सत्य का अनुसरण कैसे करें (8) भाग छह

लोगों से घुलना-मिलना पसंद करना और एकांतप्रिय होना

लोगों से घुलना-मिलना पसंद करना—यह कौन-सा पहलू है? (एक जन्मजात स्थिति है।) यह एक जन्मजात स्थिति है, लोगों के समूहों के बीच सांसारिक आचरण की एक विधि है। कुछ लोग दूसरों से मेल-जोल रखना पसंद करते हैं, वे इससे कभी नहीं थकते हैं और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि दूसरे लोगों का व्यक्तित्व कैसा है, वे उनसे मेल-जोल रखने में समर्थ होते हैं और इसके इच्छुक होते हैं। लेकिन कुछ लोग भीड़ से बचना पसंद करते हैं और दूसरों से मेल-जोल रखने के इच्छुक नहीं होते हैं। इसका कुछ हद तक व्यक्ति के जन्मजात व्यक्तित्व से संबंध है। जब इसमें व्यक्तित्व शामिल होता है तो इसमें निश्चित रूप से जन्मजात स्थितियाँ शामिल होती हैं। लोगों से घुलना-मिलना पसंद करना व्यक्ति के व्यक्तित्व से संबंधित है; इसमें मानवता के गुण या कमियाँ शामिल नहीं हैं और यकीनन इसमें कोई भ्रष्ट स्वभाव शामिल नहीं है। यह अपेक्षाकृत सादी अभिव्यक्ति है। एकांतप्रिय होना—यह किस पहलू में शामिल है? (यह व्यक्ति के जन्मजात व्यक्तित्व का हिस्सा है।) (यह मानवता की एक कमी है।) यहाँ कुछ मतभेद है—तो आखिर एकांतप्रिय होना किस तरह का मुद्दा है? (एकांतप्रिय होना बताता है कि व्यक्ति का व्यक्तित्व खराब है।) खराब व्यक्तित्व होना मानवता की एक कमी है। व्यक्तित्व खुद भी व्यक्ति की जन्मजात स्थितियों का एक पहलू है, इसलिए एकांतप्रिय होने का यह लक्षण एक जन्मजात स्थिति और मानवता की कमी दोनों ही है। यह किसी भ्रष्ट स्वभाव से संबंधित नहीं है और इसमें व्यक्ति का स्व-आचरण शामिल नहीं है। एकांतप्रिय होने का मतलब है हमेशा लोगों से दूर रहना, दूसरों के साथ अपने विचार साझा करने के लिए इच्छुक नहीं होना, चीजें अकेले करना पसंद करना, दूसरों से मेल-जोल रखना नापसंद करना और लोगों के बीच रहना नापसंद करना। ऐसे लोग केवल एकांत परिवेश या एक कोने में रहना पसंद करते हैं। जब वहाँ बहुत-से लोग होते हैं, तब वे बात करने के इच्छुक नहीं होते हैं। वे दूसरों से संवाद करने में अच्छे नहीं होते हैं। जब वे दूसरों से संवाद करते हैं, तब वे बेचैन और भयभीत महसूस करते हैं या अंत में कुछ शर्मिंदा करने वाली और अजीब परिस्थितियों में फँस जाते हैं। यह जन्मजात स्थितियों के भीतर व्यक्तित्व का मुद्दा है और यकीनन यह मानवता की कमी भी है, है ना? (सही कहा।)

दब्बू होना और दबंग होना

चलो, अब दब्बू होने पर एक नजर डालें—यह किस तरह का मुद्दा है? (एक जन्मजात स्थिति है।) (मानवता की एक कमी है।) यह एक जन्मजात स्थिति है और मानवता की एक कमी भी है। मुझे बताओ, दब्बू होने का क्या मतलब है? रात में बाहर जाने से डरना, चूहों, कनखजूरों और बिच्छुओं से डरना, मुसीबत में पड़ने से डरना और जटिल मुद्दों का सामना करने का इच्छुक नहीं होना—ये सब दब्बू होने की अभिव्यक्तियाँ हैं। कुछ लोग साँप को देखकर डर से बेहोश हो जाते हैं। कुछ लोग कार दुर्घटना के बारे में सुनकर इतना डर जाते हैं कि उनका पूरा शरीर काँप उठता है। कुछ लोग यह सुनकर कि परमेश्वर में विश्वास रखने वालों का उत्पीड़न किया जाता है, उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है, सजा सुनाई जा सकती है और कैद किया जा सकता है, इतना डर जाते हैं कि वे विश्वास रखने की हिम्मत नहीं करते हैं। फिर ऐसे लोग भी हैं जो रोलर कोस्टर की सवारी करने की हिम्मत नहीं करते हैं। ऐसे लोग किसी भी चीज में हिस्सा लेने या कोई भी चीज आजमाने की हिम्मत नहीं करते हैं अगर उसमें जरा-सा भी कुछ ऐसा है जिसकी वे असलियत नहीं देख पाते हैं या अगर यह कोई ऐसी चीज है जो उन्होंने पहले नहीं की है। वे न सिर्फ खतरनाक कार्य या खतरनाक गतिविधियाँ आजमाने की हिम्मत नहीं करते हैं, बल्कि वे उन चीजों को करने से भी डरते हैं जो सामान्य लोगों को दैनिक जीवन में करनी चाहिए। उदाहरण के लिए, अगर उनसे कार चलाना सीखने के लिए कहा जाता है तो वे कहते हैं, “मैं गाड़ी चलाने की हिम्मत नहीं करता। सड़क पर इतनी सारी गाड़ियाँ हैं और वे इतनी तेज़ रफ्तार से चलती हैं—अगर उन्होंने मुझे टक्कर मार दी तो क्या होगा?” कोई कहता है, “तुम हमेशा कार दुर्घटना के बारे में क्यों फिक्र करते रहते हो? क्या तुम कार चलाते समय बस थोड़ा अधिक सावधान नहीं रह सकते?” लेकिन वे अब भी डरते हैं : “एक बार जब कार चलना शुरू कर देती है तो वह मेरे काबू से बाहर हो जाती है। अगर वाकई कोई दुर्घटना होती है तो कोई भी इस पर काबू नहीं रख सकता!” वे हमेशा नकारात्मक दिशा में सोचते हैं, इसलिए वे कुछ भी हासिल नहीं कर पाते हैं। दब्बू होना एक जन्मजात स्थिति है और यह मानवता की एक कमी भी है। दब्बू लोग जो भी चीज करते हैं उसमें बहुत ही ज्यादा सतर्क और सावधान रहते हैं। वे आमतौर पर बड़ी गलतियाँ नहीं करते हैं या बड़े गलत काम नहीं करते हैं। लेकिन किसी भी परिप्रेक्ष्य से इसे गुण नहीं माना जा सकता है—यह मानवता की एक कमी है। फिर दबंग होने के बारे में क्या कहना है? दबंग होने के साथ आमतौर पर किन शब्दों को जोड़ा जाता है? (बेवकूफी भरे ढंग से दबंग होना, दबंगता के कारण बेतहाशा कार्य करना।) “दबंगता के कारण बेतहाशा कार्य करना,” “चौंका देने वाले ढंग से दबंग होना,” और “बदतमीजी से दबंग होना” इन सभी का मतलब दबंग होना है। तो दबंग होना अच्छा है या नहीं? (यह मामले पर निर्भर करता है।) यह परिस्थिति और वे किस तरह के व्यक्ति हैं इस पर निर्भर करता है। अगर मानवता के परिप्रेक्ष्य से देखा जाए तो दबंग होने को गुण या कमजोरी के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता—हम इसे एक जन्मजात स्थिति के रूप में वर्गीकृत करेंगे। व्यक्ति की दबंगता पर मामले के लिहाज से विचार किया जाना चाहिए; इसके अलावा, तुम्हें यह देखना पड़ेगा कि उसके पास चीजें करने की सीमाएँ हैं या नहीं और उसका चरित्र कैसा है। अगर उसका चरित्र खराब है तो दबंगता के कारण वह कानून तोड़ सकता है, बुराई कर सकता है, अपराध कर सकता है, फायदा उठा सकता है, गलत तरीके से लाभ प्राप्त कर सकता है और हर जगह दूसरों को ठग सकता है और धोखा दे सकता है। अगर कोई उन्हें गलत काम करने के लिए पैसे दे तो वे इसे करने में सक्षम होते हैं। फायदा उठाने के लिए वे नतीजों की परवाह किए बिना या दूसरों के बारे में विचार किए बिना कोई भी बुरा कर्म करने की हिम्मत करते हैं। क्या इस तरह से दबंगता के कारण बेतहाशा कार्य करना अच्छा है? (नहीं।) कुछ लोग अपने कारोबार की खातिर हर जगह दूसरों को धोखा देते हैं। वे गैर कानूनी कारोबार चलाते हैं—यह वास्तविक परिचालनों के बिना सिर्फ एक दिखावटी कंपनी होती है। लेकिन अपनी दबंगता और धोखा देने की अपनी क्षमता के कारण वे थोड़े समय के लिए बहुत सारा पैसा कमाते हैं, आलीशान घरों में रहते हैं और सेडान चलाते हैं—वे बहुत ही अच्छा जीवन जीते हैं, लेकिन वे जिस पैसे और भौतिक संपत्ति का आनंद लेते हैं वह सब कुछ उनकी दबंगता के फलस्वरूप धोखे से प्राप्त किया गया है। क्या यह अच्छी बात है? मुझे बताओ, क्या यह दबंगता अच्छी है? (नहीं।) इसलिए जब दबंग लोगों की बात आती है तब तुम्हें उनके द्वारा अपनाए गए मार्ग को देखना पड़ेगा। अगर वे अपनी दबंगता के कारण दूसरों को ठगने और धोखा देने की हिम्मत करते हैं तो वे बहुत बुरा कर्म कर रहे हैं। जितना ज्यादा तुम दूसरों को धोखा दोगे और जितना ज्यादा तुम दूसरों का फायदा उठाओगे, भविष्य में तुम्हें उतनी ही कड़ी सजा मिलेगी, है ना? क्या इससे विपत्ति नहीं आती है? (हाँ।) अगर तुम दब्बू हो और दूसरों को ठगना और धोखा देना चाहते हो तो तुम थोड़ा कम धोखा दोगे और भविष्य में तुम्हें जो सजा मिलेगी वह हल्की सजा होगी। इसलिए जो लोग सही मार्ग पर नहीं चलते हैं, क्या उनके लिए कुछ हद तक दब्बू होना बेहतर है या कुछ हद तक दबंग होना? (कुछ हद तक दब्बू होना बेहतर है।) जो लोग सही मार्ग पर नहीं चलते हैं, जो दूसरों को ठगने और धोखा देने में सक्षम होते हैं, जो कानून की परवाह नहीं करते हैं और हमेशा छप्पर-फाड़ लाभ कमाने के लिए कानूनी खामियों का फायदा उठाने का प्रयास करते हैं और जो कभी भी कानून तोड़ सकते हैं, उनके लिए दबंगता एक विपत्ति है—यह उनकी मानवता की एक कमी और विफलता है। दूसरी तरफ, दब्बू होना एक अच्छी चीज बन जाती है—यहाँ तक कि यह उनके लिए एक बचाव भी है। दब्बू लोग कुछ पैसे कमाते हैं ताकि वे अपने परिवार और अपनी मूलभूत जरूरतें पूरी कर सकें और कुछ ऐशो-आराम का भी आनंद ले सकें और वे वहीं रुक जाते हैं। भविष्य में उन्हें जो सजा मिलेगी वह हल्की होगी। दबंग लोग बेतहाशा गलत कर्म करने, दूसरों को धोखा देने और ठगने की हिम्मत करते हैं, दूसरों की चीजें ले लेते हैं ताकि उनके पास आनंद लेने के लिए ज्यादा चीजें हों। वे दूसरों का फायदा उठाते हैं—क्या उन्हें भविष्य में इसकी भरपाई नहीं करनी पड़ेगी? (हाँ।) अगर उन्हें अगला जन्म मिला तो उन्हें जो सजा मिलेगी वह कड़ी सजा होगी—हो सकता है कि वे एक या दो जन्मों में भी इसकी पूरी भरपाई न कर पाएँ। कुछ लोग अपना पूरा जीवन रेस्टोरेंट चलाने या कारोबार करने में बिता देते हैं, संपत्ति में दस-बीस लाख या यहाँ तक कि एक करोड़ तक कमाते हैं, फिर भी उन्हें खुद इसका आनंद लेने का मौका नहीं मिलता है क्योंकि यह सब कुछ कर्ज चुकाने में उपयोग हो जाता है। यहाँ तक कि जब वे सत्तर-अस्सी वर्ष की आयु तक पहुँचते हैं, तब भी उन्होंने कर्ज चुकाने का काम पूरा नहीं किया होता है। यहाँ क्या चल रहा है? यह कर्मों का फल है—शायद ऐसा इसलिए है क्योंकि अपने पिछले जन्मों में उन्होंने लालच में आकर दूसरों से बहुत ज्यादा ले लिया था, इसलिए वे बाद के इन कई जन्मों में कर्ज चुकाए जा रहे हैं। क्या ऐसा नहीं है कि अपने पिछले जन्मों में वे बहुत ही ज्यादा लालची, बहुत ही ज्यादा दबंग थे और उन्होंने बहुत ही ज्यादा दूसरों का फायदा उठाया जिसके फलस्वरूप उन्हें अपने मौजूदा जीवन में कर्मों का फल मिल रहा है? (हाँ।) जो लोग सही मार्ग पर नहीं चलते हैं उनके लिए जरा-सा दब्बू होना एक बचाव है, जबकि दबंगता एक बुरी निशानी है।

अगर कोई व्यक्ति सही मार्ग पर चलता है तो क्या दबंगता अच्छी है? (हाँ।) इसमें क्या अच्छा है? (अगर वह दबंग है तो वह उत्पीड़न का सामना करते समय भी परमेश्वर में विश्वास रखना जारी रख सकता है।) इस दबंगता का मतलब सिर्फ दैहिक साहस नहीं है। अगर यह दैहिक साहस वाली दबंगता है तो यह दुस्साहस और उतावलापन है—यह कुछ हद तक आवेगशील और अंधी दबंगता है। उदाहरण के लिए, अगर तुम दबंग हो और तुम्हें परमेश्वर में विश्वास रखने के कारण गिरफ्तार किया जाता है तो क्या तुम यातनाएँ दिए जाने से डरोगे? क्या तुम मौत से डरोगे? क्या तुम बीस-तीस वर्षों तक कैद में डाले जाने से डरोगे? अगर तुम डरोगे तो जब तुम परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू करते हो तब तुम्हारा यह कहना कि “मैं नहीं डरता” दुस्साहस है, यह सच्ची दबंगता नहीं है। कौन-सी अभिव्यक्ति दुस्साहस नहीं है? वह है जब तुम परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू करते हो तब तुममें कुछ साहस होता है, लेकिन तुममें सच्ची आस्था भी होती है। इस सच्ची आस्था का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि परमेश्वर में विश्वास रखने में तुम्हारे पास संकल्प है : “अगर परमेश्वर में विश्वास रखने के कारण मेरा उत्पीड़न किया जाता है, मुझे गिरफ्तार किया जाता है और मुझे यातनाएँ दी जाती हैं तो मुझे अपना जीवन न्योछावर करने के लिए तैयार रहना चाहिए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मुझे कितना या किस हद तक सताया जाता है, मैं कलीसिया से गद्दारी नहीं करूँगा या यहूदा नहीं बनूँगा—मैं मौत से नहीं डरता!” यह एक पहलू है। दूसरा पहलू यह है कि अगर तुम्हें सच में गिरफ्तार कर लिया जाता है और तुम्हारा उत्पीड़न किया जाता है और बड़ा लाल अजगर तुमसे कलीसिया से गद्दारी करवाने के लिए तुम्हें धमकाता है तो तुम शैतान की चालों की असलियत देख सकते हो और उसके द्वारा बेबस नहीं होते हो और अपनी गवाही में डटे रह सकते हो, यह कह सकते हो, “किसी व्यक्ति का सब कुछ, जिसमें उसका जीवन और मृत्यु भी शामिल है, परमेश्वर के हाथ में है। मैं नहीं डरता!” यह न तो दुस्साहस है और न ही महज साहस; यह सच्ची आस्था है। इस सच्ची आस्था को रखना और अपनी गवाही में डटे रह पाना तुम्हारा गुण है। मान लो कि तुममें सच्ची आस्था नहीं है और तुम सिर्फ कहते हो, “मैं नहीं डरता—सबसे बुरा क्या होगा, बस मृत्यु,” लेकिन जब तुम गिरफ्तारी का सामना करते हो तब तुम इतना डर जाते हो कि अपनी पैंट गीली कर देते हो। गिरफ्तार होने के बाद पहली चीज जो तुम सोचते हो वह है, “क्या मुझे यातनाएँ दी जाएँगी? क्या मेरा देह कष्ट सहेगा? अगर मेरे शरीर को बिजली के लोहे से दागा जाता है तो क्या मैं इसे झेल पाऊँगा? अगर यातना बहुत तेज़ हुई तो क्या मैं मर जाऊँगा? अगर मैं मर गया तो क्या परमेश्वर मुझे याद नहीं रखेगा? क्या मैं उद्धार प्राप्त नहीं कर पाऊँगा? अगर मैं वाकई इसे सहन नहीं कर पाया तो मैं कलीसिया से गद्दारी करूँगा और यहूदा बन जाऊँगा। अगर यहूदा बनने के बाद मुझे सजा दी जाती है और मुझे मिटा दिया जाता है तो यही सही—कम-से-कम मुझे अभी तो दर्द सहना नहीं पड़ेगा।” ऐसे में क्या तुम अपनी गवाही नहीं खो रहे हो? मान लो कि फिर कम्युनिस्ट पार्टी तुम्हें धमकाती है, तुम्हारे परिवार का उपयोग करके तुम्हें ब्लैकमेल करती है—तुम्हारे बच्चों को विश्वविद्यालय जाने की अनुमति नहीं देती है, तुम्हारे माता-पिता को चिकित्सा बीमा की पहुँच से इनकार करती है, तुम्हारे परिवार के सभी अधिकार छीन लेती है—तो तुम डर जाओगे और तुम्हारे पास सच्ची आस्था नहीं होगी। तुम्हारा साहस कहाँ चला गया होगा? क्या तुम सच में दबंग हो? अगर तुममें सच्ची आस्था नहीं है तो तुम्हारी दबंगता सिर्फ दुस्साहस है। तुम्हारा साहस सिर्फ तभी सच्चा होता है जब तुममें सच्ची आस्था होती है। अगर तुम गिरफ्तार किए जाने से पहले सोचते हो, “परमेश्वर मुझे गिरफ्तार नहीं होने देगा,” और इस विचार के कारण तुम साहसी बन जाते हो तो यह सच्चा साहस या सच्ची आस्था नहीं है। मान लो कि गिरफ्तार किए जाने से पहले ही तुमने इन सब बातों पर गहराई से सोच-विचार कर लिया है और तुम कहते हो, “व्यक्ति का जीवन और मृत्यु परमेश्वर के हाथ में है। अगर परमेश्वर सच में मेरा जीवन ले लेना चाहता है तो मुझे समर्पण कर देना चाहिए। जहाँ तक मेरे भविष्य के गंतव्य की बात है, वह परमेश्वर के एक वचन से तय होता है। परमेश्वर मेरे साथ जैसा भी व्यवहार करता है और मुझे जो भी गंतव्य देता है, वह सब कुछ परमेश्वर की धार्मिकता है और मैं समर्पण करूँगा। अगर परमेश्वर मेरे जेल में मरने की व्यवस्था करता है तो यह मेरा सम्मान है—मैं यह जीवन परमेश्वर को अर्पित करने को तैयार हूँ। चाहे मैं कितने भी बड़े कष्ट का अनुभव करूँ, मेरा एक स्थिर जीवन-सिद्धांत रहेगा, जो यह है कि मैं अपना जीवन परमेश्वर के हाथ में सौंपता हूँ और चाहे शैतान मुझे कैसे भी सताए, मुझे तबाह करे या मुझे यातनाएँ दे, मैं कभी भी उसके आगे नहीं झुकूँगा। मैं इस बात से चिंतित नहीं हूँ कि मैं मर जाऊँगा या नहीं। अगर मैं मर भी जाता हूँ तो यह परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन होगा और उसने इसे पूर्वनियत किया होगा। मैं फिर भी परमेश्वर का धन्यवाद करूँगा और उसकी तारीफ करूँगा!” तुममें इसी तरह की आस्था होनी चाहिए; सिर्फ ऐसी आस्था से ही तुममें सच्चा साहस हो सकता है। मान लो कि गिरफ्तार किए जाने से पहले, तुम्हारे साथ वाकई ऐसा होने से पहले तुमने इन मामलों की असलियत देख ली है, तुम्हारी परमेश्वर में सच्ची आस्था है, तुममें परमेश्वर के प्रति सच्चा समर्पण है, तुममें जीवन और मृत्यु के मामलों की सच्ची समझ और स्वीकृति है, तुम खुद को पूरी तरह से परमेश्वर के हाथ में सौंप सकते हो, और जब तुम्हें सच में गिरफ्तार कर लिया जाता है और मृत्यु तुम्हारे सामने है, तब अगर तुम्हारे दिल में ये समझ स्थिर रहती हैं—तब तुम्हारी आस्था नहीं डगमगाएगी। हालात चाहे जो भी हों, अगर तुम्हारी आस्था पूरी तरह से टूट नहीं गई है या हार नहीं गई है तो तुममें हमेशा साहस रहेगा। मान लो कि गिरफ्तार होने से पहले, तुम्हारे साथ वाकई ऐसा होने से पहले तुमने इन बातों पर गहराई से सोच-विचार नहीं किया है और तुम सिर्फ ख्याली पुलाव पकाते हो, “मैं अपना जीवन अर्पित करने को तैयार हूँ। मेरा जीवन परमेश्वर द्वारा दिया गया है—सबसे बुरी स्थिति यही होगी कि मैं परमेश्वर के लिए शहीद होकर मर जाऊँगा!” ऐसे में जब बड़ा लाल अजगर तुम्हें यातनाएँ देगा और फिर तुम्हें दस वर्ष की जेल की सजा सुनाएगा, तब तुम हक्के-बक्के रह जाओगे : “मैंने सोचा था कि इसका अंत मौत से होगा। अगर मैं शहीद हो जाता तो परमेश्वर मुझे याद रखता। मैंने यह उम्मीद नहीं की थी कि मैं वह गवाही देने में विफल हो जाऊँगा और अंत में मुझे दस वर्ष की सजा सुनाई जाएगी। दस वर्ष—यह दस दिन या दस महीने नहीं हैं! मैं इसे कैसे सहन कर पाऊँगा?” चूँकि तुमने इन चीजों के बारे में पहले नहीं सोचा है, तो क्या इस समय उन्हें समझना आसान होगा? यह कुछ हद तक मुश्किल होगा, है ना? (हाँ।) जब कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं तब लोग सिर्फ इस बारे में सोचते हैं कि उनसे कैसे निपटना है और उनसे कैसे बच निकलना है। अगर कठिनाइयों से बच निकलने की तुम्हारी आंतरिक इच्छा मजबूत है तो संकट के बीच उनके अनुकूल बनने की तुम्हारी आंतरिक इच्छा बेहद कमजोर होगी। इसलिए, कठिनाइयों से सामना होने पर तुम्हारे लिए ऐसे माहौल के प्रति समर्पण करना बहुत ही मुश्किल हो जाता है। तो ऐसी स्थितियों को कैसे हल किया जाना चाहिए? तुम्हें तुरंत सत्य की तलाश करनी होगी और इन मामलों पर गहराई से सोच-विचार करना होगा; तुम्हें यह रास्ता भी ढूँढ़ निकालना होगा कि तुम्हें सत्य का अभ्यास कैसे करना चाहिए। उदाहरण के लिए, अगर तुम्हें दस वर्ष की कैद हो जाती है तो तुम क्या सोचोगे? “क्या मेरी पत्नी (या पति) मुझे तलाक दे देगी (या दे देगा)? दस वर्ष बाद मेरे बच्चों की आयु कितनी होगी? मैंने उनके प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं की होगी—क्या वे मुझे छोड़ देंगे और मेरे बुढ़ापे में मेरी देखभाल करने से इनकार कर देंगे? रिहा कर दिए जाने के बाद मैं कैसे जीऊँगा? दस वर्ष बाद मेरे माता-पिता बूढ़े हो चुके होंगे और मैंने उनके प्रति अपनी संतानोचित जिम्मेदारी पूरी नहीं की होगी—क्या यह मुझे माता-पिता के प्रति कर्तव्यहीन संतान नहीं बना देगा? क्या दस वर्ष बाद परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाएगा? मैंने जेल में कुछ भी प्राप्त नहीं किया होगा—मैं किसी भी सभा में शामिल नहीं हुआ होऊँगा या मैंने कोई भी धर्मोपदेश नहीं सुना होगा और मैंने सत्य नहीं समझा होगा। क्या मैं इन दस वर्षों के दौरान पिछड़ नहीं गया होऊँगा? क्या इसका मतलब यह नहीं होगा कि मुझे निकाल दिया गया है? क्या परमेश्वर तब भी मुझे चाहेगा? अगर मैं इस कष्ट से गुजरता हूँ तो क्या परमेश्वर इसे याद रखेगा? अगर वह इसे याद नहीं रखता है और मैं उद्धार प्राप्त नहीं कर पाता हूँ तो क्या मैंने जेल में यह समय व्यर्थ नहीं बिताया होगा? दस वर्षों में बहुत कुछ बदल जाएगा और मैं कुछ भी प्राप्त नहीं करूँगा जबकि बहुत कुछ खो दूँगा।” जब तुम इन चीजों के बारे में सोचते हो तब कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं। तुम्हें इन कठिनाइयों का सामना कैसे करना चाहिए? क्या तुम्हें इस बारे में नहीं सोचना चाहिए कि हर दिन कैसे गुजारना है? अगर तुमने इन बातों पर गहराई से विचार नहीं किया है और तुम उस बिंदु पर नहीं पहुँचे हो जहाँ तुम सत्य समझते हो और मामलों को स्पष्ट रूप से देखते हो तो जब तुम गिरफ्तार किए जाने का सामना करोगे तब तुम्हारा जीवन और मृत्यु एक ही विचार पर लटके रहेंगे : दब्बूपन और भय के एक पल, एक अकेली सोच या धारणा के कारण तुम यहूदा बन सकते हो, कलीसिया से गद्दारी कर सकते हो और अपने पिछले सभी प्रयास बरबाद कर सकते हो। अगर तुम इस मामले पर गहराई से विचार नहीं कर सकते हो या इसकी असलियत नहीं देख सकते हो तो तुम्हारे लिए अपनी संभावनाओं और किस्मत के बारे में फिक्र नहीं करना बहुत मुश्किल होगा और अपना जीवन और मृत्यु परमेश्वर के हाथ में सौंपना और उसे उसकी इच्छानुसार योजना बनाने की अनुमति देना बहुत मुश्किल होगा। अगर तुम जीवन और मृत्यु के मामलों की असलियत नहीं देख सकते हो और फिर भी अपनी किस्मत आजमाने की मानसिकता रखते हो, जैसे-तैसे काम चलाने की चाह रखते हो तो जब कोई परिवेश तुम पर आ पड़ेगा तब तुम बेनकाब कर दिए जाओगे। वे सभी लोग जो गिरफ्तार कर लिए जाने पर यहूदा बन गए, जिन्होंने “तीन कथन” पर हस्ताक्षर किए, उन्होंने रातों-रात ऐसा किया और वे शैतान द्वारा दरिंदे के निशान से दागे गए। कभी-कभी व्यक्ति का जीवन और मृत्यु एक ही विचार से लटका हुआ होता है। सत्य के बिना संकटों को पार करना बहुत ही मुश्किल है। तो सच्ची दबंगता क्या है? अगर कोई पाशविक शक्ति के एक विस्फोट पर भरोसा करके कुछ हासिल करता है तो क्या यह सच्ची दबंगता है? नहीं—यह आवेगशीलता है। एक सही मायने में साहसी व्यक्ति के दिल में बहुत-सी सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के संबंध में एक विशेष स्तर की सूझ-बूझ होती है। वह आंतरिक रूप से सकारात्मक चीजों से सहमत होने, उन्हें स्वीकारने और दृढ़ता से पहचानने में समर्थ होता है और सत्य के प्रति और परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति समर्पण करने में समर्थ होने के बिंदु तक पहुँच जाता है। सिर्फ इसी तरह से तुममें सच्चा साहस हो सकता है। अगर तुम्हारे दिल में ये चीजें नहीं हैं तो तुम्हारी दबंगता सिर्फ बेवकूफी वाला साहस है—जैसे एक नवजात बछड़े का बाघ से नहीं डरना। इसलिए, परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाले देश में परमेश्वर में विश्वास रखने और उसका अनुसरण करने के लिए न सिर्फ साहस की जरूरत पड़ती है, बल्कि इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इसके लिए आस्था की भी जरूरत पड़ती है। तुम यह जो परमेश्वर में विश्वास रखने की हिम्मत करते हो उसका कारण यह नहीं है कि तुम दबंग हो, बल्कि यह है कि तुममें आस्था है। कुछ लोग कहते हैं, “मुझे लगता है कि मैं परमेश्वर में सिर्फ इसलिए विश्वास रखता हूँ क्योंकि मैं दबंग हूँ और उत्पीड़न से नहीं डरता।” यह कथन सही हो सकता है। तुम दुस्साहस के कारण विश्वास रखते हो, लेकिन तुम्हारी बेवकूफी, जाहिलपन और सादेपन की रोशनी में परमेश्वर तुम पर विशेष अनुग्रह दिखाता है, तुम्हारे लिए खास परिवेशों का इंतजाम करता है और साथ ही तुम्हें सत्य का सिंचन और प्रावधान भी देता है। इसके जरिये तुम काफी कुछ सत्य समझने और प्राप्त करने लगते हो। समय के साथ तुम्हारे दुस्साहस में सच्ची आस्था के तत्व जुड़ जाते हैं और सिर्फ तभी तुम्हारा साहस बढ़ता है और तुम भविष्य के परिवेशों या उत्पीड़न का सामना करने की और ज्यादा हिम्मत करते हो। अगर किसी व्यक्ति में सच्ची आस्था नहीं है और वह शक्तियों के एक विस्फोट पर भरोसा करता है, कहता है, “मैं परमेश्वर में विश्वास रखने की हिम्मत करता हूँ! मैं उत्पीड़न या गिरफ्तार किए जाने और कैद में डाले जाने से नहीं डरता!”—तो इस तरह का साहस लंबे समय तक कायम नहीं रहेगा। सत्य के प्रावधान के बिना, तुम्हें प्रशिक्षित करने के लिए, तुमसे अभ्यास करवाने के लिए और तुम्हें विभिन्न चीजों का सामना करने का तरीका सिखाने के लिए परमेश्वर द्वारा वास्तविक जीवन में परिवेशों का इंतजाम किए बिना, तुम्हारी दबंगता पूरी तरह से दुस्साहस है और यह बिल्कुल भी सच्ची आस्था नहीं है। तुम समझ रहे हो? (हाँ।) अगर यह सही मायने में दुस्साहस है तो यह तुम्हें एक दुस्साहसी, बेवकूफ, जाहिल व्यक्ति बनाता है। परमेश्वर में विश्वास रखने वाले कुछ लोगों के विचार बहुत ही सादे होते हैं, वे कल्पना करते हैं कि चीजें बहुत ही सीधी-सादी हैं, वे यह अनुमान बिल्कुल भी नहीं लगाते कि परमेश्वर का अनुसरण करने में क्या खतरे शामिल होंगे। लेकिन जब उनका सामना असफलताओं से होता है, सिर्फ तभी जाकर उन्हें यह एहसास होता है कि परमेश्वर का अनुसरण करना कोई सीधा-सादा मामला नहीं है। अगर किसी व्यक्ति की दबंगता मानवता का एक गुण है तो कम-से-कम, वह सरल और बेबाक है, जटिल नहीं है और वह हर मोड़ पर खतरे मौजूद रहने की फिक्र नहीं करता है। लेकिन मान लो कि तुम्हारी दबंगता आशीषें प्राप्त करने के इरादे से संचालित है और तुम सोचते हो, “अगर तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो तो तुम स्वर्ग में प्रवेश कर सकते हो, महान आशीषें प्राप्त कर सकते हो और आपदाओं से बच निकल सकते हो और मौत से बच सकते हो, इसलिए चाहे कुछ भी हो जाए, मैं विश्वास रखूँगा!” दूसरे शब्दों में, तुम्हारा विश्वास दुस्साहसी पाशविक शक्ति के विस्फोट से संचालित है; यह तुम्हारा सरल तरीके से परमेश्वर में विश्वास रखने की चाह करना नहीं है; बल्कि यह आशीषों का पीछा करना है। ऐसे में तुम्हारी दबंगता को, ज्यादा से ज्यादा, दुस्साहस कहा जा सकता है और इसे मानवता के गुण के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता। इसलिए, जब दबंग लोगों की बात आती है तब तुम्हें यह देखना चाहिए कि उनका मानवता सार कैसा है। अगर उनमें कोई जमीर और विवेक नहीं है और वे सिर्फ दुस्साहसी हैं तो उनका कोई मोल नहीं है और वे कुछ भी सार्थक प्राप्त नहीं कर सकते हैं। लेकिन अगर वे परमेश्वर में विश्वास रखने और सत्य स्वीकारने में समर्थ हैं तो फिर ऐसे लोगों का मोल है। अगर कोई व्यक्ति दबंग है, लेकिन उसमें बोध क्षमता नहीं है, वह सत्य नहीं समझ पाता है और सिर्फ आशीषें प्राप्त करने के लिए परमेश्वर में विश्वास रखता है और आशीषें प्राप्त करने के लिए अपना परिवार और करियर छोड़ने को तैयार है और उत्पीड़न से नहीं डरता है—तो यह मानवता का गुण नहीं है, बल्कि एक गलत विचार और दृष्टिकोण है। क्या गलत विचार और दृष्टिकोण परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होते हैं? (नहीं।) कोई व्यक्ति दब्बू है या दबंग है, इसमें उसकी जन्मजात स्थितियाँ शामिल हैं और इसका उसकी मानवता के सार से कोई लेना-देना नहीं है।

अगर हमने जन्मजात स्थितियों, मानवता और भ्रष्ट स्वभावों की विभिन्न अभिव्यक्तियों पर संगति नहीं की होती तो क्या तुम अपने आप उनका भेद पहचान पाते? (हम शायद सरल अभिव्यक्तियों का भेद पहचान पाते, लेकिन हम ज्यादा जटिल अभिव्यक्तियों का भेद नहीं पहचान पाते।) अब जब जन्मजात स्थितियों, मानवता और भ्रष्ट स्वभावों में अंतरों के बारे में संगति की जा चुकी है, तो क्या अब तुम लोग उनका भेद पहचान सकते हो? (हम उनका भेद पहले से थोड़ा बेहतर पहचान सकते हैं।) अगर मैं कुछ और असामान्य उदाहरण दूँ तो क्या तुम लोग मेरी की गई संगति के आधार पर उनका भेद पहचान पाओगे? ये कहना मुश्किल है, है ना? तो फिर अगली बार हम इस विषय से संबंधित मुद्दों के बारे में संगति करना जारी रखेंगे। जैसे-जैसे हम ज्यादा संगति करते जाएँगे, तुम विभिन्न प्रकार के मुद्दों का भेद पहचानने के लिए कुछ नियमों को पहचानते जाओगे। मानवता, जन्मजात स्थितियों और भ्रष्ट स्वभावों की विभिन्न अभिव्यक्तियों के लिहाज से तुम लोग आमतौर पर उन अभिव्यक्तियों का भेद पहचान सकते हो जिनके बारे में संगति की जा चुकी है। जहाँ तक उन अभिव्यक्तियों का प्रश्न है जिनके बारे में संगति नहीं की गई है, उनमें से कुछ का भेद सिर्फ आध्यात्मिक समझ वाले लोग या वे लोग पहचानने में समर्थ हो सकते हैं जो सत्य की तलाश करना जानते हैं। खराब काबिलियत वाले लोग शायद इन बातों को पूरी तरह न समझ पाएँ और उनका भेद न पहचान पाएँ, इसलिए उन्हें ज्यादा सुनने और ज्यादा प्रश्न पूछने की जरूरत है। अगर हम इन मुद्दों के बारे में संगति नहीं करें तो ये तुम लोगों के लिए हमेशा अस्पष्ट ही रहेंगे और तुम जो कहोगे वह भी अस्पष्ट होगा; तुम लोगों की समझ और सत्य की शुद्ध समझ में हमेशा एक अंतर बना रहेगा, है ना? (हाँ।)

आज हमने काबिलियत के मामलों पर संगति की। क्या अब तुम यह भेद पहचान सकते हो कि लोगों की काबिलियत कैसी है? (हम मोटे तौर पर यह भेद पहचान सकते हैं।) अगर तुम यह भेद नहीं पहचान सकते हो तो धीरे-धीरे चीजों का अनुभव करो। दैनिक जीवन में इन मामलों से तुम्हारा सामना होगा। हमारी संगति से मिले शब्दों को वास्तविक जीवन में लागू करना सीखो, उन्हें थोड़ा-थोड़ा करके लोगों की अभिव्यक्तियों से मिलाओ—अपना भेद पहचानो और दूसरों का भेद पहचानो, खुद को जानना शुरू करो और दूसरों को जानना शुरू करो। धीरे-धीरे तुम इन चीजों को आँकने में समर्थ हो जाओगे और तुम्हारे पास ऐसा करने के लिए एक मानक होगा। लोगों और चीजों को देखने के साथ-साथ आचरण करने और कार्य करने के सिद्धांत भी ज्यादा से ज्यादा स्पष्ट होते जाएँगे। हमने जन्मजात स्थितियों, मानवता और भ्रष्ट स्वभावों का भेद पहचानने के विभिन्न पहलुओं के बारे में बहुत संगति की है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि हम मानवता की किन अभिव्यक्तियों या प्रकाशनों के बारे में संगति करते हैं, इनमें से कोई भी खोखले शब्द नहीं हैं—वास्तविक जीवन में इन सभी चीजों से सामना हो सकता है, इन्हें देखा जा सकता है और महसूस किया जा सकता है। इसलिए, तुम्हें परमेश्वर के वचनों को विभिन्न चीजों और विभिन्न तरह के लोगों के साथ मिलाकर देखना सीखना चाहिए। सिर्फ हमारी संगति से विभिन्न दशाओं और मामलों को वास्तविक जीवन से मिलाना सीखकर ही तुम लोगों और चीजों को देखने में और साथ ही आचरण करने और कार्य करने में धीरे-धीरे प्रगति कर सकते हो, तुम्हारे पास सत्य से संबंधित विभिन्न मामलों की सटीक समझ हो सकती है और तुम धीरे-धीरे विभिन्न सत्य सिद्धांतों पर पकड़ बना सकते हो। तुम समझ रहे हो? (हाँ।) वैसे तो हमने जिन मामलों पर चर्चा की है उनका मुख्य रूप से उपयोग लोगों द्वारा प्रदर्शित विभिन्न दशाओं और प्रकाशनों का भेद पहचानने के लिए किया जाता है और ये तुम्हें सीधे, सत्य समझने और उसमें प्रवेश करने में सक्षम नहीं बनाते हैं, ये सभी मामले सत्य की तुम्हारी समझ को प्रभावित करेंगे और साथ ही सत्य वास्तविकता में तुम्हारे प्रवेश को भी प्रभावित करेंगे। इसलिए, वैसे तो ऐसा लग सकता है कि ये मामले लोगों की धारणाओं में सिर्फ मानवता, जन्मजात स्थितियों या कुछ स्पष्ट भ्रष्ट स्वभावों को शामिल करते हैं, लेकिन हर मामला और हर कथन सत्य में लोगों के प्रवेश से संबंधित है। और इसलिए, ये मामले ऐसे हैं जिनका तुम्हें सत्य में प्रवेश करने के मार्ग पर सामना करना पड़ेगा—तुम उनसे बच नहीं सकते। मानवता के विभिन्न मामले और अभिव्यक्तियाँ, चाहे वे सकारात्मक हों या नकारात्मक, वही सब चीजें हैं जिनका तुम दैनिक जीवन के विभिन्न परिवेशों में सामना करोगे और जो तुम्हारे सामने आएँगी। जब तुम विभिन्न मामलों का सामना करते हो तब अगर तुम उनमें से किसी का भी भेद नहीं पहचान सकते हो और उन सभी को एक ही मानकर चलते हो, हमारी संगति के इन सत्य सिद्धांतों को विनियम या धर्म-सिद्धांत मानते हो, तो तुम कभी भी सत्य वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर पाओगे। ऐसा क्यों है? क्योंकि तुम यह कभी नहीं समझ पाओगे कि सत्य क्या है।

बहरहाल, आज की संगति के लिए बस इतना ही। अलविदा!

25 नवम्बर 2023

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