नहीं ढूँढ़ पाते हैं और इससे पहले कि वे जानें कि अभ्यास कैसे करना है, उनके पास ऐसा कोई होना चाहिए जो उन्हें खास निर्देश दे। ऐसे लोग मानो जानवरों का पुनर्जन्म होते हैं; उनके मन हमेशा धुँधले और अस्पष्ट रहते हैं और वे कभी भी यह अंतर नहीं कर पाते हैं कि सिद्धांत क्या हैं और विनियम क्या हैं। वे अपने दिलों में कहते हैं, “इन चीजों को सुनकर हमेशा मेरा सिर क्यों दुखता है और मुझे नींद क्यों आती है?” अंत में वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं : “न सिर्फ सत्य सिद्धांत मेरी पहुँच से परे हैं, बल्कि मैं विनियमों का पालन भी नहीं कर सकता, इसलिए भविष्य में मैं अपने अंदर की सारी ऊष्मा से जितना हो सके उतना तेज़ चमकूँगा, मेरी क्षमता से जितना संभव होगा उतना प्रयास करूँगा और बस वही करूँगा जो करने में मैं सक्षम हूँ और यह काफी है।” इनमें से कुछ लोग तो खुद को दिलासा भी देते हैं, कहते हैं, “मुझे नहीं पता कि विनियमों का पालन कैसे करना है और न ही मैं सत्य सिद्धांत समझता हूँ, लेकिन मेरे पास परमेश्वर-प्रेमी दिल है!” अगर वे सही मायने में परमेश्वर से प्रेम कर पाते तो यह बुरा नहीं होता, लेकिन इतनी खराब काबिलियत होने के कारण वे सत्य भी नहीं समझते हैं—क्या परमेश्वर के प्रति उनका प्रेम सच्चा हो सकता है? बिना काबिलियत वाले लोगों में सभी लिहाज से बोध क्षमता की कमी होती है और उनमें विनियमों का पालन करने की क्षमता भी नहीं होती है। खराब काबिलियत वाले कुछ लोग सत्य का अभ्यास करते समय कम-से-कम किसी आंशिक रूप से समझे गए सिद्धांत, विनियम या सूत्र को पकड़ सकते हैं और इस तरह से जरा-सा सत्य अभ्यास में ला सकते हैं। लेकिन बिना काबिलियत वाले लोग तो विनियम-आधारित चीजों को भी समझ नहीं सकते हैं या उनका पालन नहीं कर सकते हैं—इस प्रकार का व्यक्ति और भी दयनीय होता है।

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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