सत्य का अनुसरण कैसे करें (1) भाग तीन

ख. परमेश्वर अपने कार्य में जो नतीजे हासिल करना चाहता है, उनके बारे में लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ

वैसे तो परमेश्वर का कार्य सर्वशक्तिमान और अद्भुत है और परमेश्वर के वचन सत्य और जीवन हैं, लेकिन फिर भी लोगों को रातों-रात पूर्ण करना या बदलना संभव नहीं है। कुछ लोग अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर अक्सर यह कहते हैं, “मैंने तो इतने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखा है, फिर भी मैं क्यों नहीं बदला? मैंने अब भी पवित्रीकरण प्राप्त क्यों नहीं किया? अपने दिल में अब भी मुझे दुनिया से प्रेम क्यों है? मैं अब भी इतना घमंडी क्यों हूँ? अब भी मुझमें दुष्ट वासना क्यों है? पहले मुझे अविश्वासी दुनिया के कुछ वीडियो या मनोरंजन कार्यक्रम देखना पसंद था। मैं अब भी कभी-कभी उन्हें क्यों देखना चाहता हूँ, जबकि मैंने अब तक परमेश्वर में विश्वास रखा है, बहुत वर्षों से परमेश्वर के वचनों को खाया-पीया है, अपना कर्तव्य किया है, चीजों का त्याग किया है और बहुत वर्षों से खुद को खपाया है और मुझे लगता है कि मैं अपने दिल में उन चीजों को पहले ही छोड़ चुका हूँ?” लोग ऐसी ही धारणाएँ रखते हैं, हैं ना? विशेष रूप से, कुछ लोग परमेश्वर में अपने विश्वास में हमेशा ऐसी चीजों का पीछा करते हैं, जैसे कि अपने देह को अधीन करना, दैहिक सुखों का लालच नहीं करना, ज्यादा कष्ट सहना और कड़ी मेहनत करना और बहुत-से शारीरिक कष्टों पर विजय पाने में समर्थ होना। लेकिन उनके इस तरह से पीछा करते रहने के बावजूद उन्हें अब भी यही लगता है कि वे अक्सर देह की अत्यधिक इच्छाओं, अपनी सुख-सुविधाओं का लालच करने और आलसीपन के वश में आ जाते हैं और इसलिए वे अक्सर नकारात्मक हो जाते हैं और परमेश्वर में आस्था खो देते हैं, वे सोचते हैं, “परमेश्वर का कार्य इस बिंदु तक पहुँच गया है, तो फिर मैं इतना निराशाजनक क्यों हूँ और अब भी अक्सर नकारात्मक क्यों हो जाता हूँ?” कभी-कभी जब वे किसी कार्य में कुछ परिणाम प्राप्त कर लेते हैं और सभी की स्वीकृति प्राप्त कर लेते हैं, तो वे सहज महसूस करते हैं और सोचते हैं, “मुझे अब भी बचाए जाने की उम्मीद है। परमेश्वर का कार्य और उसके वचन इतने अच्छे हैं। उसका कार्य वाकई लोगों को बदल सकता है।” लेकिन फिर कुछ समय बाद उन्हें लगता है कि उन्हें अब भी अपने प्रियजनों की याद आती है। विशेष रूप से, उन्हें कभी-कभी उन लोगों की याद आती है जिनसे उन्हें कभी प्रेम था और वे पुरानी यादों में खोकर उस सांसारिक जीवन को याद करते हैं जिसे वे कभी जीते थे और उन्हें वाकई अपने उन गौरवशाली दिनों की याद आती है जब वे बाहर दुनिया में थे और इसलिए वे हैरान होते हैं, “मुझे अब भी उन चीजों की याद क्यों आती है? मैंने दैहिक सुखों को क्यों नहीं छोड़ा और खुद को पवित्र करके दुनिया से अलग क्यों नहीं किया? मैं अब तक क्यों नहीं बदला?” और वे एक बार फिर से परेशान हो जाते हैं। वे अक्सर इन विचारों और दृष्टिकोणों के बीच झूलते रहते हैं। उनकी दशा कभी अच्छी होती है और कभी बुरी, वे कुछ देर के लिए कमजोर हो जाते हैं और फिर कुछ देर के लिए मजबूत हो जाते हैं, वे कुछ देर के लिए नकारात्मक हो जाते हैं और फिर कुछ देर के लिए सकारात्मक हो जाते हैं। वे अक्सर रोजमर्रा के जीवन में अपनी अभिव्यक्तियों के आधार पर खुद पर फैसले देते हैं। अगर वे अच्छी मनोदशा में होते हैं, तो सोचते हैं कि वे उद्धार के लिए लक्ष्य हैं; अगर वे बुरी दशा में होते हैं, तो उन्हें लगता है कि उनके बचाए जाने की कोई उम्मीद नहीं है और वे छुटकारे से परे हैं। वे या तो एक चरम पर होते हैं या फिर दूसरे चरम पर। जब वे अच्छी मनोदशा में होते हैं तो उन्हें लगता है कि वे किसी पवित्र इंसान जैसे हैं और परमेश्वर के बहुत करीब हैं, उनके और परमेश्वर के बीच कोई रुकावट नहीं है और उन्हें लगता है कि परमेश्वर उनके ठीक पास में है। जब वे बुरी दशा में होते हैं तो उन्हें लगता है कि वे नरक के अठारहवें स्तर में गिर गए हैं और परमेश्वर को देख या छू नहीं सकते हैं और उन्हें लगता है कि परमेश्वर उनसे बहुत दूर है। ऐसा क्यों है? उनमें ये दशाएँ क्यों होती हैं? क्या ये दशाएँ सामान्य हैं या असामान्य? (असामान्य।) जब वे अच्छी दशा में होते हैं तो वे वही करते हैं जिसे करने की व्यवस्था कलीसिया उनके लिए करती है और वे किसी भी कठिनाई पर विजय प्राप्त कर सकते हैं, कोई भी कष्ट सह सकते हैं और कोई भी कीमत चुका सकते हैं। उन्हें लगता है कि वे ही हैं जो परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में सबसे ज्यादा सक्षम हैं, वे परमेश्वर के घर में सत्य का अनुसरण करने वाले व्यक्ति हैं और कोई भी कठिनाई उन्हें मात नहीं दे सकती है। वे अपना कर्तव्य करने के लिए बहुत मेहनत करते हैं और वे प्रयास करने को तैयार रहते हैं। दूसरों के साथ संगति करते समय वे चाहे कितनी भी बातें क्यों न करें, उन्हें थकान महसूस नहीं होती, और उन्हें भोजन छोड़ देने या दो-तीन घंटों की नींद नहीं लेने से कोई आपत्ति नहीं है। वे परमेश्वर के लिए खुद को खपाने और अपना पूरा जीवन परमेश्वर को समर्पित करने के लिए तैयार रहते हैं। फलस्वरूप, उन्हें लगता है कि वे बदल गए हैं। वे अब अपने परिवार के बारे में नहीं सोचते हैं, वे अब उन लोगों को याद नहीं करते हैं जिनसे वे कभी प्रेम करते थे और वे अब अतीत की स्मृतियों में खोकर उस गौरव और सम्मान को याद नहीं करते जो दुनिया में उनके पास था। वे ये सब कुछ हवा में उड़ा देते हैं और परमेश्वर के लिए पूरे दिल से खुद को खपाते हैं, सिद्धांतों का पालन करते हैं, जो कोई भी बाधा या विघ्न डालता है उसकी काट-छाँट करते हैं, परमेश्वर के घर के लिए निष्पक्षता बनाए रखते हैं, दृढ़ता से न्याय के पक्ष में खड़े होते हैं, परमेश्वर के घर के हितों का बचाव करते हैं और एक सख्त और निष्पक्ष “न्यायाधीश” के रूप में अपनी छवि बनाते हैं। वे कुछ समय तक बहुत अच्छा प्रदर्शन करते हैं। लेकिन ऐसा समय भी आ सकता है जब वे अपने भ्रष्ट स्वभाव प्रकट कर दें या कोई गड़बड़ी कर दें, तो फिर वे नकारात्मक और कमजोर हो जाएँगे और सोचेंगे, “परमेश्वर ने मुझे बेनकाब कर दिया है, वह अब मुझसे प्रेम नहीं करता है।” उसके बाद से वे अपने पैरों पर वापस खड़े नहीं हो पाएँगे। उन्हें लगेगा कि वे कुछ भी नहीं हैं और वे कुछ भी करने में अक्षम हैं, अब भी उनके मन में स्वार्थी विचार और दुष्ट वासना है, वे अक्सर उन लोगों को याद करते हैं जिनसे वे कभी प्रेम करते थे और जिन्हें पसंद करते थे, वे अक्सर नकारात्मक और कमजोर हो जाते हैं, वे अब भी परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, वे सत्य का अभ्यास करने में अक्षम हैं और इतने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखने के बावजूद वे नहीं बदले हैं और वे सोचेंगे, “क्या इसका मतलब यह नहीं है कि मैं तबाह हो गया हूँ?” वे सोचेंगे कि उनके पास बचाए जाने का कोई मौका नहीं है और उनके लिए बिल्कुल कोई उम्मीद नहीं है। जब वे खुश होते हैं, तो वे खुशी से फूले नहीं समाते हैं और जब वे दुखी होते हैं, तो वे अविश्वसनीय रूप से दुखी होते हैं। वे हमेशा इन दो चरम सीमाओं पर चले जाते हैं, अचानक एक सीमा से दूसरी सीमा पर पहुँच जाते हैं। ऐसा क्यों है? ये दशाएँ और अभिव्यक्तियाँ चाहे सकारात्मक हों या फिर मायूसी की, संक्षेप में, यह सब कुछ एक ही प्रकार की समस्या है, यानी परमेश्वर के कार्य के बारे में धारणाओं और कल्पनाओं से भरा होना और हमेशा अपने बारे में फैसला देना और अपने मिजाज के आधार पर और एक निश्चित अवधि के दौरान अपने खुलासों और अभिव्यक्तियों के आधार पर खुद का निरूपण करना, जबकि उसी समय परमेश्वर के कार्य पर, लोगों पर उसके कार्य से प्राप्त परिणामों पर और लोगों पर उसके कार्य से जो उद्देश्य और लक्ष्य हासिल होता है उस पर फैसले देना। क्या यही समस्या की जड़ है? (हाँ।) जब लोग सकारात्मक होते हैं तो वे परमेश्वर के सामने प्रार्थना करते हैं, बिलख-बिलखकर रोते हुए अपना संकल्प व्यक्त करते हैं, बदले में कुछ माँगे बिना अपना पूरा जीवन परमेश्वर को समर्पित करने को तैयार रहते हैं, परमेश्वर का अनुसरण करने और उसके लिए खुद को खपाने को तैयार रहते हैं। जब वे इस तरह से प्रार्थना करते हैं और संकल्प लेते हैं, तो उन्हें लगता है कि सभी कठिनाइयाँ अब कठिनाइयाँ नहीं रहीं। उनकी आँखें भर आती हैं और वे यह भी मानते हैं कि उन्हें पवित्र आत्मा ने ही भावुक किया है। वे सोचते हैं, “मुझे पवित्र आत्मा ने भावुक किया है। परमेश्वर मुझसे जरूर इतना प्यार करता है! परमेश्वर ने मुझे नहीं छोड़ा है!” वे डबडबाई आँखों से प्रार्थना करते हैं और कहते हैं कि उन्हें पवित्र आत्मा ने भावुक किया है—क्या यह भ्रम नहीं है? (हाँ।) दरअसल, तुम इस बात से भावुक हुए कि तुम्हें अपने बारे में इतना अच्छा महसूस हुआ; तुम पवित्र आत्मा के बजाय अपने खुद के संकल्प, आकांक्षाओं, इच्छाओं और अपने खुद के क्रियाकलापों के कारण भावुक हुए। मैं क्यों कहता हूँ कि तुमने खुद अपने आप को भावुक किया? परमेश्वर के कार्य के बारे में तुम्हारे मन में इतनी सारी धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं और वे इतनी विकृत हैं—क्या तुम्हें लगता है कि परमेश्वर तुम्हें भावुक करेगा? जब तुम इस चरम दशा में हो, तब क्या परमेश्वर तुम्हें भावुक करेगा ताकि तुम और चरम दशा में पहुँच जाओ? अगर परमेश्वर ने तुम्हें भावुक किया होता तो यह केवल तुम्हें और भी चरम दशा में पहुँचा देता और तुम अपनी सराहना करने लगते और खुद को और भी भावुक कर लेते और तुम्हारी यह संकल्प लेने की इच्छा और भी बढ़ जाती : “मैं कम सोऊँगा और ज्यादा कष्ट सहूँगा, मैं खाना खाऊँगा, चाहे वह अच्छा हो या बुरा, मैं कुछ भी खाकर खुश रह लूँगा और इस बात की परवाह नहीं करूँगा कि यह मेरे शरीर के लिए अच्छा है या नहीं। मुझे अपने पुराने देह की पसंद पर काबू पाना होगा, मुझे विशेष रूप से अपने पुराने देह की कमियों को ठीक करना होगा और मुझे अपने देह को और कष्ट सहने पर मजबूर करना होगा और उसे आराम से रहने नहीं देना होगा। अगर इसे आराम महसूस हुआ, तो मैं परमेश्वर से प्रेम नहीं करूँगा; अगर इसे आराम महसूस हुआ, तो फिर मैं दैहिक सुख-सुविधाओं में लिप्त हो जाऊँगा और अपना कर्तव्य करने के लिए कड़ी मेहनत नहीं करूँगा।” अगर तुम्हें पवित्र आत्मा भावुक कर रहा होता, तो तुम बस इस चरम सीमा को लगातार बनाए रखते और इससे भी ज्यादा गलती से यह मान लेते कि तुम पहले ही देह पर विजय प्राप्त कर चुके हो और तुमने शैतान को हरा दिया है और तुम पहले ही बचाए जा चुके हो। इसलिए मैं कहता हूँ कि तुम्हें पवित्र आत्मा ने नहीं बल्कि खुद तुम्हीं ने भावुक किया। क्या तुम लोग अक्सर अपने आप को भावुक कर लेते हो? (हाँ।) तुम परमेश्वर के लिए खुद को खपाने और कष्ट सहने के अपने संकल्प के कारण भावुक होते हो और तुम परमेश्वर के लिए कष्ट सहने, किसी भी मात्रा में कष्ट सहने या यहाँ तक कि मरने के लिए भी इतने इच्छुक हो उठते हो कि तुम्हारी आँखों से आँसुओं की झड़ी लग जाती है। दरअसल, परमेश्वर तुम्हारे भावुक होने से भावुक नहीं होता है और न ही वह तुम्हारे संकल्प से भावुक होता है। तुम्हारा यह भावनाओं का प्रवाह बस एक क्षणिक आवेग है, तेज जुनून का एक क्षणिक ज्वार है। इस परिस्थिति में तुम उससे प्रार्थना भी कर सकते हो और कह सकते हो, “परमेश्वर, मैं तुम्हारे लिए मरने को तैयार हूँ! परमेश्वर, मैं आज अपना कर्तव्य करने में इतना व्यस्त था कि मैंने एक बार का भोजन छोड़ दिया। अगर मुझे 10 बार का भोजन भी छोड़ना पड़े तो भी मैं ऐसा करने को तैयार रहूँगा! लोग सिर्फ रोटी के निवालों पर नहीं बल्कि परमेश्वर के मुख से निकलने वाले वचनों पर जीते हैं। परमेश्वर, मैं तुमसे जीवन भर, हमेशा-हमेशा के लिए प्रेम करने को तैयार हूँ और तुम्हारे लिए मेरा प्रेम कभी नहीं बदलेगा!” तुम्हारे ये शानदार शब्द तुम्हें बिलख-बिलखकर रोने के लिए भावुक कर देते हैं, लेकिन परमेश्वर का तुम्हारे प्रति रवैया नहीं बदलता है। क्यों? वह इसलिए क्योंकि तुम एक क्षणिक आवेग के कारण भावुक हुए हो और तुम्हारे आँसू पश्चात्ताप के, ऋणी होने के या खुद को सही मायने में जान पाने के आँसू नहीं हैं और ये सत्य का अभ्यास करने और सत्य सिद्धांतों को बनाए रखने की अपनी असमर्थता के लिए दुःख के आँसू तो बिल्कुल भी नहीं हैं। इसलिए, तुम्हारी यह भावना सिर्फ तुम्हें भावुक कर सकती है और शायद दूसरों को भी या तुम्हारे आस-पास के लोगों को भी भावुक कर सकती है, लेकिन परमेश्वर इससे भावुक नहीं होता है। इसलिए, तुम्हें पवित्र आत्मा भावुक नहीं करता है, बल्कि तुम खुद ही स्वयं को भावुक कर लेते हो। तुम्हारे आँसू इसलिए बहने लगे हैं क्योंकि तुमने खुद को भावुक कर लिया है। तुम्हारे आँसू, तुम्हारे भावुक शब्द और तुम्हारा तेज जुनून सिर्फ सतही घटनाएँ हैं, वे सिर्फ एक तरह का व्यवहार हैं। वे तुम्हारे सार और जीवन में कोई बदलाव नहीं हैं और न ही इस बात का प्रकाशन हैं कि सत्य तुम्हारा जीवन है। जब तुममें परमेश्वर के लिए खुद को खपाने और कष्ट सहने का जुनून और आवेग होता है और तुम विशेष रूप से अग्रसक्रिय होते हो, तो तुम्हें लगता है कि तुम्हें पवित्र आत्मा ही भावुक कर रहा है, तुम बदल गए हो और तुम उद्धार के लिए एक लक्ष्य हो—यह एक तरह की धारणा और कल्पना है जो तुम परमेश्वर के कार्य के बारे में रखते हो। जब तुम किसी अस्थायी असफलता और गिर पड़ने के कारण या तुम्हारी भ्रष्टता और कमियाँ बेनकाब किए जाने के कारण या फिर इसलिए नकारात्मक हो जाते हो क्योंकि तुम्हारी काट-छाँट कर दी गई और तुम्हें बेनकाब कर दिया गया, तो तुम उदास और दुखी महसूस करते हो और सोचते हो कि तुम नहीं बदले हो और तुम्हारे बचाए जाने की कोई उम्मीद नहीं है—यह परमेश्वर के कार्य के बारे में तुम्हारी एक और तरह की धारणा और कल्पना है। दरअसल, परमेश्वर चाहे जो देखे—चाहे तुम नकारात्मक दशा में हो या सकारात्मक दशा में या तुम्हारी दशा चाहे जिस हद तक खराब हो चुकी हो और गिर गई हो—परमेश्वर तुम्हें हमेशा किस तरह से देखता है? तुम्हारा आध्यात्मिक कद जो है सो है। परमेश्वर तुम्हारी वास्तविक स्थिति, तुम्हारी वास्तविक अभिव्यक्तियों और तुम्हारे वास्तविक आध्यात्मिक कद के आधार पर यह तय करेगा कि तुम कितने बदल चुके हो और तुम कितनी सत्य वास्तविकताओं में प्रवेश कर चुके हो। अपने पैरों पर वापस खड़े होने की तुम्हारी मौजूदा असमर्थता और फिलहाल तुम्हारा पूरी तरह से मायूसी में डूब जाना वे मानक नहीं हैं जिनसे परमेश्वर तुम्हें देखता है या तुम्हारा वास्तविक आध्यात्मिक कद तय करता है। इसलिए, इससे फर्क नहीं पड़ता है कि तुम सकारात्मक दशा में हो या नकारात्मक दशा में या तुम तेज जुनून से भरे हो या मायूसी महसूस कर रहे हो, यह परमेश्वर द्वारा तुम्हारे आकलन और निरूपण को प्रभावित नहीं करेगा। सिर्फ तुम्हीं एकमात्र ऐसे व्यक्ति हो जो तुम्हारे अस्थायी खुलासों और अभिव्यक्तियों के आधार पर तुम्हें गलत तरीके से—या तो किसी ऐसे व्यक्ति के रूप में जो पहले से ही पतरस जैसा है या किसी ऐसे व्यक्ति के रूप में जो छुटकारे से परे है—निरूपित करता है, क्योंकि परमेश्वर के कार्य के बारे में तुम्हारे पास बहुत सारी धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम किस तरह से फैसले देते हो, तुम किन अच्छी या बुरी भावनाओं का अनुभव करते हो, यह सब कुछ उन धारणाओं और कल्पनाओं के कारण होता है जो तुमने परमेश्वर के कार्य के बारे में बनाई हैं और ये धारणाएँ और कल्पनाएँ किसी व्यक्ति की परमेश्वर की सटीक और व्यावहारिक परिभाषा और उस व्यक्ति के बारे में परमेश्वर के सटीक और व्यावहारिक फैसले के अनुरूप नहीं हैं। क्या ऐसा नहीं है? (ऐसा है।) इसलिए, चाहे ये लोगों की अपनी अभिव्यक्तियाँ हों, उनका अपना सार हो या उनका अपना अंतिम निरूपण हो, वे अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर इन चीजों पर फैसले नहीं दे सकते हैं। इसके बजाय, उन्हें ये चीजें परमेश्वर के कार्य के सामान्य नियमों और उन वास्तविक परिणामों के आधार पर मापनी चाहिए जिन्हें परमेश्वर अपने कार्य में प्राप्त करना चाहता है या परमेश्वर के कार्य करने के तरीकों और लोगों के बारे में उसकी सटीक परिभाषाओं के आधार पर मापनी चाहिए। परमेश्वर के कार्य के बारे में यहाँ लोगों की मुख्य धारणाएँ और कल्पनाएँ क्या हैं? लोग मानते हैं कि उनका वास्तविक आध्यात्मिक कद उनकी अस्थायी अभिव्यक्तियों या एक निश्चित अवधि के दौरान उनकी अभिव्यक्तियों के आधार पर तय होता है : अगर इस अवधि के दौरान वे अच्छी दशा में हैं तो पवित्र आत्मा उन पर कार्य करेगा और वे बदल चुके होंगे, उनके पास जीवन होगा, उनका आध्यात्मिक कद बढ़ चुका होगा और वे उद्धार प्राप्त करने में समर्थ होंगे; अगर वे बुरी दशा में हैं और इस अवधि के दौरान उनकी परमेश्वर में सच्ची आस्था बिल्कुल नहीं है तो इसका मतलब है कि उनका कोई आध्यात्मिक कद नहीं है। क्या ये लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ नहीं हैं? (हाँ, हैं।) परमेश्वर के कार्य के बारे में लोगों की एक धारणा और कल्पना यह है कि यह लोगों पर लंबे समय तक और लगातार नहीं किया जाता है, बल्कि यह उन्हें क्षण भर के लिए थोड़ी-सी प्रबुद्धता देता है जिसके कारण वे ऊर्जा का विस्फोट और क्षणिक आवेग अभिव्यक्त करते हैं। दूसरा प्रकार यह है कि लोग मानते हैं कि परमेश्वर का कार्य अलौकिक है, परमेश्वर लोगों को सकारात्मक दृष्टिकोण रखने के लिए और कष्ट सहने और उसके लिए खुद को खपाने का संकल्प रखने के लिए प्रेरित करता है और फिर वे आध्यात्मिक कद प्राप्त करते हैं और ऐसे लोग बन जाते हैं जिनके पास अपने जीवन के रूप में परमेश्वर का सत्य होता है। वे मानते हैं कि अगर वे एक मुद्दे के कारण कमजोर हो जाते हैं, तो परमेश्वर यह तय करेगा कि वे असफल हो गए हैं और उन्हें बेनकाब कर दिया गया है और फिर परमेश्वर उनकी निंदा करेगा और उन्हें निकाल देगा और छोड़ देगा। क्या ये लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ नहीं हैं? (हाँ, हैं।)

लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ क्या हैं जिनके बारे में हमने अभी-अभी संगति की? (परमेश्वर के कार्य के बारे में लोगों की कई तरह की धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं। वे मानते हैं कि व्यक्ति का वास्तविक आध्यात्मिक कद एक निश्चित अवधि में उसकी अभिव्यक्तियों द्वारा या उसकी अस्थायी अभिव्यक्तियों द्वारा तय होता है और वे सोचते हैं कि लोगों पर परमेश्वर का कार्य लंबे समय तक और लगातार चलने के बजाय एक क्षण में हो जाता है। लोग यह भी मानते हैं कि परमेश्वर का कार्य बहुत ही अलौकिक है और परमेश्वर अक्सर लोगों को भावुक कर देता है। जब लोग पवित्र आत्मा के कारण क्षणिक रूप से भावुक हो जाते हैं तो उन्हें लगता है कि वे पूर्ण बनाए जाने वाले हैं या वे पतरस का मानक प्राप्त करने के नजदीक हैं और जब लोग असफल होते हैं और कमजोर हो जाते हैं तो वे तय कर लेते हैं कि उन्हें हटा दिया गया है।) इस संबंध में परमेश्वर के कार्य के बारे में लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ क्या हैं? लोग मानते हैं कि उनकी अस्थायी अभिव्यक्तियाँ उनका वास्तविक आध्यात्मिक कद दर्शाती हैं और परमेश्वर लोगों की अस्थायी अभिव्यक्तियों के आधार पर उन पर फैसले देता है। लोग सोचते हैं कि परमेश्वर लोगों को कष्ट सहते हुए और कीमत चुकाते हुए देखना पसंद करता है, वह लोगों को अक्सर प्रार्थना करते हुए और संकल्प लेते हुए और इस हद तक भावुक होते हुए देखना पसंद करता है कि वे फूट-फूट कर रोने लगें और वह पसंद करता है कि लोग चीजें छोड़ देने, खुद को खपाने और लगन से कार्य करने में समर्थ हों और देह की विभिन्न कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करने में समर्थ हों। वे सोचते हैं कि चाहे वे सिद्धांतों के अनुसार या सत्य के अनुरूप कार्य करें या न करें, जब तक वे अक्सर कीमत चुकाने में समर्थ हैं और अपने कर्तव्य के निर्वहन में अक्सर भोजन और नींद छोड़ देते हैं, सुबह जल्दी उठते हैं और रात को देर से सोते हैं और दिन-रात कार्य करते हैं, तब तक परमेश्वर इसे पसंद करेगा। इसका मतलब यह है कि इससे फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर क्या कार्य करता है या कितने वचन बोलता है, वह बस यही उम्मीद करता है कि सभी लोग उसके लिए कष्ट सहने और कीमत चुकाने में समर्थ हों, अच्छा भोजन न खाएँ या अच्छे कपड़े न पहनें और उनके पास खाली समय बिल्कुल न हो और उन्हें हर दिन अपने कर्तव्य करने या प्रार्थना करने में बिताना चाहिए और अक्सर संकल्प लेने चाहिए, अपना संकल्प व्यक्त करना चाहिए, मन दृढ़ करने चाहिए और शपथ लेनी चाहिए। कुछ लोग सोचते हैं कि परमेश्वर लोगों के दिलों और अंगों को सीमित करना पसंद करता है, वह लोगों को आजादी और मुक्ति नहीं देता है, इसके बजाय उन्हें दमित महसूस करवाता है ताकि उन्हें मुक्त न किया जा सके, और उन्हें सामान्य मानवता के जीवन की आजादी से वंचित करता है। लोग ऐसा सोचते हैं, है ना? (हाँ।) लोग और क्या सोचते हैं? यह कि परमेश्वर लोगों को असफल होने, कमजोरी या भ्रष्टता प्रकट करने या अपनी कमियाँ दिखाने की अनुमति नहीं देता है। लोग यह भी मानते हैं कि अगर वे उद्धार प्राप्त करना चाहते हैं और पूर्ण बनाए जाना चाहते हैं, तो अपना कर्तव्य करने की प्रक्रिया में वे बिल्कुल भी कमजोर नहीं हो सकते हैं या उनमें सामान्य मानवता की कोई भी जरूरत, कमी या दोष नहीं हो सकता है और उन्हें कोई भ्रष्ट स्वभाव प्रकट नहीं करना चाहिए। क्या ये लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ नहीं हैं? (हाँ।) लोग अपनी धारणाओं और कल्पनाओं में सोचते हैं कि परमेश्वर के कार्य और मार्गदर्शन के तहत उन्हें दिल से जवान रहना चाहिए, जोशीले बने रहना चाहिए और अपने कार्य के प्रति जुनूनी होना चाहिए और गंभीर रवैया रखना चाहिए और साथ ही लगातार तनाव में रहना चाहिए और कभी भी आराम नहीं करना चाहिए। क्या लोग ऐसा ही नहीं सोचते हैं? क्या यह लोगों की धारणा और कल्पना है या यह परमेश्वर की लोगों से सच्ची अपेक्षा है? (यह लोगों की धारणा और कल्पना है।) लोग सोचते हैं कि अगर वे थोड़े-से नकारात्मक और कमजोर हैं या उन्हें थोड़ी-सी दैहिक कठिनाई है या उनकी मानवता में कुछ कमियाँ या दोष हैं या वे भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हैं और कभी-कभी दैहिक सुख-सुविधाओं का लालच करते हैं, तो परमेश्वर उन्हें नहीं चाहेगा, वह उनसे बात नहीं करेगा या उन पर कार्य नहीं करेगा और उन्हें निकाल दिया जाएगा और उनके पास बचाए जाने की कोई उम्मीद नहीं होगी। क्या वाकई यही बात है? (नहीं।) क्या ये लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ नहीं हैं? (हाँ।) लोग अपनी धारणाओं और कल्पनाओं में एक लिहाज से यह मानते हैं कि परमेश्वर ऐसे लोगों को पसंद करता है जो अपने कार्य के प्रति हमेशा उत्साह और उग्र जुनून से भरे रहते हैं और दूसरे लिहाज से यह मानते हैं कि परमेश्वर लोगों की नकारात्मकता को पसंद नहीं करता है और उन्हें अपनी कमजोरियाँ दिखाने की अनुमति नहीं देता है। दूसरे शब्दों में, लोग सोचते हैं कि परमेश्वर सन्यासियों को पसंद करता है, है ना? वे सोचते हैं कि गरीबी में अपना पूरा जीवन जीना, बाहरी मामलों पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं देना और दिन-ब-दिन ठंडे तेल के दीपक की मंद रोशनी में परमेश्वर के वचनों को पढ़ना जरूरी है; वे मानते हैं कि सुबह और शाम दोनों समय की प्रार्थना अनिवार्य है, उन्हें हर बार भोजन करने से पहले परमेश्वर को धन्यवाद देना चाहिए और उन्हें सामान्य मानवता की विभिन्न जरूरतों में से कोई भी जरूरत नहीं हो सकती है। वे मानते हैं कि सिर्फ तभी उन्हें परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से वफादार और अपने कार्य के प्रति पूरी तरह से निष्ठावान माना जा सकता है और सिर्फ इस तरह का जुनून बनाए रखने से ही वे परमेश्वर को पसंद आ सकते हैं और ऐसे व्यक्ति बन सकते हैं जिसे परमेश्वर बचाना और पूर्ण बनाना चाहता है। क्योंकि लोगों की ये धारणाएँ और कल्पनाएँ होती हैं, इसलिए कुछ लोग जब कभी-कभी अपने परिवार को याद करते हैं तो वे अंदर से विशेष रूप से तिरस्कृत महसूस करते हैं और जब भी वे कभी-कभी थोड़ी देर के लिए गपशप करते हैं तो भी असहज महसूस करते हैं, यह सोचते हैं कि परमेश्वर उनका तिरस्कार करेगा। जब कुछ युवतियाँ कभी-कभी सजती-सँवरती हैं और थोड़े चमकीले और काफी फैशनेबल कपड़े पहनती हैं तो वे सिर से पैर तक असहज महसूस करती हैं और सोचती हैं, “क्या मेरा इस तरह की पोशाक पहनना थोड़ा-सा अभद्र नहीं है? क्या यह थोड़ा-सा असंयम नहीं है?” दरअसल, वे अनोखे कपड़े या बदन दिखाने वाली पोशाकें नहीं पहनती हैं, लेकिन वे सिर्फ असंयम महसूस करती हैं और सोचती हैं, “परमेश्वर भीतर से मेरा तिरस्कार कर रहा है। उसे मेरा ऐसा करना पसंद नहीं है।” अगर तुम्हें लगता है कि परमेश्वर को यह पसंद नहीं है तो तुम बौद्ध भिक्षु के लबादे या ताओवादियों का चोगा क्यों नहीं पहनती? वह कितना “सुंदर” और “सभ्य” होगा! वह तो असंयम नहीं होगा, है ना? कुछ लोग कभी-कभी थोड़ा-सा घमंड या दिखावा करते हैं और फिर अंदर से तिरस्कृत और असहज महसूस करते हैं और सोचते हैं, “परमेश्वर अब मुझे पसंद नहीं करता। वह अब मुझे नहीं चाहता।” यहाँ तक कि कुछ लोग ऐसे नियम भी बना लेते हैं कि उन्हें अपने बालों में कंघी करने, सौंदर्य-प्रसाधनों का उपयोग करने या शीशे में देखने की अनुमति नहीं है; वे सिर्फ महीने में एक बार या छह महीने में एक बार नहा सकते हैं; वे सोचते हैं कि अगर वे महीने में एक बार या छह महीने में एक से ज्यादा बार नहाएँ, तो परमेश्वर इससे बेहद घृणा करेगा और वे यकीनन बचाए नहीं जाएँगे। वे यह नियम बना लेते हैं कि उन्हें सुबह पाँच बजे से पहले उठ जाना चाहिए और सोचते हैं कि अगर वे आधे घंटे देर से उठे तो इसका मतलब है कि वे सुख-सुविधाओं में लिप्त हो रहे हैं और परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग नहीं हैं; वे यह नियम बना लेते हैं कि उन्हें आधी रात के बाद सोने जाना चाहिए और सोचते हैं कि अगर वे आधी रात से पहले सोने चले गए तो इसका मतलब है कि वे निष्ठा से अपना कर्तव्य करने वाले व्यक्ति नहीं हैं। ये लोग अपने व्यवहार, दैनिक जीवन और जीवन की जरूरतों के लिए कई पक्के नियम बना लेते हैं। वे यह नहीं तलाशते हैं कि परमेश्वर की अपेक्षाएँ क्या हैं और न ही वे यह समझने का प्रयास करते हैं कि इन मामलों के प्रति परमेश्वर के विचार और रवैये क्या हैं। बल्कि वे पूरी तरह से व्यक्तिपरक ढंग से यह मानते हैं कि परमेश्वर अपने कार्य में लोगों को ये अभिव्यक्तियाँ रखने की अनुमति नहीं देता है और अगर कभी उन्होंने ये अभिव्यक्तियाँ रखीं, तो इसका मतलब है कि वे पूरी तरह से विद्रोही बन रहे हैं और परमेश्वर उनसे नफरत करता है और इसलिए उन्हें बचाया नहीं जा सकता। अक्सर बस कुछ मामूली मामलों के कारण जो जिक्र करने लायक नहीं हैं, जैसे कि गलत चीज कह देना, गलत शब्द का उपयोग करना, थोड़ा-सा ज्यादा नाश्ता खा लेना या कभी-कभार कुछ मनोरंजक वीडियो देख लेना, लोग सोचते हैं, “मैं बर्बाद हो गया, मैं विद्रोहीपन पर उतर आया हूँ! मुझे नहीं पता था कि मुझमें ऐसे व्यवहार और ऐसी रुचियाँ हो सकती हैं—मुझे नहीं पता था कि मुझमें अब भी ये समस्याएँ हैं। यह भयानक है। मुझे गहराई से आत्म-चिंतन करना चाहिए, अपनी आत्मा की गहराइयों में अपना गहन-विश्लेषण करना चाहिए और जोरदार बदलाव लाना चाहिए। मैं इस बात को यूँ ही जाने नहीं दे सकता!” लोग ऐसे मामलों को बहुत महत्व देते हैं जिनका सत्य सिद्धांतों से कोई संबंध नहीं होता है। ये सभी लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं और परमेश्वर इनसे नफरत करता है। परमेश्वर लोगों को ये अभिव्यक्तियाँ प्रकट करते हुए देखना नहीं चाहता है। तो इस संबंध में लोगों को कौन-से सत्य समझने चाहिए? किन सिद्धांतों का पालन करना चाहिए? चूँकि ये चीजें लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं, इसलिए यकीनन ये वे सिद्धांत नहीं हैं जिनकी परमेश्वर लोगों से अपेक्षा करता है और यकीनन इनका परमेश्वर की लोगों से अपेक्षाओं से कोई लेना-देना नहीं है। और चूँकि वे धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं, इसका मतलब है कि इनकी कल्पना मानव मन में की गई है और वहीं इन्हें एक साथ जोड़ा गया है—संक्षेप में, ये लोगों के मन से आती हैं और इनका उन सत्य वास्तविकताओं से कोई लेना-देना नहीं है जिनकी परमेश्वर लोगों में होने की अपेक्षा करता है। इससे फर्क नहीं पड़ता है कि लोग इन धारणाओं और कल्पनाओं का कैसे पालन करते हैं, जब तक सत्य से इनका कोई लेना-देना नहीं है, तब तक लोगों द्वारा इनका पालन किया जाना निरर्थक है। अगर तुम इनका पालन करते भी हो, तो भी तुम सत्य सिद्धांतों का पालन नहीं कर रहे हो और परमेश्वर इसे याद नहीं रखेगा। विशेष रूप से, कुछ लोग जब कभी-कभी अपनी पसंद या दैहिक आदतें प्रकट कर देते हैं तो वे अंदर से बहुत ही असहज और कड़ी फटकार महसूस करते हैं। यह असहजता और आत्म-फटकार कैसे आती है? क्या यह पवित्र आत्मा द्वारा उन्हें भावुक किए जाने का परिणाम है? (नहीं, लोगों की परमेश्वर के बारे में धारणाएँ और कल्पनाएँ होती हैं, इसलिए वे असहज महसूस करते हैं।) इन भावनाओं का आधार सत्य नहीं, बल्कि लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं। कुछ लोग बात-बात पर अंदर से तिरस्कृत और असहज महसूस करते हैं और वे दौड़कर प्रार्थना करने और अपने पाप कबूलने चले जाते हैं और जल्दी से पश्चात्ताप करते हैं। तुम्हें किस चीज के लिए पश्चात्ताप करना है? तुमने जो चीजें की हैं, वे दैनिक जीवन में आम व्यवहार हैं। वे पाप नहीं हैं और यकीनन वे बड़े अपराध नहीं हैं। ऐसी मामूली चीजों पर हंगामा मत करो! अगर तुम्हें लगता है कि ये चीजें गलत हैं तो तुम उन्हें नहीं करने का फैसला ले सकते हो। लेकिन उन्हें नहीं करने का मतलब यह नहीं है कि तुम सत्य सिद्धांतों का पालन कर रहे हो और असहज होने का मतलब यह नहीं है कि तुमने सत्य सिद्धांतों का उल्लंघन किया है। तुम पश्चात्ताप क्यों कर रहे हो? तुम खुद को क्यों बदल रहे हो? क्या इसका कारण यह है कि तुम्हारी धारणाएँ और कल्पनाएँ तुम्हें यह गलत विश्वास दिला रही हैं कि तुम्हें ऐसे व्यवहार नहीं करने चाहिए या इसका कारण यह है कि तुम्हें लगता है कि तुम्हारे व्यवहार परमेश्वर के वचनों और सत्य सिद्धांतों के खिलाफ जाते हैं? अगर वे सत्य सिद्धांतों के खिलाफ जाते हैं और तुम वाकई असहज महसूस करते हो तो तुम्हें जल्दी से अपना रास्ता बदल लेना चाहिए और परमेश्वर से पश्चात्ताप करना चाहिए। यह असहजता कम-से-कम मानवता के जमीर को फटकारना है। अगर तुम सिर्फ इसलिए असहज महसूस करते हो क्योंकि तुम अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के खिलाफ चले गए हो तो क्या तुम अनावश्यक भावनाओं में लिप्त नहीं हो रहे हो? (हाँ।) यह पूरी तरह से अनावश्यक भावनाओं में लिप्त होना है और यह बेकार है। ऐसा क्यों है कि जब तुम मसीह-विरोधियों का अनुसरण करते हो तो तुम असहज महसूस नहीं करते? तुम इसके लिए तिरस्कृत महसूस क्यों नहीं करते? जब तुम बुरे लोगों को कलीसिया के कार्य को अस्त-व्यस्त करते हुए और परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान पहुँचाते हुए देखते हो और तुम उन्हें रोकने के लिए उठ खड़े नहीं होते हो, तो क्या तुम असहज महसूस करते हो? जब तुम सत्य सिद्धांतों का उल्लंघन करते हुए और अपनी इच्छा के आधार पर बोलते और कार्य करते हो तो क्या तुम असहज महसूस करते हो? अगर तुमने इन मामलों में सत्य सिद्धांतों का उल्लंघन किया है और फिर भी तुम इस बारे में कभी असहज महसूस नहीं करते हो तो फिर तुममें मानवता भी नहीं है और न ही तुम्हारे पास जमीर है। और अगर तुम्हारे पास जमीर नहीं है तो किन चीजों से तुम असहज महसूस करोगे? तुम्हारी असहजता सिर्फ तुम्हारी अनावश्यक भावनाओं में लिप्त होने के कारण है। यह तुम्हारी अपनी धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं जो तुम्हें तड़पा रही हैं और तुम्हें असहज महसूस करा रही हैं—इसका कोई फायदा नहीं है। अपनी धारणाओं और कल्पनाओं में रहते हुए परमेश्वर में विश्वास रखने का तुम्हारा अंतिम परिणाम क्या होगा? तुम सिर्फ ज्यादा से ज्यादा पाखंडी और फरीसियों जैसे बनते जाओगे। तुम सिर्फ परमेश्वर के वचनों और सत्य सिद्धांतों से और भटकते चले जाओगे और सत्य वास्तविकता में प्रवेश करना तुम्हारे लिए असंभव हो जाएगा। तुम हमेशा अपने बारे में अच्छा महसूस करते हो, लेकिन वास्तव में तुम्हारे बारे में इतना अच्छा है ही क्या? तुम धारणाओं और कल्पनाओं से इतना भरे हुए हो और तुम जो कुछ भी महसूस करते हो उस सबका सत्य से कोई लेना-देना नहीं है। भावुक और तिरस्कृत होने की भावनाएँ, तुम जो ऋण और पश्चात्ताप महसूस करते हो, वह पश्चात्ताप जो तुम सोचते हो कि तुममें होना चाहिए और तुम जो शपथ और संकल्प लेते हो, यह सब कुछ तुम्हारी धारणाओं और कल्पनाओं से संबंधित है। ये चीजें सिर्फ तुम्हारी धारणाओं और कल्पनाओं पर आधारित हैं और इनका सत्य से कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए, तुम जो कुछ भी करते हो—चाहे वह कष्ट सहना और कीमत चुकाना हो या चीजें अर्पित करना और खुद को खपाना और चाहे तुम कुछ भी खपाओ—अगर उसका सत्य से कोई लेना-देना नहीं है तो वह निरर्थक ही है। क्या तुम समझ गए हो? (हाँ।)

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