सत्य का अनुसरण कैसे करें (10) भाग एक
सत्य का अनुसरण करने का पहला अभ्यास : त्याग देना
अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को त्याग देना
I. परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग देना : परमेश्वर के कार्य के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग देना
च. परमेश्वर का कार्य लोगों की जन्मजात स्थितियों को नहीं बदलता, बल्कि इसका लक्ष्य उनके भ्रष्ट स्वभावों को बदलना है
हाल ही में हमने जन्मजात स्थितियों, मानवता और भ्रष्ट स्वभावों के मुद्दों पर कई संगतियाँ कीं; मुख्य रूप से हमने इन तीन पहलुओं की कुछ अभिव्यक्तियों के बारे में विस्तार से और विशिष्ट रूप से संगति की। ऐसी विस्तृत संगति के जरिये क्या तुम लोगों ने इन अभिव्यक्तियों के विशिष्ट वर्गीकरण की कुछ समझ प्राप्त की है? (हाँ।) इन तीनों पहलुओं में विशिष्ट अभिव्यक्तियों की समझ प्राप्त करने के बाद क्या अब तुम्हारे लिए यह और स्पष्ट है कि लोगों को अपने भ्रष्ट स्वभाव क्यों छोड़ देने चाहिए या लोगों में किन चीजों को बदलने और छोड़ देने की जरूरत है? किन पहलुओं को बदलने की जरूरत है, किन्हें बदलने की जरूरत नहीं है, किन पहलुओं का अभ्यास सत्य सिद्धांतों के अनुसार किया जाना चाहिए और कौन-से पहलू वे जन्मजात स्थितियाँ हैं जिन्हें परमेश्वर द्वारा पूर्व-नियत और व्यवस्थित किया गया है, जो भ्रष्ट स्वभावों से असंबंधित हैं और जिनके लिए लोगों को प्रयास करने या कोई बदलाव करने की आवश्यकता नहीं है—क्या अब ये मामले स्पष्ट हैं? (हम इनके बारे में पहले से कुछ हद तक ज्यादा स्पष्ट महसूस करते हैं।) स्पष्टता प्राप्त करने के बाद क्या तुम, लोगों को शुद्ध करने, उनके स्वभावों को रूपांतरित करने और उन्हें शैतान के प्रभाव से बचाने के परमेश्वर के कार्य का महत्व समझते हो? क्या अब यह स्पष्ट है कि सत्य प्रदान करने और लोगों में विभिन्न समस्याओं को उजागर करने के लिए परमेश्वर का कार्य करना और बोलना किस तरफ लक्षित है? क्या परमेश्वर द्वारा लोगों में सभी समस्याओं का प्रकाशन उनकी जन्मजात स्थितियों की तरफ निर्देशित है? (नहीं।) क्या यह मानवता में लोगों की प्राकृतिक कमियों की तरफ निर्देशित है? (नहीं।) तो फिर यह किस तरफ निर्देशित है? (मुख्य रूप से लोगों के भ्रष्ट स्वभावों की तरफ निर्देशित है।) यह मुख्य रूप से उन सिद्धांतों की तरफ निर्देशित है जिनके द्वारा लोग आचरण और कार्य करते हैं और परमेश्वर, सत्य, सकारात्मक चीजों और ऐसे दूसरे मुद्दों के प्रति उनके दृष्टिकोणों और रवैयों की तरफ निर्देशित है। भ्रष्ट स्वभाव क्या होते हैं? भ्रष्ट स्वभाव शैतान की प्रकृति से उत्पन्न होते हैं और शैतान की प्रकृति से ही प्रकट किए जाते हैं। ये सभी चीजें सत्य सिद्धांतों के खिलाफ जाती हैं, भ्रामक होती हैं और परमेश्वर का प्रतिरोध करने के क्रियाकलाप और अभिव्यक्तियाँ हैं। यही चीजें वे प्राथमिक चीजें हैं जो परमेश्वर का प्रतिरोध करती हैं और लोगों द्वारा सत्य के खिलाफ जाने, सत्य से विश्वासघात करने, परमेश्वर के इरादों के खिलाफ जाने और परमेश्वर की अपेक्षाओं के खिलाफ जाने में समर्थ होने के मूल कारण हैं। दूसरी तरफ, जन्मजात स्थितियाँ सिर्फ कुछ मूलभूत, सहज चीजें होती हैं जो जन्मजात होती हैं; लेकिन फिलहाल मानवजाति जीवित रहने के लिए भ्रष्ट स्वभावों पर भरोसा करती है। इसलिए, परमेश्वर का कार्य लोगों के भ्रष्ट स्वभावों को बदलने का लक्ष्य रखता है। ठीक इसलिए क्योंकि भ्रष्ट स्वभाव परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं और वे शैतान के हैं और यह कहा जा सकता है कि वे सभी नकारात्मक चीजों की समग्र अभिव्यक्तियाँ हैं—लोगों में प्रकट होने वाले विभिन्न भ्रष्ट स्वभाव या भ्रष्ट स्वभावों से जुड़ी विभिन्न अवस्थाएँ, विस्तृत प्रकाशन और अभिव्यक्तियाँ, ये सभी नकारात्मक चीजों से संबंधित हैं—इसलिए लोगों द्वारा परमेश्वर का प्रतिरोध करने का मूल कारण उनकी जन्मजात स्थितियाँ या उनकी मानवता में कुछ कमियाँ नहीं है, बल्कि वह जीवन है जो जीवित रहने के लिए भ्रष्ट स्वभावों को अपना आधार बनाता है। यह जीवन निश्चित रूप से शैतान से उत्पन्न होता है। इस प्रकार अंत में जिस चीज को रूपांतरित करने की जरूरत है वह लोगों के भ्रष्ट स्वभाव हैं और जिस चीज को छोड़ देने की जरूरत है वह भी लोगों के भ्रष्ट स्वभाव ही हैं। यकीनन यह भी कहा जा सकता है कि जब लोगों के भ्रष्ट स्वभाव बदल जाते हैं सिर्फ तभी वे परमेश्वर का प्रतिरोध करना बंद कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में, जब लोग अपने भ्रष्ट स्वभाव छोड़ देते हैं सिर्फ तभी इसका मतलब होता है कि उन्हें बचा लिया गया है, और जब लोगों को बचा लिया जाता है सिर्फ तभी वे परमेश्वर का प्रतिरोध करना बंद कर सकते हैं और पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकते हैं। इसलिए, लोगों को बचाने के परमेश्वर के कार्य का सच्चा अर्थ उन्हें अपने भ्रष्ट स्वभाव छोड़ देने में समर्थ बनाना है। परमेश्वर द्वारा लोगों को यह बताने कि सत्य का अनुसरण करने का मतलब है परमेश्वर के वचनों के अनुसार कार्य करना और सत्य को अपनी कसौटी मानकर लोगों और चीजों को देखना और आचरण और कार्य करना, का सच्चा अर्थ और अभिप्रेत नतीजा लोगों को अपने भ्रष्ट स्वभाव छोड़ देने और परमेश्वर के वचनों को अपना जीवन मानकर लोगों और वस्तुओं को देखने और आचरण और कार्य करने में समर्थ बनाना है। तुम समझ रहे हो? (हाँ।)
इससे पहले हमने जन्मजात स्थितियों, मानवता और भ्रष्ट स्वभावों से जुड़े कुछ विशिष्ट प्रकाशनों और अभिव्यक्तियों पर संगति की थी। कुछ अभिव्यक्तियाँ जन्मजात स्थितियों से, तो कुछ मानवता में कमियों से संबंधित होती हैं, कुछ नीच चरित्र की अभिव्यक्तियाँ होती हैं और कुछ भ्रष्ट स्वभावों की विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ होती हैं। व्यक्ति की मानवता में कमियाँ और उसकी मानवता का नीच सार ही वे चीजें हैं जिन्हें लेकर लोग बहुत आसानी से भ्रमित हो जाते हैं। मानवता में कमियाँ ज्यादातर जन्मजात स्थितियों के तहत आती हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोग बोलते समय हकलाते हैं और कुछ लोगों का स्वभाव तेज या धीमा होता है। जब तक मानवता में ये कमियाँ नीच चरित्र की श्रेणी में नहीं आती हैं तब तक ये मूल रूप से जन्मजात स्थितियों के दायरे में आती हैं। हालाँकि, नीच चरित्र जन्मजात स्थितियों से संबंधित नहीं है; यह भ्रष्ट स्वभाव की अभिव्यक्ति है और इसे जन्मजात स्थितियों के तहत नहीं बल्कि भ्रष्ट स्वभाव के तहत आना चाहिए। वह इसलिए क्योंकि परमेश्वर ने व्यक्ति के चरित्र में दो मूलभूत चीजें दी हैं : जमीर और विवेक। अगर किसी का चरित्र नीच है तो उसमें उसके जमीर और विवेक की समस्याएँ शामिल हैं। यह निश्चित रूप से उसकी जन्मजात स्थितियों से संबंधित नहीं है। यह निश्चित रूप से भ्रष्ट स्वभावों के तहत आता है; यह किसी भ्रष्ट स्वभाव की विशिष्ट अभिव्यक्ति है। यह दिखाने के लिए तथ्य काफी हैं कि शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद व्यक्ति अपने जमीर और विवेक खो देता है। शैतान उसका दिल पूरी तरह से गुमराह कर देता है और वह शैतान से आने वाले ऐसे बहुत-से विचारों और दृष्टिकोणों को और साथ ही बुरी प्रवृत्तियों से आने वाली कुछ कहावतों और मतों को भी स्वीकार लेता है। जब चीजें इस हद तक पहुँच जाती हैं तब उसके जमीर और विवेक पूरी तरह से भ्रष्ट हो जाते हैं और सड़ जाते हैं—यह कहा जा सकता है कि इस समय उसके जमीर और विवेक पूरी तरह से खो गए हैं। प्रदर्शित यह होता है कि उसका चरित्र बहुत ही खराब और बुरा है। यानी उसने सकारात्मक चीजें स्वीकारने से पहले ही अपने दिल में शैतान से प्राप्त कई भ्रामक बातें स्वीकार ली हैं। इन चीजों ने उसकी मानवता को बुरी तरह से भ्रष्ट कर दिया है जिसके नतीजतन उसकी मानवता बहुत ही खराब हो चुकी है। उदाहरण के लिए, जब वह दुनिया से “हर व्यक्ति अपनी सोचे और बाकियों को शैतान ले जाए” वाला शैतानी विचार और दृष्टिकोण स्वीकार लेता है तब क्या उसका जमीर सुधरेगा, जस का तस रहेगा या बिगड़ जाएगा? (वह बिगड़ जाएगा।) और इस बिगड़ने की विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? (वह जो भी करता है उसमें सिर्फ अपने ही स्वार्थों का ध्यान रखता है।) वह अपने खुद के मकसद और स्वार्थों के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। वह दूसरों को धोखा दे सकता है, उन्हें नुकसान पहुँचा सकता है और ऐसा कुछ भी कर सकता है जो नैतिकता और जमीर के खिलाफ जाता हो। वह ऐसा जितना ज्यादा करता है, उसके क्रियाकलाप उतने ही बेदर्द होते जाते हैं, उसके दिल का अँधेरा उतना ही गहराता जाता है, उसमें जमीर की भावना उतनी ही कम होती जाती है और उसमें मानवता उतनी ही कम बाकी रह जाती है। अपने खुद के स्वार्थों के लिए वे किसी को भी ठगेंगे और धोखा देंगे, अपने परिचितों और अनजान लोगों दोनों को समान रूप से धोखा देंगे—वे सहकर्मियों, परिजनों और यहाँ तक कि अपने आस-पास के सबसे करीबी लोगों को भी धोखा देंगे और उन लोगों को नुकसान पहुँचाएँगे जो उन पर सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं। शुरू-शुरू में जब वे ऐसी चीजें करते हैं तब वे कुछ अंदरूनी संघर्ष और अपने जमीर में एक हल्के-से एहसास का अनुभव करते हैं। बाद में वे सोचने लगते हैं कि कैसे कार्रवाई करनी है और सबसे पहले अपरिचित अजनबियों से शुरू करते हैं और आखिरकार अपने रिश्तेदारों पर भी कोई दया नहीं दिखाते हैं। देखो, उनकी मानवता धीरे-धीरे भ्रष्ट होती जा रही है, यह शैतान के विचारों और दृष्टिकोणों, जैसे कि “स्वार्थ सर्वोपरि होते हैं” और “हर आदमी अपने लिए सोचे और बाकियों को शैतान ले जाए,” से धीरे-धीरे नष्ट होती जा रही है। धीरे-धीरे नष्ट होने की यह प्रक्रिया ही वह प्रक्रिया है जिसमें उनका जमीर तब तक धीरे-धीरे जागरूकता खोता रहता है और काम करना बंद कर देता है जब तक कि अंत में वह पूरी तरह से खो जाने की हद तक नहीं पहुँच जाता। अंत में उनके क्रियाकलापों में कोई नैतिक सीमा या जमीर की भावना नहीं रहती है और वे किसी को भी धोखा दे सकते हैं। क्या कारण है कि वे किसी को भी धोखा दे सकते हैं? इसका मूल कारण क्या है? इसका कारण यह है कि उन्होंने शैतान के विचारों और दृष्टिकोणों को स्वीकार लिया है और वे शैतान के विचारों और दृष्टिकोणों के वर्चस्व के तहत कार्य करते हैं। आखिरकार उनकी मानवता के जमीर और विवेक अब और काम नहीं करते हैं; यानी मानवता में जो मूलभूत चीजें होनी चाहिए वे पूरी तरह से काम करना बंद कर देती हैं, वे शैतान के बुरे विचारों द्वारा पूरी तरह से नष्ट कर दी जाती हैं और नियंत्रित हो जाती हैं। नष्ट किए जाने और नियंत्रित होने की प्रक्रिया उनके द्वारा इन विचारों और दृष्टिकोणों को स्वीकारने की प्रक्रिया है और यकीनन यह उनके भ्रष्ट होने की भी प्रक्रिया है। जैसे-जैसे उनकी मानवता के जमीर और विवेक भ्रष्ट होते जाते हैं, वैसे-वैसे अंत में उनमें यह प्रदर्शित होता है कि उनकी मानवता बहुत ही खराब हो गई है और ज्यादा गंभीर मामलों में वे अपनी मानवता खो बैठते हैं। ये सामान्य भ्रष्ट मनुष्यों की मानवता की कुछ अभिव्यक्तियाँ हैं।
कुछ विशेष मामले भी होते हैं जिनमें कुछ लोग यहाँ तक कि मनुष्य के रूप में भी जन्म नहीं लेते हैं, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता है कि उनमें जमीर और विवेक हैं। इसे अमूर्त रूप से कहा जाए तो वे मनुष्यों से पुनर्जन्म लिए हुए लोग नहीं होते हैं। वैसे तो नया जन्म, पुनर्जन्म और देहांतरण का विषय लोगों के लिए अमूर्त और अदृश्य है, फिर भी लोगों को इसे आसानी से समझने में समर्थ होना चाहिए; यह एक ऐसी चीज है जिसे लोग समझ और बूझ सकते हैं। ऐसे लोग मनुष्यों से पुनर्जन्म लिए हुए नहीं होते हैं, तो वे किससे पुनर्जन्म लिए होते हैं? कुछ लोगों का नया जन्म होता है और वे पशुओं से देहांतरित होते हैं और कुछ दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए होते हैं; वे बिना मानवता के पैदा होते हैं। मानवता रहित लोग जमीर या विवेक के बिना पैदा होते हैं; यह पूरी तरह से भ्रष्टता के कारण नहीं होता है। वे जन्मजात जीते-जागते शैतान और जीते-जागते दानव होते हैं। वे दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए होते हैं। उदाहरण के लिए, मसीह-विरोधी कुकर्मी होते हैं; वे कुकर्मियों से पुनर्जन्म लिए हुए लोग होते हैं। जीवन में आगे चलकर वे शैतान के और भी विचारों और दृष्टिकोणों को स्वीकारते हैं। उनके पास मूल रूप से जो है और वे बाद में जो हासिल करते हैं दोनों का संयोजन उन्हें उत्तरोत्तर बुरा बनाता चला जाता है। ऐसे लोग जन्म से ही सकारात्मक चीजों से प्रेम नहीं करने वाले होते हैं; वे जन्मजात सकारात्मक चीजों से विमुख होते हैं और सकारात्मक चीजों का घोर प्रतिरोध करते हैं और उनसे नफरत करते हैं। इसलिए, ऐसे लोगों में मानवता की यह अभिव्यक्ति होती है कि उनमें रत्ती भर भी जमीर या विवेक नहीं होता है। उनमें मानवता का कोई भी गुण या मजबूत पक्ष देखना पूरी तरह से असंभव है। यकीनन इस गुण का मतलब गायन में माहिर होना, अपने दृष्टिकोणों को व्यक्त करने में माहिर होना या किसी विशेष तकनीकी कौशल या पेशे में माहिर होना नहीं है। ये वे गुण नहीं हैं जिनका जिक्र किया गया है। बल्कि इसका मतलब मानवता के गुण हैं, जैसे कि दयालु और अच्छे स्वभाव वाला होना, दूसरों को समझना या सहानुभूति रखना। मानवता के जमीर और विवेक के दायरे में ये विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ उनमें पूरी तरह से गैर-मौजूद होती हैं। तो ऐसे लोगों की मानवता के मुख्य लक्षण क्या हैं? विचलन और बुराई। ये दो मुख्य लक्षण हैं। वे सकारात्मक चीजों से प्रेम नहीं करते हैं; जब वे सकारात्मक चीजों के बारे में सुनते हैं तब वे यह तो मान सकते हैं कि वे सही हैं, लेकिन उन्हें कभी स्वीकार नहीं करते हैं। उनके दिलों में हर चीज और हर वह चीज जो वे प्रकट करते हैं, विचलन और बुराई से संबंधित होती है। यह उन लोगों के मुख्य लक्षणों में से एक है जिनका अंतर्निहित मानवता सार बुराई है। ऐसे लोग दानवों और शैतानों से पुनर्जन्म लिए हुए और उनसे देहांतरित होते हैं। यहाँ तक कि जीवन में आगे चलकर कृत्रिम विचार-रोपण, शिक्षा, प्रभाव या अनुकूलन के बिना भी वे पहले से ही बहुत बुरे होते हैं। वे अंतर्निहित रूप से इस किस्म के प्राणी होते हैं। उनके विचारों और दृष्टिकोणों में अंतर्निहित रूप से ऐसी बहुत-सी सारभूत चीजें होती हैं जो शैतान की हैं। उस पर वे जन्म के बाद शैतान की बुरी प्रवृत्तियों से और भी ज्यादा भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों को स्वीकारते हैं। इसलिए, यह कहा जा सकता है कि ऐसे लोगों के प्रकृति सार की आग में घी डाला जाता है, यह और भी ज्यादा बुरा और बदतर हो जाता है, यानी इसमें हर वह जहरीला गुण होता है जिसकी कल्पना की जा सकती है और यह और भी ज्यादा गंभीर हो जाता है। ये जानवरों से पुनर्जन्म लिए हुए और दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों के दो विशेष मामले हैं। सामान्य स्थिति यह है कि चाहे कोई व्यक्ति मानवता में किसी भी कमी के साथ पैदा हुआ हो, जब तक वह नीच चरित्र की कुछ अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित करता है तब तक यह भ्रष्ट स्वभावों के दायरे में आता है। अगर वह सत्य स्वीकार सकता है, सत्य का अभ्यास कर सकता है और सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चल सकता है तो आखिरकार वह अपने सभी भ्रष्ट स्वभावों को छोड़ सकता है। जब वह अपने भ्रष्ट स्वभावों को छोड़ देता है तब उसके चरित्र के नीच पहलू भी तदनुसार बदल जाते हैं। ऐसे लोगों को ही बचाया जा सकता है; वे सामान्य भ्रष्ट मनुष्य हैं। भले ही तुम बुरे चरित्र की कुछ अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित करो या तुममें सत्यनिष्ठा की कमी हो या तुम्हारी मानवता की कुछ अभिव्यक्तियाँ सत्य के अनुरूप न हों और वे दूसरों के लिए घिनौनी हों, तो भी जब तक तुम्हारे जमीर और विवेक मौजूद हैं और वे लोगों और चीजों को देखने, आचरण करने और कार्य करने के तुम्हारे तरीके के लिए मूलभूत स्थितियाँ बन सकते हैं—यानी तुम्हारे जमीर और विवेक लोगों और चीजों को देखने, आचरण और कार्य करने के तुम्हारे तरीके को प्रभावित करते हैं और तुम्हारे जमीर और विवेक अब भी तुममें कार्य कर सकते हैं—तब तक अंततः तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों को बदला जा सकता है। अगर किसी व्यक्ति के जमीर और विवेक उसके किसी भी कार्य को नियंत्रित या मार्गदर्शित नहीं कर सकते हैं तो फिर यह कहा जा सकता है कि ऐसा व्यक्ति सत्य स्वीकारने में असमर्थ है और उसका अभ्यास करने में तो वह और भी ज्यादा असमर्थ है। इसलिए ऐसे लोग अपने भ्रष्ट स्वभाव आसानी से नहीं छोड़ेंगे। ऐसा क्यों है? क्योंकि ऐसे लोगों के जमीर और विवेक किसी भी प्रकार से काम नहीं करते हैं। उनके पास सत्य स्वीकारने का अवसर अब और नहीं है और उनमें सत्य स्वीकारने की मूलभूत स्थितियाँ अब और नहीं हैं। इन लोगों के लिए अपने भ्रष्ट स्वभावों को छोड़ देना बहुत मुश्किल होता है। इसलिए, चाहे तुम्हारी मानवता में कोई भी समस्या हो, यह देखने के लिए खुद को जाँचो कि जब तुम किसी ऐसे तरीके से कार्य करने वाले हो जो मानवता या सत्य के खिलाफ जाता है तब क्या तुम अपने जमीर में कुछ महसूस करते हो या तुम्हारे दिल में कोई दर्द या ग्लानि महसूस होती है और क्या तुम्हारे दिल में यह मापने की कोई सीमा या मानक है कि यह कार्य करना चाहिए या नहीं, क्या इस मामले को करना नैतिकता या जमीर के खिलाफ जाता है और उससे भी ज्यादा गहराई से, क्या यह सत्य सिद्धांतों का उल्लंघन करता है। अगर तुममें जमीर की भावना है, तुम यह माप सकते हो कि यह मामला मानवता और सत्य के खिलाफ जाता है और तुम अपने जमीर और विवेक के प्रकार्य के तहत खुद को संयमित कर सकते हो और अपने क्रियाकलापों पर नियंत्रण रख सकते हो तो फिर तुम्हारे पास सत्य स्वीकारने और सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने का अवसर या संभावना है। लेकिन अगर कुछ भी करते समय तुम अपने जमीर में कुछ भी महसूस नहीं करते हो, तुम यह माप नहीं सकते हो कि इस मामले का मानक क्या है या तुम्हें यह करना चाहिए या नहीं और तुम यह नहीं जानते कि इस चीज को करना मानवता, नैतिक न्याय या सत्य सिद्धांतों के अनुरूप है या नहीं—और इसके अलावा, इस चीज को करते समय यह जमीर, मानवता या सत्य सिद्धांतों के खिलाफ जाता है, लेकिन तुम्हारा जमीर तुम्हें इस गलत और नकारात्मक चीज को करने से रोकने के लिए काम नहीं कर पाता है—तो मूल रूप से तुम जैसे लोगों के पास सत्य स्वीकारने का कोई अवसर नहीं है। इसके बाद होता यह है कि तुम्हारे पास अपने भ्रष्ट स्वभावों को छोड़ देने का कोई अवसर नहीं होता है।
लोग भ्रष्ट स्वभावों को छोड़ सकते हैं या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वे सत्य स्वीकार सकते हैं या नहीं—यह बिल्कुल स्पष्ट है। और लोग सत्य स्वीकार सकते हैं या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उनमें जमीर की भावना है या नहीं। तो इसका भेद कैसे पहचाना जा सकता है कि किसी व्यक्ति में जमीर की भावना है या नहीं? इसके लिए यह देखना जरूरी है कि क्या कार्य करते समय उसमें वह सबसे मूलभूत जमीर है जो मानवता में होना चाहिए और क्या जब वह कुछ करता या कहता है, तब उसका जमीर काम करता है। उदाहरण के लिए, जब तुम किसी को बदनाम करने के लिए कुछ ऐसा कहना चाहते हो जो तुम्हारे जमीर और तथ्यों के खिलाफ जाता है या जब तुम झूठ बोलना चाहते हो, तब तुम्हारा जमीर तुम्हें फटकारता है : “मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए। ऐसा कहना झूठ बोलना और धोखा देना है जिसका मतलब है कि मैं ईमानदार व्यक्ति नहीं हूँ। परमेश्वर पड़ताल कर रहा है और मेरा अपना जमीर मुझे ऐसा नहीं करने देगा। ऐसा कहना उचित नहीं है।” ऐसे विचार आने का मतलब है कि तुम्हारा जमीर काम कर रहा है। जब तुम्हारा जमीर काम कर रहा होता है तब यह हो सकता है कि तुम जो शब्द कहते हो उनमें अब भी कुछ मिलावट हो या मानवीय इरादे के तत्व हों और वे 100 फीसदी सटीक न हों। हालाँकि, तुम्हारे जमीर के प्रभाव के तहत तुम जो शब्द बोलते हो वे पहले से ही अपेक्षाकृत उचित होते हैं। अगर तुम सत्य का और अभ्यास कर सकते हो और सिद्धांतों के आधार पर बोल सकते हो तो तुम जो शब्द कहोगे वे पूरी तरह से उचित होंगे और तुम ईमानदार व्यक्ति बन जाओगे। लेकिन अगर कोई व्यक्ति जमीर के प्रकार्य के अधीन नहीं है तो जरूरी नहीं कि वह ईमानदार व्यक्ति बनने या ईमानदार शब्द बोलने में समर्थ हो। उदाहरण के लिए, जब ऊपरवाला उससे किसी के बारे में पूछता है तब हो सकता है कि वह सोचे, “वह व्यक्ति सचमुच बुरा नहीं है। उसकी काबिलियत अच्छी है और उसकी मानवता भी काफी अच्छी है। क्या ऊपरवाला उसे पदोन्नत करने के लिए उसके बारे में पूछ रहा है? अगर उसे पदोन्नत किया जाता है तो इसका मतलब है कि मुझे पदोन्नत नहीं किया जाएगा। मैं सच नहीं बता सकता; मैं बस यही कहूँगा कि वह औसत है”—वह इस बारे में सोचने लगता है कि किस तरीके से बात की जाए कि उसे फायदा हो। जब वह इस तरीके से सोचता है तब क्या उसका जमीर काम कर रहा होता है? उसमें जमीर है ही नहीं और वह जमीर के प्रकार्य के अधीन नहीं है। जमीर रहित लोगों में मानवता नहीं होती है। वे जो भी कहना चाहते हैं, कह देते हैं और वे जब भी झूठ बोलना चाहते हैं, बोल देते हैं। झूठ बोलने से उन्हें बुरा क्यों नहीं लगता है? क्योंकि वे जमीर के प्रकार्य के अधीन नहीं होते हैं। इस प्रकार उनके दिल में जमीर और विवेक द्वारा कोई संयम नहीं होता है और न ही संयमित करने की कोई शक्ति होती है। आखिरकार वे अपनी इच्छानुसार झूठ बोल सकते हैं और झूठ बोलने की अपनी व्यक्तिगत इच्छा पूरी कर सकते हैं। अंत में ऐसे लोगों द्वारा अभिव्यक्त सार क्या होता है? यह जमीर की संयमित करने की शक्ति के बिना चीजें करना है जिसका मतलब है कि वे जमीर के प्रकार्य के अधीन नहीं होते हैं। जो लोग जमीर के प्रकार्य के अधीन नहीं होते हैं, वे अपने दिलों में दोषी या असहज महसूस किए बिना गलतियाँ और बुरे कर्म करते हैं। इसलिए, वे अपने स्वार्थ का उपयोग कसौटी के रूप में करके सभी चीजें करते हैं। ऐसे लोगों में संयमित करने की कोई शक्ति नहीं होती है और वे जमीर के प्रकार्य के अधीन नहीं होते हैं, तो क्या वे सत्य का अभ्यास कर सकते हैं? (नहीं।) वे सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते हैं। तुममें किस तरह की मानवता है, यह मापने के लिए तुम्हें मुख्य रूप से यह देखना होगा कि क्या तुम्हारे शब्द और क्रियाकलाप जमीर और विवेक से शासित होते हैं और क्या तुम सत्य का अभ्यास कर सकते हो, भ्रष्ट स्वभावों को छोड़ सकते हो और उद्धार प्राप्त कर सकते हो। अगर तुम्हारे जमीर और विवेक अभी भी सामान्य रूप से कार्य कर सकते हैं तो फिर तुम जमीर और विवेक वाले व्यक्ति हो। अगर तुम्हारे शब्द और क्रियाकलाप जमीर और विवेक द्वारा संयमित नहीं हैं और यहाँ तक कि तुम बिना किसी संयम के पूरी तरह से अपनी मनमर्जी से और निर्लज्जता से कार्य भी कर सकते हो तो तुम न सिर्फ जमीर और विवेक रहित हो, बल्कि तुममें मानवता की भी कमी है। अगर किसी व्यक्ति की मानवता में प्रदर्शित हर चीज मूल रूप से नीच चरित्र के दायरे में आती है तो फिर उस व्यक्ति में मूल रूप से कोई मानवता है ही नहीं। मानवता नहीं होने की निशानी जमीर और विवेक की गैर-मौजूदगी और जमीर के प्रकार्य के बिना चीजें करना है। उदाहरण के लिए, अगर तुम किसी व्यक्ति को बताते हो कि उसे जमीर और मानवता से आचरण करना चाहिए तो वह सोचता है : “जमीर का क्या महत्व है? क्या जमीर होने से पैसा मिल सकता है? क्या जमीर होने से मेरा पेट भर सकता है?” लेकिन जमीर वाले लोगों के लिए यह बात भिन्न है। अगर वे कभी-कभार लालच में आकर ऐसा कुछ बुरा कर बैठते हैं जिससे दूसरों को नुकसान पहुँचता है तो बाद में वे आत्म-निंदा और पछतावा महसूस करेंगे, वे सोचेंगे, “मैंने लोगों के साथ ऐसा करके वाकई उनके साथ अन्याय किया है। क्या यह बुराई करना नहीं है? मैं उस समय इतना भ्रमित कैसे हो सका? मैं खुद पर संयम क्यों नहीं रख सका? मुझे अपनी गलती सुधारने का कोई तरीका ढूँढ़ने की जरूरत है।” देखो, उन्होंने उस समय किसी को धोखा दिया था और भले ही उन्हें कुछ फायदा हुआ हो, लेकिन जब वे इस फायदे के बारे में सोचते हैं तब वे अपने दिल में असहज महसूस करते हैं और खुद से नफरत करते हैं, वे सोचते हैं, “मैं ऐसा कैसे कर सका? मैं भविष्य में दोबारा ऐसा बिल्कुल नहीं कर सकता। मैं ऐसा दोबारा करने के बजाय गरीबी में जीना या भूखा रहना पसंद करूँगा। व्यक्ति को ऐसा नहीं करना चाहिए—ऐसा करने से उसे जीवन भर पछताना पड़ेगा!” ऐसी कोई चीज एक बार करना भी उन्हें मरी हुई मक्खी निगलने जितना घिनौना लगता है। इसलिए वे दोबारा कभी ऐसा नहीं करते हैं। वे अपने दिलों में पछतावा और परेशान महसूस करते हैं। दूसरी तरफ, मानवता रहित लोग अपना दिमाग खपाते हैं और अपना पूरा ध्यान दूसरों को धोखा देने पर केंद्रित करते हैं, बिल्कुल भी पीछे हटे बिना उन्हें पूरी तरह से धोखा देते हैं; उनका जमीर उन्हें दोष नहीं देता है और वे कोई दया नहीं दिखाते हैं। वे दूसरों को बहुत नुकसान पहुँचाते हैं और यह सोचकर खुश भी होते हैं, “वे इसी लायक हैं! किसने कहा था उन्हें मेरे हत्थे चढ़ने के लिए? अगर मैं उन्हें धोखा नहीं दूँगा तो और किसे धोखा दूँगा? यह बस उनकी बदकिस्मती थी कि वे मुझसे टकरा गए!” क्या ऐसे लोगों में जमीर की कोई भावना होती है? (नहीं।) चाहे वे दूसरों को कितना भी धोखा दें या उन्हें किसी भी हद तक नुकसान पहुँचाएँ, वे कभी माफी का एक शब्द नहीं बोलते हैं और उन्हें किसी भी तरह का कोई अपराधबोध या पछतावा नहीं होता है। इसके बजाय वे अपने दिलों में गर्वित और भाग्यशाली महसूस करते हैं। हर बार जब वे धोखे से मिली चीजों का आनंद लेते हैं तब वे परेशान नहीं होते हैं, बल्कि मानते हैं कि यह पूरी तरह से जायज है। वे सोचते हैं कि वे सक्षम, कुशल और चतुर हैं, कि उन्होंने उस समय जो सोचा और किया वह सही था और उन्हें अपनी धोखाधड़ी से और भी ज्यादा मिलना चाहिए था। मुझे बताओ, क्या ऐसे लोगों में मानवता होती है? (नहीं।) बुरा कर्म करने के बाद भी वे इस तरीके से सोच सकते हैं और ऐसा व्यवहार प्रदर्शित कर सकते हैं। क्या तुम्हें लगता है कि इस तरह के व्यक्ति को बचाया जा सकता है? क्या ऐसे हालातों का सामना करने पर वे फिर से धोखा देंगे? (वे देंगे।) वे धोखा देने में और भी ज्यादा निपुण हो जाएँगे, खुद से और भी ज्यादा खुश हो जाएँगे और जितना ज्यादा धोखा देंगे, स्वयं को उतना ही अधिकाधिक चालाक महसूस करेंगे। हर धोखे के साथ उनका दिल और भी अंधकारमय होता जाएगा, उनके क्रियाकलाप और भी निर्मम होते जाएँगे और उनके तरीके और भी क्रूर होते जाएँगे। ऐसे लोग उद्धार से परे होते हैं। यह कहा जा सकता है कि वे शैतान द्वारा पूरी तरह से बंदी बनाए जा चुके हैं। वे पूरी तरह से कुकर्मी, दानव और बदमाश हैं। अगर तुम ऐसे लोगों से जमीर और मानवता की बात करोगे तो वे तुम्हारा उपहास करेंगे और कहेंगे, “तुम महा बेवकूफ हो, जमीर और मानवता से कार्य करते हो—इसके लिए तुम्हें कौन पैसे देने वाला है? क्या तुम आखिर में बस गरीब नहीं रह जाओगे? देखो मैं कितना अच्छा कर रहा हूँ और जरा अपने आप को देखो—कितने दयनीय हो!” वे तुम्हारा उपहास करेंगे और तुम्हारा तिरस्कार करेंगे। ऐसी मानवता पूरी तरह से जमीर रहित होती है—ऐसे लोगों का जमीर पूरी तरह से खो चुका होता है; वे पूरी तरह से दानवों द्वारा कब्जे में लिए जा चुके होते हैं और वे पूरी तरह से जीते-जागते दानव बन चुके होते हैं। इसलिए, ऐसे लोगों से सत्य के बारे में बात मत करो—वे इसे स्वीकार नहीं कर सकते। उनमें तो सामान्य मानवता तक नहीं होती है, फिर वे सत्य कैसे स्वीकार सकते हैं? जो लोग सत्य स्वीकार सकते हैं उनके पास लोगों और मामलों को देखने, आचरण और कार्य करने की बात आने पर एक सीमा होती है, विशेष रूप से जब उसमें उनके अपने स्वार्थ शामिल होते हैं। यह सीमा क्या है? यह अपने जमीर द्वारा संयमित और नियंत्रित होना है। अगर वे अपने जमीर द्वारा संयमित और नियंत्रित किए जा सकते हैं तो यह कहा जा सकता है कि ऐसे लोगों में अब भी कुछ हद तक मानवता है और उनके स्व-आचरण की एक सीमा है। इसका मतलब है कि वे एक निश्चित स्तर के औचित्य से कार्य करते हैं। दूसरों के साथ संगति करते समय या कोई भी चीज करते समय अगर वे सत्य सिद्धांतों को नहीं समझते हैं या सत्य के अनुसार कार्य करने का तरीका नहीं जानते हैं तो वे कम-से-कम जमीर की सीमाओं का पालन तो कर ही सकते हैं। दूसरे शब्दों में, उनके जमीर में अब भी जागरूकता होती है और वह काम कर सकता है। अगर उनका जमीर काम कर सकता है तो फिर उनके पास सत्य स्वीकारने का अवसर है। उनका जमीर सकारात्मक दिशा में विकसित होगा और अंत में उनके चरित्र के जो हिस्से अच्छे नहीं हैं उनमें कुछ हद तक बदलाव आएगा। जैसे-जैसे धीरे-धीरे उनका चरित्र रूपांतरित होता जाएगा, वैसे-वैसे उनके विभिन्न भ्रष्ट स्वभाव भी चरणबद्ध तरीके से त्याग दिए जाएँगे। क्या अब यह स्पष्ट है? (हाँ।)
लोगों को यह स्पष्ट रूप से देखना चाहिए कि परमेश्वर किसे बचाता है और वह लोगों के किन हिस्सों को बचाता और रूपांतरित करता है। एक बात तो यह है कि उन्हें खुद की स्पष्ट समझ होनी चाहिए और दूसरी बात यह है कि उनमें अपने आस-पास के लोगों का भेद पहचानने की क्षमता भी होनी चाहिए। नीच चरित्र की अभिव्यक्तियों के संबंध में, इनमें से कुछ अभिव्यक्तियों के साथ भ्रष्ट स्वभावों के प्रकाशन जुड़े हुए हैं। ये मुख्य रूप से उन अभिव्यक्तियों को संदर्भित करते हैं जो सत्य का उल्लंघन करती हैं, परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं और परमेश्वर के प्रति प्रतिरोधी हैं। लोगों की नजर में ऐसे क्रियाकलाप कानून का उल्लंघन नहीं करते हैं और कानून द्वारा उन्हें सजा नहीं सुनाई जाएगी, लेकिन परमेश्वर द्वारा उनकी निंदा की जाती है। ये भ्रष्ट स्वभाव के तहत आते हैं। नीच चरित्र की दूसरी अभिव्यक्तियों से न सिर्फ भ्रष्ट स्वभाव जुड़े होते हैं, बल्कि वे क्रूर मानवता सार की समस्या से भी संबंधित होती हैं। ऐसे लोग किसी भी तरह का बुरा कर्म करने में सक्षम होते हैं और वे पूरी तरह से कुकर्मी होते हैं। अगर किसी व्यक्ति के चरित्र के सिर्फ एक ही पहलू में समस्याएँ हैं, लेकिन फिर भी वह जमीर और विवेक से बोलता और कार्य करता है और वह सिर्फ विशेष हालातों में ही कोई बुरा कर्म करता है तो वह कुकर्मी नहीं है। कुकर्मियों में किसी भी तरह का कोई जमीर या विवेक नहीं होता है। क्या जमीर और विवेक के बिना लोग अच्छी चीजें कर सकते हैं? बिल्कुल नहीं। क्या वे सत्य का अभ्यास कर सकते हैं? इसकी तो और भी कम संभावना है। अगर किसी व्यक्ति का जमीर काम कर रहा है और उसमें संयमित करने की शक्ति है तो फिर उसका चरित्र और व्यवहार कुछ हद तक सुधर सकता है। अगर किसी व्यक्ति में कोई जमीर नहीं है और चाहे वह कुछ भी करे, उसमें जमीर के प्रकार्य की कमी रहती है तो फिर उसके चरित्र और व्यवहार में सुधार नहीं होगा। इसलिए, किसी व्यक्ति का भेद पहचानना पूरी तरह से उसके चरित्र या सत्यनिष्ठा पर आधारित नहीं हो सकता है; मुख्य चीज यह देखना है कि क्या उसके पास जमीर और विवेक हैं और क्या उसके जमीर और विवेक काम कर रहे हैं। अगर उसमें जमीर और विवेक हैं और जब वह कार्य करता है तब उसके जमीर और विवेक काम कर सकते हैं तो फिर उसमें अब भी मूलभूत मानवता है। अगर उसके क्रियाकलापों में जमीर और विवेक के प्रकार्य की कमी है तो उसमें मूलभूत मानवता नहीं है—वह मानवता रहित है। जिन लोगों में जमीर का मूलभूत प्रकार्य और मूलभूत मानवता होती है उनके पास उद्धार का अवसर होता है, जबकि जिन लोगों में मूलभूत मानवता की कमी होती है उनके पास उद्धार का कोई अवसर नहीं होता है। कोई व्यक्ति उद्धार प्राप्त कर सकता है या नहीं, इसमें मुख्य कारक क्या है? (मुख्य कारक यह है कि क्या उसमें जमीर और विवेक हैं।) सही कहा। तो क्या तुम लोग यह भेद पहचान सकते हो कि किसी व्यक्ति में जमीर और विवेक हैं या नहीं? (हम थोड़ा-सा भेद पहचान सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण चीज यह देखना है कि क्या जब कोई व्यक्ति कार्य करता है तब वह आंतरिक रूप से जमीर और विवेक द्वारा संयमित होता है और क्या उसकी नैतिक सीमाएँ होती हैं।) धर्म-सिद्धांत और सिद्धांत के लिहाज से इसे इसी तरीके से समझाया गया है—क्या तुम्हारे पास कोई ठोस उदाहरण हैं? (उदाहरण के लिए, कुछ लोग अपना कर्तव्य करते समय सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं और बेतहाशा बुरे कर्म करते हैं और भाई-बहन उनकी समस्याओं की तरफ ध्यान दिलाते हैं या उनकी काट-छाँट करते हैं। ऐसे मामलों में अगर उन लोगों में जमीर और विवेक हैं तो वे सक्रियता से चिंतन करेंगे और खुद को जानने का प्रयास करेंगे। हालाँकि, अगर उनमें जमीर और विवेक की कमी है तो उनमें नाराजगी उत्पन्न हो सकती है या यहाँ तक कि वे हमला और पलटवार भी कर सकते हैं।) यह अच्छा उदाहरण है। जब दूसरे लोग जमीर और विवेक वाले लोगों द्वारा कुछ गलत चीज करने के कारण उनकी आलोचना करते हैं तब वे शर्मिंदा और दोषी महसूस करते हैं। उनके दिलों में पछतावा होता है और पछतावे के साथ उनमें प्रायश्चित की अभिव्यक्तियाँ होती हैं और वे बेहतर करने को तैयार रहते हैं। जहाँ तक जमीर और विवेक रहित लोगों की बात है, तो चाहे वे कितने भी बड़े बुरे कर्म या गलतियाँ क्यों न करें, चाहे वे कलीसियाई कार्य को कितना भी नुकसान क्यों न पहुँचाएँ या भाई-बहनों के लिए कितनी भी मुसीबत और विघ्न-बाधाएँ क्यों न उत्पन्न करें, उनकी आलोचना होने पर उनके पास खुद को सही ठहराने और अपना बचाव करने के लिए सैकड़ों कारण होते हैं, वे अपने अपराधों को जरा-सा भी स्वीकारने से इनकार कर देते हैं। यह स्पष्ट है कि वे कार्य को नुकसान पहुँचाते हैं, लेकिन फिर भी उनके दिलों में कोई अपराधबोध नहीं होता है। मुझे बताओ, क्या उन्हें पछतावा होगा? (नहीं होगा।) उन्हें पछतावा नहीं होगा। क्या बिना पछतावे वाले लोग प्रायश्चित कर सकते हैं? (नहीं।) क्या जो लोग प्रायश्चित नहीं कर सकते हैं, वे सत्य स्वीकारने वाले लोग होते हैं? (नहीं।) क्या वे यही चीजें करना जारी रखेंगे? (हाँ।) कब तक? (चूँकि उनमें जमीर की भावना की कमी है, इसलिए वे इसे करते रहेंगे।) सही कहा। वे इसे करते रहेंगे। चाहे दूसरे लोग कुछ भी कहें, वे नहीं सुनेंगे : “मैं बस इसी तरीके से चीजें करता हूँ—किसी को पसंद हो या न हो! कलीसियाई कार्य को नुकसान होने से मेरा क्या लेना-देना है? सिर्फ यही चीज मायने रखती है कि मेरा खुद का कोई नुकसान न हो।” उनका यही दृष्टिकोण है। ठीक है, इस विषय पर हमारी संगति के लिए बस इतना ही। हमने जो संगति की है, उस पर चिंतन करना, उसे अपने आप से और अपने आस-पास की चीजों और लोगों से मिलाना, धीरे-धीरे उसे समझना और इन शब्दों का उपयोग दूसरों को, चीजों को और खुद को देखने के लिए करना। थोड़ा-थोड़ा करके तुम इन चीजों की समझ प्राप्त कर लोगे।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?