मद नौ : वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते और वे व्यक्तिगत यश के बदले उन हितों के साथ विश्वासघात तक कर देते हैं (भाग छह) खंड तीन

परमेश्वर ने अंत के दिनों में बहुत सारा काम किया है और बहुत सारे वचन बोले हैं, लोगों ने इसका अनुभव किया है और परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण को अपनी आँखों से देखा है। चाहे इसे किसी भी परिप्रेक्ष्य से देखा जाए, यह निर्विवाद है कि परमेश्वर इतने सारे सत्य व्यक्त करता है और इतने सारे लोगों को बचाता है और किसी को भी इस पर सवाल नहीं उठाना चाहिए। देहधारी परमेश्वर चाहे कितना भी साधारण और सामान्य क्यों न हो, वह चाहे मनुष्य को कितना भी कम ध्यान देने योग्य क्यों न लगे, लोगों को अभी भी उसके वचनों को सत्य के रूप में स्वीकारना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं, “चूँकि देहधारी परमेश्वर इतना महत्वहीन और इतना साधारण है और बिल्कुल भी महान नहीं है, तो हम उसकी प्रशंसा कैसे कर सकते हैं? क्या ऐसा साधारण शरीर कोई महान कार्य करने में सक्षम हो सकता है? क्या हम वास्तव में उससे महान आशीष प्राप्त कर सकते हैं? हमें नहीं पता; हम बस इतना कर सकते हैं कि उसके साथ एक साधारण व्यक्ति की तरह पेश आएँ।” दूसरे कहते हैं, “क्योंकि तुमने जो चीजें की हैं, उनमें से कुछ हमें आश्वस्त नहीं कर पाई हैं और कुछ चीजों ने हमारे अंदर धारणाएँ पैदा की हैं और कुछ चीजें हमारी समझ से परे हैं और क्योंकि तुम्हारे द्वारा कही गई कुछ बातें हमें स्वीकार नहीं हैं, तुम स्वर्ग के परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते—और इसलिए हमें तुमसे आखिर तक लड़ना होगा। अगर तुम हमें सुसमाचार का प्रचार करने के लिए कहोगे, तो हम यह नहीं करेंगे; अगर तुम हमें हमारा कर्तव्य निभाने के लिए कहोगे तो हम यह नहीं करेंगे; और अगर तुम हमें सत्य स्वीकारने के लिए कहोगे तो हम यह नहीं करेंगे। हम उस व्यक्ति से जो तुम हो, आखिर तक लड़ेंगे—देखते हैं कि तुम हमारा क्या कर सकते हो।” इन लोगों के हृदय में, जो सत्य को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करते हैं, परमेश्वर के कार्य को, उसके वचन सत्य हैं, इसे नकारने के और उसके देहधारी शरीर को नकारने के एक हजार—दस हजार—कारण हैं। लेकिन एक चीज है जो शायद उनके सामने इतनी स्पष्ट न हो : चाहे उनके पास कितने ही कारण क्यों न हों, अगर वे इन सत्यों को स्वीकार नहीं करते, तो उन्हें बचाया नहीं जाएगा। अगर तुम उस व्यक्ति को स्वीकार नहीं करते, जो मैं हूँ या परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण नहीं करते, तो कोई बात नहीं—मैं तुम्हें मजबूर नहीं करूँगा। लेकिन अगर तुम परमेश्वर के इन वचनों को सत्य नहीं मानते और इन्हें सत्य मानकर अभ्यास में नहीं लाते हो, तो मैं तुम्हें पूरी ईमानदारी से बता दूँ : तुम कभी भी बचाए नहीं जाओगे, न ही तुम कभी स्वर्ग के राज्य का द्वार पार करोगे। अगर तुम परमेश्वर के इन वचनों से, इन सत्यों से और कार्य करने वाले और मानवजाति को बचाने वाले इस मसीह से किनारा करते हो, तो तुम चाहे कितना ही धर्म-सिद्धांत क्यों न समझते हो या तुम कितनी ही बड़ी कठिनाइयाँ क्यों न सहते हो, तुम्हें सत्य प्राप्त नहीं होगा; तुम कचरे का एक टुकड़ा मात्र हो। तुम्हारा परमेश्वर में विश्वास रखने का कारण चाहे कुछ भी हो और अपना कर्तव्य निभाने में तुम्हारा लक्ष्य चाहे कुछ भी हो, तुम्हें बचाया नहीं जा सकता। और अगर तुम्हें बचाया नहीं जा सकता, तो तुम्हें क्या आशीष प्राप्त होंगे? कुछ लोग स्वर्ग के परमेश्वर से होड़ करते हैं, कुछ पृथ्वी के परमेश्वर से होड़ करते हैं, और परमेश्वर के वचनों और सत्य का प्रतिरोध करने का इस हद तक दुस्साहस करते हैं कि वे अपने परिणाम और मंजिल की भी परवाह नहीं करते। क्या यह नीचता नहीं है? ये पतित लोग बहुत दुष्ट हैं! इनमें से हर कोई बुरा इंसान है। ये सब छद्म-विश्वासी, अवसरवादी, निर्लज्ज लोग हैं और यही मसीह-विरोधियों का सार है।

मैंने अभी परमेश्वर के वचनों के प्रति मसीह-विरोधियों के रवैये पर संगति की। जब मसीह-विरोधी परमेश्वर के वचनों को देखते हैं तो वे अपने अंतरतम से सत्य या अभ्यास के सिद्धांतों की खोज नहीं करते। वे परमेश्वर के वचनों से यह समझने की कोशिश नहीं करते कि परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग कैसे प्राप्त किया जाए, और वे निश्चित रूप से परमेश्वर के इरादों को समझने की कोशिश नहीं करते, ताकि वे उसके इरादों को पूरा करने वाले व्यक्ति बन सकें। इसके बजाय, वे परमेश्वर के वचनों में अपनी वांछित मंजिल और साथ ही विभिन्न इच्छित लाभ पाना चाहते हैं, जिनमें यह भी शामिल है कि क्या वे आशीष प्राप्त कर सकते हैं और वे इस जीवन में अधिक अनुग्रह कैसे प्राप्त कर सकते हैं और क्या वे आने वाले संसार में सौ गुना अधिक प्राप्त कर सकते हैं, वगैरह। वे परमेश्वर के वचनों में इन्हीं चीजों को खोजते हैं। इसलिए, चाहे तुम इसे किसी भी परिप्रेक्ष्य से देखो, मसीह-विरोधी कभी भी परमेश्वर के वचनों को सत्य नहीं मानते, ना ही वे सोचते हैं कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं और मानवजाति को उन्हें स्वीकार करना चाहिए। परमेश्वर के वचनों के प्रति उनका रवैया यह है कि वे अपने वांछित आशीष और मंजिल प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के वचनों का उपयोग करना चाहते हैं। वे परमेश्वर के वचनों का उपयोग उन चीजों को प्राप्त करने के लिए एक स्प्रिंगबोर्ड के रूप में करना चाहते हैं जिनका वे अनुसरण करते हैं और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करना चाहते हैं। उनके अनुसरण, उनके द्वारा अपनाए गए मार्ग और परमेश्वर के वचनों के प्रति उनके रवैये के आधार पर, ये लोग छद्म-विश्वासियों का समूह, अवसरवादियों का समूह हैं। जब मसीह-विरोधी परमेश्वर के वचनों में अपने वांछित लाभ और मंजिल नहीं पा सकते हैं या जब परमेश्वर के वचनों का अध्ययन करने की प्रक्रिया में, संभावनाओं और नियति के बारे में परमेश्वर के वचन या मानवजाति से परमेश्वर के वादे उन्हें निराश करते हैं और उनकी इच्छाएँ संतुष्ट नहीं हो पाती हैं, तो वे अपने हाथों में थामे हुए परमेश्वर के वचनों को अभद्रता से और बिना किसी संकोच के किनारे कर देते हैं, वे परमेश्वर को छोड़ देते हैं और त्याग देते हैं और अपनी इच्छित जिंदगी का अनुसरण करते हैं। वे परमेश्वर का उद्धार स्वीकारने के लिए उसके सामने नहीं आते हैं। जब वे परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं तो वे उन्हें सत्य नहीं मानते हैं, इसके बजाय वे अपने व्यक्तिगत लक्ष्यों को प्राप्त करने और अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए परमेश्वर के वचनों का उपयोग करना चाहते हैं। इस प्रकार, वे अपने परिणाम और मंजिल के लिए बिना थके परमेश्वर के वचनों में खोजते हैं। वे खोजते हैं कि परमेश्वर आपदाओं के बारे में क्या कहता है, रहस्यों के बारे में उसके खुलासे क्या हैं, मानवजाति के विकास के बारे में उसके खुलासे क्या हैं, और उसके कार्य के बारे में परदे के पीछे की थोड़ी जानकारी पाना चाहते हैं। यही वह विषयवस्तु है जिसकी उन्हें परवाह है। वे इस दायरे से बाहर किसी भी चीज में कोई रुचि नहीं रखते हैं। वे अक्सर भ्रष्ट मानवजाति से परमेश्वर की कुछ अपेक्षाओं से नफरत और उनका विरोध भी करते हैं। वे परमेश्वर द्वारा भ्रष्ट मानवजाति को उजागर किए जाने के प्रति भी विमुख महसूस करते हैं। वे अक्सर परमेश्वर के वचनों में इस्तेमाल किए गए शब्दों और बोलने के लहजे में दोष ढूँढ़ते हैं और कुछ ऐसा खोजने की कोशिश करते हैं जिसका वे परमेश्वर के खिलाफ इस्तेमाल कर सकें। उदाहरण के लिए, जब परमेश्वर मानवजाति को “पतिता” और “वेश्या” के रूप में उजागर करता है तो वे कहते हैं : “ये परमेश्वर के वचन कैसे हो सकते हैं? परमेश्वर इस तरह नहीं बोलेगा! परमेश्वर को एक परिष्कृत, सौम्य और विचारशील तरीके से बोलना चाहिए।” जब परमेश्वर के कुछ ऐसे वचनों की बात आती है जो मानवीय धारणाओं के अनुरूप नहीं होते हैं, जो मानवीय व्याकरण के अनुरूप नहीं होते हैं और जो भ्रष्ट मनुष्यों के पारंपरिक तर्क के अनुरूप नहीं होते हैं तो वे सोचते हैं, “ये परमेश्वर के वचन नहीं हैं, परमेश्वर इस तरह तो नहीं बोलेगा! परमेश्वर इतना सर्वोच्च, महान और अथाह है, तो उसके वचन इतने साधारण कैसे हो सकते हैं? वे पारंपरिक तर्क से इतने अलग कैसे हो सकते हैं? अगर परमेश्वर के वचन सत्य हैं तो उन्हें इस तरह से बोला जाना चाहिए कि हर कोई उन्हें ऊँचा सम्मान दे, उनकी आराधना करे और उनकी प्रशंसा करे। वे सभी वचन अथाह होने चाहिए—परमेश्वर के वचन ऐसे ही होने चाहिए!” जब परमेश्वर के वचनों की बात आती है तो उनके मन में विभिन्न धारणाएँ, विभिन्न परिसीमाएँ और यहाँ तक कि विभिन्न अपेक्षाएँ भी होती हैं। उनकी अपेक्षाओं और परिसीमाओं के आधार पर, यह देखा जा सकता है कि मसीह-विरोधियों का सार शैतान का सार है। परमेश्वर और परमेश्वर के वचनों के प्रति उनका रवैया शोध करने, विरोध करने, आलोचना करने, परमेश्वर के विरुद्ध उपयोग करने के लिए कुछ खोजने और दोष ढूँढ़ने का है। वे परमेश्वर के वचनों में निहित सत्य के लिए कोई प्रयास नहीं करते हैं, ना ही वे इसके प्रति समर्पण करते हैं; वे ना इसे स्वीकारते हैं और ना ही इसका अभ्यास करते हैं। इसलिए, मसीह-विरोधियों का सार शैतान का और बुरी आत्माओं का सार है। मसीह-विरोधी परमेश्वर के वचनों के साथ जिस तरह से पेश आते हैं उसी तरह से वे परमेश्वर के साथ भी पेश आते हैं। परमेश्वर के वचन स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करते हैं। परमेश्वर द्वारा व्यक्त सभी सत्य उसके स्वभाव, उसके सार और इससे भी बढ़कर, उसकी पहचान और स्थिति का प्रतिनिधित्व करते हैं। चाहे ये वचन परमेश्वर के देह द्वारा व्यक्त किए गए हों या परमेश्वर के आत्मा द्वारा और चाहे वह किसी भी विषयवस्तु को व्यक्त करता हो, ये वचन निस्संदेह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए, मसीह-विरोधियों का परमेश्वर के वचनों पर शोध और विश्लेषण करना और उसके बारे में धारणाएँ विकसित करना परमेश्वर के बारे में धारणाएँ विकसित करने के बराबर है। वे परमेश्वर की जाँच-पड़ताल कर रहे हैं। वे परमेश्वर के वचनों पर विश्वास नहीं करते और परमेश्वर के वचन स्वीकार नहीं करते, जिसका मतलब है कि वे परमेश्वर के अस्तित्व पर विश्वास नहीं करते; वे निश्चित रूप से यह नहीं मानते कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, और वे परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं कर सकते। यही मसीह-विरोधियों का सार है।

कुछ लोग कहते हैं : “देहधारी परमेश्वर बहुत ही महत्वहीन और बहुत ही साधारण है। उसके वचनों और कार्यों से अक्सर मेरे मन में धारणाएँ पैदा होती हैं और उसके वचन और कार्य मेरी कल्पनाओं के अनुरूप बिल्कुल नहीं होते। मैं देखता हूँ कि देहधारी परमेश्वर बस एक साधारण व्यक्ति है। वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं करता, तो चाहे वह अपने वचनों और कार्य में कितने ही सत्य व्यक्त करे, वह परमेश्वर जैसा नहीं है।” ये वचन कहाँ से आते हैं? वे किस चीज का प्रतिनिधित्व करते हैं? क्या वे शैतान का प्रतिनिधित्व नहीं करते? शुरू से अंत तक, शैतान ने कभी भी परमेश्वर की पहचान और स्थिति को नहीं स्वीकारा है। उसने कभी यह नहीं माना कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं और उसने निश्चित रूप से परमेश्वर के वचनों को कभी नहीं स्वीकारा है। इस प्रकार, जब शैतान परमेश्वर से बात करता है तो वह ऐसा बराबरी के स्तर पर आकर करना चाहता है। उसके बोलने का तरीका परमेश्वर का उपहास करने, उसका मजाक उड़ाने और परमेश्वर को धोखा देने वाला है और उसके हृदय में परमेश्वर के लिए कोई जगह नहीं है। मसीह-विरोधी जो चीजें करते हैं और जो शब्द मसीह-विरोधी कहते हैं वे सभी बिल्कुल शैतान के जैसे ही हैं। उनका सार एक जैसा है, सिवाय इसके कि शैतान मानवजाति के लिए अदृश्य है, जबकि मसीह-विरोधी प्रत्यक्ष और मूर्त हैं; वे मनुष्य की खाल पहने शैतान हैं। अगर वे शैतान नहीं होते तो वे ऐसी चीजें करने और ऐसी बातें कहने में सक्षम नहीं होते। शैतान अक्सर झूठ बोलता है और वह मानता है कि परमेश्वर के वचन भी झूठे हैं। शैतान अक्सर लोगों को धोखा देता है, वह धूर्त, कपटी और दुष्ट होता है और उसका मानना है कि परमेश्वर भी उसी तरह बोलता है। परमेश्वर चाहे कुछ भी कहे, मसीह-विरोधी हमेशा परमेश्वर के वचनों में कुछ न कुछ जोड़ते रहेंगे, उनमें अपने स्वयं के अर्थ जोड़ते रहेंगे और उनकी मनमाने ढंग से व्याख्याएँ करते रहेंगे। यही नहीं, वे तो यह भी सोचते हैं कि परमेश्वर के कुछ वचन उनके वचनों जितने शानदार नहीं हैं, उनके स्तर के और उच्च मानकों वाले नहीं हैं और भ्रष्ट मानवजाति को जीतने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इसलिए, वे परमेश्वर के बोलने के तरीकों, बोलने के लहजे और उसके वचनों की विषयवस्तु को कुछ लोगों के सामने लाना चाहते हैं ताकि उनका विश्लेषण कर उन्हें परखा जा सके और इससे भी बढ़कर, उनकी आलोचना और निंदा की जा सके। ऐसा करने में उनका उद्देश्य क्या है? परमेश्वर का अनुसरण करते हुए, वे इस परमेश्वर से अपनी इच्छित संभावनाएँ और नियति प्राप्त करने की आशा करते हैं और इस परमेश्वर से अपनी इच्छित मंजिल प्राप्त करने का इंतजार करते हैं। तो फिर वे अभी भी इस तरह से क्यों कार्य करते हैं? क्या यह खुद को थप्पड़ मारना नहीं है? इसका एक ही कारण है। वह यह है कि उनकी नजरों में, ऐसे परमेश्वर द्वारा बोले गए वचन बहुत ही सामान्य और साधारण हैं—उसके कार्य भी बहुत ही साधारण हैं। ऐसा परमेश्वर वह नहीं है जिसका वे सम्मान करना चाहते हैं या जो उनकी कल्पनाओं में है और वह उनसे मेल नहीं खाता। अगर वे ऐसे परमेश्वर का अनुसरण करते हैं तो उनकी मंजिल, उनकी संभावनाएँ और नियति, सब विफल हो सकती हैं। इसलिए, वे ऐसे परमेश्वर की घोर अवहेलना करते हैं। वे उसकी आलोचना करते हैं, उसे कमजोर करते हैं और उसके कार्य को नष्ट करने, उसमें बाधा डालने और उसे बर्बाद करने का प्रयास करते हैं, ताकि वह ऐसा ना कर सके। ऐसा होने पर उनका उद्देश्य पूरा हो जाएगा। कुछ लोग कहते हैं : “अगर वे अपना उद्देश्य प्राप्त कर लेते हैं तो क्या उनकी मंजिल खत्म नहीं हो जाएगी?” इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर का अस्तित्व नहीं स्वीकारता, ना ही वह परमेश्वर के देहधारी शरीर को स्वीकारता है, इस तथ्य की तो बात ही छोड़ दो कि उसका प्रबंधन कार्य मानवजाति को बचाने के लिए है। वह केवल दाँव लगा रहा है और जुआ खेल रहा है। अगर इस परमेश्वर को वाकई नीचे लाया जाता है तो वह जो चाहे वो कर सकता है और उसे परमेश्वर के घर में ऐसी कठिनाइयाँ अब और नहीं सहनी पड़ेंगी। फिर, वह संसार में, बुरी प्रवृत्तियों में और जिसे वह सामान्य जीवन कहता है उसमें वापस लौटने में सहज महसूस कर सकता है। उसे किसी आपदा को सहने की जरूरत नहीं होगी, उसे किसी भी तरह के शोधन से गुजरने की जरूरत नहीं होगी और उसे निश्चित रूप से परमेश्वर के वचनों का न्याय और ताड़ना नहीं झेलनी पड़ेगी। इन सबका कोई अस्तित्व नहीं रहेगा और दुनिया हमेशा की तरह चलती रहेगी। ऐसे लोग अपने सपनों में इसी चीज की लालसा करते हैं। क्या ये लोग बुरे नहीं हैं? उनके इतने बुरे होने का मूल कारण क्या है? (उनका सार शैतान है, इसलिए वे परमेश्वर से घृणा करते हैं।) वास्तव में, ये मसीह-विरोधी, बुरे राक्षस अपने दिलों की गहराई में, अपनी आत्माओं में, इसे महसूस कर सकते हैं—वे जानते हैं कि परमेश्वर उनके जैसे लोगों को कैसे देखता है। परमेश्वर उनके जैसे लोगों से घृणा करता है। वे परमेश्वर के अनुरूप नहीं हैं। उनकी मानवता और प्रकृति सार से परमेश्वर को घृणा है। इसलिए, चाहे वे कितनी भी मेहनत करें और चाहे आशीष प्राप्त करने की कितनी भी इच्छा करें, उनका अंतिम नतीजा उनकी इच्छा पर निर्भर नहीं करेगा। वे किसी भी तथ्य को नहीं बदल सकते। वे परमेश्वर के अनुरूप नहीं हैं। वे परमेश्वर के वचनों के अनुरूप नहीं हैं। वे मसीह के अनुरूप नहीं हैं। तो आखिर में उनका क्या होगा? उन सभी का नाश होना निश्चित है। उनके दिलों में इस नतीजे की एक धुंधली-सी समझ है, तो फिर वे अभी भी परमेश्वर के घर में क्यों रहते हैं? वे आशीष प्राप्त करने का इतना अच्छा अवसर छोड़ने को तैयार नहीं हैं, इसलिए वे एक जुआ खेलना चाहते हैं, “अगर मैं इस तरह जुआ खेलता हूँ तो शायद मैं अभी भी आशीष प्राप्त कर सकता हूँ। शायद मैं अभी भी छिपकर निकल सकता हूँ और बच सकता हूँ। अगर परमेश्वर सावधान नहीं है और वह ध्यान नहीं देता तो शायद मैं स्वर्ग के राज्य के द्वार से छिपकर निकल सकता हूँ।” “शायद” की इस खयाली सोच के साथ वे परमेश्वर के घर में निष्क्रियता से बने रहते हैं, लेकिन परमेश्वर के प्रति उनका दृष्टिकोण और रवैया कभी नहीं बदलता है। वे परमेश्वर के वचनों का तिरस्कार करते हैं, सत्य का तिरस्कार करते हैं और सभी सकारात्मक चीजों का तिरस्कार करते हैं।

परमेश्वर अपेक्षा करता है कि लोग ईमानदार बनें। कुछ लोग यह सुनकर सोचते हैं : “क्या यह मानक बहुत निम्न-स्तर का नहीं है? हम कई वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करते आ रहे हैं, तो फिर अब वह हमें ‘ईमानदार बनने’ के लिए क्यों कह रहा है? अगर यह परमेश्वर का वचन है तो यह गहरा होना चाहिए, और भी ज्यादा ऊँचा, और भी अभेद्य और हमेशा मनुष्य की पहुँच से और भी दूर होना चाहिए। हमें उच्चतर अपेक्षित मानकों की जरूरत है, न कि इन साधारण, महत्वहीन, निम्न-स्तरीय मानकों की।” ऐसे लोग नहीं समझ पाते हैं कि सत्य वास्तविकता क्या है। जब वे लोग जो सत्य नहीं समझते, इस धर्मोपदेश को सुनते हैं तो वे परेशान हो जाते हैं, मगर संगति, अनुभव और एक अवधि तक इससे गुजरने के बाद, उन्हें एहसास होता है कि मनुष्य को परमेश्वर के इन्हीं वचनों की जरूरत है। मनुष्य को इनकी जरूरत क्यों है? मनुष्य शैतान द्वारा बहुत गहराई तक भ्रष्ट किया जा चुका है और इसलिए कोई भी व्यक्ति ईमानदार नहीं है; यह संसार झूठ से भरा है और यह बात उन लोगों के लिए भी सच है जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं। हर दिन लोग एक के बाद एक झूठ बोलते हैं; उनकी बातें शैतान के झूठ और धोखे से भरी हुई हैं। इसलिए परमेश्वर ने मनुष्य से यह सबसे सरल और सीधी-सी अपेक्षा रखी है : ईमानदार बनो। समय और अनुभव के साथ, लोगों में परमेश्वर के वचनों की समझ, और उसकी अपेक्षाओं और उसके इरादों की समझ विकसित होती है; परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन और निर्देश से, उन्हें धीरे-धीरे एहसास होता है कि उसके वचन कितने व्यावहारिक हैं, उसके हर एक वचन को कैसे समझा जाना चाहिए और कैसे उसमें प्रवेश किया जाना चाहिए, कैसे उसका कोई भी वचन खोखला नहीं है, कैसे मानवता को उसके सभी वचनों की जरूरत है, कैसे परमेश्वर लोगों को इतनी अच्छी तरह समझता है और उनकी असलियत देख सकता है और वह उनकी भ्रष्टता को बहुत अच्छी तरह समझता है। यही वह मार्ग है जिससे एक साधारण व्यक्ति गुजरता है। फिर भी जब मसीह-विरोधी इस वाक्यांश को देखते हैं, जहाँ परमेश्वर लोगों से ईमानदार बनने की अपेक्षा करता है तो वे इसे अनादर, उपहास, व्यंग्य और यहाँ तक कि प्रतिरोध के रवैये से देखते हैं। इस वाक्यांश के बारे में अपनी राय बनाने के बाद वे इसे दिमाग के एक कोने में डाल देते हैं, परमेश्वर के प्रति उनका तिरस्कार बढ़ता जाता है और वे उसे और उसके वचन को अधिक से अधिक घृणा से देखते हैं, यहाँ तक कि वे अब उसके वचन का अध्ययन भी नहीं करते। जब कुछ लोग अपने अनुभवों के बारे में बताते हैं कि उन्होंने कैसे अपने कपटी स्वभाव को प्रकट किया और कैसे उन्होंने पश्चात्ताप किया और ईमानदार बनने की कोशिश की तो इन मसीह-विरोधियों के मन में प्रतिरोध, घृणा और तिरस्कार पैदा हो जाता है। न केवल वे उन लोगों की बातों को स्वीकारने से नकार देते हैं, बल्कि वे भाई-बहनों की संगति से मिले अनुभवजन्य ज्ञान को लेकर प्रतिरोध और घृणा महसूस करते हैं, यहाँ तक कि वे उन लोगों के प्रति घृणा और तिरस्कार महसूस करते हैं जो अधिक संगति करते हैं और जिनके पास बेहतर ज्ञान होता है। वे सोचते हैं, “तुम लोग बेवकूफ हो। परमेश्वर तुम लोगों को ईमानदार बनने के लिए कहता है और तुम बस वही करते हो। तुम लोग इतने आज्ञाकारी कैसे हो सकते हो? तुम लोग मेरे कहे शब्दों पर ध्यान क्यों नहीं देते? मुझे देखो—तुममें से कोई भी मेरी वास्तविक स्थिति नहीं जानता, कोई नहीं जानता कि मैं कितना कपटी और धूर्त हूँ। और मैं तुम लोगों को इन चीजों के बारे में बताऊँगा भी नहीं; क्या तुम लोगों को लगता है कि तुम उन्हें सुनने के हकदार हो?” वे परमेश्वर की अपेक्षाओं के प्रति यही रवैया रखते हैं; न केवल वे उन्हें स्वीकारने से नकार देते हैं, बल्कि वे उनका प्रतिरोध और निंदा भी करते हैं। क्या ये छद्म-विश्वासियों की अभिव्यक्तियाँ नहीं हैं? ये मानक छद्म-विश्वासी हैं। ऊपरी तौर पर, उन्होंने खुलेआम परमेश्वर के वचन की निंदा नहीं की है, उन्होंने परमेश्वर के वचन की किताबों को भट्टी में जलाने के लिए नहीं फेंका है। बाहर से, वे रोज परमेश्वर का वचन पढ़ते हैं और धर्मोपदेश सुनते हैं और सभाओं के दौरान संगति करते हैं, मगर वास्तव में, परमेश्वर के वचन के प्रति उनके दिलों की गहराई में गहन घृणा, प्रतिरोध और तिरस्कार की भावना उत्पन्न हो गई है। दूसरे शब्दों में कहें तो जिस पल उनके मन में परमेश्वर के वचन के बारे में धारणाएँ विकसित हुईं, उसी पल उन्होंने इसे नकार दिया था। कुछ लोग कहते हैं : “क्या उन मसीह-विरोधियों ने परमेश्वर का वचन उसके ये बातें बोलने से पहले ही ठुकरा दिया था?” उस समय तक उन्होंने इसे नहीं ठुकराया था। ऐसा क्यों है? क्योंकि उनके मन में परमेश्वर के बारे में कई धारणाएँ और कल्पनाएँ थीं और इनकी वजह से ही वे उसका सम्मान और उसकी प्रशंसा करते थे और उसे एक महान व्यक्ति मानते थे। मगर जब परमेश्वर ने अपने वचन व्यक्त किए तो उसके बारे में उनका दृष्टिकोण पूरी तरह बदल गया, उन्होंने कहा : “परमेश्वर द्वारा बोले गए वचन वास्तव में बहुत ही साधारण हैं! वे बहुत सरल, बहुत सीधे, समझने में बहुत आसान हैं : ऐसे वचन तो मैं खुद ही बोल सकता हूँ! क्या हर कोई यह नहीं कहता कि परमेश्वर महान है? तो फिर वह हमें ईमानदार बनने के लिए क्यों कहेगा? अगर परमेश्वर बहुत महान है, अगर वह वाकई सर्वोच्च है, तो उसे लोगों से इतनी छोटी और मामूली अपेक्षाएँ नहीं रखनी चाहिए!” जब उन्होंने परमेश्वर का वचन पढ़ा और उसे उथला महसूस किया और उन्हें लगा कि यह लोगों की धारणाओं से मेल नहीं खाता या परमेश्वर की भव्य छवि और पहचान के अनुरूप नहीं है तो उनके मन में परमेश्वर के वचनों के बारे में धारणाएँ विकसित हो गईं। इन धारणाओं के विकसित होने की पृष्ठभूमि में, उनके भीतर परमेश्वर के वचनों के लिए अत्यधिक घृणा पैदा हो गई और इसके बाद उनके दिलों की गहराई में परमेश्वर के बारे में उनकी कल्पनाओं और धारणाओं को बांधे रखने वाला तटबंध पूरी तरह से ढह गया। इस ढहने का क्या नतीजा हुआ? अपने दिलों की गहराई से, उन्होंने परमेश्वर के वचन को नकार दिया और उसकी निंदा की। तो, जब लोग परमेश्वर के वचन का प्रचार करते हैं तब मसीह-विरोधियों के मन में क्या चलता है? वे दर्शकों की तरह होते हैं, किनारे खड़े होकर बस देख रहे होते हैं। जब वे किसी को परमेश्वर के वचनों की प्रशंसा करते हुए या परमेश्वर के वचनों के अपने अनुभव पर संगति करते हुए सुनते हैं तब भी ये मसीह-विरोधी दर्शक बनकर देखते रहते हैं और कभी दिल की गहराइयों से “आमीन” नहीं कहते। कई बार, वे यह कहते हुए लोगों का मजाक भी उड़ाते हैं, “ईमानदार बनकर तुमने क्या हासिल कर लिया? भले ही तुम ईमानदार बनने की कोशिश कर रहे हो, यह जरूरी नहीं कि परमेश्वर तुम्हें बचाएगा ही और यह भी जरूरी नहीं कि वह तुम्हें आशीष देगा। बहुत कम लोगों को ही आशीष मिलेगा। अगर मुझे कोई आशीष नहीं मिलता तो तुम लोगों में से भी किसी को कोई आशीष नहीं मिलेगा!” एक मसीह-विरोधी का प्रकृति सार परमेश्वर के वचन और स्वयं परमेश्वर को लेकर प्रतिरोधी होता है, इसलिए मसीह-विरोधी परमेश्वर के वचन को स्वीकारने में असमर्थ होते हैं और उसके प्रति समर्पण करना तो दूर की बात है। अगर वे परमेश्वर के वचन को स्वीकार नहीं करते और उसके प्रति समर्पण नहीं करते तो क्या वे उससे अनुभव प्राप्त कर सकते हैं? वे ऐसा नहीं कर सकते, तो फिर वे किस व्यक्तिगत ज्ञान की बात करते हैं? यह सब केवल कल्पनाएँ, अनुमान, धर्म-सिद्धांत या सिद्धांत हैं या कभी-कभी वे दूसरे लोगों के कुछ अच्छे लगने वाले शब्द भी दोहराते हैं और इस तरह, उनके अंदर परमेश्वर के वचनों का कोई अनुभव या ज्ञान उत्पन्न होना असंभव है। इसलिए, परमेश्वर और उसके वचन के प्रति मसीह-विरोधियों के विभिन्न रवैयों के कारण और उनके प्रकृति सार के कारण, चाहे वे 10 साल, 20 साल या उससे भी ज्यादा समय से परमेश्वर पर विश्वास करते रहे हों, आज तक, तुम उनसे परमेश्वर का एक भी वचन नहीं सुनोगे या उनमें परमेश्वर के वचन का कोई अनुभव नहीं देखोगे और परमेश्वर के बारे में थोड़ा-सा भी ज्ञान तुम और भी नहीं पाओगे। उनकी बातों में तुम यह नहीं सुनोगे कि उनके मन में परमेश्वर के बारे में धारणाएँ और गलतफहमियाँ हैं और परमेश्वर के प्रकाशन से वे प्रबुद्ध हो गए हैं और आखिरकार उस मुकाम पर पहुँच गए हैं जहाँ से वे परमेश्वर को गलत नहीं समझते या उसके बारे में धारणाएँ नहीं रखते हैं। उनके पास यह अनुभव नहीं है, न ही उनके पास यह ज्ञान है। यही कारण है कि मसीह-विरोधी सत्य प्राप्त नहीं कर सकते या किसी व्यक्तिगत अनुभव या ज्ञान के बारे में बिल्कुल भी बात नहीं कर सकते, फिर चाहे वे परमेश्वर के वचन का अध्ययन करने की कितनी भी कोशिश क्यों न करें। वे बस परमेश्वर के वचन के कुछ मशहूर अंशों को पढ़ने और याद करने में लगे रहते हैं, जिन्हें भाई-बहन अक्सर उद्धृत करते हैं; वे बस आधे-अधूरे मन से काम करते हैं और बहती धारा के साथ चलते हैं और फिर उसी तरह से सोचना जारी रखते हैं जैसे वे हमेशा से सोचते आए हैं। वे परमेश्वर के बारे में अपने मन में उठने वाली धारणाएँ या अपने और परमेश्वर के बीच उत्पन्न होने वाले मतभेद और समस्याएँ हल नहीं करते, चाहे वे कितनी भी महत्वपूर्ण क्यों न हों। ये धारणाएँ और समस्याएँ हमेशा उनका पीछा करती रहती हैं। उनके द्वारा ये समस्याएँ हल नहीं करने के क्या परिणाम होते हैं? उनके दिलों में आक्रोश गहरा होता जाता है और परमेश्वर के प्रति उनकी नफरत बढ़ती जाती है। इस रास्ते पर चलते रहने से, परमेश्वर में लंबे समय तक विश्वास करते रहने के क्या परिणाम होंगे? क्या ये संचित आक्रोश और धारणाएँ उन्हें अपनी संभावनाओं, नियति और आशीष पाने के इरादे को छोड़ने पर मजबूर कर सकती हैं? (नहीं।) अगर ये समस्याएँ हल नहीं होती हैं, तो अंतिम नतीजा क्या होगा? (उनमें बड़ा विस्फोट होगा।) “विस्फोट” शब्द बिल्कुल स्पष्ट है। उनमें कैसे विस्फोट होगा? इसके कितने तरीके हैं? (मुझे परमेश्वर के कुछ वचन याद आ रहे हैं जो मैंने पहले पढ़े थे, “यहाँ तक कि एक ही रात के अंतराल में वे एक मुस्कुराते, ‘उदार-हृदय’ व्यक्ति से एक कुरूप और जघन्य हत्यारे में बदल जाते हैं” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास)।) वे हत्यारे क्यों बन जाते हैं? जब आशीष पाने की उनकी इच्छा नष्ट हो जाती है तो वे लड़ने की मुद्रा में आ जाते हैं, और कहते हैं, “हममें से किसी के लिए भी यह आसान नहीं होने वाला है, इसलिए मुझे इसे छिपाने या इस पर परदा डालने की जरूरत नहीं है—मैं सिर्फ आशीष पाने के लिए परमेश्वर में विश्वास करता हूँ। अगर मुझे पता होता कि मुझे आशीष नहीं मिलने वाला है तो मैं बहुत पहले ही छोड़कर चला गया होता!” वे अपने दिल की सारी बात कह देते हैं और अपनी निंदा किए जाने से नहीं डरते। वे निंदा से क्यों नहीं डरते? क्यों वे शिष्टता के सारे दिखावे छोड़ देते हैं और उनमें विस्फोट क्यों हो जाता है? ऐसा इसलिए है क्योंकि वे अब और विश्वास नहीं करना चाहते और सब छोड़-छाड़कर चले जाना चाहते हैं। वे इतने सालों से अपने लक्ष्यों की खातिर अपमान और कठिनाई सहते आ रहे हैं और वे इन रणनीतियों के अनुसार अभ्यास करते हैं और इन रणनीतियों का अपने आध्यात्मिक समर्थन के रूप में उपयोग करते हैं। आज जब वे देखते हैं कि उन्हें आशीष पाने की कोई उम्मीद नहीं है तो उन्हें लगता है कि उन्हें शिष्टता के सारे दिखावे छोड़ देने चाहिए और खुलकर कहना चाहिए, “मैं मात्र एक छद्म-विश्वासी हूँ। मुझे सकारात्मक चीजें पसंद नहीं हैं। मुझे सांसारिक चीजों के पीछे भागना और दुष्ट प्रवृत्तियाँ पसंद हैं। वे कहते हैं कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं और परमेश्वर के वचन लोगों को बदल सकते हैं और उन्हें बचा सकते हैं। मैंने ऐसा क्यों नहीं देखा? मैं इसका अनुभव या इसे महसूस क्यों नहीं कर सकता हूँ? परमेश्वर का वचन लोगों में क्या बदलाव लाया है? मुझे लगता है कि परमेश्वर के वचन कुछ भी नहीं हैं। केवल एक ही चीज है जिसका सबसे ज्यादा ठोस लाभ है और वह यह है कि जो लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, वे धन्य होंगे और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेंगे। ये वचन सत्य हैं। अगर आशीष पाने की बात नहीं होती तो मैं परमेश्वर पर विश्वास नहीं रखता! परमेश्वर कहाँ है? अगर परमेश्वर लोगों को बचा सकता था तो उसे सलीब पर क्यों चढ़ाया गया? वह तो खुद को भी नहीं बचा सका!” वे वही कहते हैं जो वे वास्तव में सोचते हैं—क्या इसमें उनका शैतानी पक्ष प्रकट नहीं होता? बरसों से जमा हुई धारणाओं और आक्रोश का विस्फोट हो जाता है। यह मसीह-विरोधियों का अंत में अपना असली रंग दिखाना है।

कुछ मसीह-विरोधी अक्सर कहते हैं : “मैंने अपना परिवार और करियर त्याग दिया, बहुत मेहनत की, और परमेश्वर पर अपने विश्वास में बहुत कुछ सहा, और अंत में मुझे क्या मिला? क्या परमेश्वर वह नहीं है जो लोगों को आशीष देता है? क्या परमेश्वर वह नहीं है जो लोगों को अनुग्रह देता है? तो मुझे क्या मिला?” परमेश्वर ने मनुष्य को बहुत सारे सत्य प्रदान किए हैं और उसने बदले में कुछ माँगे बिना बहुत कुछ दिया है; भले ही लोग परमेश्वर का बहुत ज्यादा विरोध और उसके खिलाफ बहुत ज्यादा विद्रोह करते हैं, वह इसे याद नहीं रखता, और अभी भी मनुष्य को बचाने आता है। मसीह-विरोधी यह नहीं देख सकते कि मनुष्य ने परमेश्वर से कितना कुछ पाया है। “मुझे क्या मिला” कहने से वास्तव में उनका क्या मतलब है? (आशीष।) मसीह-विरोधियों को सब कुछ चाहिए। वे परमेश्वर में विश्वास करने और परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए सब कुछ त्यागने में सक्षम हैं और उन्हें लगता है कि ऐसा करने से उन्हें सफलता पाने का मौका मिलेगा और यह उनके लिए सार्थक होगा। वे संसार और अपनी संभावनाएँ त्याग देते हैं, पर भविष्य में वे पूरे संसार के मालिक बनना चाहते हैं। बदले में उन्हें जो चाहिए वह उन चीजों से ज्यादा होना चाहिए जो उन्होंने त्यागी हैं। यह उन चीजों से ज्यादा कीमती होना चाहिए और इससे उन्हें ज्यादा फायदे मिलने चाहिए, तभी वे लेन-देन करेंगे। क्या तुम लोगों को लगता है कि मसीह-विरोधी अपने विस्फोटों के दौरान क्षणिक गुस्से में आकर ऐसी बातें बोलते हैं? (नहीं।) वे विस्फोट से पहले यकीनन इन बातों को अपने मन में लंबे समय से दबाए रखते हैं। इसके बाद, मसीह-विरोधी जो कुछ भी वर्षों से सोच रहे थे और जिन चीजों का अनुसरण कर रहे थे, वह सब उजागर हो जाता है, उनके सारे नकाब उतर जाते हैं। वे जो कहते हैं उनका मुख्य बिंदु क्या है? “मैंने इतने सालों तक परमेश्वर में विश्वास किया और उसका अनुसरण किया और मुझे क्या मिला?” वे जो हासिल करना चाहते हैं वह सत्य नहीं है। वे सत्य नहीं चाहते हैं। वे जीवन नहीं चाहते, वे स्वभाव में बदलाव नहीं चाहते और न ही वे परमेश्वर का उद्धार चाहते हैं। वे सोचते हैं कि वे पूर्ण व्यक्ति हैं और वे ये चीजें हासिल नहीं करना चाहते। वे कुछ अतिरिक्त, कुछ बड़े आशीष हासिल करना चाहते हैं जो इस संसार में प्राप्त नहीं किए जा सकते। यानी उन्होंने संसार की जिन चीजों को त्याग दिया है उनके बदले में उन आशीषों को पाना चाहते हैं जिनका परमेश्वर ने वादा किया है। वे परमेश्वर से सबसे बड़ा आशीष पाना चाहते हैं। जब वे देखते हैं कि वे अपनी इच्छाओं को साकार नहीं कर सकते और सारी उम्मीदें खत्म हो गई हैं तो उन्हें हार मान लेनी पड़ती है। मगर जब ऐसा करने का समय आता है तो उनके स्वभाव के हिसाब से क्या वे वहाँ रुक पाएँगे? वे नहीं रुकेंगे। कुछ परिवार ऐसे हैं जहाँ हर कोई विश्वासी है, और उनके बीच से ही मसीह-विरोधी उभर आते हैं। जब ये मसीह-विरोधी देखते हैं कि उन्हें आशीष नहीं मिलेंगे तो वे अपने परिवार के लोगों को विश्वास रखने से रोकने के लिए उन्हें बाधित करना शुरू कर देते हैं। क्या ये अभी भी परिवार के लोग हैं? वे बाहरी शारीरिक या खून के रिश्ते के मामले में परिवार के करीबी लोग हैं। मगर जब हम प्रत्येक सदस्य के अनुसरण के मार्ग को देखते हैं, तो भले ही उन सभी ने 10 वर्षों से अधिक समय से परमेश्वर में विश्वास रखा हो, कुछ मसीह-विरोधियों के रूप में बेनकाब होते हैं, कुछ सत्य का अनुसरण करते हुए अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभा रहे होते हैं, वहीं कुछ लोग औसत स्तर पर सत्य का अनुसरण कर रहे होते हैं—इस तरह उनका प्रकृति सार प्रकट होता है। बेशक, उनमें से सबसे बुरे मसीह-विरोधी हैं, जिन्हें मनुष्य द्वारा ठुकरा दिया जाना चाहिए और परमेश्वर के घर द्वारा निष्कासित कर दिया जाना चाहिए। तो, क्या ये परिवार हैं? क्या असली परिवार ऐसे ही होते हैं? ये तो एक जैसे लोग भी नहीं हैं! कुछ लोग इतने वर्षों से दानवों के साथ रह रहे हैं और अभी भी उन्हें परिवार के सदस्य मानते हैं। वे उन्हें छोड़ नहीं सकते और बेवकूफों की तरह उन्हें अपने प्रियजन भी मानते हैं। ये किस तरह के प्रियजन हैं? मसीह-विरोधी खुद को प्रकट करने के बाद, सभी तरह की बुराई करने लगते हैं। वे अपने परिवारों में मौजूद सच्चे विश्वासियों को सता भी सकते हैं। इससे भी बदतर, वे अपने परिवार के सदस्यों को दुष्ट सरकारों के हवाले कर सकते हैं। कुछ माता-पिता अपने बच्चों को धोखा देते हैं और कुछ बच्चे अपने माँ-बाप को धोखा देते हैं। चाहे उनका रिश्ता कितना भी करीबी या घनिष्ठ क्यों न हो, ऐसा कुछ भी नहीं है जो मसीह-विरोधी नहीं करेंगे। चूँकि मसीह-विरोधी अपने परिवारों में सच्चे विश्वासियों को धोखा दे सकते हैं और उन्हें सता सकते हैं तो क्या इसका मतलब यह नहीं है कि वे दुश्मन हैं? (हाँ।) कलीसिया में एक या दो मसीह-विरोधियों के उभरने का मतलब भाई-बहनों के लिए खतरा है। जैसे ही मसीह-विरोधी देखते हैं कि उन्हें आशीष नहीं मिलेंगे, वे अपने कदम वापस खींच लेते हैं, सतर्कता बरतना छोड़ देते हैं, लड़ने की मुद्रा में आ जाते हैं और अन्य भाई-बहनों को परेशान करने के बारे में सोचने लगते हैं। कुछ भाई-बहन कमजोर, छोटे आध्यात्मिक कद वाले होते हैं और सत्य नहीं समझते हैं। मसीह-विरोधी इन भाई-बहनों को इंटरनेट पर कुछ बेबुनियाद अफवाहें दिखाते हैं, और फिर उनमें अपने अलंकृत स्पष्टीकरण जोड़कर आग को हवा देने का काम करते हैं, जिससे वे भाई-बहन परेशान और गुमराह हो जाते हैं और आखिरकार बर्बाद हो जाते हैं। बेशक, कुछ भाई-बहनों में विवेकशीलता होती है और वे तुरंत मसीह-विरोधियों को पहचान लेते हैं। अगर वे मसीह-विरोधियों से खुलेआम निपटते हैं तो उनके लिए मुसीबत खड़ी हो जाएगी, इसलिए यह पर्याप्त है कि वे उन्हें अलग-थलग करने का कोई बुद्धिमान तरीका खोजें ताकि वे दूसरों को परेशान न कर सकें या पीड़ा न पहुँचा सकें। शैतानों से निपटते समय, लोगों को बुद्धिमानी से काम लेना चाहिए।

मसीह-विरोधी अपनी संभावनाओं और नियति की खातिर परमेश्वर में विश्वास और उसका अनुसरण करते हैं। वे आशीष पाने की अपनी इच्छा को पकड़े रहते हैं और परमेश्वर के घर में प्रवेश करते समय, परमेश्वर के वचन पढ़ते समय, उन्हें स्वीकारते समय, और उनका प्रचार करते समय अपनी महत्वाकांक्षाएँ साथ लेकर आते हैं। वे अपनी संभावनाओं और नियति की खातिर परमेश्वर के घर में रियायतें देते हैं, अपमान सहते हैं और सभी प्रकार की कठिनाइयाँ झेलते हैं। और कई वर्षों तक इंतजार करने और देखने के बाद, जब उनकी आशाएँ चकनाचूर हो जाती हैं तो वे अपनी संभावनाओं और नियति के कारण कलीसिया और परमेश्वर के घर को छोड़ देते हैं, क्योंकि आशीष पाने की उनकी इच्छा और इरादा साकार नहीं हो पाता। ऐसे लोगों का क्या परिणाम होता है? उन्हें हटा दिया जाएगा। और उन्हें क्यों हटा दिया जाएगा? क्या परमेश्वर उन्हें नहीं बचाने का फैसला उसी पल ले लेता है जब वे उसके घर में प्रवेश करते हैं या फिर उनकी अपनी कुछ समस्याएँ हैं? (उनकी अपनी समस्याएँ हैं।) जब मसीह-विरोधी परमेश्वर के घर में प्रवेश करते हैं तो वे गेहूँ के बीच जंगली दानों की तरह मिल जाते हैं। कुछ लोग कहते हैं, “मगर क्या परमेश्वर इसके बारे में नहीं जानता?” परमेश्वर इसके बारे में जानता है; परमेश्वर इन सबकी जाँच-पड़ताल करता है। इस तरह के लोग बदल नहीं सकते। भले ही उन्होंने परमेश्वर के सभी वचन पढ़े हों, भले ही उन्होंने रहस्यों, मनुष्य की मंजिल और मनुष्य के विभिन्न भ्रष्ट स्वभावों के बारे में पढ़ा हो जिनका खुलासा परमेश्वर ने किया है और भले ही उन्होंने ऐसे अन्य वचनों को पढ़ा हो, इसका कोई फायदा नहीं है, क्योंकि वे सत्य स्वीकार नहीं करते। परमेश्वर द्वारा बोले गए वचन पूरी मानवजाति के लिए हैं। वे किसी से छिपे नहीं हैं और सभी को समान रूप से प्रदान किए गए हैं। हर कोई परमेश्वर के वचन पढ़ और सुन सकता है, मगर अंत में, मसीह-विरोधी उन्हें कभी प्राप्त नहीं करेंगे, क्योंकि वे मसीह-विरोधी, दानव और शैतान हैं। परमेश्वर के साथ इतने वर्षों तक रहने के बाद भी शैतान नहीं बदला, तो फिर मसीह-विरोधी कहाँ से बदलेंगे? भले ही तुम उन्हें हर दिन परमेश्वर का वचन पढ़ने के लिए कहो, वे इसे प्राप्त नहीं करेंगे, क्योंकि वे मसीह-विरोधी हैं और उनमें मसीह-विरोधी का सार है। मसीह-विरोधियों से उनके हितों या उनकी संभावनाओं और नियति को छुड़वाना मुमकिन नहीं है। यह सुअर को पेड़ पर चढ़ाने जैसा है। यह नामुमकिन कार्य है। मसीह-विरोधी तत्काल लाभ देखना चाहते हैं और वे भविष्य में अनंत लाभ भी चाहते हैं। अगर वे इनमें से किसी भी चीज को प्राप्त या साकार नहीं कर पाते हैं तो वे तुरंत शत्रु बन जाते हैं और कभी भी छोड़कर जा सकते हैं। मसीह-विरोधी परमेश्वर के वचनों के मर्म को समझना चाहते हैं, उनके लहजे और अंदाज को सुनकर उसके वचनों के अर्थ और इरादे का अनुमान लगाने की कोशिश करते हैं, ताकि उन विभिन्न लाभों को आँक सकें जिनकी उन्हें परवाह है और जिन्हें वे प्राप्त करना चाहते हैं। जब वे परमेश्वर के वचनों के प्रति यह रवैया अपनाएँगे तो क्या उनके लिए सत्य समझना मुमकिन होगा? (नहीं।) इसलिए, चाहे जो हो मसीह-विरोधी परमेश्वर और उसके वचन के विरोधी और पक्के दुश्मन होते हैं। कुछ लोग कहते हैं : “फलाँ व्यक्ति वाकई बहुत अच्छा था। वह अब ऐसा व्यवहार क्यों कर रहा है? परमेश्वर के वचन की संगति सुनने के बाद, उसने कहा कि वह इसे समझता है और उसने अपने कर्तव्य निर्वहन के लिए कड़ी मेहनत करने का वादा किया है तो वह क्यों नहीं बदल सकता?” मैं तुम्हें सच बताता हूँ। ऐसा नहीं है कि वह अभी नहीं बदल सकता—वह भविष्य में भी नहीं बदल सकेगा। ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है क्योंकि उसका बदलने का कोई इरादा नहीं है। जरा सोचो : अगर किसी भेड़िये को खाने के लिए भेड़ नहीं मिलती है, तो भूखा होने पर वह कभी-कभी अपनी भूख मिटाने के लिए थोड़ी घास खा लेता है और थोड़ा पानी पी लेता है। मगर क्या इसका मतलब यह है कि उसकी प्रकृति बदल गई है? (इसका यह मतलब नहीं है।) इसलिए, जब मसीह-विरोधी कुछ भी बुरा नहीं करते और कुछ समय के लिए थोड़े अच्छे व्यवहार प्रदर्शित करते हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि वे बदल गए हैं या उन्होंने सत्य स्वीकार लिया है। जैसे ही उनकी गंभीरता से इस तरह से काट-छाँट की जाती है जिससे उनकी ताकत और रुतबे पर असर पड़ता है, और वे देखते हैं कि अब उनके पास कोई उम्मीद नहीं है—उन्हें निश्चित रूप से हटा दिया जाएगा—तो वे तुरंत नकारात्मक हो जाएँगे, अपना काम छोड़ देंगे और उनका वास्तविक, असली रंग सामने आ जाएगा। ऐसे लोगों को कौन बदल सकता है? परमेश्वर उन्हें बचाने की योजना नहीं बनाता, वह केवल उन्हें बेनकाब करने और हटाने के लिए तथ्यों का उपयोग करता है। इसलिए, सबको शैतान के इन सेवकों का भेद पहचानना चाहिए और इन्हें ठुकरा देना चाहिए।

मसीह-विरोधियों का भेद पहचानना बुरे लोगों और शैतान का भेद पहचानने जैसा है और मसीह-विरोधियों का गहन-विश्लेषण करना अदृश्य शैतान और दानवों का गहन-विश्लेषण करने जैसा है। आज हम जिन मसीह-विरोधियों का गहन-विश्लेषण कर रहे हैं, मनुष्य उन्हें देख सकता है। तुम उनके काम को देख सकते हो और उनकी बातें सुन सकते हो; तुम उनकी सभी अभिव्यक्तियों को देखकर उनके इरादों का पता लगा सकते हो। तुम आध्यात्मिक क्षेत्र के शैतान या दानवों को देख या छू नहीं सकते, तो वे तुम्हारे लिए बस एक परिकल्पना और उपाधि मात्र रहेंगे। मगर आज हम जिन मसीह-विरोधियों का गहन-विश्लेषण कर रहे हैं, वे अलग हैं। ये जीते-जागते दानव और शैतान हैं। वे हाड़-मांस से बने मूर्त दानव और शैतान हैं। ये दानव और शैतान आध्यात्मिक क्षेत्र में परमेश्वर का विरोध करते हैं और उसे ठुकराते हैं और वे परमेश्वर द्वारा बोले गए हर वचन से विमुख होते हैं। कलीसिया में आने के बाद भी वे ऐसी चीजें करना जारी रखते हैं। वे अभी भी पहले की तरह परमेश्वर के वचनों का विरोध करते हैं, उनसे विमुखता महसूस करते हैं और उन्हें ठुकरा देते हैं। वे अक्सर परमेश्वर के वचनों से नफरत भी करते हैं। अगर कोई बात परमेश्वर के मुँह से निकली है, तो एक छोटी-सी बात भी उनके दिलों में कई सवाल खड़े करेगी। वे इस पर शोध करेंगे, इसका विश्लेषण करेंगे और अपने दिमाग का उपयोग करके इसे संसाधित करेंगे। इसलिए, मसीह-विरोधियों के लिए, परमेश्वर के वचन उनके विश्वास का विषय नहीं हैं। वे कभी भी परमेश्वर के वचनों पर विश्वास नहीं करेंगे। परमेश्वर के वचन चाहे कितने भी व्यावहारिक, सच्चे या विश्वसनीय क्यों न हों, वे उन पर विश्वास नहीं करेंगे। इन बिंदुओं से देखा जाए तो क्या मसीह-विरोधी परमेश्वर के दुश्मन नहीं हैं? क्या उनकी जन्मजात प्रकृति सत्य से शत्रुता रखने की नहीं है? इस प्रकार के लोग परमेश्वर के जन्मजात दुश्मन होते हैं, वे जन्म से ही सत्य से विमुख होते हैं। वे कभी भी परमेश्वर के वचनों को सत्य नहीं मानेंगे या सत्य मानकर उन्हें कायम नहीं रखेंगे। उनके सार, परमेश्वर के प्रति उनकी विभिन्न अभिव्यक्तियों और परमेश्वर के वचनों के प्रति उनके विभिन्न रवैयों के कारण, अंत में परमेश्वर के वचनों में इस प्रकार के लोगों की निंदा की जाती है और उन्हें परमेश्वर द्वारा ठुकरा दिया जाता है। तो, क्या वे वह सबसे बड़ा लाभ हासिल कर सकेंगे जिसका वे अनुसरण करते हैं—यानी उनकी संभावनाएँ और नियति? कभी नहीं। इसलिए, परमेश्वर जिन वादों और आशीषों की बात करता है कि वह मानवजाति को देगा और जो मंजिल उसने मानवजाति के लिए तैयार की है, वे किसके लिए हैं? क्या इन चीजों में मसीह-विरोधियों के लिए कोई हिस्सा है? (नहीं।) जिस शानदार मंजिल की परमेश्वर ने बात की है और जिसका उसने मानवजाति से वादा किया है वह परमेश्वर का उद्धार पाने वालों को दी जाती है; यह उन लोगों को दी जाती है जो परमेश्वर के वचनों पर विश्वास करते हैं और परमेश्वर के वचनों को सत्य के रूप में स्वीकारते हैं। यह उन मसीह-विरोधियों के लिए नहीं है जो परमेश्वर के विरोधी हैं और जो परमेश्वर के वचन को एक मक्कार द्वारा बोले गए झूठ मानते हैं।

11 अप्रैल 2020

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