सत्य का अनुसरण कैसे करें (1) भाग दो

लोग परमेश्वर के कार्य के बारे में सभी तरह की धारणाओं और कल्पनाओं से भरे हुए हैं। हमने अभी-अभी जो संगति की, वह परमेश्वर के कार्य के दिनों के बारे में लोगों की धारणाओं से संबंधित है। इन धारणाओं के अलावा एक और तरह की धारणा और कल्पना है। वह यह है कि जब भी लोगों के सामने कुछ वास्तविक कठिनाइयाँ आती हैं, तो वे अक्सर अपनी व्यक्तिपरक इच्छा में यह उम्मीद करते हैं कि उन्हें परमेश्वर से प्रेरणा की एक झलक मिलेगी और फिर उनके दिमाग में एक विचार कौंधेगा, इसके लिए उन्हें परमेश्वर का वचन खाने और पीने, खुद को सत्य से लैस करने या दैनिक जीवन में सत्य सिद्धांतों को गहराई से समझने की जरूरत नहीं होगी और परमेश्वर उन्हें उनके रोजमर्रा के जीवन में आने वाली हर समस्या को हल करने में मदद कर सकता है, चाहे वह समस्या कितनी भी बड़ी या छोटी क्यों न हो। परमेश्वर के कार्य के बारे में लोगों की बूझ और समझ बेहद काल्पनिक और खोखली है और लोग मनुष्य को बचाने के परमेश्वर के तरीकों के बारे में भी धारणाओं और कल्पनाओं से भरे हुए हैं। लोग परमेश्वर के कार्य में विभिन्न सत्यों की तलाश नहीं करना चाहते हैं और हर मामले से सत्य सिद्धांतों के अनुसार व्यावहारिक तरीके से निपटना नहीं चाहते हैं। बल्कि वे उम्मीद करते हैं कि जब भी उनके सामने किसी भी तरह की समस्या आएगी, तो परमेश्वर उन्हें प्रकाश और प्रकाशन देगा, ठीक वैसे ही जैसे उसने नबियों को प्रकाशन दिए थे ताकि चाहे उनके वास्तविक जीवन में उनके साथ कुछ भी क्यों न घटित हो, उनके पास बुद्धि और क्षमता होगी और सभी तरह की समस्याओं से निपटने के तरीके होंगे, इसके लिए उन्हें परमेश्वर से प्रार्थना करने और सत्य की तलाश करने या परमेश्वर का वचन खाने और पीने की जरूरत नहीं पड़ेगी, जैसे कि वे किसी जादुई दुनिया में रह रहे हों। अपनी कल्पनाओं के अनुसार, लोगों को लगता है कि एक बार जब वे परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू कर देंगे तो वे होशियार और चतुर बन जाएँगे। कुछ लोग तो यह तक सोचते हैं कि एक बार जब वे परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू कर देंगे तो वे सुंदर बन जाएँगे और उन्हें देह की कोई भी कठिनाई और समस्या या भ्रष्ट स्वभावों की बाधा या अपने दैनिक जीवन में कोई भी वास्तविक कठिनाई नहीं रहेगी। वे मानते हैं कि जब तक उनमें परमेश्वर को संतुष्ट करने की इच्छा है, तब तक वह उन्हें शक्ति देगा और उनके लिए अच्छी और बेहतर परिस्थितियाँ बनाएगा, इन सबको एक वास्तविकता बनाएगा और उनकी सभी आकांक्षाएँ और इच्छाएँ पूरी करेगा और खासकर जब उनके सामने ऐसी चीजें आती हैं जिन्हें हासिल करना उनकी काबिलियत और सहज प्रवृत्तियों से परे होता है, तो परमेश्वर उनकी और ज्यादा मदद करेगा ताकि वे चतुराई से या आसानी से वे चीजें कर सकें जो वे करना चाहते हैं। कुछ ऐसे लोग भी हैं जिनकी काबिलियत खराब है और जिनमें हर तरह के पेशेवर कौशल की कमी है, जो सोचते हैं कि परमेश्वर को सिर्फ एक चमत्कार या आश्चर्य करने की जरूरत है और उनकी काबिलियत अचानक अच्छी हो जाएगी और वे अचानक होशियार बन जाएँगे। वे यह भी मानते हैं कि परमेश्वर के लिए कुछ भी हासिल करना कठिन नहीं है और परमेश्वर वे चीजें पूरी करने में उनकी मदद कर सकता है जिन्हें वे खुद पूरी नहीं कर सकते हैं और उन कठिन समस्याओं को हल करने में उनकी मदद कर सकता है जिन पर वे खुद काबू नहीं पा सकते हैं और जो उनकी क्षमताओं से परे होती हैं। कुल मिलाकर, परमेश्वर के कार्य के बारे में लोगों की बहुत-सी धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं। एक लिहाज से, वे परमेश्वर के कार्य की अवधि के बारे में विभिन्न कल्पनाओं से भरे हुए हैं और इस संबंध में उन्होंने विभिन्न क्रियाकलापों का निर्वहन भी किया है और विभिन्न कीमतें भी चुकाई हैं। साथ ही, लोग अपने सामने आने वाली विभिन्न कठिनाइयों और समस्याओं के बारे में और यहाँ तक कि अपने खुद के भ्रष्ट स्वभावों के बारे में भी सभी तरह की धारणाओं और कल्पनाओं से भरे हुए हैं। इनमें से ज्यादातर धारणाएँ और कल्पनाएँ खोखली, काल्पनिक और अवास्तविक हैं और इससे भी बड़ी बात यह है कि वे लोगों की काबिलियत और मन से बढ़कर हैं और उनकी सहज प्रवृत्तियों के दायरे से परे हैं। लोग अक्सर उम्मीद करते हैं कि परमेश्वर उनकी वास्तविक कठिनाइयों के आधार पर या उनकी काबिलियत, मन और सहज प्रवृत्तियों के आधार पर कार्य नहीं करेगा, बल्कि वह उन्हें इन सबसे बढ़कर होने और कुछ चीजों को करने के लिए उन्हें उनकी सामान्य मानवता और उनकी काबिलियत और सहज प्रवृत्तियों से ऊपर उठने में सक्षम बनाएगा। लोग परमेश्वर के कार्य के बारे में धारणाओं और कल्पनाओं से भरे हुए हैं और उनकी कल्पनाओं की सामग्री बेहद अलौकिक है। ये धारणाएँ और कल्पनाएँ परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्यों के पूरी तरह से विपरीत हैं और उनके प्रति शत्रुतापूर्ण हैं। लोग अपने मन में यह नहीं सोचते हैं : अगर परमेश्वर ये अलौकिक चीजें करता है तो वह अब भी इतने सारे वचन क्यों बोलता है और लोगों को इतने सारे सत्य क्यों प्रदान करता है? उसे ऐसा करने की कोई जरूरत नहीं होगी। परमेश्वर के कार्य के इतना व्यावहारिक होने का कारण यह है कि परमेश्वर अपने सभी वचन और सत्य लोगों को प्रदान करना चाहता है और उन्हें लोगों में समाविष्ट करना चाहता है ताकि वे इन वचनों और इन सत्यों के अनुसार जी सकें। उसका इरादा लोगों को सामान्य मानवता या उनके सहज प्रवृत्तियों से ऊपर उठने में सक्षम बनाना नहीं है, बल्कि सामान्य मानवता के आधार पर उन्हें सत्य सिद्धांतों को पकड़कर रखने और उन कर्तव्यों और आदेशों को पकड़कर रखने में सक्षम बनाना है जो उसने उन्हें दिए हैं। लेकिन लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ परमेश्वर के कार्य के बिल्कुल विपरीत हैं और वे परमेश्वर के कार्य करने के तरीके के बिल्कुल भी अनुरूप नहीं हैं। परमेश्वर व्यावहारिक तरीके से कार्य करना चाहता है, जबकि परमेश्वर के कार्य के बारे में लोगों की कल्पनाएँ अलौकिक चीजों से जुड़ी हैं, खोखली हैं और अवास्तविक हैं। यकीनन, कुछ लोग उम्मीद करते हैं कि परमेश्वर उन्हें प्रकाशन देने, उनका भरण-पोषण करने, उन्हें सहारा देने और उनकी मदद करने और यहाँ तक कि उन्हें बदलने और उन्हें बचाए जाने में सक्षम बनाने के लिए भी कुछ और ज्यादा खास तरीकों का उपयोग करेगा। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों के सामने जब भी कोई समस्या आती है तो अक्सर वे परमेश्वर के वचनों में इसके समाधान या अभ्यास के मार्ग नहीं खोजते हैं, बल्कि घुटनों के बल बैठ जाते हैं, अपनी आँखें बंद कर लेते हैं और प्रार्थना करते हैं। वे प्रार्थना करते समय समस्या के बारे में सत्य की तलाश नहीं करते हैं, और फिर इसे हल करने के लिए परमेश्वर के संगत वचनों को नहीं खोजते हैं। बल्कि वे उम्मीद करते हैं कि परमेश्वर उनके दिलों में उन्हें बता सकेगा कि क्या करना है; या उन्हें एक वाक्य, एक विचार या एक छवि से प्रबुद्ध कर सकेगा; या उन्हें कुछ प्रकाश प्राप्त करने में सक्षम बना सकेगा और उन्हें कुछ प्रेरणा दे सकेगा—वे इस तरीके से सत्य समझना चाहते हैं। यकीनन, कुछ ऐसे लोग भी हैं जो और चरम तरीका अपनाते हैं, जो यह है कि जब भी उनके सामने कोई समस्या आती है तो वे उम्मीद करते हैं कि परमेश्वर उन्हें सपने में अपने वचनों के एक अंश का प्रकाशन कर सकेगा, उन्हें बताएगा कि उन्हें फलाँ चीज करनी चाहिए या नहीं और अगर करनी चाहिए तो कैसे करनी चाहिए या उन्हें फलाँ जगह जाना चाहिए या नहीं या उन्हें फलाँ-फलाँ को सुसमाचार सुनाना चाहिए या नहीं। कुछ लोगों को जब बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तो वे सपना दिखाए जाने या सपने में उत्तर पाने की उम्मीद करते हैं और यहाँ तक कि अपने भाई-बहनों या कलीसिया के अगुआओं के साथ अपने सपने का विश्लेषण और व्याख्या करने की उम्मीद भी करते हैं, वे सोचते हैं, “परमेश्वर ने मुझे जो सपना दिखाया है उसका क्या मतलब है? वह मुझसे क्या करवाना चाहता है? क्या वह मुझे जाने के लिए कह रहा है या नहीं?” वे मानते हैं कि परमेश्वर का कार्य लोगों को प्रकाशन देना, लोगों की अगुआई करना और इन विशेष साधनों का उपयोग करके लोगों का भरण-पोषण करना है और इस प्रकार उन्हें बचाए जाने के लिए सक्षम बनाना है। क्या यह एक धारणा और कल्पना नहीं है? (हाँ, है।) ऐसे भी लोग हैं जो किसी समस्या का सामना करने पर नहीं जानते हैं कि उन्हें क्या करना है और प्रार्थना करने पर भी जब उन्हें परमेश्वर से उत्तर नहीं मिलता है, तो वे सिक्का उछालकर निर्णय लेते हैं। उदाहरण के लिए, जब सुसमाचार का प्रचार करने के लिए किसी जगह जाने की बात आती है, तो वे परमेश्वर से इस बारे में प्रार्थना करते हैं कि उन्हें जाना चाहिए या नहीं और उन्हें कोई उत्तर नहीं मिलता है, और फिर वे क्या करते हैं? यह तय करने के लिए कि उन्हें जाना चाहिए या नहीं, वे बस सिक्का उछालते हैं। वे सोचते हैं कि अगर नीचे गिरने पर यह चित आता है, तो यह साबित होता है कि परमेश्वर चाहता है कि वे जाएँ, जबकि अगर यह पट आता है, तो यह साबित होता है कि परमेश्वर नहीं चाहता है कि वे जाएँ। वे तीन बार सिक्का उछालते हैं और यह एक बार चित और दो बार पट आता है, इसलिए वे निष्कर्ष निकालते हैं, “यह दो बनाम एक है, जिसका मतलब है कि परमेश्वर नहीं चाहता है कि मैं जाऊँ,” और वे नहीं जाते हैं। यहाँ तक कि वे नहीं जाने के बारे में भी निश्चिंत रहते हैं, सोचते हैं कि यह परमेश्वर की इच्छा है और खुद से कहते हैं, “मुझे परमेश्वर के मार्गदर्शन का पालन करना चाहिए। यह परमेश्वर का फैसला है, मेरा नहीं। मुझे परमेश्वर के मार्गदर्शन के प्रति समर्पण करना चाहिए और नहीं जाना चाहिए।” तो क्या उन्हें वास्तव में जाना चाहिए या नहीं? क्या इस तरीके से परमेश्वर के इरादों की तलाश करने से सटीक उत्तर मिल सकता है? यह उत्तर बिल्कुल भी सटीक नहीं हो सकता है। ऐसी स्थिति का सामना करने पर तुम्हें सिद्धांतों के आधार पर और इस आधार पर फैसला लेना चाहिए कि क्या परिस्थितियाँ इसकी अनुमति देती हैं—सिर्फ यही तरीका सही है। सुसमाचार का प्रचार करना तुम्हारा कर्तव्य है, तुम्हारा कार्य है और ऐसा कार्य है जो तुम्हें आज करना चाहिए, इसलिए तुम्हें जाना चाहिए—सही सिर्फ यह है कि तुम जाओ। लेकिन अक्सर लोग ऐसे मामलों को इन वास्तविकताओं के आधार पर नहीं समझते हैं या नहीं सँभालते हैं। बल्कि वे अक्सर उनके साथ कुछ धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर पेश आते हैं और कुछ असामान्य साधनों और विधियों का उपयोग करके उनका मूल्यांकन करते हैं और अंत में कुछ बेतुके और विकृत फैसले लेते हैं। क्या यह उनकी धारणाओं और कल्पनाओं के कारण नहीं है? (हाँ।) परमेश्वर के कार्य में जब परमेश्वर ऐसे स्पष्ट वचन प्रदान नहीं करता है जो लोगों को बताते हों कि हर चीज कैसे की जानी चाहिए या हर प्रकार के मुद्दे से निपटने में किन सिद्धांतों का पालन करना चाहिए, तो लोगों को पवित्र आत्मा के निर्देश का पालन करने और उस मार्गदर्शन का पालन करने की जरूरत है जो परमेश्वर उन्हें वास्तविक परिस्थितियों में प्रदान करता है। यकीनन, उन्हें अपने भाई-बहनों के साथ चर्चा करने या प्रार्थना करने और साथ मिलकर तलाश करने की और अंत में वास्तविक स्थिति के आधार पर यह तय करने की भी जरूरत है कि मौजूदा मुद्दे से कैसे निपटना है। लेकिन परमेश्वर के कार्य में जब परमेश्वर के पास ऐसे स्पष्ट वचन और स्पष्ट निर्देश होते हैं जो लोगों को विभिन्न मामलों के लिए अभ्यास के सिद्धांत बताते हैं, तो पहले अपनाई गई इन औपचारिकताओं को हटाया जा सकता है और लोगों को अब उनका पालन करने की जरूरत नहीं है। अगर वे उनका पालन करते रहे तो इससे सिर्फ चीजों में देरी होगी। उदाहरण के लिए, मान लो कि जब भी कुछ होता है और जाकर कार्यवाही करना जरूरी होता है, तब भी लोग अपने घुटनों के बल बैठ जाते हैं और प्रार्थना करते हैं, पूछते हैं, “परमेश्वर, मुझे जाना चाहिए या नहीं? अगर तुम नहीं चाहते कि मैं जाऊँ, तो मुझे रोकने के लिए कुछ परिस्थितियाँ बना दो या अगर तुम चाहते हो कि मैं जाऊँ, तो मेरे लिए सब कुछ सुचारू रूप से चला दो।” यह सख्ती से औपचारिकताओं का पालन करना है और यह वह नहीं है जिसकी परमेश्वर लोगों से अपेक्षा करता है। जब परमेश्वर के पास अपनी अपेक्षाओं और कसौटियों के संबंध में स्पष्ट वचन होते हैं, तो लोगों को तलाशने, प्रार्थना करने, छानबीन करने आदि जैसी किसी भी औपचारिकता से गुजरने की जरूरत नहीं होती है। बल्कि एक लिहाज से उन्हें वास्तविक स्थिति और वास्तविक परिस्थितियों के अनुसार कार्य करना चाहिए और दूसरे लिहाज से, सबसे बड़ी बात, उन्हें सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना चाहिए—यह सही है। हर रोज चीजों को उचित क्रम में सँभालो, जो भी तुम्हें करना चाहिए उसे करो और जो तुम्हें नहीं करना चाहिए उसे मत करो; जो भी जरूरी हो और जिससे निपटने की जरूरत हो उससे निपटो, जो कुछ भी फिलहाल छोड़ा जा सकता है उसे स्थगित कर दो और पहले जरूरी मामलों पर ध्यान दो। क्या ये सिद्धांत नहीं हैं? (हाँ, हैं।) वे सचमुच सिद्धांत हैं। तुम्हें यह याद रखना चाहिए : जब तुम परमेश्वर से प्रार्थना करते हो और उसके इरादे गहराई से समझने का प्रयास करते हो, तो तुम्हें ऐसा उसके वचनों के आधार पर करना चाहिए; विशेष परिस्थितियों में, यानी जब परमेश्वर से निर्देश देने वाला कोई स्पष्ट वचन नहीं है, तब भी तुम्हें यह पता होना चाहिए कि उसके पास सभी प्रकार के मामलों के लिए स्पष्ट वचन और अभ्यास के सिद्धांत हैं और ऐसे मामलों में तुम्हें उन विभिन्न सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना चाहिए जिनके बारे में अतीत में परमेश्वर ने लोगों को आगाह किया था। लेकिन लोगों ने अपने मन में परमेश्वर के कार्य के बारे में ऐसी कई धारणाएँ और कल्पनाएँ बना ली हैं जो बेहूदी हैं, बेतुकी हैं और अलौकिक चीजों से संबंधित हैं, जो परमेश्वर के वचनों और विभिन्न सत्य सिद्धांतों को सजावटी चीजों और खोखले सिद्धांतों में बदल देती हैं और ऐसा कर देती हैं कि जब लोग समस्याओं का सामना करते हैं, तो ये उनके लिए चीजों से निपटने की कसौटियाँ या अभ्यास के मार्ग नहीं हो पाते हैं। यह शोचनीय बात है और यह पूरी तरह से इस तथ्य के कारण होती है कि लोगों ने परमेश्वर के कार्य के बारे में बहुत सारी धारणाएँ और कल्पनाएँ बना ली हैं।

परमेश्वर के कार्य के बारे में लोगों की कुछ दूसरी बेहूदी, बेतुकी और अजीब धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं, जो उनके रोजमर्रा के जीवन में व्याप्त हैं। उदाहरण के लिए, मान लो कि जैसे ही कोई व्यक्ति वह कार्य करने वाला होता है जो उसे सबसे ज्यादा करना चाहिए, तो कुछ ऐसा हो जाता है जो उसे लगता है कि नहीं होना चाहिए था, जैसे कि कार्य करने के लिए जाते समय उसका सेल फोन चोरी हो जाना या उसकी गाड़ी खराब हो जाना या उसका रास्ते में गिर पड़ना या कुछ और गड़बड़ी हो जाना। इसका क्या मतलब है? क्या इसका यह मतलब है कि परमेश्वर उसे यह कार्य करने से रोक रहा है? क्या इसका यह मतलब है कि यह कार्य करना परमेश्वर के इरादों के अनुरूप नहीं है? क्या इसका यह मतलब है कि यह कार्य नहीं करना चाहिए? क्या इसे इस तरह से समझा और बूझा जाना चाहिए? (नहीं।) अगर अपने कर्तव्य के निर्वहन में यह वह सबसे महत्वपूर्ण चीज है जो तुम्हें अभी करनी चाहिए और तुम जाकर इसे करते हो, तो अगर तुम्हारे रास्ते में कुछ रुकावटें और कठिनाइयाँ आती भी हों या यहाँ तक कि तुम्हारे सामने ऐसी चीजें होती भी हों जिनके बारे में लोगों को लगता है कि उन्हें नहीं होना चाहिए, तो भी यह नहीं कह सकते हैं कि यह कर्तव्य जिसका तुम निर्वहन कर रहे हो और यह कार्य जिसे तुम कर रहे हो, वे परमेश्वर को नाराज करते हैं या परमेश्वर तुम्हें ये चीजें करने से रोक रहा है—यह एक मानवीय धारणा और कल्पना है। अगर परमेश्वर तुम्हें रोकना चाहेगा, तो वह उन तरीकों का उपयोग नहीं करेगा। बल्कि वह सीधे एक परिस्थिति का इंतजाम करेगा ताकि तुम्हें स्वाभाविक रूप से वहाँ जाने और उस कार्य को करने की जरूरत न पड़े। यानी परमेश्वर तुम्हारे मन में यह बहुत स्पष्ट कर देगा कि कुछ और महत्वपूर्ण चीज है जिसे तुम्हें आज करना चाहिए और नतीजतन उस कार्य को तुम्हारी सूची में दूसरे या तीसरे स्थान पर नीचे धकेलना होगा और बाद में करने के लिए छोड़ देना होगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम अपनी गणना कैसे करते हो, तुम यही पाओगे कि वास्तविक स्थिति के आधार पर उस कार्य को आज पूरा करना संभव नहीं होगा। यह परमेश्वर द्वारा तुम्हे रोकना है। लेकिन चाहे तुम कुछ भी सोचो और चाहे उस कार्य को करने की प्रक्रिया में कोई भी बाधा या कठिनाई क्यों न आए, जो भी हो, अगर वह कार्य आज किया जाना चाहिए तो तुम्हें जाकर उसे करना चाहिए। अगर परमेश्वर तुम्हें रोकता है तो वह तुम्हें स्वाभाविक रूप से उस कार्य को छोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त और उचित साधन का उपयोग करेगा—परमेश्वर इसी तरीके से कार्य करता है। परमेश्वर जिस तरीके से कार्य करता है, वह है लोगों को मानवता की सहज प्रवृत्तियों के दायरे में वह करने देना जो उन्हें करना चाहिए। एक लिहाज से, लोगों का यही रवैया होना चाहिए। दूसरे लिहाज से, वस्तुनिष्ठ परिस्थितियाँ भी एक कारक हैं—अगर परिस्थितियाँ वह कार्य करने की अनुमति देती हैं, तो उसे करना चाहिए; अगर परिस्थितियाँ इसकी अनुमति नहीं देती हैं, तो लोगों को इसे करने के लिए कुछ देर प्रतीक्षा करनी चाहिए। प्रतीक्षा करने का उद्देश्य क्या है? यह सही समय और उन परिस्थितियों की प्रतीक्षा करना है जो परमेश्वर व्यवस्थित करता है। अगर परिस्थितियाँ लगातार अनुपयुक्त हैं और इस कार्य का निर्वहन करने का प्रयास करते समय चीजें गलत होती रहती हैं, तो तुम्हें उसे नहीं करना चाहिए। क्या तुम समझ गए हो? (हाँ।) लोगों के रोजमर्रा के जीवन में उन्हें यह गहराई से समझने का प्रयास करने की कोई जरूरत नहीं है कि वे कार्य करते समय अपनी अंतरात्माओं में क्या महसूस कर रहे हैं, चाहे वे किसी भी प्रकार के कार्य क्यों न हों, वे बड़े मामले हों या छोटे या वे व्यक्तिगत मामले हों या कलीसियाई मामले। अगर तुम आज आध्यात्मिक शुष्कता महसूस कर रहे हो और अपने दिल में तुम किसी कार्य को नहीं करना चाहते, तो जो लोग तुम्हारे साथ इसका निर्वहन करने जा रहे हैं उनसे पूछो कि क्या वे आध्यात्मिक शुष्कता महसूस कर रहे हैं। अगर दूसरे लोग आध्यात्मिक शुष्कता महसूस नहीं कर रहे हैं और वे अपने दिलों में यह कार्य करने के इच्छुक हैं और फिर भी तुम तुम्हारी अपनी भावनाओं के आधार पर यही निष्कर्ष निकालते हो कि इसे नहीं किया जाना चाहिए तो क्या तुम इस बारे में थोड़ा ज्यादा ही व्यक्तिपरक नहीं हो रहे हो? (हाँ।) इसलिए, जब भी लोग किसी कार्य का निर्वहन करते हैं तो उन्हें कम-से-कम यह समझना चाहिए कि उन्हें अपनी भावनाओं को गहराई से समझने की कोशिश नहीं करनी चाहिए या अपनी भावनाओं के आधार पर कार्य नहीं करना चाहिए। मान लो कि तुम्हें किसी कार्य का निर्वहन करना है और तुम थोड़ा घबरा रहे हो, तुम्हारी आँख फड़के जा रही है और तुम्हारे कान झनझना रहे हैं और तुम कहते हो, “मेरी दाईं आँख फड़क रही है, क्या यह बुरी खबर का संकेत है? क्या मुझे यह कार्य करना चाहिए?” तब कोई कहता है, “बाईं आँख का फड़कना अच्छे भाग्य की भविष्यवाणी करता है, लेकिन दाईं आँख का फड़कना विपत्ति की भविष्यवाणी करता है” और यह सुनने के बाद तुम जाकर उस कार्य को करने की हिम्मत नहीं करते। चाहे तुम्हारी कोई भी आँख क्यों न फड़के, अगर यह कोई ऐसा कार्य है जिस पर इससे पहले सहमति हो गई थी और इस कार्य को करने के लिए सभी जरूरी कारक मौजूद हैं और समय और स्थान उपयुक्त हैं, तो तुम्हें इसे जाकर जरूर करना चाहिए। अगर तुम नहीं जाने का निर्णय सिर्फ इसलिए लेते हो क्योंकि एक व्यक्ति कहता है कि तुम्हारी दाईं आँख का फड़कना विपत्ति की भविष्यवाणी करता है, तो क्या यह उचित है? (नहीं, यह उचित नहीं है।) यह उचित क्यों नहीं है? अगर यह तुम्हारी जिम्मेदारी और तुम्हारा कर्तव्य है और आज वस्तुगत परिस्थितियाँ और सभी स्थितियाँ इसे करने की अनुमति देती हैं और इसके अलावा, इस कार्य को तत्काल करने की जरूरत है, तो तुम्हें जाकर इसे करना चाहिए। अगर तुम्हारी दाईं आँख फड़कती है, तो क्या हुआ? हो सकता है कि कुछ मामूली मुद्दे उठें और चीजें बहुत सुचारू रूप से न चलें, लेकिन फिर भी कार्य पूरा हो जाता है। सिर्फ तब तुम जाकर यह कार्य नहीं कर सकते जब परमेश्वर इसे रोकता है और परिस्थितियाँ इसकी अनुमति नहीं देती हैं। कोई कहता है, “जरूर कुछ गड़बड़ है, तभी तुम्हारी दाईं आँख फड़क रही है,” लेकिन कोई और कहता है, “इस कार्य पर इससे पहले सहमति हो चुकी थी, इसलिए हमें जाकर इसे करना चाहिए।” अंत में, तुम सभी इसे करने के लिए निकल पड़ते हो, लेकिन आधे रास्ते जाकर अचानक गाड़ी खराब हो जाती है। मुझे बताओ, अगर समूह के रवाना होते समय किसी की दाईं आँख फड़कती है, तो क्या ऐसे में उन्हें जाना चाहिए? मैं देखना चाहता हूँ कि क्या तुम लोग वास्तव में सत्य समझते हो या नहीं। तुम्हें क्या लगता है, क्या जाकर यह कार्य करना सही होगा? (हाँ, यह सही होगा।) इसमें कोई संदेह नहीं है। तुम इस आधार पर कि तुम्हारी दाईं आँख फड़क रही है या बाईं, यह फैसला नहीं ले सकते कि तुम्हें जाना चाहिए या नहीं। सबसे पहली बात, यह कार्य करने के लिए जाना सही है। तो वहाँ जाते समय गाड़ी क्यों खराब हो गई? क्या परमेश्वर ने इसकी अनुमति दी थी? यह समझाना कठिन है, है ना? (आधे रास्ते में गाड़ी का खराब हो जाना मानव लापरवाही के कारण हो सकता है, जैसे कि अगर गाड़ी का पहले से मुआयना नहीं किया गया हो कि उसमें कोई समस्या थी या नहीं।) यह एक संभव कारण है। अगर हम उस कारण को खारिज कर दें तो क्या गाड़ी का बीच सफर में खराब हो जाना सामान्य बात है? (हाँ।) अगर तुम कोई ऐसी पुरानी चीनी गाड़ी खरीदते हो जो शुरू से ही बहुत अच्छी गुणवत्ता वाली नहीं थी और तुम उसका रखरखाव नहीं करते हो या ठीक से उसकी मरम्मत नहीं करवाते हो और बस उसे चलाते रहते हो, तो वह गाड़ी बीच सफर में खराब हो जाएगी। अगर गाड़ी बीच सफर में खराब हो जाती है तो क्या इसका यह मतलब है कि कार्य को यकीनन पूरा नहीं किया जा सकता है? (ऐसा जरूरी नहीं है।) गाड़ी खराब हो जाती है और उसकी मरम्मत करवाने में एक या दो घंटे लगते हैं। जब तुम गंतव्य पर पहुँचते हो तो वहाँ के भाई-बहन कहते हैं, “यह खुशकिस्मती की बात है कि तुम लोग इस समय आए हो। निगरानी एजेंट बस अभी-अभी यहाँ से गए हैं। अगर तुम लोग दो घंटे पहले आए होते, तो तुम यकीनन बड़े लाल अजगर द्वारा पकड़ लिए जाते। बाल-बाल बच गए!” तो देखा तुमने, एक बुरी चीज अच्छी चीज साबित हुई। क्या जाकर कार्य करना सही था? (हाँ।) क्या गाड़ी के खराब होने में परमेश्वर का अच्छा इरादा था? (हाँ।) तो क्या तुम्हारी दाईं आँख का फड़कना बदकिस्मती का संकेत था या खुशकिस्मती का? (किसी का भी नहीं।) इसके नतीजे के तौर पर कुछ भी नहीं हुआ। अगर हम कहानी को उस बिंदु पर समाप्त कर देते हैं जब गाड़ी खराब हुई, तो फिर यह दावा कि “दाईं आँख का फड़कना विपत्ति की भविष्यवाणी करता है” काफी सटीक लगेगा। गाड़ी का खराब होना एक दुर्घटना थी, है ना? लेकिन अंतिम नतीजा देखा जाए तो गाड़ी का खराब होना एक अच्छी चीज साबित हुई। अगर गाड़ी खराब नहीं होती तो तुम सभी गंतव्य पर पहुँचने पर मुसीबत में पड़ जाते—न सिर्फ तुम कार्य पूरा करने में विफल हो जाते, बल्कि तुम्हें गिरफ्तार भी कर लिया जाता। हालाँकि, जैसा कि बाद में पता चला, रास्ते में गाड़ी खराब हो गई और उसे ठीक करने में दो घंटे लग गए, इसलिए जब तक तुम वहाँ पहुँचे, तब तक खतरा अभी-अभी टल चुका था और तुम सुरक्षित थे। यह परमेश्वर द्वारा तुम्हारी रक्षा करना था! जरा सोचो, अगर गाड़ी के खराब होने के परिप्रेक्ष्य से देखा जाए, तो ऐसा लगता है जैसे परमेश्वर तुम्हें जाने से रोक रहा था, लेकिन तुम्हें सिर्फ गाड़ी की मरम्मत होने और बिना किसी और घटना के तुम्हारे वहाँ पहुँचने के बाद ही वास्तव में पता चला कि क्या हुआ था। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान परमेश्वर के क्रियाकलापों के सिद्धांतों और तरीकों को तुम लोग कैसे देखते हो? लोगों को परमेश्वर के कार्य के बारे में किस तरह की समझ होनी चाहिए? इन चीजों की समीक्षा करो, यहाँ कुछ सत्य हैं जिनकी तलाश की जा सकती है और मैं देखूँगा कि तुम उन्हें तलाशने में समर्थ हो या नहीं। (परमेश्वर, मेरी समझ यह है कि इससे फर्क नहीं पड़ता है कि लोगों के साथ अच्छी चीजें घटित होती हैं या बुरी, इसमें परमेश्वर का अच्छा इरादा होता है।) यह एक पहलू है। (एक और पहलू है, जो यह है कि परमेश्वर का कार्य अलौकिक या काल्पनिक नहीं है, बल्कि बहुत व्यावहारिक है।) हाँ, यह अच्छी समझ है। परमेश्वर का कार्य व्यावहारिक है और यह काल्पनिक या अलौकिक नहीं है; सामान्य मानवता वाला कोई भी व्यक्ति इसे महसूस कर सकता है और अनुभव के जरिये इसे जान सकता है और यह कुछ ऐसा भी है जिसे लोग बूझने में समर्थ हैं। क्या यह वही समझ नहीं है जो लोगों को परमेश्वर के कार्य के बारे में होनी चाहिए? (हाँ।) इस समझ के अलावा लोगों को और क्या समझना चाहिए? उन्हें यह समझना चाहिए कि परमेश्वर हर चीज पर संप्रभु है। परमेश्वर अपने कार्य में जो भी विशिष्ट कार्य करता है, वह लोगों को यह देखने में सक्षम बनाता है कि उसके क्रियाकलाप अत्यंत व्यावहारिक हैं। शुरू में जब तुम्हारा समूह रवाना हो रहा था, तो तुम में से कुछ लोगों ने इस पर चर्चा की कि जाएँ या नहीं जाएँ। परमेश्वर ने तुम्हें नहीं रोका; उसने तुम्हें मतली जैसा महसूस नहीं करवाया या तुमसे उल्टी नहीं करवाई या तुम्हें दस्त नहीं लगवाए। उसने न तो तुम्हें रोका और न ही तुम्हें जाने के लिए प्रेरित किया। क्या यह बहुत व्यावहारिक नहीं है? उसने समूह को इस पर मिलकर बात करने की अनुमति दी। कुछ लोगों ने कहा कि उनकी दाईं आँख फड़क रही है, जबकि दूसरों ने कहा कि वे अंदर से असहज महसूस कर रहे हैं, लेकिन चाहे तुमने अपनी भावनाओं और मिजाज पर भरोसा किया हो या अलौकिक चीजों से संबंधित कल्पनाओं पर, अंत में तुम्हें वहाँ जाना चाहिए था जहाँ तुमसे जाने की अपेक्षा की गई थी, और परमेश्वर ने तुम्हें किसी भी तरीके से नहीं रोका। क्या परमेश्वर के लिए इस तरीके से कार्य करना बहुत व्यावहारिक नहीं है? (हाँ।) परमेश्वर के क्रियाकलाप रत्ती भर भी खोखले नहीं हैं; सभी तरह की मानवीय अभिव्यक्तियों की अनुमति है जिसमें कुछ लोगों की आँख फड़कना भी शामिल है। मुझे बताओ, क्या परमेश्वर लोगों की आँख फड़कना रोक सकता है या नियंत्रित कर सकता है? क्या परमेश्वर के लिए इसे नियंत्रित करना बहुत आसान नहीं होता? लेकिन क्या उसने ऐसा किया? (नहीं।) परमेश्वर ने ऐसा नहीं किया। उसने दखल नहीं दिया, उसने तुम्हें आजादी दी। तुम्हारी आँख वैसे ही फड़की जैसे उसे फड़कना था, लेकिन फिर भी अंत में समूह चल पड़ा—यह सब कुछ कितना व्यावहारिक था। लेकिन गंतव्य पर मुसीबत मौजूद थी और परमेश्वर ने इस खतरे से सिर्फ इसलिए छुटकारा नहीं पाया कि तुम लोग उधर जा रहे हो। परमेश्वर ने ऐसा नहीं किया और मुसीबत तब भी वैसे ही खड़ी हुई जैसे होनी चाहिए थी। फिर भी परमेश्वर ने एक चतुराई भरी चीज की : उसने तुम लोगों की गाड़ी बीच रास्ते में खराब कर दी जिससे जब तक गाड़ी की मरम्मत पूरी हुई और तुम सब गंतव्य पर पहुँचे, तब तक खतरा टल चुका था। यह परमेश्वर द्वारा तुम्हारी रक्षा करना था! देखा तुमने, इस समय अंतराल के कारण उसने चतुराई से तुम्हें खतरे से बचने में सक्षम बनाया। परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह कितना व्यावहारिक है, है ना? (हाँ।) तो यह तुम्हें बहुत ही व्यावहारिक तरीके से दिखाता है कि परमेश्वर जो करता है वह बिल्कुल भी खोखला या अलौकिक नहीं होता है और हर चीज का होना स्वाभाविक और अवश्यंभावी है, लेकिन इसमें परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता निहित है। पूरी घटना के दौरान, चाहे लोगों की कल्पनाएँ कुछ भी रही हों, चाहे उनकी कठिनाइयाँ, कमजोरियाँ और समस्याएँ कुछ भी रही हों, चाहे उन्होंने साथ मिलकर जिन दृष्टिकोणों पर चर्चा की वे सही या गलत रहे हों, इनमें से किसी ने भी अंत में जो हुआ उसे प्रभावित नहीं किया और न ही इसने घटना के अवश्यंभावी नतीजे को प्रभावित किया। हर एक चीज जो होनी चाहिए थी वह हुई, जो मुसीबत खड़ी होनी चाहिए थी वह खड़ी हुई, जो गाड़ी खराब होनी चाहिए थी वह खराब हुई, और लोगों के दृष्टिकोण भी बेनकाब कर दिए गए, लेकिन घटना का अंतिम परिणाम फिर भी उसी तरीके के अनुसार हुआ जैसा परमेश्वर ने तय किया था और उसी के अनुसार हुआ जैसा परमेश्वर ने पूर्वनियत किया था और जिस तरह से परमेश्वर ने घटना पर संप्रभुता का प्रयोग किया था। यह परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता है, है ना? (हाँ।) यह सब कुछ कितना व्यावहारिक और सामान्य रूप से हुआ, ठीक वैसे ही जैसे लोगों के साथ उनके रोजमर्रा के जीवन में हर रोज होता है; यह स्वाभाविक रूप से हुआ और यह अलौकिक, काल्पनिक या खोखला नहीं था। इसलिए, इस मामले में लोगों को यह समझना चाहिए कि परमेश्वर का कार्य व्यावहारिक है और वह हर चीज पर संप्रभु है। लोगों को कैसे अभ्यास करना चाहिए? सबसे पहली बात, उन्हें यह समझना होगा कि चाहे उनके साथ कुछ भी घटित हो, उन्हें किन सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। अगर वे सिर्फ मानवीय भावनाओं के अनुसार चलते हैं, तो यह भरोसेमंद नहीं है। उन्हें अलौकिक भावनाओं के अनुसार नहीं चलना चाहिए या खोखली कल्पनाओं के आधार पर बेबुनियाद अटकलें नहीं लगानी चाहिए। बल्कि उन्हें वास्तविक हालातों और उन्हें जो कर्तव्य करने चाहिए उनके आधार पर जाकर वही करना चाहिए जो उन्हें करना चाहिए। इसके अलावा, महत्वपूर्ण बात यह है कि वे जाकर वही करें जो उन्हें सत्य सिद्धांतों के आधार पर करना चाहिए। क्या तब यह ज्यादा आसान नहीं है? (हाँ।) इसलिए, चाहे तुम्हारे सामने कोई भी समस्या आए और चाहे परमेश्वर का कार्य किसी भी चरण तक पहुँच चुका हो, तुम्हें अपनी भावनाओं के अनुसार चलने की जरूरत नहीं है, तुम्हें यह देखने की जरूरत नहीं है कि कोई तारीख शुभ है या नहीं और विशेष रूप से यकीनन तुम्हें कोई खगोलीय परिघटना देखने या कोई भविष्यवाणी सुनने की जरूरत नहीं है—तुम बस वही करो जो तुम्हें करना चाहिए। कुछ लोग खगोलीय परिघटनाएँ देखना पसंद करते हैं या यह देखना चाहते हैं कि तारीखें शुभ हैं या नहीं, वे कहते हैं, “कल की तारीख अच्छी नहीं है, अगर मैं बाहर गया तो क्या सब कुछ गड़बड़ हो जाएगा? क्या महान लाल अजगर गिरफ्तारियाँ करेगा? आज सुबह जब मैं जल्दी उठा और बाहर गया, तो दरवाजे के पास कौआ काँव-काँव क्यों कर रहा था? मैंने सुना कि कल रात जब कुछ लोग बाहर गए थे, तो उन्होंने एक काली बिल्ली देखी थी। ये सब अशुभ संकेत हैं! मुझे क्या करना चाहिए? क्या कुछ खतरनाक होने वाला है?” अगर तुममें सामान्य मानवता और सामान्य मानवीय सोच है, तो तुम्हें यह फैसला लेने में समर्थ होना चाहिए कि किस तरह की परिस्थितियाँ खतरनाक हैं और किस तरह की परिस्थितियाँ अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं और यह जानने में समर्थ होना चाहिए कि वास्तविक स्थिति के अनुसार उनके साथ कैसे पेश आना है और उनसे कैसे निपटना है—तुम्हें उन दूसरी चीजों को देखने की जरूरत नहीं है। जहाँ तक इस बात का प्रश्न है कि तुम्हें हर रोज क्या करना चाहिए और क्या नहीं, एक लिहाज से, परमेश्वर के ऐसे स्पष्ट वचन हैं जो सत्य सिद्धांतों के रूप में कार्य करते हैं और दूसरे लिहाज से, तुम्हारे पास सामान्य मानवता, जमीर और विवेक है और जब तक तुम हर रोज वही करते हो जो तुम्हें वास्तविक परिस्थितियों की व्यवस्था और उनके द्वारा प्रदान की गई दिशा के आधार पर और सामान्य मानवता की वास्तविक जरूरतों और अपनी खुद की जिम्मेदारियों और दायित्वों के अनुसार करना चाहिए, तब तक यह ठीक है। अगर लोग अपने रोजमर्रा के जीवन के साथ इस तरह से पेश आते हैं तो क्या चीजें और आसान नहीं हो जाएँगी? (हाँ।)

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें