अपने कर्तव्‍य का मानक स्तर का निर्वहन क्‍या है? (भाग तीन)

आइए, इसके बाद हम इस बारे में संगति करें कि अपना कर्तव्य मानक-स्तरीय ढंग से न निभाने की अभिव्यक्तियाँ क्या हैं। पहले मैं एक व्यक्ति का उदाहरण दूँगा और इसके जरिए तुम सब लोग भेद पहचान सकते हो कि क्या वह अपने कर्तव्य का निर्वहन मानक-स्तरीय ढंग से और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार कर रहा है कि नहीं। एक व्यक्ति कलीसिया में अगुवा बनने के लिए चुना गया और उसकी मेजबानी एक अर्ध-विश्वासी परिवार ने की, जिसके कुछ सदस्य विश्वासी थे और कुछ विश्वासी नहीं थे। हालाँकि, उन सभी में एक अजीब खासियत थी, वह यह कि वे सत्ता में बैठे लोगों की मनोदशा समझने व उनकी चापलूसी करने में विशेष रूप से माहिर थे। उनकी यह खासियत अनजाने में अगुआ के लिए क्या बनेगी? (एक प्रलोभन बनेगी।) इस खासियत ने एक प्रलोभन तैयार किया। यह उसके लिए आशीष था या दुर्भाग्य? यह उसके लिए आशीष था या दुर्भाग्य, यह बाद में देखेंगे; फिलहाल हम आगे बढ़ते हैं। इस परिवार ने अगुआ की मेजबानी करने के बाद उसे हर बार मांसाहार और अच्छा भोजन परोसा। उन्होंने अगुआ का इस तरह स्वागत क्यों किया? क्या इसका कारण प्रेम था? क्या उन्होंने भाई-बहनों का स्वागत भी इसी तरह किया होता? बिल्कुल नहीं। जब अगुआ वहाँ था, तो वे हर दिन उसके लिए मांसाहार पकाते थे। आखिर भोजन से प्रसन्न होकर अगुआ ने कहा, “तुम्हारा पूरा परिवार परमेश्वर से प्यार करता है। तुम्हारी माँ राज्य में प्रवेश कर सकती है, तुम्हारा बेटा राज्य में प्रवेश कर सकता है और तुम और तुम्हारी पत्नी भी राज्य में प्रवेश कर सकते हो। भविष्य में तुम्हारा पूरा परिवार राज्य में प्रवेश कर सकता है।” यह सुनकर परिवार प्रसन्न हो गया, सोचने लगा “हमारा पूरा परिवार राज्य में प्रवेश कर सकता है, यहाँ तक कि परिवार के अविश्वासी लोग भी राज्य में प्रवेश कर सकते हैं। ऐसा लगता है कि जो मांसाहार हम उसे परोस रहे हैं वह बेकार नहीं गया; उसे मांसाहार खिलाते रहना चाहिए।” हकीकत में तो इस परिवार को इस बात की कम ही समझ थी कि राज्य में प्रवेश करना होता क्या है, लेकिन वे जानते थे कि यह एक अच्छी बात है। परमेश्वर में विश्वास करने वालों में कौन नहीं चाहेगा कि वह स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करे और आशीष प्राप्त करे? उन्होंने सोचा, “अगर अगुआ कहता है कि हम राज्य में प्रवेश कर सकते हैं तो हम कर सकते हैं, है ना? अगुआ की बात निर्णायक है; आखिरकार वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है!” बाद में अगुआ ने जितना अधिक कहा कि वे राज्य में प्रवेश कर सकते हैं, उतना ही अधिक शानदार भोजन वे परोसते गए। धीरे-धीरे अब अगुआ अन्य परिवारों से मिलने नहीं जाना चाहता था क्योंकि वे उसे ऐसी अच्छी चीजें नहीं परोसते थे या उसकी इस तरह चापलूसी नहीं करते थे। जल्दी ही, अगुआ का वजन बढ़ता गया; उसका सिर भी मोटा हो गया और “मानव सिर” से “सुअर का सिर” बन गया। सहकर्मियों की एक सभा में वह अलग ही दिखाई दे रहा था। सिर्फ एक महीने बाद देखने पर ही उसका वजन इतना बढ़ गया था कि उन्होंने तुरंत उससे उसके काम के बारे में पूछा। उन्हें गंभीर समस्याओं का पता चला और इस झूठे अगुआ की उन्होंने सख्ती से काट-छाँट की; अंततः उसकी समस्या के सार का गहन-विश्लेषण कर उसे बर्खास्त कर दिया। आगे की जाँच में और भी समस्याएँ सामने आईं : इस झूठे अगुआ ने कोई वास्तविक काम नहीं किया था और रोज अपने रुतबे के फायदे उठा रहा था। वह अपने चापलूसों का पक्ष लेता था, उन्हें आगे बढ़ाता था, जबकि जो लोग उसे उपहार नहीं देते थे उनका दमन करता था। उसने यहाँ तक माँग की कि उसकी पत्नी उसके खाने में और चिकन लाया करे। तो तुम लोग इस झूठे अगुआ के कर्तव्य निर्वहन के बारे में क्या सोचते हो? अपने कर्तव्यों के प्रति उसका रवैया क्या था? वह वास्तव में कार्य नहीं कर रहा था; यह ऐसा है जैसे वह सिर्फ एक अधिकारी बनने के लिए ही कहीं गया हो। नहीं तो उसका वजन इतना कैसे बढ़ जाता? इसके दो कारण हैं : एक तरफ, उसने जानबूझकर उन मेजबान परिवारों को चुना जहाँ रहकर और लगातार भोग-विलास करते हुए वह मांसाहार खा सकता था; दूसरी तरफ, अपना कर्तव्य निभाते समय निश्चित रूप से उसमें जिम्मेदारी की कोई भावना नहीं थी, और उसने कोई कठिनाई नहीं सही। यदि किसी अगुआ या कार्यकर्ता में कलीसिया के व्यापक कार्यभार और तत्काल समाधान की आवश्यकता वाले कई मुद्दों को देखकर जिम्मेदारी का एहसास है, तो क्या वह तनावग्रस्त और चिंतित नहीं होगा? यह चिंता उसे कार्रवाई करने के लिए प्रेरित करेगी; वह तुरंत इन मुद्दों को हल करना शुरू कर देगा, अपनी ऊर्जा खर्च करेगा और कुछ कठिनाइयाँ झेलेगा। शारीरिक रूप से देखें तो उसका वजन कम ही होगा; यह एक प्राकृतिक नियम है। किन परिस्थितियों में कोई व्यक्ति अधिक खाता रहेगा और उसका वजन बढ़ता रहेगा? ऐसा केवल दिनभर भरपेट भोजन करने और किसी अन्य चीज पर ध्यान न देने, जिम्मेदारी से मुक्त रहने, घमंड में चूर रहने, समुदाय और कार्यस्थल से अलग-थलग रहने, शारीरिक सुख-सुविधाओं में लिप्त रहने से ही हो सकता है। केवल तभी किसी का वजन बढ़ता रह सकता है और सिर्फ एक महीने से कुछ अधिक समय में ही वह “मानव सिर” से “सुअर के सिर” में बदल सकता है। तो, यह अगुआ अपना कर्तव्य कितनी अच्छी तरह निभा रहा था? एक अगुआ के रूप में उसकी भूमिका की प्रकृति बदल गई थी; यह अब अपने कर्तव्य निभाने वाली प्रकृति नहीं बल्कि आरामपरस्ती और रुतबे के फायदों में लिप्त रहने वाली प्रकृति थी। वह एक सरकारी अधिकारी की तरह पेश आ रहा था। उसने न केवल असली कार्य से मुँह मोड़ लिया, बल्कि वह गलत कामों में भी लिप्त हो गया। यदि कोई उसकी चापलूसी नहीं करता था या उसे स्वादिष्ट भोजन नहीं खिलाता था, तो ऐसे लोगों को वह दबाता था। यही नहीं, ऐसे लोगों की काट-छाँट करने के लिए उसने भाई-बहनों को अपने साथ शामिल होने के लिए उकसाया, जिससे अंततः जनता का गुस्सा भड़क गया। लोग उससे विमुख होकर दूरी बनाने लगे। उसे बर्खास्त किए जाने के कारणों को अलग रखते हुए चलो हम इस पर चर्चा करते हैं कि क्या वह अपने कर्तव्यों के निर्वहन में मानक स्तर का था। उसका रुतबे के फायदों में लिप्त होना और वास्तविक कार्य न करना सबसे गंभीर मुद्दा है। वह परमेश्वर के चुने हुए लोगों की सेवा नहीं कर रहा था; वह उनके साथ एक अधिकारी की तरह पेश आ रहा था, और किसी भी तरह अपने कर्तव्य नहीं निभा रहा था। एक अगुआ के रूप में अपने कार्य में उसके पास अपना कर्तव्य निभाने को लेकर रत्तीभर भी लगन नहीं थी, उसने इसमें अपना हृदय और ऊर्जा तो और भी नहीं लगाई। उसने अपना हृदय और ऊर्जा केवल खाने-पीने और मौज करने में लगा दी। उसने यह सोचने में अपना दिमाग खूब दौड़ाया कि अपने रुतबे के फायदे कैसे उठाए जाएँ और उसने इस तरह के चापलूसी भरे व्यवहार रोकने के लिए मेजबान परिवार के साथ सत्य के बारे में संगति नहीं की। यही नहीं, उसने यह कहकर उन्हें धोखा दिया कि केवल ऐसी मेजबानी से ही वे राज्य में प्रवेश कर पाएँगे और पुरस्कार अर्जित कर सकेंगे। क्या यह दुष्टता नहीं है? जब उसने मेजबान परिवार के साथ ऐसा व्यवहार किया तो वह कलीसिया के कार्य में क्या करेगा? वह परमेश्वर के चुने हुए लोगों के साथ कैसा व्यवहार करेगा? निश्चय ही यह छल-कपट और अनमनेपन से भरा व्यवहार होगा। क्या यह व्यक्ति सचमुच जानता था कि कर्तव्य क्या होता है? क्या वह जानता था कि परमेश्वर ने उसे जो कार्य सौंपा था वह क्या था? उसने इस आदेश को क्या समझा? उसने इसे पूँजी समझा और इसे अपने रुतबे के फायदे भोगने का आधार बनाया और परिणामस्वरूप उसने कई बुरे कर्म किए, कलीसियाई जीवन को विघ्न पहुँचाया और भाई-बहनों के जीवन प्रवेश को नुकसान पहुँचाया। कर्तव्य का ऐसा निर्वहन न केवल मानक स्तर का नहीं है, बल्कि यह बुरे कर्म करना भी बन गया है। यदि कोई व्यक्ति अपने कर्तव्य निर्वहन में किसी भी तरह से मानक स्तर का नहीं है तो क्या उसे परमेश्वर याद रख सकता है? (नहीं।) स्पष्ट रूप से इसे परमेश्वर याद नहीं रख सकता, जो काफी दयनीय बात है। सत्य को न समझना दयनीय है—सत्य को समझना लेकिन उसका अभ्यास न करना क्या और भी अधिक दयनीय है? (हाँ।) यह प्रथम प्रकरण है, “मानव सिर जो सुअर के सिर में बदल गया” का प्रकरण। यह प्रकरण अपेक्षाकृत सरल है : इसमें रुतबे के फायदों में लिप्त होना, जरा-भी लगन के बिना अपना कर्तव्य निभाना और परमेश्वर का जरा-सा भी भय मानने वाला हृदय न होना शामिल हैं। इस अगुआ ने अपने रुतबे के फायदे उठाने के लिए परमेश्वर प्रदत्त अपने कर्तव्य को पूँजी माना। इसे पहचानना आसान है। प्रथम प्रकरण का नाम याद रखो ताकि भविष्य में तुम लोग तुलना कर सको, दूसरों को पहचान सको और अपना हौसला बढ़ा सको। मैंने जिस प्रकरण की बात की है उसके बारे में तुम लोग क्या सोचते हो? क्या तुम लोग ऐसे लोगों और ऐसे कार्यों का तिरस्कार करते हो? (बिल्कुल।) यदि तुम परमेश्वर का आदेश स्वीकारते हो तो क्या ऐसे कार्य कर सकते हो? यदि तुम उस नकली अगुआ से अधिक विवेक रख सको और तुम कुछ संयमित रह सको और सत्य के लिए प्रयास कर सको तो अभी भी कुछ आशा बची है। लेकिन यदि तुम उसकी तरह खाने-पीने और अपने रुतबे के फायदे में लिप्त हो सकते हो तो फिर तुम्हें प्रकट कर और निकाल दिया जाएगा; तुम पूरी तरह एक नकली अगुआ होगे और एक ऐसे व्यक्ति होगे जिससे परमेश्वर भारी घृणा करता है। अब तुम लोगों के पास कुछ विवेकशीलता है और तुम कुछ सत्यों को समझते हो। तुम्हारे उद्धार की कितनी आशा है यह इससे निर्धारित होता है कि तुम खुद को किस हद तक संयम और नियंत्रण में रख सकते हो; ये दोनों चीजें समानुपातिक हैं। यदि तुम स्वयं को संयम में नहीं रख सकते और अपनी पसंदगियों के अनुसार कार्य करते रहते हो, भ्रष्ट स्वभाव में जीते हो और रुतबे के फायदों में लिप्त रहते हो और जब कोई तुम्हारी चापलूसी करता है तो मगन और मदहोश रहते हो, बिना किसी आत्म-चिंतन या वास्तविक पश्चात्ताप के, तो तुम्हारे उद्धार पाने की आशा शून्य है।

आगे एक और प्रकरण की बात करते हैं। सुसमाचार फैलाने की प्रक्रिया में कलीसिया के कई लोग सुसमाचार का प्रचार करने विभिन्न स्थानों पर जाते हैं। सुसमाचार का प्रचार करने का कार्य हर व्यक्ति के लिए एक कर्तव्य है। इसके साथ तुम चाहे कैसा भी व्यवहार करो या इस कर्तव्य को तुम चाहे अच्छा समझो या मत समझो, आम तौर पर यह लोगों को परमेश्वर का दिया हुआ आदेश है। लोगों को दिए परमेश्वर के आदेशों की बात करें तो इनका संबंध लोगों की जिम्मेदारी से है और इनका संबंध लोगों के कर्तव्य से भी है। चूँकि इनका संबंध लोगों के कर्तव्य से है, इसलिए इसका संबंध इस बात से भी है कि कोई अपना कर्तव्य कैसे निभाता है। सुसमाचार का प्रचार करने की प्रक्रिया में कुछ लोग विशेष रूप से अमीर इलाकों और अमीर घरों की तलाश करते हैं। जब वे किसी को अच्छी-सी कार चलाते या बड़े घर में रहते देखते हैं, तो उन्हें ईर्ष्या और जलन महसूस होती है। यदि उन्हें कोई ऐसा घर मिलता है जो उनकी अच्छी तरह से मेजबानी करता है, तो वे लालायित होकर वहीं टिके रहते हैं। वे सोचते हैं कि उन्होंने सुसमाचार का प्रचार करने में योगदान दिया है, इसलिए उन्हें कुछ अनुग्रह का आनंद भी लेना चाहिए। तो उनका सुसमाचार का प्रचार क्या बन जाता है? वे केवल दैहिक सुखों में लिप्त रहते हैं, शारीरिक आनंद के बदले अपना श्रम देते हैं; यह उनके श्रम की बिक्री बन जाता है। दो-तीन वर्षों में वे वहाँ सुसमाचार का प्रचार करके कुछ लोगों को प्राप्त कर लेते हैं और एक कलीसिया की स्थापना भी कर चुके होते हैं और इस प्रकार कुछ पूँजी जुटा लेते हैं। फिर वे बहकने लगते हैं और जब वे “शान-ओ-शौकत के साथ” अपने गृहनगर लौटते हैं, तब तक वे चमक-दमक वाले और फैशनपरस्त-से बन चुके होते हैं। वे महँगे घरेलू उपकरण और इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद लेकर घर आते हैं और सिर से पाँव तक बने-ठने रहते हैं। स्थानीय लोग अब उन्हें नहीं पहचानते हैं, और सोचते हैं कि उन्होंने कहीं से अकूत धन कमा लिया होगा। क्या यहाँ कोई समस्या नहीं है? वे इतने वर्षों से विश्वासी रहे हैं, हमेशा घर से दूर रहकर अपना कर्तव्य निभाते रहे हैं। शुरुआत में उनके घर में वास्तव में कुछ भी कीमती सामान नहीं था, लेकिन अब वे लोगों के दिए सारे अच्छे कपड़े और अच्छे उपकरण ले आते हैं; अब उनके पास अच्छे कपड़े भी हैं और अच्छे उपकरण भी। वे इसे परमेश्वर का अनुग्रह मानते हैं। लेकिन वास्तव में ये चीजें कहाँ से आईं? कहा जा सकता है कि ये चीजें उन्हें सुसमाचार के प्रचार के प्रयास के बदले मिलीं। कुछ अन्य लोगों ने उनकी कई वर्षों की आस्था और सुसमाचार के प्रचार में उनकी कड़ी मेहनत देखी, इसलिए उन्होंने इन लोगों को कुछ अच्छी चीजें दीं। क्या यह “देना” दान-पुण्य है? क्या यह करुणा है? यदि ये अच्छी चीजें सुसमाचार के प्रचार के कारण प्राप्त हुईं, दूसरों ने चापलूसी में उन्हें दीं तो क्या इस व्यक्ति का इन चीजों को परमेश्वर का उपकार या परमेश्वर का अनुग्रह मानना उचित है? खरे ढंग से कहें तो ये चीजें प्राप्त करने के लिए वे लोग सुसमाचार का प्रचार करने के मौके का फायदा उठा रहे हैं। यदि वे हमेशा दूसरों के सामने अपनी गरीबी का रोना रोते रहें, साथ ही यह भी कहते रहें कि उन्हें अमुक-अमुक चीज पसंद है, और फिर लोग बेमन से उन्हें वह चीज दे दें तो क्या यह जबरन वसूली या ब्लैकमेल करने जैसा नहीं है? सुसमाचार प्रचार करने वाले कुछ लोग दूसरों को यह बताना पसंद करते हैं, “हम सुसमाचार कार्यकर्ता परमेश्वर के दूत हैं, परमेश्वर ने हमें भेजा है। तुम लोग हमसे परमेश्वर का सुसमाचार प्राप्त करते हो—तुम कितना भरपूर आशीष और लाभ प्राप्त कर रहे हो! यह देखते हुए कि तुम कितने अमीर हो और तुमने परमेश्वर के अनुग्रह का कितना आनंद लिया है, क्या तुम्हें कुछ आभार प्रकट नहीं करना चाहिए? क्या तुम्हें अपनी कुछ फालतू या उपयोग में न ली हुई चीजें हमें नहीं दे देनी चाहिए?” इस तरह मनाने के बाद कुछ लोग शर्मिंदगी के कारण हार मान लेते हैं और सुसमाचार कार्यकर्ता सोचते हैं कि वे पूरी तरह से उचित हैं। क्या जो लोग देते हैं वे सचमुच स्वेच्छा से ऐसा करते हैं? भले ही देने वाले इच्छुक हों या नहीं, क्या ये चीजें सुसमाचार कार्यकर्ताओं को मिलनी चाहिए? (नहीं।) कुछ लोग तर्क देते हैं : “मुझे ये चीजें क्यों नहीं लेनी चाहिए? मैंने सुसमाचार प्रचार करने के लिए कड़ी मेहनत की है; क्या ये कुछ चीजें प्राप्त करना केवल परमेश्वर का अनुग्रह नहीं है?” जब तुम सुसमाचार प्रचार करते हो तो तुम क्या कर रहे होते हो? क्या यह तुम्हारा आजीविका कमाने का काम है? सुसमाचार प्रचार करना कोई लेन-देन नहीं है; यह तुम्हारा कर्तव्य है। जब तुम लोगों से चीजें माँगते हो, तो तुम दरअसल परमेश्वर से चीजें माँग रहे होते हो। लेकिन चूँकि तुम परमेश्वर तक नहीं पहुँच सकते हो और तुममें उससे माँगने की हिम्मत नहीं है, इसलिए तुम उसके बजाय लोगों तक पहुँचते हो और कई सारे आध्यात्मिक सिद्धांत सुनाकर उन्हें गुमराह करते हो। तुम्हें लगता है कि तुमने सुसमाचार के प्रचार के माध्यम से कुछ लोगों को प्राप्त करके योग्यता अर्जित की है और अपने इन प्रयासों के लिए तुम कुछ प्रतिफल लेने के हकदार हो। तुम्हें लगता है कि सीधे पैसे माँगना अच्छी बात नहीं होगी, इसलिए तुम इसके बजाय चीजें माँगते हो, यह मानते हुए कि इस तरह तुम्हारे प्रयास व्यर्थ नहीं हुए। क्या यह तुम्हारा कर्तव्य निर्वहन है? (नहीं है।) तुम्हारे कार्यों की प्रकृति बदल गई है। तुमने सुसमाचार के प्रचार को क्या बना दिया है? तुमने परमेश्वर के सुसमाचार का व्यवसायीकरण कर दिया है, तुम इन भौतिक चीजों के बदले इसे बेच रहे हो। यह कैसा व्यवहार है? (यह अवसरवाद है।) यह अवसरवाद है? क्या इसे अवसरवाद कहना इसकी गंभीरता को कम करना है? क्या यह वास्तव में बुराई करना नहीं है, क्या यह बुरा कर्म नहीं है? (है।) इसे बुरा कर्म क्यों माना जाता है? सुसमाचार का प्रचार कर्तव्य निभाना और परमेश्वर की गवाही देना है; जब तुम परमेश्वर की गवाही देते हो तो उसके साथ ही तुम एक व्यक्ति तक सुसमाचार पहुँचाते हो और वह व्यक्ति परमेश्वर का हो जाता है, और इस प्रकार तुम अपना मिशन पूरा कर लेते हो। तुम्हें अपना मिशन पूरा करने के लिए जो कुछ भी मिलना चाहिए वह परमेश्वर तुम्हें देगा; तुम्हें किसी से माँगने की आवश्यकता नहीं है, न ही किसी के पास इस सुसमाचार के बदले दान-पुण्य करने का कोई कारण है। परमेश्वर का सुसमाचार अमूल्य है; न तो इसे किसी भी धनराशि से खरीदा जा सकता है, न ही किसी चीज के बदले इसका सौदा किया जा सकता है। जब तुम सुसमाचार के प्रचार का उपयोग भौतिक लाभ प्राप्त करने के अवसर के रूप में करते हो, तो तुम अपनी गवाही खो देते हो; यह दृष्टिकोण परमेश्वर की निंदा करने जैसा है और परमेश्वर का अपमान करने की निशानी है। यही नहीं, सुसमाचार के प्रचार के बाद लोगों को अपना कृतज्ञ बनाने की प्रकृति को क्या कहेंगे? यह परमेश्वर की महिमा को चुराना है! परमेश्वर का सुसमाचार और परमेश्वर का कार्य व्यापार की वस्तुएँ नहीं हैं। परमेश्वर मनुष्य को अपना सुसमाचार मुक्त रूप से प्रदान करता है; यह मुफ्त में मिलता है और इसमें किसी भी प्रकार का लेन-देन नहीं होता। फिर भी लोग परमेश्वर के सुसमाचार को बेचने की वस्तु में बदल देते हैं और इसके बदले में दूसरों से पैसे और भौतिक चीजें माँगते हैं। इसमें गवाही का अभाव है और इससे परमेश्वर के नाम का अपमान होता है। क्या यह एक बुरा कर्म नहीं है? (है।) यह वास्तव में एक बुरा कर्म है। क्या यह कर्तव्य का मानक स्तर का निर्वहन है? (नहीं।) क्या यह प्रकरण उस प्रकरण से अधिक गंभीर प्रकृति का है जिसके बारे में हमने अभी बात की थी, “मानव सिर जो सुअर के सिर में बदल गया”? (हाँ।) गंभीरता कहाँ है? (परमेश्वर का अपमान करने में।) यह परमेश्वर का अपमान है, परमेश्वर की निंदा है और परमेश्वर की महिमा को चुराना है। परमेश्वर का सुसमाचार लेकर इसे लोगों को बेचना, उन्हें इस तरह बेचना जैसे कि यह कोई व्यापार की वस्तु हो और फिर अत्यधिक मुनाफा कमाना और इससे व्यक्तिगत लाभ पाने का प्रयास करना—किस प्रकार के प्राणी ऐसा करेंगे? ये डाकू और बुरे लोग हैं जो शैतान की तरह व्यवहार कर रहे हैं! परमेश्वर ने स्पष्ट रूप से स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीजों के साथ-साथ मानवजाति की भी रचना की, फिर भी शैतान और दुष्ट आत्माएँ लोगों को यह कहकर गुमराह करते रहते हैं कि उन्होंने ही मनुष्य, स्वर्ग और पृथ्वी को बनाया है, और वे लोगों से परमेश्वर और सृष्टिकर्ता के रूप में अपनी आराधना करवाते हैं। क्या यह परमेश्वर की महिमा की चोरी नहीं है? यह पाप है, यह बुरा कर्म है, यह परमेश्वर का विरोध है। क्या लोगों का सुसमाचार को बेचना बिल्कुल शैतान के व्यवहार के समान है? (हाँ।) सुसमाचार को बेचने का उनका उद्देश्य क्या है? खुद को दूसरे लोगों से सुसमाचार का दूत मनवाना, मानो सुसमाचार उन्हीं से उत्पन्न हुआ हो और उनमें निर्णय लेने की शक्ति हो। क्या यह परमेश्वर की महिमा चुराना नहीं है? (है।) परमेश्वर की महिमा चुराकर किस प्रकार का पाप किया गया है? इसकी प्रकृति क्या है? यह परमेश्वर का विरोध करने का बुरा कर्म है; यह परमेश्वर की निंदा करने वाला व्यवहार है। क्या इस तरह से सुसमाचार का प्रचार करना अभी भी कर्तव्य का निर्वहन माना जाता है? यह पूरी तरह से बुराई करना है; यह परमेश्वर का विरोध करना है। इस तरह से सुसमाचार का प्रचार करना परमेश्वर के लिए गवाही देना बिल्कुल भी नहीं है, इसलिए यह कर्तव्य निर्वहन नहीं है; यह विशुद्ध रूप से बुराई करना है। कुछ लोग कहते हैं : “सुसमाचार का प्रचार करना बहुत कठिन काम है; बदले में कुछ अच्छी चीजें प्राप्त कर लेना उचित ही है। इसमें क्या बड़ी बात है? अविश्वासियों के बीच इसमें कुछ भी गलत नहीं माना जाता है।” क्या यह कथन सही है? यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम्हारे इरादे क्या हैं, तुम किस चीज के लिए लालची हो और इसकी प्रकृति क्या है। यदि तुम इसे व्यक्तिगत लाभ के लिए कर रहे हो, तुम परमेश्वर का सुसमाचार बेच रहे हो, तुम सत्य बेच रहे हो और अंततः तुम इसके बदले अपना व्यक्तिगत लाभ प्राप्त करते हो—तो यह वास्तव में एक बुरा कर्म है। क्या इसे एक बुरा कर्म ठहराना ज्यादती है? (नहीं।) यह जरा भी ज्यादती नहीं है। जब कोई अपना कर्तव्य प्राप्त कर उसे निभा चुका होता है, लेकिन फिर ऐसे दुष्परिणाम सामने आते हैं, तो दोषी कौन है? (स्वयं व्यक्ति ही दोषी है।) ऐसे लोग केवल स्वयं को ही दोषी ठहरा सकते हैं। तो ये दुष्परिणाम कैसे आए? इस बात का सीधा संबंध लोगों की दुष्ट प्रकृति से है। कुछ लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं, लेकिन उनमें शर्म, सत्यनिष्ठा और अंतरात्मा का बोध होता है, इसलिए वे ऐसी चीजें नहीं करेंगे। यदि कोई ऐसे कार्यों में लिप्त होता है तो यह दर्शाता है कि इस व्यक्ति में मानवता नहीं है; वह लालची और क्रूर स्वभाव का है। इससे न केवल लोग अपने कर्तव्यों का निर्वहन मानक-स्तरीय ढंग से नहीं कर पाते, बल्कि वास्तव में यह बुराई करने में बदल जाता है। कुछ लोग कहते हैं : “इसे बुराई करना कैसे निरूपित किया जा सकता है? अपने सुसमाचार के प्रचार के माध्यम से वे काफी लोगों को हासिल करने में सफल रहे हैं। चूँकि उन्हें सुसमाचार के प्रचार में स्पष्ट नतीजे मिले हैं, उनके व्यवहार को बुराई करने के रूप में निरूपित नहीं किया जा सकता, है ना?” क्या यह कथन सही है? (नहीं।) यह गलत क्यों है? सुसमाचार का प्रचार करना उनका कर्तव्य है, उनकी जिम्मेदारी है। उनके कर्तव्य के पीछे इरादा और उद्देश्य क्या है? कौन-से सिद्धांत उनके कर्तव्य का मार्गदर्शन करते हैं? क्या वे अपने कार्यों में जिम्मेदारी बरतते हैं? इन कारकों के आधार पर यह निर्धारित किया जा सकता है कि अमुक व्यक्ति अपना कर्तव्य निभा रहा है या बुराई कर रहा है। भले ही वे अपने कर्तव्य निभा रहे हैं, लेकिन उनके निर्वहन की शुरुआत गलत है; उन्होंने सिद्धांतों के अनुसार कार्य नहीं किया है और कई बुरे कर्म किए हैं। उनके कर्तव्य निर्वहन में सत्य का अभ्यास करने की थोड़ी-सी भी अभिव्यक्ति नहीं है। इस प्रकार के सुसमाचार के प्रचार का सार क्या है? (सुसमाचार बेचना।) इस प्रकरण को क्या कहा जाना चाहिए? “सुसमाचार बेचने” का प्रकरण। यह नाम सुनकर ही तुम जान लेते हो कि मामले की प्रकृति बहुत गंभीर है। कोई व्यक्ति परमेश्वर का सुसमाचार कैसे बेच सकता है? सुसमाचार बेचने के इस मुद्दे की प्रकृति बहुत गंभीर है। इसलिए जब भी सुसमाचार बेचने का उल्लेख हो, तो क्या लोगों को यह नहीं जानना चाहिए कि मामला क्या है, इसकी दशाएँ, व्यवहार और तरीके क्या हैं? यह प्रकरण संख्या दो है, और इस प्रकरण की प्रकृति पिछले प्रकरण से अधिक गंभीर है।

अगला प्रकरण भी सुसमाचार का प्रचार करने की प्रक्रिया के दौरान घटित हुआ। अतीत में परमेश्वर के घर ने सुसमाचार का प्रचार करने के कुछ सिद्धांत और तरीके स्थापित किए थे, जिनमें ऐसी विधियाँ शामिल थीं जो प्रेम दर्शाने और मित्र बनाने से संबंध रखती हैं। इससे कुछ लोगों को खामियों का फायदा उठाने के मौके मिल गए। इन खामियों का फायदा किन लोगों ने उठाया? दुष्ट प्रकृति के लोगों ने जो सत्य से प्रेम नहीं करते। वास्तव में कुछ ऐसे दुष्ट लोग हैं जो सुसमाचार का प्रचार करने की प्रक्रिया में रोमानी साथी ढूँढ़ने और रोमानी व अंतरंग संबंधों में लिप्त होने का मौका तलाशते हैं। जब ऐसी चीजें होती हैं, तो वे सोचते हैं कि इनके कुछ कारण हैं, जबकि वास्तव में ये शैतान के दुष्ट व्यक्ति हैं जो खामियों का फायदा उठा रहे हैं। वे सुसमाचार का प्रचार करने के अवसर को विपरीत लिंग के संपर्क में आने का जरिया बनाते हैं और जब उन्हें कोई उपयुक्त या पसंदीदा व्यक्ति मिल जाता है तो वे उसके साथ बातचीत करने और उसे लुभाने का मौका तलाशने में अपनी पूरी क्षमता लगा देते हैं। ऊपरी तौर पर ऐसा लगता है कि वे सुसमाचार का प्रचार कर लोगों को प्राप्त करने के लिए ऐसा कर रहे हैं, लेकिन वास्तव में वे अपनी हवस मिटाने के लिए ऐसा कर रहे होते हैं। वे ये सब चीजें सुसमाचार का प्रचार करने के नाम पर, परमेश्वर के कार्य को फैलाने के नाम पर, परमेश्वर के लिए गवाही देने और स्वयं को परमेश्वर के प्रति समर्पित करने के नाम पर करते हैं, और अपने कर्तव्य निर्वहन के नाम पर भी करते हैं। ये काम कोई भी बिना इरादे के नहीं करता; वास्तव में सब कुछ जानते हुए भी वे हठपूर्वक भ्रमित होने का नाटक करते हैं। ऐसा करते समय प्रत्येक व्यक्ति दिल से जानता है कि यह पाप है, परमेश्वर इससे घृणा करता है, और परमेश्वर से ऐसा करने की अनुमति नहीं है, लेकिन वे अपनी देह की वासना नियंत्रित नहीं कर सकते और वे अपने किए गए पापों के लिए बहाने बनाने और उनका औचित्य सिद्ध करने की भरपूर कोशिश करते हैं। क्या इससे उनकी अपनी समस्याएँ छुप सकती हैं? यदि तुम एक-दो बार ऐसे पाप करते हो और फिर पश्चात्ताप कर लेते हो तो परमेश्वर तुम्हें अभी भी माफ कर सकता है, लेकिन यदि तुम बदलने से लगातार इनकार करते हो तो तुम खतरे में हो। कुछ लोग ऐसा पाप करने पर हर बार कुछ हद तक यह सोचते हुए असहज महसूस कर सकते हैं, “अगर मैं इस तरह से कार्य करता हूँ तो क्या मुझे बचाया जा सकेगा?” लेकिन फिर वे सोचते हैं, “यह कोई बहुत बड़ी बुराई नहीं है; यह अधिक से अधिक सिर्फ भ्रष्टता का खुलासा होना है। मैं इसे दोबारा नहीं करूँगा; यह मेरे परिणाम और गंतव्य को प्रभावित नहीं करेगा।” क्या अपराध के प्रति यह रवैया वास्तविक पश्चात्ताप है? यदि उनके हृदय में जरा भी पश्चात्ताप नहीं है, तो क्या वे यह अपराध करना जारी नहीं रखेंगे? मुझे लगता है कि इसमें बहुत जोखिम है। क्या ऐसा व्यक्ति अपने कर्तव्य का निर्वाह मानक स्तरीय ढंग से कर सकता है? अपने कर्तव्य निर्वहन में, अभी भी “निजी प्रचालन” के तत्व मौजूद हैं; वे “सार्वजनिक और निजी” का मिश्रण कर रहे हैं, जो एक गंभीर मिलावट है! इससे निश्चित ही परमेश्वर का स्वभाव नाराज होगा। इन लोगों को अपने कर्तव्य निर्वहन में “मानक स्तर का” नहीं माना जा सकता; यह चीजें माँगने या सुसमाचार बेचने से भी अधिक गंभीर मामला है। यह अधिक गंभीर कैसे है? यह बहुत घृणित है; यह देह और वासना का व्यापार है। तो इस समस्या की प्रकृति क्या है? यह सच्चे मार्ग को जानते हुए भी जानबूझकर पाप किए जाने का मामला है। “जानबूझकर” शब्द समस्या की प्रकृति बदल देता है। वास्तव में, वे जानते हैं कि कार्य व्यवस्थाओं में विनियम और सिद्धांत लोगों को बुद्धिमत्ता का अभ्यास कराने और शैतान को उन पर बढ़त हासिल करने से रोकने के लिए बनाए गए हैं। इनका उद्देश्य लोगों को परमेश्वर के सामने लाना है, लेकिन वे खामियों का फायदा उठाते हैं और अपनी दुष्ट वासनाओं को खुलकर प्रकट करने के लिए अवसरों को भुनाते हैं; इसे कहते हैं जानबूझकर पाप करना। बाइबल इस बारे में क्या कहती है? (“क्योंकि सच्‍चाई की पहिचान प्राप्‍त करने के बाद यदि हम जान बूझकर पाप करते रहें, तो पापों के लिये फिर कोई बलिदान बाकी नहीं” (इब्रानियों 10:26)।) यदि अब सलीब की पाप-बलि भी उपलब्ध नहीं है तो क्या इन लोगों का अभी भी उद्धार से कोई लेना-देना है? यह स्थिति पर निर्भर करता है। कुछ लोग जरूरत के कारण ऐसा करते हैं या वे अंदर ही अंदर स्वयं की निंदा करते हैं, लेकिन उस समय की परिस्थितियों के कारण उन्हें इस तरह से कार्य करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। यदि यह अपराध बार-बार नहीं हो, तीन से अधिक बार न हो, तो उन्हें क्षमा किया जा सकता है। उन्हें क्षमा किया जा सकता है इसका क्या मतलब है? इसका मतलब है कि पहले अपराध के बाद यदि वे होश में आ सकते हैं, सत्य खोज सकते हैं, पश्चात्ताप के लक्षण दिखा सकते हैं, और दोबारा अपराध नहीं करते हैं, और वे अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए कहते हैं, तो उन्हें अपने पापों का प्रायश्चित करने का मौका दिया जा सकता है। ऐसे मामलों में अभी भी उद्धार की आशा है, लेकिन कितनी आशा है यह व्यक्ति के अनुसरण पर निर्भर करता है। कोई भी तुम्हारे लिए निश्चित निर्णय नहीं ले सकता, कोई तुम्हें गारंटी नहीं दे सकता; यह मुख्य रूप से तुम्हारे अपने अनुसरण पर निर्भर करता है। मैं तुम लोगों से यह कहते हुए कोई वादा नहीं करूँगा कि जब तक तुम यह पाप दोबारा नहीं करोगे, तुम निश्चित रूप से बचा लिए जाओगे; मैं यह वादा नहीं करूँगा क्योंकि मुझे नहीं पता कि भविष्य में तुम कैसा व्यवहार करोगे। यदि तुम उस संख्या को पार कर जाते हो जिस तक के लिए क्षमा संभव है, तुम बदलने से बार-बार इनकार करते हो, और सुसमाचार का प्रचार करने के दौरान तुमने कोई ऐसे अच्छे कर्म नहीं किए हैं जो तुम्हारे बुरे कर्मों की भरपाई कर सकें, तो तुम पूरी तरह से खत्म हो चुके हो। तुमने बुरे कर्म तो बहुत सारे किए हैं लेकिन अच्छे कर्मों का नामोनिशान भी नहीं है; तुम्हारे लिए सुसमाचार प्रसार का उद्देश्य केवल अनाप-शनाप ढंग से अंतरंग संबंधों में लिप्त होना है, अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाना नहीं—इसका तुम्हारे कर्तव्य निर्वहन से कोई जुड़ाव नहीं है। यह अब पाप-बलि होने या न होने का मुद्दा नहीं रहा। ऐसे लोगों को कैसे निरूपित किया जाना चाहिए? उन्हें गंदे दानवों और बुरी आत्माओं के रूप में निरूपित किया जाना चाहिए। वे सामान्य इंसान नहीं हैं। वे पाप ही नहीं कर रहे हैं; उन्हें अपने कर्तव्य निर्वहन से भी कोई लेना-देना नहीं रहा। क्या अब भी उनके उद्धार की आशा है? नहीं, कोई आशा नहीं है। ऐसे लोग परमेश्वर के घर से बाहर निकाले जा चुके हैं; उन्हें काटकर अलग कर दिया गया है और परमेश्वर उन्हें नहीं बचाएगा। उनके कार्य और व्यवहार न केवल उनके कर्तव्य को छूने में विफल रहते हैं; बल्कि इसे मानक स्तर के कर्तव्य-निर्वहन का मामला भी नहीं माना जा सकता। ऐसे लोगों के लिए अंतिम नतीजा और उनका परिणाम उनके निरूपण के आधार पर निर्धारित किया जाएगा। क्या ये प्रकरण काफी घिनौना नहीं है? इसकी प्रकृति उस दूसरे प्रकरण से भी अधिक गंभीर है जिसकी हमने अभी चर्चा की है। इन लोगों में कुछ ऐसे भी होते हैं जिनके मामले अधिक गंभीर प्रकृति के होते हैं। क्या वे वापस लौट सकते हैं? क्या उनके पास पश्चात्ताप करने वाला हृदय हो सकता है और वे ऐसी चीजें करना बंद कर सकते हैं, और अब भी सुसमाचार का प्रचार कर परमेश्वर के घर में श्रम कर सकते हैं? क्या ऐसे भी लोग हैं? (नहीं।) क्या वे स्वेच्छा से श्रम कर सकते हैं? (नहीं।) वास्तव में, इनमें से कुछ लोगों ने सुसमाचार का प्रचार करने के दौरान कुछ लोगों को प्राप्त किया है। लेकिन अब उन्होंने जो यह सब काम किया है उसका क्या हुआ? यह श्रम माना जाएगा, अपना कर्तव्य निभाना नहीं। दरअसल, इन लोगों के प्रयास में कोई भी कमी नहीं है, लेकिन उन्होंने जो रास्ता अपनाया है, उसने उनकी नियति और परिणाम को निर्धारित किया है। जो भी लोग सुसमाचार का प्रचार करते हैं, क्या उनमें से प्रत्येक को ऐसे प्रलोभनों का सामना करना पड़ेगा? यह कहा जा सकता है कि हर किसी को अलग-अलग स्थितियों में अलग-अलग स्तर तक इस प्रकार के प्रलोभनों का सामना करना पड़ेगा, लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि उनमें से हर व्यक्ति प्रलोभन में फँस जाएगा और पाप करेगा? (नहीं।) हर कोई पाप नहीं कर सकता, हर कोई ऐसी गतिविधियों में लिप्त नहीं हो सकता—यह उन लोगों को दोषी ठहराता है जो इस प्रकार की गतिविधियों में लिप्त होते हैं, और इस प्रकार उनका खुलासा हो जाता है। इससे पता चलता है कि उनके स्वभाव और उनकी मानवता में कुछ गड़बड़ है। ऐसे परिणाम के लिए वे किसे दोषी ठहरा सकते हैं? (स्वयं को।) वे केवल स्वयं को दोषी ठहरा सकते हैं, किसी और को नहीं।

कुछ लोग सुसमाचार का प्रचार करने के दौरान चाहे जो भी अपराध करें, वे उनका समाधान करने के लिए कभी भी सत्य नहीं खोजते हैं, परमेश्वर से प्रार्थना नहीं करते हैं और कभी भी आत्म-चिंतन नहीं करते हैं, जिससे पता चलता है कि वे हठधर्मी और पश्चात्तापहीन हैं। अंत में इन लोगों को निकाल दिया जाता है। मैंने एक ऐसे व्यक्ति के बारे में सुना है, जिसने सुसमाचार का प्रचार करते समय एक महिला को अपने कब्जे में ले लिया और उसे जीवनसाथी नहीं ढूँढ़ने दिया और शादी भी नहीं करने दी; इस मामले की प्रकृति बहुत गंभीर है। यह कैसा व्यक्ति है? (एक बुरा व्यक्ति।) क्या ऐसे बुरे व्यक्ति परमेश्वर के घर में रह सकते हैं? (नहीं।) परमेश्वर के घर में ऐसे अत्याचारियों के लिए कोई जगह नहीं है; वे परमेश्वर का अपमान करते हैं! ऐसी चीजें करके वे परमेश्वर के प्रति असंख्य लोगों की धारणा को प्रभावित कर परमेश्वर को गलत समझे जाने का सबब बनते हैं! लोग कहेंगे, “परमेश्वर में विश्वास करने वाला कोई व्यक्ति ऐसे काम कैसे कर सकता है?” यह पहले से ही परमेश्वर का अपमान है। यदि कलीसिया ऐसे व्यक्तियों को निष्कासित नहीं करती है और उनसे निपटती नहीं है, बल्कि उन्हें सुसमाचार प्रचार करते रहने देती है और उन्हें पश्चात्ताप करने का मौका देती है तो यह पूरी तरह से गलत है। इस व्यक्ति ने पहली बार अपराध नहीं किया है; उसका व्यवहार गंभीर प्रकृति का है और उसे सीधे निष्कासित किया जाना चाहिए। अन्यथा इससे परमेश्वर का अपमान होगा और शैतान को परमेश्वर के घर के बारे में राय बनाने और उसकी निंदा करने का अवसर मिलेगा। इसलिए शैतान को फायदा उठाने का अवसर नहीं दिया जा सकता; जो लोग आदतन लंपट हैं उन्हें कलीसिया से निष्कासित कर दिया जाना चाहिए। ऐसे व्यक्ति लंपट आत्माएँ हैं जो पहले ही परमेश्वर को अपमानित कर चुकी हैं, और परमेश्वर उन्हें बिल्कुल भी नहीं बचाएगा। उनका सुसमाचार प्रचार चाहे कितना ही प्रभावी हो या उन्होंने कितने ही लोगों को प्राप्त किया हो, यदि वे सही रास्ते पर नहीं चलते तो उन्होंने खुद ही स्वयं को नष्ट और बर्बाद कर लिया है। ऐसे लोगों को परमेश्वर के घर में रहने नहीं दिया जाता है; वे काटकर अलग कर दिए जाने के निशाने पर हैं। तो क्या उनके कर्म उनके कर्तव्य निर्वहन के रूप में मायने रखते हैं? नहीं, उनका पूरा त्याग परमेश्वर की नजरों में पूरी तरह मिट चुका है और उसके द्वारा याद नहीं रखा जाएगा। न केवल उनके त्याग के बारे में कुछ भी मानक स्तर का नहीं है बल्कि उनके कर्तव्य निर्वहन की प्रकृति बदल गई है और यह बुराई करना बन गया है। परमेश्वर उन लोगों से कैसे निपटता है जो बुराई करते हैं? वह उन्हें काटकर अलग कर देता है। काटकर अलग कर दिए जाने का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि उन्हें उन लोगों के बीच से हटा दिया जाता है जिन्हें परमेश्वर ने चुना है और बचाने के लिए तैयार किया है—वे उनमें से नहीं हैं। इसके बजाय उन्हें बुरी आत्माओं, गंदे दानवों और बचाए न गए लोगों की श्रेणी में रखा जाता है। उनके उद्धार प्राप्त करने की संभावनाएँ कितनी हैं? (शून्य।) यद्यपि उन्होंने अपना कर्तव्य निर्वहन किया है और उसी प्रकार परमेश्वर का अनुसरण भी किया है, फिर भी ऐसा व्यक्ति अंत में इस बिंदु तक पहुँच जाता है और निकाल दिया जाता है। तो तुम देखते हो, यह एक अलग किस्म का व्यक्ति है। क्या इस प्रकरण की प्रकृति पिछले प्रकरण से ज्यादा गंभीर है? (हाँ।) यह और भी अधिक गंभीर है; यह लक्षित है। इस प्रकरण को तीसरे प्रकरण के साथ मिला दिया जाना चाहिए; यह तीसरे उदाहरण में एक विशेष, विशिष्ट मामले की श्रेणी में आता है, और यह लक्षित है। इस प्रकरण को क्या कहा जाना चाहिए? “दुष्ट लोगों को काटकर अलग कर दिया जाएगा,” आओ, यह तय कर लेते हैं। इन तीन प्रकरणों में तीन प्रकार के लोगों के लिए, वस्तुतः उनका कर्तव्य निर्वहन श्रम करने को अप्रभावी बनाना था। श्रम करने को अप्रभावी बनाने का क्या मतलब है? इसका मतलब यह है कि उन्होंने अपने कर्तव्य को केवल श्रम करने में बदल दिया—और तब भी, उन्होंने अच्छी तरह से श्रम नहीं किया या अपना कर्तव्य ठीक से नहीं निभाया। उन्होंने अपने कर्तव्य को कर्तव्य नहीं माना और यहाँ तक कि विभिन्न दुराचार और बुरे कर्म भी किए और अंततः उन्हें निकाल दिया गया और कोई अच्छा परिणाम नहीं मिला। इन तीनों प्रकरणों की प्रकृति बेहद गंभीर है।

हम यहाँ एक और प्रकरण की बात करेंगे और इसकी प्रकृति भी काफी गंभीर है। एक व्यक्ति था जिसने कई वर्षों तक कार्य किया और ऊपरी तौर पर वह सत्य का अनुसरण करता हुआ और वास्तव में खुद को खपाता हुआ प्रतीत होता था। उसने विवाह और परिवार और साथ ही अपने पेशे और संभावनाओं को त्याग दिया, वह अपना कर्तव्य निभाने के लिए बहुत सारे स्थानों पर गया और उसने कुछ ऐसा काम भी किया जो कुछ खास नहीं था। लेकिन अपने कर्तव्य निर्वहन की प्रक्रिया में वह कुछ ही सत्य समझ पाया क्योंकि वह वास्तव में सत्य का अनुसरण नहीं करता था और कुछ शब्दों और धर्म-सिद्धांतों के बारे में बात कर सकने के आधार पर ही उसने यह सोच लिया कि वह अच्छा काम कर रहा है। इससे भी अधिक गंभीर बात यह थी कि यह व्यक्ति सत्य का अभ्यास बिल्कुल भी नहीं करता था। इसलिए उसका कर्तव्य निर्वहन आमतौर पर दूसरों के साथ दयापूर्वक व्यवहार करते हुए और किसी को नाराज न करते हुए महज कुछ धर्म-सिद्धांतों का प्रचार करना और कुछ विनियमों का पालन करना भर था। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि कलीसिया का काम कैसे करना है और कौन-से मसले अभी भी मौजूद हैं, इन मसलों के समाधान को लेकर वह सचेत नहीं था, प्रयास नहीं करता था और सत्य नहीं खोजता था। संक्षेप में, काम के प्रति उसका रवैया सतही और रूखा था; ऐसा लगता था कि वह सुस्ती नहीं बरतता लेकिन वह खुद को थका भी नहीं रहा था। वह अनमने ढंग से काम करता नहीं दिखता था, लेकिन उसके काम के नतीजे कुछ खास अच्छे नहीं रहे। अपनी लापरवाही और अनमने रवैये के कारण एक विशेष घटना में उसने परमेश्वर के चढ़ावे में एक करोड़ चीनी युआन से अधिक का नुकसान करवा दिया। एक करोड़ चीनी युआन किस प्रकार का आँकड़ा है? आम लोगों के लिए यह आँकड़ा एक बहुत बड़ी रकम है। इस आँकड़े को सुनकर आम आदमी का मुँह खुले का खुला रह जाएगा और शायद ही वह इसके बारे में सोचने की हिम्मत कर पाए क्योंकि अपने जीवनकाल में उसने इतना पैसा कभी नहीं देखा होगा। लेकिन चढ़ावे में एक करोड़ चीनी युआन से अधिक का नुकसान करवाने के बाद भी इस “वृद्ध सज्जन” को कोई पछतावा नहीं था, उसके मन में न तो पश्चात्ताप का कोई संकेत था, न वह दुखी ही था। जब कलीसिया ने उसे निष्कासित कर दिया, तब भी वह शिकायत करता रहा। कैसा प्राणी ऐसा करेगा? आओ, दो बिंदुओं पर चर्चा करते हैं। सबसे पहले, यह धनराशि तब खोई जब तुम काम कर रहे थे और चाहे गलती किसी की भी हो, जिम्मेदार तुम हो। इसकी सुरक्षा करना तुम्हारी जिम्मेदारी थी, लेकिन तुम ऐसा करने में विफल रहे। यह जिम्मेदारी की अवहेलना है, क्योंकि यह मनुष्य का धन नहीं है; यह चढ़ावा है और लोगों को इसके साथ अत्यंत निष्ठापूर्वक व्यवहार करना चाहिए। यदि चढ़ावे में घाटा हो जाए तो क्या सोचना चाहिए? इसका बदला चुकाने के लिए मौत भी काफी नहीं है! मानव जीवन का मूल्य ही कितना है? यदि हानि बहुत बड़ी है, तो अपनी जान गँवाकर भी इसकी भरपाई नहीं की जा सकती! मुख्य बात यह है कि इस मुद्दे की प्रकृति बहुत गंभीर है। इस “वृद्ध सज्जन” ने चढ़ावे के इतने बड़े नुकसान को गंभीरता से नहीं लिया; यह व्यक्ति बहुत घृणित है! चढ़ावे में एक करोड़ चीनी युआन से अधिक की राशि का खोना उसके लिए यही कोई 100 चीनी युआन खोने जैसा था; उसने ऊपरवाले को इसकी बिल्कुल भी सूचना नहीं दी, उसे इसका बिल्कुल भी पछतावा नहीं था और उसने अपने आस-पास के लोगों से यह नहीं कहा, “आओ, पता करें कि यह पैसा कैसे खो गया और अब क्या किया जाना चाहिए। क्या हमें इसे चुकाना चाहिए या कोई और समाधान खोजना चाहिए? या शायद हमें ऊपरवाले को सूचित करना चाहिए, जिम्मेदारी स्वीकार कर इस्तीफा दे देना चाहिए और परमेश्वर से प्रार्थना कर अपने पाप कबूलने चाहिए?” उसका यह रवैया भी नहीं था; क्या यह घिनौनी बात है? (हाँ।) यह बहुत ही घिनौनी बात है! इतना बड़ा बुरा काम करने की उसकी क्षमता अपने कर्तव्य और परमेश्वर के प्रति उसके रवैये को प्रकट करती है। दूसरी बात, निष्कासित होने के बाद भी न तो उसने इसे स्वीकार किया, न अपना पाप कबूल किया, न ही पश्चात्ताप किया, बल्कि उसे शिकायत भी थी। ऐसा व्यक्ति तर्क से परे होता है। जरा सोचो कि उसे किस बारे में शिकायत हो सकती थी। उसे यह शिकायत थी, “मैं 20 वर्षों से अधिक समय से परमेश्वर में विश्वास करता हूँ, मैंने कभी शादी नहीं की, मैंने बहुत कुछ त्याग किया, बहुत कष्ट सहे और अब उन्होंने मुझे निष्कासित कर दिया, मुझे नकार दिया। मैं अपनी जगह खुद ढूँढ़ लूँगा!” कुछ समय बाद ही उसने शादी कर ली। मुझे बताओ, क्या कोई सामान्य व्यक्ति—ऐसा व्यक्ति जिसमें अंतरात्मा और मानवता होती है—जो अपनी अंतरात्मा के बारे में थोड़ा-सा भी सचेत हो, वह इतनी जल्दी शादी कर लेगा? क्या उसका शादी करने का मन होगा? आम तौर पर थोड़ी-सी भी अंतरात्मा और मानवता वाला व्यक्ति इस तरह के गंभीर मसले का सामना करने पर यह सोचकर मृत्यु के बारे में भी विचार करने लगेगा कि “मेरा जीवन समाप्त हो गया है, 20 वर्षों से अधिक समय तक परमेश्वर में विश्वास करने के बाद मैं ऐसा कृत्य कैसे कर सकता हूँ? मैं केवल खुद को ही दोष दे सकता हूँ और मैं निष्कासित किए जाने के योग्य हूँ! एक करोड़ के बारे में भूल जाओ; मैं तो दस लाख चुकाने में भी सक्षम नहीं हूँ। मुझे बेच कर भी मैं इसकी भरपाई नहीं कर सकता, मेरे जीवन का कुछ भी मूल्य नहीं है!” जब तुम्हें पता था कि तुम इसे वहन नहीं कर सकते तो फिर तुमने ऐसा किया ही क्यों? क्या तुम नहीं जानते कि वह पैसा परमेश्वर को अर्पित चढ़ावा था? वह पैसा तुम्हारा नहीं था; तुम्हारी जिम्मेदारी उसे सुरक्षित रखने की थी। ऐसा नहीं है कि तुम्हारा उससे कोई संबंध नहीं था; तुम्हें उसे सुरक्षित रखना था। यह सबसे महत्वपूर्ण बात थी और तुम्हारी लापरवाही जिम्मेदारी की अवहेलना थी। इस पैसे को गँवाकर तुम अपनी जिम्मेदारी से पल्ला तो बिल्कुल नहीं झाड़ सकते। परमेश्वर में विश्वास रखने वाले व्यक्ति के नाते क्या इन चढ़ावों को सुरक्षित रखना और कोई भी अप्रिय घटना रोकना तुम्हारा दायित्व और जिम्मेदारी नहीं है? क्या तुम्हें कुछ गड़बड़ होने का जोखिम कम नहीं करना चाहिए था? यदि तुम ऐसा भी नहीं कर सकते, तो तुम क्या हो? क्या तुम जीते-जागते दानव नहीं हो? (हाँ।) यह पूरी तरह से घिनौनी और मानवता से रहित बात है! यही नहीं, निष्कासित होने के बाद उसने न केवल परमेश्वर में विश्वास करना बंद कर शादी कर ली बल्कि उसने अपने परिवार में विश्वासियों को भी परेशान किया—इसकी प्रकृति और भी गंभीर है। उसने कई वर्षों तक अपना कर्तव्य निभाया, बहुत कुछ त्यागा, कई बलिदान दिए, काफी काम किया, जोखिम उठाया और जेल काटी। लेकिन ये बाहरी कारक किसी की नियति तय नहीं करते। तो नियति किस चीज से तय होती है? व्यक्ति जो रास्ता चुनता है उससे। यदि उसने सत्य के अनुसरण का रास्ता अपनाया होता तो उसका ऐसा हश्र न होता और परमेश्वर के घर को इतना बड़ा नुकसान नहीं हुआ होता। इतनी बड़ी अप्रिय घटना होना बिल्कुल भी आकस्मिक नहीं था; इसका सीधा संबंध उसकी मानवता की गुणवत्ता और उसके चुने रास्ते से था। क्या तुम लोगों को लगता है कि परमेश्वर जानता है कि वह व्यक्ति किस रास्ते पर है? (हाँ।) परमेश्वर जानता है। तो क्या यह घटना उसका खुलासा करने के लिए थी या उसे निकालने के लिए? यह उसका खुलासा करने और निकालने, दोनों के लिए थी। मानवीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो लगता है कि वह लगन, खुद को खपाने, कीमत चुकाने की इच्छा और कठिनाई सहने की क्षमता के साथ अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभा रहा था। तो परमेश्वर उसके साथ ऐसा क्यों करेगा? परमेश्वर उसका खुलासा क्यों करेगा? किस चीज का खुलासा किया जाना था? क्या यह सब केवल उसका परिणाम प्रकट करने के लिए था? नहीं, इसका उद्देश्य उसकी आस्था, उसकी मानवता, उसके सार और उसकी प्रकृति का खुलासा करना था—ये सभी अब उघड़कर सामने आ चुके हैं। क्या परमेश्वर अब भी ऐसे व्यक्ति को बचा सकता है? क्या परमेश्वर को उससे तनिक भी आशा है? ऐसे व्यक्ति के लिए परमेश्वर के दिल में बिल्कुल भी आशा नहीं है। क्या परमेश्वर के हृदय में उसके लिए कोई प्रेम या दया बची है? बिल्कुल भी नहीं। कुछ लोग कह सकते हैं : “यदि परमेश्वर के हृदय में उसके लिए कोई प्रेम या दया नहीं है, तो क्या केवल धार्मिकता, प्रताप और क्रोध ही बचा है?” सही कहा। ऐसे बुरे व्यक्ति को अब प्रेम या दया की आवश्यकता नहीं है और इसकी अब कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह परमेश्वर के स्वभाव को गंभीर रूप से नाराज कर चुका है। परमेश्वर की ओर से उसके लिए जो कुछ बचा है वह धार्मिकता, प्रताप और क्रोध ही है। उसके परिणाम का परमेश्वर के प्रबंधन कार्य से कोई लेना-देना नहीं रहा, इसका मानवजाति को बचाने के परमेश्वर के कार्य से बिल्कुल भी लेना-देना नहीं रहा; उसे निकालकर हटा दिया गया है। इसलिए इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह व्यक्ति अब कहाँ है, परमेश्वर की नजरों में वह एक जिंदा मुर्दा है; वह गंदे दानवों और बुरी आत्माओं, मानवीय चेहरे पहनकर जानवर का दिल रखने वालों और मानव के भेष में जानवरों के बीच रहने वाली एक चलती-फिरती लाश है। ये उसके गुण हैं और वह सृष्टिकर्ता की दृष्टि से हटाया जा चुका है। उसके परिणाम और उसके जीवन में घटी इस प्रमुख घटना के प्रति उसके अंतिम रवैये को ध्यान में रखते हुए क्या इस पूरी अवधि में उसके कर्तव्य निर्वहन का “मानक-स्तरीय होने” के वाक्यांश से कोई लेना-देना है? (नहीं।) तुम कैसे जानते हो कि इस घटना के घटित होने से पहले भी उसका कर्तव्य निर्वहन मानक स्तर का नहीं था? क्या तुम अपने आकलन और तार्किक निष्कर्ष के जरिए ऐसा जानते हो या तुमने उसके सार को देखकर यह मूल्यांकन किया है? (उसके सार को देखकर।) सही कहा। पौलुस का उदाहरण देख लो—अगर उसने सत्य का अनुसरण किया होता, अगर उसने पतरस की तरह पूर्ण होने की कोशिश की होती तो उसने ऐसे ईशनिंदात्मक शब्द नहीं बोले होते। प्रत्येक परिणाम का एक कारण होता है; इस व्यक्ति को जो परिणाम मिला उसके अंतर्निहित कारण हैं। इस व्यक्ति के आज इस बिंदु तक पहुँच पाने से और परमेश्वर के प्रति उसके रवैये से, चढ़ावे के प्रति उसके रवैये से और अपने स्वयं के बुरे कर्मों के प्रति उसके रवैये से लोग स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि वह किस मार्ग पर चल रहा था और परमेश्वर में उसकी आस्था वास्तव में क्या थी। यह पूरी तरह से उसके सार और उस रास्ते का खुलासा करता है जिस पर वह चल रहा था। यदि वह सत्य का अनुसरण करने, परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर होता, और यदि वह वास्तव में अपने कर्तव्य को अपनी जिम्मेदारी और दायित्व मान पाता, तो जब यह अनहोनी हो ही गई तो वह इस स्थिति को कैसे सँभालता? निश्चित रूप से उसका वह रवैया नहीं होता जो अब है—प्रतिरोध और शिकायत का रवैया। उसका दानवीय पक्ष उजागर हो गया है; उसकी आत्मा की गहराई का प्रकृति सार पूरी तरह उजागर हो गया है। वह मनुष्य नहीं है, वह एक दानव है। यदि वह मानव होता, तो 20 वर्षों से अधिक समय तक परमेश्वर में विश्वास करने के बाद उसका ऐसा हश्र नहीं होता। यदि वह मानव होता तो चढ़ावे के इतने बड़े नुकसान पर उसे कितना पछतावा हुआ होता? वह कितना रोया होता? वह किस हद तक काँप गया होता? वह भयानक पाप के लिए स्वयं को अपरिहार्य रूप से जिम्मेदार और दोषी महसूस करता और खुद को माफी के लायक न मानकर यह महसूस करता कि उसे पश्चात्ताप करना चाहिए और परमेश्वर के सामने अपने पाप कबूल करने चाहिए। भले ही कलीसिया ने उसे निष्कासित कर दिया हो, वह कम-से-कम परमेश्वर में विश्वास करना तो बंद न करता, परमेश्वर को धोखा तो न देता, परमेश्वर में अपने परिवार की आस्था में बाधा डालना तो दूर की बात है। इस व्यक्ति के बाद के विभिन्न व्यवहारों से हमें क्या पता चलता है? यही कि वह एक छद्म-विश्वासी है जिसे सत्य से कोई प्रेम नहीं है और यह भी कि उसकी मानवता भी दुर्भावनापूर्ण है। यह चौथा प्रकरण है। हमें इस प्रकरण को क्या नाम देना चाहिए? (“चढ़ावे के मामले में एक करोड़ का नुकसान।”) हमें इसमें उसकी प्रतिक्रिया जोड़कर इसे “पश्चात्ताप के किसी संकेत के बिना चढ़ावे में एक करोड़ का नुकसान” कहना चाहिए। क्या वह नाम बेहतर नहीं है? यह दूसरों के लिए चेतावनी का काम करता है; कम-से-कम यह लोगों को इस बात से अवगत कराता है कि उसके कार्यों की गंभीरता कहाँ होती है।

इन सभी घटनाओं का घटित होना, इन लोगों द्वारा प्रदर्शित विभिन्न व्यवहार, साथ ही इन घटनाओं के घटित होने के बाद परमेश्वर के प्रति उनका रवैया, ये सभी अपने कर्तव्यों को पूरा करने की प्रक्रिया में उत्पन्न और उजागर हुए। इसलिए परमेश्वर में विश्वास करने में व्यक्ति जो मार्ग अपनाता है और उसका अंतिम परिणाम कुछ हद तक उसके कर्तव्य निर्वहन से बहुत संबंधित होते हैं; यह भी कहा जा सकता है कि उनमें सीधा संबंध है। कर्तव्य निर्वहन का विषय एक अनंत विषय होना चाहिए और इस पहलू से संबंधित सत्य भी एक अनंत विषय होना चाहिए। यह सत्य ही है जिसे लोगों को सबसे बुनियादी रूप से समझना चाहिए और यह एक ऐसा विषय है जिस पर लोगों के जीवन के विकास और परमेश्वर में विश्वास की प्रक्रिया में लगातार चर्चा होनी चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह लोगों के स्वभाव में परिवर्तन, उनके जीवन प्रवेश और वे किस प्रकार के मार्ग पर चलते हैं और अंततः उन्हें किस प्रकार का परिणाम मिलता है, इन सबसे अटूट रूप से जुड़ा हुआ है। आज हमने कर्तव्य निभाने के बारे में विस्तार से संगति की और कई प्रकरणों पर भी संगति की। इसका मुख्य उद्देश्य यह समझाना है कि तुम लोग अपने कर्तव्यों को उस तरीके से कैसे निभाओ जैसा परमेश्वर को मंजूर हो, यदि तुम बुरा करते हो तो दुष्परिणाम क्या होंगे और अपने कर्तव्यों को मानक-स्तरीय ढंग से निभाने का महत्व क्या है। इन प्रकरणों में घटनाएँ उत्तरोत्तर अधिक गंभीर और भयावह होती चली गईं, लेकिन ये मेरी मनगढ़ंत घटनाएँ नहीं थीं। वे वास्तव में उन लोगों के बीच घटित हुईं जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं और जो अपना कर्तव्य निभाने वालों की श्रेणी में आते हैं। यह क्या दर्शाता है? कुछ लोग कहते हैं : “अगर हम अपने कर्तव्य नहीं निभाते तो कोई समस्या नहीं आती, लेकिन जब निभाते हैं तो हमेशा समस्याएँ आती हैं। तो क्या अपने कर्तव्य न निभाना ही ठीक है?” यह कैसी सोच है? क्या यह दम घुटने के डर से खाना छोड़ देना नहीं है? क्या यह मूर्खता नहीं है? इन समस्याओं को हल करने के लिए तुम्हें सत्य खोजना सीखना चाहिए; यह एक सक्रिय रवैया है और इसी तरह का रवैया एक सामान्य व्यक्ति का होना चाहिए। यदि तुम्हें डर है कि अपने कर्तव्य निभाते समय समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं जिसके कारण तुम्हारी निंदा की जाएगी, तुम्हें निष्कासित कर दिया जाएगा, निकाल दिया जाएगा या पूरी तरह हटा दिया जाएगा और अंत में उद्धार प्राप्त करने की कोई भी आशा नहीं रहेगी, और इस डर से तुम अपने कर्तव्य निभाना बंद कर देते हो या उनके प्रति नकारात्मक, विरोधी रवैया अपना लेते हो तो यह कैसा रवैया है? (एक खराब रवैया।) कुछ और लोग कहते हैं : “कर्तव्य निभाने के लिए हमारी मानवता बहुत ही कम है, इसलिए क्यों न हम बस संतोषपूर्वक श्रम करें? श्रमिकों से परमेश्वर की कोई ऊँची अपेक्षाएँ नहीं होती हैं और उनके लिए कोई मानक या सिद्धांत भी नहीं हैं—सिर्फ प्रयास करना ही पर्याप्त है। जो भी कहा जाए वह कर दो, आज्ञाकारी बने रहो, कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मत लो और अगुआ या कार्यकर्ता बनने की कोई महत्वाकाँक्षा मत रखो। अंत तक टिके रह पाना ही सबसे बड़ा आशीष होगा।” ये मकसद कैसे हैं? क्या ये अधम और नीच नहीं हैं? क्या ऐसे महत्वाकाँक्षाहीन व्यक्ति परमेश्वर का उद्धार प्राप्त कर सकते हैं? क्या मानवता से रहित व्यक्ति का श्रम मानक स्तर का हो सकता है? मानवता से रहित लोगों का श्रम मानक स्तर का नहीं हो सकता; वे ऐसे वफादार श्रमिक नहीं बनेंगे जिन्हें अंत तक रहने की अनुमति मिलेगी।

संगति में पिछले कुछ समय में उदाहरणों का जिक्र अपेक्षाकृत अधिक किया गया है। इन घटनाओं को याद रखना आसान है लेकिन मैंने जिन सत्यों पर संगति की उन्हें समझना कठिन है। हालाँकि इसका एक फायदा है : इन घटनाओं पर चर्चा करके तुम लोग उन सत्यों को याद कर सकते हो या समझ सकते हो जिन्हें ये घटनाएँ थोड़ा-सा छूती हैं। यदि हम इन प्रकरणों के बारे में बात नहीं करते तो इस प्रकार का नतीजा प्राप्त करने के लिए शायद अधिक प्रयास की आवश्यकता होती। इन प्रकरणों पर चर्चा करना संवेग और चेतावनी दोनों के रूप में कार्य करता है जिससे लोगों को इनके भीतर से सही रास्ता खोजने में मदद मिलती है। ये प्रकरण यह जानने में तुम्हारा मार्गदर्शन करते हैं कि परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करने, बड़ी गलतियाँ करने या गलत रास्ता अपनाने से बचने के लिए तुम्हें किस रास्ते पर चलना चाहिए। मुख्य लक्ष्य मानक-स्तरीय ढंग से अपने कर्तव्य निभाने में लोगों की मदद करना है। इन चार प्रकरणों के बारे में सुनने के बाद तुम लोग कैसा महसूस कर रहे हो? क्या तुम्हारे पास कर्तव्यों के मानक-स्तरीय ढंग से निर्वहन की नई समझ है? क्या लोगों के लिए अपने कर्तव्यों का मानक-स्तरीय ढंग से निर्वहन आसान है? (यह आसान नहीं है।) कठिनाई कहाँ है? क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि लोग सत्य को नहीं समझते हैं और सिद्धांत नहीं खोज पाते हैं, इसलिए गलतियाँ करते रहते हैं? (नहीं।) तो फिर कठिनाई कहाँ है? कठिनाई यह है : लोग सत्य से प्रेम नहीं करते, न इसका अनुसरण ही करते हैं। अपने कर्तव्य निभाने के दौरान लोग अगर सत्य का अनुसरण और अभ्यास नहीं करते हैं तो इसके साथ ही अपने क्रूर, दुष्ट और अहंकारी स्वभावों के कारण आसानी से कुछ ऐसे दुष्परिणाम और परिणाम मिल सकते हैं जिन्हें लोग नहीं चाहते हैं या जिनकी उम्मीद नहीं करते हैं। क्या कोई अपने लिए बुरे परिणाम की आशा करता है? (नहीं।) क्या ऐसे लोग हैं जो यह सोचते हुए केवल एक औसत परिणाम की आशा करते हैं कि जब तक वे बिना मरे अंत तक खानापूरी कर पाते हैं तो यह ठीक है? (हाँ, हैं।) ये किस तरह के लोग हैं? वे ऐसे लोग हैं जो सत्य का अनुसरण नहीं करते; वे केवल मृत्यु तक का समय अंकित कर रहे हैं। ऐसे लोगों का कर्तव्य निर्वहन पूरी तरह से अनमना भरा होना तय है, जिससे उनके लिए गलतियाँ या पाप करना आसान हो जाता है और मानक स्तरीय ढंग से अपना कर्तव्य निभाना बहुत कठिन हो जाता है। किस प्रकार के लोग मानक-स्तरीय ढंग से कर्तव्य निभा सकते हैं? (वे जो सत्य का अनुसरण करते हैं।) और कौन लोग ऐसा कर सकते हैं? (मानवता वाले लोग।) मानवता में क्या शामिल है? (अंतरात्मा और विवेक।) जिनके पास अंतरात्मा और विवेक है, जिनके पास मानवता है, यदि वे सत्य का अनुसरण करते हैं तो वे आसानी से मानक-स्तरीय ढंग से कर्तव्य निभाएँगे। कुछ लोग कहते हैं : “तुम लोग मानक-स्तरीय ढंग से कर्तव्य निभाने में असफल रहने वाले लोगों के इन गंभीर नकारात्मक उदाहरणों के बारे में बात करते रहते हो और इससे हमारा आत्मविश्वास डोल जाता है। हम कब मानक-स्तरीय ढंग से अपना कर्तव्य निभा सकेंगे? क्या इसके कोई सकारात्मक उदाहरण हैं?” तो फिर चलो, कुछ अधिक सकारात्मक बातें करें। वर्तमान में बहुत-से लोग सत्य का अनुसरण करने पर ध्यान देने लगे हैं और वे अपने कर्तव्य निभाते समय अधिक सचेत भी रहने लगे हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोग अपने कर्तव्य निभाते हुए दूसरों के साथ सौहार्दपूर्ण सहयोग कर सकते हैं। सौहार्दपूर्ण सहयोग का क्या अर्थ है? इसकी एक अभिव्यक्ति यह है : इसका केवल यह अर्थ नहीं है कि बिना झगड़े या साजिश के बाहरी तौर पर सबके साथ मिल-जुलकर रहो। सौहार्दपूर्ण सहयोग का मतलब है कि जब काम करते समय विभिन्न समस्याओं से सामना होता है—चाहे तुम्हारे पास उनके बारे में अंतर्दृष्टि हो या न हो और तुम्हारा दृष्टिकोण सही हो या न हो—फिर भी तुम दूसरों के साथ बातचीत और संगति कर सकते हो, सत्य सिद्धांत खोज सकते हो और फिर आम सहमति बना सकते हो। यह सौहार्दपूर्ण सहयोग है। आम सहमति बनाने का उद्देश्य क्या है? अपने कर्तव्यों को और भी अच्छे ढंग से निभाना, कलीसिया का कार्य बेहतर ढंग से करना और परमेश्वर की गवाही देने में सक्षम होना। यदि तुम चाहते हो कि तुम्हारे कर्तव्यों का निर्वहन मानक स्तर का हो तो तुम्हें अपने कर्तव्य निर्वहन के दौरान सबसे पहले सौहार्दपूर्ण सहयोग प्राप्त करना होगा। वर्तमान में ऐसे कुछ लोग हैं जो पहले से ही सौहार्दपूर्ण सहयोग का अभ्यास करने का प्रयास कर रहे हैं। सत्य को समझने के बाद भले ही वे पूरी तरह से सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ हों और भले ही रास्ते में असफलताएँ, कमजोरियाँ व विचलन हों, फिर भी वे सत्य सिद्धांतों की ओर अग्रसर होने का प्रयास करते हैं। इसलिए उनके सौहार्दपूर्ण सहयोग प्राप्त कर लेने की आशा है। उदाहरण के लिए, कभी-कभी तुम्हें लग सकता है कि तुम जो कर रहे हो वह सही है, लेकिन तुम खुद को आत्मतुष्ट नहीं होने देते हो। तुम दूसरों के साथ चर्चा कर सकते हो और उनके साथ सत्य सिद्धांतों पर तब तक संगति कर सकते हो जब तक ये इतने स्पष्ट और प्रत्यक्ष न हो जाएँ कि हर कोई उन्हें समझ जाए और इस बात पर सहमत हो जाए कि ऐसा करने से सर्वोत्तम नतीजा प्राप्त होगा। साथ ही, हर कोई इस बात से सहमत हो जाए कि यह सिद्धांतों से बाहर नहीं है, यह परमेश्वर के घर के हितों को ध्यान में रखता है और यह परमेश्वर के घर के हितों की यथासंभव रक्षा करेगा। इस तरह से अभ्यास करना सत्य सिद्धांतों के अनुरूप है। हालाँकि अंतिम नतीजा हमेशा वैसा नहीं हो सकता जैसा तुमने सोचा था, लेकिन तुम्हारे अभ्यास का मार्ग, दिशा और लक्ष्य सही था। तो परमेश्वर इसे कैसे देखता है? परमेश्वर इस मामले को कैसे परिभाषित करता है? परमेश्वर कहेगा कि तुम्हारा कर्तव्य निर्वहन मानक स्तर का है। क्या मानक स्तर का होने का अर्थ यह है कि तुम्हारा कर्तव्य परमेश्वर के इरादों के अनुसार निभाया गया था? नहीं, यह अर्थ नहीं है। मानक स्तर का होना परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट करने, परमेश्वर की पुष्टि प्राप्त करने और परमेश्वर की अपेक्षाओं का पूर्ण पालन करते हुए अभ्यास करने से अभी भी कोसों दूर है। मानक स्तर का होने का सीधा सा मतलब है कि तुम सही रास्ते पर हो, तुम्हारे इरादे सही हैं और तुम्हारी दिशा सही है लेकिन तुम अभी भी सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने के परमेश्वर द्वारा अपेक्षित उच्च मानक तक नहीं पहुँचे हो। समर्पण के संबंध में एक उदाहरण लेते हैं, मान लो कि परमेश्वर का घर तुम्हारे कर्तव्य निर्वहन के दौरान तुम्हारे लिए कुछ करने की व्यवस्था करता है। तुम्हें अपने कर्तव्य निर्वहन में मानक स्तर का होने के लिए किस प्रकार अभ्यास करना चाहिए? जब तुम पहली बार कार्य के बारे में सुनोगे, तो तुम्हारी कुछ राय हो सकती है। लेकिन कुछ विचार करने के बाद तुम सोचते हो, “परमेश्वर ने कहा है कि हम जिन मामलों को समझते नहीं हैं, उनमें हमें खोजना और समर्पण करना सीखना चाहिए। तो, मुझे खोजना ही होगा। हालाँकि मैं सत्य को नहीं समझता या अभ्यास का तरीका नहीं जानता, लेकिन कार्य मेरे ऊपर आ गया है इसलिए मुझे अनुपालन और समर्पण करना ही होगा। भले ही यह केवल विनियमों का पालन करने की बात हो, पहले मुझे इनका पालन करना चाहिए।” यदि तुम इस तरीके से अभ्यास कर सकते हो तो यह मानक स्तर का है। लेकिन क्या इस “मानक स्तर” और परमेश्वर की मान्यता प्राप्त करने के बीच कोई अंतर है? (है।) यह अंतर इस बात से निर्धारित होता है कि तुम सत्य को किस हद तक समझते हो। भले ही तुम समर्पण कर सकते हो, तुम परमेश्वर के इरादे नहीं समझते हो और तुमने सत्य सिद्धांतों की पूरी तरह से पहचान नहीं की है या उन्हें अभ्यास में नहीं लाए हो; तुमने केवल विनियमों का पालन किया है। तुमने अंतरात्मा और विनियमों के मानकों के अनुसार उन्हीं बुनियादी चीजों का पालन किया है जो किसी व्यक्ति को करनी चाहिए, इसलिए कार्यान्वयन के संदर्भ में कोई समस्या नहीं है और तुम्हारे कार्यों की प्रकृति के संदर्भ में कुछ भी गलत नहीं है। लेकिन यह सत्य का अभ्यास करने के मानक को पूरा नहीं करता है; तुम लोग अभी भी परमेश्वर के इरादे नहीं समझते हो। तुमने केवल निष्क्रिय ढंग से अपने कर्तव्य कायम रखे हैं; तुमने इन्हें सत्य सिद्धांतों के अनुसार अच्छे से नहीं निभाया है। तुम उस स्तर तक नहीं पहुँचे हो जहाँ तुम परमेश्वर की गवाही दे सको या परमेश्वर के इरादे पूरे कर सको। तुमने गवाही देने के मानक पूरे नहीं किए हैं। इसलिए इस तरीके से अपना कर्तव्य निभाना केवल मानक स्तर का है, यह अभी भी परमेश्वर की स्वीकृति के अनुरूप नहीं है।

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