वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

Recital-latest-expression-1
वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

श्रेणियाँ

Recital-the-word-appears-in-the-flesh-1
अंतिम दिनों के मसीह के कथन – संकलन

पहले, आओ हम एक भजन गाएं:

हर बार जब तुम लोग इस भजन को गाते हो तब तुम सब इसके विषय में क्या सोचते हो? (अत्याधिक रोमांचित; हर्षित; इसके विषय में सोचो कि परमेश्वर के राज्य का सौन्दर्य कितना महिमामय है, और मानवजाति एवं परमेश्वर सदा सर्वदा के लिए जुड़ जाएंगे।) क्या किसी ने उस रूप के विषय में सोचा है जिसे परमेश्वर के साथ रहने के लिए मनुष्य को धारण करना होगा? तुम लोगों की कल्पनाओं में, किसी व्यक्ति को परमेश्वर के साथ जुड़ने और उस महिमामय जीवन का आनन्द लेने के लिए कैसा होना चाहिए जो राज्य के बाद आता है? (उनके पास एक परिवर्तित स्वभाव होना चाहिए।) उनके पास एक परिवर्तित स्वभाव होना चाहिए, परन्तु किस सीमा तक परिवर्तित होना है? जब इसे बदल दिया जाता है उसके बाद वे किसके समान होंगे? (वे पवित्र बन जाएंगे।) पवित्रता के लिए मानक क्या है? (उनके सभी विचार और सोच मसीह के अनुरूप हैं।) ऐसी अनुरूपता कैसे प्रदर्शित होती है? (वे परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं करते हैं, परमेश्वर से विश्वासघात नहीं करते हैं, परन्तु परमेश्वर के प्रति सम्पूर्ण आज्ञाकारिता अर्पित करते हैं, और अपने अपने हृदय में परमेश्वर का भय मानते हैं।) तुम लोगों के कुछ उत्तर सही पटरी पर हैं। तुम सभी अपने अपने हृदय को खोलो, और जो कुछ तुम सब का हृदय कह रहा है उसे बांटो। (ऐसे लोग जो राज्य में परमेश्वर के साथ रहते हैं वे सत्य के अनुसरण के द्वारा और किसी व्यक्ति, घटना एवं वस्तु के द्वारा रोके बिना अपने कर्तव्य को निभा सकते हैं, और अपने कर्तव्य को निष्ठापूर्वक सम्पन्न कर सकते हैं। और अंधकार के प्रभाव से पूरी तरह अलग होना, अपने अपने हृदय को परमेश्वर के साथ एक मेल में लाना, और परमेश्वर का भय मानना एवं बुराई से दूर रहना संभव हो जाता है।) (हालातों की ओर देखने के हमारे दृष्टिकोण को परमेश्वर के साथ एक मेल में लाया जा सकता है, और हम अंधकार के प्रभाव से अलग हो सकते हैं। निम्नतम मानक यह है कि शैतान के द्वारा हमारा शोषण न किया जाए, किसी भी भ्रष्ट स्वभाव को दूर किया जाए, और परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता को हासिल किया जाए। हम विश्वास करते हैं कि अंधकार के प्रभाव से अलग होना मुख्य बिन्दु है। यदि कोई अंधकार के प्रभाव से अलग नहीं हो सकता है, शैतान के बन्धनों को तोड़ कर आज़ाद नहीं हो सकता है, तो उसने परमेश्वर के उद्धार को अर्जित नहीं किया है।) (परमेश्वर के द्वारा सिद्ध किए जाने का मानक यह है कि मनुष्य परमेश्वर के साथ एक हृदय एवं एक मन का हो। मनुष्य अब परमेश्वर का कोई प्रतिरोध नहीं करता है; वह स्वयं को जान सकता है, सत्य पर अमल करता है, परमेश्वर की समझ को अर्जित करता है, परमेश्वर से प्रेम करता है, और परमेश्वर के साथ एक मेल में आ जाता है। किसी व्यक्ति को यही सब करने की आवश्यकता है।)

लोगों के हृदय में परिणाम का बोझ

ऐसा प्रतीत होता है कि तुम लोगों के हृदय में उस मार्ग के विषय में कुछ है जिसमें तुम सब को चलना चाहिए और तुम लोगों ने इसकी एक अच्छी पकड़ एवं समझ विकसित कर ली है। परन्तु जो कुछ तुम लोगों ने कहा था चाहे वह खोखले शब्द साबित हुए हों या असल वास्तविकता यह इस बात पर निर्भर होती है कि तुम सब दिन प्रतिदिन के अपने अभ्यास में किस पर ध्यान देते हो। तुम लोगों ने सिद्धान्तों में एवं सत्य की विषय वस्तु दोनों में सालों से सत्य के सभी पहलुओं की फसल काटी है। यह प्रमाणित करता है कि लोग आजकल सत्य के लिए प्रयास करने पर जोर देते हैं। और परिणामस्वरूप, सत्य के हर पहलु और हर मद ने यकीनन कुछ लोगों के दिलों में जड़ें जमा ली हैं। फिर भी, वह क्या है जिससे मैं सबसे अधिक डरता हूँ? यह कि यद्यपि सत्य के विषयों, एवं इन सिद्धान्तों ने अपनी जड़ें जमा ली हैं, फिर भी वह वास्तविक विषयवस्तु तुम लोगों के हृदय में ज़्यादा वज़न ही नहीं रखती है। जब तुम सब समस्याओं का सामना करते हो, परीक्षाओं से मुखातिब होते हो, विकल्पों से मुखातिब होते हो – तब तुम सब इन सच्चाईयों की वास्तविकता का लाभ उठाने हेतु कितने सक्षम होगे? परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट करने के बाद क्या वे कठिनाईयों से होकर गुज़रने और तुम्हारी परीक्षाओं से उबरने में तुम लोगों की सहायता करेगा? क्या तुम सब अपनी परीक्षाओं में दृढ़ रहोगे और परमेश्वर के लिए ऊँचे स्वर से एवं साफ साफ गवाही दोगे? क्या पहले तुम सब इन मामलों में रुचि रखते थे? मुझे तुम सब से पूछने की अनुमति दो: अपने अपने हृदय में, प्रतिदिन की अपनी सोच एवं विचारों में, वह क्या है जो तुम सबों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है? क्या तुम लोग कभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचे हो? तुम सबको क्या लगता है सबसे महत्वपूर्ण बात क्या है? कुछ लोग कहते हैं "निश्चित रूप से, यह सत्य को अभ्यास में लाना है"; कुछ लोग कहते हैं "निश्चित रूप से, यह प्रतिदिन परमेश्वर के वचन को पढ़ना है"; कुछ लोग कहते हैं "निश्चित रूप से, यह स्वयं को परमेश्वर के सामने रखना है और प्रतिदिन परमेश्वर से प्रार्थना करना है" और तब ऐसे भी लोग हैं जो कहते हैं "निश्चित रूप से यह अपने कर्तव्य को प्रतिदिन उचित रीति से निभाना है"; फिर भी कुछ लोग हैं जो कहते हैं कि वे सदैव इसके विषय में ही सोचते रहते हैं कि परमेश्वर को किस प्रकार संतुष्ट करें, सभी चीज़ों में किस प्रकार उसका पालन करें, और उसकी इच्छा के मेल में किस प्रकार कार्य करे? क्या यह ऐसा ही है? क्या बस इतना ही है? उदाहरण के लिए, कुछ लोग हैं जो कहते हैं: "मैं बस परमेश्वर की आज्ञा मानना चाहता हूँ। परन्तु जब कुछ घटित होता है तब मैं उसकी आज्ञा नहीं मान सकता।" कुछ लोग कहते हैं: "मैं बस परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहता हूँ। भले ही मैं उसे बस एक बार ही संतुष्ट कर सकूँ, तो यह अच्छा होगा, किन्तु मैं उसे कभी संतुष्ट नहीं कर सकता हूँ।" और कुछ लोग कहते हैं, "मैं सिर्फ परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना चाहता हूँ। परीक्षा के दिनों में बिना किसी शिकायत या निवेदनों के उसकी संप्रभुता एवं प्रबंधों का पालन करते हुए मैं केवल उसके आयोजनों के अधीन होना चाहता हूँ। फिर भी लगभग हर समय मैं आज्ञाकारी होने में असफल हो जाता हूँ।" कुछ अन्य कहते हैं "जब मुझे निर्णयों का सामना करना पड़ता है, तब मैं कभी सत्य को अभ्यास में लाने का चुनाव नहीं कर सकता हूँ। मैं हमेशा शरीर को संतुष्ट करना चाहता हूँ, मैं हमेशा अपनी व्यक्तिगत स्वार्थी अभिलाषाओं को संतुष्ट करना चाहता हूँ।" इसका कारण क्या है? परमेश्वर की परीक्षा के आने से पहले, क्या तुम लोगों ने कई बार स्वयं को चुनौती दी है, और कई बार कोशिश की है और स्वयं को परखा है? देखो यदि तुम लोग वास्तव में परमेश्वर की आज्ञा का पालन कर सकते हो, वास्तव में परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हो, और परमेश्वर से विश्वासघात न करने के लिए सुनिश्चित हो सकते हो। देखो कि तुम सब स्वयं को संतुष्ट नहीं कर सकते हो, अपनी स्वार्थी अभिलाषाओं को संतुष्ट नहीं कर सकते हो, परन्तु सिर्फ परमेश्वर को ही संतुष्ट करते हो, और अपने व्यक्तिगत चुनावों से वंचित होते हो। क्या कोई ऐसा है? वास्तव में, केवल एक ही तथ्य है जिसे बिलकुल तुम लोगों की आंखों के सामने रखा गया है। यह वह है जिसमें तुम लोगों में से हर कोई अत्यधिक रूचि लेता है, जिसे तुम लोग सबसे अधिक जानना चाहते हो, और यह प्रत्येक व्यक्ति के परिणाम एवं नियति का मामला है। तुम सब शायद इसका एहसास न करो, परन्तु यह कुछ ऐसा है जिसका कोई इंकार नहीं कर सकता है। जब मनुष्य के परिणाम की सच्चाई, मानवता के प्रति परमेश्वर की प्रतिज्ञा, और परमेश्वर मनुष्य को किस प्रकार की मंज़िल के पहुंचाने का इरादा करता है उसकी बात आती है, तो मैं जानता हूँ कि कुछ लोग हैं जिन्होंने पहले से ही इन मामलों पर कई बार परमेश्वर के वचनों का अध्ययन किया है। तब ऐसे लोग हैं जो बारम्बार इसकी खोज कर रहे हैं और अपने मनों में इस पर विचार कर रहे हैं, और उन्हें अभी भी कोई नतीजा नहीं मिला है, या शायद किसी निष्कर्ष तक पहुंच गए हैं। अंत में वे अभी भी इस बात के विषय में निश्चित नहीं हैं कि किस प्रकार का परिणाम उनका इंतज़ार करता है। सत्य के संवाद को स्वीकार करते समय, कलीसिया के जीवन को स्वीकार करते समय, अपने कर्तव्य को निभाते समय, अधिकांश लोग हमेशा इन निम्नलिखित प्रश्नों के निश्चित उत्तर को जानना चाहते हैं: मेरा परिणाम क्या होगा? क्या मैं उस पथ पर बिलकुल उसके अंत तक चल सकता हूँ? मनुष्य के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति क्या है? कुछ लोग यह चिंता भी करते हैं: मैं ने अतीत में कुछ किया है, मैं ने कुछ बातों को कहा है, मैं परमेश्वर के प्रति अनाज्ञाकारी रहा हूँ, मैं ने कुछ ऐसी चीज़ें की हैं जिसने परमेश्वर का विश्वासघात किया है, ऐसे कुछ मामले थे जहाँ मैं ने परमेश्वर को संतुष्ट नहीं किया था, परमेश्वर के हृदय को चोट पहुंचाया था, परमेश्वर को मुझ से निराश होने के लिए बाध्य किया था, परमेश्वर को मुझ से घृणा एवं नफरत करने के लिए बाध्य किया था, अतः शायद मेरा परिणाम अज्ञात है। यह कहना सही है कि अधिकतर लोग अपने स्वयं के परिणाम के विषय में असहज महसूस करते हैं। कोई भी यह कहने का साहस नहीं करता है: "मुझे सौ प्रतिशत निश्चितता के साथ महसूस होता है कि मैं ज़िन्दा बचा हुआ इंसान होऊंगा; मैं सौ प्रतिशत निश्चित हूँ कि मैं परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट कर सकता हूँ; मैं ऐसा व्यक्ति हूँ जो परमेश्वर के हृदय का अनुसरण करता है; मैं ऐसा व्यक्ति हूँ जिसकी तारीफ परमेश्वर करता है।" कुछ लोग सोचते हैं कि परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करना विशेष रूप से कठिन है, और यह कि सत्य को अभ्यास में लाना सबसे कठिन बात है। परिणामस्वरूप, ये लोग सोचते हैं कि वे सहायता से परे हैं, और वे एक अच्छे परिणाम के विषय में अपनी आशाओं को जगाने का साहस नहीं करते हैं। या शायद वे विश्वास करते हैं कि वे परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट नहीं कर सकते हैं, और ज़िन्दा बचे हुए इंसान नहीं बन सकते हैं, और इस कारण कहेंगे कि उनके पास कोई परिणाम नहीं है, और एक अच्छी मंज़िल को हासिल नहीं कर सकते हैं। इसकी परवाह किए बगैर कि लोग कितनी सटीकता से सोचते हैं, हर कोई अपने परिणाम के विषय में कई बार आश्चर्य कर रहा है। उनके भविष्य के प्रश्नों पर, या उन प्रश्नों पर कि उन्हें क्या मिलेगा जब परमेश्वर अपने कार्य को समाप्त करता है, ये लोग सदैव गुणा भाग करते रहते हैं, एवं सदैव योजना बनाते रहते हैं। कुछ लोग दोगुनी कीमत चुकाते हैं; कुछ लोग अपने परिवारों एवं अपनी नौकरियों को छोड़ देते हैं; कुछ लोग अपने विवाह के विषय में हार मान लेते हैं; कुछ लोग परमेश्वर के लिए व्यय करने हेतु इस्तीफा दे देते हैं; कुछ लोग अपने कर्तव्य को निभाने के लिए घरों को छोड़ देते हैं; कुछ लोग कठिनाई का चुनाव करते हैं, और अत्यधिक कड़वे एवं थका देनेवाले काम को करना शुरू करते हैं; कुछ लोग धन का समर्पण करने, एवं अपना सर्वस्व समर्पित करने का चुनाव करते हैं; अभी भी कुछ लोग सत्य का अनुसरण करने, एवं परमेश्वर को जानने का अनुसरण करते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम लोग अभ्यास करने का चुनाव कैसे करते हो, क्या वह तरीका जिसके अंतर्गत तुम सब ऐसा करते हो महत्वपूर्ण है? (महत्वपूर्ण नहीं है।) तो हम कैसे समझाएं कि यह महत्वपूर्ण नहीं है? यदि यह तरीका महत्वपूर्ण नहीं है, तो क्या महत्वपूर्ण है? (बाहरी अच्छा व्यवहार सत्य को अभ्यास में लाने का नमूना नहीं है।) (जो हर कोई सोचता है वह महत्वपूर्ण नहीं है। यहाँ मुख्य बात यह है कि हमने सत्य को अभ्यास में लाया है या नहीं, और हम परमेश्वर से प्रेम करते हैं या नहीं।) (मसीही विरोधियों एवं झूठे अगुवों का पतन यह समझने में हमारी सहायता करता है कि बाहरी व्यवहार अत्यंत महत्वपूर्ण बात नहीं है। बाहरी तौर पर ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने बहुत कुछ त्याग दिया है, और ऐसा प्रतीत होता है कि वे कीमत चुकाने के लिए तैयार हैं, परन्तु विश्लेषण करने पर हम देख सकते हैं कि उनके पास सामान्यतः ऐसा हृदय ही नहीं है जो परमेश्वर का भय मानता है; सभी मायनों में वे उसका विरोध करते हैं। वे संकटपूर्ण समयों में हमेशा शैतान के साथ खड़े हो रहे हैं, और परमेश्वर के कार्य में हस्तक्षेप कर रहे हैं। इस प्रकार, यहाँ मुख्य विचार ये हैं कि जब समय आता है तो हम किस ओर खड़े होते हैं, और हमारे दृष्टिकोण क्या हैं।) तुम सब ने अच्छे से बोला है, और ऐसा प्रतीत होता है कि तुम लोगों के पास पहले से ही सत्य को अभ्यास में लाने की, परमेश्वर के इरादों की, और जो कुछ परमेश्वर मनुष्य से मांग करता है उसकी एक मूल समझ एवं मानक है। यह कि तुम सब इस प्रकार से बोल सकते हो जो अत्यंत मर्मस्पर्शी है। यद्यपि यहाँ वहाँ कुछ अनुचित शब्द हैं, फिर भी तुम लोगों के कथन पहले से ही ऐसी व्याख्या के निकट आ रहे हैं जो सत्य के योग्य है। इससे प्रमाणित होता है कि तुम सभी ने लोगों, घटनाओं, एवं अपने चारों ओर की वस्तुओं, और अपने समस्त परिवेश जिसे परमेश्वर ने व्यवस्थित किया है, एवं हर एक चीज़ जिसे तुम सब देख सकते हो उनके विषय में अपने स्वयं की वास्तविक समझ को पहले ही विकसित कर लिया है। ये समझ सत्य के निकट आ रही है। यद्यपि जो कुछ तुम लोगों ने कहा था वह पूरी तरह से विस्तृत नहीं है, और कुछ शब्द बिलकुल भी उचित नहीं हैं, फिर भी तुम सब की समझ पहले से ही सत्य की वास्तविकता के निकट आ रही है। तुम लोगों को इस तरह बोलते हुए सुनने से मुझे खुशी होती है।

लोगों के विश्वास सत्य का स्थान नहीं ले सकते हैं

कुछ लोग ऐसे हैं जो कठिनाईयों को सह सकते हैं; वे दाम चुका सकते हैं; उनका बाहरी आचरण बहुत अच्छा है; वे बहुत ही आदरणीय हैं; और उनके पास अन्य लोगों की सराहना है। तुम सब क्या सोचते हो: क्या इस प्रकार के बाहरी आचरण को सत्य को अभ्यास में लाने के रूप में माना जा सकता है? क्या तुम लोग कह सकते हो कि यह व्यक्ति परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट कर रहा है? ऐसा क्यों है कि बार-बार लोग इस प्रकार के व्यक्ति को देखते हैं और सोचते हैं कि वे परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हैं, यह सोचते हैं कि वे सत्य को अभ्यास में लाने के मार्ग पर चल रहे हैं, और यह कि वे परमेश्वर के मार्ग पर चल रहे हैं? कुछ लोग क्यों इस प्रकार सोचते हैं? इसके लिए केवल एक ही व्याख्या है? और वह व्याख्या क्या है? यह बहुत से लोगों के लिए ऐसा ही है, ऐसे प्रश्न जैसे सत्य को अभ्यास में लाना क्या है, परमेश्वर को संतुष्ट करना क्या है, और सत्य की यथार्थता का होना वास्तव में क्या है—ये प्रश्न बिलकुल स्पष्ट नहीं हैं। अतः कुछ लोग हैं जिन्हें अकसर ऐसे लोगों के द्वारा धोखा दिया जाता है जो ऊपर से आत्मिक प्रतीत होते हैं, कुलीन प्रतीत होते हैं, ऐसे प्रतीत होते हैं कि उनके पास उत्कृष्ट स्वरूप है। जहाँ तक ऐसे लोगों की बात है जो पत्रियों एवं सिद्धान्तों के विषय में बोल सकते हैं, और जिनके सन्देश एवं कार्य सराहना के योग्य प्रतीत होते हैं, उनके प्रशंसकों ने उनके कार्यों के सार को, उनके कार्यों के पीछे के सिद्धान्तों को, और उनके लक्ष्य क्या हैं उनको कभी अच्छी तरह से नहीं देखा है। और उन्होंने कभी अच्छी तरह से नहीं देखा है कि ये लोग वास्तव में परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं या नहीं, और वे ऐसे लोग हैं या नहीं जो सचमुच में परमेश्वर का भय मानते हैं और बुराई से दूर रहते हैं। उन्होंने इन लोगों की मानवता के मूल-तत्व को कभी नहीं परखा है। इसके बजाय, परिचित होने के पहले कदम से ही, थोड़ा थोड़ा करके, वे इन लोगों की तारीफ करने, और इन लोगों का परम आदर करने लग जाते हैं, और अन्त में ये लोग उनके आदर्श बन जाते हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ लोगों के मनों में, वे आदर्श जिनकी वे उपासना करते हैं, जिन पर वे विश्वास करते हैं वे अपने परिवारों एवं नौकरियों को छोड़ सकते हैं, और ऊपर से देखने पर वे कीमत चुका सकते हैं—ये आदर्श लोग ऐसे हैं जो वास्तव में परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हैं, और ऐसे लोग हैं जो वास्तव में एक अच्छा परिणाम एवं एक अच्छी मंज़िल को प्राप्त कर सकते हैं। उनके मनों में, ये आदर्श ऐसे लोग हैं जिनकी प्रशंसा परमेश्वर करता है। किस चीज़ ने लोगों को प्रेरित किया है कि इस प्रकार के विश्वास को रखें? इस मामले का सार क्या है? यह कौन कौन से परिणामों की ओर ले जा सकता है? आओ हम पहले इसके सार के विषय (सामग्री) की चर्चा करें।

लोगों के दृष्टिकोणों, लोगों के रीति व्यवहारों, जिन सिद्धान्तों को लोग अभ्यास करने के लिए चुनते हैं, और जिस पर लोग सामान्य तौर पर जोर देते हैं उनके सम्बन्ध में, अनिवार्य रूप से इन सब का मानवजाति से की गई परमेश्वर की मांगों का कोई लेना देना नहीं है। इसकी परवाह किए बगैर कि लोग सतही मसलों पर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं या गंभीर मसलों पर, पत्रियों एवं सिद्धान्तों या वास्तविकता पर, लोग उसके मुताबिक नहीं चलते हैं जैसे उन्हें पूरी तरह से चलना चाहिए, और वे उसे नहीं जानते हैं जिन्हें उन्हें पूरी तरह से जानना चाहिए। इसका कारण यह है कि लोग सत्य को बिलकुल भी पसन्द नहीं करते हैं। इसलिए, लोग परमेश्वर के वचन में सिद्धान्तों को खोजने एवं अभ्यास करने के लिए समय लगाने एवं प्रयास करने के लिए तैयार नहीं है। इसके बदले, वे छोटे रास्तों का उपयोग करने को प्राथमिकता देते हैं, और जिसे वे समझते हैं, जिसे वे जानते हैं, कि यह अच्छा अभ्यास एवं अच्छा व्यवहार है उसका सारांश निकालते हैं। तब यह सारांश अनुसरण करने के लिए उनका स्वयं का लक्ष्य, एवं अभ्यास करने हेतु सत्य बन जाता है। इसका प्रत्यक्ष परिणाम ऐसे लोग हैं जो सत्य को अभ्यास में लाने के स्थान पर अच्छे मानवीय व्यवहार को उपयोग में लाते हैं, जो परमेश्वर के अनुग्रह को पाने हेतु खुशामद करने के लिए लोगों की अभिलाषाओं को भी संतुष्ट करते हैं। यह सत्य के साथ संघर्ष करने के लिए, एवं परमेश्वर के साथ तर्क करने एवं विवाद करने के लिए घातक चीज़ें देता है। ठीक उसी समय, लोग अनैतिक ढंग से परमेश्वर को भी दरकिनार कर देते हैं, और अपने हृदय के आदर्शों को परमेश्वर के स्थान में रख देते हैं। केवल एक ही मूल कारण है जिससे लोगों के पास ऐसे अज्ञानता भरे कार्य, अज्ञानता भरे दृष्टिकोण, या एकतरफा दृष्टिकोण एवं रीति व्यवहार होते हैं, और आज मैं तुम लोगों को उसके बारे में बताऊंगा। कारण यह है कि यद्यपि हो सकता है कि लोग परमेश्वर के पीछे चलते हों, प्रतिदिन उससे प्रार्थना करते हों, और प्रतिदिन परमेश्वर का वचन पढ़ते हों, फिर भी वे परमेश्वर के इच्छा को वास्तव में नहीं समझते हैं। यही समस्या की जड़ है। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के हृदय को समझता है, यह समझता है कि परमेश्वर क्या पसन्द करता है, किस चीज़ से परमेश्वर घृणा करता है, परमेश्वर क्या चाहता है, किस चीज़ को परमेश्वर अस्वीकार करता है, किस प्रकार के व्यक्ति से परमेश्वर प्रेम करता है, किस प्रकार के व्यक्ति को परमेश्वर नापसन्द करता है, मनुष्य से की गई अपनी मांगों के प्रति परमेश्वर किस प्रकार के मानकों (मानदंड) को लागू करता है, मनुष्य को सिद्ध करने के लिए वह किस प्रकार की पद्धति को अपनाता है, क्या तब भी उस व्यक्ति के पास अपने व्यक्तिगत विचार हो सकता है? क्या वह बस यों ही जा सकता है तथा किसी और व्यक्ति की आराधना कर सकता है? क्या कोई साधारण व्यक्ति उनका आदर्श बन सकता है? यदि कोई परमेश्वर के इरादों को समझता है, तो उनका दृष्टिकोण उसकी अपेक्षा थोड़ी बहुत न्यायसंगत होती है। वे मनमाने ढंग से किसी भ्रष्ट व्यक्ति को आदर्श के रूप में लेने वाले नहीं है, न ही वे, सत्य को अमल में लाने के पथ पर चलते समय, यह विश्वास करेंगे कि मनमाने ढंग से कुछ साधारण नियमों या सिद्धान्तों के मुताबिक चलना ही सत्य को अमल में लाने के बराबर है।

उस मानक के सम्बन्ध में अनेक राय हैं जिसके तहत परमेश्वर किसी मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करता है

आओ हम इस विषय पर वापस आएं और परिणाम के विषय पर चर्चा करना निरन्तर जारी रखें।

चूँकि प्रत्येक व्यक्ति अपने परिणाम को लेकर चिन्तित होता है, क्या तुम लोग जानते हो कि परमेश्वर किस प्रकार उस परिणाम को निर्धारित करता है? परमेश्वर किस रीति से किसी व्यक्ति के परिणाम को निर्धारित करता है? और किसी व्यक्ति के परिणाम को निर्धारित करने के लिए वह किस प्रकार के मानक का उपयोग करता है? और जब किसी मनुष्य का परिणाम अभी तक निर्धारित नहीं हुआ है, तो परमेश्वर इस परिणाम को प्रकट करने के लिए क्या करता है? क्या कोई इसे जानता है? जैसा मैं ने अभी अभी कहा था, कुछ लोग हैं जिन्होंने लम्बे समय पहले से ही परमेश्वर के वचन की खोजबीन की है। ये लोग मानवजाति के परिणाम के विषय में, उन श्रेणियों के विषय में जिस में यह परिणाम विभाजित होता है, और उन विभिन्न परिणामों के विषय में सुरागों की खोज कर रहे हैं जो विभिन्न प्रकार के लोगों का इंतज़ार कर रहे हैं। वे यह भी जानना चाहते हैं कि किस प्रकार परमेश्वर का वचन मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करता है, उस प्रकार का मानक जिसे परमेश्वर उपयोग करता है, और वह रीति जिसके अंतर्गत वह मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करता है। फिर भी अन्त में ये लोग किसी भी चीज़ का पता नहीं लगा पाते हैं। वास्तविक तथ्य में, परमेश्वर के वचन के मध्य इस मामले पर बहुमूल्य रूप से थोड़ा बहुत ही कहा गया है। ऐसा क्यों है? अगर मनुष्य के परिणाम को अभी तक प्रकट नहीं किया गया है, परमेश्वर किसी को बताना नहीं चाहता है कि अन्त में क्या होने वाला है, और न ही वह किसी को समय से पहले उनकी नियति के विषय में सूचित करना चाहता है। इसका कारण यह है कि परमेश्वर के ऐसा करने से मनुष्य को कुछ लाभ नहीं होता। इस वक्त, मैं सिर्फ तुम लोगों को उस रीति के विषय में बताना चाहूंगा जिसके अंतर्गत परमेश्वर मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करता है, उन सिद्धान्तों के विषय में बताना चाहूंगा जिन्हें वह मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करने के लिए, और इस परिणाम को प्रदर्शित करने के लिए अपने कार्य में उपयोग में लाता है, साथ ही साथ उस मानक के विषय में भी बताना चाहूंगा जिसे वह यह निर्धारित करने के लिए इस्तेमाल करता है कि कोई व्यक्ति ज़िन्दा रह सकता है या नहीं। क्या यह वह बात नहीं है जिसके विषय में तुम सब अत्यंत चिन्तित हो? अतः फिर, लोग किस प्रकार उस मार्ग का एहसास करते हैं जिसके द्वारा परमेश्वर मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करता है? तुम लोगों ने इस मामले पर अभी अभी थोड़ा बहुत कहा था। तुम लोगों में से कुछ ने कहा था कि यह उनके कर्तव्य को विश्वासयोग्यता से निभाने, एवं परमेश्वर के लिए खर्च करने का एक प्रश्न है; कुछ ने कहा था कि यह परमेश्वर की आज्ञा मानना और परमेश्वर को संतुष्ट करना है; कुछ लोगों ने कहा था कि यह परमेश्वर की दया में रहना है; और कुछ लोगों ने कहा था कि यह शांत जीवन जीना है। जब तुम सब इन सच्चाईयों को अमल में लाते हो, जब तुम लोग अपनी कल्पना के सिद्धान्तों को अमल में लाते हो, तब क्या तुम सब जानते हो कि परमेश्वर क्या सोचता है? क्या तुम लोगों ने कभी विचार किया है कि इस प्रकार से आगे बढ़ना परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट करता है या नहीं? यह परमेश्वर के मानक (स्टैण्डर्ड) को पूरा करता है या नहीं? यह परमेश्वर की मांग को पूरा करता है या नहीं? मेरा मानना है कि अधिकांश लोग इस पर वास्तव में विचार नहीं करते हैं। वे बस यंत्रवत् रूप से परमेश्वर के वचन के एक भाग को, या उपदेशों के एक भाग को, या कुछ निश्चित आत्मिक मनुष्यों के मानकों को लागू करते हैं जिन्हें वे पसन्द करते हैं, और इसे करने के लिए या उसे करने के लिए स्वयं को बाध्य करते हैं। वे मानते हैं कि यह सही तरीका है, अतः वे उसके मुताबिक चलते रहते हैं, उसे करते रहते हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि अन्त में क्या होता है। कुछ लोग सोचते हैं: "मैं ने कुछ अनेक वर्षों से विश्वास किया है; मैं ने सदैव इस मार्ग का अभ्यास किया है; मैं महसूस करता हूँ कि मैं ने वास्तव में परमेश्वर को संतुष्ट किया है; मैं यह भी महसूस करता हूँ कि मैं ने इससे बहुत कुछ प्राप्त किया है। क्योंकि इस समय अवधि के दौरान मैं बहुत सारी सच्चाईयों को समझने लगा हूँ, और बहुत सी बातों को समझने लगा हूँ जिन्हें मैं पहले कभी नहीं समझता था—विशेष रूप में, मेरे कई विचार एवं दृष्टिकोण बदल चुके हैं, मेरे जीवन के मूल्य काफी कुछ बदल चुके हैं, और मेरे पास इस संसार की अच्छी खासी समझ है।" ऐसे लोग विश्वास करते हैं कि यह एक फसल है, और यह मनुष्य के लिए परमेश्वर के कार्य का अंतिम परिणाम है। तुम लोगों की राय में, इन मानकों और तुम सभी के रीति व्यवहारों (अभ्यास) को एक साथ लेकर, क्या तुम लोग परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट कर रहे हो? कुछ लोग पूर्ण निश्चय के साथ कहेंगे, "निश्चित रूप से! हम परमेश्वर के वचन के अनुसार अभ्यास कर रहे हैं; जो कुछ उस भाई ने प्रचार किया था और संगति में विचार विमर्श किया था हम उसके अनुसार अभ्यास कर रहे हैं; हम हमेशा से अपने कर्तव्य को निभा रहे हैं, हमेशा से परमेश्वर का अनुसरण कर रहे हैं, और हमने परमेश्वर को कभी नहीं छोड़ा है। इसलिए हम पूर्ण आत्मविश्वास के साथ कह सकते हैं कि हम परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि हम परमेश्वर के इरादों को कितना समझते हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि हम परमेश्वर के वचन को कितना समझते हैं, क्योंकि हम हमेशा से ही परमेश्वर के अनुरूप होने के पथ की खोज करते रहे हैं। यदि हम सही रीति से कार्य करें, और सही रीति से अभ्यास करें, तो परिणाम सही होगा।" तुम लोग इस दृष्टिकोण के बारे में क्या सोचते हो? क्या यह सही है? कदाचित् कुछ ऐसे लोग हैं जो यह कहते हैं: "मैं ने इन चीज़ों के विषय में पहले कभी नहीं सोचा है। मैं केवल इतना सोचता हूँ कि यदि मैं लगातार अपने कर्तव्य को निभाता रहूं और परमेश्वर के वचन की अपेक्षाओं के अनुसार निरन्तर कार्य करता रहूं, तो मैं जीवित बच सकता हूँ। मैं ने कभी उस प्रश्न पर विचार नहीं किया है कि मैं परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट कर सकता हूँ या नहीं, मैं ने कभी यह विचार नहीं किया है कि मैं उसके द्वारा अपेक्षित मानक को हासिल कर रहा हूँ या नहीं। चूँकि परमेश्वर ने मुझे कभी नहीं बताया है, और न ही किसी स्पष्ट निर्देश के साथ मेरी आपूर्ति की है, मैं विश्वास करता हूँ कि जब तक मैं बढ़ता जाता हूँ, परमेश्वर संतुष्ट होगा और उसके पास मेरे लिए कोई अतिरिक्त मांग नहीं होनी चाहिए।" क्या ये विश्वास सही हैं? जहाँ तक मेरी बात है, अभ्यास का यह तरीका, सोचने का यह तरीका, और ये दृष्टिकोण—वे सब अपने साथ कल्पनाओं एवं कुछ अंधत्व को लेकर आते हैं। जब मैं ऐसा कहता हूँ, तो कदाचित् तुम लोगों में से कुछ हैं जो थोड़ी बहुत निराशा महसूस करते हैं: "अंधापन? यदि यह अंधापन है, तो हमारे उद्धार की आशा, हमारे जीवित बचने की आशा बहुत ही छोटी है, और बहुत ही अनिश्चित है, है कि नहीं? क्या तुम्हारा ऐसा कहना हमारे ऊपर ठण्डा पानी डालने के समान नहीं है?" इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम लोग क्या विश्वास करते हो, क्योंकि ऐसी बातें जो मैं कहता और करता हूँ उनका अभिप्राय यह नहीं है कि तुम सब को लगे मानो तुम लोगों के ऊपर ठण्डा पानी डाला जा रहा है। इसके बजाय, इसका अभिप्राय यह है कि परमेश्वर के इरादों के विषय में तुम सब की समझ को बेहतर किया जाए, और परमेश्वर क्या सोच रहा है उस पर तुम लोगों की पकड़ को बेहतर किया जाए, परमेश्वर क्या पूरा करना चाहता है, परमेश्वर किस प्रकार के व्यक्ति को पसन्द करता है, परमेश्वर किस से घृणा करता है, परमेश्वर किसे तुच्छ जानता है, किस प्रकार के व्यक्ति को परमेश्वर पाना चाहता है, और किस प्रकार के व्यक्ति को परमेश्वर ठुकराता है। इसका अभिप्राय यह है कि तुम सब के मनों को स्पष्टता दी जाए, कि साफ साफ जानने में तुम सब की मदद की जाए कि तुम लोगों में से हर एक एवं प्रत्येक व्यक्ति के कार्य एवं विचार उस मानक से कितनी दूर भटक गए हैं जिसकी अपेक्षा परमेश्वर के द्वारा की गई है। क्या इन विषयों पर विचार विमर्श करना आवश्यक है? क्योंकि मैं जानता हूँ तुम सब ने लम्बे समय से विश्वास किया है, और बहुत अधिक प्रचार को ध्यान से सुना है, परन्तु ये बिलकुल ऐसी चीज़ें हैं जिनकी अत्यंत घटी है। शायद तुम लोगों ने अपनी नोटबुक में हर एक सत्य को लिख लिया है, शायद तुम सब ने उसे भी दर्ज कर लिया है जिस पर तुम लोग व्यक्तिगत रूप से अपने अपने मन में एवं अपने अपने हृदय में विश्वास करते हो कि यह महत्वपूर्ण है। जब तुम सब अभ्यास करते हो तब इसका उपयोग करने के लिए, एवं परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए योजना बनाओ; जब तुम लोग स्वयं को आवश्यकता में पाते हो तब इसका उपयोग करो; उन कठिन समयों से होकर गुज़रने के लिए इसका उपयोग करो जो तुम लोगों की आँखों के सामने होती हैं; या जब तुम सब अपनी अपनी ज़िन्दगी को जीते हो तब बस इन सच्चाईयों को तुम लोगों के साथ होने दो। जहाँ तक मेरी बात है, यदि तू केवल अभ्यास करता है, तो तू कितने सटीक रूप से अभ्यास कर रहा है यह महत्वपूर्ण नहीं है। तब सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात क्या है? यह ऐसा है कि जब तू अभ्यास कर रहा है, तब तेरा हृदय पूरी निश्चयता के साथ जानता है कि हर एक कार्य जो तू कर रहा है, और प्रत्येक कार्य ऐसा कार्य है या नहीं जिसे परमेश्वर चाहता है, हर कार्य जिसे तू करता है, हर चीज़ जो तू सोचता है, और तेरे हृदय में जो परिणाम एवं लक्ष्य हैं वे परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट करते हैं या नहीं, परमेश्वर की मांगों को पूरा करते हैं या नहीं, और परमेश्वर उनकी स्वीकृति देता है या नहीं? ये महत्वपूर्ण चीज़ें हैं।

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII

0खोज परिणाम