वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन – संकलन

परमेश्वर का अधिकार (II)    भाग तीन

स्वतन्त्रता: तीसरा घटनाक्रम

जब कोई व्यक्ति बचपन एवं किशोरावस्था से होकर गुज़र जाता है और आहिस्ता आहिस्ता एवं अनिवार्य रूप से परिपक्वता की ओर पहुँच जाता है, तो उनके लिए अगला कदम होता है कि वे अपनी किशोरावस्था को पूरी तरह से अलविदा कह दें, अपने अपने माता पिता को अलविदा कह दें, और एक स्वतन्त्र वयस्क के रूप में उस मार्ग का सामना करें जो सामने है। इस बिन्दु पर उन्हें सभी लोगों, घटनाओं, एवं चीज़ों का सामना करना होगा जिन्हें एक व्यस्क को सामना करना पड़ता है, और अपनी नियति की जंज़ीर की सभी कड़ियों का सामना करना होगा।यह तीसरा घटनाक्रम है जिससे होकर किसी व्यक्ति को गुज़रना होगा।

1. स्वतन्त्र होने के पश्चात्, कोई व्यक्ति सृष्टिकर्ता की संप्रभुता का अनुभव करना आरम्भ कर देता है

यदि किसी व्यक्ति का जन्म एवं पलना-बढ़ना उसकी जीवन यात्रा के लिए, किसी व्यक्ति की नियति की आधारशिला रखने के लिए "तैयारी की अवधि" है, तो उसकी स्वतन्त्रता जीवन में उसकी नियति के लिए आरम्भिक आत्मभाषण है। यदि किसी व्यक्ति का पलना-बढ़ना उस धन-समृद्धि के समान है जिसे उन्होंने जीवन में अपनी नियति के लिए संचय करके रखा है, तो किसी व्यक्ति की स्वतन्त्रता तब होती है जब वे अपनी धन-समृद्धि को खर्च करना एवं उसमें जोड़ना आरम्भ करते हैं। जब कोई अपने माता पिता को छोड़ देता है और स्वतन्त्र हो जाता है, तो वे सामाजिक स्थितियाँ जिनका वह सामना करता है, और उसके लिए उपलब्ध कार्य व जीवनवृत्ति दोनों का प्रकार नियति द्वारा आदेश दिया जाता है और उनका किसी के माता पिता के साथ कोई लेना देना नहीं होता है। कुछ लोग महाविद्यालय में अच्छे मुख्य विषय लेते हैं और अंत में स्नातक के पश्चात् एक संतोषजनक नौकरी पाते हैं, और अपने जीवन की यात्रा में पहली विजयी छलांग लगाते हैं। कुछ लोग बहुत से विभिन्न कौशलों को सीखते और उनमें महारत हासिल कर लेते हैं और फिर भी ऐसी नौकरी नहीं ढूँढ़ पाते हैं जो उन पर जँचती हो या अपने पद को नहीं पाते हैं, जीवनवृत्ति को तो बिलकुल भी नहीं पाते हैं; अपनी जीवन यात्रा के आरम्भ में ही वे अपने आपको हर एक मोड़ पर बाधित, परेशानियों से व्याकुल, अपनी भविष्य की योजनाओं को निराशाजनक और अपने जीवन को अनिश्चित पाते हैं। कुछ लोग स्वयं को कर्मठतापूर्वक अपने अध्ययनों में लगा देते हैं, फिर भी ऊँची शिक्षा पाने के लिए अपने सभी अवसरों से बहुत कम अन्तर से चूक जाते हैं, और कभी सफलता हासिल न करने के लिए नियति के द्वारा निर्धारित होते हैं, अपनी जीवन यात्रा में उनकी सबसे पहली आकांक्षा अचानक ही गायब हो जाती है। न जानते हुए कि आगे का मार्ग सपाट है या पथरीला, वे पहली बार महसूस करते हैं कि मानव की नियति कितनी विभिन्नताओं से भरी हुई है, और इसलिए वे जीवन को आशा एवं भय के साथ समझते हैं। कुछ लोग, बहुत अधिक शिक्षित न होने के बावजूद भी, पुस्तकें लिखते हैं और बड़ी प्रसिद्धि हासिल करते हैं; कुछ, हालाँकि पूरी तरह से अशिक्षित हैं, फिर भी व्यवसाय में पैसा कमाते हैं और इसके द्वारा स्वयं का खर्च वहन करने में समर्थ हैं। कोई व्यक्ति कौन सा व्यवसाय चुनता है, कोई व्यक्ति कैसे जीविका अर्जित करता है: क्या लोगों के पास इस पर कोई नियन्त्रण है कि वे अच्छा चुनाव करते हैं या बुरा चुनाव? क्या वे अपनी इच्छाओं एवं निर्णयों से सहमत होते हैं? अधिकांश लोग चाहते हैं कि वे कम काम करें और अधिक कमा सकें, धूप और बरसात में परिश्रम न करें, अच्छे अच्छे कपड़े पहनें, हर जगह जगमगाएँ और चमकें, दूसरों से ऊँचा उठें, और अपने पूर्वजों का सम्मान बढ़ाएँ। लोगों की इच्छाएँ तो बहुत ही बढ़िया होती हैं, किन्तु जब लोग अपने जीवन की यात्रा में अपना पहला कदम उठाते हैं, तब उन्हें धीरे धीरे एहसास होता है कि मानव की नियति कितनी अपूर्ण है, पहली बार वे सचमुच में आभास करते हैं कि, यद्यपि कोई व्यक्ति अपने भविष्य के लिए जोरदार योजना बना सकता है, यद्यपि कोई अपने लिए साहसिक कल्पनाओं को आश्रय दे सकता है, फिर भी किसी के पास अपने सपनों को साकार करने की योग्यता या सामर्थ्य नहीं होती है, और कोई भी अपने स्वयं के भविष्य को नियन्त्रित करने की स्थिति में नहीं होता है। किसी व्यक्ति के सपनों एवं उन सच्चाईयों के बीच हमेशा कुछ दूरियाँ होंगी जिनका सामना उसे करना होगा; चीज़ें वैसी कभी नहीं होती हैं जैसा कोई व्यक्ति चाहता है कि वे हों, और जब ऐसी सच्चाईयों से सामना होता है तो लोग कभी भी संतुष्टि या तृप्ति हासिल नहीं कर सकते हैं। यहाँ तक कि कुछ लोग कल्पना की जाने लायक किसी भी हद तक जाएँगे, अपनी स्वयं की नियति को बदलने की कोशिश में, वे अपनी जीविका एवं भविष्य के वास्ते बहुत अधिक प्रयास करेंगे और बड़े बड़े बालिदन करेंगे। किन्तु अंत में, भले ही वे अपने सपनों एवं इच्छाओं को अपने स्वयं के कठिन परिश्रम के माध्यम से साकार कर सकते हैं, फिर भी वे अपनी नियति को कभी बदल नहीं सकते हैं, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे कितने दृढ़ निश्चय के साथ कोशिश करते हैं क्योंकि वे कभी उससे आगे नहीं बढ़ सकते हैं जो नियति ने उन्हें आवंटित किया है। योग्यता, बौद्धिक क्षमता, एवं इच्छा शक्ति में भिन्नताओं के बावजूद भी, लोग नियति के सामने बिलकुल एक समान हैं, जो महान एवं तुच्छ, ऊंचे एवं नीचे, और उच्च एवं नीच के बीच कोई भेद नहीं करती है। कोई किस व्यवसाय में निरन्तर लगा रहता है, कोई जीविका के लिए क्या करता है, और कोई जीवन में कितनी धन-सम्पत्ति इकट्ठा करता है ये उसके माता पिता, उसकी प्रतिभाओं, उसके प्रयासों या उसकी महत्वाकांक्षाओं के द्वारा तय नहीं किए जाते हैं, बल्कि सृष्टिकर्ता के द्वारा पूर्वनिर्धारित किए जाते हैं।

2. अपने माता पिता को छोड़ना और जीवन के रंगमंच में अपनी भूमिका अदा करने के लिए ईमानदारी से शुरुआत करना

जब कोई व्यक्ति परिपक्व हो जाता है, तो वह अपने माता पिता को छोड़ने और अपने बलबूते पर कुछ करने में सक्षम हो जाता है, और यह इसी बिन्दु पर होता है कि वह सही मायने में अपनी भूमिका अदा करना शुरू कर देता है, यह कि जीवन में उसका मिशन धुँधला नहीं होता है और धीरे धीरे स्पष्ट हो जाता है। कोई व्यक्ति नाममात्र के लिए अभी भी अपने माता पिता के करीब बना रहता है, परन्तु क्योंकि उसका मिशन एवं वह भूमिका जिसे वह जीवन में अदा करता है उनका उसके माता पिता के साथ कोई लेना देना नहीं होता है, इसलिए वास्तविकता में यह घनिष्ठ बन्धन आहिस्ता आहिस्ता टूट जाता है जब कोई व्यक्ति धीरे धीरे स्वतन्त्र हो जाता है। जैविक दृष्टिकोण से, लोग अभी भी अवचेतन रूप में माता पिता पर निर्भर होने से अपने आपको रोक नहीं सकते हैं, किन्तु वस्तुनिष्ठ रूप से कहें, तो जब एक बार वे बड़े हो जाते हैं तो उनके पास अपने माता पिता से बिलकुल अलग जीवन होता है, और वे उन भूमिकाओं को अदा करेंगे जिन्हें उन्होंने स्वतन्त्र रूप से ग्रहण किया है ।जन्म व बच्चों के पालन पोषण के अलावा, किसी बच्चे के जीवन में माता पिता की ज़िम्मेदारी होती है कि उस बच्चे या बच्ची के पलने-बढ़ने के लिए बस एक औपचारिक वातावरण प्रदान करें, क्योंकि सृष्टिकर्ता के पूर्वनियोजन को छोड़ किसी भी चीज़ का उस व्यक्ति की नियति से कोई सम्बन्ध नहीं होता है। कोई भी इस चीज़ को नियन्त्रित नहीं कर सकता है कि किसी व्यक्ति का कैसा भविष्य होगा; इसे बहुत पहले ही पूर्वनिर्धारित किया जाता है, और यहाँ तक कि उसके माता पिता भी उसकी नियति को नहीं बदल सकते हैं। जहाँ तक नियति की बात है, हर एक व्यक्ति स्वतन्त्र है, और हर स्त्री या पुरुष की अपनी स्वयं की नियति होती है। अतः किसी के भी माता पिता जीवन में उसकी नियति को नहीं टाल सकते हैं या उस भूमिका को जरा सा भी प्रभावित नहीं कर सकते हैं जिसे वह जीवन में अदा करता है। ऐसा कहा जा सकता है कि वह परिवार जिसमें किसी व्यक्ति का जन्म लेना तय किया जाता है, और वह वातावरण जिसमें वह पलता-बढ़ता है, वे जीवन में उसके मिशन को पूरा करने के लिए उन पूर्व शर्तों से बढ़कर और कुछ नहीं हैं।वे किसी भी तरह से जीवन में किसी व्यक्ति के भाग्य को या उस प्रकार की नियति को निर्धारित नहीं करते हैं जिसके मध्य कोई स्त्री या पुरुष अपने मिशन को पूरा करता है। और इसलिए किसी के भी माता पिता जीवन में उसके मिशन को पूरा करने में उसकी सहायता नहीं कर सकते हैं, किसी के भी सगे-सम्बन्धी जीवन में उसकी भूमिका को ग्रहण करने में उसकी सहायता नहीं कर सकते हैं। किस प्रकार कोई व्यक्ति अपने मिशन को पूरा करता है और वह किस प्रकार के जीवन जीने के वातावरण में अपनी भूमिका को अदा करता है यह जीवन में उसकी नियति के द्वारा पूरी तरह से निर्धारित किया जाता है। दूसरे शब्दों में, कोई भी वस्तुनिष्ठ स्थितियाँ किसी व्यक्ति के मिशन को प्रभावित नहीं कर सकती हैं, जिसे सृष्टिकर्ता के द्वारा पूर्वनिर्धारित किया जाता है। सभी लोग अपने स्वयं के पलने-बढ़ने के विशेष वातावरण में परिपक्व होते जाते हैं, तब आहिस्ता आहिस्ता, कदम दर कदम, जीवन में अपने स्वयं के मार्गों में चल पड़ते हैं, उन तकदीरों को पूरा करते हैं जिन्हें सृष्टिकर्ता के द्वारा उनके लिए नियोजित किया गया था, और स्वाभाविक रूप से, अनायास ही मानवता के विशाल समुद्र में प्रवेश करते हैं और जीवन में अपने स्वयं के पदों को ग्रहण करते हैं, जहाँ वे सृष्टिकर्ता के पूर्वनिर्धारण के वास्ते, और उसकी संप्रभुता के वास्ते, सृजित किए गए प्राणियों के रूप में अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करना शुरू करते हैं।

विवाह: चौथा घटनाक्रम

जब कोई उम्र में बढ़ता है एवं परिपक्व होता है, तो वह अपने माता पिता से और उस वातावरण से और भी अधिक दूर हो जाता है जिसमें वह जन्मा और पला-बढ़ा था, और इसके बदले वह अपने जीवन के लिए एक दिशा को खोजना और उस तरीके से अपने स्वयं के जीवन के लक्ष्यों को पाने का निरन्तर प्रयास शुरू कर देता है जो उसके माता पिता से भिन्न होता है। इस दौरान उसे अपने माता पिता की अब और आवश्यकता नहीं होती है, परन्तु उसके बजाए एक साथी की आवश्यकता होती है जिसके साथ वह अपने जीवन को बिता सकता हैः एक पत्नी, एक ऐसा इंसान जिसके साथ उसकी नियति घनिष्ठता से परस्पर जुड़ी हुई होती है। इस तरह से, पहली बड़ी घटना जिसका वह स्वतन्त्रता के पश्चात् सामना करता है वह विवाह है, चौथा घटनाक्रम जिससे होकर उसको गुज़रना होगा।

1. विवाह के विषय में किसी के पास कोई विकल्प नहीं है।

किसी व्यक्ति के जीवन में विवाह एक मुख्य घटना होती है; यह वह समय है जब कोई सचमुच विभिन्न प्रकार की ज़िम्मेदारियों को ग्रहण करना शुरू करता है, विभिन्न प्रकार के मिशन को धीरे-धीरे पूरा करना आरम्भ करता है। लोग विवाह के बारे में बहुत से भ्रमों को पनाह देते हैं इससे पहले कि वे स्वयं इसका अनुभव करें, और ये सब भ्रम बहुत ही खूबसूरत हैं। महिलाएँ कल्पना करती हैं कि उनके होने वाले पति सुन्दर राजकुमार होंगे, और पुरुष कल्पना करते हैं कि वे बर्फ जैसी सफेद स्त्री से विवाह करेंगे। ये कल्पनाएँ यह दिखाने के लिए की जाती हैं कि प्रत्येक व्यक्ति की विवाह के लिए कुछ निश्चित अपेक्षाएँ होती हैं, उनकी स्वयं की मांगें एवं मानक होते हैं। हालाँकि इस बुरे युग में लोगों के ऊपर विवाह के बारे में विकृत संदेशों की लगातार बमबारी की जाती है, जो और भी अधिक अतिरिक्त अपेक्षाओं को जन्म देते हैं और लोगों को सब प्रकार के बोझ एवं अजीब मनोवृत्तियाँ प्रदान करते हैं, कोई व्यक्ति जिसने विवाह का अनुभव किया है वह जानता है कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह इसे किस प्रकार समझता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इसके प्रति उसकी मनोवृत्ति क्या है, किन्तु विवाह व्यक्तिगत चुनाव का मामला नहीं है।

किसी व्यक्ति का अपने जीवन में कई लोगों से आमना-सामना होता है, परन्तु कोई भी नहीं जानता है कि उसका जीवन साथी कौन बनेगा। हालाँकि विवाह के विषय पर प्रत्येक के पास उनके स्वयं के विचार एवं व्यक्तिगत दृष्टिकोण होते हैं, फिर भी वह पहले से नहीं जान सकता हैं कि अंततः कौन सचमुच में उसका जीवन साथी बनेगा, और उसकी स्वयं की धारणाएँ कम महत्व रखती हैं। तुम जिस इंसान को पसंद करते हो उससे मिलने के बाद, उसे पाने का निरन्तर प्रयास कर सकते हो; परन्तु वह तुममें रुचि रखता या रखती है या नहीं, वह पुरुष या स्त्री तुम्हारा या तुम्हारी जीवन साथी बनने के योग्य है या नहीं, यह फैसला करना तुम्हारा काम नहीं है। तुम्हारे स्नेह का विषय ज़रूरी नहीं कि वह व्यक्ति हो जिसके साथ तुम अपना जीवन साझा करने में समर्थ होगे; और इसी बीच कोई जिसकी तुमने कभी अपेक्षा नहीं की वह चुपके से तुम्हारे जीवन में प्रवेश करता है और तुम्हारा जीवन साथी बन जाता है, तुम्हारी नियति में सबसे महत्वपूर्ण अवयव, तुम्हारा जीवन साथी बन जाता है, जिसके साथ तुम्हारी नियति अभिन्न रूप से बँध जाती है। और इसलिए, यद्यपि संसार में लाखों विवाह होते हैं, फिर भी हर एक अलग है: कितने विवाह असंतोषजनक होते हैं, कितने खुशगवार होते हैं; कितने पूर्व एवं पश्चिम, कितने उत्तर एवं दक्षिण के दायरे में फैल जाते हैं; कितने पूर्ण जोड़े होते हैं, कितने समान श्रेणी के होते हैं; कितने प्रसन्न एवं सामंजस्यपूर्ण होते हैं, कितने दुःखदाई एवं कष्टपूर्ण होते हैं; कितने दूसरों से इर्ष्या करते हैं, कितनों को गलत समझा जाता है और उन पर नाक-भौं चढ़ाई जाती है; कितने आनन्द से भरे होते हैं, कितने आँसू बहाते हैं एवं मायूसी पैदा करते हैं। इन बेशुमार विवाहों में, मनुष्य विवाह के प्रति वफादारी एवं आजीवन समर्पण प्रकट करते हैं, या प्रेम, आसक्ति, एवं अवियोज्यता को, या परित्याग एवं न समझ पाने को, या विवाह के प्रति विश्वासघात, और यहाँ तक कि घृणा को भी प्रकट करते हैं। चाहे विवाह स्वयं ही खुशी लेकर आता है या कष्ट, विवाह में हर एक व्यक्ति के मिशन को सृष्टिकर्ता के द्वारा पूर्वनिर्धारित किया गया है और यह नहीं बदलेगा; हर एक को इसे पूरा करना ही होगा। और वह व्यक्तिगत नियति जो प्रत्येक विवाह के पीछे होता है वह अपविर्तनीय है; इसे बहुत पहले ही सृष्टिकर्ता के द्वारा निर्धारित किया गया था।

2. विवाह दो भागीदारों की नियति से जन्म लेता है

विवाह किसी व्यक्ति के जीवन में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। यह किसी व्यक्ति की नियति का परिणाम है, उसकी नियति में एक महत्वपूर्ण कड़ी है; यह किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत इच्छा या प्राथमिकताओं पर स्थापित नहीं है, और बाहरी कारकों द्वारा प्रभावित नहीं होता है, परन्तु यह दो लोगों की नियति के द्वारा, दम्पत्ति की नियतियों के बारे में सृष्टिकर्ता के इंतज़ामों एवं पूर्वनिर्धारणों के द्वारा पूरी तरह से निर्धारित है। सतही तौर पर, विवाह का उद्देश्य मानव जाति को जारी रखने के लिए है, परन्तु असलियत में विवाह और कुछ नहीं बल्कि एक रस्म है जिसमें कोई व्यक्ति अपने मिशन को पूरा करने के लिए उस प्रक्रिया से होकर गुज़रता है। वे भूमिकाएँ जिन्हें लोग विवाह में अदा करते हैं वे अगली पीढ़ी का पालन पोषण करना मात्र नहीं हैं; वे ऐसी विभिन्न भूमिकाएँ हैं जिन्हें वे ग्रहण करते हैं और ऐसे मिशन हैं जिन्हें विवाह को बनाए रखने के दौरान उन्हें पूरा करना होगा। चूँकि व्यक्ति का जन्म लोगों, घटनाओं एवं आसपास की चीज़ों के परिवर्तन को प्रभावित करता है, तो उसका विवाह अनिवार्य रूप उन्हें भी प्रभावित करेगा, और इसके अतिरिक्त, विभिन्न अलग अलग तरीकों से उन्हें रूपान्तरित करेगा।

जब कोई स्वतन्त्र हो जाता है, तो वह अपनी स्वयं की जीवन यात्रा प्रारम्भ करता है, जो उसे कदम दर कदम उसके विवाह से सम्बन्धित लोगों, घटनाओं, एवं चीज़ों की और ले जाती है; और उसके साथ-साथ, वह दूसरा व्यक्ति जो उस विवाह को पूरा करेगा वह, कदम दर कदम, उन्हीं लोगों, घटनाओं एवं चीज़ों की ओर आ रहा है। सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के अधीन, दो असम्बद्ध लोग जो एक सम्बद्ध नियति को साझा करते हैं धीरे-धीरे विवाह में प्रवेश करते हैं और, चमत्कारी ढ़ंग से, एक परिवार, "एक ही रस्सी से लटकी हुई दो टिड्डियाँ" अतः जब कोई विवाह में प्रवेश करता है, तो उसकी जीवन यात्रा उसके जीवनसाथी को प्रभावित एवं स्पर्श करेगी, और उसी तरह उसके साथी की जीवन यात्रा भी जीवन में उसकी नियति को प्रभावित एवं स्पर्श करेगी। दूसरे शब्दों में, मनुष्य की नियतियाँ आपस में एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं, और कोई भी दूसरों से पूरी तरह स्वतन्त्र होकर जीवन में अपने मिशन को पूरा नहीं कर सकता है या अपनी भूमिका को अदा नहीं कर सकता है। किसी व्यक्ति का जन्म रिश्तों की एक बड़ी श्रृंखला से सम्बन्धित होता है; पलने-बढ़ने में भी सम्बन्धों की एक जटिल श्रृंखला शामिल होती है; और उसी प्रकार, मानवीय सम्बन्धों के एक विशाल एवं जटिल जाल में विवाह अनिवार्य रूप से अस्तित्व में आता है और कायम रहता है, जिसमें प्रत्येक सदस्य शामिल है और हर एक की नियति प्रभावित होती है जो इसका एक भाग है। विवाह दोनों सदस्यों के परिवारों का, जिन परिस्थितियों में वे पले-बढ़े थे उनका, उनके रंग-रूप, उनकी आयु, उनकी योग्यताओं, उनकी प्रतिभाओं, या अन्य कारकों का परिणाम नहीं है; बल्कि, यह उनके साझा मिशन एवं उनकी सम्बद्ध नियति से उत्पन्न होता है। यह विवाह का मूल है, और मनुष्य की नियति का एक उत्पाद है जिसे सृष्टिकर्ता के द्वारा आयोजित एवं व्यवस्थित किया जाता है।

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII

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