सत्य का अनुसरण कैसे करें (1) भाग चार

अब जबकि हमने परमेश्वर के कार्य के बारे में लोगों की इन धारणाओं और कल्पनाओं पर संगति कर ली है और उनका गहन-विश्लेषण कर लिया है, तो क्या तुम लोग इस बारे में थोड़ा-सा स्पष्ट हो गए हो कि ऐसे व्यवहारों को कैसे देखना है, जैसे कि लोग कष्ट सहते हैं या नहीं, वे कीमत चुकाते हैं या नहीं और अपने कर्तव्य करने में वे खुद पर अंकुश लगाते हैं या नहीं और उन्हें अच्छा भोजन करने और अच्छे कपड़े पहनने का शौक है या नहीं, वगैरह और साथ ही इस बारे में भी थोड़ा स्पष्ट हो गए हो कि परमेश्वर लोगों से किन सिद्धांतों की अपेक्षा करता है और परमेश्वर अपने कार्य से लोगों में वास्तव में क्या परिणाम प्राप्त करना चाहता है? परमेश्वर लोगों में जो परिणाम प्राप्त करना चाहता है वह यह नहीं है कि तुम हर समय अपने कार्य के प्रति अपना जुनून दिखाओ। यानी, परमेश्वर जो देखना चाहता है वह तुम्हारा उत्साह या कष्ट सहने और कीमत चुकाने का तुम्हारा संकल्प नहीं है। परमेश्वर की नजर में, अगर तुम सत्य नहीं समझते हो तो ये अभिव्यक्तियाँ सिर्फ एक क्षणिक आवेश भर हैं। दूसरे शब्दों में, वे सिर्फ तुम्हारा उत्साह हैं। उत्साह वास्तव में क्या होता है? यह तुम्हारी आवेगशीलता है या और विशिष्ट रूप से कहा जाए तो यह चीजों के प्रति एक भावनात्मक दृष्टिकोण है। परमेश्वर जो चाहता है वह लोगों का उत्साह, चीजों के प्रति उनका भावनात्मक दृष्टिकोण, उनका अस्थायी आवेश या इस तरह की जुनूनी हालत नहीं है। तो परमेश्वर क्या चाहता है? (वह चाहता है कि लोग सत्य समझने में समर्थ बनें।) कम-से-कम, वह चाहता है कि तुम सत्य से प्रेम करने और सत्य समझने में समर्थ बनो और विभिन्न मामलों से सामना होने पर किसी विनियम, औपचारिकता या व्यवहार का पालन करने के बजाय सत्य सिद्धांतों का पालन करो; वह यह भी चाहता है कि तुम अपने कर्तव्य में और हर चीज में सत्य सिद्धांतों की तलाश करने, सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने और परमेश्वर के वचनों और सत्य को अपनी वास्तविकता बनाने में समर्थ बनो—यह वह परिणाम है जिसे प्राप्त करना परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य है। जहाँ तक यह प्रश्न है कि अपने निजी जीवन में क्या तुम जल्दी सोना और जल्दी उठना चाहते हो या देर से सोना और देर से उठना चाहते हो या तुम्हारे पास किस तरह के गुण हैं या तुम बोलने में कितने कुशल हो, तो इनमें से कोई भी चीज परमेश्वर के लिए मायने नहीं रखती है। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुममें कष्ट सहने का संकल्प है या नहीं या तुम कितनी कीमत चुकाते हो, परमेश्वर इन चीजों को महत्व नहीं देता है। कुछ लोग कहते हैं, “परमेश्वर में अपने विश्वास की खातिर मैंने कई वर्षों से अच्छे कपड़े नहीं खरीदे हैं और मैं दस वर्षों से भी ज्यादा समय से नाई के पास नहीं गया हूँ।” भले ही तुम अच्छा भोजन मत करो, अच्छे कपड़े मत पहनो और जीवनभर बहुत सारे कष्ट सहो, तो क्या हुआ? क्या परमेश्वर यही चाहता है? क्या परमेश्वर के उपदेश देने और संगति करने का अंतिम उद्देश्य लोगों को बहुत सारे सत्य प्रदान करना है ताकि बस तुम्हें सन्यासी बनाया जा सके? क्या यह बस तुम्हें एक दयनीय बदकिस्मत व्यक्ति, भिखारी या एक गुस्सैल युवा में बदलने के लिए है? नहीं। परमेश्वर अपने वचनों और सत्य सिद्धांतों को लोगों में समाहित करना चाहता है। इसलिए, जब बहुत-से लोग मानते हैं कि परमेश्वर लोगों को ज्यादा कष्ट सहते हुए और ज्यादा कीमत चुकाते हुए देखना पसंद करता है और वह उन्हें अत्यंत मितव्ययी, कठोर और सरल जीवन जीते हुए, अत्यधिक संकल्प और आकांक्षाओं वाला व्यक्ति, अत्यधिक जुनूनी या अत्यधिक आत्म-संयमी व्यक्ति होते हुए और वाकई अपने स्थान पर रहते हुए और अच्छा व्यवहार करते हुए देखना पसंद करता है, तो ये परमेश्वर के कार्य के बारे में बस उनकी धारणाएँ और कल्पनाएँ भर हैं। मान लो कि तुम अपने जीवन के कई वर्षों तक दिन में सिर्फ एक बार भोजन करते हो और रात को तीन घंटे सोते हो और अच्छा भोजन करने या अच्छे कपड़े पहनने में समर्थ नहीं हो और तुम कई वर्षों तक वही करते हो जो तुम्हें लगता है कि तुम्हें करना चाहिए और तुमने अनगिनत कष्ट सहे हैं और अनगिनत संकल्प लिए हैं। तुम लोगों के अपने शब्दों में, तुम “अपनी मूल आकांक्षा के प्रति सच्चे रहते हो,” और तुम कष्ट सहते हो और खुद को परमेश्वर के लिए खपाते हो और अपना पूरा जीवन परमेश्वर को समर्पित कर देते हो। लेकिन इन सबके बावजूद अगर तुम कभी भी परमेश्वर के वचनों या सत्य पर मेहनत नहीं करते हो और अपने हर कार्य में सत्य सिद्धांतों की तलाश नहीं करते हो, तो तुम्हें छोड़ दिया जाना तय है। तुम कष्ट सहकर और कीमत चुकाकर और अपनी मूल आकांक्षा को कभी न बदलकर और जीवनभर परमेश्वर के लिए खुद को खपाकर और अपना सब कुछ उसे अर्पित करके उद्धार प्राप्त करना चाहते हो। यह बस एक सपना है—यह ख्याली पुलाव है। अगर तुम जीवनभर मकई का आटा और भाप से पकी मकई की रोटी खाते रहो और कभी अच्छा भोजन न खाओ या अच्छी चीजों का आनंद न लो, तो भी इसका कोई फायदा नहीं होगा। परमेश्वर कभी किसी व्यक्ति का व्यवहार नहीं देखता है और न ही वह यह देखता है कि व्यक्ति बाहर से किन नियमों का पालन करता है या वह बाहर से सरल और सादा जीवन जीता है या नहीं। परमेश्वर यह देखना चाहता है कि तुम किस मार्ग पर हो, तुम अपने सामने आने वाले हर मामले में किन सिद्धांतों का पालन करते हो और तुम समस्याओं से निपटने में सत्य सिद्धांतों का पालन करते हो या नहीं। अगर तुम सत्य सिद्धांतों का पालन नहीं करते हो, तो चाहे तुम उन निर्धारित शर्तों और नियमों का कितनी भी अच्छी तरह से पालन करो, इसका कोई फायदा नहीं होगा। इससे सिर्फ यह पता चलेगा कि तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो धारणाओं और कल्पनाओं में जीता है, एक ऐसे व्यक्ति हो जो पूरी तरह से व्यक्तिपरक, सुखद इच्छाओं में जीता है, जिसका परमेश्वर के कार्य से बिल्कुल कोई लेना-देना नहीं है और ऐसे किसी तरीके से भी कोई लेना-देना नहीं है जिससे परमेश्वर लोगों पर उद्धार का कार्य करता है—तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के कार्य से बहुत दूर है। इसलिए, अगर तुम परमेश्वर के कार्य से कुछ प्राप्त करना चाहते हो तो पहले तुम्हें सत्य पर कड़ी मेहनत करनी चाहिए; तुम्हें अपनी धारणाओं और कल्पनाओं पर कोई काम या प्रयास नहीं करना चाहिए—ऐसा करना बेकार है। कुछ लोग मुझसे पूछते हैं : “तुम्हें क्या लगता है, मैं लंबे बालों में ज्यादा सभ्य और ठीक दिखती हूँ या छोटे बालों में?” जवाब में मैं उनसे पूछता हूँ, “तुम्हें अपने बाल लंबे रखना पसंद है या छोटे?” वे कहती हैं, “मुझे अपने बाल लंबे रखना पसंद है। लेकिन मुझे लगता है कि लंबे बाल सभ्य और ठीक नहीं हैं और परमेश्वर को यह पसंद नहीं है।” और मेरा जवाब होता है, “परमेश्वर ने ऐसा कब कहा? क्या इसका सत्य से कोई लेना-देना है?” दूसरे लोग मुझसे पूछते हैं : “क्या मैं स्नैक्स खा सकता हूँ?” और मेरा जवाब होता है, “क्या स्नैक्स खाना सामान्य मानवता की जरूरत है? क्या परमेश्वर ने यह नियम बनाया है कि लोग उन्हें नहीं खा सकते हैं? क्या परमेश्वर इसकी निंदा करता है?” और वे कहते हैं, “मुझे लगता है कि परमेश्वर इसकी निंदा करता है क्योंकि स्नैक्स खाना असंयम है।” “असंयम” का क्या मतलब होता है? अगर तुम्हें लगता है कि स्नैक्स खाना असंयम है, तो क्या स्नैक्स नहीं खाने का मतलब यह है कि तुम असंयमी नहीं हो? क्या स्नैक्स नहीं खाने का मतलब यह है कि तुम सत्य समझते हो और सत्य का अभ्यास करते हो? जब मैं इसे इस तरह से कहता हूँ तो तुम इसे समझ पाते हो, है ना? (हाँ।) धारणाएँ और कल्पनाएँ सत्य नहीं हैं और उनका सत्य से कोई लेना-देना नहीं है। अगर तुम होशियार हो तो तुम्हें जल्दी से यह जाँच करनी चाहिए कि अब भी तुम्हारे पास कौन-सी धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं और अब भी तुम्हारे पास फरीसियों के कौन-से अभ्यास, विचार और नजरिये हैं और तुम्हें देरी किए बगैर उन्हें छोड़ देना चाहिए। इन चीजों को छोड़ देने का उद्देश्य तुम्हें असंयमी और विलासी बनाना नहीं है, बल्कि तुम्हें सत्य सिद्धांतों की तलाश करने के लिए परमेश्वर के सामने आने और सत्य को अपने जीवन के रूप में प्राप्त करने के लिए प्रेरित करना है। परमेश्वर तुम्हें भिखारी बने हुए और सन्यासी का जीवन जीते हुए देखना नहीं चाहता है। कुछ लोग कहते हैं, “परमेश्वर को लोगों का भिखारी होना पसंद नहीं है, तो क्या इसका मतलब यह है कि उसे उनका अमीर होना पसंद है?” परमेश्वर को लोगों का अमीर होना भी पसंद नहीं है। कुछ लोग कहते हैं, “यह एक मानवीय धारणा और कल्पना है कि परमेश्वर को लोगों का शारीरिक कष्ट सहना पसंद है। तो अगर परमेश्वर को लोगों का कष्ट सहना पसंद नहीं है तो क्या इसका मतलब यह है कि उसे उनका आराम से रहना पसंद है?” गलत, यह भी तुम्हारी धारणा और कल्पना है। तो फिर, कार्य करने का सही तरीका क्या है? (परमेश्वर को यह पसंद है कि लोग उसके सामने आने और सत्य सिद्धांतों की खोज करने में समर्थ हों, चाहे उनके साथ कुछ भी घटित हो।) चाहे कोई भी समय हो, सत्य सिद्धांतों को भुलाया नहीं जा सकता। कुछ लोग कहते हैं, “परमेश्वर को यह पसंद है कि लोग उसके सामने संकल्प लें और उनमें कष्ट सहने का संकल्प हो।” दूसरे लोग कहते हैं, “परमेश्वर ऐसे लोगों को पसंद नहीं करता है जो कष्ट सहने के इच्छुक नहीं होते हैं।” क्या ये चीजें कहना सही है या गलत? कौन-सा कथन सही है और कौन-सा गलत? (ये दोनों ही गलत हैं।) कुछ लोग हमेशा अपने रुतबे, शोहरत और फायदे के लिए कष्ट सहते हैं—उनमें कष्ट सहने का दृढ़ संकल्प होता है। क्या ये अभिव्यक्तियाँ परमेश्वर को खुश करती हैं? (नहीं।) जब व्यक्तिगत मामलों की बात आती है तो कुछ लोग कष्ट सहने को तैयार नहीं होते हैं, लेकिन वे अपना कर्तव्य करने और सत्य की खातिर कष्ट सहने को तैयार रहते हैं और सत्य-सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने के लिए थोड़ा-सा कष्ट सहने को तैयार रहते हैं। इनमें से कौन-सी अभिव्यक्ति बेहतर है? (सत्य सिद्धांतों की खातिर कष्ट सहना।) इन चीजों से क्या देखा जा सकता है? यह कि सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना और सत्य का अभ्यास करना सही है। चाहे यह अपने कर्तव्य करने के मामलों के संबंध में हो या अपने व्यक्तिगत जीवन के मामलों के संबंध में, कोई व्यक्ति कष्ट सहता है या नहीं यह कोई मानक या सिद्धांत नहीं है। सिद्धांत क्या हैं? सिद्धांत परमेश्वर की अपेक्षाएँ, परमेश्वर के वचन और सत्य हैं। अगर तुम सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करते हो तो अगर तुम ऐसा करने में कष्ट नहीं भी सहते हो, तो भी तुम जो कर रहे हो वह सही है और परमेश्वर इसे स्वीकृति देगा; अगर तुम सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य नहीं करते हो तो भले ही तुम इस प्रक्रिया में बहुत कष्ट सहो या अपमान झेलो, यह व्यर्थ है और परमेश्वर तुम्हारे क्रियाकलापों को स्वीकृति नहीं देगा। यह ठीक वैसा ही है जैसे कुछ लोग किसी मसीह-विरोधी से आदेश सुनते हैं और फिर वैसा ही करते हैं जैसा उन्हें कहा गया है, मसीह-विरोधी की पसंद के अनुसार कार्य को कार्यान्वित करते हैं, बहुत बोलते हैं और कष्ट सहते हैं, और खुद को बहुत व्यस्त रखते हैं, इस हद तक कि शारीरिक थकावट के कारण उनका शरीर झुक जाता है और टूट जाता है। क्या परमेश्वर इसकी स्वीकृति देता है? क्या परमेश्वर इसे याद रखेगा? (वह इसकी स्वीकृति नहीं देता है और वह इसे याद नहीं रखेगा।) तो परमेश्वर का रवैया क्या है? (परमेश्वर ऐसे लोगों से नफरत करता है।) परमेश्वर ने क्या कहा? “हे कुकर्म करनेवालों, मेरे पास से चले जाओ।” परमेश्वर का यही रवैया है, है ना? (हाँ।) चाहे तुमने कितना भी कष्ट सहा हो या कितनी भी बड़ी कीमत चुकाई हो, भले ही तुम अपने योगदानों की शेखी बघारने के लिए इनका उपयोग कर सकते हो, लेकिन परमेश्वर इन चीजों को नहीं देखता है। परमेश्वर सिर्फ यह देखता है कि तुमने ये चीजें सत्य सिद्धांतों के अनुसार की हैं या नहीं और क्या तुम परमेश्वर के वचनों का पालन कर रहे थे—तुम्हें मापने के लिए वह इसी सिद्धांत का उपयोग करता है। अगर तुम परमेश्वर के वचनों का पालन करने के बजाय अपने विचारों के अनुसार कार्य करते हो, तो चाहे तुम कितना भी कष्ट सहो या कितनी भी बड़ी कीमत चुकाओ, यह सब कुछ निरर्थक होगा। न सिर्फ परमेश्वर इसे याद नहीं रखेगा, बल्कि वह इसकी निंदा भी करेगा। यह तुम्हारा विनाश लेकर आएगा, है ना? (हाँ।) ऐसे लोगों को अंत में हटा दिया जाएगा—वे इसी लायक हैं, है ना? (हाँ।) परमेश्वर ने अनगिनत वचन बोले हैं और तुम्हें सत्य सिद्धांत बताए हैं, लेकिन तुम तो सुनते ही नहीं। तुम्हारे पास हमेशा अपने विचार होते हैं और तुम सत्य को अपनी धारणाओं और कल्पनाओं से प्रतिस्थापित करने और इस तरह से परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करने, राज्य में प्रवेश करने और धन्य होने और पुरस्कृत किए जाने के ख्याली पुलाव पकाते हो। क्या यह मौत को बुलावा देना नहीं है? क्या ऐसे लोग पौलुस जैसे नहीं हैं? (हाँ।) इसलिए, अगर लोग अपने और परमेश्वर के बीच के अवरोधों और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को छोड़ना चाहते हैं, तो उन्हें परमेश्वर के कार्य की सटीक समझ होनी चाहिए। उन्हें परमेश्वर के बारे में अटकलें लगाना, उसके कार्य को मापना या अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर अपने व्यवहार और अभ्यासों को मापना और फिर इन धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर सब कुछ संभालना नहीं चाहिए। इस तरीके का अंतिम परिणाम यह होगा कि यह विफल हो जाएगा और गंभीर मामलों में, वे कलीसिया के कार्य को अस्त-व्यस्त कर देंगे, परमेश्वर के स्वभाव को अपमानित करेंगे और दंडित किए जाएँगे। इसलिए, परमेश्वर के कार्य के संबंध में लोगों को परमेश्वर के बारे में अपनी विभिन्न धारणाएँ और कल्पनाएँ छोड़ देनी चाहिए। यानी उन्हें अपनी धारणाओं और कल्पनाओं की जाँच करनी चाहिए, उनका गहन-विश्लेषण करना चाहिए और फिर उन्हें छोड़ देना चाहिए, परमेश्वर के इरादों और सत्य की तलाश करनी चाहिए और अपनी धारणाओं, कल्पनाओं, गलत सिद्धांतों और अभ्यासों का स्थान लेने के लिए सत्य सिद्धांतों का उपयोग करना चाहिए। सिर्फ इसी तरह से तुम उद्धार के मार्ग पर चलना शुरू कर सकते हो। नहीं तो तुम्हें बचाया जाना असंभव है, इसका तो प्रश्न ही नहीं उठता! यह एक तरह की धारणा और कल्पना है जो लोग परमेश्वर के कार्य के बारे में रखते हैं। तो चलो हम अपनी संगति यहीं समाप्त करें।

ग. परमेश्वर मनुष्य को कैसे शुद्ध करता और बचाता है, इस बारे में लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ

परमेश्वर के कार्य के बारे में लोगों की एक और तरह की धारणा और कल्पना है, जो यह है कि अपने रोजमर्रा के जीवन में जब वे कमजोर होते हैं, जब उनमें परमेश्वर के प्रति विभिन्न प्रकार के विद्रोहीपन जन्म लेने लगते हैं या जब उन्होंने ऐसी चीजें की होती हैं जो परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करती हैं और परमेश्वर का विरोध करती हैं, तो वे अपनी धारणाओं और कल्पनाओं में यह मानते हैं कि उन्हें अनुशासित किया जाना चाहिए, उन्हें ताड़ना दी जानी चाहिए या यहाँ तक कि उन्हें दंडित, शापित, वगैरह भी किया जाना चाहिए। मिसाल के तौर पर, कभी-कभी लोग गलत चीज कह देते हैं या कुछ धारणाएँ प्रकट कर देते हैं या वे किसी चीज के बारे में कुछ राय और कुछ अवज्ञा रखते हैं और कुछ समय बाद सोचते हैं, “मैंने यह विद्रोहीपन और विश्वासघात प्रकट किया है, लेकिन मुझे इसके लिए अनुशासित क्यों नहीं किया गया है? मेरी जीभ पर छाले नहीं पड़े हैं, मुझे रात में बुरे सपने नहीं आते हैं और मैं दिल में असहज महसूस नहीं करता हूँ। ऐसा क्यों है? मैं पवित्र आत्मा का कार्य महसूस क्यों नहीं करता?” अपनी धारणाओं और कल्पनाओं में वे मानते हैं कि चूँकि परमेश्वर उन्हें बचाने के लिए आया है और परमेश्वर के कार्य को उन्हें न सिर्फ जीत लेना चाहिए, बल्कि उन्हें बदल देना और शुद्ध भी करना चाहिए और उनके उन सभी प्रकार के विचारों और नजरियों को बदल देना चाहिए जो सत्य से असंगत हैं, तो अगर उनके विचारों में कुछ ऐसी बातें हैं जो सत्य से असंगत हैं या ऐसी चीजें हैं जो गंदी, मैली या दुष्ट हैं, तो उन्हें उनके लिए अनुशासित, तिरस्कृत या यहाँ तक कि दंडित भी किया जाना चाहिए और वे सोचते हैं, “अगर लोगों को अक्सर अनुशासित नहीं किया गया तो वे कैसे बदल सकते हैं और कैसे पावनीकृत हो सकते हैं?” यहाँ लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ क्या हैं? यानी, उन्हें अक्सर अनुशासित, तिरस्कृत, ताड़ित और दंडित किया जाना चाहिए और यहाँ तक कि उन्हें ताड़ना भी दी जानी चाहिए और उनका न्याय भी किया जाना चाहिए और सिर्फ तभी वे स्वभावगत बदलाव प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन रोजमर्रा के जीवन में जब लोग गंदगी, दुष्टता और भ्रष्टता प्रकट करते हैं, तो वे ऐसा बहुत स्वाभाविक रूप से करते हैं, वे इसे महसूस कर सकते हैं और वे इस तरीके से जीवन जीने में शांति भी महसूस करते हैं और उन्हें यह आभास नहीं होता है कि उन्हें अनुशासित या दंडित किया जा रहा है और उन्हें यह असामान्य लगता है। लोग सोचते हैं कि अगर वे भ्रष्टता प्रकट करते हैं, तो उन्हें कम-से-कम तिरस्कृत महसूस करना चाहिए या बीमार पड़ जाना चाहिए या उनके मुँह में छाले पड़ जाने चाहिए या भोजन करते समय उनका खाना गले में फँस जाना चाहिए या उनकी जीभ दाँतों से कट जानी चाहिए और अगर वे कुछ ऐसा देखते हैं जो उन्हें नहीं देखना चाहिए तो उनकी आँखें लाल हो जानी चाहिए और सूज जानी चाहिए। मुझे बताओ, क्या परमेश्वर ये चीजें करता है? (नहीं।) क्या वह इन्हें बिल्कुल नहीं करता है? (जब लोग सत्य नहीं समझते हैं तो परमेश्वर उनके आध्यात्मिक कद के अनुसार उन्हें थोड़ा-सा अनुशासित और तिरस्कृत कर सकता है ताकि वे आत्म-चिंतन कर सकें और सत्य में प्रवेश कर सकें। लेकिन जब लोग सत्य समझते हैं और अपने दिलों में स्पष्ट रूप से यह जानते हैं कि उन्होंने जो किया है वह गलत है, तो ऐसे में परमेश्वर यकीनन उन्हें अनुशासित नहीं करेगा क्योंकि वह उम्मीद करता है कि वे सत्य की तलाश कर सकते हैं और उसके वचनों और सत्य का उपयोग अपने क्रियाकलापों और व्यवहार को मापने के लिए कर सकते हैं।) उस पर वाकई बहुत अच्छी तरह से संगति की गई थी। अपनी धारणाओं और कल्पनाओं में लोग मानते हैं कि जब भी वे भ्रष्टता और विद्रोहीपन प्रकट करते हैं तो परमेश्वर को उन्हें अनुशासित करना चाहिए और विशेष रूप से, जब कुकर्मी बुराई करते हैं तो उन्हें तुरंत परमेश्वर का दंड मिलना चाहिए ताकि कुकर्मी निश्चित रूप से दंडित किए जा सकें। लेकिन वास्तविक जीवन में वे मुश्किल से ही कभी ये दंड दिए जाते हुए देखते हैं। एक लिहाज से, जब लोग भ्रष्टता और विद्रोहीपन के विभिन्न प्रकार प्रकट करते हैं तो उन्हें अनुशासित नहीं किया जाता है या उन्हें ताड़ना नहीं दी जाती है और दूसरे लिहाज से, जब कुकर्मी बुराई करते हैं तो उन्हें दंडित नहीं किया जाता है। इससे लोगों के दिलों की गहराइयों में परमेश्वर के कार्य के बारे में कुछ धारणाएँ जन्म ले लेती हैं और यहाँ तक कि कुछ लोग अपनी आस्था भी खो देते हैं और इन बाहरी चीजों के आधार पर परमेश्वर के कार्य को मापते हैं और उसके कार्य पर फैसले देते हैं। ये लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं, है ना? जब लोग भ्रष्टता और विद्रोहीपन प्रकट करते हैं, तो क्या परमेश्वर को उन्हें अनुशासित करना चाहिए या उन्हें ताड़ना देनी चाहिए और उनका न्याय करना चाहिए? (नहीं।) कुछ लोग कहते हैं, “जब परमेश्वर लोगों को बचाता है तो उसे उन्हें पूरी तरह से बचाना चाहिए। परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य क्या है? क्या यह लोगों को शुद्ध करना नहीं है? इसलिए जब लोग भ्रष्टता और विद्रोहीपन प्रकट करते हैं तो परमेश्वर को उन्हें अनुशासित करना चाहिए और उनका तिरस्कार करना चाहिए—यह उनके प्रति जिम्मेदार होना है। नहीं तो इसका मतलब है कि वह लोगों की परवाह नहीं करता है और सही मायने में उनसे प्रेम नहीं करता है और उन पर दया नहीं करता है।” क्या लोग इसी तरीके से नहीं सोचते हैं? (हाँ।) यहाँ कौन-से सत्य समझे जाने चाहिए? क्या लोगों द्वारा सत्य समझने और सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए अनुशासित होना, ताड़ना दिया जाना और दंडित होना जरूरी प्रक्रियाएँ हैं? क्या ये लोगों को बचाने और उन्हें बदलने के लिए परमेश्वर के जरूरी साधन और तरीके हैं? कुछ लोग इसे समझ नहीं पाते हैं और सोचते हैं, “अगर वाकई परमेश्वर का अस्तित्व है और वह लोगों को बचाने के लिए अपना कार्य करता है तो जब लोग भ्रष्टता प्रकट करते हैं या उसके खिलाफ विद्रोह करते हैं तो वह उन्हें अनुशासित क्यों नहीं करता है? परमेश्वर कुकर्मियों को बुराई करने के लिए दंडित क्यों नहीं करता है?” जब परमेश्वर लोगों को अनुशासित नहीं करता है या जब कुकर्मियों को बुराई करने के लिए दंडित नहीं किया जाता है तो क्या इससे कुछ लोग परमेश्वर के अस्तित्व और उसके कार्य के परिणामों पर प्रश्न नहीं उठाएँगे? अगर बार-बार अनुशासित और दंडित करना लोगों द्वारा सत्य की खोज करने की जगह ले सकता या उन्हें सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने में सक्षम बना सकता तो अनुशासित और दंडित करना ही वह मुख्य तरीका होता जिससे परमेश्वर लोगों को बचाने के लिए कार्य करता है और ये ऐसा करने का एक जरूरी साधन भी होता। लेकिन लोगों की भ्रष्टता के वर्तमान स्तर को देखा जाए तो क्या परमेश्वर के अनुशासित और दंडित करने से उनकी शैतानी प्रकृति को तुरंत बदला जा सकता है? क्या लोग तुरंत सच्चा पश्चात्ताप करना शुरू कर सकते हैं? क्या वे तुरंत सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हैं? (नहीं, वे नहीं कर सकते हैं।) यह उनकी पहुँच से बाहर होगा। इसलिए, परमेश्वर के कार्य के इस चरण में जब परमेश्वर लोगों को जीवन प्रदान करने के लिए सत्य व्यक्त करता है तो उसी समय वह—पवित्र आत्मा द्वारा लोगों को प्रबुद्ध करने और उनका मार्गदर्शन करने के कार्य को छोड़कर—कुछ भी अलौकिक नहीं करता है और मुश्किल से ही कभी वह लोगों को ताड़ना देने, अनुशासित या दंडित करने जैसी चीजें करता है। लोगों को ताड़ना देना, अनुशासित और दंडित करना परमेश्वर के कार्य का मुख्य भाग नहीं है, लेकिन वह फिर भी ये चीजें करता है। यानी कुछ विशेष लोगों के मामले में या कुछ विशेष मामलों या कुछ विशेष परिवेशों में, कुछ विशेष परिणाम प्राप्त करने की खातिर या कुछ विशेष कारणों से, परमेश्वर लोगों को अनुशासित करने, ताड़ना देने या दंडित करने का कार्य करेगा। लेकिन कुल मिलाकर वह अपने कार्य के इस चरण में जिस मुख्य तरीके से कार्य करता है वह सत्य बोलना और व्यक्त करना है ताकि वह लोगों को वह चीज प्रदान कर सके जिसकी उन्हें सत्य का अनुसरण करने के अपने मार्ग पर जरूरत है, और इसका उद्देश्य उन्हें सत्य सिद्धांतों को समझने और सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने में सक्षम बनाना है। अब जबकि परमेश्वर ने बहुत सारे सत्य व्यक्त कर दिए हैं तो वह अनुशासित करने, ताड़ना देने और यहाँ तक कि दंडित करने का यह कार्य शायद ही कभी करता है जो उसने अतीत में किया था। इसलिए लोगों को इस बात पर कि क्या परमेश्वर उन्हें अनुशासित कर रहा है, बाधित कर रहा है या किसी दिए गए मामले में उनके लिए चीजें सुचारू रूप से चला रहा है, और ऐसे दूसरे तरीकों और अभ्यासों पर, ध्यान देने के बजाय उन विभिन्न सत्य सिद्धांतों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए जिन्हें उन्हें रोजमर्रा के जीवन में मामलों का सामना करने पर अभ्यास में लाना चाहिए। चूँकि परमेश्वर कभी-कभार अनुशासित करने, ताड़ना देने और दंडित करने जैसे तरीकों का उपयोग करता है, इसलिए ऐसा नहीं है कि वह इनका उपयोग कभी नहीं करता है, वह बस इनका उपयोग कभी-कभार ही करता है। “इनका उपयोग कभी-कभार ही करता है” से मेरा क्या मतलब है? जब-तब, कुछ विशेष हालातों में, वह—हल्के या प्रतिनिधिक और प्रतीकात्मक तरीके से—कुछ ऐसा कार्य करने के लिए जो लोगों को सत्य समझने और सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने में मदद करता है, अनुशासित करने, ताड़ना देने या दंडित करने के तरीकों का उपयोग करेगा। यानी, वह इन तरीकों का उपयोग लोगों को सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने में मदद करने के लिए करता है, लेकिन बस इतना ही। तो फिर परमेश्वर अपने कार्य में इन तरीकों का बहुत उपयोग क्यों नहीं करता है? वह मुख्य रूप से इन तरीकों से कार्य क्यों नहीं करता है? एक लिहाज से, वह इसलिए है क्योंकि अपने कार्य के इस चरण में उसने लोगों को पहले से ही विभिन्न सत्य बता दिए हैं और प्रदान कर दिए हैं जिन्हें उन्हें समझना चाहिए, और उन्होंने पहले से ही ये सत्य सुन लिए हैं और उनके पास पहले से ही अपनी समझ के दायरे में उन सत्यों पर पकड़ है और उनका ज्ञान है। यह एक कारण है। दूसरा कारण लोगों के व्यक्तिपरक कारकों से संबंधित है। लोगों के पास सामान्य मानवता वाला जमीर होता है और इस जमीर के प्रभाव में वे यह मापेंगे कि उनके द्वारा प्रकट किए गए भ्रष्ट स्वभाव या उनके अपने क्रियाकलाप, विचार और नजरिये सकारात्मक हैं या नकारात्मक। यह सब कुछ मापने के लिए लोगों में, कम-से-कम, जमीर का मानक होता है। अगर तुम किसी विशेष चीज को मापने के लिए अपने जमीर का उपयोग करते हो और तुम यह तय करते हो कि वह सकारात्मक है तो तुम्हें आगे बढ़ना चाहिए और इसे करना चाहिए और अगर इसे करने में तुम थोड़े धीमे हो या तुम देर कर देते हो तो तुम्हें अपना तिरस्कार करने की जरूरत नहीं है। अगर तुम उस चीज को मापने के लिए अपने जमीर का उपयोग करते हो और तुम यह तय करते हो कि वह नकारात्मक है और कुछ ऐसा है जो नहीं करना चाहिए, तो तुम्हें खुद पर अंकुश लगाना चाहिए और ऐसा कहना या करना नहीं चाहिए। लेकिन अगर तुम्हारे पास अपने जमीर और विवेक से प्रेरित भावनाएँ नहीं हैं तो तुम मनुष्य नहीं हो। अगर तुम्हारे पास जमीर और विवेक भी नहीं है तो तुम संभवतः यह नहीं माप सकते कि कोई चीज सही है या गलत, सकारात्मक है या नकारात्मक और इस प्रकार परमेश्वर के लिए तुम्हें अनुशासित और दंडित करना निरर्थक होगा। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर उन लोगों पर कार्य नहीं करता है जो जमीर के प्रभावों के अधीन नहीं हैं और वह ऐसे लोगों को नहीं बचाता है। “उन्हें नहीं बचाने” में क्या शामिल है? वह उन्हें अनुशासित करना चाहता ही नहीं है; वह उन्हें अनुशासित नहीं करता है या उन्हें ताड़ना नहीं देता है। कुछ लोग पूछते हैं, “अगर कोई बुराई करता है तो क्या परमेश्वर उसे दंडित करेगा?” परमेश्वर उसे सीधे दंडित नहीं करेगा क्योंकि कलीसिया के पास प्रशासनिक आदेश हैं। अगर वह कोई ऐसा बुरा व्यक्ति है जो बाधाएँ या विघ्न डाल रहा है, तो उसे बहिष्कृत या निष्कासित कर इस मामले को समाप्त कर दिया जाएगा। अगर वह बहिष्कृत या निष्कासित किए जाने की शर्तें पूरी नहीं करता है तो भी उसे बी समूह में भेज दिया जाएगा। अगर कोई परमेश्वर के चढ़ावे बर्बाद करता है तो यह ज्यादा गंभीर है और उससे जो भी देय है उसकी उसे प्रतिपूर्ति करनी चाहिए और उसके बाद उससे उचित तरीके से निपटा जाना चाहिए। परमेश्वर के कार्य का यही सिद्धांत है और यही वह सिद्धांत है जिसके द्वारा वह लोगों से पेश आता है। यह सरल है, है ना? (हाँ, है।) क्या तुम्हें लगता है कि परमेश्वर का तुम्हें चुनने का यह मतलब है कि वह तुम्हें जरूर पूर्ण करेगा और जब तक वह ऐसा नहीं करता है, तब तक वह नहीं रुकेगा? ऐसा सिर्फ उन लोगों के लिए है जिनके पास जमीर और विवेक है और जो सत्य का अनुसरण करते हैं—ऐसा सिर्फ उन लोगों के लिए है जिन्हें बचाया जा सकता है। जहाँ तक उन लोगों की बात है जिनके पास जमीर की जागरूकता तक नहीं है, उनके साथ सिर्फ कलीसिया के प्रशासनिक आदेशों के अनुसार पेश आने और निपटने की जरूरत है—परमेश्वर उन्हें अनुशासित नहीं करेगा। उन्हें अनुशासित करने का क्या फायदा है? ऐसे लोगों को अनुशासित करना जिनमें सामान्य मानवता और जमीर नहीं है, मछली को जमीन पर रहने या सुअर को उड़ने के लिए मजबूर करने के समान है, यह सूअरों के आगे मोती डालने और अशुद्ध लोगों को खाने के लिए पवित्र चीजें देने जैसा है—परमेश्वर यकीनन ऐसा नहीं करता है। इसलिए, इस मामले में लोगों को यह नहीं सोचना चाहिए, “मुझे परमेश्वर ने चुना, मैं परमेश्वर की भेड़ों में से एक हूँ और अगर मैं गलतियाँ और बुराई करूँ, तो भी परमेश्वर मुझे नहीं छोड़ेगा।” इस बात में दम नहीं है—यह कहना मुश्किल है कि तुम भेड़ हो या भेड़िया। तुम यह कैसे मापते हो कि तुम परमेश्वर की भेड़ों में से एक हो या नहीं? यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या तुममें इस बारे में जागरूकता है और जब तुमने कुछ ऐसा किया है जो मानवता और जमीर के विरुद्ध जाता है तो क्या तुम्हारा जमीर तिरस्कृत और निंदित महसूस करता है। अगर यह निंदित महसूस करता है तो तुम अपने आप को बदल डालोगे और अगर तुम सत्य नहीं समझते हो, तो भी तुम जमीर के मानक के अनुसार कार्य करने में समर्थ होगे। कम-से-कम, तुम सामान्य मानवता के अनुसार कार्य करने में समर्थ होगे। अगर तुममें ये अभिव्यक्तियाँ हैं तो तुम परमेश्वर की भेड़ों में से एक हो। जब तुम्हारे सामने कोई ऐसी चीज आती है जो सामान्य मानवता वाले जमीर के खिलाफ जाती है और नैतिक न्याय का उल्लंघन करती है, तो अगर तुममें न्याय की रत्ती भर भी भावना नहीं होती है और तुम्हें अपनी की हुई बुराई के लिए या कुकर्मियों द्वारा डाले गए विघ्न के लिए नफरत महसूस नहीं होती है और अगर तुम्हारा जमीर बिल्कुल भी तिरस्कृत महसूस नहीं करता है तो तुम परमेश्वर की भेड़ों में से एक नहीं हो, तुम एक भेड़िये हो, तुम एक दरिंदे हो और तुम एक दानव हो। यह वह मानक है जिससे यह मापा जाता है कि तुम परमेश्वर की भेड़ों में से एक हो या भेड़िये हो। अगर तुम परमेश्वर की भेड़ों में से एक नहीं हो और फिर भी तुम विचारों, धारणाओं और कल्पनाओं, जैसे कि, “मैंने भ्रष्टता और विद्रोहीपन प्रकट किया है, फिर भी परमेश्वर ने मुझे अनुशासित नहीं किया है; परमेश्वर को मुझे अनुशासित करना चाहिए,” का उपयोग करके लगातार परमेश्वर का कार्य मापते हो तो तुम बेवकूफ हो। तुम परमेश्वर की भेड़ों में से एक बिल्कुल नहीं हो और परमेश्वर का तुम्हें बचाने का कोई इरादा नहीं है, तो क्या तुम परमेश्वर के कार्य को मापने और उसके बारे में राय बनाने के योग्य हो? अगर यह बेवकूफी नहीं है तो यह क्या है? तुम यह मामला माप सकते हो, है ना? (अब मैं माप सकता हूँ।)

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