अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (7) खंड एक

मद सात : विभिन्न प्रकार के लोगों को उनकी मानवता और खूबियों के आधार पर समझदारी से कार्य आवंटित कर उनका उपयोग करो, ताकि उनमें से प्रत्येक का सर्वोत्तम उपयोग किया जा सके (भाग दो)

पिछली संगति में, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की सातवीं जिम्मेदारी पर चर्चा की गई थी : “विभिन्न प्रकार के लोगों को उनकी मानवता और खूबियों के आधार पर समझदारी से कार्य आवंटित कर उनका उपयोग करो, ताकि उनमें से प्रत्येक का सर्वोत्तम उपयोग किया जा सके।” हमने इस जिम्मेदारी के तीन पहलुओं पर मुख्य रूप से संगति की थी। ये तीन पहलू क्या हैं? (एक है विभिन्न प्रकार के लोगों का उनकी मानवता के आधार पर समझदारी से उपयोग करना; दूसरा है विभिन्न प्रकार के लोगों का उनकी खूबियों के आधार पर समझदारी से उपयोग करना; और एक और यह है कि कुछ विशेष प्रकार के लोगों के साथ कैसे व्यवहार करना है और उनका कैसे उपयोग करना है।) तीन पहलू मूल रूप से यही हैं। इन तीनों पहलुओं को देखा जाए, तो क्या लोगों का उपयोग करने का परमेश्वर का सिद्धांत ऐसा है कि प्रत्येक व्यक्ति का सर्वोत्तम उपयोग किया जाता है? (हाँ।) क्या यह सिद्धांत सटीक है? क्या यह लोगों के प्रति न्यायसंगत है? (यह न्यायसंगत है।) जहाँ तक कमजोर बुद्धि वाले बेवकूफ लोगों की बात है, वे कुछ भी करने में अक्षम हैं, और थोड़ा-सा भी कर्तव्य नहीं कर सकते हैं। अगर तुम उन्हें कोई कार्य सौंपते हो, चाहे वह पेशेवर, तकनीकी पहलुओं से संबंधित हो या श्रम के संबंध में हो, वे इसे पूरा नहीं कर पाते हैं। ऐसे लोगों का बिल्कुल उपयोग नहीं किया जा सकता है, यहाँ तक कि सेवा करने के लिए भी नहीं। यह बुद्धिमत्ता के संबंध में है। मानवता के संबंध में, जिन लोगों की मानवता खराब है और जो कुकर्मी हैं, वैसे तो वे कुछ कार्य कर सकते हैं और कुछ कर्तव्य कर सकते हैं, लेकिन क्योंकि उनकी मानवता बहुत ज्यादा बुरी है, वे अपना कर्तव्य करने में गड़बड़ियाँ और विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न करेंगे, जिससे फायदे की तुलना में नुकसान ज्यादा होगा, वे कुछ भी अच्छी तरह से करने में असमर्थ होंगे। ऐसे लोग कर्तव्य करने के लिए उपयुक्त नहीं हैं और उनका बिल्कुल भी उपयोग नहीं किया जा सकता है। अगर ऐसे लोग हैं जिनके पास कुछ खूबियाँ हैं, जब तक वे परमेश्वर के घर के कार्य के लिए जरूरी सभी शर्तें पूरी करते हैं—उनकी मानवता के आधार पर जो मानक स्तर की है—उन्हें समझदारी से व्यवस्थित किया जा सकता है और उनका उपयोग किया जा सकता है। पिछली बार, हमने इस बारे में भी संगति की थी कि कुछ विशेष प्रकार के लोगों के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिए और उनका उपयोग कैसे करना चाहिए। पहले प्रकार के लोग वे हैं जो यहूदा जैसे हैं, जो विशेष रूप से बुजदिल होते हैं। उनकी विशेष बुजदिली को देखा जाए, तो एक बार जब वे बड़े लाल अजगर द्वारा कैद कर लिए जाते हैं तो इस बात की 100% संभावना रहती है कि वे एक यहूदा बन जाएँगे; अगर उन्हें कोई महत्वपूर्ण कार्य सौंपा जाता है, तो जैसे ही कुछ होता है, वे सभी चीजों को धोखा दे देते हैं। क्या ये खतरनाक चरित्र नहीं हैं? इस प्रकार के लोग भी हैं जो छद्म-विश्वासियों जैसे होते हैं, जिन्हें हम कलीसिया के मित्र कहते हैं। ऐसा लगता है जैसे ये लोग अपने दिलों में मानते हैं कि आसमान में कोई बूढ़ा आदमी है, लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता है कि परमेश्वर का वास्तव में अस्तित्व है या नहीं, परमेश्वर कहाँ है, या क्या परमेश्वर ने सचमुच अपना नया कार्य किया है या नहीं, वे अक्सर परमेश्वर के अस्तित्व पर संदेह करते हैं। वे सही मायने में परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते और उसका अनुसरण नहीं करते हैं। इसलिए, ऐसे लोगों का उपयोग नहीं किया जा सकता है, वे परमेश्वर के घर में कर्तव्य करने के लिए अनुपयुक्त हैं। यहाँ तक कि जो लोग सही मायने में विश्वास रखते हैं, जरूरी नहीं है कि वे भी अपना कर्तव्य ऐसे कर पाएँ जो मानक के अनुरूप हो, फिर छद्म-विश्वासी, कलीसिया के मित्र की तो बात ही छोड़ दो! दूसरे प्रकार के लोग वे हैं जिन्हें बर्खास्त किया जा चुका है; इस समूह को भी कई परिस्थितियों में विभाजित किया गया है।

अगुआओं और कार्यकर्ताओं की सातवीं जिम्मेदारी के बारे में पिछली संगति की सामग्री में मूल रूप से इन तीन मुख्य बिंदुओं को शामिल किया गया था : एक है विभिन्न प्रकार के लोगों का उनकी मानवता के आधार पर समझदारी से उपयोग करना; दूसरा है विभिन्न प्रकार के लोगों का उनकी खूबियों के आधार पर समझदारी से उपयोग करना; और एक और यह है कि कुछ विशेष प्रकार के लोगों के साथ कैसे व्यवहार करना है और उनका कैसे उपयोग करना है। सातवीं जिम्मेदारी में उल्लेखित कई पहलुओं के आधार पर इन तीन मुख्य बिन्दुओं पर संगति की गई थी, और सभी सिद्धांतों पर स्पष्ट रूप से संगति की गई थी। कुछ लोग कहते हैं : “वैसे तो सिद्धांतों पर स्पष्ट रूप से संगति की गई है, लेकिन जब कुछ विशिष्ट मामलों और विशेष परिस्थितियों की बात आती है, तो हमें अब भी नहीं मालूम है कि इन सिद्धांतों को कैसे लागू किया जाए, लोगों से कैसे पेश आया जाए, या व्यक्तियों को कैसे पदोन्नत किया जाए और उनका कैसे उपयोग किया जाए; हम अब भी ज्यादातर समय दुविधा में ही रहते हैं।” क्या ऐसी कोई समस्या मौजूद है? (हाँ, है।) तो इस समस्या को कैसे सुलझाना चाहिए? लोगों को पदोन्नत करने और उनका उपयोग करने में पहला विचार परमेश्वर के घर के कार्य की जरूरतें हैं। दूसरा विचार यह है कि क्या परमेश्वर के घर के कार्य पर किसी व्यक्ति का उपयोग करने का प्रभाव नुकसानदायक कम और फायदेमंद ज्यादा है या इसके विपरीत है। अगर किसी व्यक्ति की मानवता दोषपूर्ण है, लेकिन उसका उपयोग करना परमेश्वर के घर के कार्य के लिए नुकसानदायक के बनिस्पत फायदेमंद ज्यादा है, तो जब तक कोई बेहतर व्यक्ति नहीं मिल जाता है, तब तक ऐसे व्यक्ति का अस्थायी रूप से उपयोग किया जा सकता है। अगर इस व्यक्ति का उपयोग करने से भला कम और बुरा ज्यादा होता है, फायदा कम और नुकसान ज्यादा होता है, जिससे कलीसिया के कार्य में सिर्फ गड़बड़ी और घपला होता है, तो ऐसे व्यक्ति का उपयोग बिल्कुल नहीं किया जा सकता है। यह गुण-दोष को तोलने का सिद्धांत है, उन परिस्थितियों में जहाँ कोई उपयुक्त उम्मीदवार नहीं है पहले इसे समझा जाना चाहिए, और यह लोगों का अस्थायी रूप से उपयोग करने का सिद्धांत भी है। जब उपयुक्त उम्मीदवार नहीं मिल पाए और यह अस्पष्ट हो कि कौन अपेक्षाकृत बेहतर हो सकता है, जब यह प्रत्यक्ष नहीं हो कि कार्य के लिए कौन पूरी तरह से उपयुक्त है और हर कोई आम लगे, तो क्या करना चाहिए? ऐसे में एकमात्र विकल्प यही है कि ऐसे दो लोगों को ढूँढ़ा जाए जिनके पास अपेक्षाकृत आध्यात्मिक समझ हो, यानी जो सत्य को विशुद्ध रूप में समझते हों, ताकि वे एक दूसरे का सहयोग करते हुए कार्य कर सकें। जब वे अपना कर्तव्य कर रहे होते हैं, उनके साथ सत्य के बारे में ज्यादा संगति करनी चाहिए, और उनकी स्थितियों को देखना और समझना चाहिए; इससे यह तय करना संभव हो जाता है कि किसमें अपेक्षाकृत बेहतर काबिलियत है, जिससे सही उम्मीदवार ढूँढ़ना आसान हो जाता है। कर्तव्य करने के लिए चाहे किसी की भी व्यवस्था क्यों ना की जाए, यह उसकी काबिलियत, खूबियों और चरित्र पर आधारित होना चाहिए; यह बेहद जरूरी है। अगर कोई इन पहलुओं की असलियत नहीं जान सकता और यह नहीं समझता कि व्यक्ति में क्या खूबियाँ है, तो पहले उसे एक साधारण कर्तव्य, या कुछ शारीरिक श्रम वाला कार्य सौंपना चाहिए, या सुसमाचार का प्रचार करने के लिए उसके द्वारा सुसमाचार प्राप्तकर्ताओं की खोज करने की व्यवस्था करनी चाहिए। एक परीक्षण अवधि के बाद, अनुवर्ती कार्रवाई और आगे की जाँच-परख से उसकी स्थिति का सटीकता से आकलन करना संभव हो जाता है और उसके लिए सबसे उपयुक्त कर्तव्य तय करना आसान हो जाता है। अगर उसकी काबिलियत बहुत ही खराब है और उसमें खूबियों की कमी है, तो उसे कोई शारीरिक कार्य सौंपना ही काफी होगा। अगुआओं और कार्यकर्ताओं को महत्वपूर्ण कार्य की देखरेख करने वालों, सुसमाचार निर्देशकों, प्रत्येक समूह के अगुआ, फिल्म निर्माण दलों के निर्देशकों आदि की समझ विभिन्न स्रोतों से प्राप्त करनी चाहिए और निश्चित होने से पहले उन्हें इन लोगों का गहन प्रेक्षण और परीक्षण करना चाहिए। केवल इस तरह से लोगों को काम सौंपकर ही वे यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि व्यवस्थाएँ सही हैं और लोग अपने कार्य में प्रभावी होंगे। कुछ लोग कहते हैं, “यहाँ तक कि गैर-विश्वासी कहते हैं, ‘न तो उन लोगों पर संदेह करो जिन्हें तुम नियोजित करते हो, न ही उन लोगों को नियोजित करो जिन पर तुम संदेह करते हो।’ परमेश्वर का घर इतना शक्की कैसे हो सकता है? वे सभी विश्वासी हैं; वे कितने बुरे हो सकते हैं? क्या वे सभी अच्छे लोग नहीं हैं? परमेश्वर के घर को उन्हें क्यों समझना चाहिए, उन पर नजर क्यों रखनी चाहिए और उनका पर्यवेक्षण क्यों करना चाहिए?” क्या ये बातें मान्य हैं? क्या वे समस्यात्मक हैं? (हाँ।) क्या किसी को समझना और उसका गहराई से प्रेक्षण करना और उसके साथ निकटता से बातचीत करना सिद्धांतों के अनुरूप है? यह सिद्धांतों का पूर्ण अनुपालन करना है। यह किन सिद्धांतों के अनुरूप है? (अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियों की मद संख्या चार : “विभिन्न कार्यों के पर्यवेक्षकों और विभिन्न महत्वपूर्ण कार्यों के लिए जिम्मेदार कर्मियों की परिस्थितियों से अवगत रहो, और आवश्यकतानुसार तुरंत उनके कर्तव्यों में बदलाव करो या उन्हें बर्खास्त करो, ताकि अनुपयुक्त लोगों को काम पर रखने से होने वाला नुकसान रोका या कम किया जा सके, और कार्य की दक्षता और सुचारु प्रगति की गारंटी दी जा सके।”) यह एक अच्छा संदर्भ बिंदु है, लेकिन ऐसा करने का वास्तविक कारण क्या है? ऐसा इसलिए है क्योंकि लोगों का स्वभाव भ्रष्ट है। हालाँकि आज बहुत से लोग कर्तव्य करते हैं, लेकिन कम ही लोग सत्य का अनुसरण करते हैं। बहुत कम लोग अपने कर्तव्य करने के दौरान सत्य का अनुसरण करते हुए सत्य वास्तविकता में प्रवेश करते हैं; अधिकांश लोगों के काम करने के तरीके में कोई सिद्धांत नहीं होते, वे अब भी सच्चाई से परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं करते; वे केवल यह दावा करते हैं कि उन्हें सत्य से प्रेम है, सत्य का अनुसरण करने और सत्य के लिए प्रयास करने के इच्छुक हैं, लेकिन पता नहीं उनका यह संकल्प कितने दिनों तक टिकेगा। जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, उनमें किसी भी समय या स्थान पर भ्रष्ट स्वभाव का प्रकाशन हो सकता है। उनमें अपने कर्तव्य के प्रति किसी जिम्मेदारी की भावना नहीं होती, वे अक्सर अनमने होते हैं, मनमर्जी से कार्य करते हैं, यहाँ तक कि काट-छाँट भी स्वीकार करने में अक्षम होते हैं। जैसे ही वे नकारात्मक और कमजोर होते हैं, वे अपने कर्तव्य त्यागने में प्रवृत्त हो जाते हैं—ऐसा अक्सर होता रहता है, यह सबसे आम बात है; सत्य का अनुसरण न करने वाले लोगों का व्यवहार ऐसा ही होता है। और इसलिए, जब लोगों को सत्य की प्राप्ति नहीं होती, तो वे भरोसेमंद और विश्वास योग्य नहीं होते। उनके भरोसेमंद न होने का क्या मतलब है? इसका मतलब यह है कि जब उन्हें कठिनाइयों या असफलताओं का सामना करना पड़ता है, तो बहुत संभव है कि वे गिर पड़ें, और नकारात्मक और कमजोर हो जाएँ। जो व्यक्ति अक्सर नकारात्मक और कमजोर हो जाता है, क्या वह भरोसेमंद होता है? बिल्कुल नहीं। लेकिन जो लोग सत्य समझते हैं, वे अलग ही होते हैं। जो लोग वास्तव में सत्य की समझ रखते हैं, उनके अंदर परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय, परमेश्वर के प्रति समर्पण वाला हृदय होता है, और जिन लोगों में परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय होता है, केवल वही लोग भरोसेमंद होते हैं; जिनमें परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय नहीं होता, वे लोग भरोसेमंद नहीं होते। जिनमें परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय नहीं होता, उनके प्रति कैसा रवैया अपनाया जाना चाहिए? उन्हें प्रेमपूर्वक सहायता और सहारा देना चाहिए। जब वे कर्तव्य कर रहे हों, तो उनका अधिक अनुवर्तन करना चाहिए, और उन्हें अधिक मदद और निर्देश दिए जाने चाहिए; तभी वे अपना कार्य प्रभावी ढंग से कर पाएँगे। और ऐसा करने का उद्देश्य क्या है? मुख्य उद्देश्य परमेश्वर के घर के काम को बनाए रखना है। दूसरा मकसद है समस्याओं की तुरंत पहचान करना, तुरंत उनका पोषण करना, उन्हें सहारा देना, या उनकी काट-छाँट करना, भटकने पर उन्हें सही मार्ग पर लाना, उनके दोषों और कमियों को दूर करना। यह लोगों के लिए फायदेमंद है; इसमें दुर्भावनापूर्ण कुछ भी नहीं है। लोगों का पर्यवेक्षण करना, प्रेक्षण करना, और उन्हें समझने की कोशिश करना—यह सब उन्हें परमेश्वर में विश्वास के सही रास्ते में प्रवेश करने में मदद करने के लिए है, ताकि वे परमेश्वर के कहे के मुताबिक और सिद्धांत के अनुसार अपना कर्तव्य कर सकें, ताकि उन्हें किसी प्रकार की गड़बड़ियाँ करने और विघ्न उत्पन्न करने से रोका जा सके, ताकि उन्हें व्यर्थ का कार्य करने से रोका जा सके। ऐसा करने का उद्देश्य पूरी तरह से उनके प्रति और परमेश्वर के घर के कार्य के प्रति उत्तरदायित्व दिखाने के लिए है; इसमें कोई दुर्भावना नहीं है। मान लो कि कोई कहता है, “तो यही वे सिद्धांत हैं जिनके अनुसार परमेश्वर का घर लोगों के साथ व्यवहार करता है, यही वे साधन हैं जिनका वह उपयोग करता है। अब से मुझे सावधान रहने की जरूरत है। परमेश्वर के घर में सुरक्षा की कोई भावना नहीं है। कोई ना कोई हमेशा तुम्हारी निगरानी करता रहता है; यहाँ अपना कर्तव्य करना मुश्किल है!” क्या यह कथन सही है? किस किस्म के लोग ऐसी बात कहेंगे? (छद्म-विश्वासी।) छद्म-विश्वासी, बेतुके लोग और वे लोग जिनमें आध्यात्मिक समझ की कमी है—वे सत्य समझे बगैर ही ऊलजलूल बकवास करते रहते हैं। यहाँ क्या मुद्दा है? क्या ये शब्द कलीसिया के कार्य की आलोचना और निंदा नहीं करते हैं? यह सत्य और सकारात्मक चीजों की भी आलोचना और निंदा है। जो लोग ऐसे शब्द बोलने के काबिल हैं वे यकीनन भ्रमित लोग हैं जो सत्य नहीं समझते हैं, वे सभी छद्म-विश्वासी हैं जो सत्य से प्रेम नहीं करते हैं।

परमेश्वर का घर उन लोगों का निरीक्षण, अवलोकन और उन्हें समझने का प्रयास करता है जो कर्तव्य करते हैं। क्या तुम लोग परमेश्वर के घर का यह सिद्धांत स्वीकारने में सक्षम हो? (हाँ।) अगर तुम परमेश्वर के घर द्वारा तुम्हारा पर्यवेक्षण करना, अवलोकन करना और तुम्हें समझने का प्रयास करना स्वीकार सकते हो, तो यह बहुत बढ़िया बात है। यह तुम्हारा कर्तव्य निभाने में, संतोषजनक तरीके से तुम्हारा कर्तव्य कर पाने में और परमेश्वर के इरादे पूरे करने में तुम्हारे लिए मददगार है। यह बिना किसी भी नकारात्मक पक्ष के तुम्हें फायदा पहुँचाता है और तुम्हारी मदद करता है। एक बार जब तुम इस सिद्धांत को समझ गए हो, तो क्या तुममें अब अपने अगुआओं, कार्यकर्ताओं और परमेश्वर के चुने हुए लोगों की निगरानी के खिलाफ प्रतिरोध या सतर्कता की कोई भावना होनी चाहिए? भले ही कभी-कभी कोई तुम्हें समझने का प्रयास करता हो, तुम्हारा अवलोकन करता हो और तुम्हारे कार्य का पर्यवेक्षण करता हो, यह व्यक्तिगत रूप से लेने वाली बात नहीं है। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? क्योंकि जो कार्य अब तुम्हारे हैं, जो कर्तव्य तुम निभाते हो, और कोई भी कार्य जो तुम करते हो, वे किसी एक व्यक्ति के निजी मामले या व्यक्तिगत कार्य नहीं हैं; वे परमेश्वर के घर के कार्य से संबंधित हैं और परमेश्वर के कार्य के एक भाग से संबंध रखते हैं। इसलिए, जब कोई तुम्हारी पर्यवेक्षण या प्रेक्षण करने में थोड़ा समय लगाता है या तुम्हें गहराई से समझने लगता है, तुम्हारे साथ खुले दिल से बातचीत करने और यह पता लगाने की कोशिश करता है कि इस दौरान तुम्हारी स्थिति कैसी रही है, यहाँ तक कि कभी-कभी जब उसका रवैया थोड़ा कठोर होता है, और तुम्हारी थोड़ी काट-छाँट करता है, अनुशासित करता और धिक्कारता है, तो वह यह सब इसलिए करता है क्योंकि उसका परमेश्वर के घर के कार्य के प्रति एक ईमानदार और जिम्मेदारी भरा रवैया होता है। तुम्हें इसके प्रति कोई नकारात्मक विचार या भावनाएँ नहीं रखनी चाहिए। अगर तुम दूसरों की निगरानी, निरीक्षण और समझने की कोशिश को स्वीकार कर सकते हो, तो इसका क्या मतलब है? यह कि अपने दिल में तुम परमेश्वर की जाँच स्वीकार करते हो। अगर तुम लोगों के द्वारा अपनी निगरानी, निरीक्षण और समझने के प्रयासों को स्वीकार नहीं करते—अगर तुम इस सबका विरोध करते हो—तो क्या तुम परमेश्वर की जाँच स्वीकार करने में सक्षम हो? परमेश्वर की जाँच लोगों की समझने की कोशिश से ज्यादा विस्तृत, गहन और सटीक होती है; परमेश्वर की अपेक्षाएँ इससे अधिक विशिष्ट, कठोर और गहन होती हैं। अगर तुम परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा पर्यवेक्षण किया जाना स्वीकार नहीं कर सकते, तो क्या तुम्हारे ये दावे कि तुम परमेश्वर की जाँच स्वीकार कर सकते हो, खोखले शब्द नहीं हैं? परमेश्वर की जाँच और परीक्षा स्वीकार करने में सक्षम होने के लिए तुम्हें पहले परमेश्वर के घर, अगुआओं और कार्यकर्ताओं, या भाई-बहनों द्वारा पर्यवेक्षण स्वीकार करने में सक्षम होना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं, “मेरे पास मानवाधिकार हैं, मेरे पास अपनी आजादी है, मेरा कार्य करने का अपना एक तरीका है। मैं जो कुछ भी करता हूँ, उसकी निगरानी और मुआयना करना, क्या यह जीने का बहुत ही दमघोंटू तरीका नहीं है? मेरे मानवाधिकार कहाँ हैं? मेरी आजादी कहाँ है?” क्या यह कथन सही है? क्या मानवाधिकार और आजादी सत्य हैं? वे सत्य नहीं हैं। मानवाधिकार और आजादी मानव समाज में लोगों के साथ व्यवहार करने के सिर्फ अपेक्षाकृत सभ्य और प्रगतिशील तरीके हैं, लेकिन परमेश्वर के घर में, परमेश्वर का वचन और सत्य सर्वोपरि हैं—उन्हें “मानवाधिकार” और “आजादी” के साथ एक ही तराजू में नहीं तौला जा सकता है। इसलिए, परमेश्वर के घर में, जो भी किया जाता है वह अविश्वासी दुनिया के उच्च सिद्धांतों या ज्ञान पर आधारित नहीं होता, बल्कि परमेश्वर के वचन और सत्य पर आधारित होता है। इसलिए, जब कुछ लोग कहते हैं कि उन्हें मानवाधिकार और आजादी चाहिए, तो क्या यह सिद्धांतों के अनुरूप है? (यह नहीं है।) यह अत्यंत स्पष्ट है कि यह कर्तव्य करने के सिद्धांत के अनुरूप नहीं है। तुम परमेश्वर के घर में हो, सृजित प्राणी का कर्तव्य कर रहे हो, समाज में पैसा कमाने के लिए कार्य नहीं कर रहे हो। इसलिए, तुम्हारे मानवाधिकारों की रक्षा करने के लिए किसी को तुम्हारे समर्थन में खड़े होने की जरूरत नहीं है; ऐसी चीजें अनावश्यक हैं। क्या ज्यादातर लोग मानवाधिकारों और आजादी के संबंध में भेद पहचान सकते हैं? ये मानवीय विचारों और परिप्रेक्ष्यों से संबंधित हैं और इनको सत्य के साथ एक ही तराजू में नहीं तौला जा सकता है; परमेश्वर के घर में ऐसे विचार मान्य नहीं हैं। यह तो अच्छी बात है कि कोई अगुआ तुम्हारे कार्य की निगरानी करता है। क्यों? क्योंकि इसका यह अर्थ है कि वह कलीसिया के कार्य की जिम्मेदारी ले रहा है; यह उसका कर्तव्य है, उसकी जिम्मेदारी है। यह जिम्मेदारी पूरी करने में समर्थ होना यह साबित करता है कि वह एक योग्य अगुआ है, एक अच्छा अगुआ है। अगर तुम्हें पूरी आजादी और मानवाधिकार दे दिए जाते, और तुम जो चाहते कर पाते, अपनी इच्छाओं का अनुसरण कर पाते, और पूरी आजादी और लोकतंत्र का आनंद ले पाते, और चाहे तुम कुछ भी करते या कैसे भी करते, अगुआ इसकी परवाह या निगरानी नहीं करता, तुमसे कभी भी प्रश्न नहीं करता, तुम्हारे कार्य की जाँच नहीं करता, समस्याएँ पाए जाने पर कुछ नहीं बोलता और सिर्फ तुम्हें या तो मनाता या फिर तुमसे बातचीत करता, तो क्या वह अच्छा अगुआ होता? बिल्कुल नहीं। ऐसा अगुआ तुम्हें नुकसान पहुँचा रहा है। वह तुम्हें कुकर्म करने की खुली छूट देता है और तुम्हें सिद्धांतों के खिलाफ जाने और जो चाहो वह करने की अनुमति देता है—वह तुम्हें आग के कुएँ की तरफ धकेल रहा है। यह ऐसा अगुआ नहीं है जो जिम्मेदार और मानक स्तर का हो। दूसरी तरफ, अगर कोई अगुआ नियमित रूप से तुम्हारी निगरानी कर सकता है, तुम्हारे कार्य में समस्याओं को पहचान सकता है और तुम्हें फौरन चेता सकता है या फटकार सकता है और उजागर कर सकता है, और समय पर तुम्हारे गलत अनुसरणों और कर्तव्य से विचलनों को ठीक करके तुम्हारी मदद कर सकता है, और उसकी निगरानी, फटकार, प्रावधान और मदद के तहत, तुम्हारा अपने कर्तव्य के प्रति गलत रवैया बदल जाता है, तुम कुछ बेतुके विचारों को छोड़ने में समर्थ हो जाते हो, आवेग से उत्पन्न होने वाले तुम्हारे अपने विचार और चीजें धीरे-धीरे कम हो जाती हैं, और तुम सही और सत्य सिद्धांतों के अनुरूप कथनों और दृष्टिकोणों को शांति से स्वीकार करने में समर्थ हो जाते हो, तो क्या यह तुम्हारे लिए फायदेमंद नहीं है? इसके फायदे सचमुच बेशुमार हैं!

परमेश्वर का घर निगरानी, जाँच-परख और समझ को लागू कर अपने अगुआओं और कार्यकर्ताओं के साथ व्यवहार करता है। लोगों के साथ इस तरह से व्यवहार करने का आधार क्या है? लोगों के साथ इस तरह से व्यवहार क्यों करें? क्या यह अपने कर्तव्य के प्रति वफादार, गंभीर और जिम्मेदार होने के सिद्धांतों से उत्पन्न तरीका और रवैया नहीं है? (हाँ, है।) अगर कोई अगुआ कभी भी उसके उत्तरदायित्व के क्षेत्र में अपने कर्तव्यों का पालन करने वाले लोगों की निगरानी या जाँच-परख नहीं करता है या गहराई से उन्हें नहीं समझता है, तो क्या उसे अपने कर्तव्य के प्रति वफादार अगुआ माना जा सकता है? स्पष्ट रूप से, उसे ऐसा नहीं माना जा सकता है। क्या तुम लोगों के अगुआओं, कार्यकर्ताओं और पर्यवेक्षकों ने कभी तुम्हारे कार्य की जाँच की है? क्या उन्होंने तुम्हारे कार्य की प्रगति के बारे में पूछताछ की है? क्या उन्होंने तुम्हारे कार्य में उत्पन्न हुई समस्याओं को सुलझाया है? क्या उन्होंने तुम्हारे कार्य में किसी स्पष्ट दोष या विचलन को ठीक किया है? क्या उन्होंने तुम्हारी मानवता और जीवन प्रवेश के तुम्हारे लक्ष्य की विभिन्न अभिव्यक्तियों और खुलासों के संबंध में मदद, प्रावधान, समर्थन या काट-छाँट करने की पेशकश की है? अगर कोई अगुआ ना सिर्फ सामान्य कर्तव्य करने वाले लोगों को कभी मार्गदर्शन प्रदान नहीं करता है, बल्कि महत्वपूर्ण कार्य में व्यस्त लोगों को भी कभी संगति, मदद या समर्थन प्रदान नहीं करता है—निगरानी, जाँच-परख या गहरी समझ का तो जिक्र ही क्या करना—तो इन अभिव्यक्तियों और क्रियाकलापों के बिना, क्या इस अगुआ को ठोस कार्य करने वाला अगुआ माना जा सकता है? क्या वह एक अगुआ के रूप में मानक पर खरा उतरता है? (नहीं।) कुछ लोग कहते हैं, “हमारा अगुआ सिर्फ हफ्ते में दो बार हमारे लिए सभाएँ आयोजित करता है, थोड़ी देर के लिए परमेश्वर के वचनों पर संगति करता है, और फिर ऊपरवाले से कुछ संगति पढ़ता है, और कभी-कभी वह अपनी व्यक्तिगत अनुभवजन्य समझ के बारे में संगति करता है। लेकिन उसने हमारी विभिन्न स्थितियों के बारे में, और साथ ही हमारे कर्तव्यों को करने में या जीवन प्रवेश में हमें होने वाली मुश्किलों के बारे में कभी कोई सलाह, प्रावधान या मदद की पेशकश नहीं की।” इस अगुआ के बारे में तुम्हारी क्या राय है? (वह मानक पर खरा नहीं उतरता है, वह एक नकली अगुआ है।) अगर कोई अगुआ अपने कार्य या अपने अधीन लोगों की विभिन्न स्थितियों की परवाह नहीं करता है, न ही वह अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करता है, तो वह अगुआ के रूप में मानक पर खरा नहीं उतरता है। वह किसी की निगरानी या जाँच-परख नहीं करता है, या किसी को समझने का प्रयास नहीं करता है। हर बार, तुम्हारी उसके साथ ऐसी बातचीत होती है : “यह व्यक्ति अभी कैसा कार्य कर रहा है?” “मैं फिलहाल उसकी जाँच-परख कर रहा हूँ।” “तुम कब से उसकी जाँच-परख कर रहे हो? क्या तुम उसे जानते हो?” “मैं एक-दो वर्षों से उसकी जाँच-परख कर रहा हूँ। मैं अब भी उसे अच्छी तरह से नहीं जानता हूँ।” “अच्छा, उस व्यक्ति के बारे में क्या कहना है?” “मैं अब भी उसके बारे में ज्यादा स्पष्ट नहीं हूँ, लेकिन वह अपना कर्तव्य करने में कष्ट सहन कर सकता है, उसमें संकल्प है, और वह परमेश्वर के लिए खुद को खपाने का इच्छुक है।” “यह सब सतही बातें हैं। सत्य की उसकी खोज के बारे में तुम्हारा क्या कहना है?” “मुझे उस बारे में भी जानना पड़ेगा? ठीक है, मैं इसकी छानबीन करूँगा।” उसके यह कहने के बाद कि वह इसकी छानबीन करेगा, तुम्हें नतीजों के लिए कितने समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी, यह किसी को नहीं मालूम, यह अनिश्चित है। ऐसा नकली अगुआ अपने कार्य में भरोसेमंद नहीं है।

क्या तुम्हारी कलीसिया के अगुआ और तुम्हारे पर्यवेक्षक तुम्हारे कार्य के प्रति जिम्मेदार रवैया रखते हैं? क्या वे कार्य के संबंध में तुम लोगों की स्थितियों को सही मायने में समझते हैं? क्या कार्य के इस पहलू पर उचित रूप से ध्यान दिया गया है? (नहीं।) उनमें से किसी ने भी इस पहलू पर उचित रूप से ध्यान नहीं दिया है; कोई भी अपने कर्तव्य के प्रति वफादार होने और कार्य के लिए गंभीर और जिम्मेदार होने की हद तक नहीं पहुँचा है। तो, क्या इसे हासिल करना आसान है? क्या यह मुश्किल है? यह मुश्किल नहीं है। यदि तुम वास्तव में एक निश्चित स्तर की काबिलियत रखते हो, तुम अपनी जिम्मेदारी के दायरे में पेशेवर कौशल की समझ रखते हो और अपने पेशे से अनजान नहीं हो, तो तुम्हें बस एक वाक्यांश का पालन करना है, और तुम अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान बन सकोगे। कौन-सा वाक्यांश? “पूरे दिल से कार्य करो।” यदि तुम पूरे दिल से काम करोगे और अपना दिल लोगों में लगाओगे, तो तुम अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान और जिम्मेदार बन पाओगे। लेकिन क्या इस वाक्यांश का अभ्यास करना आसान है? तुम इसे व्यवहार में कैसे लाओगे? इसका मतलब कानों से सुनना या दिमाग से सोचना नहीं है—इसका मतलब है अपने हृदय का इस्तेमाल करना। यदि कोई व्यक्ति वास्तव में अपने हृदय का उपयोग कर सकता है, तो जब उसकी आँखें देखती हैं कि कोई कुछ कर रहा है, किसी तरह से कार्य कर रहा है, या किसी चीज के प्रति उसकी किसी प्रकार की प्रतिक्रिया है या जब उसके कान कुछ लोगों की राय या तर्क सुनते हैं, इन बातों पर विचार और मनन करने के लिए अपने हृदय का उपयोग करके, उनके दिमाग में कुछ ख्याल, विचार और दृष्टिकोण पैदा होता है। ये ख्याल, विचार और दृष्टिकोण उस व्यक्ति या वस्तु की गहरी, विशिष्ट और सही समझ देंगे और साथ ही, उपयुक्त और सही निर्णय और सिद्धांतों को जन्म देंगे। जब किसी व्यक्ति में अपने दिल का इस्तेमाल करने की ऐसी अभिव्यक्तियाँ होती हैं, तभी इसका अर्थ होता है कि वह अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान है। लेकिन अगर तुम चीजों में दिल नहीं लगाते हो, अगर तुम्हारे पास इसके लिए दिल नहीं है, तो तुम जो कुछ भी देखते हो, उसके प्रति तुम्हारी आँखें प्रतिक्रिया नहीं करती हैं, और तुम जो कुछ भी सुनते हो, उसके प्रति तुम्हारे कान प्रतिक्रिया नहीं करते हैं। तुम्हारी आँखें कभी भी लोगों, घटनाओं और चीजों की जाँच-परख नहीं करती हैं; वे तुम्हें मिलने वाली जानकारी की जाँच-परख नहीं करती हैं। तुम अपने दिल में उन विभिन्न आवाजों और दलीलों को पहचान नहीं पाओगे जिन्हें तुम सुनते हो, तुम उस जानकारी को पहचानने में असमर्थ रहोगे जो तुम्हें सुनाई पड़ती है। यह आँखें खुली होने के बावजूद अंधे होने जैसा है। जब किसी व्यक्ति का दिल अंधा होता है, तो उसकी आँखें भी अंधी होती हैं। तो, आँखों से चीजों की जाँच-परख करने और कानों से जानकारी प्राप्त करने से जो विचार, दृष्टिकोण और रवैये बनते हैं, उनके पीछे क्या कारण है? यह सब चीजों में अपना दिल लगाकर सत्य की तलाश करने पर निर्भर करता है। अगर तुम चीजों में दिल लगा देते हो, तो जब भी तुम्हें कोई जानकारी मिलती है, चाहे वह देखने से मिली हो या सुनने से, तुम किसी व्यक्ति या चीज के बारे में अपनी राय बना पाओगे और उसकी गहरी समझ हासिल कर पाओगे। लेकिन अगर तुम चीजों में दिल नहीं लगाते हो, तो मिली हुई कोई भी जानकारी फायदेमंद नहीं होगी; अगर तुम इसका भेद पहचानने या इसकी असलियत जानने में दिल नहीं लगाते हो, तो तुम्हें कुछ भी हासिल नहीं होगा, तुम निकम्मे और बेकार बन जाओगे। कोई व्यक्ति बेकार है, इसका क्या मतलब है? इसका मतलब है वह व्यक्ति पूरे दिल से अपना कर्तव्य नहीं करता है—उसके पास आँखें और कान तो होते हैं, लेकिन इनका कोई फायदा नहीं होता है। बिना दिल वाला व्यक्ति अपने कर्तव्य के प्रति वफादार नहीं होगा और ना ही वह अपने कार्य के प्रति गंभीर और जिम्मेदार रवैया रखेगा।

परमेश्वर का घर सभी स्तरों पर अगुआओं और कार्यकर्ताओं पर निगरानी रखता है, उनकी गहराई से जाँच-परख करता है और उन्हें समझता है, जिसका उद्देश्य कलीसिया के कार्य में सुधार करना और परमेश्वर के चुने हुए लोगों को जल्द से जल्द परमेश्वर में विश्वास रखने के सही रास्ते पर लाना है। इसलिए, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की निगरानी और जाँच-परख अत्यंत जरूरी है और इसी तरीके से इसका अभ्यास करना चाहिए। परमेश्वर के चुने हुए लोगों की निगरानी से, अगर यह पता चलता है कि अगुआ और कार्यकर्ता वास्तविक कार्य में शामिल नहीं हो रहे हैं और उनसे फौरन निपटा जाता है और इस पर ध्यान दिलाया जाता है, तो यह कलीसिया के कार्य की प्रगति के लिए फायदेमंद है। अगुआओं और कार्यकर्ताओं की निगरानी करना परमेश्वर के चुने हुए लोगों की जिम्मेदारी है, और ऐसा करना पूरी तरह से परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है। चूँकि अगुआ और कार्यकर्ता भ्रष्ट स्वभाव के होते हैं, इसलिए अगर उनकी निगरानी नहीं की जाए, तो यह ना सिर्फ उनके लिए नुकसानदायक होगा, बल्कि कलीसिया के कार्य को भी सीधे प्रभावित करेगा। किन परिस्थितियों में अगुआओं और कार्यकर्ताओं को परमेश्वर के चुने हुए लोगों की निगरानी की और जरूरत नहीं होती है? यह तब होता है जब अगुआ और कार्यकर्ता सत्य पूरी तरह से समझ लेते हैं, सत्य वास्तविकता में प्रवेश करते हैं, और सिद्धांतों के साथ कार्य करते हैं, जिससे वे परमेश्वर द्वारा पूर्ण और उपयोग किए गए लोग बन जाते हैं। ऐसे मामलों में, परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा निगरानी अनावश्यक हो जाती है, और परमेश्वर का घर अब इस मामले पर और जोर नहीं देगा। लेकिन, क्या यह बात पूरी तरह से निश्चित है कि परमेश्वर द्वारा पूर्ण किया गया व्यक्ति गलतियों और विचलनों से बिल्कुल मुक्त होता है? ऐसा जरूरी नहीं है। इसलिए, परमेश्वर द्वारा जाँच-पड़ताल अब भी जरूरी है, उसी तरह सत्य समझने वालों द्वारा निगरानी भी जरूरी है; यह अभ्यास पूरी तरह से परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है। चूँकि सभी मनुष्य भ्रष्ट स्वभाव के होते हैं, इसलिए सिर्फ निगरानी के जरिए ही अगुआओं और कार्यकर्ताओं पर अपने कार्य की जिम्मेदारी लेने और अपने कर्तव्यों के प्रति वफादार होने का दबाव डाला जा सकता है। निगरानी के बिना, ज्यादातर अगुआ और कार्यकर्ता जानबूझकर लापरवाही से कार्य करेंगे और लापरवाह तरीका अपनाएँगे—यह एक वस्तुनिष्ठ तथ्य है। अगर तुम अगुआ या कार्यकर्ता हो, और तुम्हारे आसपास के भाई-बहन अक्सर तुम्हारी निगरानी और जाँच-परख करते हैं, यह समझने का प्रयास करते हैं कि तुम सत्य का अनुसरण करने वाले व्यक्ति हो या नहीं, तो यह तुम्हारे लिए अच्छी चीज है। अगर उन्हें तुम्हारी किसी समस्या का पता चलता है और तुम उसे जल्द से जल्द सुलझा पाते हो, तो यह तुम्हारे सत्य की खोज और तुम्हारे जीवन प्रवेश के लिए फायदेमंद है। अगर उन्हें पता चलता है कि तुम कुकर्म कर रहे हो, और तुम अकेले में कई बुरे व्यवहार प्रदर्शित करते हो, और यकीनन कोई ऐसे व्यक्ति नहीं हो जो सत्य का अनुसरण करता है, तो वे तुम्हें उजागर कर देंगे और तुम्हारे पद से तुम्हें बर्खास्त कर देंगे, जिससे परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए एक संकट दूर हो जाएगा, और तुम भी ज्यादा कठोर सजा से बच सकोगे : इस तरह की निगरानी किसी के लिए भी फायदेमंद है। और इसलिए, अगुआओं और कार्यकर्ताओं को परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा निगरानी किए जाने के प्रति सही प्रतिक्रिया देनी चाहिए। अगर तुम परमेश्वर का भय मानने वाले और बुराई से दूर रहने वाले व्यक्ति हो, तो तुम्हें महसूस होगा कि तुम्हें परमेश्वर के चुने हुए लोगों की निगरानी की जरूरत है, और कि इससे भी ज्यादा, तुम्हें उनकी सहायता की जरूरत है। अगर तुम कुकर्मी हो, और तुम्हारा जमीर दोषी है, तो तुम निगरानी किए जाने से डरोगे और इससे बचने का प्रयास करोगे; यह अवश्यंभावी है। इसलिए इसमें कोई संदेह नहीं है कि जो लोग परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा निगरानी किए जाने का प्रतिरोध करते हैं और उसके प्रति विमुखता महसूस करते हैं, वे कुछ छिपा रहे होते हैं, और वे यकीनन ईमानदार लोग नहीं हैं; धोखेबाज लोग ही निगरानी से सबसे ज्यादा डरते हैं। तो परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा निगरानी किए जाने के प्रति अगुआओं और कार्यकर्ताओं को क्या रवैया अपनाना चाहिए? क्या यह नकारात्मकता, सतर्कता, प्रतिरोध और द्वेष का रवैया होना चाहिए या परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति आज्ञाकारिता और विनम्र स्वीकृति का रवैया होना चाहिए? (विनम्र स्वीकृति का रवैया होना चाहिए।) विनम्र स्वीकृति का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है परमेश्वर से सब कुछ स्वीकार लेना, सत्य की तलाश करना, सही रवैया अपनाना और आवेगपूर्ण ना होना। अगर किसी को वास्तव में तुम्हारी किसी समस्या का पता चलता है और वह तुम्हें इस बारे में बताता है, इसे पहचानने और समझने में तुम्हारी मदद करता है, इस समस्या को सुलझाने में तुम्हारी सहायता करता है, तो वह तुम्हारे प्रति जिम्मेदार हो रहा है, और परमेश्वर के घर के कार्य और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन प्रवेश के प्रति जिम्मेदार हो रहा है; यही चीज करना सही है, और यह बिल्कुल स्वाभाविक और उचित है। अगर ऐसे लोग हैं जो कलीसिया द्वारा निगरानी किए जाने को शैतान से, और दुर्भावनापूर्ण इरादों से उत्पन्न होने वाली चीज मानते हैं, तो वे दुष्ट लोग और शैतान हैं। ऐसी शैतानी प्रकृति के साथ, वे यकीनन परमेश्वर द्वारा जाँच-पड़ताल किए जाने को स्वीकार नहीं करेंगे। अगर कोई सही मायने में सत्य से प्रेम करता है, तो उसमें परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा निगरानी किए जाने की सही समझ होगी, वह इसे प्रेम के कारण किया जा रहा, परमेश्वर से आने वाला कार्य मान सकेगा, और वह इसे परमेश्वर से स्वीकार लेने में समर्थ होगा। वह यकीनन आवेगपूर्ण नहीं होगा या आवेश में आकर कार्य नहीं करेगा, उसके दिल में प्रतिरोध, सतर्कता या संदेह तो बिल्कुल नहीं होगा। परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा निगरानी किए जाने को सँभालने का सबसे सही रवैया यह है : कोई भी ऐसा शब्द, क्रियाकलाप, निगरानी, जाँच-परख, या सुधार—यहाँ तक कि काट-छाँट किया जाना—जो तुम्हारे लिए उपकारी है, उसे तुम्हें परमेश्वर से स्वीकार लेना चाहिए; आवेगपूर्ण मत बनो। आवेगपूर्ण होना उस दुष्ट से, शैतान से आता है, यह परमेश्वर से नहीं आता है, और लोगों को सत्य के प्रति यह रवैया नहीं रखना चाहिए।

हम अगुआओं और कार्यकर्ताओं की सातवीं जिम्मेदारी के बारे में बस इतना ही जोड़ेंगे और इतनी ही संगति करेंगे। तो क्या इसका यह अर्थ है कि जिम्मेदारी के बारे में पूरी तरह से संगति की जा चुकी है और अब इसमें कहने लायक और कोई विशिष्ट सामग्री नहीं बची है? नहीं, हर जिम्मेदारी में अब भी बहुत ज्यादा विशिष्ट और विस्तृत सामग्री बची है। मैंने जिन चीजों के बारे में संगति की, वे व्यापक सिद्धांत हैं; बाकी, विशिष्ट विवरणों को कैसे लागू किया जाए और इन सिद्धांतों का अभ्यास और उपयोग कैसे किया जाए, यह अनुभव के जरिए तुम लोगों की अपनी सहभागिता पर निर्भर करता है। अगर तुम लोग अब भी इन सिद्धांतों की असलियत नहीं जान सकते या यह नहीं जान सकते कि इन्हें कैसे लागू करना है, तो सब साथ मिलकर तलाश और संगति करो। अगर साथ मिलकर संगति करने से भी तुम्हें नतीजे नहीं मिलते हैं, तो अपने से उच्च पदों पर आसीन लोगों से पूछताछ करो। संक्षेप में, चाहे यह किसी भी प्रकार के व्यक्ति के साथ व्यवहार करना हो या यह तय करना हो कि किसे पदोन्नत करना है और किसका उपयोग करना है, इन सभी में सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। कुछ प्रतिभाशाली व्यक्तियों के मामले में, ऐसी परिस्थितियों में जहाँ कोई भी उन्हें पूरी तरह से पहचान या समझ नहीं पाता है, उन्हें कलीसिया के कार्य की जरूरतों के अनुसार प्रारंभिक रूप से पदोन्नत किया जा सकता है और उनका उपयोग किया जा सकता है—कार्य में देरी मत करो, और लोगों को विकसित करने में देरी मत करो; यही कुंजी है। कुछ लोग पूछते हैं, “अगर उपयोग किए जाने के बाद वे कार्य में गड़बड़ी कर देते हैं, तो क्या होगा? कौन जिम्मेदार होगा?” जब तुम किसी का उपयोग करते हो, तो क्या यह ऐसा है जैसे तुम उसे किसी वीरान द्वीप पर छोड़ देते हो जहाँ कोई भी उससे संपर्क नहीं कर सकता है? क्या वास्तव में उसके आसपास ऐसे कई दूसरे लोग नहीं हैं जो विशिष्ट कार्यों में लगे हुए हैं? इन सभी मामलों को सुलझाने के तरीके हैं; यानी, उसकी निगरानी करना, जाँच-परख करना और उसे समझना, और, अगर परिस्थितियाँ अनुमति दें, तो यह सब नजदीकी संपर्क के जरिए करना। नजदीकी संपर्क से वास्तव में क्या अभिप्राय है? इससे अभिप्राय है उसके साथ मिलकर कार्य करना; कार्य करने की प्रक्रिया उसे समझने की प्रक्रिया है। क्या तुम इस किस्म के संपर्क के जरिए उसे धीरे-धीरे समझने नहीं लगोगे? अगर तुम्हारे पास संपर्क बनाने का अवसर तो है लेकिन तुम ऐसा नहीं करते हो, और कुछ प्रश्न पूछने के लिए बस एक फोन कॉल कर लेते हो और फिर उसे वहीं छोड़ देते हो, तो फिर उसे समझना असंभव है। समस्याओं को सुलझाने के लिए तुम जिन लोगों से संपर्क बना सकते हो उनसे तुम्हें संपर्क बनाना चाहिए। इसलिए, अगुआओं और कार्यकर्ताओं को अपने कार्य में आलसी नहीं होना चाहिए। तो, अगर तुम किसी की जाँच-परख कर उसे समझना चाहते हो, तो तुम्हें यह कैसे करना चाहिए? (उससे संपर्क बनाकर करना चाहिए।) सही कहा न? यहाँ मुख्य बात यह है कि तुम्हें इस कार्य में अपना दिल लगाना होगा! तुम लोग अपने दिमागों में जो जानकारी रख सकते हो, उसकी तुलना किसी बंदर के मकई चुनने से की जा सकती है—वह जैसे-जैसे आगे बढ़ता जाता है उसे चुनता रहता है और उसे चुनते ही गिरा भी देता है और अंत में उसके पास सिर्फ मकई का एक दाना बच जाता है, जिससे उसकी सारी मेहनत बेकार हो जाती है। धर्मोपदेश सुनने के बाद तुम लोग संगति की गई सामग्री वापस याद नहीं कर पाते हो, इसका क्या कारण है? (हम उसमें अपना दिल नहीं लगाते हैं।) आम तौर पर तुम लोग सत्य का अभ्यास करने पर ध्यान केंद्रित नहीं करते हो, इसलिए तुम लोगों के दिल इन मामलो पर ध्यान केंद्रित नहीं करते हैं। सत्य को कैसे समझना है और वास्तविकता में कैसे प्रवेश करना है, खुद को कैसे जानना है और सत्य से विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों के सार की असलियत को कैसे जानना है, इन सबके संबंध में तुम लोगों के पास किसी भी तरह का प्रवेश नहीं है; इसलिए, तुम लोगों के दिलों में इन मामलों का कोई आधार नहीं है। जहाँ तक सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने से संबंधित चीजों का प्रश्न है, तुम लोग हमेशा उलझन में ही रहते हो। अब, धर्मोपदेश सुनने के लिए अभी भी तुम लोग हर हफ्ते सभाओं में शामिल होते हो। अगर तुम धर्मोपदेश नहीं सुनते हो, तो क्या इससे तुम लोगों के दिलों में परमेश्वर में जो थोड़ी सी आस्था है, वह कम नहीं हो जाएगी, धीरे-धीरे लुप्त नहीं हो जाएगी? यह एक खतरनाक संकेत है! क्या तुम लोग इसमें अपने दिल लगा सकते हो या नहीं? मैंने तुम लोगों को सारे विवरण बता दिए हैं, अगर सही मायने में तुम्हारे पास दिल है, तो तुम ऐसा करने में समर्थ हो जाओगे। अगर तुम्हारे पास दिल नहीं है, तो मैं चाहे किसी भी तरह से बोलूँ, तुम्हें समझ नहीं आएगा। इस विषय पर हमारी संगति यहीं समाप्त होती है।

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें