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अंतिम दिनों के मसीह के कथन – संकलन

परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है (II)     भाग एक

आइए, पिछले समय की बातचीत के विषय को जारी रखें। क्या तुम लोग याद कर सकते हो कि पिछले समय हमने किस विषय पर बातचीत की थी? (परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है।) क्या "परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है" एक ऐसा विषय है जो तुम लोगों की पहुँच से बहुत दूर प्रतीत होता है? क्या कोई इस विषय के मुख्य अंश को बता सकता है जिस पर हमने पिछली बार चर्चा की थी? (परमेश्वर के द्वारा सभी चीज़ों की सृष्टि के जरिए, मैं देखता हूँ कि परमेश्वर सभी चीज़ों का पालन पोषण करता है एवं मानवजाति का पालन पोषण करता है। अतीत में, मैं हमेशा सोचता था कि जब परमेश्वर मनुष्य की आपूर्ति करता है, तो वह केवल अपने चुने हुए लोगों के लिए ही अपने वचन की आपूर्ति करता है, परन्तु मैंने कभी नहीं देखा, सभी चीज़ों के नियमों के जरिए, कि परमेश्वर मानवजाति का पालन पोषण कर रहा है। यह केवल परमेश्वर के द्वारा सत्य के इस पहलू के वार्तालाप के जरिए हुआ है कि अब मैं देखता हूँ कि सभी चीज़ों को परमेश्वर के द्वारा जीवन प्रदान किया गया है, यह कि परमेश्वर इन नियमों का कुशलता से उपयोग करता है, और यह कि वह सभी चीज़ों का पालन पोषण करता है। उसके द्वारा सभी चीज़ों की सृष्टि से मैं परमेश्वर के प्रेम को देखता हूँ और यह महसूस करता हूँ कि परमेश्वर ही सभी चीज़ों का स्रोत है।) हुम्म, पिछली बार, हमने प्राथमिक रूप से परमेश्वर के द्वारा सभी चीज़ों की सृष्टि और उसने किस प्रकार उनके लिए नियमों एवं सिद्धांतों की स्थापना की थी उसके विषय में बातचीत की थी। ऐसे नियमों एवं ऐसे सिद्धांतों के अन्तर्गत, सभी चीज़ें मनुष्य के साथ जीती एवं मरती हैं और परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन एवं परमेश्वर की नज़रों में मनुष्य के साथ मिलकर अस्तित्व में बनी रहती हैं। हमने पहले किसके बारे में बात की थी? परमेश्वर ने सभी चीज़ों की सृष्टि की और सभी चीज़ों के लिए प्रगति के नियमों, साथ ही साथ उनकी प्रगति के चक्राकार मार्ग एवं नमूनों, और इस पृथ्वी पर सभी चीज़ों के अस्तित्व के लिए उनके मार्गों को भी स्थापित करने के लिए अपनी पद्धतियों का उपयोग किया था, ताकि वे निरन्तर जीवन बिताते रहें और एक दूसरे पर निर्भर रहें। ऐसी पद्धतियों एवं नियमों के साथ, सभी चीज़ें इस भूमि पर सफलतापूर्वक एवं शांतिपूर्वक अस्तित्व में बने रहने में और प्रगति करने में समर्थ हैं। केवल ऐसे ही वातावरण के होने से मनुष्य एक स्थिर निवास एवं सजीव वातावरण पाने के योग्य हुआ है, और परमेश्वर के मार्गदर्शन के अन्तर्गत, वह निरन्तर विकसित होता है एवं आगे बढ़ता है, विकसित होता है एवं आगे बढ़ता है।

पिछली बार हमने परमेश्वर के द्वारा सभी चीज़ों की आपूर्ति करने के मूल विचार पर चर्चा की थी। परमेश्वर पहले सभी चीज़ों की आपूर्ति इस रीति से करता है ताकि सभी चीज़ें मानवजाति के लिए अस्तित्व में बनी रहें एवं जीवित रहें। परमेश्वर के द्वारा स्थापित नियमों के कारण ऐसा वातावरण अस्तित्व में बना हुआ है। यह केवल परमेश्वर के द्वारा ऐसे नियमों को बनाए रखने एवं प्रबन्ध किए जाने के कारण है कि मानवजाति के पास ऐसा सजीव वातावरण है जैसा अब उनके पास है। जिसके विषय में हमने पिछले समय बात की थी वह परमेश्वर के ज्ञान जिसके विषय में हमने पहले बात की थी उसके बहुत बाद की बात है। इतना बड़ा अन्तराल मौजूद क्यों है? क्योंकि जब हमने अतीत में परमेश्वर को जानने के विषय में बात की थी, तो हम परमेश्वर के द्वारा मानवजाति को बचाने एवं उसका प्रबन्ध करने की सीमा के भीतर चर्चा कर रहे थे—अर्थात्, परमेश्वर के चुने हुए लोगों का उद्धार एवं प्रबन्धन—परमेश्वर, परमेश्वर के कार्यों, उसके स्वभाव, जो उसके पास है तथा जो वह है, उसके इरादों, और वह किस प्रकार मनुष्य को सत्य एवं जीवन की आपूर्ति करता है उसे जानने के विषय में। परन्तु वह शीर्षक जिसके विषय में हमने पिछले समय बातकी थी वह अब मात्र बाइबल तक ही सीमित नहीं था और न ही वह आगे से परमेश्वर के द्वारा अपने चुने हुओं लोगों को बचाने के दायरे के भीतर था। उसके बजाए, इसने इस दायरे के बाहर, बाइबल के बाहर और कार्य की उन तीन अवस्थाओं की सीमाओं के बाहर छलांग लगाई जिसे परमेश्वर ने अपने चुने हुए लोगों के बीच में स्वयं परमेश्वर के बारे में चर्चा करने के लिए किया है। अतः जब तुम मेरी बातचीत के इस भाग को सुनते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के विषय में अपने ज्ञान को बाइबल और परमेश्वर के कार्य की तीन अवस्थाओं तक ही सीमित नहीं रखना होगा। उसके बजाए, तुम्हें अपने दृष्टिकोण को खुला रखना है और सभी चीज़ों के मध्य परमेश्वर के कार्यों और जो उसके पास है और जो वह है उसे देखना है, और यह देखना है कि परमेश्वर किस तरह सभी चीज़ों पर शासन करता है तथा उनका प्रबन्ध करता है। इस पद्धति के जरिए एवं इस नींव पर, तुम देख सकते हो कि परमेश्वर किस प्रकार सभी चीज़ों की आपूर्ति करता है। यह मानवजाति को समझने के योग्य बनाता है कि परमेश्वर ही सभी चीज़ों के लिए जीवन का सच्चा स्रोत है और यह कि यह स्वयं परमेश्वर की सच्ची पहचान है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर की पहचान, पदस्थिति और अधिकार और उसका सब कुछ बस उन्हीं लोगों के लिए नहीं है जिन्होंने हाल में ही उसका अनुसरण किया है—अर्थात् केवल तुम्हारे लिए ही नहीं है—किन्तु सभी चीज़ों के लिए है। उस दशा में सभी चीज़ों का दायरा क्या है? सभी चीज़ों का दायरा अति विशाल है। मैंने हर चीज़ में परमेश्वर के शासन के दायरे को चित्रित करने के लिए "सभी चीज़ों" का उपयोग किया है क्योंकि मैं तुम लोगों को बताना चाहता हूँ कि ऐसी चीज़ें जिन पर परमेश्वर के द्वारा शासन किया जाता है वे महज वैसी नहीं हैं जैसे तुम लोग अपनी आँखों से देख सकते हो, किन्तु उसमें भौतिक संसार सम्मिलित है जिसे सभी लोग देख सकते हैं, साथ ही साथ दूसरा संसार भी सम्मिलित है जिसे मनुष्य की आँखों के द्वारा भौतिक संसार के बाहर देखा नहीं जा सकता है, और इसके अतिरिक्त बाह्य अंतरिक्ष एवं नक्षत्र भी सम्मिलित हैं जहाँ मनुष्य वर्तमान में मौजूद है। यह सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर के शासन का दायरा है, और वह विचार है कि परमेश्वर सभी चीज़ों के ऊपर शासन करता है। सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर के शासन का दायरा अति विस्तृत है। जहाँ तक तुम लोगों बात है, जो तुम लोगों को समझना चाहिए, जो तुम लोगों को देखना चाहिए, और जिन चीज़ों से तुम लोगों को ज्ञान हासिल करना चाहिए—यह वही सब कुछ है जिन्हें तुम लोगों में से प्रत्येक को जो यहाँ बैठा है समझने, देखने और उसके विषय में स्पष्ट होने की आवश्यकता है, और तुम लोगों को समझना ही होगा। यद्यपि "सभी चीज़ों" का दायरा अति विशाल है, फिर भी मैं तुम लोगों को उस दायरे के बारे में नहीं बताऊँगा जिसे तुम लोग बिल्कुल भी नहीं देख सकते हो या तुम लोग जिसके सम्पर्क में नहीं आ सकते हो। मैं केवल तुम लोगों को उस दायरे के विषय में बताऊँगा जिसके सम्पर्क में मनुष्य जाति आ सकता है, उसे समझ सकता है और उसका आभास कर सकता है, ताकि सभी लोग इस वाक्यांश "परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है" का अर्थ समझ सकें। उस तरह से, कुछ भी जसके बारे में तुम लोगों से मैं बातचीत करता हूँ वे खोखले शब्द नहीं होंगे। पिछले समय, मैंने "परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है" के शीर्षक पर एक सामान्य झलक प्रदान करने के लिए कहानी बताने के तरीके का इस्तेमाल किया था, ताकि तुम लोगों के पास इस बात की मूलभूत समझ हो सके कि परमेश्वर किस प्रकार सभी चीज़ों की आपूर्ति करता है। इस मूलभूत विचार धारणा को तुम लोगों के भीतर थोड़ा-थोड़ा करके डालने का उद्देश्य क्या है? यह तुम लोगों को यह जानकारी देने के लिए है कि, बाइबल और उसके कार्य की तीन अवस्थाओं के बाहर, परमेश्वर और भी अधिक कार्य कर रहा है जिन्हें मनुष्य नहीं देख सकते हैं या उनके सम्पर्क में नहीं आ सकते हैं। ऐसे कार्य परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रीति से क्रियान्वित किए जा रहे हैं। यदि परमेश्वर को केवल अकेले ही अपने लोगों को आगे बढ़ने के लिए अगुवाई करना पड़ता, उसके प्रबन्धन कार्य के बाहर इस कार्य के बगैर, तो इस मानवता के लिए, जिसमें तुम सभी लोग भी शामिल हो, लगातार आगे बढ़ना बड़ा कठिन हो जाता, और यह मानवता एवं यह संसार निरन्तर विकसित होने के योग्य नहीं होता। यह इस वाक्यांश "परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है" का महत्व है जिसके विषय में मैं आज तुम लोगों से बातचीत कर रहा हूँ।

1. परमेश्वर ने मानवजाति के लिए मूल सजीव वातावरण बनाया है

हमने इस वाक्यांश "परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है" के सम्बन्ध में बहुत सारे विषयों एवं सार पर बातचीत की है, परन्तु क्या तुम लोग अपने हृदय के भीतर जानते हो कि परमेश्वर तुम लोगों को अपने वचन की आपूर्ति करने और तुम लोगों पर अपनी ताड़ना एवं न्याय के कार्य को क्रियान्वित करने के अलावा मानवजाति को कौन कौन सी चीज़ें देता है? कुछ लोग कह सकते हैं, "परमेश्वर मुझे अनुग्रह एवं आशीष देता है, और मुझे हर संभावित तरीके से अनुशासन, राहत, और देखरेख और सुरक्षा देता है।" अन्य लोग कहेंगे, "परमेश्वर मुझे प्रतिदिन भोजन एवं जल देता है," जबकि कुछ अन्य लोग यहाँ तक कह सकते हैं, "परमेश्वर मुझे सब कुछ देता है।" इन चीज़ों के सम्बन्ध में लोग अपने दैनिक जीवन के दौरान इनके साथ सम्पर्क में आ सकते हैं, तुम सभी लोगों के पास कुछ उत्तर हो सकते हैं जो तुम लोगों के शारीरिक जीवन से सम्बन्धित हैं। परमेश्वर प्रत्येक और हर एक इंसान को बहुत सारी चीज़ें देता है, यद्यपि जिसकी हम यहाँ पर चर्चा कर रहे हैं वह सिर्फ लोगों की दैनिक आवश्यकताओं के दायरे तक सीमित नहीं है, किन्तु यह तुम लोगों में से हर एक को दूर तक देखने की अनुमति देता है। बृहद् दृष्टिकोण से, जबकि परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है, तो वह सभी चीज़ों के जीवन को कायम कैसे रखता है? जिससे सभी चीज़ें लगातार अस्तित्व में बनी रहें, तो उनके अस्तित्व को कायम रखने और उनके अस्तित्व के नियमों को कायम रखने के लिए परमेश्वर सभी चीज़ों के साथ क्या करता है? यही वह मुख्य बिन्दु है जिसके विषय में हम आज चर्चा कर रहे हैं। जो कुछ मैंने कहा है क्या तुम लोग उसे समझते हो? जितनी तेज़ी से मैं बोल रहा हूँ क्या तुम लोग उसे उतनी तेज़ी से समझ सकते हो? (हाँ।) अब मुझे निश्चय हुआ कि तुम लोग सुन रहे हो, मैं लगातार बोलता रहूँगा। हो सकता है कि यह शीर्षक तुम लोगों के लिए बिल्कुल भी चिरपरिचित नहीं हो, परन्तु मैं किसी ऐसे सिद्धांत के विषय में कोई बात नहीं करूँगा जो बहुत ही अधिक गम्भीर है। ध्यान से सुनने के बाद मैं तुम लोगों को समझाने के लिए प्रयास करूँगा। तुम लोगों को किसी बोझ का एहसास करने की आवश्यकता नहीं है—तुम लोगों को केवल सावधानी से सुनना है। फिर भी, मुझे अभी भी इस पर थोड़ा और जोर देना हैः मैं किस शीर्षक के विषय में बोल रहा हूँ? मुझे बताओ। (परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है।) उस दशा में परमेश्वर किस प्रकार सभी चीज़ों को प्रदान करता है? परमेश्वर सभी चीज़ों को क्या प्रदान करता है? ऐसा क्यों कहा जा सकता है कि "परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है?" क्या तुम लोगों के पास इसके बारे में कोई धारणा या विचार हैं? ऐसा प्रतीत होता है कि यह शीर्षक जिसके विषय में मैं बात कर रहा हूँ उसे मूल रूप से तुम लोग अपने हृदय एवं अपने मन में बिल्कुल भी नहीं समझ रहे है। परन्तु मैं आशा करता हूँ कि तुम लोग उस शीर्षक को और उन चीज़ों को जिसके विषय में मैं बात करने जा रहा हूँ परमेश्वर के कार्यों से जोड़ सकते हो, और उन्हें किसी ज्ञान या किसी मानवीय संस्कृति या अनुसन्धान से बाँध नहीं सकते हो। मैं सिर्फ परमेश्वर और स्वयं परमेश्वर के बारे में बात कर रहा हूँ। तुम लोगों के लिए मेरी यही सलाह है। क्या तुम लोग समझ गए? (हाँ।)

परमेश्वर ने मानवजाति को बहुत सारी चीज़ें दी हैं। लोग जो कुछ देख सकते हैं उसके विषय में बात करके मैं शुरूआत करने जा रहा हूँ, अर्थात्, जो वे महसूस कर सकते हैं। ये वो चीज़ें हैं जिन्हें लोग अपने भीतर समझ सकते हैं और स्वीकार कर सकते हैं। अतः परमेश्वर ने मानवजाति को क्या प्रदान किया है इस पर चर्चा करने के लिए आइए पहले भौतिक संसार के साथ शुरूआत करें।

(1) वायु

पहले, परमेश्वर ने वायु को बनाया ताकि मनुष्य साँस ले सके। क्या यह "वायु" प्रतिदिन के जीवन की वायु नहीं है जिसके साथ मनुष्य लगातार सम्पर्क में रहते हैं? क्या यह वायु ऐसी चीज़ नहीं है जिसके ऊपर मानवजाति हर पल निर्भर रहती है, यहाँ तक कि उस समय भी जब वे सोते हैं? वह वायु जिसे परमेश्वर ने सृजा है वह मानवजाति के स्मरणार्थ बहुत ही महत्वपूर्ण हैः यह उनकी प्रत्येक श्वास एवं स्वयं उनके जीवन के लिए अति आवश्यक तत्व है। यह तत्व, जिसे केवल महसूस किया जा सकता है किन्तु देखा नहीं जा सकता है, सभी चीज़ों के लिए परमेश्वर की प्रथम भेंट थी। वायु को बनाने के बाद, क्या परमेश्वर ने बस दुकान बन्द कर दी थी? ये इसके पहलू हैं जो लोगों के लिए अकल्पनीय हैं। वायु को बनाने के बाद, वायु की मात्रा एवं उसे वास्तविक घनत्व को मानवजाति के लिए उनके जीवित रहने हेतु विशेष रूप से प्रदान किया जाना था। घनत्व के सम्बन्ध में, उसमें पहले आक्सीजन का तत्व होता है। यह भौतिकी का एक प्रश्न है। जब परमेश्वर ने वायु को बनाया तो वह क्या सोच रहा था? परमेश्वर ने वायु को क्यों बनाया था, और उसका तर्क क्या था? मनुष्यों को वायु की आवश्यकता होती है, और उन्हें श्वास लेने की आवश्यकता होती है। किसी भी चीज़ से पहले, वायु के घनत्व को मनुष्य के फेफड़ों के अनुकूल होना चाहिए। क्या कोई वायु के घनत्व को जानता है? यह कुछ ऐसा नहीं है जिसे लोगों को जानने की आवश्यकता है; इसे जानने की कोई आवश्यकता नहीं है। बस एक सामान्य विचार होना की अच्छा है—हमें वायु के घनत्व के सम्बन्ध में एक सटीक संख्या की आवश्यकता नहीं है। पहले, परमेश्वर ने एक घनत्व के साथ वायु को बनाया जो साँस लेने हेतु मानवीय फेफड़ों के लिए बिल्कुल उपयुक्त हो जाए—वह मानवीय श्वसन के अनुकूल हो गया। अर्थात्, जब साँस अन्दर लेते हैं, तो वायु उस घनत्व की होती है जो शरीर को नुकसान नहीं पहुँचाती है। वायु के घनत्व के पीछे यह युक्ति थी। प्राथमिक रूप से, वायु के तत्व मनुष्यों को नुकसान पहुँचाने के लिए विषैले नहीं हैं और उससे फेफड़ों एवं शरीर को नुकसान नहीं पहुँचेगा। परमेश्वर को इस सब के बारे में विचार करना था। परमेश्वर को विचार करना था कि वह वायु जो मनुष्य साँस ले रहा है उसे आसानी से भीतर एवं बाहर जाना चाहिए, और यह कि, भीतर श्वास लेने के बाद, वायु का अंतर्वस्तु एवं मात्रा ऐसा होना चाहिए कि जिससे लहू और साथ ही साथ फेफड़ों एवं शरीर की बेकार हवा सही रीति से चयापचय हो जाए, और साथ ही उस हवा में कोई ज़हरीले अंग नहीं होने चाहिए। इन दो मानकों के सम्बन्ध में, मैं तुम लोगों को ज्ञान के कुछ गुच्छों को नहीं खिलाना चाहता हूँ, किन्तु इसके बजाए तुम लोगों को जानकारी देना चाहता हूँ कि परमेश्वर के मस्तिष्क में एक विशेष वैचारिक प्रक्रिया थी जब उसने हर एक चीज़को बनाया था—सबसे बेहतरीन। जहाँ तक वायु में धूल की मात्रा की बात थी, धूल की मात्रा, पृथ्वी की रेत एवं मिट्टी, साथ ही साथ वह धूल है जो आकाश से नीचे आता है, परमेश्वर के पास इन चीज़ों के लिए भी योजना थी—इन चीज़ों को स्पष्ट करने या इनका समाधान करने का एक तरीका था। हालांकि, वातावरण में कुछ धूल मौजूद है, लेकिन परमेश्वर ने इसे बनाया ताकि वह मनुष्य के शरीर एवं श्वसन को नुकसान नहीं पहुँचाए, और इस तरह कि धूल के कण ऐसे आकार के हों जो शरीर के लिए नुकसानदेह न हों। क्या परमेश्वर के द्वारा वायु की सृष्टि रहस्यमयी नहीं है? (हाँ।) क्या यह मुँह से हवा फूँकने के समान ही सरल था? (नहीं।) यहाँ तक कि उसके द्वारा सरल चीज़ों की सृष्टि में भी, परमेश्वर का रहस्य, उसका मस्तिष्क, उसके विचार और उसकी बुद्धिमत्ता सब कुछ दृष्टिगोचर होते हैं। क्या परमेश्वर वास्तविक है? (हाँ।) दूसरे शब्दों में, यहाँ तक कि कुछ सरल चीज़ों की सृष्टि में भी, परमेश्वर मनुष्य जाति के बारे में सोच रहा था। पहली बात, वह वायु जिसमें मनुष्य साँस लेते हैं वह साफ है, तत्व विषैले नहीं हैं और मनुष्य के श्वास लेने के लिए उपयुक्त हैं और मनुष्यों को कोई नुकसान नहीं पहुँचाते हैं, और उसके घनत्व को मनुष्यों के श्वास लेने के लिए मापकर समायोजित किया गया है। यह वायु, जिससे मनुष्य अन्दर एवं बाहर श्वास लेते हैं, उनके शरीर और उनकी देह के लिए जरूरी है। अतः मनुष्य आसानी से बिना किसी रूकावट या चिंता के साँस ले सकते हैं। वे सामान्य रूप से साँस ले सकते हैं। वायु वह है जिसे परमेश्वर ने आदि में सृजा था और जो मनुष्य के श्वास लेने के लिए अति महत्वपूर्ण है।

(2) तापमान

दूसरी चीज़ है तापमान। हर कोई जानता है कि तापमान क्या होता है। तापमान एक प्रकार का वातावरण है जो मनुष्य के जीवित रहने के लिए उपयुक्त है और उसे इससे सुसज्जित होना ही होगा। यदि तापमान बहुत ही अधिक होगा, मान लीजिए यदि तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊँचा है, तो मानवजाति के लिए जीना बड़ा दयनीय होगा। क्या यह बहुत खाली नहीं होगा? क्या होगा यदि तापमान बहुत नीचे हो जाए, और शून्य से 40 डिग्री सेल्सियस कम हो जाए? मनुष्य इसे भी सहन नहीं कर पाएँगे। इसलिए, परमेश्वर ने तापमान के इस क्रम को निर्धारित करने में वास्तव में बहुत अधिक ध्यान दिया था। तापमान का क्रम जिसे मानवजाति सहन कर सकता है वह मूल रूप से —30 डिग्री सेल्सियस से 40 डिग्री सेल्सियस तक है। यह उत्तर से लेकर दक्षिण तक तापमान का मूल क्रम है। ठण्डे प्रदेशों में, तापमान —50 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच सकता है। ऐसा प्रदेश एक ऐसा स्थान नहीं हैं जहाँ रहने के लिए परमेश्वर मनुष्य को अनुमति देता है। वहाँ ऐसे ठण्डे प्रदेश क्यों हैं? इसमें परमेश्वर की बुद्धि और उसके इरादे निहित हैं। वह तुम्हें उन स्थानों के निकट जाने की अनुमति नहीं देता है। परमेश्वर उन स्थानों को सुरक्षित रखता है जो बहुत अधिक गर्म और बहुत अधिक ठण्डे हैं, अर्थात् वह मनुष्य को वहाँ रहने की अनुमति देने को तैयार नहीं है। यह मानवजाति के लिए नहीं है। वह ऐसे स्थानों को पृथ्वी पर बने रहने की अनुमति क्यों देता है? यदि परमेश्वर मनुष्य को वहाँ रहने या वहाँ अस्तित्व में बने रहने की अनुमति नहीं देगा, तो परमेश्वर उन्हें क्यों बनाएगा? उसमें परमेश्वर की बुद्धि निहित है। अर्थात्, मनुष्यों के जीवित रहने के लिए वातावरण के मूल तापमान को भी न्यायसंगत रूप से परमेश्वर के द्वारा समायोजित किया गया है। यहाँ पर एक नियम भी है। परमेश्वर ने ऐसे तापमान को बनाए रखने में सहायता हेतु और इस तापमान को नियन्त्रित करने के लिए कुछ चीज़ों को बनाया है। इस तापमान को बरकरार करने के लिए कौन-कौन सी चीज़ों को इस्तेमाल किया गया है? सर्वप्रथम, सूर्य लोगों के लिए गर्माहट ला सकता है, किन्तु लोग उसे नहीं ले सकेंगे यदि यह बहुत अधिक गर्म हो। क्या पृथ्वी पर कोई उपकरण है जो सूर्य के करीब जा सकता है? (नहीं।) क्यों नहीं? यह बहुत ही अधिक गर्म है। यह पिघल जाएगा। इसलिए, परमेश्वर ने मानवजति से सूर्य की दूरी के लिए एक निश्चित नाप को भी ठहराया है। परमेश्वर के पास इस दूरी के लिए एक मानक है। साथ ही पृथ्वी में उत्तरी ध्रुव एवं दक्षिणी ध्रुव भी होते हैं। उत्तरी ध्रुव एवं दक्षिणी ध्रुव में क्या है? ये सभी हिमशैल हैं। क्या मानवजाति हिमशैल पर रह सकता है? क्या यह मनुष्य के रहने के लिए उपयुक्त है? (नहीं।) नहीं, अतः तुम वहाँ नहीं जा सकते हो। जबकि तुम उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव पर नहीं जा सकते हो, हिमशैल सुरक्षित रहेंगे, और वे अपनी भूमिका अदा करने के योग्य होंगे, जो तापमान को नियन्त्रित करने के लिए है। समझ गए? यदि उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव नहीं हैं और सूर्य हमेशा पृथ्वी पर चमक रहा है, तो पृथ्वी के सभी लोग गर्मी से मर जाएँगे। क्या परमेश्वर तापमान को नियन्त्रित करने के लिए मात्र इन दो चीज़ों को इस्तेमाल करता है? नहीं, मनुष्य के जीवित रहने हेतु उपयुक्त तापमान को नियन्त्रित करने के लिए वह मात्र इन दो चीज़ों को ही इस्तेमाल नहीं करता है। सभी किस्म की जीवित चीज़ें भी हैं, जैसे भूमि की घास, जंगल में विभिन्न प्रकार के वृक्ष और सब प्रकार के पौधे। वे सूर्य की गर्मी को सोख लेते हैं और उस तापमान को नियन्त्रित करने के लिए जिसमें मनुष्य रहते हैं सूर्य की ताप ऊर्जा का संश्लेषण करते हैं। जल के स्रोत भी हैं, जैसे नदियाँ एवं झीलें। नदियों एवं झीलों का क्षेत्र फल कुछ ऐसा नहीं है जिसे किसी के द्वारा निर्धारित किया जा सकता है। पृथ्वी पर कितना जल है, जहाँ जल प्रवाहित होता है, जिस दिशा में वह प्रवाहित होता है, जल की मात्रा या प्रवाह की गति क्या कोई नियन्त्रण कर सकता है? इसे कोई नियन्त्रित नहीं कर सकता है। केवल परमेश्वर जानता है। जल के ये विभिन्न स्रोत भी, जिसमें भूमिगत जल और भूमि के ऊपर की नदियों एवं झीलों का जल भी शामिल है जिसे लोग देख सकते हैं, उस तापमान को नियन्त्रित करते हैं जिसमें मनुष्य रहते हैं। इसके अलावा, हर प्रकार की भौगोलिक संरचनाएँ हैं, जैसे पहाड़, समतल भूमि, घाटियाँ और दलदली भूमि। इन विभिन्न भौगोलिक संरचनाओं के क्षेत्रफल एवं आकार सब मिलकर तापमान को नियन्त्रित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, यदि इस पहाड़ का घेरा 100 किलोमीटर का है, तो इन 100 किलोमीटर को 100—किलोमीटर का प्रभाव होगा। जहाँ तक इसकी बात है कि कितनी सारी ऐसी पर्वत मालाएँ एवं घाटियाँ हैं जिन्हें परमेश्वर ने इस पृथ्वी पर बनाया है, तो यह ऐसा कुछ है जिसके विषय में परमेश्वर ने पूर्ण रूप से विचार किया है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के द्वारा सृजी गई प्रत्येक चीज़ के अस्तित्व के पीछे एक कहानी है, और इसमें परमेश्वर की बुद्धि एवं योजनाएँ भी हैं। उदाहरण के लिए, मान लीजिए, जंगल एवं सभी प्रकार के पेड़ पौधे—वह क्षेत्रफल एवं स्थल का आकार जिसमें में वे उगते हैं उन्हें किसी मनुष्य के द्वारा नियन्त्रित नहीं किया जा सकता है, और न ही किसी मनुष्य के पास इन चीज़ों के लिए अंतिम राय है। वे कितना जल सोखते हैं, और वे सूर्य से कितनी ताप ऊर्जा सोखते हैं उसे भी किसी मनुष्य के द्वारा नियन्त्रित नहीं किया जा सकता है। ये सभी चीज़ें उस परिधि के भीतर हैं जिसकी योजना परमेश्वर के द्वारा तब बनाई गई थी जब उसने सभी वस्तुओं की सृष्टि की थी।

यह केवल परमेश्वर की सावधानीपूर्वक योजना, विचार और सभी पहलुओं में समायोजनों की वजह से है जिससे मनुष्य एक वातावरण में एक ऐसे उपयुक्त तापमान के साथ रह सकता है। इसलिए, हर एक चीज़ जो मनुष्य अपनी आँखों से देखता है, जैसे सूर्य, या जिसके बारे में उत्तरी ध्रुव एवं दक्षिणी ध्रुव के लोग अक्सर सुनते हैं, साथ ही साथ भूमि के ऊपर एवं नीचे और जल के विभिन्न जीवित प्राणी, और जंगलों का क्षेत्रफल एवं अन्य प्रकार के पेड़ पौधे, और जल के सोते, विभिन्न जलराशि, जितना भी समुद्री जल एवं शुद्ध जल है, उसके अतिरिक्त विभिन्न भौगोलिक वातावरण—परमेश्वर मनुष्य के जीवित रहने के लिए सामान्य तापमान को बरकरार रखने हेतु इन चीज़ों को इस्तेमाल करता है। यह निश्चित है। यह केवल इसलिए है क्योंकि परमेश्वर के पास ऐसे विचार हैं जिससे मनुष्य एक वातावरण में ऐसे उपयुक्त तापमान के साथ रह सकता है। यह न तो बहुत अधिक ठण्डा हो सकता है और न ही बहुत अधिक गर्म हो सकता हैः वे स्थान जो बहुत अधिक गर्म हैं और जहाँ तापमान मानव शरीर की सहनशक्ति से बढ़ जाते हैं उन्हें निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा तुम्हारे लिए नहीं बनाया गया है। वे स्थान जो बहुत अधिक ठण्डे हैं और जहाँ तापमान बहुत कम हैं; ऐसे स्थान जो, जैसे ही मनुष्य आता है, उन्हें कुछ ही मिनट में इतना जमा देता है कि वे बोलने के काबिल भी नहीं होंगे, उनका दिमाग़ जम जाएगा, वे सोचने के काबिल नहीं होंगे, और बहुत ही जल्द उनका दम घुट जाएगा—ऐसे स्थानों को भी मानवजाति के लिए परमेश्वर के द्वारा नहीं बनाया गया है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य किस प्रकार का अनुसन्धान करना चाहते हैं, या वे नई खोज करना चाहते हैं या ऐसी सीमाओं को तोड़ना चाहते हैं—इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि लोग क्या सोचते हैं, क्योंकि वे कभी भी उन सीमाओं को पार करने में सक्षम नहीं हो पाएँगे जहाँ तक मानव शरीर सहन कर सकता है। वे कभी भी परमेश्वर के द्वारा मनुष्य के लिए बनाई गई सीमाओं से छुटकारा पाने में सक्षम नहीं होंगे। जब से परमेश्वर ने मनुष्यों को बनाया है, परमेश्वर भली भांति जानता है कि कौन सा तापमान मानव शरीर के लिए अनुकूल हो सकता है। क्या मनुष्य स्वयं जानते हैं? (नहीं।) तुम ऐसा क्यों कहते हो कि मनुष्य नहीं जानते हैं? मनुष्य ने किस प्रकार की मूर्खता भरी चीज़ें की हैं? क्या कुछ ऐसे लोग नहीं हैं जो हमेशा उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुवों को चुनौती देना चाहते हैं? वे उस भूमि पर कब्जा करने के लिए हमेशा वहाँ जाना चाहते हैं, जिससे वे जड़ पकड़ सकें और उसका विकास कर सकें। क्या यह स्वयं के विनाश का कार्य नहीं है? (हाँ।) मान लीजिए कि तुमने पूरी तरह से उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुवों का अुनसन्धान कर लिया है। परन्तु भले ही तुम ऐसे तापमानों को सहने के अनुकूल हो गए हो, तो क्या उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुवों के सजीव वातावरण एवं जीवित रहने के वातावरण को बदलने से किसी तरह से मानवजाति को लाभ पहुँच सकता है? यदि उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुवों की सारी बर्फ पिघल जाती है तो क्या तुम प्रसन्न होगे? यह अविश्वसनीय है। यह बेतुका कार्य है। मानवजाति के पास एक ऐसा वातावरण है जिसमें वे जीवित रह सकते हैं, परन्तु वे बस खामोशी और सचेतता से यहाँ नहीं रह सकते हैं, और उन्हें वहाँ जाना पड़ता है जहाँ वे जीवित नहीं रह सकते हैं। ऐसा क्यों है? वे इस उपयुक्त तापमान में रहते हुए उक्ता गए हैं। उन्होंने बहुत सारी आशीषों का आनन्द उठाया है। इसके अतिरिक्त, इस सामान्य सजीव वातावरण को मानवजाति के द्वारा काफी हद तक नष्ट कर दिया गया है, इसलिए वे थोड़ा और नुकसान करने के लिए उत्तरी ध्रुव एवं दक्षिणी ध्रुव भी जा सकते हैं या किसी "कारण" में संलग्न हो सकते हैं, ताकि वे एक प्रकार के "प्रथम अन्वेषक" बन सकें। क्या यह मूर्खता नहीं है? उनके पूर्वज शैतान की अगुवाई में, यह मानवजाति एक के बाद एक लगातार बेतुकी चीज़ें करता है, और बेधड़क और मनमौजी तरीके से उस सुन्दर निवास को नष्ट करता है जिसे परमेश्वर ने मानवजाति के लिए बनाया था। शैतान ने यही किया था। इसके आगे, यह देखते हुए कि पृथ्वी पर मानवजाति का जीवन थोड़ा बहुत खतरे में है, बहुत से लोग चाँद पर जाने और वहाँ बसने के लिए तरीके ढूँढ़ते हैं, यह देखने के द्वारा कि वहाँ रह सकते हैं कि नहीं वे बच निकलने के लिए एक मार्ग खोजते हैं। अंत में, वहाँ किस बात की घटी है? (ऑक्सीजन।) क्या मनुष्य ऑक्सीजन के बगैर जीवित रह सकते हैं? (नहीं।) जबकि चाँद में ऑक्सीजन की कमी है, तो यह ऐसी जगह नहीं है जहाँ मनुष्य रह सकता है, और फिर भी मनुष्य वहाँ जाने की लगातार इच्छा करता है। यह क्या है? (यह स्वयं का विनाश है और परेशानियों को खोजना है।) यह स्वयं का विनाश है, है ना? यह वायु से विहिन एक स्थान है, और तापमान मनुष्य के अस्तित्व के लिए उपयुक्त नहीं है, इसलिए इसे मनुष्य के लिए परमेश्वर के द्वारा नहीं बनाया गया है।

वह तापमान जिसके विषय में हमने अभी अभी बात की है वह कुछ ऐसा है जिसके साथ लोग अपने प्रतिदिन के जीवन में सम्पर्क में आ सकते हैं। "आज मौसम बड़ा अच्छा है, 23 डिग्री सेल्सियस है। मौसम बढ़िया है, आसमान साफ है, और हवा तरोतज़ा करनेवाली है। शुद्ध हवा में साँस लीजिए। सूर्य चमक रहा है। सूर्य की रोशनी में अंगड़ाई लीजिए। आज मेरी मनोदशा बहुत अच्छी है!" या "आज मौसम बहुत ठण्डा है। यदि तुम अपने हाथ बाहर निकलोगे तो वे तुरन्त जम जाएँगे। सब कुछ जम रहा है, इसलिए बाहर देर तक मत रहिए। जल्दी कीजिए, ठण्ड में जम मत जाइए!" तापमान एक ऐसी चीज़ है जिसका सभी मानवीय देह आभास कर सकते हैं, परन्तु कोई इसके बारे में नहीं सोचता है कि यह तापमान कैसे आया था, या यह किसके जिम्मे में है और कौन इस तापमान को नियन्त्रित करता है जो मनुष्य के रहने के लिए उपयुक्त है। यह वही है जिसे हम अब जानने की कोशिश कर रहे हैं। क्या इसमें परमेश्वर की बुद्धि है? क्या इसमें परमेश्वर का कार्य है? (हाँ।) इस पर विचार करते हुए कि परमेश्वर ने मनुष्य के जीवन के लिए एक उपयुक्त तापमान के साथ एक वातावरण बनाया है, क्या यह एक मार्ग है जिसके तहत परमेश्वर सभी चीज़ों की आपूर्ति करता है? यह वास्तव में है। यह दिखाता है कि सभी चीज़ों के लिए परमेश्वर की आपूर्ति एवं प्रबन्धन सचमुच में वास्तविक है!

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