सत्य का अनुसरण कैसे करें (8) भाग चार
सत्य का अनुसरण करने का पहला अभ्यास : त्याग देना
अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को त्याग देना
I. परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग देना : परमेश्वर के कार्य के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग देना
च. परमेश्वर का कार्य लोगों की जन्मजात स्थितियों को नहीं बदलता, बल्कि इसका लक्ष्य उनके भ्रष्ट स्वभावों को बदलना है
मुझे बताओ, जिस हद तक लोग परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं और उसके खिलाफ विद्रोह करते हैं, क्या उसका इस बात से कोई लेना-देना है कि उनकी काबिलियत अच्छी है या बुरी? क्या लोग खराब काबिलियत के कारण परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं और उसके खिलाफ विद्रोह करते हैं? क्या तुम लोगों ने कभी इस सवाल पर विचार किया है? क्या यह कोई ऐसा सवाल है जो विचार करने योग्य है? (हाँ।) कुछ लोग कहते हैं, “क्योंकि हमारी काबिलियत खराब है, क्योंकि परमेश्वर ने हमें जो काबिलियत दी है वह अच्छी नहीं है, इसलिए हम परमेश्वर का जोर से प्रतिरोध और उसके खिलाफ तीव्र विद्रोह करते हैं।” क्या यह कथन सही है? (नहीं।) जन्मजात स्थितियों, मानवता और भ्रष्ट स्वभावों के बीच अंतरों के बारे में हमारी पिछली संगति के आधार पर काबिलियत किस श्रेणी में आती है? (जन्मजात स्थितियों की श्रेणी में।) यह जन्मजात स्थितियों से संबंधित है। तो क्या तुम जानते हो कि जन्मजात स्थितियों के विभिन्न पहलू लोगों की मानवता और भ्रष्ट स्वभावों से संबंधित हैं या नहीं? आओ, काबिलियत से शुरू करें—क्या काबिलियत यह तय करती है कि कोई व्यक्ति किस हद तक परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करता है और उसका प्रतिरोध करता है? (नहीं।) हम ऐसा क्यों कहते हैं कि वह इसे तय नहीं करती है? यह इस कारण से संबंधित है कि लोग परमेश्वर का प्रतिरोध क्यों करते हैं और उसके खिलाफ विद्रोह क्यों करते हैं। क्या लोग खराब काबिलियत के कारण परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करते हैं और उसका प्रतिरोध करते हैं? (नहीं, इसका कारण यह है कि हममें भ्रष्ट स्वभाव हैं।) सही कहा—यह वास्तविकता के अनुरूप है। परमेश्वर के खिलाफ तुम्हारा प्रतिरोध और विद्रोह, और सत्य के प्रति समर्पण करने में तुम्हारी असमर्थता खराब काबिलियत के कारण नहीं हैं, वे इसलिए हैं क्योंकि तुममें भ्रष्ट स्वभाव हैं। और इस प्रकार, सिर्फ इसलिए कि तुम परमेश्वर का प्रतिरोध करने में समर्थ हो, तुम परमेश्वर के बारे में यह शिकायत नहीं कर सकते कि उसने तुम्हें खराब काबिलियत दी है। काबिलियत या तुम्हारी जन्मजात स्थितियों का कोई भी दूसरा पहलू स्वाभाविक रूप से एक ऐसी स्थिति है जो खुद तुम्हारे पास है; यह एक अंतर्निहित, जन्मजात स्थिति है जो तुम्हारे एक सृजित प्राणी होने के नाते तुम्हारे पास है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह जन्मजात स्थितियों का कौन-सा पहलू है, यह परमेश्वर का प्रतिरोध करने का कारण नहीं बनता है और इसका भ्रष्ट स्वभावों से कोई संबंध नहीं होता है। उदाहरण के लिए, कद में लंबा होने का मतलब यह नहीं है कि तुम्हारे पास कम भ्रष्ट स्वभाव हैं। सुंदर होने या गोरी त्वचा होने का यह मतलब नहीं है कि तुममें कोई भी स्वभाव भ्रष्ट नहीं है। ऐसी नस्ल में जन्म लेना जिसके बारे में लोग ऊँची राय रखते हैं और जिसका लोग सम्मान करते हैं, उसका यह मतलब नहीं है कि तुममें कोई भ्रष्ट स्वभाव नहीं है। दूसरे शब्दों में, चाहे परमेश्वर ने किसी व्यक्ति को कोई भी जन्मजात स्थिति दी हो और चाहे किसी व्यक्ति की जन्मजात स्थितियाँ कैसी भी हों, उनका उस व्यक्ति के भ्रष्ट स्वभावों से कोई संबंध नहीं होता है। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति का रंग-रूप ही उसके द्वारा परमेश्वर का प्रतिरोध करने का कारण नहीं बनता है। लेकिन, क्योंकि लोगों में भ्रष्ट स्वभाव होते हैं इसलिए जब कोई देखने में सुंदर होता है तो वह सोच सकता है, “मैं सुंदर हूँ इसलिए मेरे पास रुतबा होना चाहिए और मेरा सम्मान किया जाना चाहिए।” ये भ्रष्ट स्वभावों के प्रकाशन हैं। कुछ लोग अपने विशेष कौशलों को सामने लाने के लिए अपनी सुंदरता का उपयोग करते हैं और इस प्रकार कई गलत बयानों और क्रियाकलापों का खुलासा होता है। ये सभी बयान और क्रियाकलाप उनके भ्रष्ट स्वभावों के कारण होते हैं, उनकी जन्मजात स्थितियों के कारण नहीं। चाहे तुम्हारी काबिलियत अच्छी हो या खराब, काबिलियत अपने आप में परमेश्वर का प्रतिरोध करने का कारण नहीं बनती है। अगर तुम्हारी काबिलियत अच्छी है लेकिन तुम सत्य नहीं समझते हो या उसे स्वीकार नहीं करते हो, तो तुम फिर भी परमेश्वर का प्रतिरोध करोगे और उसके खिलाफ विद्रोह करोगे क्योंकि तुममें भ्रष्ट स्वभाव हैं। अगर तुममें खराब काबिलियत है, लेकिन तुम सत्य स्वीकार सकते हो और एक बार जब तुम यह समझ जाते हो कि परमेश्वर तुमसे क्या करने या नहीं करने के लिए कहता है, तो तुम उसका पालन कर सकते हो और तुम अपने भ्रष्ट स्वभावों के आधार पर कार्य नहीं करने में समर्थ हो जाते हो, तो तुम परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह नहीं करोगे और न ही तुम धूर्त और कामचोर बनोगे या लापरवाह, उद्दंड या मनमाने और जल्दबाज बनोगे। चाहे तुममें खराब काबिलियत हो या न हो, जब तक तुममें भ्रष्ट स्वभाव हैं तब तक भले ही तुम परमेश्वर के वचन समझ सको, तुम फिर भी परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करोगे और उसका प्रतिरोध करोगे। क्योंकि तुममें जीवन के रूप में भ्रष्ट स्वभाव हैं, इसलिए तुम स्वाभाविक रूप से विभिन्न शैतानी विचार और दृष्टिकोण, सांसारिक आचरण के शैतानी फलसफे और साथ ही ऐसे शैतानी दृष्टिकोण विकसित करते हो जो इस बात की नींव रखते हैं कि तुम लोगों और चीजों को कैसे देखते हो, और तुम दिखावा करोगे, अपना बचाव करोगे और लगातार दूसरों से अलग दिखना और खुद को दूसरों से ऊपर बनाए रखना चाहोगे और यहाँ तक कि दूसरों को नियंत्रित करना और उन पर राज करना भी चाहोगे। ये सभी अभिव्यक्तियाँ लोगों की शैतानी प्रकृति से उत्पन्न होती हैं। अगर तुम अपनी शैतानी प्रकृति और शैतानी जीवन के आधार पर विभिन्न चीजें करते हो तो चाहे तुम्हारी काबिलियत अच्छी हो या बुरी, तुम परमेश्वर का प्रतिरोध करोगे। काबिलियत अपने आप में परमेश्वर का प्रतिरोध करने का कारण नहीं बनती है। तुममें खराब काबिलियत है, लेकिन जब तक तुम परमेश्वर के वचन समझते हो, तब तक क्या तुम उनके अनुसार कार्य कर सकते हो? अगर तुममें भ्रष्ट स्वभाव नहीं हैं या तुम अपने भ्रष्ट स्वभावों के अनुसार नहीं जीते हो, तो तुम इसे जरूर हासिल कर सकते हो। उदाहरण के रूप में एक विशेष कौशल होने की बात ले लो—लोग अक्सर सोचते हैं, “चूँकि मेरे पास यह विशेष कौशल है, इसलिए मैं दूसरों से बेहतर हूँ; परमेश्वर के घर में मेरे पास रुतबा होना चाहिए, मुझे परमेश्वर के घर में अगुआ या स्तंभ होना चाहिए।” ये विचार विशेष कौशल होने के कारण उत्पन्न नहीं होते हैं बल्कि भ्रष्ट स्वभावों के कारण उत्पन्न होते हैं। क्योंकि लोगों में जीवन के रूप में भ्रष्ट स्वभाव होते हैं, इसलिए वे जो भी प्रकट करते हैं, जीते हैं और प्रदर्शित करते हैं और विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों को देखने में उनके जो परिप्रेक्ष्य, रुख और सिद्धांत होते हैं, वे सभी उनके पास जीवन के रूप में भ्रष्ट स्वभाव होने के कारण होते हैं। ये परमेश्वर द्वारा उन्हें दी गई किसी जन्मजात स्थिति के कारण नहीं होते हैं। तुम समझ रहे हो? (हाँ।) इन वचनों की संगति करने से मेरा क्या मतलब है? इस संगति का उद्देश्य तुम लोगों को अपनी वास्तविक परिस्थिति को और स्पष्ट रूप से समझने और पहचानने में और यह भी पहचानने में सक्षम बनाना है कि तुम्हारी काबिलियत कैसी है—ऐसा व्यक्ति मत बनो जिसके पास कोई सूझ-बूझ नहीं है और औसत या खराब काबिलियत होने पर व्यर्थ प्रयास मत करो या यह दिखाने के लिए व्यर्थ बहाने भी मत दो कि तुम्हारी काबिलियत खराब नहीं है। इन क्रियाकलापों का कोई मूल्य नहीं है। यह संगति तुम्हें अपनी काबिलियत और अपनी विभिन्न क्षमताओं को सटीक रूप से समझने और फिर अपनी उचित स्थिति ढूँढ़ निकालने और अपने उचित स्थान के अनुसार आचरण करने के लिए है। इससे तुम्हें एक उचित सृजित प्राणी बनने, एक सृजित प्राणी के रूप में अपनी स्थिति में उचित रूप से खड़े होने और एक सृजित प्राणी के कर्तव्य पूरे करने में और मदद मिलेगी। यकीनन इससे तुम्हें अपने भ्रष्ट स्वभावों को छोड़ देने में भी कुछ हद तक और मदद मिलेगी। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारी काबिलियत या विभिन्न क्षमताएँ किस स्तर पर हैं, वे उस सीमा को तय नहीं करतीं जिस तक तुम परमेश्वर का प्रतिरोध करते हो और उसके खिलाफ विद्रोह करते हो। दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव तुम्हारी काबिलियत के वर्ग पर निर्भर नहीं करते हैं और वे इस बात पर तो बिल्कुल निर्भर नहीं करते हैं कि तुम्हारी जन्मजात स्थितियाँ कैसी हैं। मनुष्यों के भ्रष्ट स्वभाव उनके जन्मजात, अंतर्निहित देह में उत्पन्न होते हैं। शैतान द्वारा मनुष्यों को भ्रष्ट किए जाने के बाद उनके भ्रष्ट स्वभाव उनका आंतरिक जीवन बन गए। जब तुमने अभी तक अपने भ्रष्ट स्वभाव नहीं छोड़े होते हैं, तब तुम इस शैतानी जीवन के आधार पर बोलने और कार्य करने के लिए अपनी जन्मजात स्थितियों का फायदा उठाते हो। इसका मतलब यह है कि तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव छोड़ देने से पहले उन विभिन्न जन्मजात स्थितियों का फायदा उठा रहे हो जो परमेश्वर ने तुम्हें तुम्हारे अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए दी हैं। और इसलिए, हम यह कह सकते हैं : अगर तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव नहीं छोड़ देते हो तो तुम उन विभिन्न जन्मजात स्थितियों का फायदा उठा रहे हो या उन्हें रौंद रहे हो जो परमेश्वर ने तुम्हें दी हैं; अगर तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव छोड़ देने के लिए सत्य का अनुसरण करने और सत्य का अभ्यास करने की प्रक्रिया में हो तो तुम उचित रूप से और कारगर तरीके से उन विभिन्न जन्मजात स्थितियों का फायदा उठा रहे हो जो परमेश्वर ने तुम्हें दी हैं; जब तुम एक ऐसे व्यक्ति से जिसके पास जीवन के रूप में भ्रष्ट स्वभाव हैं, एक ऐसे व्यक्ति में बदल जाते हो जिसके पास जीवन के रूप में सत्य है, तब तुम उचित रूप से और सही तरीके से—दूसरे शब्दों में, ज्यादा सार्थक तरीके से—उन जन्मजात स्थितियों का उपयोग कर रहे होते हो जो परमेश्वर ने तुम्हें दी हैं। अब तुम समझ रहे हो? जन्मजात स्थितियाँ अपने आप में परमेश्वर के खिलाफ मानवजाति के प्रतिरोध का मूल कारण नहीं हैं। बल्कि लोगों के शैतानी भ्रष्ट स्वभाव और शैतान द्वारा लोगों के भीतर डाला गया जीवन ही परमेश्वर के खिलाफ मानवजाति के प्रतिरोध और विद्रोह का मूल कारण हैं। क्या यही बात नहीं है? (हाँ।) क्या अब यह मुद्दा मूल रूप से तुम्हें स्पष्ट हो गया है? (हाँ।)
6. जन्मजात स्थितियों, मानवता और भ्रष्ट स्वभावों की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ
हमने काबिलियत के विषय पर संगति करने से पहले जन्मजात स्थितियाँ, मानवता और भ्रष्ट स्वभाव, इन तीन पहलुओं की कुछ अभिव्यक्तियों के बारे में संगति की। पिछली बार हमने किन अभिव्यक्तियों के बारे में संगति की थी? (पिछली बार जिन अभिव्यक्तियों के बारे में संगति की गई थी, वे थीं चीजें करने में लगन, चीजों को क्रमबद्ध ढंग से करना, चीजें करने में शुरूआत मजबूत तरीके से करना लेकिन समाप्ति कमजोर तरीके से करना, चीजें करने में सावधानी बरतना और साथ ही, बड़ी-बड़ी बातें करना और डींग हाँकना, लापरवाही, अपना प्रदर्शन करना पसंद करना, गरीबों को तुच्छ समझना और अमीरों की तरफदारी करना, शक्तिशाली लोगों की खुशामद करना, असाधारण याददाश्त होना, वगैरह-वगैरह।) हम इन पर इससे आगे संगति नहीं करेंगे। हम जन्मजात स्थितियों, मानवता और भ्रष्ट स्वभावों के प्रकाशनों की विभिन्न अभिव्यक्तियों के बारे में संगति करना जारी रखेंगे। जब ये अभिव्यक्तियाँ होती हैं, तो तुम्हें पता होना चाहिए कि वे किस प्रकार की अभिव्यक्ति से संबंधित हैं और तुम्हें उनमें अंतर करने और उनका भेद पहचानने में समर्थ होना चाहिए; तभी तुम उन्हें सही तरीके से सँभाल सकते हो। अगर कोई अभिव्यक्ति जन्मजात स्थितियों से संबंधित है, जिन्हें बदला नहीं जा सकता है, तो तुम्हें इसके बारे में चिंता करने की जरूरत नहीं है। अगर यह मानवता की ऐसी कुछ कमियों या दोषों से संबंधित है जिन पर काबू पाया जा सकता है, जिन्हें सुधारा या बदला जा सकता है, तो तुम्हें उन्हें सुधारने और बदलने का प्रयास करना चाहिए। अगर उन पर काबू पाने की कोई जरूरत नहीं है और उनसे तुम्हारे कर्तव्य के निर्वहन या सत्य के तुम्हारे अनुसरण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है तो तुम्हें उन पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है। अगर कोई अभिव्यक्ति न तो जन्मजात स्थितियों की समस्या है और न ही मानवता की समस्या है, बल्कि यह भ्रष्ट स्वभावों से जुड़ी है, तो इसे बदला जाना चाहिए। अगर तुम इसे रूपांतरित नहीं करते हो या नहीं बदलते हो तो जो भ्रष्ट स्वभावों द्वारा नियंत्रित जीवन का रूप तुममें जड़ें जमा रहा है और शक्ति का उपयोग कर रहा है, उसके चलते तुम जो जीते हो और प्रकट करते हो वे सिर्फ मामूली समस्याएँ नहीं हैं, जैसे कि दूसरों के साथ मिलजुलकर नहीं रह पाना या दूसरों को अप्रिय होना और उनकी नैतिक उन्नति करने में विफल होना। बल्कि तुम जो जीते हो और प्रकट करते हो, वह सत्य का उल्लंघन करने, सत्य सिद्धांतों का उल्लंघन करने, परमेश्वर का प्रतिरोध करने, परमेश्वर को ठुकरा देने, परमेश्वर के प्रति विरोधपूर्ण होने और—यहाँ तक कहा जा सकता है—परमेश्वर के विरोध में खड़े होने के स्तर तक पहुँच जाता है। ठीक इसी कारण से भ्रष्ट स्वभाव इस प्रकृति के होते हैं, एक बार जब इन अभिव्यक्तियों में भ्रष्ट स्वभाव जुड़ जाते हैं, तब तुम्हें इन भ्रष्ट स्वभावों को जानना शुरू कर देना चाहिए और फिर सत्य की तलाश करनी चाहिए, सत्य का अभ्यास करने के सिद्धांतों को समझना चाहिए, उन पर पकड़ बना लेनी चाहिए और इन भ्रष्ट स्वभावों को प्रतिस्थापित करने के लिए सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करना चाहिए ताकि ये भ्रष्ट स्वभाव तुम्हारे जीवन को अब और नियंत्रित न करें और उनकी जगह सत्य तुम्हारा जीवन बन जाए और तुम्हारे दैनिक जीवन को और तुम जो जीते हो उसे नियंत्रित करे।
भुलक्कड़पन
हम जन्मजात स्थितियों, मानवता और भ्रष्ट स्वभावों की विभिन्न अभिव्यक्तियों के बारे में संगति करना जारी रखेंगे। पिछली बार हमने जिस अंतिम अभिव्यक्ति के बारे में संगति की थी, वह अच्छी याददाश्त होना था, है ना? (हाँ।) तो फिर भुलक्कड़पन किस पहलू से संबंधित है? (जन्मजात स्थितियों से।) यह एक जन्मजात स्थिति है और मानवता की एक कमी भी है—बस ये दो पहलू हैं। क्या भुलक्कड़पन एक भ्रष्ट स्वभाव है? (नहीं।) जाहिर है नहीं। कुछ लोग इसलिए भुलक्कड़ होते हैं क्योंकि उनकी याददाश्त स्वाभाविक रूप से खराब होती है, जबकि दूसरे लोग दिमाग की उम्र बढ़ने और उम्र बढ़ने के साथ याददाश्त के कमजोर होते रहने के कारण भुलक्कड़ हो जाते हैं। अगर भुलक्कड़पन जन्मजात है, तो यह जन्मजात स्थितियों से संबंधित है; अगर यह अर्जित है तो फिर यह मानवता की एक कमी है। स्वाभाविक रूप से भुलक्कड़ होने को यकीनन एक कमी भी माना जाता है, है ना? (हाँ।)
चीजें करने से पहले योजना बनाने में कुशल होना और विशेष रूप से जोड़-तोड़ करना
चीजें करने से पहले योजना बनाने में कुशल होना—यह किस पहलू से संबंधित है? (मानवता के एक गुण से।) यह मानवता का एक गुण है। जो लोग योजना बनाने में कुशल होते हैं वे कोई चीज करने से पहले ही आगे की योजना बना लेते हैं और फिर आवेगी, लापरवाह या उतावले हुए बगैर उस योजना के अनुसार कदम उठाते हैं। वे सधे हुए तरीके से कार्य करते हैं, सनक में आकर जल्दबाजी में चीजें नहीं करते हैं, बल्कि पहले से विचार करते हैं कि उन्हें कैसे जाना चाहिए, किसके साथ जाना चाहिए, विशेष परिस्थितियों में क्या करना चाहिए, कौन-से दस्तावेज या सामान लाने की जरूरत है, परिवेश के आधार पर कुछ जरूरी दैनिक सामान लाना है या नहीं, वगैरह-वगैरह। वे ये सभी चीजें ध्यान में रख पाने में समर्थ होते हैं। कार्य करने से पहले वे गहन तैयारियाँ करते हैं, ज्यादा कारकों पर विचार करते हैं और ज्यादा बारीकी से सोचते हैं। वे पहले से ही अनुकूल और प्रतिकूल स्थितियों के बीच अंतर का आकलन कर लेंगे और सबसे बेहतर स्थिति और सबसे बुरे संभावित नतीजों में अंतर करेंगे। वे सबसे अच्छे नतीजे हासिल करने के लिए उचित व्यवस्था करेंगे। क्योंकि वे योजना बनाने और उचित व्यवस्था करने में कुशल होते हैं, इसलिए उनके मामले सँभालने का तरीका आमतौर पर ज्यादा विस्तृत होता है। वे जिन चीजों और मार्गों की व्यवस्था करते हैं उनमें अप्रत्याशित स्थितियाँ कम बार उत्पन्न होती हैं और उनके कार्य के नतीजे बेहतर होने की संभावना रहती है। उनके साथ कार्य करने वाले लोग बेचैन महसूस नहीं करते हैं, बल्कि वे ज्यादा सहज महसूस करते हैं। तो क्या यह कहा जा सकता है कि योजना बनाने में कुशल होना, अपेक्षाकृत रूप से कहा जाए तो मानवता के एक गुण से संबंधित है? (हाँ।) उसमें योजना बनाने में कुशल होना शामिल है। तो, हिसाबी होना अच्छा है या नहीं? (यह अच्छा नहीं है। यह मानवता की एक कमी है।) योजना बनाने में कुशल होना मानवता का एक गुण और मजबूत पक्ष है—यह सकारात्मक है—जबकि हिसाबी होना मानवता की एक कमी है। उदाहरण के लिए, अगर दो लोग भोजन करते हैं जिसकी कुल लागत दस युआन आती है और जब भुगतान करते समय कुचक्री व्यक्ति पाँच युआन और पचास सेंट का भुगतान करता है जबकि दूसरा व्यक्ति चार युआन और पचास सेंट का भुगतान करता है तो उसे लगता है : “यह सही नहीं है—उसने पचास सेंट कम भुगतान किया। इसे न्यायसंगत और उचित होने के लिए हर व्यक्ति को पाँच युआन का भुगतान करना चाहिए।” वे इतनी छोटी रकम का भी हिसाब लगाते हैं। अगर उन्हें लगता है कि उन्हें नुकसान हो गया है तो वे बेचैन हो उठते हैं और साजिश के जरिये हमेशा अपने नुकसानों की भरपाई करने के अवसर तलाशते रहते हैं। अगर वे इस तरह से अपने नुकसानों की भरपाई नहीं कर पाते हैं तो वे अच्छी तरह से खा या सो नहीं पाते हैं। हिसाबी होना मानवता की एक कमी है। अगर यह गंभीर हो जाती है और वे बड़े मामलों में भी जोड़-भाग करते हैं, हमेशा दूसरों से लाभ निकालने या उनका फायदा उठाने का प्रयास करते हैं या अपने हिसाबों के लिए बार-बार साजिशों का सहारा लेते हैं तो यह अब सिर्फ मानवता की कमी नहीं रह जाती है, बल्कि इसमें भ्रष्ट स्वभाव भी जुड़े होते हैं। अगर किसी का हिसाबी होना दूसरों को प्रभावित नहीं करता है या उनके हितों को नुकसान नहीं पहुँचाता है और यह सिर्फ दैनिक जीवन के उन मामूली मामलों में ही मौजूद रहता है जिससे अंत में मामलों को सँभालने में बार-बार विफलताएँ होती हैं या खराब नतीजे सामने आते हैं, तो यह मानवता की एक कमी है।
कंजूस होना किस तरह की समस्या है? (मानवता की एक कमी है।) कौन-सी अभिव्यक्तियाँ कंजूस होने की हैं? उदाहरण के लिए, अगर कोई कंजूस व्यक्ति गाड़ी से कहीं जाने वाला है और कोई उससे कहता है, “मैं भी इसी रास्ते से जा रहा हूँ, क्या तुम मुझे लिफ्ट दे सकते हो? इसमें सिर्फ पाँच मिनट लगेंगे और मैं तुम्हें गैस के लिए कुछ पैसे दे सकता हूँ” तो उसे डर रहता है कि लिफ्ट लेने के बाद वह व्यक्ति भुगतान नहीं करेगा और वह उसे लिफ्ट देने से मना करने का बहाना ढूँढ़ता है—यह कंजूस होना है। ऐसे लोग भी होते हैं जो जब कोई उनसे कोई चीज उधार माँगता है और वे उसे वह चीज उधार नहीं देना चाहते हैं तो वे कहते हैं, “मैं अभी इसका उपयोग कर रहा हूँ। मैं वाकई इसे तुम्हें उधार देने की स्थिति में नहीं हूँ। तुम किसी और से माँग लो।” वे बेहद कंजूस और कठोर होते हैं; वे सामान्य पारस्परिक मेल-जोल नहीं रखते हैं और उन्हें इस बात का बहुत ही ज्यादा डर रहता है कि दूसरे उनका फायदा उठा लेंगे जबकि वे खुद हमेशा दूसरों का फायदा उठाने की उम्मीद करते रहते हैं। इसे कंजूस होना कहते हैं। ऐसे भी लोग हैं जो जब तुम भोजन और कुछ दूसरी चीजें खरीदने के लिए दस युआन उधार माँगते हो तो वे इस पर सोच-विचार करते हैं : “मैं भोजन के लिए तुम्हें सिर्फ पाँच युआन उधार दूँगा—उससे एक सेंट भी ज्यादा नहीं!” अगले दिन जब वे तुमसे मिलते हैं तो वे यह तक पूछते हैं, “भोजन कैसा था? क्या तुमने पूरे पाँच युआन खर्च कर दिए?” उनके शब्दों का परोक्ष रूप से यह मतलब होता है, “जल्दी करो और मुझे मेरे पैसे लौटाओ! तुम पर अब भी उस भोजन के पैसे बकाया हैं। अगर तुमने मुझे पैसे नहीं लौटाए तो तुम्हें मुझे एक बार खाना खिलाना होगा!” इस किस्म के लोग अपने स्व-आचरण में बेहद ओछे होते हैं और जोड़-भाग करने में कुशल होते हैं। वे न सिर्फ भौतिक चीजों के मामले में जोड़-भाग करने में कुशल होते हैं, बल्कि पारस्परिक मेल-जोल में भी विशेष रूप से जोड़-भाग करने में कुशल होते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई उनसे क्या कहता है, वे हमेशा उसकी बात का अध्ययन करते हैं और उसके पीछे के मतलब पर विचार करते हैं। अगर उसके शब्द उन्हें नुकसान पहुँचाते हैं या उनके हितों का हनन करते हैं तो वे तुरंत ईंट का जवाब पत्थर से देते हैं। वे बातचीत में भी फायदा उठाने का प्रयास करते हैं और कोई भी नुकसान सहने से साफ-साफ इनकार कर देते हैं। अब यह सिर्फ ओछा या कंजूस होना नहीं रह गया है—यह एक भ्रष्ट स्वभाव है। अगर इसमें रोजमर्रा के भौतिक और वित्तीय लेन-देन में फायदा उठाने और नुकसानों से बचने का प्रयास करना ही शामिल है तो यह सिर्फ मानवता की एक कमी है और यह भ्रष्ट स्वभाव के स्तर तक नहीं बढ़ा है। लेकिन अगर इसमें आचरण करने और कार्य करने के सिद्धांत शामिल हैं तो अब यह मानवता की कमी नहीं रहा बल्कि यह भ्रष्ट स्वभावों के स्तर तक बढ़ चुका है। तो उदारता किससे संबंधित है? (यह मानवता का एक गुण है।) इसे मानवता के गुण के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। उदार लोग दूसरों के साथ मेल-जोल में फायदों और नुकसानों को लेकर बहुत ज्यादा चिंतित नहीं रहते हैं। जब दूसरे लोग उनका छोटा-मोटा फायदा उठाते हैं या उनसे थोड़ा-सा कुछ ले लेते हैं या कभी-कभार जब कोई उन्हें उनसे उधार लिया हुआ पैसा वापस करने में विफल रहता है तो वे वाकई ऐसी चीजों का हिसाब नहीं लगाते हैं। वे दूसरों के प्रति अपेक्षाकृत उदार और सहनशील होते हैं—यह मानवता का एक गुण है।
ओछापन
ओछापन किस तरह की समस्या है? (यह मानवता की एक कमी है।) यह मानवता की एक कमी है। ओछेपन की क्या अभिव्यक्तियाँ हैं? (छोटी-छोटी बातों पर ज्यादा परेशान होने की प्रवृत्ति होना।) उदाहरण के लिए, भोजन के दौरान अगर तुम किसी ओछे व्यक्ति से कहते हो, “वाकई तुम्हारी भूख बहुत ज्यादा है—तुम ज्यादातर लोगों से ज्यादा खाते हो” तो उसे गुस्सा आ जाता है : “क्या तुम मुझे भुक्खड़ कह रहे हो?” तुमने कोई ऐसी टिप्पणी की जिससे अनजाने में उसे ठेस पहुँची या वह परेशान हो गया और वह इसे दिल पर ले लेता है और इसे जाने नहीं देता। वह आधे महीने तक तुमसे नाराज रह सकता है और तुमसे बात करने से इनकार कर सकता है और तुम्हें कोई अंदाजा नहीं होगा कि इसका क्या कारण है। दरअसल तुम उसका मजाक उड़ाने के इरादे से नहीं, बस यूँ ही एक टिप्पणी कर रहे थे लेकिन वह अचानक इस टिप्पणी को बड़ा बना देता है, यह मानता है कि उसका मजाक उड़ाया जा रहा था। वह इस छोटी-सी बात को भी दिल पर ले लेता है और उसे अंतहीन रूप से बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है, बात का बतंगड़ बना देता है और बिल्कुल कोई क्षमा भाव नहीं दिखाता—यह ओछापन है। इस तरह का व्यक्ति कितना ओछा हो सकता है? वह बच्चों की तरह मनमौजी हो सकता है—कोई भी उसे उकसाने की हिम्मत नहीं करता। उससे मेल-जोल रखते समय तुम्हें हमेशा सावधान रहना पड़ता है, तुम उससे सामान्य ढंग से बात करने की हिम्मत नहीं करते क्योंकि अगर तुमने ऐसा किया तो तुम जो भी कहोगे, वह उसे अपमानित कर सकता है या ठेस पहुँचा सकता है और इसके दुष्परिणाम होंगे—अगली बार जब उससे तुम्हारी मुलाकात होगी तो उसका मुँह फूला होगा, वह तुमसे नजरें चुराएगा और यहाँ तक कि चीजों को पटकेगा। अगर तुम उससे बात करने का प्रयास करोगे तो वह तुम्हें नजरअंदाज कर देगा। न तो उससे चीजों के बारे में बात करना और न ही उसे मनाने का प्रयास करना काम करेगा। अगर तुम उसके पास बैठोगे तो वह तुमसे दूर हट जाएगा और तुम्हें नजरअंदाज कर देगा। उसकी उम्र चाहे कुछ भी हो, वह हमेशा बच्चों की तरह नखरे दिखाता है और मनमाने ढंग से कार्य करता है—क्या यह ओछापन नहीं है? (हाँ।) यह मानवता की एक कमी है। इस तरह के लोगों के साथ मिलजुलकर रहना बहुत ही मुश्किल है। जब भाई-बहन एक-दूसरे की कमियों पर ध्यान दिलाते हुए खुले दिलों से संगति करते हैं, तब इस किस्म के लोगों की किसी भी कमी की ओर ध्यान दिलाने की हिम्मत कोई नहीं करता है। लेकिन अगर उन्हें संगति में शामिल नहीं किया जाता है, तो वे असंतुष्ट हो जाते हैं और उनके मन में कुछ विचार आने लगते हैं : “तुम सभी मिलकर खुले दिलों से संगति करते हो, एक-दूसरे की मदद करते हो, लेकिन तुम मुझसे भाई-बहन की तरह पेश नहीं आते।” उनसे कुछ भी नहीं कहना ठीक नहीं है—तुम्हें उनसे थोड़ा-सा कुछ तो कहना पड़ेगा : “तुम बहुत अच्छे हो, लेकिन कभी-कभी तुम्हारा मिजाज इतना अच्छा नहीं रहता है। लेकिन हमारी भी अपनी गलतियाँ हैं और हम अक्सर इस बात पर ध्यान नहीं देते हैं कि हम क्या कह रहे हैं।” अगर तुम इसे इस तरह शब्दों में व्यक्त नहीं करते हो और सिर्फ यह कहते हो कि वे बदमिजाज हैं और वे संकीर्ण विचारों वाले हैं, तो यह काम नहीं करेगा—उन्हें गुस्सा आ जाएगा। उनसे मेल-जोल रखते समय तुम्हें विशेष रूप से सतर्क रहना होगा और सावधानी से बोलना होगा। अगर तुम कोई ऐसी चीज कहते हो जो अनुचित है तो तुम्हें इसके नतीजे भुगतने होंगे। इसलिए उनसे मेल-जोल रखना विशेष रूप से थकाऊ होता है। अविश्वासियों के पास इसके लिए एक शब्द है, वे कहते हैं कि इस किस्म के लोगों के पास “काँच के दिल” होते हैं जिसका मतलब है कि उन्हें विशेष रूप से आसानी से ठेस लग जाती है। इस तरह के लोग तुरंत आहत हो जाते हैं, रोना शुरू कर देते हैं, खाना खाने से मना कर देते हैं, सो नहीं पाते हैं और नकारात्मक हो जाते हैं। वे कहते हैं, “तुम सभी कहते हो कि मैं अच्छा व्यक्ति नहीं हूँ। तुम लोगों में से कोई भी मुझे पसंद नहीं करता है, तुम लोगों में से कोई भी मुझसे गपशप नहीं करता है और तुम सभी मुझसे दूर भागते हो और मेरे आस-पास नहीं रहना चाहते।” क्या यह बचकाना नहीं है? (हाँ।) कोई कहता है, “तुम्हारा दिल बहुत नाजुक है, काँच की तरह—यह जरा-सी चोट लगते ही टूट जाता है। कौन तुम्हें उजागर करने की हिम्मत करेगा? कौन तुम्हारे साथ मेल-जोल रखने की हिम्मत करेगा? हर कोई ऐसा करने से डरता है।” यह कहना कि इस किस्म के लोगों में बुरी मानवता होती है वस्तुनिष्ठ नहीं होगा—वे वाकई किसी भी बुरे कर्म में शामिल नहीं होते हैं। बात बस इतनी है कि वे बहुत ही चिड़चिड़े होते हैं—वे मनमौजी, जरा-सी बात पर चिढ़ने वाले और बच्चों जैसे मिजाज वाले होते हैं। तुम उनसे टकरा नहीं सकते या उन्हें उकसा नहीं सकते। अगर तुम उनके प्रति क्षमाशील होते हो तो वे कहते हैं कि तुम उन्हें नीची नजर से देखते हो और उन्हें गंभीरता से नहीं ले रहे हो; अगर तुम उनके साथ गंभीर होते हो तो वे कहते हैं कि तुम उनमें मीन-मेख निकाल रहे हो—चाहे तुम कुछ भी करो, यह गलत ही होता है। इस किस्म के लोगों से मेल-जोल रखते समय अगर उनसे पेश आने का तुम्हारा तरीका उपयुक्त है और तुम उन्हें खुश करने में कामयाब हो जाते हो तो भले ही उनकी काबिलियत कुछ हद तक खराब हो, वे अपना कर्तव्य अच्छी तरह से कर सकते हैं। लेकिन अगर उनसे पेश आने का तुम्हारा तरीका उपयुक्त नहीं है और कोई चीज उन्हें परेशान कर देती है, तो वे नकारात्मक हो जाते हैं और तुम्हें उन्हें खुश करने के तरीकों के लिए अपना दिमाग खपाना पड़ता है। जो लोग ओछे होते हैं, वे बहुत परेशान करने वाले होते हैं। किसी मामूली-सी बात पर वे एक लंबे अरसे तक रो सकते हैं, इस हद तक कि उनकी आँखें बहुत लाल हो जाती हैं। अगर कोई मामूली-सी बात उनकी इच्छा के मुताबिक नहीं होती है, तो वे घंटों मुँह फुलाए रह सकते हैं। जब वे गुस्से में होते हैं, तब आधे महीने तक दूसरों पर ध्यान दिए बिना या दूसरों से बात किए बिना रह सकते हैं। इस तरह के लोग बदमिजाज होते हैं और ओछे होते हैं, लेकिन फिर भी वे वह कार्य करते हैं जो उन्हें करना चाहिए—बात बस इतनी है कि वे इसे गुस्से से करते हैं। एक बार जब उनका मिजाज ठीक हो जाता है तो वे फिर से अच्छी तरह से कार्य कर सकते हैं। कुल मिलाकर उनकी मानवता की यह कमी और समस्या गंभीर है। वे तनावपूर्ण माहौल बनाने और अपने लिए और दूसरों के लिए परेशानी का कारण बनने और अपने पर और दूसरों पर बोझ डालने की संभावना रखते हैं। इस किस्म के लोगों में सांसारिक आचरण के लिए वयस्कों जैसी दरियादिली या वयस्कों जैसा रवैया नहीं होता है। वे कुछ हद तक लगभग दस वर्ष के बच्चों जैसे होते हैं—तुम यह नहीं कह सकते कि वे समझदार हैं क्योंकि वे वाकई समझदार नहीं होते हैं, लेकिन तुम यह भी नहीं कह सकते कि वे अपरिपक्व हैं क्योंकि वे हमेशा वयस्कों की तरह बोलते हैं। अगर तुम उनसे वयस्कों जैसे पेश आते हो, तो यह संभव है कि तुम जो कुछ भी कहो वह उन्हें नाराज कर दे और उन्हें बेबस महसूस करवाए जिससे वे अचानक बच्चों की तरह नखरे करने लगें। लेकिन अगर तुम उनसे बच्चों की तरह पेश आते हो, तो उन्हें लगता है कि तुम उन्हें नीची नजर से देख रहे हो। संक्षेप में, वे बहुत असामान्य होते हैं। यह मानवता की एक कमी है। अगर किसी में इस तरह की समस्या है तो उसे बदल जाना चाहिए और सहनशील और धैर्यवान बनना सीखने का, मुद्दों को सही तरीके और सही रवैये से देखना और सँभालना और सामान्य लोगों के तर्कसंगत ढंग से दूसरों से मेल-जोल रखना सीखने का प्रयास करना चाहिए। भले ही ज्यादातर लोग सत्य या चीजों को करने का सही तरीका स्वीकार न करें, तुम्हें इससे बेबस या प्रभावित नहीं होना चाहिए और न ही तुम्हें इससे प्रतिबंधित या बाध्य होना चाहिए। तुम्हें फिर भी चीजों को सही तरीके से करने पर डटे रहना चाहिए। भले ही तुम्हें लगे कि यह मुश्किल है, लेकिन हार मत मानो—यह भी सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा है। धीरे-धीरे तुम्हारी मानवता, अंतर्दृष्टि और दूसरे पहलू परिपक्व हो जाएँगे और तुम्हारा विकास होगा। विकास का चिह्न क्या है? यह ज्यादातर लोगों के साथ तालमेल बिठाकर निभाने में समर्थ होना है; यह जब कोई तुमसे कुछ अप्रिय कहता है, मजाक करता है या तुम्हें कुछ दुखदायी कहता है, उसे सही ढंग से सहन करने, उसे समझने और उसे सँभालने में समर्थ होना है। अगर तुम्हें दूसरों की कही बात अप्रिय लगती है लेकिन वह तुम्हारी वास्तविक परिस्थिति दर्शाती है, तो तुम्हें इसे स्वीकारना और मान लेना चाहिए। अगर कोई अनजाने में कुछ ऐसा कह देता है जिससे तुम नाराज हो जाते हो और तुम देखते हो कि यह अनजाने में हुआ, तो तुम्हें सहनशीलता का अभ्यास करना चुनना चाहिए। अगर कोई जानबूझकर तुम्हें निशाना बनाता है और कुछ बहुत ही ठेस पहुँचाने वाली बातें कहता है, तो तुम्हें शांत होने, परमेश्वर से प्रार्थना करने और यह तलाश करने की जरूरत है : “वह मुझे क्यों ऐसे निशाना बना रहा है? उसका क्या इरादा है? क्या वह कोई कुकर्मी है या यह किसी भ्रष्ट स्वभाव का प्रकाशन है? अगर वह कोई कुकर्मी है तो मुझे उसके प्रति ज्यादा सूझ-बूझ वाला होने और उससे सावधान रहने की जरूरत है। अगर वह जो कहता है वह सही है और सत्य के अनुरूप है तो मैं इसे स्वीकारूँगा; अगर वह गलत है तो फिर उससे बहस करने की भी कोई जरूरत नहीं है। अगर वह कोई भ्रष्ट स्वभाव प्रकट कर रहा है तो मैं देखूँगा कि वह सत्य स्वीकार सकता है या नहीं। अगर वह सत्य स्वीकार सकता है तो मैं उसके साथ सत्य की संगति करूँगा। अगर वह सत्य नहीं स्वीकारता है तो मैं सिर्फ सहनशीलता का अभ्यास कर सकता हूँ।” क्या इससे मुद्दा हल नहीं हो जाता है? इस तरीके से जब तुम सभी तरह के लोगों से मेल-जोल रखते हो तो तुम यह आपसी सहनशीलता और आपसी सहयोग से कर सकते हो और उनके साथ तालमेल बिठाकर मिलजुलकर रह सकते हो—यह एक ओछा व्यक्ति होने से हमेशा बेहतर है। ओछे लोग एक लिहाज से दूसरों के लिए काफी बेचैनी लेकर आते हैं और दूसरे लिहाज से वे किसी भी समूह का हिस्सा नहीं बन पाते हैं, बहुत अलग-थलग और अजीब दिखाई पड़ते हैं। कुछ रहमदिल लोगों को तुम पर दया आ जाएगी और हर कोई वास्तव में तुम्हारी मदद करना चाहेगा क्योंकि तुम सभी भाई-बहन हो, लेकिन जब तुम हमेशा खुद को अलग-थलग रखते हो और इस तरह से अकेले रहते हो तो क्या तुम्हें नहीं लगता कि दूसरों को तुम अजीब लगते हो? (हाँ।) तुम अजीब क्यों हो? वह इसलिए क्योंकि तुममें मानवता की यह कमी है, इसलिए तुम्हें इस पर काबू पाने और धीरे-धीरे बदलने के लिए कार्य करना चाहिए, है ना? (हाँ।)
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?