सत्य का अनुसरण कैसे करें (1) भाग पाँच
जमीर होने का मानक क्या है? तुम्हें यह कैसे मापना चाहिए कि किसी व्यक्ति में जमीर है या नहीं? (यह इस बात पर निर्भर करता है कि जब वह कुकर्मियों को बुराई करते देखता है या परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान पहुँचाने वाली चीजें देखता है, तो क्या उसके दिल में न्याय की भावना होती है और क्या वह इन चीजों से नफरत करने में समर्थ होता है। अगर उसके दिल में बिल्कुल भी जागरूकता नहीं है तो इसका मतलब है कि उसमें जमीर नहीं है। साथ ही, अगर किसी के दिल में अपनी की हुई बुराई या उन चीजों के बारे में कोई जागरूकता नहीं है जो स्पष्ट रूप से सिद्धांतों का उल्लंघन करती हैं, तो ऐसे लोगों में भी जमीर नहीं होता है।) अगर तुममें जमीर नहीं है तो इसका मतलब है कि तुम मनुष्य नहीं हो। ऐसे में क्या परमेश्वर फिर भी तुम्हें बचाएगा? अगर परमेश्वर तुम्हें नहीं बचाएगा तो क्या वह फिर भी तुम्हें अनुशासित करेगा? अनुशासित करना और ताड़ना देना परमेश्वर के कार्य का एक मामूली हिस्सा है। जब मैं “मामूली” कहता हूँ, तो मेरा मतलब है कि परमेश्वर इन तरीकों का कम उपयोग करता है, लेकिन फिर भी वे परमेश्वर के कार्य का भाग हैं। अगर तुममें जमीर या विवेक ही नहीं है तो क्या परमेश्वर का तुम्हें अनुशासित करने का कोई फायदा है? अगर तुममें न्याय की भावना नहीं है और तुम्हें सभी दुष्ट चीजों, सत्य के विरुद्ध जाने वाली सभी चीजों, नैतिक न्याय के विरुद्ध जाने वाली सभी चीजों और यहाँ तक कि अपने जमीर के विरुद्ध जाने वाली सभी चीजों के प्रति कुछ भी महसूस नहीं होता है और तुम ऐसी चीजों से नफरत नहीं करते हो और अगर तुम परमेश्वर के घर के हितों का बचाव करने के लिए परमेश्वर के पक्ष में खड़े नहीं हो पाते हो और तुम उठकर कलीसिया के कार्य के बचाव में एक चीज—एक निष्पक्ष बयान—तक नहीं कह पाते हो तो इसका मतलब है कि तुम मनुष्य नहीं हो। तुम मनुष्य नहीं हो और फिर भी तुम परमेश्वर से तुम्हें अनुशासित करने की अत्यधिक उम्मीद करते हो। तुम वाकई खुद को ऊपर उठा रहे हो और खुद को बाहरी व्यक्ति नहीं मान रहे हो! कुछ लोग कहते हैं, “अगर कोई व्यक्ति परमेश्वर की भेड़ों में से नहीं बल्कि भेड़िया है, तो परमेश्वर उसे अनुशासित नहीं करेगा। इसलिए अगर वह परमेश्वर की भेड़ों में से हो, तो क्या परमेश्वर उसे अनुशासित करेगा?” विशेष हालातों में परमेश्वर कभी-कभार तुम्हें अनुशासित करेगा और तुम्हारी तरफ से जिम्मेदारी लेगा। अगर तुम सुन्न और बेखबर हो तो भी परमेश्वर तुम्हें चेताएगा, तुम्हें अनुशासित करेगा और तुम्हारा तिरस्कार करेगा। परमेश्वर का कार्य उचित सीमा तक किया जाता है और उसे वहीं छोड़ दिया जाता है। वह इस तरीके से कार्य क्यों करता है? क्योंकि अगर तुममें जमीर है तो जब परमेश्वर तुम्हें इस तरीके से तिरस्कृत करेगा, तो तुरंत तुम्हारे जमीर में जागरूकता आएगी और तुम खुद को दोषी ठहराओगे और उसके प्रति ऋणी महसूस करोगे; तुम पश्चात्ताप, दुख और पीड़ा महसूस करोगे और तुम खुद को बदलने में समर्थ होगे और अंत में सत्य सिद्धांतों की तलाश करोगे और सत्य के अनुसार अभ्यास करोगे—परमेश्वर यही परिणाम चाहता है। अगर तुममें संवेदनशील जमीर है और तुम बहुत-से सत्य समझते हो, और भले ही परमेश्वर तुम्हें अनुशासित न करे, तुम्हें ताड़ना न दे या तुम्हें न चेताए, फिर भी तुम समस्या का एहसास करने में समर्थ हो और अब भी तुम्हारे जमीर में जागरूकता है और वह तिरस्कार और फटकार महसूस करता है, तो यह और भी बेहतर है और परमेश्वर के अनुशासन की जरूरत नहीं है। अगर परमेश्वर तुम्हें अनुशासित न भी करे तो भी तुम्हारा जमीर अत्यंत संवेदनशील होता है और फटकार महसूस करता है और तुम पश्चात्ताप, दुःख और परमेश्वर के प्रति ऋणी महसूस करते हो और यह महसूस करते हो कि तुमने उसके साथ गलत किया है, उसे निराश किया है और उसे असंतुष्ट छोड़ दिया है और तुम अग्रसक्रियता से सत्य सिद्धांतों की तलाश करने और उसकी अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करने में समर्थ होते हो। सामान्य मानवता का जमीर लोगों पर यही प्रभाव डालता है और यह वह प्रभाव भी है जो उसे लोगों पर डालना चाहिए। इसलिए, कोई व्यक्ति परमेश्वर की भेड़ों में से एक है या नहीं और उसे बचाया जा सकता है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसमें सामान्य मानवता और जमीर है या नहीं है। यह निर्णायक और महत्वपूर्ण है। अगर तुम कहते हो कि तुम बहुत सारे सत्य समझते हो तो जब तुम खुद विद्रोही होते हो या जब कुकर्मी तुम्हारे सामने आते हैं जो बुरा कर रहे होते हैं, तब क्या तुम जो सत्य समझते हो वे असर करते हैं? क्या वे तुम पर निगरानी रखने, तुम्हें प्रबुद्ध करने और तुम्हारे जमीर को तिरस्कृत महसूस करवाने का प्रभाव हासिल करते हैं और प्रभावी होते हैं? अगर तुममें जमीर के बारे में जागरूकता नहीं है तो तुममें जमीर और सामान्य मानवता की कमी है और जिसे तुम समझते हो वह सत्य नहीं बल्कि धर्म-सिद्धांत है। अगर तुम सिर्फ धर्म-सिद्धांत समझते हो तो तुम सत्य को अभ्यास में नहीं ला सकते और तुम उन लोगों में से नहीं हो जिन्हें बचाया जाएगा। तुम यह समझते हो, है ना? (हाँ।) इसलिए, परमेश्वर के कार्य में जब उसके कार्य करने के कुछ सबसे बुनियादी तरीकों की बात आती है तो लोगों को उन्हें अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर सीमित नहीं करना चाहिए। भले ही परमेश्वर ने तुम्हें अनुशासित किया हो, ताड़ना दी हो और दंडित किया हो या तुम्हें कभी भी अनुशासित नहीं किया हो, ताड़ना नहीं दी हो या दंडित नहीं किया हो, यह इस बात को नहीं दर्शाता है कि तुमने कितने सत्य सिद्धांत समझे हैं और न ही यह इस बात को दर्शाता है कि तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जिसे परमेश्वर ने चुना है। हो सकता है कि तुमने बहुत वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखा हो और तुम्हें अनगिनत बार अनुशासित किया गया हो और ताड़ना दी गई हो, लेकिन तुमने कभी भी सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य नहीं किया है—ऐसे में, अंत में जब तुम बचाए नहीं जाओगे, तो यह पूरी तरह से तुम्हारी अपनी गलती होगी और ठीक वही होगा जिसके तुम लायक हो। यह भी हो सकता है कि तुम्हें परमेश्वर में अपने विश्वास में शायद ही कभी अनुशासित और दंडित किया गया हो, लेकिन अपने जमीर के कारण तुम अक्सर फटकार और तिरस्कार महसूस करते हो और जब तुम अपराध करते हो, तो तुम पश्चात्ताप महसूस करते हो और खुद को बदल लेते हो और तुम सत्य सिद्धांतों की तलाश करने, सत्य का अभ्यास करने और सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने में समर्थ होते हो—ऐसे में तुम उन लोगों में से एक हो जिन्हें बचाया जाएगा। क्या तुम समझ गए हो? (हाँ।) मैंने दो परिस्थितियों का जिक्र किया। वे विशेष रूप से क्या हैं? (एक परिस्थिति वह है जिसमें लोगों को बहुत अनुशासित और दंडित किया गया है, लेकिन अंत में वे फिर भी सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य नहीं कर पाते हैं और उन्होंने सत्य प्राप्त नहीं किया होता है, और इसलिए उन्हें बचाया नहीं जाता है, और यह सब उनकी अपनी ही करनी है। दूसरी परिस्थिति वह है जिसमें कुछ लोग परमेश्वर द्वारा बहुत ज्यादा अनुशासित किए जाने या ताड़ना दिए जाने की जरूरत के बिना अपने जमीर का उपयोग खुद पर अंकुश लगाने के लिए करने में समर्थ होते हैं और वे जब भी सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं या विद्रोहीपन प्रकट करते हैं, तो अपने जमीर से फटकार महसूस करते हैं और अग्रसक्रिय रूप से सत्य की तलाश कर पाते हैं और सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर पाते हैं और वे कम-से-कम कुछ सकारात्मक चीजें कर पाते हैं और इसलिए वे उन लोगों में से एक होते हैं जिन्हें बचाया जाएगा। परमेश्वर ने अभी-अभी इन्हीं दो परिस्थितियों के बारे में बात की।) वे सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर सकते हैं या नहीं, यही इन दो प्रकार के लोगों का मूल्यांकन करने का मानक है। कुछ लोग सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने में असमर्थ होते हैं और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कितना धर्म-सिद्धांत समझते हैं या उन्हें कितना अनुशासित और दंडित किया जाता है, वे उद्धार के लक्ष्य नहीं होते हैं। जबकि कुछ दूसरे लोगों को शायद ही कभी परमेश्वर द्वारा अनुशासित और दंडित किया जाता है या उसके द्वारा ताड़ना दी जाती है और तिरस्कृत किया जाता है, लेकिन वे अक्सर आत्म-चिंतन करने में समर्थ होते हैं और जब भी वे सिद्धांतों का उल्लंघन करते हुए कार्य करते हैं या विद्रोहीपन प्रकट करते हैं, तो वे अपने जमीर से फटकार और तिरस्कार महसूस कर पाते हैं और बाद में वे पश्चात्ताप महसूस करते हैं और सत्य सिद्धांतों के अनुसार अग्रसक्रियता से अभ्यास कर पाते हैं। वैसे तो शायद ही कभी परमेश्वर द्वारा उन्हें अनुशासित किया जाता है या ताड़ना दी जाती है, फिर भी इस प्रकार के लोग उद्धार के लक्ष्य होते हैं। मैं यहाँ जिस अनुशासन और दंड का जिक्र कर रहा हूँ उसका परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना से कोई लेना-देना नहीं है, ये बस वही बातें हैं जिन्हें लोग अपनी धारणाओं और कल्पनाओं में अनुशासन और दंड के रूप में सोचते हैं। लोग अपनी धारणाओं और कल्पनाओं में मानते हैं कि अगर उन्हें अक्सर अनुशासित और दंडित किया जाता है, तो इसका मतलब है कि उनके पास अनुभवजन्य गवाही है और वे आध्यात्मिक लोग हैं। लोग अक्सर अनुशासित और दंडित किए जाने को पवित्र आत्मा के कार्य से जोड़ते हैं और मानते हैं कि वे पवित्र आत्मा की धारा से जुड़े हुए हैं। कुछ लोग अक्सर कहते हैं, “मैंने अपना कर्तव्य ठीक से नहीं किया और एक बार फिर मेरी काट-छाँट की गई। अब मेरे मुँह में छाले हैं और मैं बीमार पड़ गया हूँ—यह परमेश्वर का मुझे अनुशासित करना है।” बहुत-से लोग अक्सर इन अनुभवों के बारे में संगति करते हैं, लेकिन तुम्हें यह देखना चाहिए कि जब भी वे समस्याओं का सामना करते हैं तो उनकी अभिव्यक्तियाँ क्या होती हैं—यह देखो कि क्या कुछ गलत करने पर वे अपने जमीर से फटकार महसूस करते हैं और जब उनके सामने कुकर्मी बुराई करते हैं या जब उनके सामने दुष्ट चीजें आती हैं तो क्या वे उठ खड़े होते हैं और सत्य सिद्धांतों को बनाए रखने और परमेश्वर के घर के हितों का बचाव करने में समर्थ होते हैं। अगर नहीं, तो इन लोगों में बिल्कुल जमीर नहीं है और वे मनुष्य नहीं हैं! वे सुखद शब्द बोलते हैं और अपनी बहुत-सी अनुभवजन्य गवाहियों के बारे में इतनी संपूर्णता से बोलते हैं—ऐसा लगता है मानो परमेश्वर ने उन पर बहुत ज्यादा अनुग्रह दिखाया हो और उन पर बहुत कार्य किया हो और उनसे बहुत सारे वचन कहे हों और इससे ऐसा लगता है मानो वे पहले ही उद्धार प्राप्त कर चुके हों। लेकिन अपने रोजमर्रा के जीवन में जब भी सिद्धांतों से संबंधित समस्याएँ उनके सामने आती हैं तो वे कभी भी सत्य सिद्धांतों को बनाए नहीं रखते हैं और हमेशा अपने खोल में छिपे हुए कछुए की तरह पीछे हट जाते हैं और मुद्दे को टाल देते हैं। और हर बार जब उनसे बोलने और अपने विचार और दृष्टिकोण व्यक्त करने के लिए कहा जाता है तो वे दूर रहते हैं, अनजान बनने का नाटक करते हैं और चुप रहते हैं। वे सत्य सिद्धांतों को बिल्कुल भी बनाए नहीं रखते हैं और न ही वे सत्य का अभ्यास करते हैं। ये कौन लोग हैं? ये पाखंडी हैं। दूसरों को सींचते और उनकी मदद करते समय वे बहुत व्यवस्थित और तर्कसंगत तरीके से आध्यात्मिक सिद्धांतों के बारे में बात करते हैं और वे कई-कई घंटों तक बोलते रहते हैं जिससे कुछ लोग भावुक होकर रोने लगते हैं और फिर भी वे अपने क्रियाकलापों में कभी भी सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं—ये लोग फरीसी हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कितने छद्म-आध्यात्मिक अनुभवों और छद्म-आध्यात्मिक धर्म-सिद्धांतों की बात करते हैं या वे कितने खोखले शब्द और अतिशयोक्तिपूर्ण शब्द कहते हैं, उनका जमीर उन्हें तिरस्कृत नहीं करता है; और जब सही और गलत या सिद्धांत के किसी भी मुख्य मुद्दे की बात आती है तो वे सत्य के पक्ष में खड़े नहीं होते हैं या सत्य सिद्धांतों को बनाए नहीं रखते हैं और उनका जमीर उन्हें बिल्कुल भी तिरस्कृत नहीं करता है, लेकिन फिर भी बाद में वे बेशर्मी से इस बारे में शेखी बघार पाते हैं कि वे परमेश्वर के घर के हितों का बचाव कैसे करते हैं, और वे अब भी कई सुखद धर्म-सिद्धांतों को बड़बड़ा सकते हैं—यह पाखंडी होना और जमीर की जागरूकता नहीं होना है। वे बहुत बार सत्य का अभ्यास करने में विफल हो जाते हैं, वे बहुत बार सत्य का उल्लंघन करते हैं, वे बहुत बार लोगों को धोखा देते हैं और गुमराह करते हैं, फिर भी उनका जमीर उन्हें बिल्कुल भी तिरस्कृत नहीं करता है और वे अब भी बेशर्मी से अपना दिखावा कर पाते हैं—यह मानवता से रहित होना है! वे इसी तरह से अकड़कर इधर-उधर घूमते हैं और हर जगह झाँसा देते हैं और उन्हें शर्मिंदगी तक महसूस नहीं होती है; वे सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं और फिर भी वे यह डींग हाँकते हैं कि वे आध्यात्मिक लोग हैं, वे ऐसे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर ने बचा लिया है और पूर्ण बना दिया है और जो बाकी सभी से ज्यादा परमेश्वर से प्रेम करते हैं—यह जमीर की जागरूकता की कमी है और ये वे लोग नहीं हैं जिन्हें बचाया गया है। क्या बचाए गए लोगों में सामान्य मानवता और जमीर की जागरूकता की कमी हो सकती है? कुछ लोगों को लगता है कि उन्हें सत्य उतना पसंद नहीं है और जब भी सत्य सिद्धांतों या सही-गलत के मुख्य मुद्दों से जुड़ी समस्याएँ उनके सामने आती हैं तो वे चापलूस बन जाते हैं, गोलमोल करने की कोशिश करते हैं और कभी भी सत्य सिद्धांतों को बनाए नहीं रख पाते हैं और इसलिए वे अपने दिलों में तिरस्कृत महसूस करते हैं और अक्सर परमेश्वर के सामने प्रार्थना करते हैं और उसके प्रति ऋणी महसूस करते हैं। वैसे तो वे अक्सर कमजोर होते हैं और इस आड़ को तोड़कर निकलने में असमर्थ होते हैं, फिर भी उन्हें अपने दिलों में पता होता है कि उन्होंने सत्य या न्याय को बनाए नहीं रखा है और वे परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में डटकर नहीं खड़े रहे हैं और वे सिर्फ चापलूस हैं, इसलिए उन्हें यह कहने में बहुत शर्मिंदगी महसूस होगी कि उनके पास कोई गवाही है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्होंने सत्य सिद्धांतों को बनाए नहीं रखा है और उनके पास कोई सच्ची अनुभवजन्य गवाही नहीं है और वे कंगाल और अंधे हैं और उन्होंने परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी नहीं की हैं; वे अपने दिलों में यह बात जानते हैं और इसके लिए अक्सर उनके जमीर फटकार महसूस करते हैं और उन्हें लगता है कि वे परमेश्वर के कर्जदार हैं और वे दुखी हो जाते हैं। अब भी इन लोगों के पास उद्धार पाने की उम्मीद और गुंजाइश है। इसके विपरीत, ऐसे लोग भी हैं जिन्हें देखकर लगता है कि वे बहुत अच्छी तरह से सत्य समझते हैं और लोगों को सींचने, उनका भरण-पोषण करने और उनकी मदद करने में समर्थ हैं, लेकिन जब उनके सामने ऐसी समस्याएँ आती हैं जिनमें सत्य सिद्धांत या सही-गलत के मुख्य मुद्दे शामिल होते हैं, तो वे कभी भी परमेश्वर के पक्ष में खड़े नहीं होते हैं और वे कभी भी सत्य सिद्धांतों को बनाए नहीं रखते हैं और फिर भी वे आध्यात्मिक लोग, परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग और परमेश्वर के प्रति वफादार लोग होने की डींग हाँकते हैं। इस तरह के लोग बहुत मुसीबत में होते हैं। वे वास्तविकता का सामना करने की हिम्मत नहीं करते हैं, वे वास्तविक समस्याएँ सुलझाने की हिम्मत नहीं करते हैं, वे मुख्य मुद्दों पर अपनी स्थिति घोषित करने की हिम्मत नहीं करते हैं और वे खुले और सीधे तरीके से सत्य सिद्धांतों को बनाए रखने की हिम्मत नहीं करते हैं, लेकिन इस तथ्य के बाद भी वे बेशर्मी से यह डींग हाँकते हैं कि वे आध्यात्मिक लोग हैं और कहते हैं कि सभी से ज्यादा वे परमेश्वर से प्रेम करते हैं और परमेश्वर के इरादों को सबसे अच्छी तरह से समझ सकते हैं। इस तरह के लोगों में जमीर के बारे में बिल्कुल भी जागरूकता नहीं होती है। क्या कोई व्यक्ति जिसमें जमीर के बारे में जागरूकता नहीं है सत्य सिद्धांतों को बनाए रख सकता है? क्या वह कुकर्मियों से निपटने के लिए खुलेआम अपनी स्थिति घोषित करने और परमेश्वर के पक्ष में खड़े होने की हिम्मत कर सकता है? उसकी कोई संभावना नहीं है; ऐसे लोगों के लिए सत्य का अभ्यास करना बहुत मुश्किल है।
अगर किसी व्यक्ति में सामान्य मानवता वाला जमीर है तो वह अपने विचारों, शब्दों और कार्यों को विनियमित करेगा। “विनियमित करने” का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि जब तुम्हारे विचार और व्यवहार सामान्य मानवता के मानक से बाहर भटक जाते हैं, तो तुम्हारा जमीर यह फैसला लेता है कि उस तरीके से सोचना गलत है और वह चीज करना अच्छा नहीं है, और इसलिए तुम शर्मिंदा होते हो और असहज और तिरस्कृत महसूस करते हो। ये भावनाएँ उत्पन्न होने के बाद तुम्हारे विचार और व्यवहार एक निश्चित सीमा तक सीमित हो जाएँगे और संयम की यह निश्चित सीमा तुम्हारे व्यवहार को विनियमित करेगी और तुम्हें ऐसी चीजें करने से बचने में सक्षम बनाएगी जो स्पष्ट रूप से सत्य सिद्धांतों का उल्लंघन करती हैं और उन चीजों से भी बचने में सक्षम बनाएगी जो तुम्हारे जमीर और नैतिक न्याय के विरुद्ध जाती हैं। लेकिन अगर तुम्हारे पास जमीर का मानक नहीं है, तो जब तुम चीजें करोगे तो तुम्हारे पास अपने विचारों और व्यवहारों को विनियमित और संयमित करने की कोई कसौटी नहीं होगी और इसलिए तुम निरंकुश हो जाओगे, तुम्हारे दिमाग में जो भी आएगा, तुम जो भी चाहोगे और जो भी तुम्हारे अपने लिए फायदेमंद और उपकारी होगा, तुम वही करोगे। ऐसे हालातों में जब तुम में कोई संयम नहीं होगा, तो तुम्हारे विचार और व्यवहार बहुत ही ज्यादा बढ़ जाएँगे। “बहुत ही ज्यादा बढ़ जाएँगे” का क्या मतलब है? उन पर बिल्कुल कोई विनियम नहीं होगा। यह ठीक वैसा ही होगा जैसा तब होता है जब अविश्वासी दूसरे लोगों को धोखा देते हैं—उनमें जमीर के बारे में जागरूकता नहीं होती है और अगर वे तुमसे एक हजार रुपये ठग लेते हैं तो उन्हें बुरा नहीं लगता है और अगर वे तुम्हें इस हद तक ठग लेते हैं कि तुम्हारा परिवार बर्बाद हो जाता है तो भी उन्हें बुरा नहीं लगता है और अगर तुम घुटनों के बल बैठ जाते हो और उनसे मिन्नतें भी करते हो तो भी वे तुम पर ध्यान नहीं देते हैं। वे वाकई बेहद कुकर्मी हैं। वे इतनी बुराई क्यों कर पाते हैं? वह इसलिए क्योंकि उनके पास जमीर के बारे में या जमीर द्वारा प्रदान किए जाने वाले संयम के बारे में जागरूकता नहीं होती है और इसलिए वे इतने बुरे हो सकते हैं और जघन्य पापी बन सकते हैं। इसलिए, सामान्य मानवता वाला जमीर होना महत्वपूर्ण है। लोग सबसे पहले इसी शर्त के तहत सत्य सिद्धांतों को बनाए रखने में समर्थ होते हैं कि उनके पास जमीर के बारे में जागरूकता हो। जमीर के बारे में जागरूकता होना और शर्म की भावना होना ही तुम्हारे व्यवहार को विनियमित किए जाने में सक्षम बनाता है और तुम्हें सत्य की तलाश करने और सत्य का अभ्यास करने के मार्ग पर चलना शुरू करने का अवसर देता है। अगर तुम्हारे पास खुद को विनियमित करने के लिए जमीर के बारे में जागरूकता नहीं है, तो तुम्हारे पास सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलना शुरू करने का अवसर नहीं होगा। इसलिए, यह सिर्फ जमीर के बारे में जागरूकता रखने की बुनियाद पर ही है कि लोगों को सत्य का अभ्यास करने और सत्य सिद्धांतों को बनाए रखने के मार्ग पर लेकर जाने का अवसर मिल सकता है—लेकिन फिर भी उनके पास सिर्फ यही अवसर है। मैं कहता हूँ कि उनके पास सिर्फ यही अवसर है क्योंकि अगर किसी व्यक्ति के विचार और व्यवहार जमीर के बारे में जागरूकता से विनियमित हों, तो भी वह सत्य सिद्धांतों का उल्लंघन कर सकता है या उनके अनुसार कार्य नहीं कर सकता है, वह बीच का रास्ता अपना सकता है, वह सत्य सिद्धांतों को बनाए नहीं रखता है लेकिन कुकर्मियों के साथ गुट भी नहीं बनाता है। यानी, जमीर के प्रभाव में वे लोग जो कुछ हद तक अच्छे हैं, सत्य का अभ्यास कर सकते हैं और सत्य सिद्धांतों को बनाए रख सकते हैं, जबकि थोड़ी बदतर काबिलियत वाले लोग कम-से-कम कुकर्मियों द्वारा नियंत्रित होने या मजबूर किए जाने से बच सकते हैं और कुकर्म करने में उनका अनुसरण करने से बच सकते हैं—यह सिर्फ उस आधार रेखा तक पहुँचना है जो जमीर के मानक से आती है। भले ही तुमने सत्य का अभ्यास न किया हो, लेकिन तुमने कोई बुराई नहीं की है। इस तरह के व्यक्ति को कम-से-कम अब भी जमीर वाला व्यक्ति कहा जा सकता है और वैसे तो उसने सत्य का अभ्यास नहीं किया है, लेकिन यकीनन वह बुराई नहीं करेगा। यही वह प्रभाव है जो जमीर लोगों पर डालता है। जहाँ तक सत्य से प्रेम करने वाले लोगों की बात है, उनके लिए जमीर का सबसे फायदेमंद प्रभाव यह है कि इसमें उनके शब्दों और व्यवहारों को विनियमित करने का मौका होता है और यह उन्हें सत्य का अभ्यास करने और सत्य सिद्धांतों को बनाए रखने के मार्ग पर ले जा सकता है। इसलिए, लोगों के लिए जमीर उनकी मानवता का एक बहुत ही महत्वपूर्ण भाग है और यह कुछ ऐसा है जिसके बिना वे नहीं रह सकते हैं। तो “जमीर” का क्या मतलब है? इस बारे में हम बाद में अवसर मिलने पर विस्तार से बात करेंगे, लेकिन आओ आज हम इस बारे में बस संक्षेप में कुछ कहें। जमीर का मतलब व्यक्ति की दयालुता और न्याय की भावना है, जो दो सबसे बुनियादी गुण हैं। अगर तुममें ये दो गुण हैं, तो तुम जमीर वाले व्यक्ति हो; अगर तुममें इन दोनों में से कोई भी गुण नहीं है, तो इसका मतलब है कि तुममें जमीर नहीं है। जिन लोगों में जमीर नहीं होता है, उनमें सामान्य मानवता नहीं होती है और सामान्य मानवता नहीं होने का मतलब है कि उनमें न्याय की भावना नहीं होती है और वे दयालु नहीं होते हैं। “न्याय की भावना नहीं होने” का क्या मतलब है? इसका मतलब है चालबाज और दुष्ट होना। “दयालु नहीं होने” का क्या मतलब है? इसका मतलब है दुर्भावनापूर्ण, क्रूर और दुष्ट होना। जिन लोगों में ये स्वभाव होते हैं, उनमें मानवता नहीं होती है और फलस्वरूप वे किसी भी तरह की बुरी चीज करने में सक्षम होते हैं क्योंकि उनमें सामान्य मानवता वाला जमीर नहीं होता है और न ही उनमें न्याय और दयालुता की भावना वाले वे दो सार होते हैं जो सामान्य मानवता वाले जमीर में निहित हैं। वे बेशर्म, बेहद कुटिल और विशेष रूप से क्रूर और दुर्भावनापूर्ण होते हैं, इसलिए वे किसी भी तरह की बुरी चीज करने में सक्षम होते हैं। यानी, वे जो भी चीजें करते हैं वे चाहे कितनी भी दुष्ट और दुर्भावनापूर्ण क्यों न हों, उन्हें कुछ भी महसूस नहीं होता है—उन्हें बुरा नहीं लगता है और वे तिरस्कृत महसूस नहीं करते हैं। वे किसी भी तरह की बुराई करने में सक्षम क्यों होते हैं? वह इसलिए क्योंकि वे दयालु नहीं होते हैं और उनमें मानवता का सार नहीं होता है; इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे क्या बुराई करते हैं, उन्हें लगता है कि यह जायज है और उन्हें नहीं लगता है कि यह बुराई है। मिसाल के तौर पर, अगर तुम कोई ऐसे व्यक्ति हो जिसमें जमीर के बारे में जागरूकता है, तो जब तुम किसी दूसरे व्यक्ति को कोसने वाली या उस पर हमला करने वाली कोई बात कहते हो, तो तुम इसे सह नहीं पाओगे। तुम सोचोगे, “मैंने उसे कोसने के लिए कुछ बातें कही हैं और यह बहुत हुआ। लोगों को कोसने से वे वाकई परेशान हो जाते हैं! अगर मुझे कोई इस तरह से कोसे तो मैं भी परेशान हो जाऊँगा, इसलिए अब जब मैं उसे कोसने के लिए कुछ बातें कह चुका हूँ ताकि अपनी नफरत से राहत पा सकूँ और थोड़ा गुबार निकाल सकूँ, तो मैं इस बात को यहीं खत्म कर दूँगा।” और इसलिए तुम रुक जाओगे। लेकिन कुकर्मी इस तरीके से नहीं सोचते हैं। वे सोचते हैं, “तुम्हें कोसने का मतलब तुम्हें आसानी से छोड़ देना होगा। मैं तुम्हें पीटूँगा भी, तुम्हारे परिवार को भी बर्बाद करूँगा और तुम्हारे वंशजों को भी कष्ट दूँगा! मैं तुम्हारे साथ जो भी बुराई या बुरी चीजें करता हूँ, वे जायज हैं। जब तक तुम्हें अपने किए की सजा मिलती है और मुझे अपनी नफरत से राहत पाने का मौका मिलता है, तब तक मैं कुछ भी करने को तैयार हूँ!” वे शायद तुम्हें कोसें भी नहीं, बल्कि सीधे आगे बढ़ें और तुम्हारे साथ बुरी चीजें करें और तुमसे बदला लें—बुरा होने का यही मतलब है। जिन लोगों में जमीर के बारे में जागरूकता नहीं होती है, वे ऐसे ही होते हैं—वे सभी प्रकार की बुराई करने में सक्षम होते हैं।
परमेश्वर के कार्य के बारे में लोगों की विभिन्न धारणाओं और कल्पनाओं में से जिन धारणाओं के बारे में लोग जागरूक होते हैं, वे मुख्य रूप से वही धारणाएँ हैं जिनके बारे में वे अक्सर बात करते हैं जो कि अनुशासित करने, ताड़ना देने और दंडित करने से संबंधित हैं। एक लिहाज से, हमने उन धारणाओं और कल्पनाओं पर संगति की है जो परमेश्वर के कार्य में लोगों में उठती हैं; दूसरे लिहाज से, लोगों को यह भी पता होना चाहिए कि परमेश्वर लोगों पर बहुत सारे और विविध तरीकों से कार्य करता है। जिन अलग-अलग युगों में वह कार्य करता है उनके आधार पर, लोगों से वह जिन विभिन्न मानकों की अपेक्षा करता है उनके आधार पर, अपने कार्य के माध्यम से वह लोगों में जो अलग-अलग परिणाम प्राप्त करना चाहता है यकीनन उनके आधार पर और अपने कार्य के अलग-अलग लक्ष्यों और लोगों के अलग-अलग प्रकृति सारों के आधार पर भी परमेश्वर अलग-अलग विधियाँ अपनाता है और लोगों पर बहुत सारे और विविध तरीकों से कार्य करता है। अनुशासित करना, ताड़ना देना और दंडित करना उसके कार्य का सिर्फ एक छोटा-सा भाग हैं और ये वे मुख्य विधियाँ नहीं हैं जिनका वह अपने कार्य में उपयोग करता है। चूँकि परमेश्वर ने अपने कार्य के तीसरे चरण में लोगों का भरण-पोषण करने और उन्हें बचाने का परिणाम प्राप्त करने के लिए बहुत सारे सत्य व्यक्त किए हैं, इसलिए लोगों पर वह जो अनुशासित करने, ताड़ना देने और यहाँ तक कि दंडित करने का कार्य करता है उसकी मात्रा बहुत कम है। इसके अलावा, अपने कार्य के विभिन्न लक्ष्यों के आधार पर परमेश्वर इन चीजों को संगत सिद्धांतों के अनुसार भी करता है और उसके क्रियाकलाप लक्ष्यों और विभिन्न अलग-अलग हालातों के आधार पर अलग-अलग होते हैं। वैसे तो तुलनात्मक रूप से कहा जाए, तो वह शायद ही कभी लोगों को अनुशासित करता है, ताड़ना देता है या दंडित करता है। इसलिए, लोगों को परमेश्वर के कार्य के बारे में अपनी पिछली धारणाओं और कल्पनाओं को पकड़कर रखना बंद कर देना चाहिए और चूँकि परमेश्वर ने बहुत सारे वचन और बहुत सारे सत्य व्यक्त किए हैं, इसलिए उन्हें परमेश्वर द्वारा अनुशासित किए जाने, ताड़ना दिए जाने या दंडित किए जाने पर निर्भर रहना जारी नहीं रखना चाहिए, सत्य का अभ्यास करने और सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए निष्क्रियता से उसे उन्हें प्रेरित नहीं करने देना चाहिए—यह विचार लोगों के मन में नहीं होना चाहिए। लोगों के मन में जो सही विचार होना चाहिए वह यह है कि उन्हें परमेश्वर के इरादे समझाने या उसके सामने आने के लिए उन्हें निष्क्रियता से परमेश्वर द्वारा अनुशासित किए जाने, ताड़ना दिए जाने या दंडित किए जाने पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें परमेश्वर के इरादों और सत्य सिद्धांतों की तलाश करने के लिए उसके सामने आने में ज्यादा सकारात्मक और सक्रिय होना चाहिए। चाहे कोई भी समय हो, परमेश्वर के वचन और सत्य सिद्धांत तुम्हारे दैनिक जीवन में या तुम्हारे अस्तित्व के मार्ग पर तुम्हारे लिए आगे बढ़ने की दिशा हैं और वही सिद्धांत और मार्ग हैं जिन्हें तुम्हें सबसे ज्यादा बनाए रखना चाहिए और जिनका सबसे ज्यादा अभ्यास करना चाहिए, जबकि परमेश्वर का अनुशासित करना, ताड़ना देना या दंडित करना सिर्फ कार्य करने के तरीके हैं जिन्हें वह कुछ विशेष परिस्थितियों में और उन हालातों में प्रदर्शित करता है जहाँ वह इसे जरूरी समझता है। लोगों को इसके होने की निष्क्रियता से प्रतीक्षा या निष्क्रियता से इसका अनुरोध नहीं करना चाहिए, यह नहीं सोचना चाहिए, “परमेश्वर मुझे अनुशासित करे, ताड़ना दे और दंडित करे ताकि मैं सत्य से प्रेम और उसका अभ्यास करने लगूँ।” ऐसा करना गलत है—परमेश्वर लोगों की वास्तविक अभिव्यक्तियों और उनके जीवन की जरूरतों के अनुसार कार्य करता है। कुछ लोग सुनते हैं कि जिनके पास जमीर नहीं होता है वे दरिंदे होते हैं और उन्हें बचाया नहीं जा सकता है, इसलिए वे चिंतित हो जाते हैं और सोचते हैं, “अगर मुझे बचाया नहीं जा सका तो यह वाकई में परेशानी वाली बात होगी। चूँकि मेरे पास सामान्य मानवता वाले जमीर के बारे में जागरूकता नहीं है, इसलिए मैं यही पसंद करूँगा कि परमेश्वर सामान्य मानवता वाले जमीर के एवज में मुझे अनुशासित और दंडित करे।” क्या यह अच्छा विचार है? एक सृजित प्राणी और भ्रष्ट मानवजाति के एक साधारण सदस्य के रूप में, अगर तुम वाकई सोचते हो कि तुममें सामान्य मानवता नहीं है और तुममें सामान्य मानवता वाला जमीर नहीं है, तो तुम इस बात का दर्द गहराई से महसूस करते हो और तुम उम्मीद करते हो कि परमेश्वर का अनुशासन, ताड़ना और दंड तुम्हें नहीं छोड़ेंगे, और वे तुम्हें बदलने और अंत में जीवित बचे रहने में सक्षम बनाएँगे—अगर तुममें वाकई इस तरह का संकल्प है तो यह एक अच्छी बात हो सकती है और यह तुम्हारे जीवित रहने की उम्मीद की एक किरण है। लेकिन अगर तुममें इस तरह का संकल्प नहीं है तो मैं तुमसे कहता हूँ : अगर तुममें सामान्य मानवता वाले जमीर के बारे में जागरूकता नहीं है तो तुम बहुत बड़े खतरे में हो। अगर तुम्हें कभी-कभी परमेश्वर का अनुशासन, ताड़ना और दंड मिलता है तो यह कुछ ऐसा है जिसे उसने तुम्हें प्रदान किया है। परमेश्वर ये चीजें करता है और इन तरीकों का उपयोग तुम्हें प्रेरित करने और तुम्हें चेतावनी देने के लिए करता है ताकि तुम कम बुराई करो और तुम्हें कम सजा मिले। परमेश्वर ने तुम्हारा अभिमान काफी बचाया है; तुम्हें परमेश्वर का आभारी होना चाहिए कि परमेश्वर ने यह नहीं जानने के बजाय कि तुम्हारे लिए क्या अच्छा है, तुम्हें यह अनुग्रह दिखाकर एक अपवाद बनाया है। सामान्य परिस्थितियों में परमेश्वर किसी ऐसे व्यक्ति पर कोई कार्य नहीं करेगा या कार्य करने के किसी भी तरीके का उपयोग नहीं करेगा जिसके पास मानवता वाला जमीर और विवेक नहीं है। अगर तुम्हें परमेश्वर से अनुशासन, ताड़ना या दंड प्राप्त हुआ है, चाहे यह इनमें से कोई भी चीज हो, चाहे यह हल्की हो या कुछ हद तक कड़ी, तो तुम्हें इन सब के लिए परमेश्वर का आभारी होना चाहिए। इसे मनुष्य की बोलचाल की भाषा में कहें, तो यह परमेश्वर का तुम्हें महत्व देना और तुम्हें ऊपर उठाना है। परमेश्वर तुम्हें बिल्कुल भी शत्रुता की नजर से नहीं देखता है या तुम्हारी निंदा नहीं करता है, इसलिए तुम्हें परमेश्वर से इसे स्वीकार करना चाहिए। अगर तुम्हें सत्य के पोषण से परे परमेश्वर का अनुशासन, ताड़ना या दंड प्राप्त करने का वाकई मौका मिला है, तो इससे यह साबित होता है कि परमेश्वर अब भी तुम्हें एक सृजित प्राणी और भ्रष्ट मानवजाति का सदस्य मानता है। तुम्हें परमेश्वर का धन्यवाद करना चाहिए, इसे सही तरह से समझना चाहिए और परमेश्वर के अनुशासन, ताड़ना या दंड के प्रति समर्पण करना चाहिए। तुम्हें इसके कारण परमेश्वर के प्रति शत्रुता भरा रवैया नहीं रखना चाहिए और न ही तुम्हें इसके कारण परमेश्वर के खिलाफ और ज्यादा विद्रोह करना चाहिए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम्हें किस प्रकार का अनुशासन मिला है या तुम्हें कितनी कड़ी सजा मिली है, तुम्हें परमेश्वर के प्रति समर्पण करना चाहिए और बिना देरी किए उसका धन्यवाद करना चाहिए, तुम्हें चेताने और चेतावनी देने के लिए और तुम्हें यह अवसर देने के लिए और तुम्हें उससे यह सब प्राप्त करने का अवसर देने के लिए उसका धन्यवाद करना चाहिए। इससे यह भी साबित होता है कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा अब भी रिश्ता है और यह बंधन पूरी तरह से टूटा नहीं है। परमेश्वर के मानवजाति-प्रबंधन कार्य में और उसके लोगों को बचाने की प्रक्रिया में परमेश्वर ने अब भी तुम्हें अपने दिल में रखा हुआ है; कम-से-कम, परमेश्वर अब भी तुम्हें देखता है—जब वह तुम्हारा विद्रोहीपन और तुम्हारी भ्रष्टता देखता है, तो वह अब भी तुम्हें अनुशासित करने, ताड़ना देने और दंडित करने को तैयार रहता है। इससे यह साबित होता है कि उसने तुम्हें पूरी तरह से नहीं छोड़ा है; यह तुम्हारे लिए खुशकिस्मती की बात है और यह अच्छी खबर भी है। इसलिए, अगर तुम्हें थोड़ा दर्दनाक अनुशासन या ताड़ना भुगतनी पड़े, तो भी तुम्हें बिना देरी किए परमेश्वर के सामने आना चाहिए। परमेश्वर के सामने आने का उद्देश्य तुम्हारे लिए उसके सामने झुकना नहीं है और न ही यह तुम्हें यह महसूस करवाना है कि परमेश्वर डरावना या भयावह है। इसके बजाय तुम्हें यह समझना चाहिए कि परमेश्वर को खुश करने के लिए तुम्हें क्या करना चाहिए, तुम्हें ऐसा क्या करना चाहिए जिससे परमेश्वर अब तुमसे नाराज नहीं रहे और तुम्हें ऐसा क्या करना चाहिए जिससे उसका गुस्सा दूर हो जाए। कम-से-कम, तुम्हारी काबिलियत जो प्राप्त कर सकती है तुम्हें उसके दायरे में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करना चाहिए ताकि तुम परमेश्वर द्वारा तुम्हें बताए गए सत्य सिद्धांतों का अभ्यास कर सको, और तुम्हें परमेश्वर को अपने ऊपर फिर से क्रोधित नहीं करना चाहिए। अगर परमेश्वर बार-बार तुम पर गुस्सा होता है और तुम बेहद सुन्न बने रहते हो और तुम फिर भी अपनी गर्दन अकड़कर रखते हो और अड़ियल तरीके से परमेश्वर को शत्रुता भरी नजरों से देखते हो और अंत तक उसके खिलाफ लड़ते रहते हो, तो यह बिल्कुल तय है कि अंत में परमेश्वर तुम्हें छोड़ देगा। जिस समय परमेश्वर तुम्हे अनुशासित करना, ताड़ना देना या दंडित करना बंद कर देता है, वही वह समय है जब परमेश्वर तुम्हें छोड़ चुका होता है। और एक बार जब परमेश्वर तुम्हें छोड़ देगा, तो वह तुम्हें चेताना बंद कर देगा और वह तुम्हें अपनी नजरों से हटा देगा, तुम्हें कलीसिया के बाहर किसी जगह भेज देगा, किसी ऐसी जगह जो उसके कार्य के केंद्र से दूर हो; कम-से-कम, वह ऐसी व्यवस्था करेगा कि अपने कार्य की अवधि के दौरान वह तुम्हें न देख पाए—परमेश्वर तुम्हें और नहीं देखना चाहेगा। अगर तुम इस हद तक बुराई करते हो और इस बिंदु तक पहुँच जाते हो तो तुम्हें बचाए जाने की कोई उम्मीद नहीं है। क्या तुम समझ गए हो? (हाँ।)
आज की संगति अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता छोड़ देने के विषय से संबंधित है। चाहे यह परमेश्वर के बारे में लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं को उजागर करना हो या परमेश्वर के प्रति उनके रवैयों को उजागर करना हो या इस बारे में संगति करना हो कि परमेश्वर लोगों पर अपना कार्य वास्तव में कैसे और किन तरीकों से करता है, जो भी हो, यह सब अंत में लोगों को यही बताता है कि : उन्हें परमेश्वर के कार्य के प्रति जो सही दृष्टिकोण सबसे ज्यादा रखना चाहिए वह है परमेश्वर से भटक जाने के बजाय उसके न्याय और ताड़ना को स्वीकार करना और उसके प्रति समर्पण करना और उसके वचनों और उसके द्वारा प्रदान किए गए हर सत्य सिद्धांत को स्वीकार करना। वे जब भी कुछ करते हैं तो उन्हें अपने बाहरी व्यवहार में या बाहरी तौर पर कष्ट सहने और कीमत चुकाने में प्रयास करने के बजाय और यकीनन अपनी धारणाओं और कल्पनाओं में फँसने और उन पर बहुत हंगामा मचाने के बजाय सत्य सिद्धांतों की तलाश करनी चाहिए और उनके अनुसार अभ्यास करना चाहिए और सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने का प्रयास करना चाहिए। सभी पहलुओं पर विचार किया जाए तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर के बारे में तुम्हारी धारणाएँ और कल्पनाएँ क्या हैं, परमेश्वर का कार्य जो परिणाम प्राप्त करने का उद्देश्य रखता है, वह है लोगों में अपने वचन और सत्य समाहित करना और लोगों को इसमें सक्षम बनाना कि वे पालन करने के लिए सत्य सिद्धांत प्राप्त कर सकें और अपने दैनिक जीवन के दौरान और अस्तित्व के अपने मार्ग पर सामने आने वाली हर चीज में इन सत्य सिद्धांतों को बनाए रख सकें—परमेश्वर का कार्य यही परिणाम प्राप्त करना चाहता है। परमेश्वर का कार्य जो अंतिम परिणाम प्राप्त करता है वह यह है कि परमेश्वर द्वारा ये सब कुछ लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार पूरा किए जाने के बजाय सत्य लोगों की वास्तविकता और लोगों का जीवन बन जाता है। तुम यह समझते हो, है ना? हमने इन विषयों पर लगभग पर्याप्त संगति कर ली है, है ना? (हाँ।) तो आज के लिए हमारी संगति यहीं समाप्त होती है। अलविदा!
8 जुलाई 2023
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?