अपनी धारणाओं का समाधान करके ही व्यक्ति परमेश्वर पर विश्वास के सही मार्ग पर चल सकता है (2) भाग दो

मैंने अभी-अभी लोगों के स्वभाव के एक पहलू के बारे में चर्चा की—हठ। लोग जब उन पीड़ादायक परिस्थितियों और संकटों का सामना करते हैं जिनका इंतजाम सृष्टिकर्ता उनके लिए करता है तो अपने हठ के कारण उनका रवैया समर्पण करने का नहीं बल्कि अपनी हर लाभकारी चीज को पकड़े रखने और उसे न त्यागने का होता है। ऐसे बर्ताव से परमेश्वर कैसे निपटता है? परमेश्वर का कार्य लोगों की इच्छा से स्वतंत्र होता है, तो फिर परमेश्वर लोगों के ऐसे कार्यों से कैसे निपटता है? परमेश्वर यकीनन यह नहीं कहेगा, “तुम इस बार नाकामयाब रहे, इसलिए तुम तबाह हो जाओगे। तुम जैसे लोग बेकार हैं, और मुझे अब तुम्हारी जरूरत नहीं है।” परमेश्वर ने लोगों का त्याग नहीं किया है। वह वही तरीका इस्तेमाल करता रहता है, विभिन्न माहौल, विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों की व्यवस्था करता रहता है, ताकि लोग वही पीड़ा और वही कठिन हालात अनुभव कर सकें। इसका प्रयोजन क्या है? (यह लोगों को होश में लाता है।) इससे लोग चिंतन करते हैं, होश में आते हैं, और अपनी जिद्दी सोच को त्याग देते हैं। इंसानों से इस प्रकार बातचीत करने, और इंसानों से इस प्रकार की पारस्परिक क्रिया करने के लिए परमेश्वर बार-बार अपने अनूठे तरीकों का इस्तेमाल करता है। आखिरकार, इस कार्यपद्धति के जरिये परमेश्वर कौन-सा नतीजा हासिल करना चाहता है? लोगों को विभिन्न कठिन हालात, व्यथा, यहाँ तक कि रोगों और परिवार की बदकिस्मतियों से गुजारकर परमेश्वर लोगों का जीवन भर मार्गदर्शन करता है। लोगों को इस दुख का अनुभव करवाने का प्रयोजन यह है कि वे निरंतर चिंतन कर अपनी अंतरात्मा में समझें और गहराई से सत्यापन करें : “क्या यह परमेश्वर की व्यवस्था है? मुझे अपने भविष्य के पथ पर कैसे चलना चाहिए? क्या मुझे दिशा बदलनी चाहिए? क्या मुझे सत्य का मार्ग खोजना चाहिए? क्या मुझे अपने जीने का ढंग बदलना चाहिए?” परमेश्वर लोगों को हर तरह की पीड़ा, क्लेश, दुर्भाग्य और कठिन हालात अनुभव करवाता है ताकि बाद में उनके दिलों की गहराई में यह पुष्टि हो सके कि एक संप्रभु है जो लोगों की नियति पर संप्रभु है, और लोग मनमाने, अहंकारी और जिद्दी नहीं हो सकते बल्कि उन्हें समर्पण करना सीखना चाहिए—माहौल, नियति, और उनके आसपास होने वाली हर चीज के प्रति समर्पण करना। इससे पहले कि तुम परमेश्वर के स्पष्ट वचन सुनो, परमेश्वर इन तरीकों और तथ्यों का इस्तेमाल करता है ताकि तुम हर तरह के माहौल, लोगों, घटनाओं और चीजों का अनुभव करो, और अपने दिल की गहराई में निरंतर पुष्टि कर सको कि लोगों की नियति परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित होती है, और किसी भी व्यक्ति की इस पर संप्रभुता नहीं होती, और लोग अपनी ही नियति पर संप्रभुता नहीं रख सकते। तुम्हारे दिल की गहराई में निरंतर ऐसी समझ होती है या ऐसी आवाज आती है, और तुम निरंतर पुष्टि करते रहते हो कि तुम्हारे द्वारा अनुभव की गई हर चीज किसी एक व्यक्ति की वजह से नहीं होती, न यह संयोग से होती है, न ही वस्तुपरक कारणों या हालात से होती है, बल्कि यह परमेश्वर है जो अदृश्य रूप से हर चीज पर संप्रभुता रखता है। एक व्यक्ति का दूसरे से मिलना और कुछ हो जाना संयोग नहीं होता, या ऐसे माहौल से उसका सामना होना जो उसका जीवन बदल दे, संयोग नहीं होता। यह संयोग नहीं है कि कोई व्यक्ति बीमार पड़े और बाद में बड़े आशीष प्राप्त कर ले। यह परमेश्वर ही है जो अपने अनूठे ढंग से प्रत्येक व्यक्ति को बताता है : लोगों की नियति पर परमेश्वर की संप्रभुता है, परमेश्वर प्रति दिन लोगों की निगरानी कर उनका मार्गदर्शन करता है, और वह जीवन भर हर दिन उनका मार्गदर्शन करता रहता है। लोगों को यह जानने देने के अलावा कि मानवजाति की नियति, लोगों के जीवन की सभी चीजों, मानवजाति की मंजिल और मानवजाति से जुड़ी हर चीज पर उसकी संप्रभुता है, परमेश्वर और क्या हासिल करना चाहता है? यह कि सृष्टिकर्ता परमेश्वर के प्रति लोगों की अव्यावहारिक धारणाओं, कल्पनाओं और माँगों को धीरे-धीरे धूमिल कर, गायब कर दे और उन्हें निकाल फेंके, और फिर लोग धीरे-धीरे उस मुकाम पर पहुँच जाएँ जहाँ वे उन तरीकों को स्पष्ट रूप से पहचान कर समझ सकें जिनसे सृष्टिकर्ता मानवजाति का मार्गदर्शन करता है, और जिन तरीकों से सृष्टिकर्ता लोगों के पूरे जीवन की नियति की व्यवस्था करता है। तब इन चीजों से, लोग यह समझ सकते हैं कि परमेश्वर का अपना स्वभाव है और परमेश्वर जीवंत और जीवन-सदृश है। वह मिट्टी का पुतला नहीं है, रोबोट नहीं है, न ही लोगों द्वारा कल्पित निर्जीव प्राणी है, बल्कि इसके बजाय उसमें जीवन और स्वभाव है। एक अर्थ में, इससे लोग उन तरीकों को समझ लेते हैं जिनसे सृष्टिकर्ता कार्य करता है और यह लोगों से हर तरह की धारणाओं, कल्पनाओं, और वास्तविकता के विपरीत खोखले विचारों और तर्कों का त्याग करवाता है। संक्षेप में कहें, तो यह लोगों को इस लायक बनाता है कि वे परमेश्वर के कार्य से जुड़ी तमाम खोखली धारणाओं और कल्पनाओं को जाने दे सकें। एक दूसरे अर्थ में, जब वे इन धारणाओं और कल्पनाओं को जाने देते हैं, तो वे परमेश्वर के कार्य और उसकी संप्रभुता को स्वीकार कर उसके प्रति समर्पण कर सकते हैं। एक अर्थ में यह एक छोटा-सा नतीजा है, लेकिन एक दूसरे अर्थ में, यह एक ऐसा परिणाम है जो तुमने नहीं देखा है, और यही सबसे बड़ा और सबसे गूढ़ परिणाम है। यह परिणाम क्या है? यह है कि परमेश्वर इन तरीकों का प्रयोग लोगों को बताने के लिए करता है कि वह लोगों पर जो भी करता है और हासिल करता है वह खास तौर पर व्यावहारिक और वास्तविक स्थिति में करता है। एक बार यह समझ लेने के बाद लोग कुछ खोखली और भ्रमपूर्ण चीजों को त्याग देंगे, सृष्टिकर्ता की व्यवस्थाओं का वास्तव में पालन करेंगे और इनके प्रति समर्पण करेंगे और फिर वास्तविक जीवन में हर उस चीज का सचमुच सामना करेंगे जिसका इंतजाम सृष्टिकर्ता ने किया है, बजाय इसके कि सृष्टिकर्ता की कल्पना करने के लिए या जीवन की कुछ चीजों से निपटने के लिए कुछ खोखले सिद्धांतों या धार्मिक संकल्पनाओं या धर्मसैद्धांतिक ज्ञान का प्रयोग करें। यही वह परिणाम है जो परमेश्वर देखना चाहता है और जो वह लोगों में हासिल करना चाहता है। इसलिए पहले चरण में सृष्टिकर्ता की वाणी सुनने और विभिन्न सत्यों के बारे में सृष्टिकर्ता के स्पष्ट वचनों को समझने से पहले परमेश्वर का लोगों पर कार्य करने का तरीका यह है कि वह तुम्हारे लिए ऐसी विभिन्न स्थितियों की व्यवस्था करता है जिनसे होकर तुम गुजरो और जिन्हें अनुभव करो। जब तुम्हें कुछ पुष्टि प्राप्त होती है, और तुम्हारे दिल की गहराई में इन चीजों के बारे में कुछ भावनाएँ पैदा होती हैं, और ये तुम्हारे दिल को छू जाती हैं और तुम उन्हें समझ लेते हो, तब परमेश्वर तुम्हें स्पष्ट वचनों से बताएगा कि जीवन किस बारे में है, परमेश्वर किस बारे में है, इंसान कैसे अस्तित्व में आए, और लोगों को किस प्रकार के पथ पर चलना चाहिए। इस प्रकार, इस मान्यता के आधार पर कि मनुष्य परमेश्वर से आए, और उन्हें परमेश्वर ने रचा, और इस मान्यता के आधार पर कि स्वर्ग, पृथ्वी, और तमाम चीजों के बीच एक संप्रभु है, लोग परमेश्वर में आस्था के पथ पर चलते हैं, फिर परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार कर लेते हैं, और परमेश्वर के उद्धार और पूर्णता को स्वीकार कर लेते हैं—इसकी प्रभावशीलता और भी बेहतर होती है। अब, परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार करने वाले सभी लोग कौन हैं? कम-से-कम वे परमेश्वर के अस्तित्व को मानते हैं और मानते हैं कि संपूर्ण ब्रह्मांड परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है। वे यह भी मानते हैं कि नियति होती है, और मानव जीवन परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत है, और इसके अलावा वे आध्यात्मिक क्षेत्र के अस्तित्व को और स्वर्ग और नरक के अस्तित्व को मानते हैं, और यह कि लोगों की नियति पूर्वनिर्धारित है। इन लोगों में से, परमेश्वर ने अपने चुने हुए लोगों को चुना है, जो सत्य से प्रेम करते हैं, और जो सत्य को स्वीकार कर सकते हैं। वे परमेश्वर की वाणी को समझ सकते हैं, और परमेश्वर के कार्य को स्वीकार कर सकते हैं। यही वह एक तरीका और एक सिद्धांत है जिससे परमेश्वर कार्य करता है।

परमेश्वर लोगों पर कार्य कैसे और किन विधियों से करता है, इस पर हमने अभी-अभी चर्चा की। हमने सिर्फ इन मुद्दों को ही छुआ, इस पर कुछ नहीं कहा कि लोगों की धारणाएँ क्या हैं और लोग परमेश्वर के समक्ष कौन-सी माँगें रखते हैं। आओ, अब हम इनसे जुड़े मसलों पर संगति करें। चूँकि हमने इस संगति में जिक्र किया कि लोगों के मन में परमेश्वर के कार्य के बारे में कुछ खोखले और अस्पष्ट विचार और समझ हैं, तो आओ इसे साबित करने के लिए हम कुछ मिसालें ढूँढ़ें, और सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह की मिसालों के बारे में थोड़ी चर्चा करें। इस बुनियाद पर, क्या तब लोग समझ नहीं पाएँगे कि कौन-सी कल्पनाएँ काफी खोखली और काफी अस्पष्ट हैं और ये परमेश्वर के कार्य के बारे में धारणाएँ हैं? पहले जो कहानी मैंने तुम्हें सुनाई थी, उससे शुरू करूँ, तो कहानी की नायिका जीवन में बहुत सारे दर्दनाक अनुभवों से गुजरी। हर दर्दनाक अनुभव के बाद, परमेश्वर अपने ही तरीकों से उसकी नियति की व्यवस्था और आयोजन करता रहा और आगे के मार्ग पर उसका मार्गदर्शन करता रहा। हालाँकि वह नहीं समझी, नहीं जान पाई, और उसने चिंतन नहीं किया, फिर भी परमेश्वर ने यह वैसे ही किया जैसे उसने हमेशा किया था। इस मुकाम पर, क्या उस महिला ने सृष्टिकर्ता की इस कार्यविधि के बारे में कुछ विचार प्रदर्शित किए? क्या उन विचारों को एक किस्म की धारणा कहा जा सकता है? ये विचार और ऐसी धारणा वास्तव में क्या हैं? सबसे पहले, अगर नायिका की ही बात करें, तो उसकी एक इच्छा थी। उसने जीवन में अमीर या दौलतमंद होने की अपेक्षा नहीं की थी, वह बस इतना चाहती थी कि कोई ऐसा हो जिस पर वह भरोसा कर सके। गहन-विश्लेषण और भेद पहचानने के जरिये हम समझ सकते हैं कि यह इच्छा गलत थी। एक अर्थ में, यह उस नियति के विपरीत थी जो परमेश्वर लोगों के लिए आयोजित और व्यवस्थित करता है, और एक दूसरे अर्थ में यह व्यावहारिक भी नहीं थी। तो क्या परमेश्वर ने उसकी इस इच्छा के बारे में कोई परिभाषा या वक्तव्य दिया है? लोगों की कल्पनाओं के अनुसार परमेश्वर के लिए किसी व्यक्ति को थोड़ा धर्म-सिद्धांत समझाना बहुत आसान है, है कि नहीं? अगर वह उन्हें समझाना चाहे, तो क्या वे समझेंगे नहीं? इस महिला की एक आकांक्षा थी कि कोई ऐसा हो जिस पर वह भरोसा कर सके—परमेश्वर उसे ऐसा बना सकता था कि वह ऐसी आकांक्षा न रखे, या वह उससे इस आकांक्षा को बदलवा सकता था—क्या परमेश्वर ने यह किया? (नहीं।) नहीं, परमेश्वर ने यह नहीं किया। तो क्या लोगों के इस तरह के विचार वास्तव में धारणाएँ नहीं हैं? क्या ये अलौकिक नहीं हैं? और खोखले नहीं हैं? लोगों के मन में ऐसे विचारों का उठना एक सहज परिघटना है। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ कि यह एक स्वाभाविक घटना है? परमेश्वर ने इंसान को स्वतंत्र इच्छा वाला बनाया। इंसान के पास दिमाग है, सोच और विचार हैं। शैतान के हाथों भ्रष्ट होने के बाद, इंसान संसार की ध्वनियों और दृश्यों से धीरे-धीरे प्रभावित हुआ, और अपने माँ-बाप से शिक्षा पाकर, अपने परिजनों से प्रभावित होकर और समाज से शिक्षा ग्रहण करके, इंसान के विचारों में अनेक चीजें उभरती हैं—ऐसी चीजें जो इंसान के दिल से पैदा होती हैं, जो सहज रूप से बाहर आ जाती हैं। जो चीजें इंसान के अंदर से सहज रूप से बाहर आ जाती हैं, वे आकार कैसे लेती हैं? सबसे पहले, व्यक्ति में यह क्षमता होनी चाहिए कि वह समस्या पर विचार कर सके—यही वह नींव है जो इन चीजों को उभारने की क्षमता रखने के लिए व्यक्ति में होनी चाहिए। फिर परिवेश की शिक्षा—जैसे कि परिवार और समाज से मिलने वाली शिक्षा और उसके प्रभावों—के माध्यम से साथ ही अपने भ्रष्ट स्वभावों, इच्छाओं और निरंकुश महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित होकर, ये विचार धीरे-धीरे आकार लेने लगते हैं। जब बात इस तरह से आकार लेने वाली सोच और विचारों की हो, तो चाहे ये वास्तविकता से मेल खाते हों या फिर खोखले हों, या वे चाहे जैसे भी हों, हम अभी उनका निरूपण नहीं करेंगे। इसके बजाय, हम सिर्फ इस बारे में बात करेंगे कि परमेश्वर ऐसे विचारों को कैसे सँभालता है। क्या परमेश्वर उनकी निंदा करता है? वह उनकी निंदा नहीं करता। तो वह उनके साथ किस प्रकार पेश आता है? वह ऐसे विचारों को लोगों के मन से नहीं निकालता। लोगों के मन में एक धारणा और कल्पना होती है, वे सोचते हैं कि परमेश्वर के महान, निराकार हाथ का सौम्य स्पर्श पाकर, उनकी सोच बदल जाएगी। क्या यह धारणा अस्पष्ट, अलौकिक और खोखली नहीं है? (बिल्कुल है।) परमेश्वर के कार्य के तरीके को लेकर लोगों के मन में यह एक धारणा है। लोग अपने दिल की गहराइयों में, अक्सर परमेश्वर के कार्य और उसकी कार्यविधि को लेकर कोरी कल्पनाएँ गढ़ लेते हैं, हालाँकि वे इस बारे में कुछ कहते नहीं हैं। लोग कल्पना कर लेते हैं कि सृष्टिकर्ता शांति से आकर इंसान की बगल में खड़ा हो जाएगा और फिर उसके महान हाथ के इशारे, उसकी श्वास के झोंके से या फिर उसके किसी विचार के फेर से, इंसान के अंदर की तमाम नकारात्मक चीजें पलभर में छूमंतर हो जाएँगी, जैसे तूफानी हवा के झोंके की निःशब्द खामोशी किसी बादल को उड़ा ले जाती है। परमेश्वर मनुष्य के इन विचारों से और मनुष्य के मन में उपजने वाली इन बातों से कैसे पेश आता है? परमेश्वर इनका समाधान अलौकिक और खोखले तरीकों से नहीं करता है, बल्कि मनुष्य के परिवेश का इंतजाम करते हुए करता है। वह कैसा परिवेश बनाता है? यह कोई खोखला नहीं होता है—परमेश्वर सारे नियमों को तोड़कर कोई अलौकिक चीज नहीं करता। बल्कि वह ऐसा परिवेश बनाता है जो इंसान को मामले को समझने और उस पर निरंतर चिंतन करने दोनों के लिए बाध्य करता है, जिसके बाद परमेश्वर इंसान का मार्ग रोशन करने के लिए हर तरह के लोगों, घटनाओं और चीजों का इस्तेमाल करता है, जिससे इंसान को एक समझ हासिल हो जाती है। परमेश्वर उनकी नियति नहीं बदलता; वह उनकी नियति के क्रम में कुछ घटनाएँ जोड़ देता है, और इस तरह उन्हें ये चीजें समझने योग्य बना देता है। इंसान की तमाम धारणाएँ अलौकिक, खोखली, अस्पष्ट और वास्तविकता से असंगत—यानी वास्तविकता से दूर होती हैं। मान लो, मिसाल के तौर पर, कोई व्यक्ति भूखा है और खाना खाना चाहता है। कुछ लोग कहेंगे, “परमेश्वर सर्वशक्तिमान है, उसे बस इतना करना है कि वह मेरे ऊपर अपनी श्वास छोड़े और मेरा पेट भर जाएगा। क्या सचमुच मुझे खाना पकाने की जरूरत है? बड़ा अच्छा होगा अगर परमेश्वर एक छोटा-सा चमत्कार कर दे ताकि मुझे भूख न लगे।” क्या यह वास्तविकता से परे नहीं है? (बिल्कुल है।) अगर तुम परमेश्वर से कहो कि तुम भूखे हो, तो परमेश्वर क्या कहेगा? परमेश्वर तुमसे कहेगा कि कुछ खाना तलाशो और उसे पकाओ। अगर तुमने कहा कि तुम्हारे पास खाना नहीं है और तुम खाना नहीं बना सकते, तो परमेश्वर क्या करेगा? वह तुम्हें खाना बनाना सीखने के लिए कहेगा। यह परमेश्वर के कार्य का व्यावहारिक पक्ष है। अगर तुम लोगों का सामना किसी अस्पष्ट वस्तु से हो जाए, और तुम अब खोखली प्रार्थना न करो या आत्म-विश्वासी ढंग से परमेश्वर पर अस्पष्ट ढंग से निर्भर न रहो, या परमेश्वर के बारे में अपनी इन धारणाओं और कल्पनाओं पर अपनी उम्मीदें न टिकाओ, तो तुम्हें समझ आ जाएगा कि तुम्हें क्या करना चाहिए—तुम्हें अपना कर्तव्य, अपनी जिम्मेदारी और अपना दायित्व समझ में आ जाएगा।

मैंने अभी एक पहलू के बारे में चर्चा की, वह यह है कि जब लोग परमेश्वर द्वारा इंतजाम किए गए परिवेशों को नहीं समझते हैं तो परमेश्वर क्या करता है? परमेश्वर परिवेशों का इंतजाम करता रहता है। वह यह इसलिए करता है ताकि लोग सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को समझते रहें, और जीवन अनुभव के जरिये समझते रहें कि उनकी नियति क्या है, भीतर गहरे जान लें कि उनकी इच्छाएँ उनकी नियति से भिन्न हैं, सृष्टिकर्ता की व्यवस्थाओं से भिन्न हैं। वह ऐसा इसलिए करता है ताकि लोग तब धीरे-धीरे अपनी इच्छाओं को त्याग देना और सृष्टिकर्ता द्वारा आयोजित हर चीज के प्रति समर्पण करना सीख लें। यह समझना काफी आसान है। दूसरा पहलू यह है कि जब परमेश्वर के स्पष्ट वचन लोगों तक पहुँचते हैं, तो वे और कुछ धारणाएँ और कल्पनाएँ बना लेते हैं। कैसी धारणाएँ? “परमेश्वर के वचन जीवन की रोटी और सत्य हैं। परमेश्वर के वचन स्वयं परमेश्वर हैं। जब मैं परमेश्वर के वचन सुनता हूँ, तो मैं चाहे जितना भी मूर्ख क्यों न हूँ, तुरंत अक्लमंद बन जाता हूँ। अगर मैं परमेश्वर के अधिक वचन पढ़ता रहूँगा, तो मेरी काबिलियत बढ़ेगी और मेरे कौशल बढ़ेंगे।” लोगों के ये विचार क्या हैं? ये उनकी धारणाएँ हैं। तो क्या परमेश्वर इस तरह से कार्य करता है? (नहीं।) चूँकि ये मनुष्य की धारणाएँ हैं, इसलिए ये यकीनन परमेश्वर के कार्य के विपरीत हैं और उसके विरोध में हैं। इसी में एक तथ्य निहित है। परमेश्वर मनुष्य से आमने-सामने होकर बात करता है, और उसे बताता है कि उसे क्या करना और क्या नहीं करना चाहिए, किस मार्ग पर चलना चाहिए, परमेश्वर के प्रति समर्पण कैसे करना चाहिए, और वे कौन-से सिद्धांत हैं जिनमें उसे कार्य के विभिन्न पहलुओं में प्रवेश करना चाहिए। परमेश्वर ये तमाम चीजें स्पष्ट रूप से मनुष्य को बताता है, फिर भी मनुष्य अक्सर इस उम्मीद में रुका रहता है कि परमेश्वर उसे अपने वचनों के बजाय किन्हीं दूसरे साधनों से बताएगा कि वास्तव में उसके इरादे क्या हैं, और आशा करता है कि वह ऐसे नतीजे हासिल कर सकेगा जो पहले अकल्पनीय थे, और कुछ चमत्कार देख पाएगा। क्या यह मनुष्य की धारणा नहीं है? (बिल्कुल है।) असल में परमेश्वर क्या करता है? (अपने वचनों से होकर गुजरने और उनका अनुभव करने हेतु परमेश्वर लोगों के लिए व्यावहारिक परिवेश बनाता है।) लोगों के लिए व्यावहारिक परिवेश बनाने के बाद भी लोग जब उसके इरादे नहीं समझते हैं तो परमेश्वर क्या करता है? (वह लोगों को प्रबुद्ध करता है और उनका मार्गदर्शन करता है।) अगर वह तुम्हें प्रबुद्ध कर तुम्हारा मार्गदर्शन नहीं करता तो तुम्हें क्या करना चाहिए? (परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करना और उसका कहा करना चाहिए।) सही है। अपना कार्य शुरू करने से लेकर आज तक परमेश्वर ने लोगों से आमने-सामने होकर कितने वचन बोले हैं? इतने सारे हैं कि तुम बरसों उन्हें पढ़ते रहो, तो भी अंत तक नहीं पहुँच पाओगे। लेकिन लोग कितने वचन प्राप्त करते हैं? अगर कोई व्यक्ति बहुत कम वचन प्राप्त करता है, तो इससे क्या साबित होता है? इससे साबित होता है कि उसने परमेश्वर के वचनों पर ज्यादा मेहनत नहीं की, और उसने उन्हें नहीं सुना है। कुछ लोग कहते हैं, “मैंने सुने हैं”—लेकिन क्या तुमने परमेश्वर के वचनों को आत्मसात किया था? क्या तुमने उन्हें समझा था? क्या तुमने उन पर ध्यान दिया था? तुमने उन पर ध्यान नहीं लगाया, इसलिए परमेश्वर के वचन पहले ही तुम्हें छूकर निकल गए हैं। इसलिए जब परमेश्वर मनुष्य को यह बताने के लिए स्पष्ट भाषा का प्रयोग करता है कि कर्म कैसे करें, कैसे जिएँ, उसके प्रति समर्पण कैसे करें और हर घटना का अनुभव कैसे करें, फिर भी मनुष्य न समझे तो परमेश्वर उसके लिए परिवेशों का इंतजाम करने, उसे कुछ विशेष प्रबुद्धता देने या उसे कुछ विशेष अनुभवों से गुजारने के सिवाय और कुछ नहीं करता। यही इस बात का अंत है कि परमेश्वर क्या कर सकता है, उसे क्या करना चाहिए और वह क्या करने को तैयार है। कुछ ऐसे भी लोग हैं जो पूछते हैं, “क्या परमेश्वर नहीं चाहता कि हर व्यक्ति बचाया जाए, और किसी का भी विनाश न हो? अगर परमेश्वर ऐसी कार्यविधि अपनाएगा तो कितने लोग बचाए जा सकेंगे?” जवाब में परमेश्वर पूछेगा, “कितने लोग मेरे वचनों पर ध्यान देते हैं और मेरे मार्ग पर चलते हैं?” जितने हैं, बस उतने ही हैं—यह परमेश्वर का नजरिया और उसके कार्य का तरीका है। परमेश्वर इससे ज्यादा कुछ नहीं करता। इस मामले में मनुष्य की धारणा क्या है? “परमेश्वर इस मानवजाति पर दया दिखाता है, उसे इस मानवजाति की चिंता है, तो उसे अंत तक जिम्मेदारी उठानी ही चाहिए। अगर मनुष्य अंत तक उसका अनुसरण करता है, तो वह अवश्य बचाया जाएगा।” यह धारणा सही है या गलत? क्या यह परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है? अनुग्रह के युग में लोगों के लिए ऐसी धारणाएँ रखना सामान्य था, क्योंकि वे परमेश्वर को नहीं जानते थे। अंत के दिनों में, परमेश्वर ने लोगों को ये तमाम सत्य बताए हैं, और परमेश्वर ने लोगों को बचाने के अपने कार्य के सिद्धांत भी उन्हें समझा दिए हैं, इसलिए अगर लोग अपने दिलों में अभी भी ये धारणाएँ रखते हैं तो यह बड़ी अनर्थक बात है। परमेश्वर ने तुम्हें ये तमाम सत्य बता दिए हैं, तो अगर अंत में, तुम अभी भी कहते हो कि तुम परमेश्वर के इरादे नहीं समझते और अभ्यास करना नहीं जानते, और तुम अभी भी ऐसी विद्रोही और विश्वासघाती बातें कहते हो, तो क्या ऐसा व्यक्ति परमेश्वर द्वारा बचाया जा सकेगा? ऐसे कुछ लोग हैं जो हमेशा सोचते हैं, “परमेश्वर ऐसा महान कार्य करता है, उसे दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी प्राप्त हो जानी चाहिए और उसे परमेश्वर के महिमामंडन की गवाही देने के लिए ढेर सारे लोगों, शक्तिशाली ताकतों और काफी संख्या में उच्च क्रम के व्यक्तित्वों का प्रयोग करना चाहिए! यह कितना अद्भुत होगा!” यही मनुष्य की धारणा है। बाइबल में, पुराने और नए दोनों नियमों में, ऐसे कुल कितने लोग थे जिन्हें बचाया और पूर्ण किया गया था? अंत में वे कौन थे जो परमेश्वर का भय मान कर बुराई से दूर रह पाए? (अय्यूब और पतरस।) बस ये दो लोग ही थे। परमेश्वर की नजर में, उसका भय मानना और बुराई से दूर रहना, दरअसल, उसे जानने, सृष्टिकर्ता को जानने का मानक है। परमेश्वर की नजर में, अब्राहम और नूह धार्मिक थे, लेकिन फिर भी वे अय्यूब और पतरस से एक पायदान नीचे थे। बेशक, उस समय परमेश्वर ने इतना अधिक कार्य नहीं किया था। उसने लोगों के लिए उतना प्रावधान नहीं किया था जितना वह उनके लिए अब करता है, न तो उसने इतने स्पष्ट वचन बोले थे, न ही इतने बड़े पैमाने पर उद्धार का कार्य किया था। शायद उसे बड़ी संख्या में लोग प्राप्त नहीं हुए थे, लेकिन यह अभी भी उसकी पूर्व-नियति के दायरे में है। इसमें सृष्टिकर्ता के स्वभाव के किस पहलू को देखा जा सकता है? परमेश्वर को और अधिक लोग प्राप्त होने की उम्मीद है, लेकिन असल में अगर अधिक लोग प्राप्त न हो सके—अगर परमेश्वर को अपने उद्धार-कार्य के दौरान अधिक लोग प्राप्त न हो पाए—तो परमेश्वर उन्हें त्यागना और ठुकरा देना ही बेहतर समझेगा। यही है सृष्टिकर्ता की आंतरिक वाणी और नजरिया। इस बारे में, परमेश्वर को लेकर इंसान की क्या अपेक्षाएँ या धारणाएँ हैं? “चूँकि तुम मुझे बचाना चाहते हो, इसलिए तुम्हें अंत तक जिम्मेदार होना चाहिए और तुमने मुझे आशीष देने का वादा किया था, इसलिए तुम्हें मुझे आशीष देने चाहिए और मुझे उन्हें पाने देना चाहिए।” इंसान के अंदर बहुत-सी “अनिवार्यताएँ” हैं—अनेक माँगें हैं—और यह उसकी एक धारणा है। अन्य लोग कहते हैं, “परमेश्वर ऐसा महान कार्य करता है—छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना—अगर अंत में वह केवल दो ही लोगों को प्राप्त करे, तो यह कितनी दयनीय बात होगी। क्या तब उसके सारे कार्यकलाप व्यर्थ नहीं हो जाएँगे?” इंसान सोचता है कि ऐसा नहीं होना चाहिए, लेकिन परमेश्वर दो लोगों को प्राप्त करके भी खुश है। परमेश्वर का असली उद्देश्य मात्र उन दो लोगों को प्राप्त करना ही नहीं है, बल्कि अधिक लोगों को प्राप्त करना है, लेकिन अगर लोग जागते नहीं और नहीं समझते और वे परमेश्वर को गलत समझ कर उसका प्रतिरोध करते हैं, और वे सभी बेकार और निकम्मे हैं, तो परमेश्वर उन्हें प्राप्त न करना ही बेहतर समझेगा। यही परमेश्वर का स्वभाव है। कुछ लोग कहते हैं, “इससे बात नहीं बनेगी। तब क्या शैतान हँसी नहीं उड़ाएगा?” शायद शैतान हँसी उड़ाए, मगर इसके बावजूद क्या वह परमेश्वर का परास्त शत्रु नहीं है? फिर भी परमेश्वर ने मानवजाति को प्राप्त किया है—उनमें से कुछ ऐसे हैं जो शैतान के खिलाफ विद्रोह कर सकते हैं और उसके नियंत्रण से मुक्त हो सकते हैं। परमेश्वर ने सच्चे सृजित प्राणियों को प्राप्त किया है। जो लोग परमेश्वर द्वारा प्राप्त नहीं किए गए हैं, क्या उन्हें शैतान ने बंदी बना लिया है? तुम लोगों को पूर्ण नहीं बनाया गया है, क्या तुम लोग शैतान का अनुसरण करने में सक्षम हो? (नहीं।) कुछ लोग कहते हैं, “अगर परमेश्वर मुझे नहीं चाहता है, तो भी मैं शैतान का अनुसरण नहीं करूँगा। अगर वो मुझे आशीष देगा, तो भी मैं नहीं लूँगा।” यहाँ तक कि जिन लोगों को परमेश्वर ने हासिल नहीं किया है वे भी शैतान का अनुसरण नहीं करते—क्या इस प्रकार परमेश्वर महिमा नहीं हासिल करता है? परमेश्वर द्वारा प्राप्त लोगों की संख्या, और जिस पैमाने पर वह उन्हें प्राप्त करता है, उस बारे में लोगों के मन में एक धारणा होती है; वे मानते हैं कि परमेश्वर को उन थोड़े-से लोगों को ही प्राप्त नहीं करना चाहिए। इंसान के मन में ऐसी धारणा इसलिए पैदा होती है, क्योंकि एक ओर वह परमेश्वर के मन की थाह नहीं पा सकता और यह नहीं समझ सकता कि वह किस प्रकार के व्यक्ति को प्राप्त करना चाहता है—इंसान और परमेश्वर के बीच हमेशा दूरी होती है; दूसरी ओर, इंसान के लिए ऐसी धारणा रखना वह तरीका है जिससे वह खुद को दिलासा देता है और अपने आप को मानसिक रूप से स्वतंत्र करता है। इंसान मानता है, “परमेश्वर ने बहुत कम लोग प्राप्त किए हैं—हम सबको प्राप्त कर लेना उसके लिए कितना गौरवशाली होगा! अगर परमेश्वर किसी को न निकाले, बल्कि हर एक को जीत ले और अंततः हर कोई पूर्ण बन जाए और परमेश्वर द्वारा लोगों को चुने जाने और बचाए जाने की बात बेकार न जाए, न ही उसके प्रबंधन का कार्य बेकार हो, तो क्या शैतान और ज्यादा शर्मिंदा न होगा? क्या परमेश्वर और अधिक महिमामंडित नहीं होगा?” वह ऐसा इसलिए कह सकता है क्योंकि कुछ तो वह सृष्टिकर्ता को नहीं जानता और कुछ उसकी अपनी स्वार्थपूर्ण मंशा है : उसे अपने भविष्य की चिंता है, इसलिए वह इसे सृष्टिकर्ता की महिमा से जोड़ देता है, इस तरह यह सोचकर कि चित भी मेरी, पट भी मेरी, उसके दिल को चैन मिलता है। इसके अलावा, उसे यह भी लगता है कि “परमेश्वर का लोगों को प्राप्त कर शैतान को अपमानित करना शैतान की हार का मजबूत साक्ष्य है। यह एक पत्थर से तीन चिड़ियों को मारना है!” लोग अपना फायदा करवाने के तरीके ढूँढ़ने में माहिर होते हैं। यह बड़ी चतुरतापूर्ण धारणा है, है कि नहीं? लोगों में स्वार्थी मंसूबे होते हैं, और क्या इन मंसूबों में विद्रोहशीलता नहीं झलकती है? क्या इसमें परमेश्वर से माँग नहीं की जाती है? इसके भीतर परमेश्वर के विरुद्ध एक अनकहा प्रतिरोध है, जो कहता है, “तुमने हमें चुना है, हमारी अगुआई की है, हम पर इतनी मेहनत की है, हमें अपना जीवन और अपनी संपूर्णता दी है, अपने वचन और सत्य दिए हैं, और हमसे इतने वर्ष अपना अनुसरण करवाया है। अगर अंत में तुम हमें प्राप्त नहीं कर पाए तो यह कैसी बड़ी क्षति होगी।” ऐसा बहाना परमेश्वर को ब्लैकमेल करने, और उन्हें प्राप्त करने को बाध्य करने का प्रयास है। यह कहना है कि अगर परमेश्वर ने उन्हें प्राप्त नहीं किया तो वे कुछ नहीं खोएँगे, इससे परमेश्वर को ही नुकसान होगा—क्या यह वक्तव्य सही है? इसमें मनुष्य की माँगें, उसकी कल्पनाएँ और धारणाएँ शामिल हैं : परमेश्वर ऐसा महान कार्य करता है, तो उसे कुछ निश्चित लोग अवश्य प्राप्त करने चाहिए। यह “अवश्य” कहाँ से आता है? यह मनुष्य की धारणाओं और कल्पनाओं, उसकी अनुचित माँगों और उसके दिखावटी अहंकार, और साथ ही उसके हठी और क्रूर स्वभाव के मिश्रण से आता है।

मनुष्य की ऐसी धारणाओं के बारे में एक और नजरिये से संगति की जानी चाहिए। कुछ लोग सोचते हैं, “चूँकि सृष्टिकर्ता को परवाह नहीं कि उसे कितने लोग प्राप्त होते हैं और वह सोचता है कि जितने भी मिलें उतने ही प्राप्त कर लेगा, चूँकि यह सृष्टिकर्ता का रवैया है, तो हमें उसके साथ कैसे सहयोग करना चाहिए? क्या यूँ ही विश्वास रखना और उसे इतनी गंभीरता से न लेना ठीक है? किसी भी स्थिति में, परमेश्वर भी इसे गंभीरता से नहीं लेता, इसलिए हमें परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी करने में उतना गंभीर नहीं होना चाहिए, न ही हमें इसे अपना मुख्य काम या जीवन भर का अनुसरण मानना चाहिए। अब चूँकि हम परमेश्वर के विचार जानते हैं, तो क्या हमें अपने जीने का तरीका नहीं बदलना चाहिए?” यह नजरिया सही है या गलत? (यह गलत है।) चूँकि परमेश्वर का रवैया लोगों को स्पष्ट समझा दिया गया है, और वे उसे समझते हैं, तो उन्हें अपनी धारणाओं को जाने देना चाहिए। अपनी धारणाओं को जाने देने के बाद लोगों को क्या करना चाहिए और उन्हें कैसे चुनना चाहिए, उन्हें इस मामले को कैसे समझना और उससे कैसे निपटना चाहिए, ताकि उनका नजरिया और रवैया वही हो जो होना ही चाहिए? सबसे पहले अपने नजरियों के संदर्भ में लोगों को उन पर चिंतन करने की कोशिश करनी चाहिए। एक बार परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद, लोगों के मन में उसके प्रति श्रद्धा और आदर की अस्पष्ट कल्पना होती है। वे सोचते हैं, “परमेश्वर सर्वशक्तिमान और सर्वसमर्थ है, और चूँकि उसने इस भ्रष्ट मानवजाति में से लोगों के एक समूह को चुना है, इसलिए वह निश्चित रूप से उन्हें पूर्ण कर पाएगा। इसलिए हमें निश्चित तौर पर आशीष प्राप्त होंगे।” क्या ऐसी “निश्चितता” के पीछे अपना भाग्य आजमाने की मानसिकता नहीं है? सत्य का अनुसरण किए बिना या परमेश्वर के न्याय और ताड़ना से गुजरे बिना आशीष और परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करने की इच्छा करना वह रवैया है जिसे मनुष्य को सबसे कम अपनाना चाहिए। अपना भाग्य आजमाने की मानसिकता मत अपनाओ—भाग्य बहुत बड़ा शत्रु है। अपना भाग्य आजमाना किस प्रकार की मानसिकता है? तुम्हारी किन दशाओं, सोच, विचारों, रवैयों, धारणाओं और नजरियों के पीछे तुम्हारी भाग्य आजमाने की मानसिकता होती है? क्या तुम इसका पता लगा सकते हो? अगर तुम इसका पता लगा लेते हो, और आशीष पाने के पीछे अपना भाग्य आजमाने की मानसिकता की मौजूदगी को देख लेते हो, तो तुम्हें उसे किस तरह से बदलना चाहिए? तुम्हें इसे कैसे सुलझाना चाहिए? ये व्यावहारिक समस्याएँ हैं। तुम्हें अपना भाग्य आजमाने की मानसिकता की असलियत जाननी चाहिए। तुम्हें इसे जरूर दूर करना चाहिए। अगर तुम इसका समाधान नहीं करते, तो इससे तुम्हें ठोकर लगेगी और तुम कष्ट सहोगे। तो अपना भाग्य आजमाने की मानसिकता में कौन-सी चीजें शामिल होती हैं? कुछ लोग सोचते हैं, “मैं परमेश्वर में विश्वास रखता हूँ और मैंने अपना परिवार और करियर भी त्याग दिया है। कुछ भी हो, भले ही मैंने सराहनीय सेवा न की हो, मैंने कड़ी मेहनत की है, और भले ही मैंने कड़ी मेहनत न की हो, मैंने खुद को थका लिया है, और अगर मैं अंत तक परमेश्वर का अनुसरण करूँ तो संभव है मैं विजेताओं में से एक, बचाए जाने वालों में से एक, आशीष प्राप्त लोगों में से एक, परमेश्वर के राज्य का एक व्यक्ति बन जाऊँ।” यह अपना भाग्य आजमाने की मानसिकता है। क्या सभी लोगों में यह मानसिकता नहीं होती? कम-से-कम परमेश्वर का अनुसरण करने और पूरे समय अपना कर्तव्य निभाने के लिए सब कुछ छोड़ देने वाले ज्यादातर लोगों की मानसिकता ऐसी ही होती है। क्या भाग्य आजमाने की मानसिकता एक तरह की धारणा नहीं है? (बिल्कुल है।) मैं इसे एक प्रकार की धारणा क्यों कहता हूँ? क्योंकि जब तक तुम इस मामले के प्रति सृष्टिकर्ता के इरादे और रवैये को समझ या ग्रहण नहीं कर लेते, तुम केवल व्यक्तिपरक रूप से एक अच्छे परिणाम की अपेक्षा करते हो और व्यक्तिपरक रूप से अनुसरण करते हो, और उसे इस तरह सँभालते हो। यह एक प्रकार की धारणा है। सृष्टिकर्ता के प्रति इस तरह की धारणा क्या एक प्रकार का ब्लैकमेल नहीं है? क्या यह एक अनुचित माँग नहीं है? यह ऐसा कहने जैसा ही है, “चूँकि मैंने तुम्हारा अनुसरण किया है, चूँकि मैं सब कुछ छोड़कर परमेश्वर के घर में पूरे समय अपना कर्तव्य निर्वहन करने के लिए आ गया हूँ, इसलिए मेरी गिनती उन लोगों में होनी चाहिए जो सृष्टिकर्ता की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित हो चुके हैं, है न? तो क्या अब मेरा भविष्य उज्ज्वल हो सकता है? मेरा भविष्य अज्ञात नहीं होना चाहिए—प्रत्यक्ष होना चाहिए।” यह अपना भाग्य आजमाने की मानसिकता है। ऐसी मानसिकता कैसे दूर हो सकती है? इंसान को परमेश्वर का स्वभाव पता होना चाहिए। अब चूँकि मैंने इस तरह संगति की है, इसलिए सभी को मूलतः यह समझ लेना चाहिए : “तो परमेश्वर यह सोचता है। यह परमेश्वर का दृष्टिकोण और रवैया है। तो हमें क्या करना चाहिए?” लोगों को अपना भाग्य आजमाने की मानसिकता छोड़ देनी चाहिए। भाग्य आजमाने की मानसिकता छोड़ने के लिए क्या इतना कहना काफी है, “मैंने इसे छोड़ दिया है और अब ऐसे विचार नहीं रखूँगा। मैं अपने कर्तव्य को गंभीरता से लूँगा, जिम्मेदारी उठाऊँगा और मेहनत करूँगा”? यह इतना आसान नहीं है—जब किसी के अंदर अपना भाग्य आजमाने की मानसिकता बन जाती है, तो उसमें कुछ विचार और व्यवहार उभर आते हैं, उससे भी ज्यादा, कुछ स्वभाव भी प्रकट हो जाते हैं। सत्य खोज कर इन्हें दूर करना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं, “अगर मैंने परमेश्वर के इरादों और रवैयों को समझ लिया है, तो क्या मैं भाग्य आजमाने की मानसिकता से मुक्त नहीं हो चुका हूँ?” यह कैसी बात हुई? आध्यात्मिक समझ न होना; यह खोखली बात है। फिर, यह समस्या कैसे दूर होती है? तुम्हें विचार करना चाहिए, “अगर परमेश्वर मुझसे सब कुछ ले ले, तो मुझे क्या करना चाहिए? मैं परमेश्वर को जो कुछ देता हूँ और स्वयं को खपाता हूँ, वह स्वेच्छा से करता हूँ या ये उससे सौदेबाजी की कोशिशें हैं? अगर मेरी नीयत सौदेबाजी की है, तो यह ठीक नहीं है। मुझे परमेश्वर से प्रार्थना करनी पड़ेगी और इसे दूर करने के लिए सत्य को खोजना पड़ेगा।” इसके अलावा, अभ्यास करते और अपने कर्तव्य निभाते समय, तुम्हें समझ लेना चाहिए कि वे कौन-से सत्य सिद्धांत हैं जिनकी समझ तुम्हें नहीं है, तुम ऐसा क्या करते हो जो परमेश्वर की अपेक्षाओं और उसके इरादों के विरुद्ध है, किस तरह का मार्ग गलत और विपदा का मार्ग है और वह किस तरह का मार्ग है जिसे परमेश्वर स्वीकृति दे सके। भाग्य आजमाने की मानसिकता में और कौन-सी चीजें होती हैं? ऐसे लोग भी हैं, जो गंभीर रोगों से ग्रस्त होने पर परमेश्वर द्वारा बचा लिए गए हैं और अब वे बीमार नहीं हैं। वे सोचते हैं, “तुम लोग आशीषों के पीछे भागने के लिए परमेश्वर में विश्वास रखते हो। मैं अलग हूँ। परमेश्वर का महान प्रेम ही मुझे यहाँ ले आया है; उसने मेरे लिए विशेष परिस्थितियों और अनुभवों की व्यवस्था की, जिससे मैं उस पर विश्वास करने लगा, इसलिए वह मुझे तुम लोगों से अधिक प्रेम करता है, वह मुझसे विशेष अनुग्रह से पेश आता है, और अंत में, मेरे पास तुम लोगों की अपेक्षा जीवित रहने की ज्यादा संभावना होगी।” वे सोचते हैं कि परमेश्वर से उनका संबंध असाधारण और विशेष है—उसके साथ उनका संबंध आम लोगों से अलग है। अपने विशेष अनुभव की वजह से, वे खुद को असाधारण और अनोखा समझते हैं और इसीलिए उन्हें इस बात का यकीन है कि वे सफल होंगे। वे खुद को पूरे विश्वास के साथ दूसरों से अलग बताते हैं, उन्हें अपने जीवित रहने की क्षमता पर पूरा भरोसा है—यह भी अपना भाग्य आजमाने की मानसिकता है। कुछ लोग ऐसे हैं जिन्होंने कोई महत्वपूर्ण कार्य ले रखा है और जिनका रुतबा ऊँचा है। वे दूसरों से थोड़ा-सा ज्यादा कष्ट झेलते हैं, उनकी काट-छाँट दूसरों से थोड़ी-सी ज्यादा की जाती है, वे खुद को दूसरों से थोड़ा-सा अधिक व्यस्त रखते हैं और दूसरों से थोड़ा-सा अधिक बोलते हैं। वे सोचते हैं, “परमेश्वर और उसके घर ने मुझे महत्वपूर्ण ओहदे पर बैठाया है और भाई-बहन मुझे सराहते हैं। यह कितने सम्मान की बात है। क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि मुझे दूसरों से पहले आशीष मिलेगा?” यह भी अपना भाग्य आजमाने की मानसिकता है और यह एक तरह की धारणा है।

मैंने अभी-अभी अपना भाग्य आजमाने की कुछ व्यावहारिक अभिव्यक्तियों और दशाओं के बारे में चर्चा की है। भाग्य आजमाने के अंतर्गत कौन-सी दशाएँ, अभिव्यक्तियाँ या चीजें हैं जो लोगों के मन में अक्सर उठती हैं और आदतन मौजूद रहती हैं? जिन्हें कुछ विशेष अनुभव होते हैं, जिनका रुतबा ऊँचा होता है और जिन्होंने परमेश्वर के लिए पूरे समय खपने हेतु सब कुछ पीछे छोड़ दिया है, उनके अलावा कुछ ऐसे लोग भी हैं जो योग्यता-प्राप्त हैं, जो कुछ विशेष कर्तव्य करते हैं, और जिनमें कुछ विशेष प्रतिभाएँ हैं—इन लोगों की मानसिकता भाग्य आजमाने की होती है। “योग्यता-प्राप्त,” इस शब्द का संदर्भ किससे है? मिसाल के तौर पर, सुसमाचार का प्रचार करने वाले लोग मानते हैं कि अगर वे दस लोगों को जीत लें, तो उन्होंने दस फल पैदा किए हैं, और उनके आशीष प्राप्त करने का मौका 10 प्रतिशत होगा, और अगर वे 50 फल पैदा करेंगे, तो उनका मौका 50 प्रतिशत होगा, और अगर वे 100 फल पैदा करेंगे, तो उनका मौका 100 प्रतिशत होगा। यह एक किस्म की धारणा है, एक किस्म की लेन-देन है और खासकर यह अपना भाग्य आजमाना है। अगर वे इन धारणाओं और अपना भाग्य आजमाने की मानसिकता को पकड़े हुए परमेश्वर का कार्य माप सकें, तो क्या यह परमेश्वर में विश्वास रखना है? वे कौन-से पथ पर चल रहे हैं? क्या उनके अनुसरण के साथ कुछ गलत नहीं है? उनके भीतर ऐसी चीजें क्यों पैदा होती हैं? वे उन्हें क्यों थामे रहते हैं और जाने देने से मना करते हैं? कुछ लोग कहते हैं कि यह इसलिए है कि वे परमेश्वर को नहीं जानते। क्या यह सही है? ये खोखली बातें हैं। तो फिर वास्तव में कारण क्या है? जो लोग हमेशा ऐसे नजरिये और रवैये पकड़े रहते हैं, जिनके मन में ये धारणाएँ होती हैं और जो उनसे चिपके रहने पर अड़े रहते हैं—क्या वे गंभीर रूप से परमेश्वर के वचनों में मेहनत लगा रहे हैं? (नहीं।) परमेश्वर के वचनों के प्रति उनका रवैया हमेशा बेपरवाही का होता है, यानी किसी ऐसे व्यक्ति का रवैया और नजरिया जो धुंधले में से देख रहा हो। वे सोचते हैं कि परमेश्वर में अपने विश्वास में, उन्हें बस इतना जानने की जरूरत है कि उन्होंने परमेश्वर के लिए कितने कष्ट सहे हैं, कितनी कीमत चुकाई है, कितने गुण अर्जित किए हैं, उनमें कौन-सी विशेष प्रतिभाएँ हैं, वे कितने कौशल-युक्त हैं, उनका रुतबा कितना ऊँचा है, उन्होंने परमेश्वर के साथ किस प्रकार के “क्लेश में सहचारिता के पल” अनुभव किए हैं, उन्हें कौन-से विशेष अनुभव हुए हैं, और परमेश्वर ने उन्हें कौन-सी विशेष चीजें दी हैं, या उसने कैसे अनुग्रह और आशीष दिए हैं जो दूसरे लोगों द्वारा प्रदत्त अनुग्रह और आशीषों से अलग हैं—उन्हें लगता है कि यह काफी है। वे इन नजरियों से भले ही जितना भी कस कर चिपके रहें, उन्होंने कभी चिंतन नहीं किया है कि उनके ये नजरिये सही हैं या नहीं, या परमेश्वर के किन वचनों और कार्य के किन सिद्धांतों के विपरीत हैं, या ये नजरिये परमेश्वर द्वारा सत्यापित किए गए हैं या नहीं, या क्या परमेश्वर इस तरह से कार्य करता है या चीजें इस तरह से पूरी करता है। उन्होंने कभी भी इन मसलों की परवाह नहीं की है। अब तक, उन्होंने सिर्फ चिंतन किया है, मंथन किया है और अपने ही मन में सपना देखा है। तो फिर सत्य उनके लिए क्या बन गया है? यह एक सजावट बन गया है। हालाँकि ये लोग परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, मगर उनके विश्वास का परमेश्वर या सत्य से कोई लेना-देना नहीं होता। तो फिर उनके विश्वास का किससे लेना-देना है? इसका सरोकार सिर्फ धारणाओं, कल्पनाओं और उनकी अपनी इच्छाओं और साथ ही उनके भविष्य के आशीषों और मंजिलों से है। उन्होंने सत्य पर कोई मेहनत नहीं की है, इसलिए उन्हें ये परिणाम मिलते हैं।

आज की संगति के जरिये, अब चूँकि तुमने परमेश्वर के कार्य करने के तरीके या परमेश्वर के नजरियों और रवैये की थोड़ी समझ हासिल कर ली है, तो क्या इसका तुम्हारे परमेश्वर को जानने के अनुसरण, सत्य के अनुसरण और जीवन प्रवेश के अनुसरण पर कोई असर होगा और यह कुछ परिणाम ला सकेगा? क्या यह तुम्हारे गलत नजरियों को पलट सकेगा, ताकि तुम अपनी धारणाओं को जाने दे सको? (बिल्कुल।) इसके लिए लोगों से क्या अपेक्षित होता है? (अपनी धारणाओं को जाने देना और परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानकों के अनुसार कार्य करना।) तुम्हें समझना चाहिए कि चूँकि परमेश्वर ने ऐसी अपेक्षाएँ और निर्धारण रखे हैं, इसलिए वह यकीनन उन्हें पूरा करेगा। अंत में, तथ्य यह है कि परमेश्वर के वचन बेकार नहीं होंगे—सबके-सब पूरे और साकार किए जाएँगे। अगर तुम सोचते हो कि जरूरी नहीं कि परमेश्वर अपनी कही हुई बातें कार्यान्वित करे, तो यह मनुष्य की धारणा और कल्पना है, और यह परमेश्वर पर संदेह करना और उसकी आलोचना करना है। कुछ लोग कहते हैं, “परमेश्वर ऐसा कैसे कर सकता है? वह जितने लोगों को बचाता है उतनों को ही बचा कर कैसे संतुष्ट रह सकता है? क्या परमेश्वर का प्रेम महान और अनंत नहीं है? परमेश्वर का धैर्य अनंत है और उसकी सहिष्णुता और दया भी अनंत हैं।” वे सत्य का अनुसरण न करने के लिए तरह-तरह के बहाने बनाते हैं, वे अपने लिए एक आसान रास्ता रख लेते हैं ताकि वे अपने पथ पर चल सकें, और वे परमेश्वर के वचनों और कार्यों, और सृष्टिकर्ता के प्रकटन की अनदेखी करते हैं। वे अपने दिल से यह अच्छी तरह जानते हैं कि यही सत्य है, और फिर भी उम्मीद करते हैं कि ऐसा न हो। उनकी करनी में थोड़ा अविश्वास होता है, साथ ही सृष्टिकर्ता के विरुद्ध थोड़ी स्पर्धा, सृष्टिकर्ता के प्रति प्रतिरोध और ब्लैकमेल करने का प्रयास होता है। ये बातें कहने के पीछे मेरा उद्देश्य क्या है? कुछ लोग कहते हैं, “यह हमें जगाने के लिए है, डराने या यह समझाने के लिए है कि जो लोग पीछे हटना चाहते हैं वे बस पीछे हट सकते हैं, जो लोग कमजोर और निराश हो जाते हैं वे कमजोर और निराश बने रह सकते हैं, और जो अपना जीवन अपनी तरह से जीना चाहते हैं वे वैसे ही जी सकते हैं। परमेश्वर के कार्य में ज्यादा समय नहीं लगेगा और इसके अलावा परमेश्वर को इतने लोगों की जरूरत नहीं है, तो चलो हम अपने अलग रास्ते चलें!” क्या चीजें ऐसी हैं? (नहीं।) परमेश्वर चाहे जो और जैसे भी कहे, परमेश्वर लोगों को जो समझाता है वह उसके इरादे हैं और वह लोगों को जो बूझने देता है वह सत्य है। तो लोगों को किस मार्ग पर चलना चाहिए? उन्हें परमेश्वर के मार्ग पर चलना चाहिए। लोगों को किन बातों पर चिंतन कर उन्हें सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए? सभी धारणाएँ, कल्पनाएँ और माँगें जो परमेश्वर की विरोधी हैं। ये तमाम चीजें सत्य के विपरीत हैं। तुम्हें इन चीजों को छोड़ देना चाहिए, अपने दिलों में से निकाल देना चाहिए और अब उनसे प्रभावित या नियंत्रित नहीं होना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के समक्ष सचमुच आने और परमेश्वर के वचनों का न्याय, ताड़ना, काट-छाँट स्वीकार करने में समर्थ होना चाहिए, तुम्हें अपने भ्रष्ट स्वभावों से शुद्ध होकर परमेश्वर के आयोजन और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण प्राप्त करना चाहिए। इसके अलावा, तुम्हें अपने भीतर की उन चीजों पर निरंतर चिंतन करना चाहिए जो परमेश्वर से असंगत हैं, सत्य के विपरीत हैं, और अपने भ्रष्ट स्वभावों, विभिन्न मामलों पर अपने गलत नजरियों और मनुष्य की विभिन्न धारणाओं और कल्पनाओं पर चिंतन करना चाहिए। जब एक बार तुम इन चीजों पर चिंतन कर उन्हें स्पष्ट रूप से समझ लेते हो, और उन्हें हमेशा के लिए दूर करने की खातिर सत्य को खोज लेते हो, तो तुम परमेश्वर में आस्था के सही मार्ग पर कदम रख चुके होगे, और तभी तुम परमेश्वर की आज्ञा मान पाओगे और उसके आयोजन और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित हो पाओगे।

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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