पवित्र आत्मा के कार्य को कोई कैसे प्राप्त कर सकता है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

पवित्र आत्मा का कार्य दिन ब दिन बदलता जाता है, हर एक कदम के साथ ऊँचा उठता जाता है; आने वाले कल का प्रकाशन आज से भी कहीं ज़्यादा ऊँचा होता है, कदम दर कदम और ऊपर चढ़ता जाता है। जिस कार्य के द्वारा परमेश्वर मनुष्य को सिद्ध करता है वह ऐसा ही है। यदि मनुष्य उस गति से चल न पाए, तो उसे किसी भी समय पीछे छोड़ा जा सकता है। यदि मनुष्य के पास आज्ञाकारी हृदय न हो, तो वह अंत तक अनुसरण नहीं कर सकता है। पूर्व का युग गुज़र गया है; यह एक नया युग है। और नए युग में, नया कार्य करना होगा। विशेषकर अंतिम युग में जिसमें मनुष्य को सिद्ध किया जाएगा, परमेश्वर पहले से ज़्यादा तेजी से नया कार्य करेगा। इसलिए, अपने हृदय में आज्ञाकारिता को धारण किए बिना, मनुष्य के लिए परमेश्वर के पदचिह्नों का अनुसरण करना कठिन होगा। परमेश्वर किसी भी नियम का पालन नहीं करता है, न ही वह अपने कार्य के किसी स्तर को अपरिवर्तनीय मानता है। बल्कि, वह जिस कार्य को करता है वह हमेशा नया और हमेशा ऊँचा होता है। उसका कार्य हर एक कदम के साथ और भी अधिक व्यावहारिक होता जाता है, और मनुष्य की वास्तविक ज़रूरतों के और भी अधिक अनुरूप होता जाता है। जब मनुष्य इस प्रकार के कार्य का अनुभव करता है केवल तभी वह अपने स्वभाव के अंतिम रूपान्तरण को हासिल कर पाता है। जीवन के बारे में मनुष्य का ज्ञान और सर्वाधिक उच्च स्तरों तक पहुँच जाता है, इसलिए इसी तरह से परमेश्वर का कार्य भी सर्वाधिक उच्च स्तरों तक पहुँच जाता है। केवल इसी तरह से मनुष्य को सिद्ध बनाया जा सकता है और वह परमेश्वर के उपयोग के योग्य हो सकता है। परमेश्वर एक ओर, मनुष्य की अवधारणाओं का सामना करने और उन्हें उलटने के लिए, और दूसरी ओर, उच्चतर तथा और अधिक वास्तविक स्थिति में, परमेश्वर पर विश्वास करने के उच्चतम आयाम में मनुष्य की अगुवाई करने के लिए, इस तरह से कार्य करता है, ताकि अंत में, परमेश्वर की इच्छा पूरी हो सके। वे सभी जो अवज्ञाकारी प्रकृति के हैं जो जानबूझ कर विरोध करते हैं उन्हें परमेश्वर के द्रुतगामी और प्रचंडता से आगे बढ़ते हुए कार्य के इस चरण द्वारा पीछे छोड़ दिया जाएगा; केवल जो स्वेच्छा से आज्ञापालन करते हैं और जो अपने आप को प्रसन्नतापूर्वक दीन बनाते हैं वे ही मार्ग के अंत तक प्रगति कर सकते हैं। इस प्रकार के कार्य में, तुम सभी लोगों को सीखना चाहिए कि समर्पण कैसे करें और अपनी अवधारणाओं को कैसे अलग रखें। तुम लोगों को उस हर कदम पर सतर्क रहना चाहिए जो तुम उठाते हो। यदि तुम लोग लापरवाह हो, तो तुम लोग निश्चित रूप से उनमें से एक बन जाओगे जिसे पवित्र आत्मा द्वारा ठुकराया जाता है, और एक ऐसे व्यक्ति बन जाओगे जो परमेश्वर के कार्य में उसे बाधित करता है। ... परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य अलग-अलग अवधियों में भिन्न होता है। यदि तुम एक चरण में बड़ी आज्ञाकारिता दिखाते हो, मगर अगले चरण में कम दिखाते हो या कुछ भी नहीं दिखाते हो, तो परमेश्वर तुम्हें त्याग देगा। जब परमेश्वर यह कदम उठाता है तब यदि तुम परमेश्वर के साथ समान गति से चलते हो, तो जब वह अगला कदम उठाता है तब तुम्हें समान गति से अवश्य चलते रहना चाहिए। केवल तभी तुम ऐसे एक हो जो पवित्र आत्मा के प्रति आज्ञाकारी है। चूँकि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें अपनी आज्ञाकारिता में अचल अवश्य बने रहना चाहिए। तुम यूँ ही जब अच्छा लगे तभी आज्ञा नहीं मान सकते हो और जब अच्छा न लगे तब अवज्ञा नहीं कर सकते हो। इस प्रकार की अवज्ञा को परमेश्वर का अनुमोदन नहीं मिलता है। यदि तुम उस नए कार्य के साथ तालमेल नहीं बनाए रख सकते हो, जिसके बारे में मैं संगति करता हूँ, और पूर्व की बातों को लगातार धारण नहीं कर सकते हो, तो तुम्हारे जीवन में प्रगति कैसे हो सकती है? परमेश्वर का कार्य, अपने वचनों के माध्यम से तुम्हारा भरण-पोषण करना है। जब तुम उसके वचनों का पालन करते हो और उन्हें स्वीकार करते हो, तब पवित्र आत्मा निश्चित रूप से तुम में कार्य करेगा। पवित्र आत्मा बिलकुल उसी तरह कार्य करता है जिस तरह से मैं कहता हूँ। जैसा मैंने कहा है वैसा ही करो, और पवित्र आत्मा शीघ्रता से तुम में कार्य करेगा। मैं तुम लोगों के देखने के लिए और तुम लोगों को वर्तमान समय के प्रकाश में लाने के लिए एक नया प्रकाश छोड़ता हूँ। जब तुम इस प्रकाश में चलोगे, तो पवित्र आत्मा तुरन्त ही तुम में कार्य करेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के आज्ञाकारी हैंवे निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाएँगे' से उद्धृत

इस वक्त पवित्र आत्मा जिस मार्ग को अपनाता है वह परमेश्वर के मौजूदा वचन हैं। अतः अगर लोग पवित्र आत्मा के मार्ग पर चलने के इच्छुक हैं, तो उन्हें देहधारी परमेश्वर के मौजूदा वचनों का पालन करना चाहिए, और उन्हें खाना तथा पीना चाहिए। जो कार्य वह करता है वो वचनों का कार्य है, सब कुछ उसके वचनों से शुरू होता है, और सब कुछ उसके वचनों, उसके मौजूदा वचनों, पर स्थापित होता है। चाहे बात परमेश्वर के देहधारण के बारे में निश्चित होने की हो या उसे जानने की, हरेक के लिए उसके वचनों पर अधिक समय देने की आवश्यकता है। अन्यथा लोग कुछ प्राप्त नहीं कर पाएंगे और उनके पास कुछ शेष नहीं रहेगा। सिर्फ परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के परिणामस्वरूप उसे जानने और संतुष्ट करने के आधार पर ही लोग धीरे-धीरे उसके साथ उचित संबंध स्थापित कर सकते हैं। मनुष्य के लिए, परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना तथा उन्हें अभ्यास में लाना ही परमेश्वर के साथ श्रेष्ठ सहयोग है। ऐसे अभ्यास के द्वारा वे परमेश्वर के जन होने की अपनी गवाही में मजबूत खड़े रह पाएंगे। जब लोग परमेश्वर के मौजूदा वचनों को समझते हैं और उसके सार का पालन करने में सक्षम होते हैं, तो वे पवित्र आत्मा द्वारा मार्गदर्शन किए जाने के पथ पर जीते हैं और वह परमेश्वर द्वारा मनुष्य को सिद्ध करने के सही मार्ग में प्रवेश कर चुके हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिनके स्वभाव परिवर्तित हो चुके हैं,वे वही लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके हैं' से उद्धृत

परमेश्वर द्वारा लोगों से माँग किया जाने वाला सबसे निम्नतम स्तर यह है कि वे अपने हृदयों को परमेश्वर के प्रति खोल सकें। यदि मनुष्य अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को दे दे और परमेश्वर से वह कहे जो वास्तव में उसके हृदय में परमेश्वर के लिए है, तो परमेश्वर मनुष्य में कार्य करने के लिए तैयार है; परमेश्वर मनुष्य का विकृत हृदय नहीं चाहता, बल्कि उसका शुद्ध और खरा हृदय चाहता है। यदि मनुष्य सच्चाई के साथ परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय से नहीं बोलता है, तो परमेश्वर मनुष्य के हृदय को स्पर्श नहीं करता या उसके भीतर कार्य नहीं करता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'प्रार्थना की क्रिया के विषय में' से उद्धृत

लोग अपने हृदय से परमेश्वर की आत्मा को स्पर्श करके परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, उससे प्रेम करते हैं और उसे संतुष्ट करते हैं, और इस प्रकार वे परमेश्वर की संतुष्टि प्राप्त करते हैं; परमेश्वर के वचनों से जुड़ने के लिए वे अपने हृदय का उपयोग करते हैं और इस प्रकार वे परमेश्वर के आत्मा द्वारा प्रेरित किए जाते हैं। यदि तुम एक उचित आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करना चाहते हो और परमेश्वर के साथ उचित संबंध स्थापित करना चाहते हो, तो तुम्हें पहले उसे अपना हृदय अर्पित करना चाहिए। अपने हृदय को उसके सामने शांत करने और अपने पूरे हृदय को उस पर उँड़ेलने के बाद ही तुम धीरे-धीरे एक उचित आध्यात्मिक जीवन विकसित करने में सक्षम होगे। यदि परमेश्वर पर अपने विश्वास में लोग परमेश्वर को अपना हृदय अर्पित नहीं करते और यदि उनका हृदय उसमें नहीं है और वे उसके दायित्व को अपना दायित्व नहीं मानते, तो जो कुछ भी वे करते हैं, वह परमेश्वर को धोखा देने का कार्य है, जो धार्मिक व्यक्तियों का ठेठ व्यवहार है, और वे परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त नहीं कर सकते। परमेश्वर इस तरह के व्यक्ति से कुछ हासिल नहीं कर सकता; इस तरह का व्यक्ति परमेश्वर के काम में केवल एक विषमता का कार्य कर सकता है, परमेश्वर के घर में सजावट की तरह, फालतू और बेकार। परमेश्वर इस तरह के व्यक्ति का कोई उपयोग नहीं करता। ऐसे व्यक्ति में न केवल पवित्र आत्मा के काम के लिए कोई अवसर नहीं है, बल्कि उसे पूर्ण किए जाने का भी कोई मूल्य नहीं है। इस प्रकार का व्यक्ति, सच में, एक चलती-फिरती लाश की तरह है। ऐसे व्यक्तियों में ऐसा कुछ नहीं है, जिसका पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया जा सके, बल्कि इसके विपरीत, उन सभी को शैतान द्वारा हड़पा और गहरा भ्रष्ट किया जा चुका है। परमेश्वर इन लोगों को हटा देगा। वर्तमान में, लोगों का इस्तेमाल करते हुए पवित्र आत्मा न सिर्फ़ उनके उन हिस्सों का उपयोग करता है, जो काम करने के लिए वांछित हैं, बल्कि वह उनके अवांछित हिस्सों को भी पूर्ण करता और बदलता है। यदि तुम्हारा हृदय परमेश्वर में उँड़ेला जा सकता है और उसके सामने शांत रह सकता है, तो तुम्हारे पास पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए जाने, और पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त करने का अवसर और योग्यता होगी, और इससे भी बढ़कर, तुम्हारे पास पवित्र आत्मा द्वारा तुम्हारी कमियाँ दूर किए जाने का अवसर होगा। जब तुम अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करते हो, तो सकारात्मक पहलू में, तुम अधिक गहन प्रवेश प्राप्त कर सकोगे और अंतर्दृष्टि का एक उच्च तल हासिल कर सकोगे; और नकारात्मक पहलू में, तुम अपनी गलतियों और कमियों की अधिक समझ प्राप्त कर सकोगे, तुम परमेश्वर की इच्छा की पूर्ति करने के लिए ज़्यादा उत्सुक होगे, और तुम निष्क्रिय नहीं रहोगे, बल्कि सक्रिय रूप से प्रवेश करोगे। इस प्रकार, तुम एक सही व्यक्ति बन जाओगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के साथउचित संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है' से उद्धृत

पवित्र आत्मा इस सिद्धांत के अनुसार काम करता है: लोगों के सहयोग के माध्यम से, उनके परमेश्वर की सक्रियता से प्रार्थना करने, परमेश्वर को खोजने एवं उसके करीब आने के माध्यम से, परिणामों को प्राप्त किया जा सकता है और पवित्र आत्मा द्वारा उन्हें प्रबुद्ध और रोशन किया जा सकता है। यह ऐसा मामला नहीं है कि पवित्र आत्मा एकतरफ़ा कार्य करता है, या कि मनुष्य एकतरफ़ा कार्य करता है। दोनों ही अपरिहार्य हैं, और लोग जितना अधिक सहयोग करते हैं, और वे जितना अधिक परमेश्वर की अपेक्षाओं के मानकों को प्राप्त करने की खोज करते हैं, पवित्र आत्मा का कार्य उतना ही अधिक विशाल होता है। पवित्र आत्मा के कार्य के साथ जोड़ा गया केवल लोगों का वास्तविक सहयोग ही, परमेश्वर के वचनों के वास्तविक अनुभवों एवं सारभूत ज्ञान को उत्पन्न कर सकता है। धीरे-धीरे, इस तरीके से अनुभव करने के माध्यम से, अंततः एक पूर्ण व्यक्ति बनता है। परमेश्वर अलौकिक चीज़ें नहीं करता है; लोगों की धारणाओं में, परमेश्वर सर्वशक्तिमान है, और सब कुछ परमेश्वर के द्वारा किया जाता है—परिणामस्वरूप लोग निष्क्रियता से प्रतीक्षा करते हैं, परमेश्वर के वचनों को नहीं पढ़ते हैं या प्रार्थना नहीं करते हैं, और मात्र पवित्र आत्मा के स्पर्श की प्रतीक्षा करते हैं। हालाँकि, जिनके पास सही समझ है, वे यह विश्वास करते हैं कि: परमेश्वर के कार्यकलाप केवल वहाँ तक जा सकते हैं जहाँ तक मेरा सहयोग होता है, और मुझ पर परमेश्वर के कार्य का जो प्रभाव पड़ता है वह इस बात पर निर्भर करता है कि मैं किस प्रकार सहयोग करता हूँ। जब परमेश्वर बोलता है, तो परमेश्वर के वचनों को ढूँढ़ने और उनकी ओर प्रयत्न करने के लिए मुझे वह सब करना चाहिए जो मैं कर सकता हूँ; यही है वह जो मुझे प्राप्त करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वास्तविकता को कैसे जानें' से उद्धृत

अनुभव से यह देखा जा सकता है कि सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक, परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत करना है। यह एक ऐसा मुद्दा है, जो लोगों के आध्यात्मिक जीवन से, और उनके जीवन में उनके विकास से संबंधित है। जब तुम्हारा हृदय परमेश्वर के सामने शांत रहेगा, केवल तभी सत्य की तुम्हारी खोज और तुम्हारे स्वभाव में आए परिवर्तन सफल होंगे। चूँकि तुम परमेश्वर के सामने बोझ से दबे हुए आते हो, और चूँकि तुम हमेशा महसूस करते हो कि तुममें कई तरह की कमियाँ हैं, कि ऐसे कई सत्य हैं जिन्हें जानना तुम्हारे लिए जरूरी है, तुम्हें बहुत सारी वास्तविकता का अनुभव करने की आवश्यकता है, और कि तुम्हें परमेश्वर की इच्छा का पूरा ध्यान रखना चाहिए—ये बातें हमेशा तुम्हारे दिमाग़ में रहती हैं। ऐसा लगता है, मानो वे तुम पर इतना ज़ोर से दबाव डाल रही हों कि तुम्हारे लिए साँस लेना मुश्किल हो गया हो, और इस प्रकार तुम्हारा हृदय भारी-भारी महसूस करता हो (हालाँकि तुम नकारात्मक स्थिति में नहीं होते)। केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के वचनों की प्रबुद्धता स्वीकार करने और परमेश्वर के आत्मा द्वारा प्रेरित किए जाने के योग्य हैं। यह उनके बोझ के कारण है, क्योंकि उनका हृदय भारी-भारी महसूस करता है, और, यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर के सामने जो कीमत वे अदा कर चुके हैं और जो पीड़ा उन्होंने झेली है, उसके कारण वे उसकी प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त करते हैं, क्योंकि परमेश्वर किसी के साथ विशेष व्यवहार नहीं करता। लोगों के प्रति अपने व्यवहार में वह हमेशा निष्पक्ष रहता है, लेकिन वह लोगों को मनमाने ढंग से और बिना किसी शर्त के भी नहीं देता। यह उसके धर्मी स्वभाव का एक पहलू है। वास्तविक जीवन में, अधिकांश लोगों को अभी इस क्षेत्र को हासिल करना बाक़ी है। कम से कम, उनका हृदय अभी भी पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मुड़ना बाक़ी है, और इसलिए उनके जीवन-स्वभाव में अभी भी कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आया है। इसका कारण यह है कि वे केवल परमेश्वर के अनुग्रह में रहते हैं और उन्हें अभी भी पवित्र आत्मा का कार्य हासिल करना शेष है। परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने के लिए लोगों को जो मानदंड पूरे करने चाहिए, वे इस प्रकार हैं : उनका हृदय परमेश्वर की ओर मुड़ जाता है, वे परमेश्वर के वचनों का दायित्व उठाते हैं, उनके पास तड़पता हुआ हृदय और सत्य को तलाशने का संकल्प होता है। केवल ऐसे लोग ही पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त कर सकते हैं और वे अकसर प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के साथउचित संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है' से उद्धृत

लोगों के भीतर पवित्र आत्मा के कार्य करने की एक शर्त है। उनमें प्यास होनी चाहिए और उन्हें खोज करनी चाहिए तथा उन्हें परमेश्वर के कार्यकलापों के बारे में आधे-अधूरे मन वाले या संशययुक्त नहीं होना चाहिए, और उन्हें हर समय अपना कर्तव्य निभाने में सक्षम होना चाहिए; केवल इसी तरह से वे पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकते हैं। परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण में मानवजाति से जो अपेक्षित है, वह है आसाधारण आत्मविश्वास और खोजने के लिए परमेश्वर के सामने आना—केवल अनुभव के माध्यम से ही लोग यह पता कर सकते हैं कि परमेश्वर कितना प्यारा है और पवित्र आत्मा लोगों में कैसे कार्य करता है। यदि तुम अनुभव नहीं करते, यदि तुम उसके माध्यम से अपना रास्ता महसूस नहीं करते, यदि तुम तलाश नहीं करते, तो तुम्हें कुछ प्राप्त नहीं होगा। तुम्हें अपने अनुभवों के माध्यम से अपना रास्ता महसूस करना चाहिए, और केवल अपने अनुभवों के माध्यम से ही तुम परमेश्वर के कार्यों को देख सकते हो और यह पहचान सकते हो कि वह कितना चमत्कारी और अथाह है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति बनाए रखनी चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर द्वारा लोगों को पूर्ण किए जाने के लिए एक नियम है, जो यह है कि वह तुम्हारे योग्य भाग का प्रयोग करके तुम्हें प्रबुद्ध करता है, जिससे तुम्हारे पास अभ्यास करने के लिए एक मार्ग हो और तुम समस्त नकारात्मक अवस्थाओं से खुद को अलग कर सको, तुम्हारी आत्मा को स्वतन्त्रता प्राप्त करने में सहायता करता है, और तुम्हें उससे प्रेम करने के और योग्य बनाता है। इस रीति से तुम शैतान के भ्रष्ट स्वभाव को उतार फेंकने के योग्य हो जाते हो। तुम सरल और उदार, स्वयं को जानने और सत्य का अभ्यास करने के इच्छुक हो। परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हें आशीष देगा, अतः जब तुम दुर्बल और नकारात्मक होते हो, वह दोहरे रूप से तुम्हें प्रबुद्ध करता है, स्वयं को और अधिक जानने में तुम्हारी सहायता करता है, स्वयं के लिए पश्चाताप करने के और अधिक इच्छुक होने, और उन बातों का अभ्यास करने के योग्य करता है, जिन बातों का अभ्यास तुम्हें करना चाहिए। मात्र इसी रीति से तुम्हारा हृदय शांतिपूर्ण और सहज होता है। एक व्यक्ति, जो साधारणतः परमेश्वर और स्वयं को जानने और अपने अभ्यास पर ध्यान देता है, वही परमेश्वर के कार्य को निरन्तर प्राप्त करने और परमेश्वर से निरन्तर मार्गदर्शन और प्रबुद्धता प्राप्त करने के योग्य होगा। एक नकारात्मक अवस्था में होने पर भी, ऐसा व्यक्ति विवेक के कार्य से या परमेश्वर के वचन से प्रबुद्धता द्वारा तुरन्त कायापलट करने के योग्य हो जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मात्र उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता हैजो अभ्यास पर ध्यान देते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर उसमें कार्य करता है जो परमेश्वर के वचनों को संजोते और उसका अनुसरण करते हैं। जितना तू परमेश्वर के वचनों को संजोयेगा, उतना ही उसका आत्मा तुझमें कार्य करेगा। कोई व्यक्ति परमेश्वर के वचन को जितना ज्यादा संजोता है, उसका परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने का मौका उतना ही ज्यादा होता है। परमेश्वर उसे पूर्ण बनाता है, जो वास्तव में उससे प्यार करता है। वह उसको पूर्ण बनाता है, जिसका हृदय उसके सम्मुख शांत रहता है। परमेश्वर के सभी कार्य को संजोना, उसकी प्रबुद्धता को संजोना, परमेश्वर की उपस्थिति को संजोना, परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा को संजोना, इस बात को संजोना कि कैसे परमेश्वर के वचन तेरे जीवन की वास्तविकता बन जाते हैं और तेरे जीवन की आपूर्ति करते हैं—यह सब परमेश्वर के दिल के सबसे अनुरूप है। यदि तू परमेश्वर के कार्य को संजोता है, अर्थात यदि उसने तुझ पर जो सारे कार्य किए हैं, तू उसे संजोता है, तो वह तुझे आशीष देगा और जो कुछ तेरा है उसे बहुगुणित करेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर उन्हें पूर्ण बनाता है, जो उसके हृदय के अनुसार हैं' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

पवित्र आत्मा मसीह के वचनों के अनुसार कार्य करता है, और वह लोगों की मसीह के प्रति स्वीकृति और उनके समर्पण के अनुसार भी काम करता है। केवल अगर लोग मसीह को स्वीकार करते हैं और मसीह को समर्पित होते हैं, तभी वे पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकते हैं। यदि लोग मसीह के विरुद्ध चलते हैं या उसके खिलाफ़ विद्रोह करते हैं, तो उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होगा। किसी व्यक्ति का परमेश्वर में विश्वास उसे उद्धार देगा या नहीं, इसका निर्णय इस बात से होता है कि वह मसीह को सचमुच स्वीकार कर उसके प्रति समर्पित हो सकता है या नहीं। पवित्र आत्मा का कार्य पूरी तरह से मसीह के प्रति किसी व्यक्ति की स्वीकृति और समर्पण पर आधारित होता है। अनुग्रह के युग में, पवित्र आत्मा का कार्य लोगों द्वारा प्रभु यीशु को स्वीकार करने, उसके प्रति समर्पित होने और उसकी आराधना करने के अनुसार पूरा किया गया था। राज्य के युग में, पवित्र आत्मा का कार्य लोगों द्वारा सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार करने, उसके प्रति समर्पित होने और उसकी आराधना करने के अनुसार किया जाता है। पवित्र आत्मा सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों के मुताबिक भी कार्य करता है, ताकि विश्वासियों को परमेश्वर के वचनों में लाया जा सके और उन्हें उद्धार और पूर्णता तक पहुँचाया जा सके। यही पवित्र आत्मा के कार्य का आधार और सिद्धांत है। कई धार्मिक अगुवाओं ने मसीह का विरोध या निंदा करने की सज़ा के रूप में मृत्यु पाई है। बहुत से धार्मिक लोगों ने अंत के दिनों के मसीह को अस्वीकार करने की वजह से, अंधेरों में गिरकर पवित्र आत्मा के कार्य को खो दिया है। परमेश्वर के घर में, मसीह के बारे में अपनी दुराग्रही धारणाओं के कारण बहुत से लोगों के जीवन मुरझा गए हैं और उन्होंने हार मान ली है, और कई अन्य लोगों को पवित्र आत्मा के कार्य से इसलिए बाहर रखा गया है कि वे केवल परमेश्वर के आत्मा में विश्वास करते हैं, मसीह में नहीं। ये सभी बातें लोगों द्वारा मसीह को अस्वीकार करने या उसके प्रति समर्पण न करने के कारण होती हैं। किसी विश्वासी के पास पवित्र आत्मा का कार्य है या नहीं, यह पूरी तरह से मसीह के प्रति उसके दृष्टिकोण से तय होता है। यदि कोई व्यक्ति केवल स्वर्ग के परमेश्वर में विश्वास करता है, और मसीह के प्रति समर्पित नहीं होता है, तो वह पवित्र आत्मा के कार्य को कभी भी प्राप्त नहीं करेगा। अभी भी विभिन्न कलीसियाओं में कई लोग ऐसे हैं जो केवल परमेश्वर के आत्मा में विश्वास करते हैं, लेकिन मसीह में विश्वास नहीं करते हैं, और इस तरह वे पवित्र आत्मा का कार्य खो देते हैं। कई लोग ऐसे हैं जो केवल मसीह के वचनों में विश्वास करते हैं, लेकिन मसीह के प्रति समर्पित नहीं होते हैं, और इसलिए वे परमेश्वर की नाराज़गी के पात्र होते हैं। इसलिए, मसीह को स्वीकार करना और मसीह के प्रति समर्पित होना पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने की कुंजी है। केवल जब कोई मसीह को स्वीकार करेगा और मसीह के प्रति समर्पित होगा, तभी वह उद्धार प्राप्त करेगा और पूर्ण किया जाएगा। स्पष्ट है कि प्रत्येक युग में पवित्र आत्मा के प्रत्येक कार्य का अपना एक आधार और सिद्धांत होता है। कौन जानता है कि कितने लोग अभी भी मसीह के प्रति समर्पित होने के महत्व को नहीं समझते हैं। पवित्र आत्मा पूरी तरह से मसीह के वचनों के अनुसार कार्य करता है। अगर लोग मसीह के वचनों को स्वीकार नहीं कर सकते, और उनके बारे में धारणाएँ बनाए रखते हैं और उनका विरोध करते हैं, तो वे पवित्र आत्मा का कार्य बिलकुल ही प्राप्त नहीं कर सकते। बहुत से लोग केवल सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम से प्रार्थना करते हैं, लेकिन मसीह के कार्य के प्रति समर्पित नहीं होते हैं, और पूरी तरह से मसीह के वचनों को स्वीकार नहीं करते हैं। इस तरह के लोग मसीह-विरोधी हैं, और वे पवित्र आत्मा का कार्य बिल्कुल ही प्राप्त नहीं कर सकते हैं।

— ऊपर से संगति से उद्धृत

पवित्र आत्मा का कार्य मुख्य रूप से लोगों को परमेश्वर के वचन में प्रवेश करने में और सत्य को समझने में मार्गदर्शन देना है। परमेश्वर के वचन में प्रवेश करने में कौन से पहलू शामिल हैं? परमेश्वर के वचन में प्रवेश करने का अर्थ यह नहीं है कि कोई व्यक्ति परमेश्वर के एक वाक्य विशेष को पढ़ता है, इस पर थोड़ा-सा चिंतन करता है और फिर उसे कुछ समझ हो जाती है। यह परमेश्वर के वचन में प्रवेश करने के समकक्ष नहीं है। यह एक पूरी तरह से अलग बात है। अनुभव के माध्यम से परमेश्वर के वचन में प्रवेश करना सबसे महत्वपूर्ण बात है। इस "अनुभव" में अनुभवों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है। यह मनुष्य के अनुभव का सिर्फ एक पहलू नहीं है। इस अनुभव के कई पहलू हैं। अपने कर्तव्य को पूरा करना भी परमेश्वर के वचन का अनुभव करना है। सत्य को अभ्यास में लाना भी परमेश्वर के वचन का अनुभव करना है। विशेष रूप से, विभिन्न प्रकार के परीक्षणों और शुद्धिकरण से गुज़रना परमेश्वर के वचन का और भी अधिक अनुभव करना है। चाहे संदर्भ या परिस्थिति कोई भी हो, जब तक तुम परमेश्वर के वचन का अनुभव करते हो, तब तक तुम पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने में सक्षम होगे। उदाहरण के लिए, जब हम परीक्षणों का सामना करते हैं, तो हम परमेश्वर के इरादों की खोज करने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं। परिणामस्वरूप, पवित्र आत्मा हमें प्रबुद्ध करता है ताकि हम परमेश्वर के इरादों को समझ सकें। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह परमेश्वर के वचन में प्रवेश करने से संबंधित है। ... इसके अतिरिक्त, हमारे कर्तव्यों को पूरा करने की प्रक्रिया में, और हमारे रोजमर्रा के जीवन के अनुभवों के भीतर, परिस्थिति चाहे कैसी भी हो, जब तक हम सत्य की तलाश करते हैं, जब तक हम परमेश्वर के इरादों की खोज करते हैं और परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं, तब तक हम पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने में सक्षम होंगे। इसका कारण यह है परमेश्वर के वचन और सत्य में प्रवेश करने में हमारा मार्गदर्शन करने के लिए यहाँ पवित्र आत्मा है। जब इस पहलू की बात आती है, तो ऐसे कुछ लोग हैं जिनके पास बहुत अनुभव है। चाहे वे किसी भी परिस्थिति का सामना करें, वे परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं। चाहे वे किसी भी तरह के लोगों से मिलें, वे परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं और परमेश्वर से उनको प्रबुद्ध करने और उन्हें बुद्धि और समझ देने के लिए आग्रह करते हैं। वे परमेश्वर से उनका मार्गदर्शन करने के लिए कहते हैं। जब तक लोग इस तरह से परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हैं, तब तक वे परमेश्वर के बहुत सारे वचनों को समझेंगे। वे जान लेंगे कि एक ठोस, विशेष परिस्थिति में उन्हें कैसे अभ्यास करना चाहिए। उन्हें पता चल जाएगा कि इसे कैसे अच्छे उपयोग में लाया जाए। यही परमेश्वर के वचन में प्रवेश करने का तरीका है।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

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