सृजित प्राणी का कर्तव्य उचित ढंग से निभाने में ही जीने का मूल्य है (भाग दो)

कुछ लोग भले ही परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, मगर उनके दिल अभी भी लौकिक संसार में लगे हैं; वे अपने कर्तव्य निभा सकते हैं, लेकिन अभी भी अमीर बनने का सपना देखते हैं। उनके दिल बेचैन और असंतुष्ट रहते हैं और कभी-कभी तो वे परमेश्वर का घर छोड़ देना चाहते हैं, लेकिन डरते हैं कि उन्हें आशीष नहीं मिलेगी और वे प्रलयों में घिर जाएँगे, इसलिए वे बस अनमने ढंग से अपने कर्तव्य निभा पाते हैं। समय-समय पर वे नकारात्मकता फैला सकते हैं और थोड़ी शिकायत कर सकते हैं; भले ही उन्होंने बहुत ज्यादा बुरे काम न किए हों मगर वे सकारात्मक भूमिका नहीं निभाते हैं। क्या परमेश्वर उनके इस व्यवहार के बारे में जानता है? (जानता है।) क्या लोग इसके बारे में जानते हैं? अक्सर लोग इसे देख नहीं पाते। उन्हें लगता है कि ऐसे लोग अच्छे हैं, अपने कर्तव्य निभाने के लिए जल्दी उठकर देर तक जागते हैं और वे कष्ट सहने और कीमत चुकाने में सक्षम हैं, और वे बस कभी-कभार कमजोर पड़ते हैं और दूसरों के साथ मेलजोल करना पसंद नहीं करते। लेकिन परमेश्वर जानता है कि ऐसे लोग अपने दिलों में क्या सोचते हैं और कैसे व्यवहार करते हैं, और इसके लिए उसके पास उपयुक्त व्यवस्थाएँ हैं। जब समय आता है तो वह उन्हें बीमार पड़ने देता है और जब वे बीमार हो जाते हैं, तो अपने कर्तव्य नहीं निभा पाते। इसका क्या मतलब है? इसका मतलब यह है कि उन्हें अपना कर्तव्य निभाने वालों की श्रेणी से हटा दिया गया है। यह अच्छी बात है या बुरी? (बुरी बात है।) तुम सभी अपने कर्तव्य समर्पित होकर निभाने के इच्छुक हो, तुम क्लेश, बीमारी या पीड़ा का सामना नहीं करना चाहते और तुम्हें लगता है कि इन सबके कारण तुम्हारे कर्तव्य निर्वहन में देरी होती है। लेकिन जो लोग अपने कर्तव्य नहीं निभाना चाहते, उन्हें लगेगा कि यदि उन्हें क्लेशों या बीमारी का सामना करना पड़ेगा तो यह अच्छा है और वे सोचते हैं, “इस बार मुझे एक कारण, एक बहाना मिल गया है; मुझे अब और अपना कर्तव्य निभाने की जरूरत नहीं है।” वास्तव में यह एक बुरी बात है : इसका मतलब है कि परमेश्वर अब उन्हें नहीं चाहता, अब उन्हें शामिल नहीं करता और यह उन्हें स्वच्छ करने का परमेश्वर का तरीका है। स्वच्छ किए जाने के बाद मुमकिन है कि उनकी बीमारियाँ अचानक ठीक हो जाएँ, और जब वे बेहतर हो जाएँगे तो काम पर जाएँगे और पैसे कमाएँगे, अपना जीवन जीते हुए धन-दौलत कमाएँगे। परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति को नहीं चाहता—जब परमेश्वर किसी को नहीं चाहता तो इसका क्या मतलब होता है? इसका मतलब है कि ऐसे व्यक्तियों का कोई परिणाम नहीं है; वे परमेश्वर की दृष्टि से हट गए हैं और उनके पास अब उद्धार प्राप्त करने का कोई अवसर नहीं है। परमेश्वर ने उन्हें पूर्वनियत करके चुना था, लेकिन अब वह उन्हें ठुकरा देता है; वह ऐसे व्यक्ति को बचाने का नहीं, बल्कि अपने घर से पूरी तरह निकालने का निर्णय लेता है। परमेश्वर ऐसे व्यक्ति को कभी नहीं बचाएगा। इस पल से ही, उसने उद्धार पाने के सभी अवसर खो दिए हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे क्या करते हैं या कैसा व्यवहार करते हैं, परमेश्वर अब उन्हें नहीं चाहता। यदि परमेश्वर अब किसी को नहीं चाहता, तो क्या यह उसका अंत है? इस शख्स की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। इससे पहले कि परमेश्वर किसी व्यक्ति को चुने, वे शैतान की सत्ता के अधीन रहते हैं। जब परमेश्वर उन्हें चुनता है, तो वे उसके घर में आते हैं और उसकी देखभाल और सुरक्षा में रहते हैं। जब वे परमेश्वर का विरोध करके उसे धोखा देते हैं, और परमेश्वर उन्हें अलग कर देता है, तो वे लौटकर कहाँ जाते हैं? (शैतान की सत्ता में।) वे फिर से शैतान की सत्ता में लौट जाते हैं। इसका मतलब है कि परमेश्वर ने वापस उन्हें शैतान को सौंप दिया है, जिसका अर्थ है, “मैं अब इस व्यक्ति को नहीं चाहता। वे सत्य नहीं स्वीकारते; मैं उन्हें तुम्हें देता हूँ,” और शैतान उन्हें ले लेता है। वह व्यक्ति शैतान के पास लौट जाता है और उसके पास उद्धार का कोई अवसर नहीं रहता। जब परमेश्वर किसी व्यक्ति को शैतान को लौटा देता है तो वह व्यक्ति क्या खो देता है? उसका परिणाम और अंत कैसा होगा? तुम लोगों को यह बात स्पष्ट होनी चाहिए। परमेश्वर द्वारा हटाया जाना कोई सरल बात नहीं है, और यह यकीनन किसी व्यक्ति के क्षणिक अपराध के कारण नहीं होता है, क्योंकि परमेश्वर लोगों को बचाने की हर मुमकिन कोशिश करता है और यूँ ही उन्हें नहीं हटाता है। जब परमेश्वर किसी व्यक्ति को चुनता है, तो उस व्यक्ति को उससे क्या प्राप्त होता है? (उसे बचाए जाने का अवसर मिलता है।) और क्या? (वे सत्य प्राप्त करते हैं।) हाँ, स्वाभाविक रूप से परमेश्वर का उद्धार प्राप्त करने के लिए उन्हें सत्य प्राप्त करना होगा। जब परमेश्वर किसी व्यक्ति को चुनता है और उसे शैतान की सत्ता से निकालकर अपने घर में ले जाता है, तो क्या शैतान परमेश्वर के लिए कोई शर्तें रखने की हिम्मत करता है? वह कोई भी शर्त रखने की हिम्मत नहीं करता, न ही कुछ कहने का साहस करता है। यदि परमेश्वर कहता है, “यह व्यक्ति मेरा है, तुम्हें अब इसे छूने की अनुमति नहीं है” तो शैतान आज्ञाकारी बनकर उस व्यक्ति को सौंप देता है। इस व्यक्ति के खान-पान, कपड़े-लत्ते, रहन-सहन, आने-जाने और हर गतिविधि पर परमेश्वर की देखरेख और नजर होती है, और परमेश्वर की अनुमति के बिना शैतान उस व्यक्ति को दोबारा छूने की हिम्मत नहीं करेगा। इसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ यह है कि व्यक्ति पूरी तरह से परमेश्वर की देखरेख और सुरक्षा के अधीन रहता है, जिसमें बाहरी ताकतों का कोई हस्तक्षेप या अतिक्रमण नहीं होता है, उसके दिन-प्रतिदिन के सुख, दुख और दर्द, सभी परमेश्वर की नजरों में जाँच-पड़ताल के अधीन और उसकी देखरेख और सुरक्षा के अधीन होते हैं। यदि कोई आपदा या विपत्ति आती है, तो परमेश्वर उस व्यक्ति को इससे बचने देगा और उसे कुछ नहीं होगा; जबकि अविश्वासियों का और जिन्हें परमेश्वर ने नहीं चुना है उनका भाग्य वही होगा जिसके वे लायक हैं। यदि उन्हें मरना चाहिए तो वे मरेंगे; यदि उन्हें आपदा का सामना करना चाहिए तो वे आपदा का सामना करेंगे। कोई भी व्यक्ति इसे बदल नहीं सकता और कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे को बचा नहीं सकता। जब आपदाएँ आती हैं तो वे कई लोगों पर पड़ती हैं; लेकिन ऐसा कैसे है कि ये विपत्तियाँ तुम पर नहीं आतीं? यह परमेश्वर की सुरक्षा है। न तो शैतान, न छोटा दानव और न ही बुरी आत्माएँ तुम्हें छूने की हिम्मत करती हैं। जब ये सब तुम्हारे सामने आते हैं, तो ऐसा लगता है मानो उनके आगे एक बाधित इलाका बनाकर उनका रास्ता रोक दिया गया हो, मानो वे इन शब्दों को देख रहे हों, “इस व्यक्ति को हाथ मत लगाना,” या मानो वे स्वर्ग के आदेश की झलक देख रहे हों, और वे तुम्हें छूने की हिम्मत नहीं करते, और तुम सुरक्षित रहते हो। तुमने इन वर्षों में बहुत अच्छा जीवन जीया है, तुम्हारे लिए सब कुछ अच्छा रहा है और तुम सामान्य रूप से अपना कर्तव्य निभाने में सक्षम रहे हो—यह एक ऐसा व्यक्ति है जिसे परमेश्वर के हाथों से सुरक्षा मिल रही है। लेकिन जिस व्यक्ति का मैंने अभी जिक्र किया उसे परमेश्वर की सुरक्षा मिलने के बाद न तो इसका एहसास होता है और न ही वह इसके प्रति सचेत होता है। वह कहता है, “यह शायद मेरी किस्मत या मेरा सौभाग्य ही है जो मैं इतने वर्षों तक शांति से जीता रहा, शैतान और वे छोटे दानव मुझसे बहुत दूर ही रहे।” यह व्यक्ति ऐसा नहीं कहता कि यह परमेश्वर की सुरक्षा थी, न ही वह परमेश्वर के प्रेम और अनुग्रह का मूल्य चुकाना जानता है। ऐसे लोग अपना कर्तव्य अच्छी तरह से नहीं निभाते, बल्कि वे बाधाएँ और गड़बड़ी पैदा कर केवल बुरे काम करते हैं। परमेश्वर उनके निरंतर व्यवहार को देखता है, उनके अंतरतम की पड़ताल करता है, उन्हें कई वर्षों तक समय और अवसर देता है, फिर भी वे पश्चात्ताप नहीं करते। परमेश्वर कहता है कि ऐसे व्यक्ति को बचाया नहीं जा सकता और आखिरकार उसे वापस शैतान को सौंप देने का फैसला करता है। यह व्यक्ति बेकार है और परमेश्वर अब और उसे नहीं चाहता। जब परमेश्वर ऐसे व्यक्ति को हटाता है तो सबसे ज्यादा खुश कौन होता है? शैतान सबसे ज्यादा खुश होता है और कहता है, “मेरे शिविर में एक और छोटा राक्षस, एक और सह-अपराधी होना कितना बढ़िया है!” वह व्यक्ति, जो सीधा-सादा है और डरना नहीं जानता, इस प्रकार शैतान के आगोश में लौट आता है। शैतान उसके साथ क्या करेगा? (शैतान उसे कुचल देगा और नुकसान पहुँचाएगा।) शैतान लोगों को नुकसान पहुँचाने में इतना माहिर है कि कुछ लोग राक्षसों के वश में हो जाते हैं, कुछ को अजीब बीमारियाँ हो जाती हैं और कुछ अचानक असामान्य व्यवहार करने लगते हैं, जिससे उनका राक्षसी स्वरूप उजागर होता है, मानो कि वे पागल हों। शैतान अक्सर इस तरह से लोगों को नुकसान पहुँचाकर निगल जाता है। शैतान के क्रियाकलापों की यही प्रकृति है : वह चालबाजी और दुष्टता के भरोसे रहता है और लोगों को लालच देकर समर्पण करने, नुकसान पहुँचाने और निगल जाने के लिए विभिन्न तरीके इस्तेमाल करता है। क्या लोगों को नुकसान पहुँचाने के शैतान के तरीके यहीं तक सीमित हैं? बिल्कुल नहीं। शैतान लोगों को सिर्फ नुकसान पहुँचाकर, बर्बाद और तबाह कर भ्रष्ट नहीं करता, जैसा कि लोग कहते हैं। उसके पास और भी कई धूर्त और क्रूर तरीके हैं, जिन सभी का भ्रष्ट मानवजाति ने प्रत्यक्ष रूप से अनुभव किया है। लोगों को शैतान को सौंपे जाने के बाद, उनमें से कुछ अचानक विशेष रूप से चतुर बन जाते हैं और चालें चलने में माहिर हो जाते हैं; अचानक उनके करियर के रास्ते बेहद सुगम हो जाते हैं और वे प्रोन्नत होकर अमीर बन जाते हैं। यह अच्छी बात है या बुरी? (बुरी बात।) मानुष की नजरों में यह अच्छी बात है, तो इसे बुरी कैसे माना जा सकता है? (ये लोग शैतान की चालों में फँस गए हैं और वे धीरे-धीरे परमेश्वर से अलग होते जाएँगे।) वे प्रोन्नत होकर अमीर बन जाते हैं और उनके लिए सब कुछ अच्छा चलने लगता है; जल्द ही, वे पैसे, रुतबे और प्रसिद्धि वाले दिग्गज कारोबारी बन जाते हैं। वे बहुत अच्छे से रहते हैं और पूरी तरह से लौकिक संसार में लौट आते हैं। क्या वे इस समय भी परमेश्वर के बारे में सोच सकते हैं? क्या वे अब भी परमेश्वर में विश्वास करना चाहते हैं? क्या उनके दिलों में अभी भी परमेश्वर बसता है? (नहीं।) उन्होंने खुद को पूरी तरह परमेश्वर से दूर कर लिया है और वे सच्चे मार्ग से विमुख हो गए हैं, शैतान ने उन्हें पूरी तरह से अपने कब्जे में कर लिया है। वे अब परमेश्वर के घर के सदस्य नहीं हैं; वे अविश्वासी बन गए हैं, और इस तरह वे एकदम बर्बाद हो चुके हैं। क्या ऐसे लोग अभी भी परमेश्वर की सुरक्षा का आनंद ले सकते हैं? (नहीं ले सकते।) लौकिक संसार में और शैतान की सत्ता के अधीन रहकर वे किस स्थिति में जी रहे हैं? हर दिन, वे नहीं जानते कि वे जीवित रहेंगे या मर जाएँगे; जब भी वे बाहर जाते हैं तो नहीं जानते कि उन्हें किसी बदकिस्मती का सामना करना पड़ेगा या नहीं; उन्हें न तो सुकून का पता है, न ही खुशी का; और उनके दिल आतंक, बेचैनी और डर से भरे रहते हैं। वे जानते हैं कि परमेश्वर को धोखा देने के दुष्परिणाम क्या होंगे, इसलिए वे दिन भर चिंता की स्थिति में जीते हैं, वे यह नहीं जानते हैं कि कब उन पर विपत्ति आ पड़ेगी और कब उन्हें दंडित किया जाएगा। लोगों के दिलों में ऐसा ही महसूस होता है जब परमेश्वर उन्हें ठुकराता है : वे अंधकार में फँस जाते हैं, बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं होता, वे जो भी कदम उठाते हैं वह बहुत कठिन और भयावह होता है, और उनका जीवन बहुत कष्टदायी होता है। क्या तुम्हें लगता है कि ये लोग इसलिए कष्टदायी जीवन जीते हैं क्योंकि ये शोहरत और लाभ के पीछे भागते हैं, संसार का अनुसरण करते हैं, आरामदायक जीवन जीते हैं और अविश्वासियों के मार्ग पर चलते हैं? नहीं। ऐसा इसलिए है क्योंकि जब परमेश्वर उन्हें त्याग देता है, तो वह उनकी परवाह नहीं करता। परमेश्वर की सुरक्षा और देखरेख के बिना वे शैतान की सत्ता के अधीन रहने वाले लोग बन जाते हैं और तुरंत अंधकार में घिर जाते हैं। अंधकार में घिरने पर लोग सबसे पहले यही महसूस करते हैं कि उनके दिल अब शांत नहीं हैं और उन्हें अब परमेश्वर की उपस्थिति महसूस नहीं होती है। उन्हें लगता है कि संसार आतंक, जाल, धोखे और खतरे से भरा है; जीवन और भी अधिक कठिन है। क्या इससे कोई फर्क पड़ता है कि संसार में उनका रुतबा क्या है? क्या इससे कोई फर्क पड़ता है कि वे कितने काबिल या शक्तिशाली हैं? नहीं। जो परमेश्वर में विश्वास नहीं करते या जिन्हें उसने हटा दिया है, उन सभी का यही परिणाम होगा, वे जीते-जागते नरक में गिर जाएँगे, जो बहुत दर्दनाक है। वहाँ तमाम जिंदा भूत हर दिन तुम्हें नुकसान पहुँचाएँगे। यह रहने लायक जगह नहीं है; यह मौत से भी बदतर जीवन है।

जब लोग परमेश्वर की सुरक्षा में होते हैं, तो वे सुरक्षित, शांत और आनंदित महसूस करते हैं। वे मनुष्य की तरह जी सकते हैं और सामान्य मानवता वाली सभी गतिविधियाँ कर सकते हैं; उनके बारे में सब कुछ सामान्य और वैसा ही है जैसा होना चाहिए, और उनके दिल स्वतंत्र और सहज हैं। जब लोग परमेश्वर की देखरेख और सुरक्षा खो देते हैं, तो ये भावनाएँ गायब हो जाती हैं, फिर वे अपने कौशल, क्षमताओं, विचारों और सांसारिक आचरण के फलसफों और अपनी उग्रता के साथ अपने आस-पास के तमाम लोगों, घटनाओं और चीजों पर प्रतिक्रिया करते हैं। ये तमाम लोग, घटनाएँ और उनके आस-पास की चीजें क्या हैं? ये सब खराब लोग, बुरे लोग, बड़े और छोटे राक्षस और दुष्ट आत्माएँ हैं। अगर लोग परमेश्वर की सुरक्षा के बिना नापाक आत्माओं वाली जगह पर रहें, तो क्या उनका जीवन अच्छा होगा? (नहीं।) यही कारण है कि लोग परमेश्वर को त्यागने के बाद एक भी अच्छे दिन का आनंद नहीं ले पाते हैं; उनके लिए जीना बेहद कठिन हो जाता है। जब लोग परमेश्वर की देखरेख और सुरक्षा के अधीन रहते हैं, तो वे इसे सँजोना नहीं जानते और वे इसे गंभीरता से नहीं लेते हैं; जब परमेश्वर उन्हें त्याग देता है, तो पछतावे के लिए बहुत देर हो चुकी होती है, और यह वास्तव में बहुत बड़ी तबाही है! जब लोग परमेश्वर के आयोजन, देखरेख और सुरक्षा के अधीन रहते हैं, तभी वे सच्ची खुशी, शांति और आनंद का अनुभव कर सकते हैं, जो कि व्यक्ति के दिल की गहराई में महसूस होने वाली ऐसी शांति और खुशी है जो परमेश्वर से आती है। जब लोग परमेश्वर की देखरेख और सुरक्षा खो देते हैं, तो उनके दिलों की गहराई में मौजूद दर्द, चिंता, व्यग्रता, असहजता और भय धीरे-धीरे बढ़ने लगता है। उनके दिलों में पीड़ा बढ़ती जाती है और इससे बाहर निकलना उनके लिए कठिन हो जाता है; वे मुक्त नहीं हो पाते। किसी व्यक्ति के कौशल और शक्तियाँ कितनी बड़ी हो सकती हैं? ऐसा क्या है जिसका सामना तुम अकेले करते हो? तुम तमाम नापाक और बुरी आत्माओं का सामना करते हो! बाहर से वे लोगों जैसे दिखते हैं : उनमें आकार, स्वरूप, देह और रक्त होता है। लेकिन वे सभी लोग शैतान के हैं, शैतान और हर प्रकार की बुरी और नापाक आत्मा ही उन्हें बहकाती है। इन चीजों के सामने कोई व्यक्ति कितना काबिल हो सकता है? क्या वे निडर हो सकते हैं? क्या वे सुकून और आनंद महसूस कर सकते हैं? चाहे वे कितनी भी बड़ी हस्ती हों, कितने भी काबिल या बुरे व्यक्ति हों, शैतान की सत्ता के अधीन और इस संसार में रहकर उन्हें कैसा महसूस होगा? जब वे अकेले और शांत होंगे, तो वे अपने आस-पास के लोगों, घटनाओं और चीजों के बारे में सोचेंगे और तब अपने रास्ते में आने वाली हर चीज से निपटना उनके लिए कितना मुश्किल होगा; उन सभी को सँभालने के लिए उन्हें अपना दिमाग लड़ाना होगा। इन सभी चीजों को निपटाने के लिए मनुष्य की ताकत और साधनों का उपयोग करना उनके लिए कितनी कठिन परीक्षा है! उनके लिए जीना इतना मुश्किल है; इतना दर्दनाक है। कुछ लोग कहते हैं कि महान हस्तियों को इतना कष्ट नहीं होता, लेकिन वास्तव में उन्हें ज्यादा कष्ट होता है। सामान्य लोग जीवन के एक छोटे-से चक्र का सामना करते हैं जबकि महान हस्तियों को जीवन के एक बड़े चक्र के साथ ही अधिक कष्ट और पीड़ा का सामना करना पड़ता है। क्या वे खुशी महसूस करते हैं? (नहीं महसूस करते।) तो फिर परमेश्वर की देखरेख और सुरक्षा खो देने और उसके द्वारा त्याग दिए जाने पर लोगों को किस प्रकार के जीवन का सामना करना पड़ेगा? वे उन सभी नापाक और बुरी आत्माओं का सामना अपने-आप और अकेले ही करेंगे—जिससे उनका जीवन असहनीय हो जाएगा! वे किसी भी समय अपने शत्रुओं की गोली खाकर या उनकी साजिशों के परिणामस्वरूप मर सकते हैं; वे थकाऊ, दर्दनाक और संतप्त जीवन जीते हैं। कुछ लोग मूर्ख होते हैं और सोचते हैं कि परमेश्वर में विश्वास करना, लगातार सत्य का अनुसरण करना और हमेशा परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और परमेश्वर के वचनों को सुनने पर ध्यान देना उबाऊ है; वे सोचते हैं कि सांसारिक लोग ही स्वतंत्र हैं और उन्हें लगता है कि परमेश्वर में विश्वास रखना निरर्थक है, इसलिए वे अब और विश्वास नहीं रखना चाहते हैं। वे हमेशा इसी तरह सोचते हैं, लेकिन एक दिन उन्हें जरूर पता चलेगा कि इसके परिणाम क्या हैं।

सृष्टिकर्ता के हाथों में लोग अनंत शांति, आनंद, आशीष, सुरक्षा और देखरेख का आनंद लेते हैं, जबकि जिन लोगों में मानवता और अंतरात्मा का अभाव है वे इन चीजों को महसूस नहीं कर पाएँगे। लेकिन जब परमेश्वर किसी व्यक्ति को त्याग देता है, तो उसे तुरंत अंधकार में घिरने की पीड़ा महसूस होगी, और उस समय वह पूरी तरह से समझ जाएगा कि परमेश्वर में विश्वास रखना, अपने कर्तव्य निभाना और परमेश्वर के घर में और उसकी उपस्थिति में रहना कितना खुशहाल और आनंददायक होता था, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। तुम कह सकते हो, “परमेश्वर को त्यागने का मुझे पछतावा है। क्या मैं उस पर नए सिरे से विश्वास रखना शुरू कर सकता हूँ?” क्या परमेश्वर ऐसे अवसर देता है? (नहीं देता है।) यदि तुम अब परमेश्वर को नहीं चाहते, तो क्या परमेश्वर अब भी तुम्हें चाहेगा? क्या तुम शैतान से प्रेम नहीं करते? तुम अपने दिल में शैतान से प्यार करते हो, लेकिन तुम अभी भी कुछ आशीष पाने के लिए परमेश्वर का अनुसरण करना चाहते हो। क्या परमेश्वर को यह मंजूर हो सकता है? (नहीं हो सकता।) ऐसा ही होता है। इसलिए लोगों को इन बातों पर गौर से सोच-विचार करने के लिए अक्सर परमेश्वर की उपस्थिति में आना चाहिए, जैसे कि : सच्ची खुशी क्या है; सच्ची खुशी, आनंद और शांति पाने के लिए कैसे जिएँ; और कौन-सी चीजें लोगों के जीवन में सबसे अधिक मूल्यवान और सँजोए जाने योग्य हैं। इन बातों पर अवश्य विचार करना चाहिए। जितना अधिक तुम उचित चीजों और सत्य पर विचार करोगे, उतना ही ज्यादा परमेश्वर तुम्हें प्रबुद्ध कर तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा, और तुम्हें समझने, जानने और देखने देगा, और तुम सत्य का अभ्यास करने और सत्य में प्रवेश करने में उतना ही अधिक प्रबुद्ध और रोशन होओगे—क्या तब तुम्हारा विश्वास और अधिक बढ़ता नहीं जाएगा? यदि तुम हमेशा आलसी और प्रतिरोधी रहते हो, हमेशा सत्य से विमुख रहते हो और इसे पसंद नहीं करते; यदि तुम कभी भी परमेश्वर की उपस्थिति में नहीं आना चाहते और हमेशा स्वच्छंद होने और परमेश्वर से दूर जाने के बारे में सोचते हो; और यदि तुम न तो उसका मार्गदर्शन, न उसकी देखभाल, और न ही उसकी सुरक्षा स्वीकारते हो, तो क्या परमेश्वर तुम्हें बाध्य कर सकता है? यदि यही तुम्हारा रवैया है, तो परमेश्वर यकीनन तुम्हें प्रबुद्ध नहीं करेगा, लिहाजा तुम्हारा विश्वास कम हो जाएगा। तुम जितना अधिक समय तक विश्वास रखोगे, तुम्हारी ऊर्जा उतनी ही कम होगी, और फिर तुम शिकायत करने लगोगे, अपनी धारणाएँ और नकारात्मकता फैलाओगे, और समय आने पर परेशानी खड़ी करोगे। एक बार अगर तुमने परेशानी खड़ी कर दी और कलीसिया के कार्य में बाधा डाल दी तो परमेश्वर का घर तुम्हारे साथ इतनी उदारता से व्यवहार नहीं करेगा; वह तुम्हें बाहर निकाल देगा या निष्कासित कर देगा और तब परमेश्वर में विश्वास रखने के तुम्हारे मार्ग का अंत हो जाएगा। इसका दोषी कौन होगा? (स्वयं व्यक्ति ही।) ऐसा अंत उन लोगों का होता है जो परमेश्वर में विश्वास तो रखते हैं, लेकिन सत्य का अनुसरण नहीं करते। जैसी कि कहावत भी है, “तीन फुट गहरी बर्फ एक दिन में नहीं जम सकती।” यदि तुमने कई वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास किया लेकिन सत्य का अनुसरण नहीं किया, और तुमने संसार का मार्ग चुना है, और परमेश्वर के बजाय शैतान का अनुसरण किया है तो परमेश्वर तुम्हें त्याग देगा और अकेला छोड़ देगा। परमेश्वर लोगों को मजबूर नहीं करता। परमेश्वर का उद्धार, उसका वचन, और उसका सत्य और जीवन मनुष्य को मुफ्त में दिया गया है; वह तुमसे पैसे नहीं माँगता या तुम्हारे साथ सौदा नहीं करता। यदि तुम न केवल सत्य को स्वीकारने से इनकार करते हो, बल्कि परमेश्वर के बारे में शिकायत भी करते हो और कलीसिया के कार्य में बाधा भी डालते हो तो क्या तुम मुसीबत नहीं बुला रहे हो? फिर परमेश्वर क्या करेगा? वह यकीनन तुम्हें त्याग देगा, और यही तुम्हारे किए की सजा होगी। यदि तुम अपने हाथ आए परमेश्वर के महान उद्धार को तत्काल ठुकरा देते हो और फिर भी महसूस करते हो कि तुम्हारे साथ अन्याय हुआ है और परमेश्वर के साथ सौदा करना चाहते हो, तो यह वाकई बेतुका है! अगर मामला यह है तो तुम्हें वापस संसार के कीचड़ भरे गड्ढे में चले जाना चाहिए और जैसे चाहो वैसे जीना चाहिए! परमेश्वर अब कोई परवाह नहीं करेगा और इसी में तुम्हारा परिणाम तय होगा। कुछ लोग कहते हैं, “यदि लोग अब परमेश्वर को नहीं चाहते, तो वह उन्हें मरने क्यों नहीं देता?” क्या ऐसा सोचने वाले लोग नहीं हैं? (बिल्कुल हैं।) कुछ लोग क्रूर होते हैं और कहते हैं, “यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर का अनुसरण नहीं करता, तो परमेश्वर को उन्हें शाप देना चाहिए, उन्हें दंडित करके नष्ट कर देना चाहिए!” क्या तुम लोगों को लगता है कि परमेश्वर का स्वभाव ऐसा है? (नहीं, ऐसा नहीं है।) परमेश्वर ऐसा नहीं करता; वह लोगों पर दबाव नहीं डालता। किसी व्यक्ति का जीवन कैसा होगा यह परमेश्वर पहले ही तय कर देता है, वह बेतरतीब ढंग से कार्य नहीं करता है। उस व्यक्ति का भाग्य, मंजिल और परिणाम परमेश्वर पहले से तय कर चुका है, और यदि वह परमेश्वर का अनुसरण नहीं करता है, तब भी परमेश्वर उसे उसकी मूल नियति के अनुसार स्वाभाविक रूप से जीने देगा। परमेश्वर उसे शैतान को सौंप देगा, और बात खत्म; आखिरकार जब सही समय आएगा यानी उसके जीवन के अंत में उसका परिणाम वही होगा जो परमेश्वर ने तय किया है। परमेश्वर इन सभी व्यवस्थाओं को नहीं बिगाड़ेगा। मनुष्य के शब्दों में, मसीह-विरोधियों की धूर्तता और क्रूरता के विपरीत, परमेश्वर एक विशेष तर्कसंगत तरीके से कार्य करता है; मसीह-विरोधी कहते हैं : “यदि तुम मेरा अनुसरण नहीं करते हो तो मैं तुमसे पछतावा करवाऊँगा!” यह कैसा स्वभाव है? यह तो एक डाकू का स्वभाव है, यह एक लुटेरे और दुष्ट व्यक्ति का स्वभाव है। परमेश्वर इस तरह से व्यवहार नहीं करता। परमेश्वर कहता है, “यदि तुम मेरा अनुसरण नहीं करते हो, तो शैतान के पास लौट जाओ, और अब से हमारे बीच के सभी संबंध टूट जाएँगे। तुम्हें न तो मेरी सुरक्षा और न ही मेरी देखरेख का आनंद मिलेगा; इस आशीष में तुम्हारा कोई हिस्सा नहीं होगा। जैसे चाहो वैसे जियो; फैसला तुम्हारा है!” परमेश्वर लोगों के प्रति सहनशील है और शैतान की तरह उन्हें मजबूर नहीं करता है; शैतान हमेशा तुम्हें काबू करना और तुम पर हमेशा के लिए कब्जा बनाए रखना चाहता है, भले ही तुम ऐसा न चाहो। परमेश्वर ऐसा नहीं करता। चीजों को करने के लिए परमेश्वर के अपने सिद्धांत हैं; वह लोगों से उसका अनुसरण करने के लिए कहता है, लेकिन वह उन्हें कभी मजबूर नहीं करता। एक सृजित प्राणी के रूप में, यदि तुम सत्य स्वीकार नहीं कर सकते, यदि तुम एक सृजित प्राणी के कर्तव्य पूरे नहीं कर सकते, तो तुम्हें कभी परमेश्वर का आशीष प्राप्त नहीं होगा।

7 नवंबर 2017

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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