सत्य का अनुसरण कैसे करें (3) भाग एक
सत्य का अनुसरण करने का पहला अभ्यास : त्याग देना
अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को त्याग देना
I. परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग देना : परमेश्वर के कार्य के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग देना
पिछले कुछ समय से हम सत्य के अनुसरण के विषय पर संगति कर रहे हैं। इस विषय की विषयवस्तु काफी व्यापक है, लेकिन विषयवस्तु चाहे कितनी भी व्यापक हो, वह उन कुछ मुद्दों से अलग नहीं की जा सकती जो दैनिक जीवन में लोगों के सामने आते हैं, जो इस बात से संबंधित होते हैं कि वे लोगों और चीजों को किस तरह देखते हैं और कैसे आचरण और कार्य करते हैं, है ना? (हाँ।) ये लोगों के जीवन के वास्तविक मुद्दे हैं। ये लोगों के दैनिक जीवन से अलग नहीं हैं, न ही ये लोगों की सामान्य मानवता से अलग हैं। इन मुद्दों में विभिन्न चीजों के प्रति लोगों के रवैये और विचार और साथ ही वे सभी प्रकार के प्रमुख मामले शामिल हैं जिनका लोग अपने अस्तित्व और अपनी जीवन-यात्रा में सामना करते हैं। हमारी पिछली संगति की विषयवस्तु “सत्य का अनुसरण कैसे करें” में “त्याग देना” के अंतर्गत अभ्यास के एक पहलू से संबंधित थी—अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को त्याग देना। इस अभ्यास में क्या शामिल है? इसमें लोगों और परमेश्वर के बीच का संबंध शामिल है, है ना? (हाँ।) पिछली कुछ संगतियों की विषयवस्तु इस बात से संबंधित थी कि व्यक्ति को परमेश्वर द्वारा अपेक्षित सिद्धांतों और मानकों के अनुसार सभी प्रकार के लोगों और सभी प्रकार की चीजों को कैसे देखना चाहिए और सभी प्रकार के लोगों और सभी प्रकार की चीजों को कैसे सँभालना चाहिए। हमारी पिछली संगति की विषयवस्तु लोगों और परमेश्वर के बीच के रिश्ते से संबंधित थी और उसमें लोगों को बताया गया कि उन्हें उन विभिन्न धारणाओं और कल्पनाओं को कैसे त्याग देना चाहिए जो परमेश्वर के इरादों के अनुरूप नहीं हैं, परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं हैं और सत्य सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हैं। ये वास्तविक समस्याएँ हैं जो परमेश्वर में विश्वास करने की यात्रा और अस्तित्व रखने की प्रक्रिया में लोगों और परमेश्वर के बीच मौजूद रहती हैं। हमने “अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को त्याग देना” के इस बड़े विषय को चार पहलुओं में विभाजित किया था : पहला है धारणाएँ और कल्पनाएँ, दूसरा है अनुचित माँगें, तीसरा है सतर्कता और संदेह, और चौथा है जाँच-पड़ताल और ताक-झाँक। हमने अपनी संगति धारणाओं और कल्पनाओं से शुरू की। धारणाओं और कल्पनाओं के अंतर्गत पहला बिंदु परमेश्वर के कार्य से संबंधित है—अर्थात, परमेश्वर के कार्य के बारे में लोगों की क्या धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं। हमने इस पर कुछ संगति की। इस बिंदु पर हमारी संगति इस बात से संबंधित थी कि लोग परमेश्वर के कार्य को किस प्रकार देखते हैं और परमेश्वर के कार्य के बारे में लोगों के ज्ञान और विचारों में क्या विचलन, धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं; ये धारणाएँ और कल्पनाएँ ऐसी चीजें हैं जिन्हें लोगों को त्याग देना चाहिए। अगर लोग इन धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग दें और सत्य खोजें तो वे परमेश्वर के कार्य को जानने में समर्थ होंगे और उन्हें परमेश्वर के वचनों की शुद्ध समझ होगी। जब परमेश्वर का कार्य लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं के अनुरूप नहीं होता तो उन्हें आत्म-चिंतन करना चाहिए और स्वयं को जानने का प्रयास करना चाहिए, और उन्हें अपनी धारणाएँ और कल्पनाएँ भी त्याग देनी चाहिए, बजाय इसके कि वे यह आकलन करने के लिए उन पर निर्भर रहें कि परमेश्वर का कार्य कैसा होना चाहिए या परमेश्वर अपने कार्य से लोगों पर क्या प्रभाव हासिल करना चाहता है। परमेश्वर के कार्य के बारे में लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ उनके जीवन प्रवेश और परमेश्वर के प्रति उनके रवैये पर सीधा प्रभाव डालती हैं, इसलिए ये धारणाएँ और कल्पनाएँ भी ऐसी चीजें हैं जिन्हें लोगों को त्याग देना चाहिए। उदाहरण के लिए, हमने संगति की कि परमेश्वर लोगों की अंतर्निहित काबिलियत, व्यक्तित्व, सहज प्रवृत्तियाँ आदि नहीं बदलता, लोगों के जन्मजात गुण और उनकी देह की सहज प्रवृत्तियाँ परमेश्वर के कार्य के लक्ष्य नहीं हैं, और उसका कार्य लोगों के भ्रष्ट स्वभावों और लोगों के भीतर की उन चीजों को लक्षित करता है जो परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करती हैं और परमेश्वर के साथ असंगत हैं। अगर लोग कल्पना करते हैं कि परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य उनकी काबिलियत, उनकी सहज प्रवृत्तियाँ, यहाँ तक कि उनका व्यक्तित्व, आदतें, जीने के ढर्रे आदि बदलना है तो दैनिक जीवन में उनके अभ्यास का हर एक पहलू उनकी धारणाओं और कल्पनाओं से प्रभावित और नियंत्रित होगा, और अनिवार्य रूप से कई विकृत अंश या चरम चीजें होंगी। ये विकृत अंश और चरम चीजें सत्य सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हैं और वे लोगों को सामान्य मानवता के जमीर और विवेक से भटका देंगी और सामान्य मानवता के पथ से अलग कर देंगी। उदाहरण के लिए, मान लो अपनी धारणाओं और कल्पनाओं में तुम मानते हो कि परमेश्वर लोगों की काबिलियत, क्षमताएँ, यहाँ तक कि उनकी सहज प्रवृत्तियाँ भी, बदलना चाहता है; अगर तुम सोचते हो कि ये वे चीजें हैं जिन्हें परमेश्वर बदलना चाहता है तो तुम्हारे अनुसरण किस तरह के होंगे? तुम्हारे अनुसरण विकृत और जुनूनी होंगे—तुम श्रेष्ठ काबिलियत का अनुसरण करना चाहोगे और विभिन्न प्रकार के कौशल सीखने और विभिन्न प्रकार के ज्ञान में निपुणता प्राप्त करने पर ध्यान केंद्रित करोगे ताकि तुम्हें श्रेष्ठ काबिलियत और श्रेष्ठ क्षमताएँ, श्रेष्ठ अंतर्दृष्टि और आत्म-विकास प्राप्त हो जाएँ, यहाँ तक कि कुछ ऐसी क्षमताएँ भी प्राप्त हो जाएँ जो सामान्य लोगों से श्रेष्ठ हों—इस प्रकार तुम बाहरी क्षमताओं और प्रतिभाओं पर ध्यान दोगे। तो फिर ऐसे अनुसरणों के लोगों पर क्या परिणाम होते हैं? वे न केवल सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलने में असफल होंगे, बल्कि उसके बजाय वे फरीसियों का मार्ग अपनाएँगे। वे आपस में प्रतिस्पर्धा करेंगे कि किसकी काबिलियत श्रेष्ठ है, किसमें श्रेष्ठ गुण हैं, किसका ज्ञान श्रेष्ठ है, किसकी क्षमताएँ अधिक हैं, किसमें अधिक विशेष कौशल हैं, लोगों के बीच किसकी प्रतिष्ठा अधिक है और लोग किसका आदर-सम्मान करते हैं। इस प्रकार, वे न केवल सत्य का अभ्यास करने और सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने में असमर्थ होंगे, बल्कि वे सत्य से दूर ले जाने वाले मार्ग पर चल पड़ेंगे।
च. परमेश्वर का कार्य लोगों की जन्मजात स्थितियों को नहीं बदलता, बल्कि इसका लक्ष्य उनके भ्रष्ट स्वभावों को बदलना है
1. परमेश्वर का कार्य लोगों की जन्मजात स्थितियों को नहीं बदलता
परमेश्वर का कार्य लोगों के भ्रष्ट स्वभावों और सत्य का उल्लंघन करने वाले उनके विभिन्न भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों को उनकी सामान्य मानवता के दायरे में रूपांतरित करना है, ताकि उनके जमीर और विवेक बहाल किए जा सकें और इष्टतम बनाए जा सकें। दूसरे शब्दों में, जितना अधिक तुम सत्य समझोगे, उतने ही अधिक तुम्हारे जमीर और विवेक सामान्य हो जाएँगे और वे एक लाभकारी दिशा में विकसित भी होते रहेंगे; यह बिल्कुल भी अलौकिक नहीं है। इस “सामान्य” शब्द से मेरा क्या तात्पर्य है? अगर लोगों में जमीर की जागरूकता और न्याय की भावना हो तो वे दयालु बनेंगे—मनुष्य के शब्दों में कहें तो, वे समझदार, सत्यनिष्ठ, तर्कसंगत होंगे और हठी या विकृतियों की ओर प्रवृत्त नहीं होंगे। यही वह प्रभाव है जिसे परमेश्वर लोगों की मानवता के संबंध में प्राप्त करना चाहता है। जैसे-जैसे लोग अधिकाधिक सत्य समझते हैं, उसका एक आकस्मिक प्रभाव यह होता है कि उनकी मानवता अधिकाधिक सामान्य होती जाती है। लेकिन अगर लोग अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार अनुसरण करते हैं तो ये धारणाएँ और कल्पनाएँ उनके अनुसरणों पर बहुत अधिक नकारात्मक प्रभाव डालेंगी और उनका नकारात्मक मार्गदर्शन करेंगी और उन्हें तमाम तरह के विकृत, हठपूर्वक अनुसरण किए जाने वाले, चरम और भ्रामक मार्गों पर ले जाएँगी। उदाहरण के लिए, अपनी धारणाओं और कल्पनाओं में लोग मानते हैं कि परमेश्वर का कार्य लोगों की मानवता को उन्नत करना और लोगों को इंसानी प्रवृत्तियों, इंसानी काबिलियत, यहाँ तक कि इंसान की आयु और लिंग से भी ऊपर उठने में समर्थ बनाना है। जब लोगों में ऐसी धारणाएँ होती हैं तो वे इस दिशा में अनुसरण करेंगे, प्रयास करेंगे और टटोलेंगे। तब वे किन चीजों पर ध्यान केंद्रित करेंगे? एक ओर वे ज्ञान, योग्यताओं, कौशलों, गुणों और प्रतिभाओं पर ध्यान केंद्रित करेंगे; दूसरी ओर वे अलौकिकता पर ध्यान केंद्रित करेंगे। क्या तुम लोग जानते हो कि अलौकिकता की क्या अभिव्यक्तियाँ होती हैं? (क्या इसका मतलब यह है कि कुछ चीजों में लोग बिना कोई कीमत चुकाए सीधे गुणात्मक बदलावों से गुजरेंगे?) यह ऐसा है जैसे कोई व्यक्ति आम तौर पर परमेश्वर के वचन न पढ़ता हो लेकिन उसके साथ कुछ हो जाए और परमेश्वर के वचन अचानक उसके मन में प्रकट हो जाएँ, या जैसे कोई व्यक्ति कभी गाने या नाचने में समर्थ न रहा हो लेकिन प्रेरित किए जाने के बाद वह अचानक गा और नाच सकता हो, और बहुत अच्छा नाच सकता हो, या जैसे किसी ने कभी कोई विदेशी भाषा नहीं सीखी हो लेकिन अचानक वह कोई विदेशी भाषा बोल सकता हो। क्या ये चीजें अलौकिक हैं? (हाँ।) उदाहरण के लिए, मान लो तुम्हें किसी जरूरी मामले में बाहर जाना है लेकिन तुम गाड़ी चलाना नहीं जानते और हताशा में तुम प्रार्थना करते हो, और तुरंत पूरी तरह से उत्साहित महसूस करते हो और अचानक तुम्हें गाड़ी चलाना आ जाता है, यहाँ तक कि तुम एक अनुभवी ड्राइवर की तरह स्थिरता से गाड़ी चलाते हो। कोई तुमसे पूछता है, “तुम इतनी अच्छी तरह गाड़ी कैसे चला लेते हो?” तुम कहते हो, “मुझे भी नहीं पता। यह सब परमेश्वर का किया हुआ है; मैं पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित था। देखो, मेरे ये हाथ अब मेरे अपने हाथ नहीं हैं; इन्हें पवित्र आत्मा थामे हुए है!” वास्तव में पवित्र आत्मा ऐसा नहीं कर रहा है; बल्कि एक अलग तरह की आत्मा तुममें प्रवेश कर गई है और तुम्हें नियंत्रित कर रही है, जिससे तुम एक अलग व्यक्ति बन गए हो और खुद को नियंत्रित नहीं कर सकते। क्या यह अपनी अंतर्निहित क्षमताओं से परे जाना नहीं है? यह अलौकिक है, है ना? (हाँ।) अलौकिक का क्या अर्थ है? क्या यह एक अच्छी परिघटना है? (नहीं, यह व्यक्ति को असामान्य बनाती है।) अगर तुम बिना कुछ समय तक अध्ययन किए या बिना किसी विशेषज्ञ के मार्गदर्शन के अचानक कोई भाषा जान लेते हो, कोई कौशल प्राप्त कर लेते हो या कोई ज्ञान समझ लेते हो तो यह अलौकिक है। अगर किसी व्यक्ति का जीवन स्वभाव सत्य का अनुसरण, खोज, प्रतीक्षा या चीजों का अनुभव करने की जरूरत पड़े बिना ही बदल गया है तो क्या यह एक भयानक बात नहीं है? (हाँ, है।) अगर तुम्हारे मन और अवचेतन में अभी भी कई धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं तो तुम्हें उन्हें त्याग देना चाहिए और उनका अनुसरण नहीं करना चाहिए, क्योंकि वे परमेश्वर के कार्य का सच्चा ज्ञान नहीं हैं और वे परमेश्वर के कार्य के तरीकों और सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हैं। परमेश्वर का कार्य तुम्हारी सामान्य मानवता से कतई परे नहीं जाएगा और तुममें परमेश्वर के कार्य द्वारा प्राप्त प्रभाव तुम्हारी सामान्य मानवता को एक उन्नत, अलौकिक मानवता में रूपांतरित करने वाला बिल्कुल नहीं है। इसके अलावा, परमेश्वर तुम्हें सामान्य व्यक्ति से असामान्य व्यक्ति में रूपांतरित नहीं करेगा। मान लो, परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने की प्रक्रिया में तुम्हारा जमीर उत्तरोत्तर संवेदनशील होता जाता है और तुममें शर्म की अधिक भावना विकसित होती है। तुम दयालु बनते हो, परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होने में समर्थ होते हो और कलीसिया के कार्य और परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करने में समर्थ होते हो। इसके अलावा, तुम्हारे शब्द और कार्य तुम्हारे जमीर और विवेक के विरुद्ध नहीं जाते, तुम धीरे-धीरे सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने में समर्थ हो जाते हो और परमेश्वर के वचनों के आधार पर सभी प्रकार के लोगों, घटनाओं और चीजों को पहचान सकते हो। यह साबित करता है कि परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम जिस मार्ग पर चल रहे हो, वह सही है। लेकिन मान लो, तुम अभी भी प्रार्थना करते समय कोई आवाज सुनने पर ध्यान केंद्रित करते हो और परमेश्वर से खोज और विनती करते समय किसी प्रेरणा, प्रकाश की चमक या अलौकिक प्रकाशन की प्रतीक्षा करते हो। इसके अलावा, तुम्हारे जमीर और विवेक किसी भी तरह से बहाल या सही नहीं किए गए हैं और तुममें न्याय की भावना नहीं आई है या तुमने परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं किया है। यह साबित करता है कि तुम्हारे अनुसरण में और जिस मार्ग पर तुम चल रहे हो उसमें समस्याएँ हैं और यह भी कहा जा सकता है कि तुम सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर बिल्कुल भी नहीं चले हो। तुम अक्सर अवचेतन रूप से एक अलौकिक व्यक्ति बनने की कोशिश भी करते हो और अक्सर महसूस करते हो कि तुम्हें देह से ऊपर उठना चाहिए—अगर तुम खाना न खाओ तो भी भूख न लगे और अगर तुम कई दिनों तक सोओ नहीं या आराम न करो तो भी थकान या नींद नहीं आए—और जिन चीजों को तुम नहीं समझते या जिन्हें तुमने अपना कर्तव्य निभाने की प्रक्रिया में नहीं सीखा है, उनकी तत्काल आवश्यकता पड़ने पर तुम उन्हें अचानक समझने और उन पर महारत हासिल करने की कोशिश करते हो। अलौकिक चीजों के बारे में ये सभी कल्पनाएँ इंसानी धारणाओं और कल्पनाओं से आती हैं। चूँकि लोगों ने परमेश्वर के कार्य का अनुभव नहीं किया है, इसलिए वे स्वाभाविक रूप से उसके कार्य के बारे में कल्पनाओं से भरे होते हैं। वास्तव में, परमेश्वर का कार्य सबसे वास्तविक और व्यावहारिक चीज है। परमेश्वर कभी लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार कार्य नहीं करता; वह लोगों पर इस प्रकार का कार्य कभी नहीं करता। वह केवल बहुत ही विशेष परिस्थितियों में और बहुत कम लोगों पर थोड़ा-बहुत अलौकिक कार्य करता है, लेकिन यह कार्य महज अस्थायी और विशेष परिस्थितियों में ही आवश्यक होता है—यह कार्य करने का वह तरीका नहीं है जो परमेश्वर के उद्धार के अंतर्गत लोगों में अक्सर प्रकट होता है। अपने प्रबंधन कार्य में परमेश्वर लोगों को बचाना चाहता है, उन्हें अपने भ्रष्ट स्वभाव त्यागने और उद्धार प्राप्त करने में समर्थ बनाना चाहता है, और परमेश्वर जिस मूल तरीके से कार्य करता है वह लोगों को सत्य प्रदान करना है, ताकि वे सत्य समझने के बाद सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास कर सकें। इसलिए, चाहे तुम्हारे मन और अवचेतन में कोई भी धारणाएँ या कल्पनाएँ हों, चाहे तुम्हारी धारणाएँ और कल्पनाएँ कितनी भी तर्कसम्मत हों या वे तुम्हारी आध्यात्मिक आवश्यकताएँ कितनी भी पूरी करती हों—चाहे कारण कुछ भी हों, वे हमेशा धारणाएँ और कल्पनाएँ ही रहेंगी और तुम्हें उन्हें त्याग देना चाहिए और उनसे चिपके नहीं रहना चाहिए। चाहे परमेश्वर का कार्य किसी भी सीमा तक किया जाए और चाहे वह कितने भी लंबे समय तक चले, लोग हमेशा लोग ही रहेंगे और कभी स्वर्गदूत नहीं बनेंगे। अगर तुम सफेद बालों, सफेद रंग से पुते हुए चेहरे, सफेद कमीज और सफेद पैंट के साथ सिर से पाँव तक सफेद हो जाओ और चाहे तुम दो पंख लगा लो, तो भी तुम देवदूत नहीं बन सकते—लोग हमेशा लोग ही रहेंगे। इसके अलावा, यहाँ “लोग” से तात्पर्य सामान्य मानवता के जमीर और विवेक वाले लोगों से है, असाधारण लोगों से नहीं, और असामान्य लोगों से तो बिल्कुल भी नहीं। ये लोग बिल्कुल भी अलौकिक नहीं होते, लेकिन वे परमेश्वर में विश्वास न करने वाले उन गैर-विश्वासियों से इस मायने में स्पष्ट रूप से भिन्न होते हैं कि वे बुराई नहीं करते, सत्य समझने के बाद उसे अभ्यास में ला सकते हैं और यह समझते हैं कि लोगों और चीजों को कैसे देखना है, और वे परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर की अपेक्षाओं और सत्य सिद्धांतों के आधार पर आचरण और कार्य करते हैं, बजाय इसके कि वे अपने भ्रष्ट स्वभावों और शैतान द्वारा लोगों में डाले जाने वाले विभिन्न विचारों और दृष्टिकोणों के अनुसार जिएँ। परमेश्वर में विश्वास करने की प्रक्रिया में लोगों ने अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार चाहे कितने भी लंबे समय तक अनुसरण किया हो, और चाहे उन्हें कितना भी लगे कि उन्होंने कितना कुछ प्राप्त कर लिया है, परमेश्वर की नजर में इसका कोई महत्व नहीं है और परमेश्वर इसमें से कुछ भी याद नहीं रखता। जब मैं यह कहता हूँ तो मैं किसकी ओर संकेत कर रहा हूँ? यानी कि अगर तुम अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर अपनी देह की तमाम विभिन्न सामान्य आवश्यकताएँ नियंत्रित करते हो या अपनी सहज प्रवृत्तियाँ, काबिलियत, क्षमताएँ, व्यक्तित्व, जीने के पैटर्न और जीने की आदतें बदलने की भरसक कोशिश करते हो, तो चाहे तुम इन चीजों को नियंत्रित करने और बदलने की कितनी भी भरसक कोशिश करो, भले ही तुम कुछ परिणाम प्राप्त करने में समर्थ हो, इसका मतलब यह नहीं कि तुम सत्य के अभ्यास के मार्ग पर पहले ही कुछ प्राप्त कर चुके हो, और इससे भी बढ़कर, इसका मतलब यह नहीं कि तुम पहले से ही सत्य का अनुसरण करने वाले व्यक्ति हो—परमेश्वर इन चीजों का अनुमोदन नहीं करता। क्या तुम समझ गए? (हाँ।)
हालाँकि लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ अदृश्य होती हैं और बाहरी तौर पर लोगों को कुछ कहने या करने या किसी भी तरह के मार्ग पर चलने के लिए बाध्य नहीं करतीं, फिर भी वे लोगों के हृदय की गहराई में और उनके अवचेतन में, उनके विचारों और अंतर्मन को कसकर नियंत्रित करती हैं। ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है क्योंकि लोग जिन चीजों से प्रेम करते हैं और जिनका अनुसरण करते हैं, वे उनकी धारणाओं और कल्पनाओं से पूरी तरह मेल खाती हैं और ये चीजें मानव-देह की जरूरतें भी पूरी करती हैं और सभी प्रकार की इंसानी इच्छाएँ और जिज्ञासाएँ संतुष्ट करती हैं। उदाहरण के लिए, अपनी धारणाओं और कल्पनाओं में लोग मानते हैं कि परमेश्वर का कार्य उन्हें असाधारण प्राणियों में रूपांतरित करने का इरादा रखता है जो साधारण लोगों से भिन्न होते हैं और पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित किए जाने पर वे कई भाषाएँ बोलने में समर्थ होंगे। यह स्पष्ट रूप से लोगों की आंतरिक क्षमताओं और सामान्य मानवता के दायरे से परे है, लेकिन बहुत हद तक यह उनके मिथ्याभिमान, जिज्ञासा और प्रतिस्पर्धा को संतुष्ट करता है। दूसरे शब्दों में, सत्य प्राप्त करने से पहले लोग कुछ अलौकिक चीजें पसंद करते हैं और ये चीजें उन्हें साधारण लोगों से महत्वपूर्ण, श्रेष्ठ और अलग महसूस कराती हैं—यही वह चीज है जिसे भ्रष्ट मानवजाति चाहती है और जिसकी चाहत रखती है। हर कोई मानवजाति में सबसे श्रेष्ठ दिखना, बाकी सबसे अलग दिखना, अनोखा और अद्वितीय होना और दूसरों द्वारा आदर और सराहना पाना चाहता है। उदाहरण के लिए, भ्रष्ट मानवजाति में एक चलन है कि अगर किसी चीज का सिर्फ एक ही नग बनता है तो जो लोग धनी और प्रतिष्ठित होते हैं, वे बेताब होकर उसे खरीदने के लिए होड़ लगा देते हैं। वे ऐसा किस हद तक करेंगे? इस हद तक कि वह वस्तु अपनी मूल कीमत से कई गुना, यहाँ तक कि दस गुना से भी ज्यादा कीमत पर बिकने लगती है। जो व्यक्ति इसे खरीदने में कामयाब रहता है वह सोचता है, “देखो, मैंने यह चीज झपट ली, जो दुनिया में इकलौती है। मैं सचमुच बहुत शक्तिशाली हूँ, है ना? मैं दूसरों से बेहतर हूँ, है ना? दूसरा कोई भी मेरे जितना सक्षम नहीं है!” अपने मन में वह स्वयं से प्रसन्न होता है और सोचता है कि वह खास, असाधारण और बेहद सक्षम है। यह कैसा स्वभाव है? (अहंकार।) यह अहंकारी स्वभाव के कारण होता है। कुछ लोग दूसरे व्यक्ति के जैसे कपड़े पहनने पर असहज महसूस करते हैं। अगर वे कोई ऐसा कपड़ा पहनते हैं जिसे दूसरे लोग नहीं खरीद सकते और जिसे उन्होंने पहले कभी नहीं देखा होता और जिसे देखने वाला हर व्यक्ति ईर्ष्यालु हो जाता है, तो उन्हें कैसा लगता है? (वे स्वयं पर प्रसन्न होते हैं।) वे स्वयं पर प्रसन्न होते हैं, और वे सोचते हैं कि उन जैसा दूसरा कोई नहीं है और वे बाकी सबसे श्रेष्ठ हैं। यह कैसा स्वभाव है? (अहंकार।) यह भी अहंकारी स्वभाव के कारण होता है। देखो, लगभग 100% लोगों की यही मानसिकता होती है : अगर उन्होंने किसी तकनीकी या पेशेवर कौशल में महारत हासिल कर ली होती है तो वे सोचते हैं कि वे दूसरों से बेहतर हैं और कोई भी उतना अच्छा नहीं है जितने वे हैं। अगर कोई और भी उसी तकनीकी या पेशेवर कौशल में महारत हासिल कर लेता है तो वे उस व्यक्ति से ईर्ष्या करेंगे और बेताबी से चाहेंगे कि कोई भी उनकी बराबरी न कर सके। उनकी ऐसी मानसिकता क्यों होती है? (वे ऐसा बनना चाहते हैं जैसा कोई और नहीं है।) अगर वे अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जो इस पेशेवर कौशल में निपुण हैं तो वे अपने समूह के औसत व्यक्ति से श्रेष्ठ हैं। चूँकि उन्हें इस तकनीकी या पेशेवर कौशल का ज्ञान है, इसलिए वे डरते हैं कि दूसरे लोग इसे उनसे सीख लेंगे। अगर दूसरे उनसे मदद माँगें तो क्या वे उन्हें सिखाएँगे? (नहीं, वे नहीं सिखाएँगे।) वे तुम्हें सिर्फ कुछ साधारण चीजें ही सिखाएँगे; जहाँ तक सबसे महत्वपूर्ण और जरूरी चीजों का सवाल है, वे उन्हें किसी को नहीं सिखाएँगे और वे तुम्हें उन्हें खुद समझने के लिए छोड़ देंगे। वे असल में क्या सोच रहे होते हैं? “अगर मैं इसे तुम्हें सिखा दूँ तो मैं अलग कैसे दिखूँगा? अगर हर कोई इसे कर सके तो क्या मैं एक आम आदमी नहीं बन जाऊँगा? अगर तुम लोगों में से कोई इसे करना नहीं जानता तो मैं यहाँ सबसे श्रेष्ठ व्यक्ति हूँ और तुम सभी लोगों को मेरी चापलूसी करनी होगी—इस तरह मैं महत्वपूर्ण महसूस करूँगा, है ना? क्या मैं तुम लोगों में से सबसे ऊँचे रुतबे वाला और सबसे सक्षम व्यक्ति नहीं हूँ? मैं तुम लोगों में से सबसे श्रेष्ठ हूँ, है ना?” चूँकि उन्हें किसी पेशेवर या तकनीकी कौशल का कुछ ज्ञान है, इसलिए वे इस बात से बहुत डरते हैं कि दूसरे लोग उनसे इसे सीख लेंगे, और वे नहीं चाहते कि दूसरे उन जैसे बनें। अगर किसी के पास उनके जैसा पेशेवर या तकनीकी कौशल या विशेषता है तो वे परेशान हो जाएँगे, इसलिए वे दूसरों से आगे निकलने के लिए कुछ न कुछ सीखने के तरीके सोचते रहते हैं। वे दूसरों से श्रेष्ठ होना चाहते हैं और महत्वपूर्ण महसूस करने के लिए हमेशा दूसरों से आगे निकलना चाहते हैं। क्या यह सही अनुसरण है? (नहीं।) ठीक इसीलिए कि भ्रष्ट मनुष्यों में ऐसी लालसाएँ और अनुसरण होते हैं, वे स्वाभाविक रूप से परमेश्वर के कार्य के बारे में तरह-तरह की धारणाएँ और कल्पनाएँ विकसित कर लेते हैं और दूसरों से श्रेष्ठ बनने, रुतबा और प्रतिष्ठा पाने, महत्वपूर्ण महसूस करने, ऐसा बनने जैसा कोई और न हो, यहाँ तक कि दूसरों की नजर में अतिमानव या असाधारण व्यक्ति बनने की कोशिश करते हैं। इसलिए लोगों को परमेश्वर के कार्य के बारे में ये धारणाएँ और कल्पनाएँ त्याग देनी चाहिए। विशिष्ट रूप से बात करें तो इसका अभ्यास कैसे किया जाना चाहिए? श्रेष्ठ गुणों या प्रतिभाओं के पीछे मत भागो और अपनी काबिलियत या मूल-प्रवृत्तियों को बदलने का प्रयास मत करो, बल्कि अपनी अंतर्निहित स्थितियों—जैसे कि काबिलियत, क्षमताओं और मूल-प्रवृत्तियों—के तहत परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अपना कर्तव्य निभाओ और हर चीज परमेश्वर की माँग के अनुसार करो। परमेश्वर ऐसी किसी चीज की माँग नहीं करता है जो तुम्हारी क्षमताओं या काबिलियत से परे हो—तुम्हें भी अपने लिए चीजें कठिन नहीं बनानी चाहिए। अगर तुम जो समझते हो और जो प्राप्त कर सकते हो उसके आधार पर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करते हो और तुम्हारी खुद की स्थितियाँ जिसकी अनुमति देती हैं उसी के अनुसार तुम अभ्यास करते हो, तो यह ठीक है। उदाहरण के लिए, अगर तुम्हारी काबिलियत और प्रतिभा तुम्हें केवल टीम अगुआ की भूमिका के लिए उपयुक्त बनाती है तो टीम अगुआ के रूप में अच्छा काम करो, इस भूमिका के दायरे में आने वाले सभी कार्यों और पेशेवर कौशलों को व्यवस्थित करो, उन्हें एक-एक करके निपटाओ, और उन तरीकों और सिद्धांतों के अनुसार उन्हें लागू करो जो परमेश्वर ने तुम्हें सिखाए हैं—इस तरह तुम परमेश्वर को संतुष्ट कर पाओगे। मान लो तुम अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार चलते हो और सोचते हो, “चूँकि मैं टीम अगुआ बनने में सक्षम हूँ, इसलिए अगर मैं बेहतर करने के लिए और अधिक प्रयास करता हूँ, थोड़ी कठिनाई सहता हूँ और थोड़ी कीमत चुकाता हूँ और पवित्र आत्मा मुझ पर महान कार्य करता है, तो क्या मैं एक कलीसिया का अगुआ या निर्णय लेने वाले समूह का अगुआ नहीं बन पाऊँगा? लोग सोच सकते हैं कि मुझमें यह क्षमता नहीं है, लेकिन मैं परमेश्वर से विनती करूँगा—परमेश्वर के लिए कुछ भी हासिल करना मुश्किल नहीं है! मैं टीम अगुआ नहीं बनना चाहता। मैं परमेश्वर से प्रार्थना करूँगा, उससे कहूँगा कि वह मुझे इससे बड़ा काम करने दे, मुझे अगुआ या कार्यकर्ता बनने दे।” क्या ऐसा अनुसरण सही है? (नहीं, यह गलत है।) तुम इसे गलत क्यों कहते हो? (ऐसे लोग हमेशा ऐसी चीजें करना चाहते हैं जो उनकी काबिलियत और योग्यताओं से परे हैं और वे अपनी काबिलियत और प्रतिभा के आधार पर अपना काम करने में, अपने उचित स्थान पर बने रहने में समर्थ नहीं होते।) हमेशा अतिमानव बनने की चाहत रखना उचित नहीं; यह वह नहीं है जिसका एक सामान्य व्यक्ति को अनुसरण करना चाहिए।
कुछ लोग अक्सर कहते हैं, “परमेश्वर के लिए कुछ भी कठिन नहीं है”; यह कथन एक तथ्य है और हर कोई इसे समझ सकता है। लेकिन कुछ लोगों की समझ विकृत होती है, वे मानते हैं कि लोगों के लिए जो कुछ भी करना असंभव है, उसे परमेश्वर प्रार्थना करने भर से उनके लिए कर सकता है और परमेश्वर पर इस तरह भरोसा करके लोग अपनी सहज प्रवृत्तियों से परे जा सकते हैं और अतिमानव बन सकते हैं। क्या वास्तव में ऐसा है? (ऐसा नहीं है।) “परमेश्वर के लिए कुछ भी कठिन नहीं है” यह कथन स्पष्ट रूप से परमेश्वर के सामर्थ्य और उसके सार, परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और सभी चीजों पर परमेश्वर की संप्रभुता को संदर्भित करता है—ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे परमेश्वर न कर सके। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि लोगों को सामान्य मानवता से परे जाकर अलौकिक बनना चाहिए; परमेश्वर चाहे कितना भी सर्वशक्तिमान हो, वह लोगों पर जो कार्य करता है वह उनकी सामान्य मानवता पर आधारित होता है और सामान्य मानवता के दायरे में किया जाता है। परमेश्वर सभी चीजों का आयोजन और संचालन करता है, वह लोगों, घटनाओं और चीजों का संचालन करता है, ताकि वे उसके द्वारा तमाम तरह की चीजें संपन्न किए जाने के लिए सेवा करें, वे तथ्य पूरे करें जिन्हें वह संपन्न करने वाला है। जिस अवधि में परमेश्वर तमाम तरह की चीजें संपन्न करता है, उसमें लोग अभी भी सामान्य मानवता में होते हैं—उनका कुछ भी नहीं बदलता और वे अभी भी मनुष्य होते हैं। परमेश्वर चाहे कितना भी सर्वशक्तिमान हो और किसी चीज पर संप्रभुता का प्रयोग करने या कुछ संपन्न करने के लिए परमेश्वर चाहे कोई भी तरीका अपनाए, सृजित मनुष्य हमेशा सृजित मनुष्य ही रहते हैं; वे अभी भी सामान्य मानवता में रहते हैं और किसी भी तरह से अलौकिक नहीं होते। क्या तुम सभी लोग कहोगे कि ये तथ्य हैं? (हाँ।) “अलौकिक नहीं होने” का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि जब परमेश्वर लोगों, घटनाओं और चीजों का आयोजन करता है तो लोग अनिवार्य रूप से परमेश्वर के आयोजन के अधीन जीते हैं, जीवित बचे रहते हैं, हर चीज करते हैं और वर्तमान क्षण में जीते हैं। लेकिन जब तुम वर्तमान क्षण में जीते हो तो क्या तुम्हारी चेतना धुँधली होती है? (नहीं।) तुम अब भी स्पष्ट सोच रखते हो। तो क्या तुम्हारी काबिलियत में तुरंत सुधार हो गया है या बदलाव आ गया है? (नहीं।) यह वैसी ही रहती है जैसी मूल रूप में थी। तो क्या तुम्हारी सहज प्रवृत्तियाँ तुरंत बदल गई हैं? नहीं, वे भी नहीं बदली हैं। परमेश्वर की संप्रभुता, आयोजनों और व्यवस्थाओं के तहत, चाहे तुम कितनी भी चीजों का अनुभव करो, तुम्हारे व्यक्तित्व, आदतों, जीने के ढर्रों और तुम्हारी सामान्य मानवता की काबिलियत, योग्यताओं और विभिन्न कार्यों में जरा भी परिवर्तन नहीं होता। बात बस इतनी है कि जब लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हैं तो वे अपने-अपने परिवेश में तमाम तरह की चीजों और लोगों का अनुभव करते हैं, जिसका अंतिम परिणाम यह होता है कि परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने की प्रक्रिया में उन्हें अंतर्दृष्टि प्राप्त होती है और वे कुछ सबक सीखते हैं। अगर वे सत्य का अनुसरण करने वाले लोग हैं तो वे सत्य के संदर्भ में और परमेश्वर को जानने के संदर्भ में फल प्राप्त करने में समर्थ होते हैं। परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने की प्रक्रिया में लोगों की सोच सामान्य होती है, उनकी चेतना धुँधली नहीं होती और उनकी काबिलियत, योग्यताएँ और सहज प्रवृत्तियाँ बिना किसी बदलाव के वैसी ही रहती हैं जैसी वे मूल रूप में थीं। इसलिए, “परमेश्वर के लिए कुछ भी कठिन नहीं है” यह कथन परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और सभी चीजों के परमेश्वर के आयोजन को संदर्भित करता है। इसका अर्थ लोगों को अलौकिक बनाना या सृजित मनुष्यों का सार बदलना नहीं है। परमेश्वर लोगों का सार नहीं बदलता; मनुष्य अभी भी मनुष्य ही रहते हैं, और चाहे तुम पुरुष हो या स्त्री, इस संबंध में कोई बदलाव नहीं होता। परमेश्वर हर चीज का आयोजन करता है, और परमेश्वर सर्वशक्तिमान है; जो परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है वह यही है, और यही है जो परमेश्वर रखता है। “परमेश्वर के लिए कुछ भी कठिन नहीं है” का अर्थ यह नहीं कि लोग अलौकिक हो गए हैं, न ही इसका अर्थ यह है कि लोग सर्वशक्तिमान हैं। भले ही कुछ व्यक्ति कभी-कभी कुछ ऐसी चीजें हासिल कर लेते हों जो उनकी काबिलियत या उनकी शारीरिक सहज प्रवृत्ति से परे होती हैं, लेकिन यह पवित्र आत्मा का कार्य होता है। यह परमेश्वर ही है जिसने उन्हें यह गुण प्रदान किया है; ऐसा नहीं है कि वे इस क्षमता के साथ पैदा हुए थे। ऐसा इसलिए है क्योंकि सृजित मनुष्यों में वह सब बदलने की क्षमता नहीं है जो परमेश्वर ने नियत किया है। मैं इंसानी सहज प्रवृत्ति के मामले में एक सरल उदाहरण दूँगा। उदाहरण के लिए, जब लोग कोई डरावनी आवाज सुनते हैं तो वे भयभीत हो जाते हैं और सहज रूप से दुबक जाते हैं। चाहे तुम्हारी उम्र कितनी भी हो, तुम बचपन से ऐसे ही रहे हो और मृत्यु तक ऐसे ही रहोगे—यह सहज प्रवृत्ति है। “सहज प्रवृत्ति” का क्या अर्थ है? यह भौतिक शरीर का एक अंतर्निहित कार्य है और यह कभी नहीं बदलेगा। केवल अंतर्निहित सहज प्रवृत्तियाँ होने से ही सामान्य व्यक्ति सामान्य मानवता का जीवन और अस्तित्व बनाए रख सकता है, इसलिए मनुष्य की सहज प्रवृत्तियाँ ऐसी चीज नहीं हैं जिन्हें परमेश्वर बदलने का इरादा रखता है। क्या तुम इसे समझ गए? (हाँ।) “परमेश्वर सर्वशक्तिमान है” का क्या अर्थ है? (इसका अर्थ है परमेश्वर का अधिकार और उसकी सर्वशक्तिमत्ता।) क्या इसका लोगों से कोई लेना-देना है? (इसका लोगों से कोई लेना-देना नहीं है और इसका यह अर्थ नहीं है कि लोग अलौकिक कार्य कर सकते हैं।) इसका यह अर्थ नहीं है कि परमेश्वर के नियंत्रण में लोग सर्वशक्तिमान होते हैं; जब लोग परमेश्वर के नियंत्रण में होते हैं तब भी वे सर्वशक्तिमत्ता प्राप्त नहीं कर सकते। ऐसा क्यों है? (क्योंकि लोग परमेश्वर नहीं हैं; लोग केवल सृजित प्राणी हैं, जबकि परमेश्वर अद्वितीय है।) यह सही है, ऐसा ही है। लोग हमेशा लोग ही रहेंगे। वे कोई दूसरी प्रजाति नहीं बन जाएँगे, और बेशक, वे परमेश्वर तो बिल्कुल भी नहीं बनेंगे; लोगों के गुण नहीं बदलेंगे। लोगों के गुण नहीं बदलेंगे, तो क्या उनकी सहज प्रवृत्तियाँ बदलेंगी? (नहीं, वे नहीं बदलेंगी।) लोगों की सहज प्रवृत्तियाँ नहीं बदलेंगी, न ही उनके जीने की आदतें और जीने के ढर्रे या परमेश्वर द्वारा प्रदत्त अंतर्निहित व्यक्तित्व बदलेंगे। उदाहरण के लिए, जीने के ढर्रे को ही ले लो। अधिकांश प्राणियों की तरह मनुष्य सूर्योदय के बाद काम करते हैं और सूर्यास्त के बाद आराम करते हैं। जब वे सुबह उठते हैं और उनका मस्तिष्क अच्छी तरह से विश्राम कर लेता है और उनका शरीर आराम महसूस करता है, तो वे काम शुरू कर देते हैं; रात में जब उनका शरीर थकने लगता है और वे जम्हाई लेते हैं और उनका दिमाग थक जाता है, तो वे आराम की अवस्था में प्रवेश करने लगते हैं—यह जीने का एक बहुत ही सामान्य ढर्रा है। यह मनुष्यों का एक सामान्य गुण है और यह एक इंसानी प्रवृत्ति भी है और बेशक यह जीने का एक ढर्रा भी है जिसे परमेश्वर ने मानवजाति के लिए स्थापित किया है। यह ढर्रा सूर्य, चंद्रमा और तारों के घूर्णन और सूर्य के उदय और अस्त होने के मुताबिक तय होता है। अगर तुम जीने का यह ढर्रा तोड़ देते हो तो अल्पावधि में तो शायद कोई बड़ी समस्या न हो—जब तुम्हें कभी-कभी थकान महसूस हो और तुम सोना चाहो, तो तुम आत्म-संयम बरत सकते हो और थोड़ी चाय या कॉफी पी सकते हो, और तुम्हारी शारीरिक थकान कुछ हद तक कम हो जाएगी—लेकिन लंबे समय में तुम्हारे शरीर में समस्याएँ उत्पन्न हो जाएँगी। उसमें समस्याएँ क्यों उत्पन्न हो जाएँगी? क्योंकि तुमने जीने के उस ढर्रे का उल्लंघन किया है जिसे परमेश्वर ने लोगों के लिए स्थापित किया है। जब तुम्हारे शरीर में समस्याएँ पैदा होंगी और तुम डॉक्टर के पास जाओगे तो वह कहेगा, “तुम्हें रात को जल्दी सो जाना चाहिए, 10 बजे सोकर सुबह 4 या 5 बजे उठ जाना चाहिए; कुछ महीनों में तुम फिर से ठीक हो जाओगे।” डॉक्टर की सलाह मानने के तीन महीने बाद तुम्हारे शरीर की सभी तकलीफों के लक्षण मूलतः गायब हो जाएँगे, इसलिए तुम मन ही मन सोचोगे, “यह बात निकलकर आई है कि मेरी शारीरिक समस्याएँ कोई गंभीर बीमारी नहीं थीं, बल्कि मेरे द्वारा अपने जीवन में इस सामान्य ढर्रे का पालन न करने के कारण थीं।” देखो, क्या तुम यह नहीं कहोगे कि लोगों के जीने के ढर्रे तोड़े नहीं जा सकते? (हाँ।) इंसानों के जीने का यह ढर्रा दूसरे जीवों जैसा ही है; वे सभी सूर्योदय के बाद काम करते हैं और सूर्यास्त के बाद आराम करते हैं। बेशक, उल्लू जैसे कुछ जीव भी हैं जो दिन में आराम करते हैं और रात में बाहर आकर सक्रिय होते हैं; उनके जीने का ढर्रा इंसानों और दूसरे जीवों से अलग है, लेकिन अगर तुम उनके इस ढर्रे को तोड़ना चाहो, तो यह नामुमकिन होगा। इसके अलावा, कुछ जीव सर्दियों में शीतनिद्रा में चले जाते हैं। क्या मनुष्यों में ऐसा ढर्रा होता है? (नहीं।) नहीं, मनुष्यों को शीतनिद्रा में जाने की जरूरत नहीं होती। मनुष्यों के जीने का एक ढर्रा है—वे प्रति सप्ताह एक-दो दिन आराम करते हैं, वे सूर्योदय के बाद काम करते हैं और सूर्यास्त के बाद आराम करते हैं, और काम और आराम का यह सामान्य ढर्रा निरंतर बनाए रखते हैं, और इस तरह उनके जीवन की रक्षा की जा सकती है और उनका अस्तित्व बना रह सकता है। मनुष्यों के जीने के अपने ढर्रे होते हैं और ये ढर्रे परमेश्वर द्वारा स्थापित किए गए थे। ये सभी अर्थपूर्ण हैं और इन सभी का उद्देश्य मानवजाति का सामान्य जीवन और अस्तित्व बनाए रखना है। इसलिए, परमेश्वर का कार्य मनुष्य के जीवन और अस्तित्व के ढर्रे बिल्कुल नहीं तोड़ेगा जैसा कि लोग कल्पना करते हैं कि वह ऐसा करेगा, और तुम्हें भी यह धारणा और कल्पना त्याग देनी चाहिए। अगर मनुष्य परमेश्वर द्वारा उनके लिए स्थापित ये ढर्रे बलपूर्वक तोड़ेंगे या अगर मनुष्य अलौकिक चीजों के बारे में कुछ विचारों से नियंत्रित होने के कारण उन्हें लगातार बदलना चाहेंगे तो यह मूर्खता होगी। अगर तुम सोचते हो कि इन्हें बदलने से तुम्हारा जीवन उन्नत होगा और तुम्हारी मानवता में सुधार होगा तो इन्हें बदलने की कोशिश करो और देखो कि तुम कितने समय तक जी पाते हो, देखो कि आने वाले दिनों में चीजें कैसे बदलती हैं और क्या तुम्हारी सामान्य मानवता उन्नत होती है और क्या तुम अतिमानव या कोई देवदूत बनते हो। अगर तुम मानते हो कि परमेश्वर के कार्य में एक अलौकिक तत्त्व होना चाहिए और उसे तुम्हारे जीने के ढर्रे बदलने चाहिए, और तुम भी खुद को मानवातीत बनाने के लिए उन्हें बलपूर्वक बदलना चाहते हो, तो तुम इसे आजमा सकते हो। हो सकता है कई वर्षों की कोशिश के बाद तुम वास्तव में अपने जीवन और अस्तित्व के ढर्रे बदल दो। ऐसा केवल एक ही स्थिति में हो सकता है, वह यह कि तुम्हारा भौतिक शरीर अस्तित्व में नहीं रहेगा, उस बिंदु पर तुम वास्तव में अलौकिक हो जाओगे और धुएँ के गुबार में बदल जाओगे, और तुम एक “आकाशीय प्राणी” में परिवर्तित होकर अमर हो जाओगे। अगर तुम अपना भौतिक शरीर सामान्य और स्वस्थ रखना चाहते हो और सामान्य अवस्था में रहते हुए परमेश्वर का कार्य और उसके वचन स्वीकारने में समर्थ होना चाहते हो, तो तुम्हें अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर तथाकथित अतिमानव बनने या तथाकथित उन्नत मानवता का अनुसरण करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए; बल्कि तुम्हें सामान्य मानवता में जीना चाहिए, अपनी सामान्य मानवता के जीवन और अस्तित्व का ढर्रा बनाए रखना चाहिए और अपनी सामान्य मानवता की सहज प्रवृत्ति भी बनाए रखनी चाहिए। परमेश्वर से अनुचित माँगें मत करो; ये सब अनुचित माँगें तुम्हारी कल्पनाओं और धारणाओं से आती हैं। तुम्हारी सहज प्रवृत्तियाँ, जीने के ढर्रे इत्यादि वे चीजें नहीं हैं जिन्हें परमेश्वर बदलना चाहता है, न ही ये वे चीजें हैं जिन्हें वह अपने कार्य से बदलना चाहता है। एक बचाया गया व्यक्ति निश्चित रूप से ऐसा व्यक्ति नहीं होता जो धारणाओं और कल्पनाओं से भरा हो, और वह अतिमानव या असामान्य व्यक्ति तो बिल्कुल नहीं होता। बल्कि, वह सामान्य मानवता और जमीर और विवेक वाला व्यक्ति होता है, ऐसा व्यक्ति जो परमेश्वर के वचनों पर ध्यान देने और सत्य सिद्धांतों के अनुसार लोगों और चीजों को देखने, और आचरण और कार्य करने में समर्थ होता है; वह ऐसा व्यक्ति होता है जो सभी चीजों में परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकता है, जो बिल्कुल भी अलौकिक नहीं होता और जिसकी मानवता विशेष रूप से सामान्य और व्यावहारिक होती है।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?