परमेश्वर की संप्रभुता को कैसे जानें (भाग तीन)
मनुष्य और परमेश्वर कैसे जुड़े हैं? तुम परमेश्वर को कैसे जान सकते हो? वह मनुष्य पर कैसे कार्य करता है? अपने वचनों का उपयोग करके, उनके माध्यम से वह अपने इरादे प्रकट करता है, तुम्हें उस मार्ग पर ले जाता है जिस पर तुम्हें चलना चाहिए, तुम्हारा परीक्षण करता है, और तुमसे उसकी सभी अपेक्षाओं और तुम्हारे लिए निर्धारित मानक बताता है। इसका एहसास किए बिना ही लोग परमेश्वर के वचनों में सत्य के सभी पहलुओं को समझ लेते हैं : जैसे लोगों के साथ कैसे व्यवहार करें और मामलों को कैसे सँभालें, इनके पीछे के सिद्धांत क्या हैं, अपने भाई-बहनों के साथ कैसे व्यवहार करें, कलीसिया के काम और उनके कर्तव्य, परीक्षणों का अनुभव कैसे करें, परमेश्वर के प्रति वफादार कैसे रहें, चीजों को कैसे छोड़ें, अविश्वासी दुनिया को कैसे देखें, इत्यादि। यह सब परमेश्वर के वचनों में है, और उसने मानवजाति को बताया है। लेकिन अंततः मनुष्य इसे किस सीमा तक अनुभव करता है? लोग परमेश्वर को उसके वचनों में देख सकते हैं, और उससे रूबरू हो सकते हैं। कोई पूछ सकता है : “वह परमेश्वर कहाँ है जिस पर तुम्हारा विश्वास है?” जिन लोगों ने इसका अनुभव नहीं किया है, वे यह नहीं समझ सकते : “हाँ, परमेश्वर कहाँ है? वह मुझे कभी दिखाई नहीं दिया। उसके बारे में हमेशा कहा जाता है कि वह तीसरे स्वर्ग में रहता है, लेकिन मैंने उसे कभी नहीं देखा। मैं नहीं जानता कि परमेश्वर वास्तव में कितना बड़ा या कितना लंबा है, या कितना सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ है।” जिनके पास अनुभव है वे कहेंगे : “वे चीजें महत्वपूर्ण नहीं हैं। मैंने जिस दिन उस पर विश्वास किया उसी दिन मेरा परमेश्वर के वचनों से सामना हुआ। अब मैं बीस-तीस वर्षों से उस पर विश्वास करता हूँ, और उसके वचनों में मैं उसका स्वभाव और सार देखता हूँ, और मुझे उसके बारे में थोड़ी समझ और थोड़ा ज्ञान है। इतने वर्षों से उसके वचनों का अनुभव करने के बाद अगर एक दिन परमेश्वर मेरे पास आए और मेरे साथ बातचीत करे, जुड़े, तो बेशक मैं पुष्टि कर पाऊँगा कि यह वही परमेश्वर है जिसने उन वचनों को व्यक्त किया था, यह वही है जिस पर मैं विश्वास करता हूँ! इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह दिखता कैसा है, जब तक इनका और उसके वचनों का स्रोत एक ही है, तो वह वही परमेश्वर है जिस पर मैं विश्वास करता हूँ, वह स्वर्ग का परमेश्वर है, मेरी किस्मत और सभी चीजों पर जिसकी संप्रभुता है। यह वही है।” अब क्या परमेश्वर को फिर भी स्वर्ग से तुम से बात करने की जरूरत है? (कोई जरूरत नहीं है।) परमेश्वर चाहे कोई भी रूप या आकार ले, तुम्हें उसे देखने की आवश्यकता नहीं है। कोई आवश्यकता नहीं है। तुममें वह जिज्ञासा नहीं होगी। लेकिन क्यों? इतने वर्षों के अनुभव, परमेश्वर के साथ संपर्क के बाद यूँ तो तुम यह नहीं कह सकते कि तुम उसे जानते हो या उससे बहुत परिचित हो, फिर भी कम से कम उसके वचनों के माध्यम से और उन वचनों और उसके कार्य के अनुभव के जरिए वह अब तुम्हें अजनबी नहीं लगता। वह तुम्हारे साथ है, तुम्हारे जीवन का मार्गदर्शन कर रहा है, तुम्हारे हर दिन और तुम्हारी किस्मत पर संप्रभुता रखता है। वह तुम्हारे आनंद, दुख, क्रोध और खुशी को अच्छी तरह से समझता है, और तुम उसके आनंद, दुख, क्रोध और खुशी को जानते हो। तुम अब उसे गलत नहीं समझते या उसके बारे में शिकायत नहीं करते हो, और तुम्हारे हृदय में उसका स्थान ऐसा है कि तुम कह सकते हो कि वह वहाँ सिंहासन पर बैठा हुआ है, और तुम्हारे संपूर्ण अस्तित्व पर नियंत्रण करने में सक्षम राजा की तरह शासन करता है। “राजा की तरह शासन करने” का क्या तात्पर्य है? इसका तात्पर्य है कि जो कुछ भी होता है उसे हल करने के लिए तुम परमेश्वर के वचन इस्तेमाल करते हो, और उसके वचन तुम्हारे हृदय के स्वामी हैं। अब तुम स्वामी नहीं हो। तुम्हारा ज्ञान और सीख, तुम्हारे द्वारा पढ़ी गई पुस्तकें, तुम्हारे जीवन के अनुभव—ये सभी तुम्हारी अगुआई नहीं कर सकते। परमेश्वर के वचन ही हर चीज में तुम्हारा मार्गदर्शन करेंगे, वे तुम्हारे जीवन की मार्गदर्शक पुस्तिका बन जाएँगे, तुम्हारे वास्तविक जीवन में वे हर रोज प्रकट होंगे और जिए जाएँगे। यही वह तरीका है जिससे तुम्हें सत्य वास्तविकताएँ प्राप्त होंगी। उस समय यदि कोई तुमसे फिर पूछे, “चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, तो क्या तुम उसे जानते हो?” तुम कहोगे : “मैं परमेश्वर को थोड़ा-सा जानता हूँ। वह कितना शक्तिशाली और बुद्धिमान है यह बताने के लिए शब्दों का इस्तेमाल करने का साहस मैं नहीं कर सकता, न ही उसे परिभाषित करने का साहस कर सकता हूँ, लेकिन मैं इतना जरूर जानता हूँ कि परमेश्वर अथाह है, बहुत ही बुद्धिमान और अद्भुत है, और मानवजाति से बहुत प्रेम करता है। परमेश्वर का प्रेम बेहद महान, बेहद सच्चा और उसका स्वभाव बेहद धार्मिक है!” क्या यह थोड़ा-सा ज्ञान लोगों की भ्रामक और कल्पनाशील धारणाओं और कल्पनाओं से अधिक मूल्यवान नहीं है? (हाँ, यह है।) तो ये मूल्यवान चीजें कहाँ से आती हैं? वे परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने से आती हैं। यानी इतने वर्षों तक परमेश्वर के वचन प्रदान किए जाने के बाद वे तुम में जड़ें जमा लेते हैं और अंकुरित होते हैं, खिलते हैं और फल लगते हैं, और तुम उसके वचनों की वास्तविकता को जी लेते हो। परमेश्वर के वचनों को जीते हुए तुम इस प्रभाव को कैसे हासिल करते हो? (परमेश्वर द्वारा इंतजाम किए गए लोगों, घटनाओं और चीजों का थोड़ा-थोड़ा अनुभव करके।) यह अनुभव से आता है, खासकर इस अवधि के दौरान परमेश्वर के वचनों की लगातार पुष्टि करना, यह पुष्टि करना कि परमेश्वर का प्रत्येक वाक्य सत्य है, और तुम्हें जीवन में क्या चाहिए। उस समय यदि कोई कहता है, “जिस परमेश्वर पर तुम विश्वास करते हो वह परमेश्वर नहीं है, उसका अस्तित्व नहीं है, उसे देखा नहीं जा सकता,” तुम कहोगे : “परमेश्वर के अस्तित्व और संप्रभुता के बारे में निर्णय लेना किसी एक व्यक्ति का काम नहीं है। परमेश्वर यह निर्णय लेता है, परमेश्वर के अस्तित्व और सभी चीजों पर संप्रभु होने का तथ्य यह निर्णय लेता है, इन वर्षों में परमेश्वर के कार्य का मेरा वास्तविक अनुभव यह निर्णय लेता है, परमेश्वर के कार्य के अनुभव की सभी गवाहियाँ यह निर्णय लेती हैं। यही प्रमाण है।” यह परमेश्वर की गवाही देना है। यदि कोई फिर पूछे, “परमेश्वर कहाँ है?” तुम क्या उत्तर दोगे? (प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में जो उस पर विश्वास करता है।) परमेश्वर पहले से ही लोगों के हृदय में रहता है, लेकिन वह हमारे चारों ओर, सभी चीजों के भीतर और चारों तरफ भी है। यह परमेश्वर का अस्तित्व है। तुम इससे इनकार नहीं कर सकते, और तुम जो अनुभव करते हो वह तुम जो देखते हो उससे अधिक वास्तविक है। यदि तुमने परमेश्वर को देख भी लिया, तो क्या तुम उसे पहचान पाओगे? (नहीं, मैं नहीं पहचान पाऊँगा।) अगर परमेश्वर का आध्यात्मिक शरीर लोगों के बीच उतरे और कहे, “मैं परमेश्वर हूँ,” तो तुम चौंक जाओगे और कहोगे, “तुम परमेश्वर हो? मैं तुम्हें कैसे नहीं पहचानता? मैं तुम जैसे परमेश्वर को नहीं स्वीकारता!” दरअसल तुम डर जाओगे। तुम्हारी ऐसी प्रतिक्रिया क्यों होगी? चूँकि तुम परमेश्वर को नहीं जानते हो, इसलिए तुम्हारा उसके प्रति ऐसा रवैया और व्यवहार होता है।
परमेश्वर में विश्वास करते समय ध्यान देने योग्य सबसे महत्वपूर्ण बात क्या होती है? तुम कह सकते हो कि उसके वचन अनुभव करना सबसे महत्वपूर्ण है। परमेश्वर के वचन अनुभव करने की प्रक्रिया में, चाहे लोगों की गलत स्थितियाँ हों या परमेश्वर के विरुद्ध विरोध की स्थितियाँ हों या विद्रोहीपन की स्थितियाँ हों, या कोई भी भ्रामक विचार हों, उन्हें बदलना होगा और सत्य से इन सब का समाधान करना होगा। इस तरह धीरे-धीरे तुम्हारी आंतरिक अवस्था सुधर जाएगी, परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होता चला जाएगा, और तुम परमेश्वर के अस्तित्व को महसूस करोगे। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य नहीं है, तो तुम परमेश्वर के अस्तित्व को महसूस नहीं करोगे। क्या इन सब में सत्य नहीं है? इस सब में सत्य है। यदि लोग परमेश्वर में ऐसे विश्वास करते हैं मानो वे शून्य में रह रहे हों, किसी भी चीज के संपर्क में न हों, कुछ भी नहीं देख रहे हों, कुछ भी न जानते हों, बाहरी दुनिया से बेखबर उन ताओवादी भिक्षुओं और ननों की तरह जो तप और साधना करते हैं, तो यह सही तरीका नहीं है। यदि लोग ध्यान से देखें, समझें और अनुभव करें तो वे कई चीजों में परमेश्वर के कार्य देख पाएँगे। लेकिन कुछ ऐसे मामले वर्तमान में हैं जो बहुत गहरे हैं और अधिकतर लोगों की समझ से बाहर हैं, इसलिए दूर की चीजों की तलाश में तुम्हें उसे नहीं छोड़ देना चाहिए जो पास में है। बस परमेश्वर के वचनों पर ध्यान दो और सीखो कि उन वचनों के आधार पर स्वयं का मूल्यांकन कैसे करें। वचनों के आधार पर स्वयं का मूल्यांकन करने का क्या मतलब है? यह इस बात का पता लगाना है कि परमेश्वर के वचनों में उजागर विभिन्न अवस्थाओं में से क्या तुम्हारे पास कोई अवस्था है, तुम किस अवस्था में हो, परमेश्वर के वचन किसकी ओर संकेत करते हैं, और वह किन मानवीय अवस्थाओं के बारे में बात कर रहा है। इन सभी की जाँच कर इन्हें स्पष्ट रूप से समझा जाना चाहिए। कभी-कभी लोग परमेश्वर के वचन एक बार सुनते हैं, लेकिन वे इन्हें एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देते हैं और सोचते हैं, “परमेश्वर के वचन मेरे लिए नहीं हैं। मेरे पास यह अवस्था नहीं है। वह औरों के बारे में बात कर रहा है।” यह परमेश्वर के वचन समझने का गलत तरीका है, और यह दर्शाता है कि तुम अभी भी उसके वचन नहीं समझते, उनका तुम पर अभी भी कोई असर नहीं हुआ है, और तुम उन्हें हजम नहीं कर पाए हो। उस दिन तक अनुभव लेते रहो जब तक कि तुम लोगों को उजागर करने वाले परमेश्वर के वचन न सुन लो और तुम कहोगे, “परमेश्वर मेरे बारे में बोल रहा है।” यह परमेश्वर के वचनों के आधार पर स्वयं का मूल्यांकन करना है। लेकिन यह तो मात्र शुरुआत है, यह परमेश्वर के वचनों में प्रवेश करने की केवल शुरुआत है—तुम्हें नहीं पता होगा कि जिस अवस्था के बारे में वह बात करता है वह वास्तव में क्या है। इसलिए तुम्हें उस दौर से गुजरना होगा जहाँ तुम यह खोज सको कि परमेश्वर जो कहता है उसमें सत्य क्या है, उसकी अपेक्षाएँ क्या हैं, और वह कौन-सा मार्ग है जो वह मानवजाति को बताता है। इसमें सूक्ष्म विवरण शामिल हैं; ऐसा नहीं है कि केवल बाहरी अवस्था की जाँच और गहन-विश्लेषण करके तुम कह सको कि काम हो गया। लोगों की अवस्था का गहन-विश्लेषण करने और उनसे इसकी जाँच करवाने में परमेश्वर का उद्देश्य क्या है? यह उन्हें सुधारने के लिए है। परमेश्वर कहता है कि यह एक गलत अवस्था है, और यदि तुम ऐसी अवस्था में रह रहे हो, या ऐसा दृष्टिकोण रखते हो, तो तुम परमेश्वर का विरोध कर सकते हो। यह विद्रोहीपन है, यह परमेश्वर को नाराज करता है, और यह एक भ्रष्ट स्वभाव है जो शैतान का है और सत्य से मेल नहीं खाता; तुम्हें अपना रास्ता बदलना होगा। रास्ता बदलते समय तुम्हें यह समझना चाहिए कि परमेश्वर की अपेक्षाएँ क्या हैं, कि इन अपेक्षाओं में सच्चाई है, और तुम्हें परमेश्वर का इरादा जानना होगा और विचार करना होगा, “इस मामले में परमेश्वर की क्या अपेक्षा है? मैं अपना रास्ता कैसे बदलूँ, खुद को ऐसी अवस्था से अलग कैसे करूँ और कैसे इसका समाधान करूँ?” इसमें सत्य की खोज शामिल है। परमेश्वर के वचनों के अनुरूप स्वयं का मूल्यांकन करना ही काफी नहीं है—इसके साथ-साथ, अभी भी तुम्हें सत्य को समझने और स्वयं को जानने में सक्षम होने की जरूरत है। तब तुम्हें लगेगा कि मानवजाति के लिए परमेश्वर की आवश्यकताएँ कितनी अद्भुत हैं, और तुम अपने हृदय से उसकी प्रशंसा करने में सक्षम होगे : “परमेश्वर बहुत बुद्धिमान है, वह मनुष्य के अंतरतम हृदय की पड़ताल करता है! परमेश्वर ने मेरी अवस्था उजागर की जिसके बारे में मुझे पता तक नहीं था, लेकिन परमेश्वर सब कुछ जानता है!” क्या यही बात है? यह कतई काफी नहीं है, और यह वह नहीं है जिसकी परमेश्वर को अपेक्षा है। वह तुमसे अपेक्षा करता है कि तुम उन नकारात्मक, गलत अवस्थाओं को त्याग दो, जो भ्रष्ट स्वभावों से उपजती हैं और एक बार जब तुमने उनका समाधान कर लिया, तो सत्य के अनुसार अभ्यास करो। जैसे-जैसे सत्य के बारे में तुम्हारी समझ धीरे-धीरे गहरी होती जाएगी, तुम्हारी आंतरिक अवस्था पूरी तरह से बदलती जाएगी और तुम चीजों के बारे में अपने पुराने दृष्टिकोण त्याग दोगे, तुम देख पाओगे कि यह भ्रामक है, जान पाओगे कि गलती कहाँ है और इसका सार क्या है, और तब इसे हल करने में सक्षम हो पाओगे। जब तुम पूरी तरह से सांसारिक चीजों और शैतानी दृष्टिकोणों को छोड़ सकते हो, तो भले ही तुम अंदर से पूरी तरह खाली कर दिए गए महसूस कर रहे हो, जो सत्य तुमने समझे हैं वह तुम्हारे हृदय में स्थान लेना शुरू कर देंगे। परमेश्वर तुम्हारे पास कौन-सा सही दृष्टिकोण चाहता है, वह तुम्हारे पास क्या चाहता है, कौन-से विचार रखना सही है और कौन-से गलत हैं—इन चीजों को समझने की एक प्रक्रिया होती है जिसके लिए तुम्हें लगातार सत्य की खोज करनी होगी और उसमें गहराई तक उतरने की आवश्यकता होगी, और जब तुम वास्तव में सत्य समझ लोगे, तो तुम्हारा हृदय पूरी तरह से परिपूर्ण और आश्वस्त हो जाएगा। सत्य पर विश्वास करना और सत्य को स्वीकारना आसान नहीं है। सभी लोगों के पास सक्रिय विचार होते हैं, उन सभी के पास अपनी सोच, विचार और भ्रष्ट स्वभाव होते हैं, और जब उनके पास करने के लिए कुछ नहीं होता वे हमेशा अध्ययन और विश्लेषण करेंगे कि परमेश्वर के वचन सही हैं या गलत। यदि वे किसी ऐसे व्यक्ति से मिलें जो सत्य समझता है और अपनी अनुभवजन्य गवाही साझा करता है, तो उन्हें कुछ लाभ और आध्यात्मिक शिक्षा मिलेगी; लेकिन यदि उनका सामना किसी ऐसे व्यक्ति से हो जो बेतुकी बातें करता हो और बेतुके दृष्टिकोण रखता हो, तो वे उनसे डगमगा जाएँगे। यह एक सामान्य अवस्था है। लेकिन पर्याप्त अनुभव होने के बाद एक दिन वे पूरी तरह से स्वीकारेंगे कि परमेश्वर के वचन ही सत्य हैं और उन्हें एहसास होगा कि उनसे कहाँ गलती हुई। लेकिन क्या इसका एहसास होने का मतलब यह है कि वे सत्य को अभ्यास में लाने में सक्षम हैं? (नहीं, वे नहीं हैं।) वे अभी भी राजी नहीं हैं और मन ही मन सोचते हैं, “बस इस तरह स्वयं को मना कर दूँ?” वे अभी भी पड़ताल करना जारी रखना चाहते हैं, और चाहे वे अपने हृदय में कुछ भी सोचें, उनका विद्रोहीपन और भ्रष्ट स्वभाव हमेशा बना रहता है। उनके लिए सत्य स्वीकारना इतना आसान नहीं होता; वे इतनी सरलता से या सहजता से सीधे तौर पर इसे सत्य नहीं मान पाते। भले ही वे स्पष्ट रूप से जानते हों कि यह सत्य है, फिर भी वे इसे तुरंत और पूर्ण रूप से अभ्यास में नहीं ला पाते। यह इस तथ्य की पुष्टि करता है कि मनुष्य के अंदर भ्रष्ट स्वभाव और शैतानी सार होता है। परमेश्वर के कार्य और सत्य की अभिव्यक्ति का उद्देश्य मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव का समाधान करना, भ्रष्टता बाहर निकालना, उसका समाधान करना और धीरे-धीरे उसे शुद्ध करना है। व्यक्ति के दृष्टिकोण धीरे-धीरे परमेश्वर के अनुरूप हो जाएँगे, और वे जो करेंगे वह भी सत्य के अनुरूप हो जाएगा। तुम जिस भी पहलू में परमेश्वर के अनुरूप होते हो, उस पहलू में तुम उसे गलत नहीं समझोगे। परमेश्वर के बारे में तुम्हें जो भी गलतफहमियाँ हैं, तुम्हें उनका सत्य खोजना चाहिए, और उस गलतफहमी को दूर करने के लिए इस सत्य का इस्तेमाल करना चाहिए। तुम्हें हमेशा अपने दृष्टिकोण पर यह सोचकर नहीं अड़े रहना चाहिए कि तुम्हारी गलतफहमी ही सही और युक्तिसंगत है, इसे जहाँ कहीं भी लागू किया जाता है, यह कायम रहती है और समझ में आती है। यह हास्यास्पद है। लोगों के स्वभाव भ्रष्ट हैं—उनका थोड़ा अहंकारी होना सामान्य बात है; लेकिन जब तक वे सत्य स्वीकारते हैं, वे बदल सकते हैं। लेकिन अगर वे बेतुके हैं और चीजों के बारे में गलत विचार रखते हैं तो यह खतरनाक है, और उनके लिए सत्य स्वीकारना आसान नहीं होगा, और वे अक्सर इसे गलत समझेंगे। ऐसे लोगों में परमेश्वर के बारे में धारणाएँ रखने और परमेश्वर का विरोध करने की संभावना सर्वाधिक होती है; वे शैतान के किस्म के हैं। परमेश्वर को गलत समझने की बात करें तो यदि कोई सत्य की खोज नहीं करता तो वह सोचेगा कि परमेश्वर जो करता है वह गलत है। यदि वे हमेशा ऐसे ही परमेश्वर को “कटघरे में खड़ा करते” रहे, उससे प्रतिस्पर्धा करते रहे और लड़ते रहे, तो अंततः इसका परिणाम विफलता है, और वे पूरी तरह से अपमानित होंगे। सत्य और परमेश्वर सदैव विजयी होंगे। यदि तुम एक समर्पित हृदय बनाए रख सकते हो, और परमेश्वर के साथ अपने विवाद और लड़ाई में सत्य खोजते और स्वीकारते हो, केवल तभी तुम्हारे हृदय को बदला जा सकता है, और अंततः तुम्हें परमेश्वर के वचन के समक्ष समर्पण करना ही पड़ेगा। इस प्रक्रिया का अनुभव करना परमेश्वर द्वारा मनुष्य को बचाने और प्राप्त करने की प्रक्रिया है, और जो लोग सत्य स्वीकारने के बजाय मरना पसंद करेंगे, वे बेनकाब होंगे और निकाल दिए जाएँगे। यदि तुम सत्य स्वीकार सकते हो और परमेश्वर के सामने समर्पण कर सकते हो, तो तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर को समर्पित है, उसके अनुरूप हो सकता है, और फिर कभी उसके खिलाफ विद्रोहीपन या उसका विरोध नहीं करेगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसी ने कितने वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास किया है, जब तक वे सत्य स्वीकार सकते हैं और परमेश्वर के प्रति समर्पित होने में सफल हो सकते हैं, वे सभी अंततः अपने जीवन स्वभाव में परिवर्तन ला सकते हैं। मैं तुम्हें एक उदाहरण देता हूँ। मान लो कि तुम वानस्पतिकी या कृषि-विज्ञान का अध्ययन करते हो और तुम फलों के पेड़ों के दस बीज बोते हो। तुमने जो सीखा है, उससे तुम जानते हो कि इन दस बीजों से दस वृक्ष उग सकते हैं। यह वैज्ञानिक आधार और सिद्धांतों पर आधारित निष्कर्ष है, और तुम इस निष्कर्ष पर अड़े रहते हो। इसलिए जब परमेश्वर कहता है कि दस बीजों से ग्यारह वृक्ष उग सकते हैं, तो तुम इस पर विश्वास नहीं करोगे : “क्या यह संभव है? दस बीजों से ग्यारह वृक्ष कैसे उग सकते हैं?” हकीकत में वहाँ एक बीज छिपा हुआ है जिसे तुमने नहीं देखा। अपने दृष्टिकोण पर अड़े रहने का तुम्हारा आधार क्या है? यह वह वैज्ञानिक प्रमाण और ज्ञान है जो तुमने सीखा है—ये चीजें तुम्हारी सोच पर हावी हैं और तुम उस दायरे से परे नहीं देख पाते। यदि तुम इसे अपना मानक मान लेते हो, तो तुम परमेश्वर के वचनों को अपना मानक नहीं मान रहे हो—और यह मनुष्य का विद्रोहीपन है। तुम सोचोगे, “मेरे पास एक आधार है, तो तुम कैसे कह सकते हो कि मेरा निष्कर्ष सत्य नहीं है? तुमने जो कहा वह निराधार है, तो तुम कैसे कह सकते हो कि तुम्हारे वचन सत्य हैं? वे पूरी तरह से आधारहीन हैं! कितने लोगों ने इसे सिद्ध किया? किसने इसे सिद्ध किया? किसने इसे देखा? तथ्य कहाँ हैं?” तथ्य देखने से पहले ही तुम परमेश्वर के वचन नकार देते हो, हमेशा उसके वचनों पर प्रश्न खड़े करते हो, हमेशा उसे नकारते हो, हमेशा महसूस करते हो, “परमेश्वर का कहा गलत है; मेरा निष्कर्ष ही सही है क्योंकि यह सिद्ध हो चुका है। मैं इस क्षेत्र का विद्वान हूँ, एक पेशेवर हूँ, इसलिए मेरे निष्कर्ष को ही सही माना जाना चाहिए।” तुम दस बीजों को दस वृक्ष उगाने के बराबर मानते हो, इसलिए जब परमेश्वर कहता है कि ग्यारह वृक्ष उगेंगे, तुम उस पर विश्वास नहीं करते हो। लेकिन अगर अंतिम परिणाम और तथ्य यह है कि ग्यारह वृक्ष उगते हैं, तो क्या तुम मान लोगे? (हाँ, मैं मान लूँगा।) क्या तुम पूरी तरह से आश्वस्त हो जाओगे? ऐसा कैसे? (क्योंकि मैंने तथ्य देखे हैं।) जब तुम तथ्य देखोगे, तो तुम अपने से अर्जित ज्ञान और निष्कर्ष को नकारना शुरू कर दोगे और संभवतः तुम्हारे हृदय में एक संघर्ष होगा : “मैं गलत कैसे हो सकता हूँ? क्या सचमुच में विज्ञान गलत हो सकता है?” इस प्रक्रिया में लोग अध्ययन और विश्लेषण करेंगे कि परमेश्वर के वचन सही हैं या गलत और उनकी तुलना करेंगे : “सही कौन है, परमेश्वर के वचन या वैज्ञानिक तर्क? किसके सही होने की संभावना ज्यादा है?” तथ्य ठीक सामने हैं, लेकिन इन्हें लोग अभी भी पूरी तरह स्वीकार नहीं कर सकते हैं और परमेश्वर ने जो किया है उससे पूरी तरह आश्वस्त हो सकने और इसे सचमुच स्वीकार करने से पहले उन्हें कई साल और इंतजार करना होगा। परमेश्वर बिना आधार के नहीं बोलता, न ही कार्य करता है; जब तक कि तुम यह नहीं देख लेते कि परिणाम क्या हैं तब तक उसके कार्यों की प्रक्रिया तुम्हें खुद अनुभव करने देती है। इस प्रक्रिया से तुम्हें क्या लाभ मिलता है? यह तुम्हें परमेश्वर के कार्यों का सच स्वीकार करने देती है। परमेश्वर तुम्हें बिना आधार के यह कहने की अनुमति नहीं देता, “तुम परमेश्वर हो, तुम महान और कुलीन, बुद्धिमान और अद्भुत हो।” वह तुम्हें इस तरह से अपनी गवाही नहीं देने देता; इसके बजाय वह तुम्हें स्वयं अनुभव करने और देखने के लिए इन तथ्यों का इस्तेमाल करता है। परमेश्वर तुम्हें यह नहीं बताएगा कि यह गलत है कि दस बीजों से दस वृक्ष उगेंगे। वह तुम्हारी बात का खंडन या तुमसे बहस नहीं करेगा, बल्कि अपनी बात साबित करने के लिए तथ्यों का इस्तेमाल करेगा, और तुम्हें स्वयं इसे देखने देगा। हो सकता है कि परमेश्वर ने तुम्हें यह तब बताया हो जब तुम बीस वर्ष के थे, लेकिन उसने यह नहीं कहा कि “मैं सत्य हूँ, और तुम्हें मेरी बात माननी चाहिए।” परमेश्वर ने ऐसा कुछ नहीं कहा; उसने बस कार्य किया, और उसके परिणाम तुम्हें तब दिखे जब तुम तीस वर्ष के थे। इसमें इतना समय लग गया। क्या इस दौरान परमेश्वर ने तुमसे बहस की? (नहीं, उसने बहस नहीं की।) तो बहस कौन कर रहा था? लोग हैं जो परमेश्वर से बहस करते हैं और हमेशा सोचते हैं, “परमेश्वर गलत है। वह जो कहता है और करता है वह अवैज्ञानिक और अतार्किक है।” लोगों को परमेश्वर के साथ बहस करना अच्छा लगता है, लेकिन वह बस चुप रहता है और कार्य करता रहता है। दस साल बाद तुम्हें कोई तथ्य पता चलेगा और तुम डर जाओगे : “ओह, अब पता चला कि मेरा ही दृष्टिकोण गलत था!” जब तक तुम यह स्वीकारते हो कि तुम गलत थे, तब तक तो उस मामले का निष्कर्ष तैयार हो चुका होता है, लेकिन क्या तुम इसे स्वीकार पाते हो? तुम केवल एक परिघटना को स्वीकार रहे हो, लेकिन अपने हृदय में अभी भी सचमुच नहीं जानते कि हो क्या रहा है। तुम्हें और कितने वर्षों का अनुभव चाहिए? इससे पहले कि तुम इस बात की पुष्टि कर सको कि इस मामले में परमेश्वर ने जो किया उसका निष्कर्ष सही था, और परमेश्वर ही सत्य है और सही है, जबकि तुम गलत हो, इसे स्वयं अनुभव करने में एक दशक का समय और लग सकता है। जब तुम चालीस वर्ष के होगे तब तुम पूरी तरह मान लोगे, और कहोगे, “परमेश्वर ही सत्य है, वही वास्तव में परमेश्वर है, और वह जो करता है वह बहुत अद्भुत और वास्तविक है! परमेश्वर बहुत बुद्धिमान है!” तुम स्वयं को नकारते हो। देखो कितने वर्षों का अनुभव लगा? (बीस वर्ष का।) और इन बीस वर्षों में परमेश्वर ने क्या किया? उसने तुम्हें बताने के लिए सूत्रों का उपयोग नहीं किया, जैसा कि न्यूटन के नियम समझाने के लिए किया जाता है—उसने तुम्हें कुछ दिखाने के लिए तथ्यों का उपयोग किया, और उन्हें समझाने के लिए तुम्हारे आसपास हो रहे प्रकटन और परिघटनाओं के माध्यम से तुम्हें प्रबुद्ध किया और तुम्हारा मार्गदर्शन किया। तुम तीन या पाँच वर्षों के बाद थोड़ी समझ हासिल करोगे और कहोगे, “मैं गलत था, लेकिन क्या मैं पूरी तरह से गलत था?” ज्यादा अनुभव प्राप्त करो और परमेश्वर तुम्हारे सामने कुछ तथ्य प्रस्तुत करेगा, और एक और दशक के बाद जब तुम चालीस वर्ष के हो जाओगे तो तुम स्वीकारोगे कि तुम गलत थे। परमेश्वर ऐसे ही कार्य करता है, वह यही चीजें करता है। तुम किस प्रक्रिया के माध्यम से पहचान सकते हो कि तुम गलत हो, और परमेश्वर सही है? तथ्यों का सामना करने की प्रक्रिया से, और परमेश्वर से मिली प्रबुद्धता और उसके मार्गदर्शन से तुम्हें यह एहसास होगा। यह एक ऐसी ही प्रक्रिया है; परमेश्वर तुम्हें केवल निष्कर्ष पकड़ाकर बिना किसी आधार के उस पर विश्वास करने को नहीं कहता। यदि परमेश्वर ने तुम्हें इसे समझने के लिए बाध्य किया तो क्या यह ठीक होगा? यदि परमेश्वर तुम्हें इसे समझाने के लिए जबरन नियंत्रित करता है, तो तुम समझोगे, और तुम्हें वैसे भी पता चल ही जाएगा कि परमेश्वर सही था। लेकिन परमेश्वर का इरादा लोगों को रोबोट बनाना नहीं है। यह वह नहीं है जो वह चाहता है। वह चाहता है कि लोग सत्य समझें, अपना चयन खुद करें और उसके प्रति समर्पण करने में सक्षम हों। लेकिन इस परिणाम तक पहुँचने में समय लगता है।
क्या अब तक तुम लोगों ने अनुभव किया है कि परमेश्वर का कार्य व्यावहारिक है? (हाँ, मैं अनुभव कर चुका हूँ।) यह काफी व्यावहारिक है। परमेश्वर के कार्य की व्यावहारिकता मनुष्य के काल्पनिक, धुँधले विचारों के विपरीत है, इसलिए तुम्हें अपने अंदर की उन चीजों पर विचार करने की आवश्यकता है जो काल्पनिक हैं, या खाली और अव्यावहारिक हैं, या परमेश्वर के वचन में जिनका कोई आधार नहीं है। तुम्हारे लिए इन सबको नकारना ही उचित है। यह निश्चित तौर पर सही है और तुम्हें इस तरह से इसे अनुभव करना होगा। सभी चीजों के सृष्टिकर्ता परमेश्वर ने कितनी चीजें बनाई हैं? वह कितना बुद्धिमान होगा? तुम अगर सोचते हो तुम तीन या पाँच वर्षों में इसका पूरी तरह से अनुभव कर लोगे और थाह पा लोगे, तो यह असंभव है। जीवन भर के अनुभव के बाद भी तुम इसकी थाह नहीं ले पाओगे। इसलिए जब तुम परमेश्वर के वचनों का अनुभव करते हो तो तुम्हें व्यावहारिक होना चाहिए; विवरण से शुरू करके छोटी शुरूआत करो, और सत्य सिद्धांतों की तलाश करो। जब किसी ऐसी चीज का सामना हो जिसकी तुम थाह नहीं ले सकते, तो परमेश्वर के सामने खुद शांत रहना सीखो और चिंतित या अधीर हुए बिना सत्य तलाश करो। कोई परमेश्वर के सामने शांत कैसे रह सकता है? तुम्हारे हृदय को परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और उसके साथ संगति करनी चाहिए और यदि तुम शांत नहीं हो सकते तो तुम परमेश्वर के वचनों को पढ़ सकते हो और उन पर विचार कर सकते हो या परमेश्वर के वचनों के भजन गा सकते हो। यह सब परमेश्वर के सामने शांत रहने के परिणाम तक पहुँचने में मदद करेगा। जब किसी व्यक्ति का हृदय परमेश्वर के पास लौटेगा तो वह शांत हो जाएगा; उसे ऐसा महसूस होगा कि बाहर काम करना या भागना व्यर्थ है, इससे कुछ हासिल नहीं होने वाला। जब तक वह परमेश्वर के सामने शांत है—चाहे उसके वचनों को पढ़ रहा हो, सत्य पर संगति कर रहा हो, या परमेश्वर की स्तुति के भजन गा रहा हो—तब तक उसकी आत्मा कुछ न कुछ जरूर हासिल करेगी और प्रबुद्ध होगी, और उनका हृदय पोषित और पूर्ण महसूस करेगा। धीरे-धीरे तुम परमेश्वर के कार्य को स्पष्ट रूप से देखोगे, उसके प्रति समर्पित होने में सक्षम होगे, और सत्य और जीवन प्राप्त करोगे। यदि लोग सत्य प्राप्त करना चाहते हैं, परमेश्वर को प्राप्त करना चाहते हैं, तो उन्हें बलिदान देना होगा, बहुत कष्ट सहना होगा, और कई वर्षों तक परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने के लिए समय और ऊर्जा खर्च करनी होगी। केवल तभी वे सत्य और जीवन और परमेश्वर का संपूर्ण उद्धार प्राप्त कर सकते हैं।
11 अक्टूबर 2017
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?