सत्य का अनुसरण कैसे करें (2) भाग चार
इसके बाद आओ हम “अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को त्याग देना” में धारणाओं और कल्पनाओं की समस्याओं के बारे में बात करें जो सत्य का अनुसरण करने के अभ्यास में “त्याग देने” की तीसरी मद है। हमने अभी-अभी परमेश्वर के कार्य के बारे में लोगों की कुछ धारणाओं और कल्पनाओं के बारे में बात की। अब इसे देखा जाए तो क्या परमेश्वर के कार्य के बारे में लोगों की कुछ दूसरी धारणाएँ और कल्पनाएँ नहीं हैं? क्या ये धारणाएँ और कल्पनाएँ इस बात को प्रभावित करेंगी कि लोग परमेश्वर के कार्य के साथ कैसे पेश आते हैं, वे परमेश्वर के कार्य का अनुभव कैसे करते हैं और वे परमेश्वर के कार्य को कैसे समझते हैं और जानते हैं? कलीसिया में दिखाई देने वाले विभिन्न प्रकार के लोगों में से एक प्रकार के लोग कुकर्मी और मसीह-विरोधी हैं। चाहे उन्होंने ऐसी कोई भी बुराई की हो जिसके कारण उनसे निपटा गया और चाहे किसी भी मामले के कारण कलीसिया ने उन्हें बहिष्कृत या निष्कासित किया हो, ऐसे कुछ लोग हमेशा होते हैं जिनकी परमेश्वर के घर द्वारा छद्म-विश्वासियों, कुकर्मियों और मसीह विरोधियों को दूर करने के बारे में कुछ धारणाएँ होती हैं और ये धारणाएँ और कल्पनाएँ इस कारण होती हैं कि उन्हें परमेश्वर के कार्य या परमेश्वर की संप्रभुता की बिल्कुल कोई समझ नहीं है। लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं में कलीसिया ही वह जगह है जहाँ परमेश्वर धरती पर कार्य करता है, इसलिए कलीसिया लोगों के लिए परमेश्वर की संप्रभुता को देखने की सबसे प्रत्यक्ष जगह है और यह भी कहा जा सकता है कि यह वह सबसे प्रत्यक्ष और स्पष्ट जगह है जहाँ परमेश्वर की संप्रभुता अभिव्यक्त होती है। लेकिन इस जगह पर लोगों को अक्सर कुछ ऐसे लोग, घटनाएँ और चीजें दिख जाती हैं जो उनकी धारणाओं से मेल नहीं खाती हैं। लोग अपनी धारणाओं में सोचते हैं कि चूँकि कलीसिया परमेश्वर के कार्य से जुड़ी जगह है, इसलिए यह मित्रता और शांति से भरी, प्रेम और सहिष्णुता से भरी, आनंद और आराम से भरी शांत-प्रशांत जगह होनी चाहिए। वे मानते हैं कि कलीसिया में कुकर्मियों और मसीह-विरोधियों जैसे व्यक्ति कभी भी दिखाई नहीं देने चाहिए और कुकर्मियों द्वारा कुकर्म करने की घटनाएँ नहीं होनी चाहिए। और वे सोचते हैं कि परमेश्वर की संप्रभुता के तहत यकीनन कलीसिया में सत्य सिद्धांतों का उल्लंघन किए जाने की कोई घटना नहीं होनी चाहिए और किसी भी प्रकार के अराजक लोग या अराजक चीजें नहीं होनी चाहिए या ऐसी चीजें तो बिल्कुल भी नहीं होनी चाहिए जो मानवीय इच्छा, मानवीय भावनाओं और मानवता से मेल नहीं खाती हों। वे मानते हैं कि कलीसिया में सब कुछ बहुत शांतिपूर्ण, प्रशांत, सुखद, सकारात्मक, आशावादी और उत्साहवर्धक होना चाहिए और वहाँ कोई लड़ाई-झगड़ा या कोई वीभत्सता या भद्दी चीजें भी नहीं होनी चाहिए जो मानवता की जरूरतों से मेल नहीं खाती हों। ये सभी लोगों की धारणाएँ हैं। लेकिन तथ्य लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं से मेल नहीं खाते हैं। चाहे कोई भी अवधि या कार्य चरण हो, कलीसिया में हमेशा कुछ कुकर्मियों और मसीह-विरोधियों द्वारा कलीसिया के कार्य में बाधा डालने और गड़बड़ करने की घटनाएँ होती रहती हैं जिसके कारण परमेश्वर के घर के कार्य के कुछ पहलुओं को नुकसान पहुँचता है, कलीसिया के कार्य का क्रम बिगड़ जाता है और उसमें विघ्न पड़ता है, और ऐसी ही दूसरी चीजें होती हैं। जब ये चीजें होती हैं तो लोगों को लगता है कि इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती और उनके दिल लाचारी, समझने की अक्षमता और उलझन से भर जाते हैं और वे सोच में पड़ जाते हैं, “क्या वाकई परमेश्वर का अस्तित्व है? परमेश्वर वाकई मानवजाति पर कैसे संप्रभु है और अपनी कलीसिया, अपने घर पर कैसे शासन करता है? क्या परमेश्वर वास्तव में इसे लेकर फिक्र करता है या नहीं? परमेश्वर कहाँ है? ऐसा क्यों है कि जब ये अराजक चीजें होती हैं और जब कुकर्मी दिखाई देते हैं और बाधाएँ उत्पन्न करते हैं, तो कोई भी उन्हें रोकने के लिए आगे नहीं आता है और परमेश्वर भी आगे आकर उन्हें नहीं रोकता है? यहाँ वास्तव में क्या हो रहा है? क्या कलीसिया परमेश्वर का घर नहीं है? क्या परमेश्वर का अनुसरण करने वाले लोग उसके चुने हुए लोग नहीं हैं? परमेश्वर अपने घर की निगरानी या सुरक्षा क्यों नहीं करता है? परमेश्वर अपने चुने हुए लोगों की रक्षा क्यों नहीं करता है ताकि वे एक सुरक्षा कवच में, एक आश्रय-स्थल में शांति से रह सकें?” लोगों के ये संदेह और उनका समझ न पाना उनकी विभिन्न धारणाओं के कारण है, है ना? (हाँ।) तो, ये धारणाएँ मुख्य रूप से किस बारे में हैं? क्या वे परमेश्वर के कार्य और परमेश्वर की संप्रभुता के बारे में नहीं हैं? क्योंकि कुकर्मियों द्वारा बुरे कर्म करने और गड़बड़ियाँ और बाधाएँ उत्पन्न करने जैसे मामले कलीसिया में होते हैं और क्योंकि लोग इन मामलों को नहीं समझते हैं इसलिए उनके लिए इन मामलों के मूल की और उनका अंतिम परिणाम क्या होगा इसकी असलियत देखना कठिन है। क्योंकि लोग इन चीजों की असलियत नहीं देख पाते हैं इसलिए वे परमेश्वर के बारे में सभी प्रकार के विचार और धारणाएँ बना लेते हैं। कुछ लोग सोचते हैं, “परमेश्वर के घर को कुकर्मियों और मसीह-विरोधियों के प्रति प्रेम दिखाना चाहिए। अगर परमेश्वर का घर उनके प्रति प्रेम नहीं दिखाता है तो क्या यह समाज की तरह ही नहीं होगा? समाज में हमेशा ऐसे लोगों का एक समूह होता है जो दूसरे समूह के लोगों को सताते हैं, वे यह सब सत्ता और प्रभाव की खातिर होड़ करने के लिए करते हैं। कुकर्मियों को बहिष्कृत और निष्कासित करके क्या परमेश्वर का घर भी उसी तरह लोगों को नहीं सता रहा है? परमेश्वर के घर में रहना उतना सुरक्षित नहीं है! अगर तुम्हारे सामने वाकई कोई अशांत परिस्थिति आती है तो तुम्हारे साथ अन्याय हो सकता है और तुम्हें बाहर निकाल दिया जा सकता है और कोई भी इसके बाद तुम्हारी प्रतिष्ठा बहाल नहीं करेगा! परमेश्वर वास्तव में कहाँ है? परमेश्वर सामने क्यों नहीं आता है और कुछ कहता या करता क्यों नहीं है? हमें तुम्हारा अस्तित्व देखने दो, हमें तुम्हारी सर्वशक्तिमत्ता देखने दो, हमें अपनी आँखों से तुम्हारी संप्रभुता देखने दो, इस तरह से हम निश्चिंत हो जाएँगे, है ना?” कलीसिया में जब भी लोग कुछ ऐसी घटनाओं का अनुभव करते हैं जो उन्हें अपनी समझ से परे लगती हैं, तो उनमें से कुछ लोगों में बेचैनी और संदेह जैसी भावनाएँ जन्म ले लेती हैं और कुछ लोग तो इन घटनाओं से बचना भी चाहते हैं और दूसरे लोग नकारात्मकता में डूब जाते हैं; विशेष रूप से कुछ लोग मसीह-विरोधियों द्वारा गुमराह किए जाने और बेवकूफ बनाए जाने पर खुद से हार मान लेते हैं और कुछ लोग मसीह-विरोधियों द्वारा गुमराह और शोषित किए जाने और उनके कुकर्मों में सहभागी बन जाने पर कलीसिया द्वारा आत्म-चिंतन के लिए अलग-थलग कर दिए जाते हैं या बाहर निकाल दिए जाते हैं। साथ ही जब लोग इन सभी चीजों को समझ से परे पाते हैं, वे परमेश्वर के अस्तित्व पर भी संदेह करने लगते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बहुत से लोगों की परमेश्वर में आस्था का मुख्य स्रोत उनका यह विश्वास है कि परमेश्वर सभी चीजों पर, हर चीज पर संप्रभु है। यानी बहुत सारे लोग यह मानते हैं कि परमेश्वर हर चीज पर, सभी चीजों पर और मानवजाति की किस्मत पर संप्रभु हो सकता है और इसलिए वे परमेश्वर के अस्तित्व और परमेश्वर की पहचान और सार पर विश्वास करते हैं। लेकिन उनके आस-पास होने वाली इन चीजों के कारण वे परमेश्वर की संप्रभुता में अपने विश्वास पर संदेह करते हैं और डगमगा जाते हैं और फिर वे इस सच्चाई पर संदेह करना शुरू कर देते हैं कि परमेश्वर हर चीज पर संप्रभु है और इसके बाद परमेश्वर में उनकी आस्था भी डगमगाने लगती है और इसलिए समस्याओं की यह पूरी श्रृंखला उत्पन्न होती है। परमेश्वर की संप्रभुता के बारे में लोगों में सभी तरह की धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं और ये धारणाएँ और कल्पनाएँ निश्चित रूप से सत्य या तथ्यों से मेल नहीं खाती हैं, बल्कि लोगों की भ्रामक व्याख्याएँ या गलतफहमियाँ हैं। तो आगे हम इस बात पर संगति करेंगे कि परमेश्वर तुम्हारे आस-पास के उन सभी लोगों, घटनाओं और चीजों पर कैसे संप्रभु है जिन्हें तुम देख और महसूस कर सकते हो, इन सब पर परमेश्वर की संप्रभुता के लिए क्या सिद्धांत हैं और वह क्या उद्देश्य प्राप्त करना चाहता है।
सभी चीजों पर परमेश्वर की संप्रभुता के सिद्धांत और उद्देश्य
“परमेश्वर की संप्रभुता” वाक्यांश में विषय-वस्तु की एक व्यापक श्रेणी शामिल है। व्यापक परिवेश को छोड़कर जब कलीसिया की बात आती है तो यह तथ्य सच्चाई है कि परमेश्वर हर चीज पर संप्रभु है। परमेश्वर की संप्रभुता कोई खोखला वाक्यांश नहीं है और न ही यह सिर्फ एक परिघटना है, बल्कि इसके वास्तविक उदाहरण और वास्तविक नतीजे मौजूद हैं। तो कलीसिया में परमेश्वर की संप्रभुता के क्या सिद्धांत हैं? आओ पहले इस बारे में सोचें : क्या परमेश्वर इस पर संप्रभु है और यह व्यवस्था करता है कि कलीसिया में किन लोगों को स्वीकार किया जाता है? (हाँ, वह है।) यह खोखला नहीं है। परमेश्वर का सुसमाचार और परमेश्वर के वचन किन लोगों तक आते हैं और कौन-से लोग परमेश्वर का कार्य स्वीकारने में समर्थ हैं और कौन-से लोग कलीसिया में प्रवेश कर सकते हैं—यह सब कुछ परमेश्वर द्वारा नियत किया जाता है। आओ अभी के लिए हम इन लोगों की मानवता और इस बारे में बात न करें कि क्या वे कुकर्मी हैं; वे कलीसिया में प्रवेश करने में समर्थ हैं इसका मतलब है कि परमेश्वर ने इसे नियत किया। क्या परमेश्वर का विधान परमेश्वर की संप्रभुता का एक पहलू है? (हाँ।) सबसे पहले एक बात के बारे में हम निश्चित हो सकते हैं कि कलीसिया में हर व्यक्ति का प्रवेश परमेश्वर द्वारा नियत किया जाता है। “परमेश्वर का विधान” वाक्यांश सुनने में थोड़ा गूढ़ लगता है, इसलिए चलो हम बस इतना ही कहें कि “अंतिम फैसला परमेश्वर का होता है, परमेश्वर द्वार की रखवाली करता है।” परमेश्वर राज्य का द्वार है और वह कलीसिया का द्वार भी है। जब यह बात आती है कि किस तरह के लोग आधिकारिक तौर पर कलीसिया के, परमेश्वर के घर के सदस्य बन सकते हैं तो परमेश्वर द्वार की रखवाली करता है। चाहे वे छद्म-विश्वासी हों या ऐसे कुकर्मी हों जो कलीसिया में आने में कामयाब हो गए हैं या ऐसे अच्छे लोग हों जो परमेश्वर में विश्वास रखने में रुचि रखते हैं या जो सत्य स्वीकारने और परमेश्वर का अनुसरण करने में समर्थ हैं, अगर वे कलीसिया में शामिल होते हैं और कलीसिया के सदस्य बनते हैं तो यह ऐसा कुछ नहीं है जिसे कोई भी व्यक्ति तय कर सकता है, यह परमेश्वर की संप्रभुता, व्यवस्थाओं और विधान के कारण होता है। चाहे परमेश्वर में विश्वास रखने में वे कुछ गुप्त उद्देश्य या लक्ष्य रखते हों या उनकी मानवता कैसी भी हो या उनकी शिक्षा का स्तर और सामाजिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो, परमेश्वर ही यह तय करता है कि वे कलीसिया में शामिल हो सकते हैं और उसके सामने आ सकते हैं—परमेश्वर ही द्वार की रखवाली करता है। क्या लोग उचित रूप से द्वार की रखवाली कर सकते हैं? (नहीं, वे नहीं कर सकते।) लोग इस मामले का फैसला नहीं कर सकते, यह लोगों की इच्छा पर निर्भर नहीं करता है। उदाहरण के लिए, जब तुम देखते हो कि कोई व्यक्ति चालाक है और समाज में उसका रुतबा है तो तुम सोचते हो, “बहुत अच्छा होगा अगर यह व्यक्ति कलीसियाई अगुआ बनने के लिए परमेश्वर के घर आ सके। हमारी कलीसिया में ऐसे लोगों की कमी है।” लेकिन परमेश्वर उसे नहीं चाहता है; वह उसे द्रवित नहीं करता है। जब दूसरे लोग उसे सुसमाचार का उपदेश देते हैं और उसके साथ परमेश्वर के वचनों की संगति करते हैं तो उसे समझ नहीं आता है कि उसने क्या सुना है। जब वह कुछ और चीज सुनता है तो वह उसे गहराई से समझ पाता है; सिर्फ जब वह परमेश्वर के वचन सुनता है तो वह समझ नहीं पाता है और बेवकूफों की तरह होता है—क्या फिर भी ऐसे लोग कलीसिया में प्रवेश कर सकते हैं? वैसे तो आशीष प्राप्त करने में उन्हें दिलचस्पी होती है लेकिन वे अपने दिलों को शांत नहीं कर पाते हैं और परमेश्वर के वचन और सत्य पर संगति सुनते समय शांत नहीं बैठ पाते हैं और दो या तीन धर्मोपदेश सुनने के बाद वे आना बंद कर देते हैं। ऐसे लोगों में कोई वास्तविक आस्था नहीं होती है, तो क्या उनके प्रति तुम्हारे अच्छे इरादों का कोई प्रभाव पड़ेगा? क्या तुम उन्हें कलीसिया में ला पाओगे? नहीं। इस पर अंतिम फैसला परमेश्वर का होता है। परमेश्वर कहता है कि उसे ऐसे लोग नहीं चाहिए और चाहे यह सेवा करने के लिए हो या कोई भूमिका निभाने के लिए, उसे वे लोग नहीं चाहिए। इसलिए अगर तुम अच्छे इरादों से उन्हें अपने साथ घसीटकर ले भी आओ तो भी यह बेकार ही होगा और अंत में, उन्हें फिर भी कलीसिया छोड़नी ही पड़ेगी। वे कलीसिया के सदस्य नहीं बन सकते; चाहे कोई भी उन्हें अपने साथ घसीटकर ले आए, यह बेकार ही होगा। इस मामले का फैसला लोग नहीं कर सकते हैं; यह परमेश्वर द्वारा नियत किया गया है और परमेश्वर द्वार की रखवाली करता है। कुछ लोगों के पास सामाजिक रुतबा नहीं होता है, वे महत्वपूर्ण हस्तियाँ नहीं होते हैं और वे औसत काबिलियत वाले होते हैं और साधारण दिखते हैं, लेकिन वे काफी सादे और स्पष्टवादी होते हैं और उन्हें परमेश्वर में विश्वास के मामलों में दिलचस्पी होती है। चाहे उन्हें कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न हों, उन्हें परमेश्वर से अलग नहीं किया जा सकता और उनमें बहुत ज्यादा उत्साह होता है—यह उत्साहपूर्ण ऊर्जा कुछ ऐसी है जिसे देखकर भाई-बहन खुश होते हैं और परमेश्वर भी इसे देखकर आनंदित होता है—और दरअसल परमेश्वर के आत्मा से द्रवित होने के कारण ही वे इतने उत्साही होते हैं। जब वे कलीसिया में प्रवेश करते हैं और देखते हैं कि कलीसिया में सभी लोग अच्छे लोग हैं, परमेश्वर के वचन खाते और पीते हैं और हर रोज सत्य पर संगति करते हैं तो वे इससे बेहद प्रोत्साहित होते हैं और महसूस करते हैं कि यही जीवन का सही मार्ग है, इसलिए वे सुसमाचार का उपदेश देना और अपने कर्तव्य करना शुरू कर देते हैं और परमेश्वर के अनुयायी बन जाते हैं। यह कौन तय करता है कि वे परमेश्वर में विश्वास रख सकते हैं? (परमेश्वर तय करता है।) यह परमेश्वर ही तय करता है। वे परमेश्वर में सिर्फ इसलिए विश्वास रख सकते हैं क्योंकि परमेश्वर उन्हें कलीसिया में प्रवेश करने की अनुमति देता है। अगर परमेश्वर कार्य न करे और उन्हें द्रवित न करे तो वे परमेश्वर में विश्वास नहीं रख पाएँगे और अगर उन्हें जबरन कलीसिया में घसीटकर लाया गया तो उन्हें देर-सवेर वहाँ से चले जाना पड़ेगा। लोगों के जन्मजात गुणों में सत्य स्वीकारने की कोई क्षमता नहीं होती है; यह तथ्य कि वे सत्य से प्रेम कर सकते हैं और सत्य स्वीकार सकते हैं यह साबित करता है कि परमेश्वर उन पर कार्य करता है। अगर परमेश्वर उन पर कार्य करता है तो वे कलीसिया के सदस्य बन सकते हैं—यह सभी प्रकार के लोगों के कलीसिया में प्रवेश करने की पूर्वापेक्षा है, यह पूर्वापेक्षा यह है कि परमेश्वर उन्हें चाहता हो। चाहे वे कलीसिया में कोई भी भूमिका निभाएँ, हर हाल में, परमेश्वर अपने घर के द्वार की रखवाली करता है। अगर वह उन्हें अंदर आने की अनुमति नहीं देता है तो वे द्वार के बाहर होते हैं; अगर वह उन्हें अंदर आने की अनुमति देता है तो वे द्वार के अंदर होते हैं। इसलिए कलीसिया का सदस्य बनना कोई इतना आसान मामला नहीं है। जब यह प्रश्न आता है कि परमेश्वर द्वारा लोगों को स्वीकारने के लिए विशिष्ट रूप से कौन-से सिद्धांत आधार के रूप में कार्य करते हैं, तो यकीनन परमेश्वर के अपने खुद के सिद्धांत हैं। हम इस बात पर संगति नहीं करेंगे कि परमेश्वर किस प्रकार का व्यक्ति चाहता है और किस प्रकार का व्यक्ति नहीं चाहता है—यह बहुत ही पेचीदा है। मैं क्यों कहता हूँ कि यह पेचीदा है? परमेश्वर के पास इसके लिए एक योजना है कि कलीसिया में कौन प्रवेश करता है, वह किस अवधि के दौरान क्या भूमिका निभाता है और वह किस अवधि के दौरान कौन-सा कर्तव्य करता है या किस महत्वपूर्ण कार्य की जिम्मेदारी उठाता है और वह किस अवधि में परमेश्वर के घर की कार्य-जरूरतों और जनबल की आवश्यकताओं के अनुरूप है। परमेश्वर सिर्फ मौजूदा पल में कार्य करने के बजाय एक स्थूल और समग्र स्तर पर विनियमित और नियंत्रित करता है—यह बहुत ही पेचीदा मामला है और इसे थोड़े-से शब्दों में स्पष्ट रूप से नहीं समझाया जा सकता, इसलिए हम विवरणों में नहीं जाएँगे। संक्षेप में, कोई व्यक्ति परमेश्वर के घर के द्वार से प्रवेश कर सकता है या नहीं, इसका फैसला कोई व्यक्ति नहीं करता है; परमेश्वर इस पर संप्रभु है और वही इसकी व्यवस्था करता है। परमेश्वर के घर में प्रवेश करने के बाद सभी प्रकार के लोग सभी प्रकार के कर्तव्य करते हैं, सभी प्रकार की भूमिकाएँ निभाते हैं और सभी प्रकार के मार्गों पर चलते हैं। इन सभी विभिन्न तरह के लोगों में सभी तरह की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ होती हैं, चाहे वे अच्छी हों या बुरी, सकारात्मक हों या नकारात्मक, सक्रिय हों या निष्क्रिय—यह सब कुछ परमेश्वर की संप्रभुता और शासन के अधीन है।
परमेश्वर की संप्रभुता का मतलब है कि उसके शासन के तहत हर चीज अपने स्वाभाविक ढर्रे के अनुसार घटित होती है; कोई भी घटना संयोग से नहीं होती है और हर घटना जिन विकासों और बदलावों से गुजरती है वे किसी व्यक्ति द्वारा शुरू या तय नहीं किए जाते हैं—परमेश्वर इन सब पर संप्रभु है। यकीनन किसी भी घटना का अंतिम नतीजा और निरूपण भी उस प्रकार की घटना के सार और उसमें शामिल लोगों के प्रकारों के सार पर आधारित होता है और घटना के निरूपण का आधार पूरी तरह से परमेश्वर के वचन और परमेश्वर के अपेक्षित सिद्धांत हैं। किसी भी प्रकार की घटना संयोग से नहीं होती है और किसी भी प्रकार की घटना का अंतिम नतीजा लोगों द्वारा तय नहीं किया जाता है। दरअसल किसी भी प्रकार की घटना की शुरुआत परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित और उत्पन्न की जाती है। जब परमेश्वर किसी प्रकार की घटना उत्पन्न करता है तो वह उसमें कार्य करने के लिए एक प्रकार के व्यक्ति की व्यवस्था करता है और उस प्रकार का व्यक्ति सेवाकर्मी या विषमता की भूमिका निभा सकता है, हो सकता है कि वह नकारात्मक भूमिका निभाए या हो सकता है कि वह सकारात्मक भूमिका निभाए। लेकिन चाहे वह कोई भी भूमिका निभाए, इन सभी चीजों की शुरुआत परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित की जाती है। इस संबंध में परमेश्वर द्वारा व्यवस्थाएँ किए जाने के दो स्पष्टीकरण हैं। एक स्पष्टीकरण यह है कि परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से कुछ सकारात्मक व्यवस्थाएँ करता है और कुछ सकारात्मक निर्देश देता है और पर्यवेक्षण करता है, और कुछ सकारात्मक व्यक्तियों से घटना की शुरुआत करवाता है—यह “परमेश्वर की व्यवस्थाओं” का एक स्पष्टीकरण है। दूसरा स्पष्टीकरण यह है कि परमेश्वर कुछ चीजें करने के लिए एक प्रकार की आत्मा को प्रेषित करता है और भेजता है। लोगों की नजर में ये चीजें नकारात्मक और दुष्ट हैं और इसलिए ये नकारात्मक और दुष्ट चरित्र निश्चित रूप से नकारात्मक व्यक्ति हैं, यानी ऐसे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर शुरू से ही अपने घर में विषमताओं और नकारात्मक शिक्षण सामग्रियों के रूप में प्रवेश करने के लिए नियत करता है। परमेश्वर उन्हें ये भूमिकाएँ निभाने के लिए कहता है क्योंकि वे अपने प्रकृति सार से सिर्फ यही भूमिकाएँ निभा सकते हैं और वह उन्हें जी भरकर नौटंकी करने देता है और उन्हें जी भरकर वह करने देता है जो उन्हें विषमताओं के रूप में करना चाहिए। पूरी प्रक्रिया के दौरान, चाहे यह सकारात्मक व्यक्तियों की अभिव्यक्तियाँ हों या नकारात्मक व्यक्तियों की, इन सभी मामलों को देखने और उन्हें सँभालने में परमेश्वर का सिद्धांत उन्हें उनके स्वाभाविक ढर्रे पर आगे बढ़ने देना है। इन मामलों को देखने और उनसे निपटने में सकारात्मक व्यक्तियों के कुछ सकारात्मक दृष्टिकोण होते हैं और कुछ ऐसे दृष्टिकोण होते हैं जो मानवता और जमीर के मानक के अनुरूप होते हैं। भले ही उनमें से कुछ लोग कुछ भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हों—उनमें खुशामदी होने की कुछ अभिव्यक्तियाँ होती हों या वे कुछ दूसरे भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हों—कम-से-कम वे मानवता के जमीर और विवेक को पकड़े रहते हैं, यानी वे आचरण करने की मूलभूत आधाररेखा को पकड़े रहते हैं। और जब नकारात्मक व्यक्तियों की बात आती है तो वे जो भी चीज करते हैं उसमें परमेश्वर दखल नहीं देता है या उनका मार्गदर्शन नहीं करता है, बल्कि वह उन्हें उनके प्राकृतिक ढर्रे का अनुसरण करने देता है; वे भी जी भरकर नौटंकी करते हैं और अपनी वीभत्सता को उजागर करते हैं और जी भरकर कुछ चीजें करते हैं। वे सफलतापूर्वक उन नकारात्मक व्यक्तियों, यानी कुकर्मियों और मसीह-विरोधियों की भूमिकाएँ निभाते हैं जिन्हें परमेश्वर उजागर करता है जिससे दूसरे लोग वास्तविक जीवन में स्पष्ट रूप से यह देखने में सक्षम बन जाते हैं कि किस तरह के लोग दानव हैं, किस तरह के लोग कुकर्मी हैं, किस तरह के लोग मसीह-विरोधी हैं और वास्तव में उन मसीह-विरोधियों, कुकर्मियों, शैतानों और दानवों के वीभत्स चेहरे कैसे होते हैं जिन्हें परमेश्वर उजागर करता है। अगर इन नकारात्मक व्यक्तियों को वास्तविक जीवन में जीती-जागती शिक्षण सामग्रियों के रूप में उपयोग नहीं किया जाता तो तुम्हारे मन में दानव और शैतान हमेशा के लिए अमूर्त बने रह जाते और हमेशा के लिए सिर्फ एक अनुमान या तस्वीर बने रह जाते। लेकिन अब ये जीते-जागते उदाहरण तुम्हारी आँखों के ठीक सामने रखे गए हैं और मानव खाल पहने ये दानव तुम्हारी अपनी आँखों के सामने स्पष्ट रूप से जी रहे हैं और उनकी बातें और आचरण, उनका हर शब्द और क्रियाकलाप, उनके चेहरे की अभिव्यक्तियाँ और यहाँ तक कि उनकी आवाज का लहजा, ये सब तुम्हारे जीवन में स्पष्ट रूप से ठीक तुम्हारे सामने दिखाई देते हैं और तुम्हारे मन में अंकित हो जाते हैं। यह तुम्हारे लिए कोई बुरी चीज नहीं है। इस तरह की चीज कलीसिया में बार-बार होती है। पहली बार ऐसा होने पर तुम बेचैन हो जाते हो और सोचते हो कि तुम्हें परमेश्वर से प्रार्थना करने की जरूरत है। दूसरी बार ऐसा होने पर तुम सोचते हो, “मुझे अपनी रक्षा करने के लिए सत्य का उपयोग करना सीखना होगा और अगली बार जब मेरे सामने इस तरह का व्यक्ति आए तो मुझे उससे दूर रहना होगा,” और तुम यह सोचना शुरू कर देते हो कि अपने आप को कैसे बचाना है और कुकर्मियों से कैसे दूर रहना है। तीसरी बार जब इस तरह का व्यक्ति दिखाई देता है तो तुम सोचते हो, “ये लोग बिल्कुल बड़े लाल अजगर की तरह, शैतान की तरह क्यों बोलते हैं? क्या वे जो चीजें कहते हैं वे गुमराह करने वाली नहीं हैं? क्या वे कुकर्मी नहीं हैं? ऐसा लगता है कि परमेश्वर के वचनों ने कहा है कि ये अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित करने वाले लोग मसीह-विरोधी होते हैं। मुझे उनका भेद पहचानना चाहिए और उन्हें उजागर करना चाहिए, मैं उनके द्वारा गुमराह नहीं हो सकता और मुझे उनसे दूर रहना चाहिए।” इस तरह की चीजें बार-बार अनुभव करके तुम मसीह-विरोधियों, कुकर्मियों, शैतानों और दानवों का भेद पहचानने की और विघ्न-बाधाएँ क्या होती हैं इसकी ज्यादा स्पष्ट और ज्यादा गहन समझ प्राप्त करते हो। तुम्हारी समझ अब शब्दों और धर्म-सिद्धांतों पर नहीं रुक जाती है और छवियों पर तो बिल्कुल भी नहीं रुकती। बल्कि तुम वास्तविक जीवन में इन चीजों को पहचान लेने में ज्यादा-से-ज्यादा समर्थ होते जा रहे हो और साथ ही, तुम सत्य का उपयोग करते हुए इन लोगों को देख पा रहे हो और ये जो चीजें हुई हैं उन्हें सत्य का उपयोग करते हुए हल कर पा रहे हो। यकीनन जब ये चीजें होती हैं तो तुम भी लगातार अपने विचारों और दृष्टिकोणों को सही कर रहे होते हो, यह सोचते हो कि इन लोगों के प्रति तुम्हें कौन-सा दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, तुम्हें उन्हें किस परिप्रेक्ष्य से देखना चाहिए और तुम्हें उनके साथ किस तरह का रिश्ता बनाए रखना चाहिए। जब तुम इन चीजों का सामना करोगे तो तुम अनजाने में इन मुद्दों पर चिंतन करोगे, उत्तर ढूँढ़ने और निष्कर्ष निकालने के लिए लगातार सत्य की तलाश करोगे और अंत में कुछ प्राप्त करोगे। इस प्रक्रिया के दौरान परमेश्वर बस लोगों को सत्य प्रदान करता है और उन्हें सत्य समझने में सक्षम बनाता है, चाहे यह सत्य पर संगति करना हो या लोगों को उन चीजों में सत्य समझने में सक्षम बनाना हो जो उनके साथ घटित होती हैं—कुल मिलाकर, परमेश्वर इस परिस्थिति को उत्पन्न होते ही तुरंत समाप्त नहीं कर देता है। अगर यह चीज जरूर घटित होनी चाहिए और यह परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन प्रवेश और कलीसिया के कार्य के लिए फायदेमंद है तो परमेश्वर इसे लोगों के साथ घटित होने देगा और वह इसे नहीं रोकेगा, बल्कि इसे इसके प्राकृतिक ढर्रे के अनुसार आगे बढ़ने देगा। इस तरीके से कार्य करने में परमेश्वर का उद्देश्य एक लिहाज से लोगों को हटाना है और दूसरे लिहाज से लोगों को पूर्ण बनाना है। यकीनन लोगों को हटाने में वह निश्चित रूप से उन लोगों को निशाना बनाता है जो विषमताओं के रूप में कार्य करते हैं और सेवा करने के लायक भी नहीं हैं, जबकि लोगों को पूर्ण बनाने में वह अपने चुने हुए लोगों को निशाना बनाता है—उनमें से उन लोगों को जो सत्य का अनुसरण करने को तैयार हैं। इसका दोहरा महत्व है। एक महत्व यह है कि कुकर्मी जो तमाशा दिखाते हैं उसके जरिये वे बेनकाब किए जाते हैं, हटाए जाते हैं और कलीसिया से बाहर निकाल दिए जाते हैं। दूसरा महत्व यह है कि इन कुकर्मियों द्वारा धीरे-धीरे तमाशा दिखाने और विषमताओं के रूप में कार्य करने की प्रक्रिया में परमेश्वर के चुने हुए लोग भेद पहचानना सीखने और परमेश्वर के वचनों में सत्य समझने में सक्षम बनते हैं; इस तरह से परमेश्वर व्यावहारिक तरीके से लोगों में सत्य ढालता है—यानी परमेश्वर जिन सभी प्रकार के कुकर्मियों, मसीह विरोधियों, शैतानों और दानवों को उजागर करता है वह उनके दुष्ट सार की सभी विभिन्न अभिव्यक्तियों को लोगों के वास्तविक जीवन में प्रदर्शित होने की अनुमति देता है और यह लोगों को विभिन्न प्रकार के दुष्ट, वीभत्स और नकारात्मक व्यक्तियों, घटनाओं और चीजों की स्पष्ट समझ और ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम बनाता है। उदाहरण के लिए, मान लो कि परमेश्वर तुमसे कहता है, “तुम अपने हाथों से जलते कोयले नहीं छू सकते; तुम्हारी उंगलियाँ जल जाएँगी और उनमें दर्द होगा।” तुम्हें नहीं पता कि जलते कोयले कैसे दिखते हैं, तुम्हें नहीं पता कि उन्हें छूने पर कैसा महसूस होता है और जब वह तुम्हें यह बताता है तो तुम जो समझते हो वह एक धर्म-सिद्धांत है। फिर कुछ लोग कल्पना करते हैं कि जलता कोयला एक गेंद या एक लंबी पट्टी है। और जलते कोयलों का रंग कैसा होता है? उन्हें छूने पर कैसा महसूस होता है? उन्हें छूने का दर्द कैसा होगा? तुम्हें नहीं पता। जलते कोयलों के बारे में तुम्हारा विचार सिर्फ उसी चीज की एक तस्वीर है जो तुम्हारा मन कल्पना करने में समर्थ है और इसका वास्तविक चीज से कभी भी कोई लेना-देना नहीं होगा। इसलिए एक दिन जब परमेश्वर जलते कोयलों की एक ट्रे बाहर निकालता है और उसे तुम्हारे सामने रखता है तो तुम उन्हें नहीं पहचानते हो और तुम्हें बस महसूस होता है कि वे बहुत गर्म लगते हैं। तुम यह मालूम करने के लिए बहुत ही सावधानी से अपना हाथ उनकी तरफ बढ़ाते हो कि क्या उन्हें छूने पर तुम्हारी उँगलियों को और भी गर्म लगेगा। परमेश्वर कहता है, “तुम यह करके देख सकते हो लेकिन उन्हें बहुत ज्यादा देर तक मत छूना, नहीं तो उनसे तुम्हारी चमड़ी जल जाएगी।” कुछ लोग बेवकूफ हैं—वे अपनी पाँचों उंगलियाँ फैलाते हैं और एक जलता कोयला पकड़ लेते हैं और उनका पूरा हाथ जल जाता है और उस पर छाले पड़ जाते हैं। दूसरे लोग होशियार और सावधान हैं—वे बस एक उँगली बढ़ाते हैं और जलते कोयले को हल्के से छूते हैं और एक सेकंड पूरा होने से पहले ही उँगली पीछे खींच लेते हैं, वे कहते हैं, “ओह, यह बहुत ही गर्म है! यह तो वाकई जल रहा है!” चाहे इसे छूने के लिए तुम पाँच उँगलियों का उपयोग करो या एक उँगली का, हर हाल में, तुम जो छूते हो वह कोई छवि या शब्दों के बजाय एक वास्तविक चीज है और तुम जीवन भर जलते कोयले छूने का एहसास, अनुभव और इस बात को कभी नहीं भूलोगे कि तुम्हारे लिए जलते कोयलों का क्या मतलब है। जब तुम फिर से जलते कोयले देखोगे तो तुम दूसरों से कहोगे : “तुम गर्माहट पाने, कपड़े सुखाने और पावरोटी सेंकने के लिए उनका उपयोग कर सकते हो, लेकिन तुम्हें उन्हें अपने हाथों से कभी नहीं छूना चाहिए। अगर तुमने उन्हें छुआ तो तुम जल जाओगे और तुम्हारे हाथों पर छाले पड़ जाएँगे।” लोग कह सकते हैं : “तो अगर मैं जल गया और मेरे हाथों पर छाले पड़ गए तो क्या होगा?” और तुम जवाब दोगे : “कम-से-कम तुम अपने हाथों से चीजें नहीं पकड़ पाओगे और तुम्हारे लिए खाना खाना भी असुविधाजनक होगा और शारीरिक कार्य करना तो और भी असुविधाजनक हो जाएगा।” यह अनुभव से बोलना है, है ना? उस गहन अनुभव के बाद गर्म कोयलों की जलन तुम्हारी याददाश्त में गहराई से अंकित हो जाएगी और इसलिए तुम फिर कभी जलते कोयले आसानी से नहीं छूओगे। परमेश्वर सभी चीजों पर संप्रभु है और लोगों के साथ घटित होने वाली सभी प्रकार की चीजों की व्यवस्था करता है ताकि वे उनसे सबक सीख सकें और फायदे प्राप्त कर सकें और ताकि वह लोगों को जो सत्य और वचन प्रदान करता है उन्हें सही मायने में उनमें ढाला जा सके और इस प्रकार परमेश्वर के वचन और सत्य अब लोगों के दिलों में धर्म-सिद्धांत, नारे या विनियम बनकर नहीं रहते हैं बल्कि उनका जीवन बन जाते हैं और ऐसे सिद्धांत और कसौटी बन जाते हैं जिन पर वे जीवित रहने के लिए निर्भर करते हैं और जो उनके जीवन का एक हिस्सा होते हैं—इस तरह से परमेश्वर का कार्य अपना प्रभाव प्राप्त कर चुका होगा।
जब परमेश्वर की संप्रभुता के मामले की बात आती है तो लोगों को यह देखना चाहिए कि परमेश्वर किसी घटना की शुरुआत की व्यवस्था करता है, फिर उसके आगे बढ़ने के ढर्रे का मार्गदर्शन और अगुआई करता है; जहाँ तक यह बात है कि अंत में इस घटना का क्या नतीजा होता है, सत्य का अनुसरण करने वाले लोग इससे क्या प्राप्त करते हैं और कितना प्राप्त करते हैं, यह घटना और इसमें शामिल लोग और चीजें अंत में कहाँ पहुँचती हैं और अंत में उन्हें कैसे व्यवस्थित किया जाता है, तो यकीनन ये भी परमेश्वर द्वारा ही निर्धारित किए जाते हैं—यह सभी चीजों पर परमेश्वर की संप्रभुता का एक सिद्धांत है। परमेश्वर हर घटना की सिर्फ शुरुआत, प्रक्रिया और नतीजा पूर्वनिर्धारित करता है और वह पूरी घटना को उस दिशा में मुक्त भाव से आगे बढ़ने देता है जिसे उसने निर्धारित किया है, इसका उद्देश्य हर चीज को प्राकृतिक ढर्रों के अनुरूप बनाना या हर चीज को किसी विकृति या प्रसंस्करण से गुजारे बिना अपना कार्य करने देना है ताकि वह प्रभाव प्राप्त हो जिसे परमेश्वर प्राप्त करने का इरादा रखता है। क्या यह ऐसा नहीं है? (हाँ।) उदाहरण के लिए, जब परमेश्वर किसी घटना के शुरू होने और घटित होने की व्यवस्था करता है तो वह यह देखना शुरू कर देता है कि इस घटना के संपर्क में आने वाले लोगों के रवैये क्या हैं और इसके प्रति उनके नजरिये क्या हैं—चाहे वे इसे बड़े ध्यान से देखें या इस पर ध्यान देने में उन्हें दिलचस्पी न हो और चाहे वे इसमें अपने दिल से शामिल हों या चाहे वे इसे अस्वीकार कर दें, इसका प्रतिरोध करें और इससे दूर रहें—परमेश्वर विभिन्न प्रकार के लोगों की अभिव्यक्तियाँ देख रहा है। तो क्या परमेश्वर विभिन्न प्रकार के लोगों की अभिव्यक्तियों में दखल देता है? परमेश्वर दखल नहीं देता है। परमेश्वर तुम्हें मुक्त भाव से चुनने का अधिकार देता है। तुम इस घटना को बहुत महत्वपूर्ण मान सकते हो और इसे गंभीरता से ले सकते हो या तुम इसे नजरअंदाज करने और इसके प्रति उदासीन होने का रवैया अपना सकते हो और यकीनन तुम इससे परहेज करने, दूर रहने और इसमें हिस्सा नहीं लेने का रवैया भी अपना सकते हो—परमेश्वर बस चुपचाप देखता है। लेकिन पूरी घटना का उद्भव और घटित होना परमेश्वर द्वारा शुरू किया जाता है। यह किसी घटना पर परमेश्वर की संप्रभुता का शुरुआती चरण है। जब यह घटना आगे बढ़ने लगती है, तो जहाँ तक यह बात है कि इसमें कौन-से लोग हिस्सा लेते हैं, इसमें कौन-से लोग शामिल होते हैं और एक बार जब वे इसमें शामिल हो जाते हैं तो उसके बाद यह घटना किस दिशा में आगे बढ़ती है, तो यकीनन परमेश्वर ही इन सभी लोगों को चलाता है और व्यवस्थित करता है ताकि यह घटना उस दिशा में और उस प्रभाव के साथ आगे बढ़े जो परमेश्वर चाहता है। उसी तरह से जब यह घटना सबके सामने आ जाती है और पूरा मामला चरमबिंदु पर पहुँच जाता है, तब भी परमेश्वर विभिन्न प्रकार के लोगों के रवैयों, अभिव्यक्तियों, राय और नजरियों को देख रहा होता है। वह देख रहा होता है कि क्या तुम इस घटना को वाकई दिल पर लेते हो, क्या तुम इस घटना को अत्यधिक गंभीरता, कठोरता और सच्चे मन से लेते हो या तुम इसके प्रति उदासीन हो, इसे नजरंदाज करते हो और इसके प्रति बहुत ही ज्यादा सुन्न हो या इससे बचने और नफरत का रवैया अपनाते हो। वह यह मालूम करने के लिए देख रहा है कि क्या तुम सत्य से प्रेम करने वाले व्यक्ति हो और क्या तुम कोई ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर की अपेक्षाओं और सत्य को गंभीरता से लेते हो। पूरी घटना के आगे बढ़ने की प्रक्रिया में तुम्हारा रवैया ज्यादा-से-ज्यादा स्पष्ट होता जाता है और परमेश्वर सत्य के प्रति तुम्हारे रवैये, उसके द्वारा इंतजाम किए गए परिवेशों के प्रति तुम्हारे रवैये को ज्यादा स्पष्टता से देखता है और वह सत्य का अनुसरण करने के प्रति तुम्हारे रवैये को भी स्पष्ट रूप से देखता है। जब पूरी घटना आगे बढ़कर अपनी समाप्ति तक पहुँचती है और उसका अवश्यंभावी नतीजा आ जाता है, तब भी परमेश्वर देख रहा होता है कि तुमने पूरी घटना से क्या प्राप्त किया है, तुम अपने मन में क्या सोच रहे हो और तुम क्या हिसाब लगा रहे हो। वह यह अच्छी तरह से देख रहा होता है कि क्या तुम इस घटना से सिर्फ अनुभव प्राप्त करने और सबक सीखने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हो ताकि अपनी रक्षा कर सको—एक खुशामदी होते हुए—या क्या तुम सत्य सिद्धांतों के अनुसार चीजें करते हो और अब उस तरह से उलझन में नहीं हो जैसे पहले थे। परमेश्वर यह भी देखेगा कि इस घटना के प्रति तुम्हारा क्या रवैया है, क्या तुम चुप रहते हो और कोई नजरिया व्यक्त नहीं करते और ऐसी हर चीज से अलग-थलग रहते हो जो तुम्हें व्यक्तिगत रूप से प्रभावित नहीं करती है या क्या इस घटना से सामना करते समय तुममें न सिर्फ शुद्ध समझ की कमी है बल्कि परमेश्वर के बारे में तुम्हारी गलतफहमियाँ और शिकायतें भी ज्यादा गंभीर हो गई हैं और तुमने उसके बारे में और भी ज्यादा धारणाएँ और कल्पनाएँ बना ली हैं, यहाँ तक कि तुम इससे दूर रहने की चाह भी रखने लगे हो। जब सभी प्रकार की घटनाएँ घटती हैं तो विभिन्न प्रकार के लोगों के अलग-अलग विचार और नजरिये होते हैं और परमेश्वर उन सभी को देख रहा और रिकॉर्ड कर रहा होता है। किसी भी वर्ष, किसी भी दिन और किसी भी घंटे, मिनट या सेकंड तुम क्या सोच रहे हो, तुम क्या कह रहे हो, तुम क्या हिसाब लगा रहे हो, तुम क्या योजना बना रहे हो, तुम सत्यों का कौन-सा पहलू समझते हो, जब कोई व्यक्ति सत्य के किसी पहलू के बारे में संगति करता है तो तुम्हारा क्या रवैया होता है, क्या तुम इसका प्रतिरोध करते हो और इससे विमुख होते हो और इसे सुनना नहीं चाहते या अपने भाग निकलने की योजना बनाते हो—परमेश्वर इन सभी चीजों की पड़ताल करता है। कुछ ऐसे लोग भी हैं जिनका कलीसिया में, परमेश्वर के घर में या अपने आस-पास दिखाई देने वाले लोगों, घटनाओं और चीजों के प्रति कभी कोई रवैया नहीं होता है, जो पुतलों की तरह सुन्न और मंदबुद्धि होते हैं। वे बस अपने नजरियों से चिपके रहते हैं, सोचते हैं : “जब तक मैं बुरे कर्म नहीं करता और विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न नहीं करता या दूसरों के बारे में राय नहीं बनाता और मैं किसी व्यक्ति, घटना या चीज से सामना होने पर कोई टिप्पणी नहीं करता या कोई रवैया या नजरिया नहीं रखता और मैं बस एक मशीनी मानव की तरह कार्य करता हूँ और अच्छी तरह से अपना कर्तव्य करता हूँ और नियमों का पालन करते हुए अच्छी तरह से श्रम करता हूँ, तब तक यह पर्याप्त है।” यह भी एक तरह का विचार और नजरिया है। यकीनन परमेश्वर इस तरह के विचार और नजरिये को देखेगा और रिकॉर्ड करेगा। सभी चीजों और घटनाओं पर और लोगों के आस-पास घटित होने वाली हर विशिष्ट चीज पर परमेश्वर की संप्रभुता होने के पीछे का उद्देश्य लोगों के लिए परिवेशों का इंतजाम करना और उन्हें जीती-जागती शिक्षण सामग्री प्रदान करना है ताकि सभी तरह की चीजों का सामना करते समय विभिन्न प्रकार के लोग अपना सबसे सच्चा पक्ष दिखाएँ और अपने सबसे सच्चे विचार और नजरिये, और परमेश्वर और सत्य के प्रति अपना सबसे सच्चा रवैया दिखाएँ। लोगों के ये रवैये पूरी तरह से आजादी और प्रतिबंधों से मुक्ति की स्थिति में अभिव्यक्त होते हैं। परमेश्वर कभी बीच में नहीं आता है, दखल नहीं देता है या हेरा फेरी नहीं करता है, वह बस विभिन्न प्रकार के लोगों को जी भरकर और अपने प्राकृतिक ढर्रे के अनुसार अपने विचारों, नजरियों और रवैयों को व्यक्त करने की अनुमति देता है और अंत में विभिन्न प्रकार के लोगों को उनकी अभिव्यक्तियों के अनुसार बेनकाब करता है और उनके साथ पेश आता है। “विभिन्न प्रकार के लोगों” में कौन शामिल है? परमेश्वर विभिन्न प्रकार के लोगों के लिए क्या व्यवस्थाएँ करता है? परमेश्वर सत्य से प्रेम करने वालों को सत्य प्राप्त करने में सक्षम बनाता है; वह सत्य में दिलचस्पी न रखने वाले लेकिन श्रम करने के इच्छुक लोगों को ऐसा करने पर पूरा ध्यान देने में सक्षम बनाता है; जहाँ तक उन लोगों की बात है जिन्हें सत्य से घिन आती है और जो उससे विमुख हैं, परमेश्वर सत्य से विमुख होने के उनके रवैये को बेनकाब करता है, लेकिन अगर वे सेवा करने पर पूरा ध्यान दे सकते हैं या सेवा करने के लिए उपयुक्त हैं, तो परमेश्वर इन बेहतर लोगों को चुनेगा और उन्हें सेवा करने का हकदार बनाएगा, जबकि अगर वे सेवा करने के लिए उपयुक्त नहीं हैं या वे इस हद तक सत्य से विमुख हैं कि वे विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न कर सकते हैं, तो जब समय और अवसर सही होगा तब परमेश्वर उन्हें बाहर निकाल देगा। परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला यह सारा कार्य लोगों की धारणाओं से मेल नहीं खाता है, है ना? (हाँ।) क्या लोग इस सब में परमेश्वर की सहनशीलता और सुंदरता देख पाते हैं? (इन चीजों से हम देख सकते हैं कि इस व्यावहारिक कार्य के जरिये परमेश्वर लोगों को अनुभव करने की तरफ ले जाता है और इस सारे कार्य के पीछे मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम है।) इस कार्य में परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादे, उसके कार्य की बुद्धिमत्ता और उन मनुष्यों के प्रति उसका जिम्मेदार रवैया है जिन्हें वह बचाना चाहता है। एक दूसरा पहलू यह है कि परमेश्वर की वस्तुएँ और अस्तित्व ऐसी चीजें नहीं हैं जो मनुष्यों के पास हैं। परमेश्वर जो भी चीज करता है उसे वह अत्यधिक कठोरता और गंभीरता से करता है और कभी भी लापरवाह नहीं होता है। विशेष रूप से जब लोगों के सत्य प्राप्त करने के मामले की बात आती है तो वह उसे अत्यधिक कठोरता और गंभीरता से लेता है; लोगों के जीवन और उनके परिणामों की जिम्मेदारी लेने के लिए परमेश्वर को इस तरह से कार्य करना ही चाहिए। यकीनन परमेश्वर के लिए यह ठीक वैसा ही है जैसा उसका सार और उसकी वस्तुएँ और उसका अस्तित्व है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि अपने जीवन के प्रति, अपने परिणाम और गंतव्य के प्रति तुम्हारा क्या रवैया है, चाहे यह गंभीर और कठोर रवैया हो या लापरवाह रवैया हो, कुछ भी हो, परमेश्वर के लिहाज से, चूँकि उसने तुम्हें चुना है और चूँकि वह तुम्हें सत्य प्रदान करता है और तुम्हें बचाना चाहता है, वह हर चीज में तुम्हारे हर शब्द और क्रियाकलाप को और तुम्हारे रवैयों को पूरी तरह से गहराई से समझेगा और अंत में तुम्हारे सभी रवैयों के आधार पर तुम्हारा परिणाम निर्धारित करेगा। और तुम्हारे सभी रवैयों के आधार पर वह यह देखेगा कि अंततः क्या तुम ऐसे व्यक्ति बनोगे जो सत्य प्राप्त करता है और एक ऐसे व्यक्ति बनोगे जो परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और उसके अनुरूप होने में समर्थ होगा। हो सकता है कि तुमने परमेश्वर के लोगों को बचाने के मामले को कभी भी गंभीरता से नहीं लिया हो, इस पर कभी ध्यान से चिंतन नहीं किया हो और यह नहीं जानते हो कि परमेश्वर लोगों को कैसे बचाता है। लेकिन ऐसे सृष्टिकर्ता के रूप में जो सृजित मनुष्यों पर संप्रभु है, वह मनुष्यों की तरह भ्रमित और उलझन में फँसा हुआ नहीं है; वह मानवजाति को बचाने का कार्य गंभीर ढंग से करता है। उसने तुम्हें बनाया और तुम्हें चुना। उसने लोगों से वादा किया कि वह उन्हें पूरी तरह से बचाएगा, इसलिए वह यह कार्य पूरा करेगा और अंत तक जिम्मेदार रहेगा। इसलिए परमेश्वर द्वारा अपने कार्य को पूरा करने और अंत तक जिम्मेदारी लेने में वास्तविक अभिव्यक्तियाँ और वास्तविक कार्य विषय-वस्तु है। परमेश्वर इसी तरह से कार्य करता है और यह उसका ईमानदार और सच्चा रवैया है। परमेश्वर तुम्हारे प्रति लापरवाह नहीं होगा या किसी नारे से तुम्हें टालेगा नहीं और विशेष रूप से परमेश्वर का कार्य लोगों को बचाने के लिए परमेश्वर द्वारा चुकाई जाने वाली वास्तविक कीमत को और लोगों के प्रति उसके जिम्मेदार रवैये को बेहतर ढंग से दर्शाता है।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?