वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन – संकलन

परमेश्वर की पवित्रता (II)     भाग दो

परमेश्वर के तत्व की पवित्रता के सम्बन्ध में, पिछली बार हमने संगति में इसके विषय में थोड़ा-बहुत परमेश्वर की पवित्रता को लोगों के ज्ञान की प्रेरणा के तौर पर प्रस्तुत किया था। परन्तु यह पर्याप्त नहीं है। परमेश्वर की पवित्रता को जानने के लिए यह लोगों की पूरी तरह से मदद नहीं कर सकता और न यह समझने में मदद कर सकता कि परमेश्वर की पवित्रता अनोखी है। इसके अलावा, यह पर्याप्त मात्रा में लोगों को पवित्रता के सच्चे अर्थ के पहलू को जो पूर्णतया परमेश्वर के अंर्तनिहित है, समझने की अनुमति नहीं दे सकता। इसलिए यह आवश्यक है कि हम इस विषय में अपनी संगति को जारी रखें। हमारी संगति के तीसरे भाग में हमने तीन शीर्षकों पर चर्चा की, इसलिए हमें चौथे शीर्षक पर अब बातचीत करनी चाहिए और हम पवित्रशास्त्र पढ़ना प्रारम्भ करेंगे।

4. शैतान के प्रलोभन

(मत्ती 4:1-4) तब आत्मा यीशु को जंगल में ले गया ताकि इबलीस् से उसकी परीक्षा हो। वह चालीस दिन और चालीस रात निराहार रहा, तब उसे भूख लगी। तब परखने वाले ने पास आकर उससे कहा, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो कह दे, कि ये पत्थर रोटियां बन जाए, यीशु ने उस को उत्तर दिया, 'लिखा है कि मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा'।"

ये वे शब्द हैं जिनसे शैतान ने प्रभु यीशु की परीक्षा करने की कोशिश की। इबलीस् ने जो कहा उसकी भावना क्या है? आगे बढ़कर इसे पढ़ो, ("यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो कह दे कि ये पत्थर रोटियां बन जाएं") शैतान ने ये शब्द कहे, जो कि बिल्कुल साधारण हैं। परन्तु क्या इन शब्दों के आवश्यक भाव के साथ एक समस्या है? (हां) क्या समस्या है? उसने कहा, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है," तो अपने मन में क्या वह जानता था कि प्रभु यीशु परमेश्वर का पुत्र है? क्या वह जानता था कि वह मसीह है? (हां)। तो उसने क्यों कहा "यदि तू"? (वह प्रभु की परीक्षा लेने का प्रयत्न कर रहा था) हां, सचमुच वह परमेश्वर की परीक्षा लेने की कोशिश कर रहा था। पर उसके ऐसा करने का मकसद क्या था? उसने कहा, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है।" अपने हृदय में वह जानता था कि यीशु मसीह परमेश्वर का पुत्र है। यह उसके मन में बिल्कुल स्पष्ट था, पर इसके बावजूद, क्या उसने अपना समर्पण किया या उसने उसकी आराधना की? (नहीं) वह क्या करना चाहता था? वह यह करना और ये शब्द कहना चाह रहा था ताकि यीशु मसीह क्रोध करे और अपने प्रलोभन में फंसा ले और यीशु मसीह को अपने सोचे हुए तरीके के अनुसार काम करवाकर अपने फंदे में फंसा ले। क्या इसका मतलब यह नहीं था? उसका मन साफ जानता था कि यह प्रभु यीशु मसीह है, पर फिर भी उसने ऐसा कहा। क्या यह शैतान का स्वभाव नहीं? शैतान का स्वभाव क्या है? (धूर्तता, दुष्टता और परमेश्वर के प्रति श्रद्धा न रखना) उसके मन में परमेश्वर के प्रति कोई श्रद्धा नहीं है। यहां वह क्या नकारात्मक बात कर रहा था? क्या वह परमेश्वर पर आक्रमण करना नहीं चाह रहा था? वह इस विधि से परमेश्वर पर आक्रमण करना चाह रहा था इसलिए उसने कहा, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो कह दे कि ये पत्थर रोटियां बन जाएं" क्या यह शैतान की बुरी नियत नहीं? (हाँ) वह वास्तव में क्या करना चाह रहा था? इसका मकसद बिल्कुल स्पष्ट है; वह प्रभु यीशु मसीह के स्थान और पहचान को खंडित करने के लिए इस विधि के उपयोग की कोशिश कर रहा था। उसने कहा, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है तो इन पत्थरों को रोटियों में बदल दे, और यदि तू ऐसा नहीं करता तो परमेश्वर का पुत्र नहीं है और यह काम तू मत कर" क्या यहाँ उसका यह मतलब था? वह इस विधि का प्रयोग कर परमेश्वर पर आक्रमण करना चाह रहा था और वह परमेश्वर के काम को तहस-नहस करके खत्म करना चाह रहा था। यह शैतान का दुष्कर्म और धूर्तता है। उसका दुष्कर्म उसके स्वभाव की प्राकृतिक अभिव्यक्ति है। हालांकि वह जानता था कि प्रभु यीशु मसीह परमेश्वर का पुत्र है, स्वयं परमेश्वर की सृष्टि होते हुए भी वह स्वयं को इस प्रकार के काम करने से नहीं रोक सका, और परमेश्वर के पीछे लगे रहने और पीछे से लगातार आक्रमण करते रहने और परमेश्वर के काम को बिगाड़ने और नाश करने के लिए बड़ा भ्रष्ट कदम उठाने के कारण वह परमेश्वर का शत्रु बना।

अब, आइए हम इस भाग की व्याख्या करें जिसका उपयोग शैतान ने कियाः "कह दे कि ये पत्थर रोटियां बन जाएं"। पत्थर को रोटी में बदलना - क्या इसका कुछ अर्थ है? इसका कोई अर्थ नहीं। यदि यहां भोजन है तो क्यों ना इसे खाएं, यह क्यों आवश्यक है कि पत्थर को खाने में बदला जाए? इसका क्या यहां कुछ अर्थ है? (नहीं) हालांकि उस समय वह उपवास में था, तो निश्चित रूप से प्रभु यीशु के पास खाने को भोजन था? क्या उसने खाना खाया? (खाया)। तो यहां हम इस कथन में शैतान की निरर्थकता और बेहूदगी को देखते हैं। उसके सारे छल-कपट और बेतुकेपन में हम उसकी मूर्खता देखते हैं। सही है? शैतान कई बातें करता है। आप उसके विद्वेषी स्वभाव को देखिये और देखिये कि वह परमेश्वर के काम को नष्ट करता है। वह घृणा से भरा हुआ और परेशान करने वाला है। परन्तु दूसरी तरफ क्या आप उसके शब्दों और काम के पीछे बचकाना और बेतुका स्वभाव पाते हैं? (हां) यह शैतान के स्वभाव का एक प्रकाशन है; उसका स्वभाव इसी प्रकार का है और वह इसी तरह का काम करेगा। मनुष्यों को यह कथन बेतुका और हास्यपद लगेगा, पर ऐसे शब्द वाकई में शैतान द्वारा कहे जा सकते हैं। क्या हम कह सकते हैं कि वह अनभिज्ञ है? बेतुका? शैतान की बुराई हर जगह है और लगातार दिखाई देती जा रही हैं। और उसे प्रभु यीशु ने कैसे उत्तर दिया? ("मनुष्य न केवल रोटी ही से जीवित रहेगा, बल्कि हरेक उस वचन से जीवित रहेगा जो परमेश्वर के मुख से निकलता है।") क्या इन शब्दों में कोई शक्ति है? (शक्ति है।) हम क्यों कहते हैं कि उनमें सामर्थ्य है? (वे सत्य हैं) सही है। ये वचन सत्य है। अब, क्या मनुष्य केवल रोटी ही से जीवित रहता है? प्रभु यीशु ने चालीस दिन और चालीस रात उपवास किया। क्या वह भूख से मरा? (नहीं) वह भूख से नहीं मरा, इसलिए शैतान उसके पास पहुंचा। उसे उकसाते हुए पत्थर को खाने में बदलने के लिए यह कहते हुएः "यदि तू पत्थर को खाने में बदल दे तो क्या तेरे पास खाने की वस्तु न होगी? तब तुझे उपवास नहीं करना पड़ेगा, भूखा नहीं रहना पड़ेगा?" परन्तु प्रभु यीशु ने कहा, "मनुष्य केवल रोटी ही से जीवित न रहेगा," इसका मतलब यह है कि हालांकि मनुष्य भौतिक शरीर में रहता है, तो भी उसे कौन सी चीज़ जीवित रखती है, उसे जीवित रहने और सांस लेने की शक्ति कहां से मिलती है? यह भोजन नहीं, परन्तु वे सारे वचन हैं जो परमेश्वर के मुख से निकलते हैं। एक ओर तो, मनुष्य इन वचनों को सच मानता है। शब्द उसे विश्वास देते हैं, उसे यह एहसास कराते हैं कि वह परमेश्वर पर निर्भर रह सकता है, परमेश्वर सत्य है। और दूसरी ओर क्या इन वचनों का कोई व्यवहारिक स्वरूप है? (हां।) क्यों? क्योंकि प्रभु यीशु ने चालीस दिन और चालीस रात उपवास किया और वह अभी भी वहां खड़ा है; जीवित है। क्या यह एक दृष्टांत है? बात यहां यह है कि चालीस दिन और चालीस रात उसने कुछ नहीं खाया। और वह अभी भी ज़िंदा है। उसके वाक्यांश का शक्तिशाली सबूत है। उसका कथन सरल है, परन्तु जहां तक प्रभु यीशु का सम्बन्ध है, क्या उसका यह वक्तव्य उसे किसी और द्वारा सिखाया गया था या क्योंकि शैतान ने ऐसा कहा था केवल इसलिए उसने यह सोचा था। इसके विषय में विचार करें। परमेश्वर सत्य है। परमेश्वर जीवन है। क्या परमेश्वर की सत्यता और जीवन बाद में जोड़े गए थे। क्या यह अनुभव से उत्पन्न हुआ? (नहीं) यह परमेश्वर में सहज है। मतलब यह कि सच्चाई और जीवन परमेश्वर के तत्व में रहते हैं। जो कुछ उसका है, वह जो प्रकट करता है, वह सत्य है। यह सत्य, यह वाक्यांश - चाहे इसका स्वरूप लम्बा हो या छोटा है - यह मनुष्य को जीने दे सकता है, उसे जीवन देता है; यह मनुष्य को जीवन यात्रा के विषय में स्पष्टता से खोजने लायक बना सकता है और मनुष्य को परमेश्वर पर विश्वास रखने के लायक बनाता है। इस वाक्यांश का उपयोग परमेश्वर का स्रोत है। स्रोत सकारात्मक है। तो क्या यह सकारात्मक वस्तु पवित्र है? (हां) शैतान का वाक्यांश शैतान के स्वभाव में से आता है। शैतान अपना बुरा स्वभाव, दुर्भावनापूर्ण स्वभाव, हर जगह लगातार प्रकट करता है। अब ये प्रकाशन, क्या स्वभाविक रूप से बनाए जाते हैं? (हां) क्या कोई इसे उकसाता है, क्या कोई इसकी सहायता करता है? क्या कोई इसे विवश करता है? (नहीं) यह इन्हें स्वयं निकालता है। यह शैतान का बुरा स्वभाव है। जो कुछ भी परमेश्वर करता और जैसे भी करता है, शैतान उसके पदचिन्हों पर चलता है। शैतान जो भी ऐसी बातें कहता और करता है वह शैतान का विशिष्ट तत्व है - बुरा तत्व, दुर्भावनापूर्ण तत्व। अब आगे पढ़ें, शैतान और क्या कहता है? आइए, हम नीचे पढ़ना जारी रखें।

(मत्ती 4:5-6) "तब शैतान उसे पवित्र नगर में ले गया, और मंदिर के कंगूरे पर खड़ा कर दिया, और उससे कहा, यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो अपने आपको नीचे गिरा दे क्योंकि लिखा है, कि वह तेरे विषय में अपने स्वर्गदूतों को आज्ञा देगा और वे तुझे हाथों हाथ उठा लेंगे, कहीं ऐसा न हो, कि तेरे पाँव में पत्थर से ठेस लगे।"

आइए, पहले हम शैतान के इस वाक्यांश पर चर्चा करें। उसने कहा, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो अपने आप को नीचे गिरा दे," और तब उसने पवित्रशास्त्र का उल्लेख किया, "वह तेरे विषय में अपने स्वर्गदूतों को आज्ञा देगा: और वे तुझे हाथों हाथ उठा लेंगे, कहीं ऐसा न हो कि तेरे पांव में पत्थर से ठेस लगे।" जब आप शैतान के शब्दों को सुनते हैं तब आप कैसा महसूस करते हैं? क्या वे बहुत बचकाने नहीं हैं? वे बचकाने हैं, निरर्थक और घृणास्पद हैं। मैं यह क्यों कहूंगा? शैतान हमेशा कुछ मूर्खतापूर्ण कार्य के पीछे रहता है, वह स्वयं को बहुत ही चतुर समझता है, और अक्सर पवित्रशास्त्र का उल्लेख करता है - यहां तक कि परमेश्वर के प्रत्येक शब्द का - वह उन शब्दों का उपयोग परमेश्वर की परीक्षा लेने और उस पर हमला करने के लिए इस्तेमाल करता है। ऐसा करने में उसका उद्देश्य परमेश्वर के काम की योजना को बर्बाद करना होता है। फिर भी शैतान ने जो कहा क्या उस पर आपने ध्यान दिया? (उसमें पापमय भावना है।) शैतान हमेशा से प्रलोभन देने वाला रहा है; वह सीधे तौर पर नहीं बोलता, वह गोल-मटोल तरीके से प्रलोभन देने, दोष लगाने और गिराने के लिए बोलता है। शैतान परमेश्वर और मनुष्य दोनों को एक समान प्रलोभन देता है। वह सोचता है कि परमेश्वर और मनुष्य दोनों अनजान, मूर्ख और चीजों को स्पष्टता से पहचानने लायक नहीं हैं। शैतान सोचता है कि परमेश्वर और मनुष्य दोनों उसके तत्व को नहीं देख सकेंगे और यह कि परमेश्वर और मनुष्य उसकी चालाकी और पापमय नीयत को नहीं देख सकेंगे। क्या यहां शैतान की मूर्खता नहीं दिखती? (हां) आगे, शैतान खुल्लम-खुल्ला पवित्रशास्त्र को पेश करता है; ऐसा करने से वह सोचता है कि उसे विश्वसनीयता प्राप्त होगी और आप उसकी गलती को नहीं पकड़ पाएंगे और इस तरह मूर्ख बनाए जाने को नज़रअंदाज़ करेंगे। क्या यह शैतान की बेतुकी और बचकानी हरकत नहीं है? (हां) यह ठीक वैसा ही है जैसा जब कोई सुसमाचार सुनाता और परमेश्वर की गवाही देता है, तो क्या नास्तिक भी वैसा ही नहीं कहते जैसा शैतान ने कहा था? क्या आपने लोगों को वैसा ही कहते हुए सुना है? (हां) जब आप इस तरह की बातें सुनते हैं तो क्या घृणा महसूस करते हैं? (हां) जब आप घृणा से भर जाते हैं तो क्या आप नफरत और विद्रोह भी महसूस करते हैं? (हां) जब आप यह अनुभव करते हैं तो क्या आप यह पहचान सकने के योग्य होते हैं कि शैतान मनुष्यों में जो काम करता है वह दूषित व्यवस्था और दुष्टता है। क्या कभी आपने अपने मन में ऐसा महसूस किया है, "परमेश्वर कभी ऐसा नहीं कहता। शैतान के शब्द हमला और प्रलोभन लाते हैं, उसके शब्द बेतुके, हास्यप्रद, बचकाने और घृणा उत्पन्न करने वाले हैं। फिर भी परमेश्वर अपने कथन में और काम में, ऐसी विधि का प्रयोग नहीं करेगा या अपना काम करेगा और न कभी उसने ऐसा किया है?" बेशक, इस परिस्थिति में लोगों के पास किंचितमात्रा में आगे बढ़ने की भावना रहती है और उन्हें परमेश्वर की पवित्रता का अहसास नहीं होता; वे केवल इतना स्वीकार कर सकते हैं कि परमेश्वर का वचन सत्य है। पर वे यह नहीं जानते कि सच्चाई स्वयं ही पवित्रता है। आप अपनी वर्तमान स्थिति के अनुसार केवल इतना महसूस करते हैं: "हर बात जो परमेश्वर कहते हैं वह सच है, हमारे लिए लाभकारी है और हमें उसे ग्रहण करना चाहिए," चाहे आप उसे ग्रहण करने के योग्य हों या ना भी हों, बिना अपेक्षा के आप कहते हैं कि परमेश्वर का वचन सत्य है और परमेश्वर सत्य है, परन्तु आप यह नहीं जानते कि सत्य स्वयं में पवित्र है और यह कि परमेश्वर पवित्र है। इसलिए यीशु मसीह का प्रत्युत्तर शैतान के शब्दों के प्रति क्या था?

(मत्ती 4:7) यीशु ने उससे कहा, यह भी लिखा है, कि तू प्रभु अपने परमेश्वर को प्रलोभन न दे।

यीशु ने जो वाक्यांश कहा क्या उसमें सच्चाई है? (हां।) उसमें सत्य है। ऊपरी तौर पर यह लगता है कि यह लोगों को मानने के लिए एक आदेश है, यह बहुत सरल वाक्यांश हैं, परन्तु यही एक है जिसका मनुष्य और शैतान ने बहुधा उल्लंघन किया है, इसलिए प्रभु यीशु ने उससे कहा, "तू प्रभु अपने परमेश्वर को प्रलोभन न दे," क्योंकि शैतान ने बहुधा यही किया और ऐसा करने के लिए पूरा प्रयास भी किया, आप यहां तक कह सकते हैं कि शैतान ने बेशर्मी से ऐसा किया। यह शैतान का स्वभाव ही है कि वह परमेश्वर से न तो डरता है और न उसके मन में परमेश्वर की श्रद्धा ही है। इसलिए जब शैतान परमेश्वर के बाजू में था और उसे देख सकता था, शैतान अपने आप को परमेश्वर को प्रलोभन देने से रोक न सका। इसलिए प्रभु यीशु ने शैतान से कहा, "तू अपने परमेश्वर को प्रलोभन न दे" यह एक ऐसा वाक्यांश है जो परमेश्वर ने शैतान से अक्सर कहा है। क्या यह उपयुक्त नहीं कि आज भी यह वाक्यांश कहा जाए? (हां) क्यों? (क्योंकि हम भी अक्सर परमेश्वर को प्रलोभन देते हैं, उसकी परीक्षा लेते हैं) लोग अक्सर परमेश्वर की परीक्षा लेते हैं, परन्तु बहुधा लोग ऐसा क्यों करते हैं? क्या यह ऐसा इसलिए है क्योंकि लोग शैतान के दूषित स्वभाव से भरे हुए हैं? (हां) इसलिए जैसा शैतान ने ऊपर कहा कुछ वैसा ही लोग अक्सर कहते हैं? (हां) किन परिस्थितियों में? कोई यह कह सकता है कि लोग ऐसा कह रहे हैं और स्वभाविक तौर पर कर रहे हैं, जिसमें समय और स्थान की कोई परवाह नहीं है। यह सिद्ध करता है कि लोगों का स्वभाव ठीक वैसा ही है जैसा शैतान का दूषित स्वभाव। प्रभु यीशु ने एक सरल वाक्यांश कहा, एक वह जो सत्य का प्रतिनिधित्व करता और जिसकी लोगों को आवश्यकता है। हालांकि इस परिस्थिति में क्या प्रभु यीशु शैतान से बहस कर रहा था? क्या जो बात उसने शैतान से कही उसमें कुछ विरोधाभास था? (नहीं) कैसे प्रभु यीशु ने शैतान के प्रलोभन को अपने मन में देखा? क्या वह खीजा और विद्रोही हुआ? (हां) प्रभु यीशु खीज से भर गया और विद्रोही भी हुआ, परन्तु उसने शैतान से वाद-विवाद नहीं किया, बल्कि किसी महान सिद्धांत के विषय में तो बात ही नहीं की, क्या यह सही नहीं है? (हां) ऐसा क्यों है? (प्रभु यीशु शैतान को मान्यता नहीं देना चाह रहे थे।) वह शैतान को मान्यता क्यों नहीं देना चाह रहे थे? (क्योंकि शैतान हमेशा से ऐसा ही है, वह कभी नहीं बदल सकता।) क्या हम यह कह सकते हैं, कि शैतान हठी है? (हां, हम कह सकते हैं) क्या शैतान मान सकता है कि परमेश्वर सत्य है? शैतान कभी नहीं मानेगा कि परमेश्वर सत्य है और न कभी स्वीकार करेगा कि परमेश्वर सत्य है; यह उसका स्वभाव है। इसके अलावा, शैतान के स्वभाव में कुछ और भी ऐसा है जो लोगों के लिए घृणास्पद है, यह क्या है? उसके प्रभु यीशु को परखने के प्रयास में, उसके मन में और क्या था? हालांकि उसने परमेश्वर को प्रलोभन देने का प्रयास किया लेकिन सफल नहीं हुआ, फिर भी शैतान ने प्रयास तो किया ही। हालांकि उसे दण्डित होना पड़ा, उसने किसी भी तरह ऐसा किया। हालांकि ऐसा करने पर उसे कुछ भी अच्छा प्राप्त नहीं हुआ, लेकिन उसने ऐसा किया, और अड़ा रहा और अंत तक परमेश्वर के विरुद्ध खड़ा रहा। यह किस तरह का स्वभाव है? क्या यह बुरा नहीं है? (हां) जो लोग परमेश्वर का नाम सुनकर क्रोधित हो जाते हैं, क्या उन्होंने परमेश्वर को देखा है? जो लोग परमेश्वर का नाम सुनकर गुस्से में आ जाते हैं, क्या वे परमेश्वर को जानते हैं? वह नहीं जानते कि परमेश्वर कौन है, उस पर विश्वास नहीं करते और परमेश्वर ने उनसे बात नहीं की है। परमेश्वर ने उन्हें कभी परेशान नहीं किया तो फिर वे गुस्सा क्यों होते हैं? क्या हम कह सकते हैं कि यह व्यक्ति बुरा है? (हां) क्या ऐसा व्यक्ति बुरे स्वभाव वाला होगा? संसार में चाहे जो कुछ भी हो रहा है, चाहे वह मनोरंजन, भोजन, प्रसिद्ध लोग, सुन्दर लोग, इन में से कोई भी चीज़ उन्हें परेशान नहीं करेगी, लेकिन "परमेश्वर" शब्द सुनकर वे विचलित हो जाते हैं; क्या यह बुरे स्वभाव का एक उदाहरण नहीं होगा? यह मनुष्य के बुरे स्वभाव को बताने के लिए संतोषजनक सबूत है? अब आपके स्वयं के लिए बात करते हैं, क्या कभी ऐसा हुआ है कि सत्य का उल्लेख किया गया है, या जब मनुष्य जाति के लिए परमेश्वर की परख का समय आता है, या जब मनुष्य के विरुद्ध परमेश्वर के न्याय, की बात की जाती है, और आप चिढ़, हठ महसूस करते और आप इसे नहीं सुनना चाहते? आप मन में सोचते है कि यह कैसा सच है? क्या सब लोगों ने नहीं कहा, परमेश्वर सत्य है? यह सच नहीं है, यह स्पष्ट रूप से मनुष्य के लिए परमेश्वर का दण्डात्मक शब्द है, कुछ लोग अपने मनों में चिढ़ महसूस कर सकते हैं, यह हर दिन होता है, उसके न्याय की तरह हर दिन हमारे लिए उसकी परख का उल्लेख होता है; इन सब का अंत कब होगा? हम अच्छा लक्ष्य कब पाएंगे? यह नहीं पता कि यह अनुचित क्रोध आता कहां से है। यह किस प्रकार का स्वभाव है? (बुरा स्वभाव) यह शैतान के बुरे स्वभाव से प्रेरित है। जहां तक परमेश्वर का सम्बन्ध है, वह शैतान के बुरे स्वभाव और मनुष्य के दूषित स्वभाव के विषय में, वह कभी मनुष्य से विवाद या झगड़ा नहीं करता, और वह कभी भी गुस्सा नहीं होता जब मनुष्य अज्ञानता में काम करते हैं। जैसा मनुष्य का दृष्टिकोण होता है वैसा परमेश्वर का दृष्टिकोण नहीं होता, इसके अलावा, उसे काम करने के लिये मनुष्य के दृष्टिकोण, उनके ज्ञान, उनके विज्ञान या उनके दर्शनशास्त्र या कल्पनाओं का उपयोग करने की आवश्यकता नहीं होती। बल्कि प्रत्येक बात जो परमेश्वर करता और जो परमेश्वर प्रगट करता है वह सत्य से जुड़ी होती है। यानिकि उसका हर शब्द और हर कार्य सच से संबंधित है। यह सत्य कोई आधारहीन कल्पना नहीं है। यह सत्य और ये शब्द परमेश्वर द्वारा उजागर किए गये हैं। वह परमेश्वर के तत्व और उसके जीवन के कारण हुए हैं। क्योंकि ये शब्द और तत्व और प्रत्येक बात जो परमेश्वर ने की, सच है, इसलिए हम कह सकते हैं कि परमेश्वर का तत्व पवित्र है। अन्य शब्दों में प्रत्येक बात जो परमेश्वर कहते और करते हैं वह लोगों के लिए जीवन शक्ति और प्रकाश लाती है; यह लोगों को सकारात्मक बातों को और उन सकारात्मक बातों की वास्तविकता को देखने की अनुमति देती है और यह मानवता को प्रकाश की राह की ओर इंगित करती है ताकि वे सही राह पर चल सकें। ये बातें परमेश्वर के तत्व के कारण निर्धारित की गई और ये परमेश्वर के तत्व की पवित्रता के कारण निर्धारित की गई हैं। आपने यह देखा है, सही? हम पवित्रशास्त्र पढ़ने के साथ जारी रखेंगे।

(मत्ती 4:8-11) फिर शैतान उसे एक बहुत ऊंचे पहाड़ पर ले गया और सारे जगत के राज्य और उसका वैभव दिखाकर उससे कहा, "यदि तू गिरकर मेरी उपासना करे, तो मैं यह सब कुछ तुझे दे दूंगा।" तब यीशु ने उससे कहा, "हे शैतान दूर हो जा, क्योंकि लिखा हैः तू प्रभु अपने परमेश्वर को प्रणाम कर, और केवल उसी की उपासना कर।" तब शैतान उसके पास से चला गया, और देखो, स्वर्गदूत आकर उसकी सेवा करने लगे।

शैतान ने, अपनी पिछली दो चालों में असफल होने के बाद एक और कोशिश की: उसने प्रभु यीशु को सारे जगत के राज्य और उसका वैभव दिखाया और उससे शैतान की आराधना करने को कहा। इस स्थिति में शैतान का कौन सा वैशिष्ट्य देखते हैं? क्या शैतान पूरी तरह से बेशर्म नहीं है? (हां) वह कैसे बेशर्म हो सकता है? प्रत्येक वस्तु परमेश्वर द्वारा रची गई थी। फिर भी शैतान इसे पलटता है और परमेश्वर को दिखाते हुए कहता है कि "इन सारे राज्यों के धन और वैभव को देख। यदि तू मेरी उपासना करे तो मैं यह सब तुझे दे दूंगा"। क्या यह उल्टा चलन नहीं है? क्या शैतान बेशर्म नहीं है? परमेश्वर ने सब कुछ बनाया, पर क्या यह उसके आनन्द के लिए था? परमेश्वर ने सब कुछ मनुष्य जाति को दे दिया, परन्तु शैतान उन सब को अपने कब्ज़े में करना चाहता था और बाद में उसने कहा, "मेरी आराधना कर। मेरी आराधना कर और मैं यह सब तुझे दे दूंगा।" यह शैतान का बदसूरत चेहरा है, वह पूर्णतया बेशर्म है, सही है न? शैतान "शर्म" शब्द का मतलब भी नहीं जानता, और यह उसकी बुराई का दूसरा सबूत है। वह यह भी नहीं जानता कि "शर्म" क्या होती है। शैतान निश्चय जानता है कि परमेश्वर ने सब कुछ बनाया है और वह उसे सम्भालता है और उस पर उसकी प्रभुता है। सब परमेश्वर का है, मनुष्य का नहीं और शैतान का तो बिल्कुल नहीं, फिर भी शैतान ने निर्लज्जतापूर्वक कहा कि वह सब कुछ परमेश्वर को दे देगा। क्या शैतान फिर से कुछ घृणास्पद और शर्मनाक नहीं कर रहा है? परमेश्वर अब शैतान से और भी अधिक नफरत करता है, सही? शैतान ने भले ही कुछ भी करने की कोशिश की, लेकिन क्या प्रभु यीशु उसके झांसे में आये? (नहीं)। प्रभु यीशु ने क्या कहा? (तू अपने प्रभु परमेश्वर ही की उपासना करना) क्या इस वाक्यांश का कोई व्यवहारिक अर्थ है? (हां) किस प्रकार का व्यवहारिक अर्थ? हम शैतान की बुराई और बेशर्मी को उसके वक्तव्य में देखते हैं। अतः यदि मनुष्य शैतान की उपासना करे, तो निष्कर्ष क्या होगा? क्या वे राज्य का धन ओर वैभव प्राप्त करेंगे? (नहीं) वे क्या प्राप्त करेंगे? क्या मनुष्य शैतान के ही समान बेशर्म और हास्यपद बन जाएंगे? (हां) तब वे शैतान से भिन्न नहीं होंगे। इसलिए प्रभु यीशु ने यह वाक्यांश कहा जो सब और प्रत्येक इंसान के लिए महत्वपूर्ण है, "तू प्रभु अपने परमेश्वर ही की उपासना कर, और उसी की सेवा कर।" जिसका अर्थ है कि प्रभु के अलावा, स्वयं परमेश्वर को छोड़, यदि आप दूसरे की उपासना करते हो, यदि आप शैतान जो इबलीस् है, उसकी उपासना करते हो, तब आप उसी गंदगी में लोटते हो जैसा शैतान है। जब आप शैतान की बेशर्मी और उसकी बुराई में भागीदार होते हो, तब आप शैतान के जैसे ही परमेश्वर की परीक्षा और हमला करने लगोगे। तब आपका अंत क्या होगा? आप परमेश्वर द्वारा घृणा किए जाने लगोगे, नीचे धकेल दिए जाओगे, और परमेश्वर द्वारा नाश किए जाओगे। क्या यह सही नहीं है? जब शैतान ने असफल होते हुए भी कई बार प्रभु यीशु को परखा, क्या उसने फिर प्रयास किया? शैतान ने फिर प्रयास नहीं किया और वह चला गया। ये क्या साबित करता है? यह शैतान के बुरे स्वभाव को सिद्ध करता है, उसकी दुर्भावना, उसका बेतुकापन, और निरर्थकता इस योग्य नहीं कि उसका वर्णन परमेश्वर से किया जाए क्योंकि प्रभु यीशु ने केवल तीन वाक्यों में शैतान को हरा दिया, उसके बाद शैतान अपने पैरों के बीच दुम दबा कर खिसक गया और उसने उसे फिर नहीं परखा। चूंकि प्रभु यीशु ने शैतान को इस परीक्षा में हरा दिया, तो अब वह आसानी से अपने उस काम को जारी रख सकता था, जो कार्य उसके सामने पड़ा था। जो कुछ प्रभु यीशु ने कहा और किया, क्या वह इस परिस्थिति में प्रत्येक के लिये व्यवहारिक अर्थ रखता है? (हां) किस प्रकार का व्यवहारिक अर्थ? क्या शैतान को हराना आसान काम है? (नहीं) तब यह क्या होगा? लोगों को क्या शैतान के बुरे स्वभाव की समझ होनी चाहिए? क्या लोगों को शैतान के प्रलोभनों की सही समझ होनी चाहिए? (हां) यदि आपने अपने जीवन में शैतान के प्रलोभनों का अनुभव किया है और आप शैतान के बुरे स्वभाव को देख सकते हैं, क्या आप उसे हराने के योग्य होंगे? यदि आप शैतान के बेतुकेपन और निरर्थकता को जानते, तो क्या फिर भी आप शैतान के साथ परमेश्वर पर हमला करने को खड़े होंगे? (नहीं, हम नहीं होंगे)। यदि आप समझ जाएं कि कैसे शैतान की दुर्भावना और बेशर्मी आपके द्वारा प्रगट हुई है - यदि आप स्पष्ट रूप से इस बात को पहचान जायें और जान जायें – तो क्या आप फिर भी परमेश्वर पर इस प्रकार हमला करेंगे और उसकी परीक्षा लेंगे? (नहीं, हम नहीं करेंगे) आप क्या करोगे? (हम शैतान का सामना करेंगे और उसे छोड़ देंगे।) क्या यह आसान कार्य है? (नहीं) यह सरल नहीं है, ऐसा करने के लिये, लोगों को निरंतर प्रार्थना करनी चाहिए, उन्हें स्वयं को परमेश्वर के सामने रखना चाहिए और उन्हें स्वयं को हमेशा जांचते रहना चाहिए। उन्हें अपने आप को परमेश्वर के अनुशासन, और उसके न्याय और दण्ड के अधीन समर्पित करना चाहिए और यही एक राह है जिससे वे अपने आपको शैतान के राज्य और नियंत्रण से धीरे-धीरे मुक्त कर पाएंगे।

हम उन बातों का निष्कर्ष निकाल सकते है जो उसके कहने से शैतान के तत्व का निर्माण करती है। सर्वप्रथम, शैतान के तत्व को सामान्य रूप से बुरा कहा जाता है, जो परमेश्वर की पवित्रता के विरूद्ध खड़ा होता है। मैं शैतान के तत्व को बुरा क्यों कहता हूं? इसे देखने के लिए कि शैतान लोगों के साथ क्या करता है, उसके परिणाम को देखना होगा। शैतान लोगों को दूषित और नियंत्रित करता है और मनुष्य शैतान के दूषित स्वभाव के अधीन कार्य करता है, और ऐसी दुनिया और दूषित लोगों के बीच रहता है जो शैतान के द्वारा दूषित कर दिये गये हैं। बहुत सारे लोग शैतान द्वारा अनजाने में ग्रसित और सम्मिलित कर लिये गये हैं और इसलिए मनुष्य में शैतान का बुरा स्वभाव आ गया है। प्रत्येक बात जो शैतान ने कहीं और की है, उसमें हम उसके अंहकार को देखते हैं, हम उसके छल और उसकी दुर्भावना को देखते हैं। शैतान का अंहकार सर्वप्रथम कैसे दिखता है? क्या शैतान सदा से ईश्वर का स्थान लेना चाहता है? शैतान हमेशा से परमेश्वर के कार्य को बिगाड़ने, और परमेश्वर का स्थान लेने की चाह रखता आया है कि वह स्वयं के लिए इसे ले ले जिससे लोग उसके पीछे चलें, उसका साथ दें, और शैतान की उपासना करें; यह शैतान के अंहकार का स्वभाव है। परन्तु जब शैतान लोगों को बिगाडता है तब वह इस चालाकी और षडयंत्रकारी तरीके से कार्य करता है: जब शैतान लोगों में अपना कार्य करता है, तो वह सीधे तौर पर लोगों को नहीं बताता कि परमेश्वर को कैसे ठुकरायें और उसका विरोध करें। जब शैतान परमेश्वर की परीक्षा लेता है तब वह आकर यह नहीं कहता, "मैं तुझे परख रहा हूं, मैं तुझ पर हमला कर रहा हूं" तो शैतान कौन से तरीके का उपयोग करता है। (धोखेबाज़ी)। वह धोखा देता, हमला करता है, और जाल बिछाता है, और यहां तक कि पवित्रशास्त्र का उल्लेख भी करता है। शैतान कई तरीकों से बोलता और कार्य करता है ताकि अपना बुरा उद्देश्य पूरा कर सके, शैतान के ऐसा कर लेने के बाद हम क्या देखते हैं कि मनुष्यों पर क्या प्रभाव पड़ा है? क्या मनुष्य अंहकारी़ नहीं है? हजारों साल मनुष्य ने शैतान के भ्रष्टाचार से दुख उठाया है इसलिए मनुष्य हेकड़ीबाज़ और असाधारण रूप से दम्भी बन गया है, वह धूर्त, दुर्भावनाग्रस्त और अनुचित हो गया है, सही? ये सारी बातें शैतान के स्वभाव के कारण हुई हैं। चूंकि शैतान का स्वभाव बुरा है, इसने मनुष्य को बुरा स्वभाव और मनुष्य को दूषित स्वभाव दिया है। इसलिए मनुष्य दूषित शैतानी स्वभाव के अधीन जीता है और मनुष्य शैतान के समान परमेश्वर के विरोध में जाता है, परमेश्वर पर आक्रमण करता है और इस हद तक उसे परखता है कि मनुष्य परमेश्वर की उपासना नहीं करता और अपने हृदय में उसका भय नहीं रखता, सही है ना?

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X

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