परमेश्वर के दैनिक वचन : कार्य के तीन चरण | अंश 21
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मैं पहले ही कह चुका हूँ कि जो मेरा अनुसरण करते हैं वे बहुत हैं परन्तु जो मुझ से सच्चे दिल से प्रेम करते हैं वे बहुत ही कम हैं। हो सकता है कि कुछ लोग कहें कि, "यदि मैं तुमसे प्रेम नहीं करता तो क्या मैंने इतनी बड़ी क़ीमत चुकाई होती? यदि मैं तुमसे प्रेम नहीं करता तो क्या मैंने यहाँ तक तुम्हारा अनुसरण किया होता?" निश्चित रूप से, तुम लोगों के पास कई कारण हैं, और तुम लोगों का प्रेम, निश्चित रूप से, बहुत ही महान है, किन्तु मेरे लिए तुम लोगों के प्रेम का क्या सार है? "प्रेम", जिस प्रकार से यह कहलाता है, ऐसी भावना का संकेत करता है जो शुद्ध और दोष रहित हो, जहाँ तुम प्रेम करने, महसूस करने, और विचारशील होने के लिए अपने हृदय का उपयोग करते हो। प्रेम में कोई शर्त, कोई अवरोध, या कोई दूरी नहीं होती है। प्रेम में कोई संदेह, कोई कपट, और कोई धूर्तता नहीं होती है। प्रेम में कोई दूरी नहीं होती है और कुछ भी अशुद्ध नहीं होता है। यदि तुम लोग प्रेम करते हो, तो तुम धोखा नहीं दोगे, शिकायत, विश्वासघात, विद्रोह नहीं करोगे, किसी चीज को छीनोने या उसे प्राप्त करने की या किसी निश्चित राशि को प्राप्त करने की कोशिश नहीं करोगे। यदि तुम लोग प्रेम करते हो, तो खुशी-खुशी बलिदान करोगे, विपत्ति को सहोगे, और मेरे अनुकूल हो जाओगे। तुम अपना सर्वस्व मेरे लिए त्याग दोगेः तुम लोगों का परिवार, तुम लोगों का भविष्य, तुम लोगों की जवानी, और तुम लोगों का विवाह। अन्यथा तुम लोगों का प्रेम बिल्कुल भी प्रेम नहीं होगा, बल्कि केवल कपट और विश्वासघात होगा! तुम लोगों का प्रेम किस प्रकार का है? क्या यह सच्चा प्रेम है? या झूठा? तुम लोगों ने कितना त्याग किया है? तुमने कितना अर्पण किया है? मुझे तुम लोगों से कितना प्रेम प्राप्त हुआ है? क्या तुम लोग जानते हो? तुम लोगों के हृदय बुराई, विश्वासघात, और कपट से भरे हुए हैं, और परिणामस्वरूप, तुम लोगों के प्रेम में कितनी अशुद्धियाँ हैं? तुम लोग सोचते हो कि तुम लोगों ने मेरे लिए पर्याप्त त्याग किया है; तुम लोग सोचते हो कि मेरे लिए तुम लोगों का प्रेम पहले से ही पर्याप्त है। किन्तु फिर तुम लोगों के वचन और कार्य क्यों हमेशा अपने साथ विद्रोह और कपट लिए रहते हैं? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी तुम मेरे वचन को स्वीकार नहीं करते हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी मुझे एक तरफ़ डाल देते हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी तुम मेरे बारे में शक्की हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी तुम मेरे अस्तित्व को स्वीकार नहीं कर सकते हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी उसके अनुकूल मेरे साथ व्यवहार नहीं करते हो जो मैं हूँ और हर मोड़ पर मेरे लिए चीज़ों को मुश्किल बनाते हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी तुम मुझे मूर्ख बनाने और हर मामले में मुझे धोखा देने का प्रयास करते हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरी सेवा करते हो, फिर भी तुम मुझसे डरते नहीं हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम लोग सर्वथा और सभी चीजों में मेरा विरोध करते हो। क्या यह सब प्यार माना जाता है? तुम लोगों ने बहुत बलिदान किए हैं, यह सत्य है, जिसकी मैं तुमसे अपेक्षा करता हूँ। क्या इसे प्रेम माना जा सकता है? सावधानी पूर्वक किया गया अनुमान दर्शाता है कि तुम लोगों के भीतर मेरे लिए प्रेम का ज़रा सा भी आभास नहीं है। इतने सालों के कार्य और इतने सारे वचनों के बाद जो मैंने तुम लोगों को प्रदान किए हैं, तुम लोगों ने वास्तव में कितना प्राप्त किया है? क्या यह पीछे मुड़कर सावधानीपूर्वक देखने योग्य नहीं है? मैं तुम लोगों की भर्त्सना करता हूँ: जिन्हें मैं अपने पास बुलाता हूँ ये वे नहीं हैं जिन्हें कभी भी भ्रष्ट नहीं किया गया है; बल्कि, जिन्हें मैं चुनता हूँ ये वे हैं जो मुझसे वास्तव में प्रेम करते हैं। इसलिए, तुम लोगों को अपने वचनों और कर्मों में सतर्क रहना चाहिए, और अपने अभिप्रायों और विचारों को जाँचना चाहिए ताकि वे अपनी सीमा रेखा को पार न करें। अंत के दिनों के इस समय में, अपने प्रेम को मेरे सम्मुख अर्पित करने के लिए अपना अधिकतम प्रयास करें, कहीं ऐसा न हो कि मेरा कोप तुम लोगों के ऊपर से कभी भी न जाए!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बुलाए बहुत जाते हैं, पर चुने कुछ ही जाते हैं
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