मद सात : वे दुष्ट, धूर्त और कपटी हैं (भाग दो) खंड दो
कनाडा की कलीसिया में मसीह-विरोधी का मामला सँभाले जाने के बाद कुछ लोग सोच रहे थे, “इन लोगों ने कई सालों तक अपना कर्तव्य निभाया है, और फिर भी एक मसीह-विरोधी के उभरने और व्यवधान पैदा करने की वजह से वे अलग-थलग कर दिए गए हैं।” उन्हें संकट का एहसास होता है क्योंकि वे सोचते हैं, “ओह, यह पहली बार है जब मैंने परमेश्वर को क्रोधित होकर लोगों को श्राप देते देखा है। मसीह-विरोधी के सहयोगियों, साथियों और अनुयायियों को भी नहीं छोड़ा गया। परमेश्वर को वास्तव में किसी की भावनाओं की कोई परवाह नहीं है! आम तौर पर अक्सर कहा जाता है कि परमेश्वर मनुष्य से प्रेम करता है और उस पर दया करता है, लेकिन इस बार तो उसका गुस्सा वास्तव में असहनीय है!” वे अपने दिल में बेचैनी महसूस करने लगते हैं। मुझे बताओ, क्या लोगों का इस तरह से सोचना सही है? (नहीं।) सही क्यों नहीं है? लोगों को इस मामले से कैसे पेश आना चाहिए? तुम लोग कितने सालों से धर्मोपदेश सुन रहे हो? क्या तुम्हें कम से कम पाँच साल नहीं हो गए? और क्या हमें कई मामलों में आम सहमति नहीं हासिल करनी चाहिए, खासकर उन मामलों में जहाँ सिद्धांत अपेक्षाकृत स्पष्ट हैं? (हाँ।) “आम सहमति” का क्या मतलब है? इसका मतलब है एक तरह की मौन समझ। मैं कुछ करूँ और तुम लोगों को इसका कारण न बताऊँ, फिर भी तुम लोगों को अच्छी तरह से पता हो कि ऐसा क्यों हुआ, तुम उसे समझने, स्वीकार करने और सकारात्मक दृष्टिकोण से बूझने में सक्षम हो—मौन समझ का यही मतलब है। यह मौन समझ कैसे आती है? मान लो कि तुमने कई उपदेश सुने हैं, एक निश्चित स्तर की सत्य की समझ हासिल की है, और हम एक-दूसरे को पहले से ज्यादा जान चुके हैं। मैंने तुम्हें कई चीजें समझाई हैं, और तुम्हें अपना दृष्टिकोण, अपने विचार, कार्रवाई के सिद्धांत के साथ वे चीजें भी बताई हैं जिन्हें तुम्हें समझने और करने की आवश्यकता है। मैंने तुम लोगों को ये सभी चीजें बताई हैं और अपने विचार बताए हैं, और उसके बाद तुम लोगों ने मेरे विचारों को स्वीकार कर लिया है, और मेरे विचारों के अनुरूप ही तुम तमाम चीजों, अपने कर्तव्य, आस्था, जीवन और अन्य लोगों से पेश आए हो। तब क्या हमारे बीच मौन समझ बढ़ती नहीं जाएगी? (हाँ।) तो, क्या हम कनाडा की कलीसिया का मामला सँभालने के संबंध में इस तरह की मौन समझ तक पहुँच गए हैं? अगर मैं मामले को जैसे स्पष्ट कर रहा हूँ, वैसे न करता तो हमारी मौन समझ का क्या मतलब होता? “दूसरों के लिए मिसाल कायम करने के लिए लोगों को कठोर दंड देना,” और “लोगों को दूसरों के लिए एक चेतावनी जैसा बनाना”—क्या यह हमारी मौन समझ है? (नहीं।) इन लोगों ने तो कई वर्षों तक धर्मोपदेश सुने हैं, तो मेरे यह कदम उठाने पर उनकी प्रतिक्रिया ऐसी कैसे हो सकती है? बताओ कि उनके ऐसे विचार सुनकर मुझे कैसा लगा? मुझे लगा कितना दुःखद है कि लोग ऐसी बातें कह सकते हैं! मैं तुमसे पूछता हूँ कि क्या मुझे ऐसा महसूस करना चाहिए था? (हाँ।) तुम ऐसा क्यों कहते हो? ऐसा इसलिए कि इस तरह का कथन, इस तरह का दृष्टिकोण, इस तरह की समझ और इस तरह का अंतर्बोध होना या सामने आना नहीं चाहिए था। अब ऐसी बातें सामने आई हैं, और वे मेरे लिए अनपेक्षित हैं। वे मेरे आकलन और अपेक्षाओं से इतनी दूर हैं कि मुझे इस मामले पर शर्म आती है! कोई कहेगा, “क्या यह इतना गंभीर मामला है? क्या तुम बात का बतंगड़ नहीं बना रहे हो?” तो, मैं तुम्हें बता दूँ यह कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन यह कोई छोटी बात भी नहीं है। जब तुम परमेश्वर पर विश्वास करना शुरू करते हो, जब तुम स्वीकार करते हो कि परमेश्वर तुम्हारा परमेश्वर और तुम्हारा प्रभु है, जब तुम परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना चाहते हो, परमेश्वर का अनुसरण करना चाहते हो, उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं को स्वीकार करना चाहते हो, और परमेश्वर तुमसे जो कुछ भी कहे, उसे समर्पित होना चाहते हो, उस दिन से तुम परमेश्वर के साथ एक रिश्ता बना लेते हो। एक बार जब तुम यह रिश्ता बना लेते हो, तो तुम्हारे और परमेश्वर के बीच एक अत्यंत महत्वपूर्ण समस्या मौजूद होती है। वह समस्या क्या है? वह यह है कि यदि तुम परमेश्वर जो करता है उसे और परमेश्वर के व्यवहार के तरीकों को स्वीकार नहीं कर सकते, यदि तुम इन चीजों को नहीं समझ सकते, और तुम उन्हें तलाशने और समझने की पहल नहीं कर सकते, तो परमेश्वर के साथ तुम्हारा रिश्ता हर पल संकट की स्थिति में रहेगा। और संकट की यह स्थिति क्या प्रदर्शित करती है? तुम परमेश्वर के कितने ही वचन खाओ और पियो, तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण करने की कितनी भी योजना बनाओ, जब तक यह संकट की स्थिति एक दिन के लिए भी मौजूद है, तब तक परमेश्वर का अनुसरण करने की तुम्हारी इच्छा और परमेश्वर का उद्धार स्वीकार करने की तुम्हारी इच्छा नष्ट हो सकती है, यह अस्थिर हो सकती है, और कल्पना मात्र बन सकती है। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? जब तक परमेश्वर के साथ तुम्हारा रिश्ता सामान्य नहीं है और जब तक यह संकट की स्थिति बनी रहती है, तब तक क्या तुम परमेश्वर के साथ सामान्य रिश्ता बनाए रख पाओगे? तब, परमेश्वर के साथ तुम्हारा कैसा रिश्ता होगा? क्या यह अनुरूपता वाला रिश्ता होगा? क्या यह किसी पारिवारिक रिश्ते जैसा, या सहकर्मियों के बीच के रिश्ते जैसा होगा? वास्तव में यह किस तरह का रिश्ता होगा? जब तक परमेश्वर के साथ तुम्हारा रिश्ता संकट की स्थिति में है, तब तक संभव होगा कि तुम किसी भी समय और स्थान पर परमेश्वर के कार्यों और व्यवहार की आलोचना करो और उसे गलत समझो, और तुम परमेश्वर द्वारा की जाने वाली चीजों का विरोध कर सकते हो और उन्हें स्वीकारने से मना कर सकते हो। तो क्या तब तुम खतरे में नहीं पड़ोगे? यह खतरा कैसे आता है? यह इसलिए आता है कि तुम परमेश्वर को नहीं जानते। हम सकारात्मक पक्ष से नहीं, बल्कि नकारात्मक पक्ष से बात करेंगे। उदाहरण के लिए, तुम हमेशा परमेश्वर को एक निश्चित तरीके से देखते हो, और सोचते हो कि परमेश्वर पृथ्वी पर एक राजा है, सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी है, सर्वोच्च व्यक्ति है और जो यहाँ सत्ता का प्रयोग करता है। अपने मन में तुम हमेशा सोचते हो कि परमेश्वर कोई है जो इस तरह की स्थिति में है और इसलिए इस आधार पर तुम परमेश्वर द्वारा की और कही जाने वाली चीजों पर क्या दृष्टिकोण अपनाओगे? मैं कुछ उदाहरण देता हूँ जिनसे तुम लोग समझ सकोगे कि मैं किस दृष्टिकोण की बात कर रहा हूँ। दुनिया में एक कहावत है : “राजा की संगत में रहना बाघ की संगत में रहने के समान है।” तो, क्या ऐसे लोग हैं जो इस कहावत को परमेश्वर के साथ अपने रिश्ते पर लागू करते हैं? (हाँ।) ऐसे लोग हैं, और बहुत-से लोग परमेश्वर के बारे में यही दृष्टिकोण रखते हैं। एक और कहावत है जिसका हमने पहले उल्लेख किया है, “लोगों को दूसरों के लिए एक चेतावनी जैसा बनाना।” क्या यह बात भी परमेश्वर को पृथ्वी पर कोई राजा या प्रभावशाली और हैसियत वाला व्यक्ति नहीं बनाती? (हाँ, ऐसा ही है।) यह परमेश्वर के बारे में उनकी समझ है क्योंकि परमेश्वर के बारे में यही उनका दृष्टिकोण है, और चूँकि परमेश्वर के साथ उनका इसी तरह का रिश्ता है, इसलिए वे उसे इसी तरह से देखते हैं, क्योंकि वे उसकी पहचान और हैसियत को ऐसा ही समझते हैं, इसलिए वे परमेश्वर को वैसे ही देखते हैं जैसे वे दुनिया में किसी रुतबे वाले व्यक्ति को देखते हैं—यह स्वाभाविक है। एक और कहावत है : “अपने दबदबे वाले इलाके में किसी और का दखल कैसे बर्दाश्त होगा?” यह सांसारिक राजाओं और रुतबे और प्रभाव वाले लोगों का वर्णन करने का एक तरीका है। तुममें से कुछ लोग ऐसे लोगों को जानते होंगे या पहले उनसे जुड़े होंगे, और शायद तुम लोग भी इस कहावत को परमेश्वर पर लागू करते हो। अर्थात्, जब परमेश्वर कुछ करता है या कहता है, तो तुम परमेश्वर को उन कहावतों के साथ जोड़ सकते हो और परमेश्वर को उसी तरह से देख सकते हो। यदि तुम परमेश्वर के बारे में उसी तरह से विचार करते हो और उसके बारे में ऐसा ही परिप्रेक्ष्य रखते हो, तो परमेश्वर के साथ तुम्हारा रिश्ता वास्तव में कैसा होगा? यह विरोधात्मक होगा। अपने मन में तुम परमेश्वर की कितनी भी प्रशंसा करो और उससे कितना भी डरो, तुम चाहे जितने आज्ञाकारी रहो और तुम उसके प्रति कितना भी समर्पण करो, और उसके प्रति चाहे जैसा रवैया रखो, परमेश्वर के साथ तुम्हारा रिश्ता अभी भी विरोधात्मक होगा। तुम लोग सोच सकते हो कि इस तरह से बोलते हुए मेरे शब्द थोड़े अमूर्त लगते हैं, लेकिन अगर तुम उन पर ध्यान से विचार करो, तो क्या तुम्हें नहीं दिखता कि चीजें ऐसी ही हैं? जब मैंने कनाडा की कलीसिया में मसीह-विरोधी से संबंधित मामला सँभाला था, तो मैंने तुम लोगों को सावधानी से और विस्तार से सारी बातें नहीं समझाई थीं, और मैंने तुम्हें वे कारण भी नहीं बताए थे कि उन लोगों से संबंधित मामला मैंने क्यों सँभाला, और बहुत-से लोग अपनी संभावनाओं और नियति के बारे में चिंतित हो गए थे। यह चिंता कहाँ से उत्पन्न हुई? यह लोगों द्वारा परमेश्वर के बारे में गलत समझ रखने और परमेश्वर को न जानने से उत्पन्न हुई थी—यही मूल कारण था! यदि परमेश्वर के बारे में तुम लोगों की समझ परमेश्वर के सार के अनुरूप हो—उदाहरण के लिए, यदि परमेश्वर की धार्मिकता, अधिकार और बुद्धि के बारे में तुम लोगों की समझ सत्य के अनुरूप हो—तो परमेश्वर कुछ भी करे, भले ही तुम लोग उसके कारणों को न समझो और परमेश्वर के इरादों को न समझो, क्या तुम परमेश्वर को गलत समझोगे? नहीं, बिल्कुल नहीं। कनाडा की कलीसिया से जुड़े मुद्दे को सँभाल लेने के बाद कुछ लोगों ने कहा, “यह उन्हें चेतावनी जैसा बना देने और हमें डराने के लिए किया गया था।” उनकी समस्या क्या है? क्या उन्होंने जो कहा वह सत्य के अनुरूप है? क्या यह सही समझ दिखाता है? (नहीं।) क्यों नहीं? मैं तुम्हें एक बहुत ही सरल बात बताता हूँ : उनकी समझ वास्तविक स्थिति के विपरीत थी, तथ्य वैसे नहीं थे, और वे उन तथ्यों को गलत तरीके से समझ रहे थे। क्या यह आसान-सा कथन नहीं है? (हाँ।) तो तुम लोग इस मुद्दे की व्याख्या के लिए इतना कठिन प्रयास क्यों करते हो? मैंने ऐसा कभी नहीं सोचा, और मैं कभी किसी को डराना नहीं चाहता था। ज्यादातर लोग पिछले कुछ वर्षों में अपने कर्तव्य की प्रभावोत्पादकता में लगातार सुधार कर रहे हैं, तो क्या वे अब अपना कर्तव्य मानक स्तर के तरीके से करते हैं? नहीं, ऐसा नहीं हैं, फिर भी ये लोग अपने कर्तव्य में मानक के अनुसार होने की प्रक्रिया में हैं, और यदि कोई छोटी-मोटी समस्याएँ हैं तो मैं उन पर ध्यान नहीं देता। इस प्रक्रिया के दौरान कुछ लोग व्यवधान पैदा कर सकते हैं, कुछ लोग चीजों को टाल सकते हैं, या कुछ लोगों के बीच कोई छोटी-मोटी समस्याएँ आ सकती हैं, लेकिन कुल मिलाकर, वे काफी अच्छे हैं। हालाँकि, एक बात है जिसे तुम्हें नहीं भूलना चाहिए : तुम अपना कर्तव्य निभाने आए हो। तुम चाहे जितनी भी मेहनत करो, या कितने भी कष्ट झेलो, या तुम्हारी कितनी भी काट-छाँट हो, तुम्हें परमेश्वर का धन्यवाद करना चाहिए। परमेश्वर ने तुम्हें यह अवसर दिया है ताकि तुम सभी तरह की अलग-अलग परिस्थितियों का अनुभव कर सको और तुम्हारे पास सभी तरह के व्यक्तिगत अनुभव हों। यह अच्छी बात है, और यह सब इसलिए किया गया है ताकि तुम सत्य समझ सको। तो, तुम लोग किस बात को लेकर चिंतित हो? तुम किससे सावधान रह रहे हो? ऐसा करने की कोई जरूरत नहीं है। बस सामान्य रूप से सत्य का अनुसरण करो, अपना सही स्थान खोजो, और अपना कर्तव्य और अपनी जिम्मेदारी के दायरे में आने वाले काम को अच्छी तरह से करो, बस यही काफी है। यह तुम लोगों से बहुत बड़ी माँग नहीं है।
जिस क्षण से कनाडा की कलीसिया में मसीह विरोधी प्रकट हुआ और उसने व्यवधान डालना शुरू किया, उससे लेकर तब तक जब तक कि वे लोग उस स्थिति में नहीं पहुँच गए जिसमें आज हैं, मैंने उन्हें कितने लंबे समय तक बर्दाश्त किया है? वहाँ जो हो रहा था मैं उससे पूरी तरह से अनजान नहीं था, पर मैंने लंबे समय तक इसे बर्दाश्त किया। मैंने कितना बर्दाश्त किया? लंबे समय तक वे काम पूरे करने में असमर्थ रहे, उन्होंने अपने काम में कोई प्रगति नहीं की, और उनमें से कोई भी अपने मुख्य मामलों पर ध्यान नहीं देता था; वे सभी मनमाने और जल्दबाज, भ्रष्ट और अनियंत्रित थे, और उन्हें बहुत पहले ही सँभाला जाना चाहिए था। यदि तुम लोग भी मनमाने, लापरवाह और अपने उचित मामलों पर ध्यान न देने वाले बन सकते हो, तो इस बात का इंतजार न करो कि मैं तुमसे निपटूंगा। इसके बजाय, पहल करो और इस्तीफा दे दो; यह अधिक सम्मानजनक होगा। क्या ऐसा करना सही होगा? नहीं, ऐसा करना भी सही नहीं होगा। छोड़ने के बारे में मत सोचते रहो, तुम्हें एकाग्रचित्त होकर यहाँ जड़ें जमानी होंगी और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाना होगा। तुम अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभा पाओ या नहीं, कम से कम उसमें अपना मन तो लगाओ और सुनिश्चित करो कि अंततः तुमने सभी दिए गए कार्य पूरे कर लिए हैं। भगोड़े न बनो। कुछ लोग कहते हैं, “मेरी काबिलियत कम है, मैं बहुत शिक्षित नहीं हूँ और मुझमें कोई प्रतिभा नहीं है। मेरे व्यक्तित्व में दोष हैं और मुझे अपने कर्तव्य में हमेशा कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अगर मैं अपना कर्तव्य अच्छी तरह से नहीं निभा पाया और मुझे हटा दिया गया तो मैं क्या करूँगा?” तुम्हें किस बात का डर है? क्या यह काम तुम अकेले पूरा कर सकते हो? तुमने अभी-अभी एक भूमिका ली है, तुमसे पूरा काम करने के लिए नहीं कहा जा रहा है। बस वही काम करो जो तुम्हें करना चाहिए, बस इतना ही काफी है। क्या तब तुमने अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी नहीं कर ली होंगी? यह इतना आसान है; तुम हमेशा इतने शंकालु क्यों रहते हो? तुम्हें डर है कि गिरती हुई पत्तियाँ तुम्हारे सिर पर गिरेंगी और तुम्हारा सिर फाड़ देंगी, और तुम सबसे पहले अपनी खुद की आकस्मिक समय के लिए बनाई गई योजनाओं के बारे में सोचते हो—क्या यह बेकार नहीं है? यहाँ “बेकार” का क्या मतलब है? इसका मतलब है प्रगति करने की कोशिश न करना, अपना सब कुछ देने के लिए तैयार न होना, हमेशा मुफ्तखोरी और अच्छी चीजों का आनंद लेने की चाहत रखना—इस तरह के लोग कूड़ा-कर्कट हैं। कुछ लोग बहुत ही संकीर्ण सोच वाले होते हैं। हम ऐसे लोगों की व्याख्या कैसे कर सकते हैं? (वे बेहद तुच्छ हैं।) एक बेहद तुच्छ व्यक्ति नीच होता है, और कोई भी नीच व्यक्ति अपने खुद के नीच मानकों से एक सज्जन व्यक्ति के चरित्र को माप सकता है और दूसरों को अपने जैसा ही स्वार्थी और नीच मान सकता है। ये लोग किसी काम के नहीं हैं, और भले ही वे परमेश्वर में विश्वास करते हों, उनके लिए सत्य को स्वीकार करना आसान नहीं होगा। किसी व्यक्ति में किस कारण से बहुत कम आस्था होती है? ऐसा उनके द्वारा सत्य न समझने के कारण होता है। यदि तुम बहुत कम सत्यों को समझते हो और उनके बारे में तुम्हारी समझ बहुत उथली है, तो परिणामस्वरूप तुम परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले कार्यों, परमेश्वर द्वारा की जाने वाली चीजों और परमेश्वर द्वारा तुमसे की जाने वाली अपेक्षाओं को नहीं समझ सकते, यदि तुम ऐसी समझ नहीं विकसित कर सकते, तो परमेश्वर के बारे में तुम्हारे मन में सभी प्रकार के संदेह, कल्पनाएँ, गलतफहमियाँ और धारणाएँ उत्पन्न होंगी। यदि तुम्हारा हृदय केवल इन्हीं चीजों से भरा है, तो क्या तुम परमेश्वर में सच्ची आस्था रख सकते हो? परमेश्वर में तुम्हारी सच्ची आस्था नहीं है, और इसीलिए तुम हमेशा बेचैन महसूस करते हो, और चिंता करते हो कि पता नहीं कब तुम्हें बर्खास्त कर दिया जाएगा। तुम डर महसूस करते हो और सोचते हो, “परमेश्वर कभी भी निरीक्षण करने के लिए यहाँ आ सकता है।” सहज रहो! जब तक तुम लोग परमेश्वर के घर द्वारा सौंपे गए काम को अच्छी तरह से करते हो, तब भले ही तुम सत्य और जीवन प्रवेश के अनुसरण में कुछ कमजोर रहो, मैं इसे अनदेखा कर दूँगा। जहाँ तक तुम लोगों के सभाओं में भाग लेने और धर्मोपदेश सुनने, तुम्हारे कलीसियाई जीवन और परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने का सवाल है, मैं उन चीजों की निगरानी नहीं करने जा रहा, और जब तुम्हारे काम की बात आती है तो मैं तुम्हें परेशान नहीं करूँगा। मैं तुम्हें परेशान क्यों नहीं करूँगा? इसके कई कारण हैं। एक कारण यह है कि विभिन्न व्यावसायिक कौशलों से तुम मुझसे ज्यादा परिचित हो। पिछले कुछ वर्षों के काम की प्रक्रिया में तुम लोगों ने अपने अनुभव या व्यावसायिक कौशल में सुधार किया होगा और अपने काम का एक कार्यक्रम बना लिया होगा। चाहे लिखित हो या मौखिक, तुम्हें कुछ नियमों-विनियमों का सारांश अवश्य देना चाहिए। मुझे नहीं पता कि तुम लोग किस तरह से काम करते हो, और तुम्हारी कार्य योजनाओं और काम करने के तौर-तरीकों को बिगाड़ने की मेरी कोई इच्छा नहीं है। तुम अपनी खुद की शैली या पैटर्न, या नियमों-विनियमों का पालन कर सकते हो, और तुम आसान और सुविधाजनक लगने वाले ऐसे तरीके से काम कर सकते हो जिससे हर कोई स्वतंत्र और मुक्त महसूस करे और जिसके परिणामस्वरूप दक्षता का स्तर ऊँचा हो। मतलब, मैं तुम लोगों को तुम्हारे काम में पूरी स्वतंत्रता देता हूँ। यद्यपि मैं कभी-कभी कलीसियाओं के आसपास घूमता हूँ, लेकिन मैं रास्ते से हट जाता हूँ, ताकि तुम मुझे न देखो—मैं तुम लोगों को स्वतंत्र और मुक्त महसूस कराने की पूरी कोशिश करता हूँ। मैं ऐसा क्यों करता हूँ? तुममें से कोई भी बहुत ज्यादा पेशेवर कौशल नहीं रखता; तुम्हें सीखने की प्रक्रिया के हिस्से के रूप में धीरे-धीरे अपने तरीके से आगे बढ़ने की जरूरत है। चाहे लोग पेशेवर कौशल सीख रहे हों या सत्य में प्रवेश कर रहे हों, उन सभी की प्रगति की दर और दक्षता का स्तर अलग-अलग होते हैं। तुम लोगों को ऐसी चीजें करने के लिए मजबूर नहीं कर सकते जो उनकी क्षमताओं से परे हों। लोगों को एक प्रक्रिया से गुजरना चाहिए, विफलताओं, रुकावटों का अनुभव करना चाहिए, या अपनी गलतियों से कुछ सबक सीखते हुए फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ने का एक तरीका निकालना चाहिए और सभी क्षेत्रों में कुछ सिद्धांतों में महारत हासिल करनी चाहिए। ऐसा होने पर वे प्रगति कर रहे होंगे। तुम लोगों की अपनी कार्यशैली और अपने तरीके हैं—इन मामलों में तुम लोगों को परेशान करना मेरे लिए अनुचित होगा। इसलिए मैं तुम्हारे काम से संबंधित इन मामलों पर चर्चा में बहुत कम ही शामिल होता हूँ। यह वह कारण है जो तुम लोगों से संबंधित है। एक प्राथमिक कारण भी है जिसका संबंध मुझसे है। ईमानदारी से कहूँ तो तुम लोग जो देखने और सोचने में सक्षम हो, चाहे वह पेशेवर कौशल की बात हो या कला के संदर्भ में हो, वह सब मुझे बहुत उथला लगता है और सत्य के संदर्भ में, वह मुझे और भी उथला लगता है। यदि मैं तुम लोगों को तेजी से प्रगति करने के लिए मजबूर करने की कोशिश करूँ तो क्या तुम लोग उसे सहन कर पाओगे? नहीं, तुम सहन नहीं कर पाओगे। यदि मैं तुम्हारे बीच अपनी इच्छानुसार कार्य करूँ, तो तुमसे मेरी माँगें तुम्हारे पेशेवर कौशल के वर्तमान वास्तविक स्तर और जीवन प्रवेश के संबंध में तुम्हारे वास्तविक आध्यात्मिक कद से बड़ी होंगी। मैं ऐसा नहीं करना चाहता, क्योंकि यह मुझे बहुत थकाने वाला होगा, और इससे तुम पर बहुत जोर पड़ेगा। हम दोनों ही एक अजीब स्थिति में पड़ जाएँगे और ये अच्छा नहीं होगा; और यह वह नहीं है जो मैं देखना चाहता हूँ। इस मामले पर ये मेरे विचार हैं, और चीजें ऐसी ही हैं। इसके दो कारण हैं : एक जो तुमसे संबंधित है, और एक यह कि इस मामले पर मेरे अपने विचार हैं, मैंने चीजों को इस तरह से सँभाला है। चीजों को इस तरह से सँभालना तुम लोगों के चरणबद्ध विकास के लिए उपयुक्त है। जीवन प्रवेश के संदर्भ में, तुम्हारे पास परमेश्वर के वचनों की पुस्तकें हैं, सभी प्रकार की सभाएँ और उपदेश हैं, और ऐसे अगुआ और कार्यकर्ता भी हैं जो तुम्हें सींचते हैं और तुम्हें सहारा देते हैं; ऐसी बहुत-सी चीजें हैं जिन्हें तुम खा सकते हो, पी सकते हो, और जिनसे पोषण प्राप्त कर सकते हो। दूसरा पहलू यह है कि लोगों के जीवन विकास की प्रक्रिया मिट्टी में बोए गए बीज के समान होती है, जिसे सींचा जाता है और खाद दी जाती है, फिर वह धीरे-धीरे अंकुरित होकर तब तक बढ़ता रहता है जब तक कि वह अंततः फल न देने लगे। यह बहुत धीमी प्रक्रिया होती है। बेशक, तुम जिस धीमी प्रक्रिया से गुजरते हो, वह बीज के अंकुरण से लेकर फलदायी होने तक बढ़ने की प्रक्रिया से भी धीमी हो सकती है। ऐसा क्यों है? लोगों में बहुत-से व्यावहारिक और वस्तुनिष्ठ कारण निहित होते हैं। एक कारण यह है कि लोगों में भ्रष्ट स्वभाव होते हैं, लेकिन हम इस बारे में बात नहीं करेंगे। दूसरा यह है कि लोग निष्क्रिय होते हैं और अक्सर नकारात्मक हो जाते हैं। वे आलसी होते हैं, और जब सत्य और सकारात्मक चीजों की बात हो तो वे संज्ञाशून्य और मंथर होते हैं। इसके अलावा, लोग सकारात्मक चीजें पसंद नहीं करते। इसलिए, जब लोग सत्य में प्रवेश कर जीवन प्रवेश पाने की कोशिश करते हैं तो उन्हें कठिन संघर्ष करना होता है और वे धारा के विरुद्ध चल रहे होते हैं। लोगों के लिए प्रवाह के साथ चलते रहना, मुफ्तखोरी करना, धर्मनिरपेक्ष दुनिया के पीछे पड़े रहना और रुझानों का अनुसरण करना आदि धारा के साथ बहना है, जो आसान है, और व्यक्तिपरक दृष्टिकोण से देखें तो लोग वास्तव में इसी तरह से कार्य करना चाहते हैं। परंतु, सत्य का अनुसरण करना, न्यायसंगत कार्यों को करना, और अपने उचित कार्यों को पूरा कर सकने वाला न्याय की भावना वाला व्यक्ति होना उनके लिए बहुत कठिन है। उन्हें अपनी व्यक्तिपरक इच्छाओं, अपनी भावनाओं, अपनी धारणाओं के विरुद्ध विद्रोह करना होगा, और उन्हें अपने आलस्य और अन्य प्रतिकूल और नकारात्मक चीजों के विरुद्ध भी विद्रोह करना होगा। जब वे लोगों, काम के भागीदारों या ऐसे वातावरण का सामना करते हैं जो उनकी कल्पना के अनुसार न हों, या जब वे परेशान करने वाली या अप्रिय बातें सुनते हैं, तो उन्हें इससे उबरने के लिए प्रार्थना पर भरोसा करना चाहिए, और इसलिए उन्हें परमेश्वर में विश्वास करने के दौरान सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर भारी प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है। यदि उनमें खासतौर से संकल्प है और वे अविश्वसनीय ऊर्जा से सत्य का अनुसरण करते हैं, तो वे एक या दो साल के अनुभव के बाद कुछ प्रगति कर सकेंगे। अन्यथा, यदि वे अपनी मर्जी से काम करते हैं और चीजों को उनके स्वाभाविक तरीके से चलने देते हैं, तो वे बहुत धीमी गति से प्रगति करेंगे। शायद कुछ समय बाद उन्हें किसी विशेष घटना का सामना करना होगा, जिसका उनके लिए असाधारण महत्व होगा, और वे एक सबक सीखेंगे, उनकी काट-छाँट की जाएगी, और अपने अंतरतम हृदय में वे बहुत अधिक चोट खाएँगे और बहुत प्रभावित होंगे, और उसके बाद ही वे अपने जीवन प्रवेश के मामले में बेहतरी के लिए थोड़ा-सा बदलाव कर पाएँगे। क्या बेहतरी के लिए यह बदलाव उन्हें प्रगति करने में सक्षम बना सकेगा? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। उनकी प्रगति इस बात पर निर्भर करेगी कि इस अवधि के दौरान वे सत्य की खोज कैसे करते हैं। यदि वे ऐसे लोग हैं जो केवल बहाने बनाते हैं, जो दैहिक सुखों में लिप्त हैं, और जो वास्तव में सत्य से प्रेम नहीं करते, तो उन्हें इस घटना से केवल एक सतही सबक मिलेगा, और वे सत्य की समझ हासिल नहीं कर पाएँगे। तुम जिस धीमी गति से जीवन प्रगति कर रहे हो, उसी के अनुसार मैं तुम लोगों के साथ संबंध में यह दूरी बनाए रखता हूँ और यह तरीका अपनाता हूँ। क्या तुम लोगों को लगता है कि यह उचित है? (हाँ।) तुम लोगों के लिए यह बहुत फायदेमंद है; कम से कम तुम लोग आराम महसूस करते हो। मैं तुम लोगों पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं डालूँगा, तुम लोगों पर दिन भर नजर नहीं रखूँगा, ऐसा नहीं होगा कि मैं तुम्हें दिन के 24 घंटों में कभी आराम न करने दूँ, और तुम्हें कड़ी मेहनत और बिना रुके काम करने के लिए मजबूर करूँ। मैं जानबूझकर ऐसा नहीं करूँगा, बल्कि इसके बजाय चीजों को स्वाभाविक तरीके से चलने दूँगा। क्या इसका मतलब यह है कि तुम अपनी इच्छापूर्ति करने में लिप्त हो सकते हो? (नहीं।) तो मैं कैसे पूरे विश्वास के साथ तुम लोगों पर निगाह न रखने का विकल्प चुन सकता हूँ? क्योंकि पवित्र आत्मा पड़ताल करता है। इसके अलावा, अगर कोई सत्य का अनुसरण करता है, अपने अंतरतम हृदय में सत्य की जरूरत महसूस करता है और सत्य का अनुसरण करने के लिए तैयार है, तो भले ही तुम उसे न देख रहे हो, फिर भी वह सत्य का अनुसरण कर रहा होगा—वह भला आदमी है जो अपने उचित मामलों पर ध्यान देता है। अगर वह अच्छा आदमी न हो, तो तुम्हारे उस पर नजर रखने से भी कोई फायदा नहीं होगा। जब तुम उसे देखते हो, तो वह तुम्हारे प्रति अनमना व्यवहार करने के लिए ऊपरी तौर पर एक तरीके से काम करता है, और एक पल के लिए भी तुम्हारी नजर हटते ही वह ठीक वैसे ही काम करने लगता है जैसे वह सामान्यतः करता है और फिर से वैसा ही हो जाता है जैसे वह पहले था। सत्य का अनुसरण ऐसी चीज नहीं है जिसकी निगरानी की जा सके। यह ऐसी चीज है जिसकी मैं असलियत जानता हूँ, और इसीलिए मैं तुम लोगों से जुड़ने और बातचीत करने के लिए इस तरीके को अपनाता हूँ। मेरे लिए ऐसा करना पूरी तरह से उचित है।
क्या कनाडा की कलीसिया का मामला अब स्पष्ट रूप से नहीं समझा दिया गया है? और क्या तुम लोगों ने इस मामले से कुछ सत्यों को समझा है? यदि भविष्य में तुम फिर से इस तरह के मामले का सामना करते हो, तो क्या तुम तब भी कहोगे कि यह दूसरों के लिए मिसाल कायम करने के लिए, और उन्हें दूसरों के लिए एक चेतावनी जैसा बनाने के लिए कठोर दंड देने का मामला है? ऐसा होने से पहले तुम लोगों को लगता था कि कोई भी परमेश्वर के साथ तुम्हारे रिश्ते को नहीं तोड़ सकता और तुम पहले से ही परमेश्वर के संगत हो। परंतु, इस मामले से सामना होने के बाद तुम्हारा छोटा आध्यात्मिक कद प्रकट हो गया। कौन-सा आध्यात्मिक कद? तुम सोचते थे कि तुम भारी बोझ उठा सकते हो और पीड़ा सह सकते हो, कि तुम्हारा संकल्प और आस्था पहले से अधिक हैं, और तुम जल्द ही पूर्ण बना दिए जाओगे; यह वह गलत समझ थी जो तुमने अपने दिल में पाल रखी थी। और अब तुम क्या सोचते हो? तुम्हारी सोच थोड़ी कच्ची थी! मुझे देखो : मैं बाहर से ऐसा दिखता हूँ, मुझे छुआ और देखा जा सकता है—क्या मेरे व्यक्तित्व को खुला और स्पष्ट माना जा सकता है? मेरे व्यक्तित्व से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि मैं ऐसा व्यक्ति नहीं हूँ जो किसी समस्या के उत्पन्न होने पर तुमसे गोपनीयता बरतता हो और तुम्हें कुछ नहीं बताता हो, जो चुपचाप कार्रवाई करता हो और फिर तुम लोगों को अपने इरादों के बारे में अनुमान लगाने के लिए छोड़ देता हो। मैं उस तरह का व्यक्ति नहीं हूँ। चाहे कोई भी समस्या उत्पन्न हो, मैं हमेशा तुम लोगों को उसे स्पष्ट रूप से समझाता हूँ, फिर भी, तुम लोग सारांश में ऐसे मत व्यक्त करते और कहते हो कि, “यह परमेश्वर के बारे में मेरी सर्वोच्च समझ है।” इस समझ के बारे में तुम क्या सोचते हो? तुम अब एक सबक पा गए हो, है न? क्या यह नहीं कहा जा सकता है कि परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ के संबंध में यह तुम लोगों की सबसे बड़ी विफलता रही है? तुम लोग मेरे बोले शब्दों को सुन सकते हो और मेरा चेहरा-मोहरा देख सकते हो, और मैं मांस और रक्त से बना व्यक्ति हूँ जिसे छुआ और देखा जा सकता है। मैंने वह कार्रवाई की और तुम लोगों में से कोई भी उसे समझ नहीं पाया, और हम आम सहमति तक नहीं पहुँच पाए—हमारे बीच थोड़ी-सी भी मौन समझ नहीं थी। तुम परमेश्वर से बहुत दूर हो! तुम लोग अभी भी परमेश्वर को समझने से बहुत दूर हो! ये सत्य वचन हैं; यही वास्तविक स्थिति है। यह मत सोचो कि तुम लोग अपना थोड़ा-बहुत कर्तव्य कर सकते हो, कई वर्षों से परमेश्वर पर विश्वास कर रहे हो, और कुछ धर्म-सिद्धांतों के बारे में बात कर सकते हो सिर्फ इसलिए तुम लोग परमेश्वर को समझते हो। मैं तुम लोगों को बता दूँ कि तुम्हारी सोच अधकचरी है! यह मत सोचो कि तुम लोग वास्तव में एक-दो बातें जानते हो। वास्तव में, तुम लोग अभी भी परमेश्वर को समझने से बहुत दूर हो; तुमने इस समझ के किनारे को भी नहीं छुआ है। लोगों को किसी भी मामले में प्रकट किया जा सकता है, और कनाडा की कलीसिया के इस मामले से निपटने के क्रम में कुछ लोग प्रकट हुए हैं। लोगों को निरंतर विकसित होना चाहिए, और परमेश्वर के कृत्यों और स्वभाव के बारे में जानने के क्रम में विभिन्न परिस्थितियों और घटनाओं के माध्यम से स्वयं को और परमेश्वर को लगातार समझना चाहिए, अपनी विद्रोहशीलता को समझना चाहिए, परमेश्वर के साथ अपने संबंध को सटीक रूप से समझना चाहिए, और स्पष्ट रूप से देखना चाहिए कि सत्य के बारे में उनकी समझ और ज्ञान, तथा परमेश्वर के बारे में उनकी समझ किस स्तर पर है। इन मामलों के माध्यम से, तुम्हारा सच्चा आध्यात्मिक कद और सच्ची मनोदशा मापी जाएगी। क्या तुम लोगों ने इस बार कोई सबक सीखा है? कोशिश करो कि अगली बार तुम्हारी समझ ऐसी न हो। यह बहुत पीड़ादायक है, यह सब अविश्वसनीय है! क्या तुम लोग सोचते हो कि इस मामले को समझाने में इतना लंबा समय लगाना उचित था? इसकी आवश्यकता नहीं होनी चाहिए थी। मैं क्यों कहता हूँ कि इसकी आवश्यकता नहीं होनी चाहिए थी? तुम लोगों ने जो वचन और धर्म-सिद्धांत समझे हैं, उनके अनुसार इस पर स्वयं चिंतन करके, और सभी के साथ मिलकर इस पर संगति करके, तुम लोगों को इस मामले की बाधाओं को पार कर लेना चाहिए था; तुम लोगों को इसे अपेक्षाकृत शुद्ध तरीके से समझने में सक्षम होना चाहिए था और तुम्हारी समझ इतनी चरम सीमा तक नहीं जानी चाहिए थी। लेकिन, जैसा कि सामने है, तुम लोगों की चरम समझ उभर आई है जिससे मेरे लिए कुछ विवरणों पर संगति करना आवश्यक हो गया है। क्या इस संगति को सुनने के बाद अब तुम्हारे दिल उज्ज्वल नहीं हुए? तुम लोगों का अब इस मामले में कोई और विचार नहीं होना चाहिए, है न? तो, क्या जिस तरह से मैं उन लोगों से निपटा, उसे तुम लोग अतिवादी मानते हो? (नहीं।) आओ, इस मामले पर चर्चा यहीं समाप्त करें, और मैं मुख्य विषय पर संगति शुरू करूँ।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?