सत्य का अनुसरण कैसे करें (3) भाग दो

सामान्य मानवता में रहने वाले लोग कई शारीरिक सहज प्रवृत्तियों और शारीरिक आवश्यकताओं से भी प्रतिबंधित होते हैं। उदाहरण के लिए, कभी-कभी लोग अपने कर्तव्य कुछ दिनों के लिए इसलिए टाल सकते हैं क्योंकि वे बहुत ही थके हुए या बीमार होते हैं और उन्हें आराम की जरूरत होती है; कभी-कभी तनावपूर्ण परिवेश के कारण वे भयभीत हो सकते हैं और अपने कर्तव्य निभाने के लिए शांतचित्त नहीं हो पाते; या वे अक्सर अपने हृदय में ऋणी होने और उदासी की भावना महसूस कर सकते हैं क्योंकि अपनी सीमित काबिलियत और योग्यताओं के कारण वे किसी विशेष प्रकार के कार्य या कर्तव्य में सक्षम नहीं हो सकते—ये सभी सामान्य अभिव्यक्तियाँ हैं जो सामान्य मानवता के दायरे में आती हैं। कभी-कभी लोग भावनाओं और शारीरिक आवश्यकताओं से बेबस हो सकते हैं और कभी-कभी वे शारीरिक प्रवृत्तियों या समय और व्यक्तित्व के प्रतिबंधों के अधीन हो सकते हैं—यह सामान्य और प्राकृतिक है। उदाहरण के लिए, कुछ लोग बचपन से ही काफी अंतर्मुखी होते हैं; वे बात करना पसंद नहीं करते हैं और दूसरों से मेलजोल रखने में उन्हें दिक्कतें आती हैं। यहाँ तक कि तीस या चालीस वर्ष के वयस्क हो जाने के बाद भी वे इस व्यक्तित्व से उबर नहीं पाते हैं : वे अभी भी बोलने में कुशल या संप्रेषण में अच्छे नहीं होते, न ही वे दूसरों के साथ मेलजोल रखने में अच्छे होते हैं। अगुआ बनने के बाद उनके व्यक्तित्व का यह गुण उनके कार्य को कुछ हद तक सीमित और बाधित करता है, और उन्हें अक्सर इसके कारण तनाव और हताशा होती है जिससे वे बहुत बेबस महसूस करते हैं। अंतर्मुखी होना और बात करना पसंद नहीं करना सामान्य मानवता की अभिव्यक्तियाँ हैं। चूँकि ये सामान्य मानवता की अभिव्यक्तियाँ हैं, तो क्या उन्हें परमेश्वर की दृष्टि से अपराध माना जाता है? नहीं, ये अपराध नहीं हैं और परमेश्वर उनके साथ सही तरह से व्यवहार करेगा। चाहे तुम्हारी समस्याएँ, दोष या खामियाँ कुछ भी हों, इनमें से कोई भी चीज परमेश्वर की नजर में मुद्दा नहीं है। परमेश्वर सिर्फ यह देखता है कि तुम किस तरह से सत्य खोजते हो, किस तरह से सत्य का अभ्यास करते हो, किस तरह से सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करते हो और सामान्य मानवता की अंतर्निहित स्थितियों के तहत परमेश्वर के मार्ग का पालन करते हो—परमेश्वर इन्हीं चीजों को देखता है। इसलिए, सत्य सिद्धांतों से संबंधित मामलों में काबिलियत, सहज प्रवृत्तियों, व्यक्तित्व, आदतें और सामान्य मानवता के जीवन जीने के तरीके जैसी बुनियादी स्थितियों को अपने आप पर प्रतिबंध मत लगाने दो। यकीनन, इन बुनियादी स्थितियों पर काबू पाने का प्रयास करने में अपनी ताकत और समय भी मत लगाओ और न ही इन्हें बदलने का प्रयास करो। मिसाल के तौर पर, अगर तुम्हारा व्यक्तित्व अंतर्मुखी है और तुम्हें बात करना पसंद नहीं है, तुम वाक्पटु नहीं हो और तुम लोगों के साथ जुड़ने और मिलने-जुलने में कुशल नहीं हो, तो इनमें से कोई भी चीज समस्या नहीं है। हालाँकि बहिर्मुखी लोग बात करना पसंद करते हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि वे जो कुछ भी कहते हैं वह उपयोगी या सत्य के अनुरूप होता है, इसलिए अंतर्मुखी होना कोई समस्या नहीं है और तुम्हें इसे बदलने का प्रयास करने की जरूरत नहीं है। तुम कह सकते हो, “अगर मैं एक साधारण अनुयायी होता, तो मेरे लिए अंतर्मुखी व्यक्तित्व का होना कोई समस्या न होती; लेकिन अब मैं एक अगुआ हूँ, इसलिए क्या मुझे अपना अंतर्मुखी व्यक्तित्व बदलने की जरूरत नहीं है?” अगर तुम वाकई इसे बदलना चाहते हो, तो तुम दूसरों के साथ मिलने-जुलने का तरीका सीख सकते हो, या इस बात के लिए एक नियम बना सकते हो कि तुम कितना बोलते हो, कितने मामले सँभालते हो और एक दिन में कितनी तरह के लोगों से व्यवहार करते हो। अगर तुममें वाकई अपना अंतर्निहित व्यक्तित्व बदलने की क्षमता है, तो बेशक, तुम्हारे कलीसिया का कार्य करने के संबंध में यह अनिवार्यतः कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन अगर तुम अंतर्मुखी व्यक्तित्व के साथ पैदा हुए हो और तुम शब्दों का इस्तेमाल अच्छी तरह नहीं कर पाते, सामाजिक मेलजोल में माहिर नहीं हो और दूसरों से बातचीत या संवाद करना नहीं जानते, तो इसे कोई नहीं बदल सकता। कुछ लोगों का अंतर्मुखी व्यक्तित्व होता है, वे दूसरों से मिलने-जुलने या बातचीत करने के इच्छुक नहीं होते हैं, और यही नहीं, उनके पास कहने के लिए ज्यादा कुछ नहीं होता। उन्हें हमेशा लगता है कि कुछ उपयोगी कहना ही सही है और अनावश्यक चीजें कहने की कोई जरूरत नहीं है, इसलिए वे ज्यादा कुछ कहने के इच्छुक नहीं होते। कुछ लोगों के लिए ऐसा इसलिए हो सकता है कि वे बहुत छोटे हैं और उनके पास कोई जीवन का अनुभव नहीं है और शब्दों की कमी है; दूसरे लोगों के लिए ऐसा हो सकता है कि वे अब युवा नहीं हैं और उनके पास पहले से ही जीवन का अनुभव है, लेकिन फिर भी उनका व्यक्तित्व अंतर्मुखी होता है। अगर तुम इस तरह के व्यक्तित्व को बदलने की कोशिश करते हो और उसे बदलने के लिए हर तरह के नजरिये अपनाते हो तो मैं तुम्हें बता दूँ, तुम उसे जीवन भर नहीं बदल पाओगे, क्योंकि परमेश्वर इस तरह का काम नहीं करता। इससे फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा चेहरा या रूप तुम्हारे पिता जैसा है या माता जैसा या किसी अन्य रिश्तेदार जैसा, यह रूप नहीं बदलेगा, और इससे भी बढ़कर, विशेषकर तुम्हारा व्यक्तित्व नहीं बदलेगा। कुछ लोग कहते हैं, “अंतर्मुखी व्यक्तित्व बदलना मुश्किल है, तो क्या बहिर्मुखी व्यक्तित्व बदलना आसान है?” बहिर्मुखी व्यक्तित्व बदलना भी उतना ही मुश्किल है। बहिर्मुखी लोगों को बात करना बहुत पसंद होता है और उनके पास कहने के लिए बहुत कुछ होता है; अगर तुम उन्हें न बोलने या कम बोलने के लिए कहो तो वे खुद को नियंत्रित नहीं कर सकते, और अगर कोई उन्हें बोलने से रोकता है तो यह उनसे उनका जीवन छीनने जैसा होता है। अगर किसी अंतर्मुखी व्यक्ति का किसी बहिर्मुखी व्यक्ति के साथ मेल-जोल कराया जाए, तो क्या वे एक-दूसरे को प्रभावित करेंगे? शुरुआत में वे एक-दूसरे को कुछ हद तक प्रभावित कर सकते हैं; अपनी इज्जत बचाने के लिए दोनों लोग एक-दूसरे के प्रति उदार और सहिष्णु होंगे या परस्पर सहनशील और समझदार होंगे। लेकिन समय के साथ वे एक-दूसरे को जान जाएँगे और एक-दूसरे के व्यक्तित्व की स्पष्ट समझ प्राप्त कर लेंगे, और उन्हें एक-दूसरे के प्रति इतना सहनशील और विचारशील व्यवहार करने की जरूरत नहीं रहेगी, इसलिए वे जल्दी ही अपनी मूल अवस्था में लौट जाएँगे। अगर तुम्हारा व्यक्तित्व पहले अंतर्मुखी था, तो तुम अब भी अंतर्मुखी हो; जब तुम बोलते और बातचीत करते हो तो तुम बस कुछ शब्द या वाक्य ही बोलते हो, और तुम्हारे पास कहने के लिए और कुछ नहीं होता। अगर कोई पूछता है, “क्या तुम बाहर गए थे?” तो तुम जवाब देते हो, “गया था।” फिर अगर वह पूछे, “तुम वापस कब आए?” तो तुम जवाब देते हो, “अभी-अभी।” तुम यह नहीं बताते कि क्या हुआ, और वह नहीं बताते जो वह व्यक्ति सुनना चाहता है। इसके विपरीत, बहिर्मुखी लोग मशीनगन की तरह लगातार शब्दों के गोले दागते रहते हैं, और अगर तुम उन्हें टोक दो, तो भी कुछ देर बाद वे फिर बोलने लगेंगे। क्या किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व में बदलाव आना आसान है? (नहीं, ऐसा नहीं है।) यह एक ऐसी चीज है जो हर सृजित मनुष्य के साथ जन्म से ही होती है। इसका भ्रष्ट स्वभावों या व्यक्ति की मानवता के सार से कोई लेना-देना नहीं है; यह बस अस्तित्व की एक अवस्था है जिसे लोग बाहर से देख सकते हैं, और एक तरीका है जिससे व्यक्ति लोगों, घटनाओं और चीजों के साथ पेश आता है। कुछ लोग खुद को अच्छी तरह अभिव्यक्त कर लेते हैं जबकि कुछ लोग नहीं कर पाते; कुछ लोग चीजों का वर्णन करना पसंद करते हैं जबकि कुछ लोग नहीं करते; कुछ अपने विचार अपने तक ही रखना पसंद करते हैं जबकि कुछ लोग अपने विचार अपने भीतर रखना पसंद नहीं करते बल्कि उन्हें जोर से व्यक्त करना चाहते हैं ताकि हर कोई उन्हें सुन सके, और तभी उन्हें खुशी महसूस होती है। ये वे अलग-अलग तरीके हैं जिनसे लोग जिंदगी और लोगों, घटनाओं और चीजों से पेश आते हैं; ये लोगों के व्यक्तित्व हैं। तुम्हारा व्यक्तित्व ऐसी चीज है जो तुम्हारे साथ पैदा हुई है। अगर तुम कई कोशिशों के बाद भी इसे बदलने में नाकाम रहे हो तो मैं तुम्हें बता दूँ, तुम अब थोड़ा आराम कर सकते हो; खुद को इतना थका देने की जरूरत नहीं है। इसे बदला नहीं जा सकता, इसलिए इसे बदलने की कोशिश मत करो। तुम्हारा मूल व्यक्तित्व जो भी रहा है, वही तुम्हारा व्यक्तित्व बना रहता है। उद्धार प्राप्त करने के लिए अपने व्यक्तित्व को बदलने का प्रयास मत करो; यह एक भ्रामक विचार है—तुम्हारा जो भी व्यक्तित्व है, वह एक वस्तुनिष्ठ तथ्य है और तुम उसे नहीं बदल सकते। इसके वस्तुनिष्ठ कारणों के लिहाज से, परमेश्वर अपने कार्य में जो परिणाम प्राप्त करना चाहता है उसका तुम्हारे व्यक्तित्व से कोई लेना-देना नहीं है। तुम उद्धार प्राप्त कर सकते हो या नहीं, यह भी तुम्हारे व्यक्तित्व से संबंधित नहीं है। इसके अलावा, तुम सत्य का अभ्यास करने वाले व्यक्ति हो या नहीं और तुम्हारे पास सत्य वास्तविकता है या नहीं, इसका भी तुम्हारे व्यक्तित्व से कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए, इस कारण से अपने व्यक्तित्व को बदलने का प्रयास मत करो कि तुम कुछ विशेष कर्तव्य कर रहे हो या कार्य की किसी विशेष मद के पर्यवेक्षक के रूप में सेवा कर रहे हो—यह एक गलत विचार है। तो तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम्हारा व्यक्तित्व या जन्मजात स्थितियाँ चाहे कुछ भी हों, तुम्हें सत्य सिद्धांतों का पालन करना चाहिए और उनका अभ्यास करना चाहिए। अंततः, परमेश्वर तुम्हारे व्यक्तित्व के आधार पर यह आकलन नहीं करता है कि क्या तुम उसके मार्ग का पालन करते हो या उद्धार प्राप्त कर सकते हो, वह इस आधार पर भी आकलन नहीं करता है कि तुम्हारे पास कौन-सी जन्मजात काबिलियत, कौशल, क्षमताएँ, गुण या प्रतिभाएँ हैं और यकीनन वह यह भी नहीं देखता कि तुमने अपनी दैहिक सहज प्रवृत्तियों और जरूरतों को कितना सीमित किया है। इसके बजाय परमेश्वर यह देखता है कि उसका अनुसरण करते हुए और अपना कर्तव्य निर्वहन करते हुए क्या तुम उसके वचनों का अभ्यास और अनुभव कर रहे हो, क्या तुममें सत्य का अनुसरण करने की इच्छा और संकल्प है और अंततः, क्या तुमने सत्य का अभ्यास करना और परमेश्वर के मार्ग का पालन करना हासिल कर लिया है। परमेश्वर यही देखता है। क्या तुम इसे समझते हो? (हाँ, हम समझते हैं।)

जब कुछ महिलाएँ कार्य करती हैं तो चीजों को बहुत तेजी से निपटाती जाती हैं, वे चमकती बिजली की तरह तेज और ऊर्जावान होती हैं और तुरंत और दृढ़ निर्णय लेती हैं; उनका व्यक्तित्व बिल्कुल पुरुषों जैसा होता है। आजकल उनका वर्णन करने के लिए कौन-सा लोकप्रिय शब्द इस्तेमाल किया जाता है? मर्दाना महिलाएँ। अब “मर्दाना महिलाएँ” मूर्ख, बड़ी, भारी-भरकम गँवार नहीं रहीं जिन्हें लोग इस शब्द से संबोधित किया करते थे। यह कोई अपमानजनक शब्द नहीं है; बल्कि यह एक प्रशंसात्मक शब्द है। लेकिन परमेश्वर इस प्रशंसात्मक शब्द को कैसे देखता है? तुम चमकती बिजली की तरह तेज और ऊर्जावान हो, और अपने कार्यों में साहस से और दृढ़तापूर्वक निर्णय करते हो, लेकिन तुम्हारे अभ्यास के सिद्धांत क्या हैं और तुम्हारे क्रियाकलापों का आधार क्या है? क्या वह आधार सत्य है? क्या वह आधार परमेश्वर के वचन हैं? यही कुंजी है। अगर कोई पुरुष अपने क्रियाकलापों में धीमा और सावधान है, तो गैर-विश्वासियों के शब्दों में, वह बँधे हुए पैरों वाली स्त्री के समान है—कुछ लोग तो यह कहते हुए अपमानजनक शब्द का भी प्रयोग करते हैं कि वह “थोड़ा महिलाओं जैसा” है—लेकिन परमेश्वर उसे कैसे देखता है? चाहे कोई व्यक्ति चमकती बिजली की तरह तेज और ऊर्जावान हो और चीजें करने में साहस और दृढ़ता से निर्णय लेता हो, या बँधे हुए पैरों वाली महिला की तरह कार्य करता हो और अपने कार्यों में थोड़ा महिलाओं जैसा हो, क्या इनमें से कोई भी चीज समस्या है? (नहीं।) क्या चमकती बिजली की तरह तेज और ऊर्जावान होना, और साहस और दृढ़ता से निर्णय लेना एक मजबूत बिंदु है? (नहीं, अनिवार्य रूप से नहीं।) तो क्या बँधे हुए पैरों वाली महिला की तरह व्यवहार करना एक कमजोरी है? (उसी तरह, नहीं, अनिवार्य रूप से नहीं।) हालाँकि दो शब्दों “मर्दाना महिलाएँ” और “थोड़ा महिलाओं जैसा” में से एक प्रशंसनीय है और दूसरा अपमानजनक, लेकिन इन दो प्रकार के व्यवहारों या काम करने के तरीकों का सार इनके शाब्दिक अर्थों के आधार पर नहीं आँकना चाहिए। उसे आँकने के लिए क्या इस्तेमाल करना चाहिए? (यह कि व्यक्ति जिसका अभ्यास करता है वह परमेश्वर का वचन है या नहीं।) उसे आँकने के लिए उसके क्रियाकलापों के आधार का और साथ ही उस प्रभाव का इस्तेमाल करना चाहिए, जिसे वह प्राप्त करने का इरादा रखता है। अगर उसके क्रियाकलापों का आधार परमेश्वर के वचन और सत्य सिद्धांत हैं तो लगभग 90 प्रतिशत निश्चित है कि वह कुछ भी गलत नहीं कर रहा है। अगर वह न केवल सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करता है, बल्कि इसके अतिरिक्त, वह जो प्रभाव प्राप्त करना चाहता है वह परमेश्वर की गवाही और परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करना और अधिक भाई-बहनों का आध्यात्मिक उन्नयन करना है, तो हम 100 प्रतिशत निश्चित हो सकते हैं कि वह कोई गलत काम नहीं कर रहा है। चाहे वह साहसपूर्वक और दृढ़ता से निर्णय करता हो या बँधे हुए पैरों वाली महिला की तरह—चाहे वह बाहरी तौर पर कैसे भी व्यवहार करता हो—यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि उसके क्रियाकलापों का आधार सत्य सिद्धांत है या नहीं, और उसके क्रियाकलापों का लक्ष्य और वह प्रभाव जो वह अपने क्रियाकलापों के जरिये प्राप्त करना चाहता है, परमेश्वर के घर के हितों और कलीसिया के कार्य की रक्षा करना और अधिक लोगों का आध्यात्मिक उन्नयन करना है या नहीं। तो क्या उसके क्रियाकलापों का स्वरूप महत्वपूर्ण है? (नहीं, ऐसा नहीं है।) चाहे तुम मर्दाना महिला हो या बँधे हुए पैरों वाली महिला की तरह हो, परमेश्वर इसे नहीं देखता; यह वह मानक नहीं है जिसका इस्तेमाल परमेश्वर लोगों को आँकने के लिए करता है। इसलिए अगर कोई महिला मर्दाना महिला जैसी प्रतीत होती है और अपने क्रियाकलापों में वह चमकती बिजली की तरह तेज और ऊर्जावान है, और साहस से और दृढ़तापूर्वक निर्णय लेती है, तो क्या यह प्रशंसा और श्रद्धा के योग्य है? (नहीं, ऐसा नहीं है।) क्या चमकती बिजली की तरह तेज और ऊर्जावान होना और साहस से और दृढ़तापूर्वक निर्णय लेना चीजें करने का एक सिद्धांत है? (नहीं।) चाहे तुम पुरुष हो या महिला, साहस से और दृढ़तापूर्वक निर्णय लेने वाला होना और चमकती बिजली की तरह तेज और ऊर्जावान होना चीजें करने का सिद्धांत नहीं है। तो, चीजें करने का क्या सिद्धांत है? (व्यक्ति को सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना चाहिए, और जो प्रभाव प्राप्त करने का वह इरादा रखता है वह परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करना और अधिक लोगों का आध्यात्मिक उन्नयन करना होना चाहिए—यह एक सिद्धांत है।) यह एक ठोस सिद्धांत है। अगर तुम इस सिद्धांत के अनुसार कार्य करते हो तो तुम सत्य का अभ्यास कर रहे हो; अगर तुम इस सिद्धांत के अनुसार कार्य नहीं करते तो मेरी दृष्टि में वह अभिव्यक्ति जो तुम्हारे साहस से और दृढ़तापूर्वक निर्णय लेने वाला होने, चमकती बिजली की तरह तेज और ऊर्जावान होने को सबसे उपयुक्त रूप से परिभाषित करती है, वह है “असंयमित होकर बुरी चीजें करना”। यह स्पष्ट है कि असंयमित होकर बुरी चीजें करना सत्य सिद्धांतों के आधार पर कार्य करना नहीं है; यूँ तो तुम अपने क्रियाकलापों में निर्णायक और निस्संकोची प्रतीत होते हो और एक अगुआ या राजा जैसा भाव रखते हो, लेकिन वास्तव में तुम असंयमित होकर बुरी चीजें करते हो। असंयमित होकर बुरी चीजें करने के क्या परिणाम होते हैं? इससे विघ्न-बाधाएँ पैदा होती हैं और कलीसिया के कार्य को नुकसान पहुँचता है। तो क्या परमेश्वर इसे याद रखेगा? (नहीं।) परमेश्वर न केवल इसे याद नहीं रखेगा, बल्कि वह इसकी निंदा भी करेगा। तो तुम कहते हो कि तुम एक मर्दाना महिला हो, और अपने क्रियाकलापों में चमकती बिजली की तरह तेज और ऊर्जावान हो, और साहस से और दृढ़तापूर्वक निर्णय करते हो, लेकिन क्या यह उपयोगी है? (नहीं, ऐसा नहीं है।) केवल सत्य खोजना और सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना ही सच्ची क्षमता कही जा सकती है; केवल यही सत्य का अभ्यास करना और सत्य का अनुसरण करना है, और केवल यही है जो सामान्य मानवता वाले लोगों को करना चाहिए। मान लो तुम कहते हो, “यह बस मेरा व्यक्तित्व है और यह बदल नहीं सकता, तो मुझे क्या करना चाहिए?” इसका एक आसान समाधान है। तुम्हारा मिजाज तेज है या धीमा, यह कोई समस्या नहीं है; इससे बाधित मत हो। तुम सिद्धांतों के अनुसार चीजें करना चाहते हो इसके लिए तुम्हें अपने कार्य करने का तरीका बदलने के लिए कड़ी मेहनत करने की भी जरूरत नहीं है। तुम्हारा तरीका चाहे जो भी हो, अगर तुम्हारे क्रियाकलापों का आधार सत्य सिद्धांत है, और जो प्रभाव तुम प्राप्त करते हो वह परमेश्वर की गवाही, परमेश्वर के हितों और परमेश्वर के घर के कार्य की रक्षा करना है, तो ये अच्छे कर्म हैं और परमेश्वर इन्हें याद रखेगा। इसके विपरीत, चाहे तुम बाहरी तौर पर बँधे हुए पैरों वाली महिला की तरह डरपोक और संकोची हो या तुम किसी अगुआ या राजा की तरह, चमकती बिजली की तरह तेज और ऊर्जावान हो—तुम्हारे क्रियाकलापों का बाहरी रूप चाहे जो भी हो—अगर तुम सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य नहीं करते तो तुम गड़बड़ियाँ और बाधाएँ पैदा कर रहे हो और ये बुरे कर्म हैं, और परमेश्वर इनकी निंदा करेगा, और इन्हें याद नहीं रखेगा। यह ये आँकने का सिद्धांत है कि कोई व्यक्ति अच्छा है या बुरा। क्या तुम समझ गए? (हाँ।) तो अब जबकि हमने इन चीजों पर संगति कर ली है, क्या तुम्हें इस बात की कुछ समझ है कि परमेश्वर के कार्य के बारे में लोगों की क्या धारणाएँ और कल्पनाएँ होती हैं? (हाँ।) अब जबकि तुम उन्हें समझते हो, तो क्या तुम उन कुछ विचलनों के बारे में जानते हो जो लोगों में परमेश्वर में विश्वास करने और सत्य का अनुसरण करने की प्रक्रिया में आते हैं? क्या तुम इस बारे में भी स्पष्ट हो कि तुम्हें अभ्यास कैसे करना चाहिए? (हाँ, हम स्पष्ट हैं।)

लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं को समझने का उद्देश्य एक ओर लोगों को इन धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार जीने और गलत जीवन-पथ पर चलने से रोकना है। दूसरी ओर, इसका उद्देश्य लोगों को—इन धारणाओं और कल्पनाओं को त्यागते हुए—सामान्य मानवता के भीतर रहने और अपनी जिम्मेदारियाँ और कर्तव्य सहजता और आनंद से निभाने और खुद को वे चीजें करने के लिए मजबूर न करने में सक्षम बनाना है जिन्हें वे करने में असमर्थ हैं। अगर कोई ऐसी चीज है जिसे तुम हासिल कर सकते हो और जो तुम्हें हासिल करनी ही चाहिए, तो उसे करने में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास लगा दो; अगर कोई चीज तुम्हारी काबिलियत और क्षमता से परे है, तो उसमें सहयोग पाने के लिए किसी को खोजो या अन्य भाई-बहनों से मदद माँगो, और उसे अपनी पूरी क्षमता से करो—ये सिद्धांत हैं। संक्षेप में, लोगों को इस विषय में जो समझना चाहिए वह यह है कि जिस अवधि में परमेश्वर कार्य करता है उस दौरान परमेश्वर के वचन स्वीकार करने की प्रक्रिया में और प्रत्येक व्यक्ति की मानवता की अंतर्निहित बुनियादी स्थितियों के दायरे में उसकी मानवता धीरे-धीरे एक अच्छी दिशा में विकसित हो रही है, न कि विकृत, अलौकिक या असामान्य हो रही है। इसलिए, अगर जो कर्तव्य तुम निभाते हो उसमें कोई तकनीकी या व्यावसायिक कौशल शामिल है तो उस कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाने के लिए तुम्हें उस तकनीकी या व्यावसायिक कौशल को कर्मठतापूर्वक सीखने और उसमें गहरे पैठने का प्रयास करना चाहिए। तुम्हें “परमेश्वर सर्वशक्तिमान है और जो कुछ लोगों के लिए करना असंभव है, उसे परमेश्वर कर सकता है अगर हम उससे प्रार्थना करें” जैसे विचारों और दृष्टिकोणों और अलौकिक चीजों के बारे में कल्पनाओं के आधार पर, खुद कौशल सीखने का प्रयास किए बिना, परमेश्वर द्वारा कार्य किए जाने की आँख मूँदकर प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। तुम्हें अपना पूरा दिल, पूरी शक्ति और पूरा मन वह कार्य करने में लगाना चाहिए जो तुम्हारी काबिलियत द्वारा हासिल किए जा सकने के दायरे में है, और जब बात उसकी हो जो तुम्हारी काबिलियत और योग्यताओं से परे है, तो अपने लिए चीजें कठिन मत बनाओ, खुद पर किसी तरह का भार, बोझ या दबाव मत डालो, बल्कि अपने साथ नरमी बरतो। उदाहरण के लिए, कंप्यूटर-कौशल सीखने की बात ले लो। मान लो, तुम्हारी उम्र बढ़ रही है, और तुम्हारी उम्र, तुम्हारी काबिलियत और तुम्हारी वर्तमान स्थितियों को देखते हुए सिर्फ टाइपिंग सीखना ही तुम्हारे लिए एक बड़ी उपलब्धि है। अगर तुम भाई-बहनों से संपर्क करना और ऑनलाइन काम करना भी सीख सको तो यह पहले ही काफी अच्छा है। लेकिन तुम कभी संतुष्ट नहीं होते और अभी और पाने की चाहत रखते हो—तुम प्रोग्राम लिखना और नेटवर्क को सुरक्षित रखना सीखना चाहते हो, कुछ ऐसा काम करना चाहते हो जो सिर्फ नेटवर्क इंजीनियर और हाईटेक कर्मचारी ही कर सकते हैं। क्या यह मूर्खतापूर्ण नहीं है? (हाँ, है।) तुम ये चीजें नहीं सीख सकते, इसलिए तुम नकारात्मक हो जाते हो और परमेश्वर से शिकायत करते हो : “हे परमेश्वर, मैं ये चीजें क्यों नहीं सीख सकता? तुमने मुझे ऐसी काबिलियत क्यों दी? मैं इतना बूढ़ा हूँ—तुम मुझे फिर से जवान क्यों नहीं बना सकते? क्या परमेश्वर सर्वशक्तिमान नहीं है?” तुम्हारा ऐसे विचार रखना और ऐसी माँगें करना गलत है। “वही करना जो अपनी शक्ति के भीतर है और अपनी काबिलियत, योग्यताओं और सहज प्रवृत्तियों का अतिक्रमण न करने” का क्या अर्थ है? तुम्हारी काबिलियत और योग्यताएँ तुम्हें जो कुछ हासिल करने देती हैं, परमेश्वर तुमसे वही चाहता है। जो कुछ तुम्हारी पहुँच से परे है, परमेश्वर तुमसे उसकी अपेक्षा नहीं करता, और तुम्हें भी खुद से उसकी माँग नहीं करनी है। अगर तुम कोई चीज नहीं कर सकते तो दूसरे लोग कर सकते हैं; परमेश्वर यह माँग नहीं करता कि तुम ही उसे करो। तुम कहते हो, “मैं बूढ़ा हूँ—मुझे वीडियो अपलोड करना नहीं आता, मुझे नेटवर्क को सुरक्षित रखना भी नहीं आता, और प्रोग्राम लिखना तो बिल्कुल भी नहीं आता,” और फिर भी तुम इन चीजों को सीखने पर जोर देते हो—क्या तुमने कभी पूछा है कि परमेश्वर का घर तुमसे यह कार्य करवाना भी चाहता है या नहीं? क्या तुमने अपना कार्य ठीक से किया है? क्या तुमने वह कार्य ठीक से किया है जिसे तुम्हारी काबिलियत तुम्हें करने देती है? अगर तुमने उसे ठीक से नहीं किया है और तुम फिर भी उन चीजों को करने की कोशिश करने पर जोर देते हो जो तुम्हारी पहुँच से बाहर और तुम्हारी समझ से परे हैं और जिन्हें तुम अपने पूरे जीवनकाल में भी नहीं सीख पाओगे, तो तुम्हें क्या लगता है, तुम खुद से संघर्ष कर रहे हो या परमेश्वर से? क्या यह बहुत परेशानी वाली बात नहीं है? (हाँ, है।) तुम हमेशा खुद से आगे निकलकर अतिमानव बनना चाहते हो, लेकिन परमेश्वर ने तुमसे ऐसा करने की अपेक्षा नहीं की है। तुम्हारे अतिमानव बनना चाहने की एक ही वजह हो सकती है, वो यह कि तुम दिखावा करना चाहते हो और तुम बुढ़ापे के आगे हार नहीं मानोगे या झुकोगे नहीं। तुम जो कष्ट सहते हो और कीमत चुकाते हो वह अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभाने के लिए नहीं करते; तुम अपना कर्तव्य ईमानदार आचरण करने और अपने उचित स्थान पर दृढ़ता से डटे रहने के सिद्धांत के अनुसार नहीं कर रहे हो। तुम अपनी काबिलियत और योग्यताओं को चुनौती देकर यह साबित करना चाहते हो कि तुम बूढ़े नहीं हो। “मुझमें अभी भी दम है,” तुम सोचते हो। “मैं बाकी लोगों जितना ही अच्छा हूँ, मैं वो सब कर सकता हूँ जो दूसरे लोग कर सकते हैं!” क्या यह अर्थपूर्ण है? (नहीं।) यह अर्थपूर्ण नहीं है। तुम यह जो भी प्रयास कर रहे हो, वह व्यर्थ और बेकार है। अगर तुम अपना पूरा दिल, पूरा दिमाग और पूरी ताकत उस काम को सही ढंग से करने में लगाओ जो तुम्हारी स्थितियाँ तुम्हें करने देती हैं तो परमेश्वर संतुष्ट होगा। खुद को चुनौती मत दो और न ही अपनी सीमाओं के परे जाने का प्रयास करो। परमेश्वर जानता है कि तुम्हारी काबिलियत और क्षमताएँ कैसी हैं। परमेश्वर ने तुम्हें जो काबिलियत और क्षमताएँ दी हैं, वे उसके द्वारा बहुत पहले से पूर्वनिर्धारित हैं। हमेशा इनसे आगे निकलने की इच्छा करने का मतलब घमंडी होना और खुद को ज्यादा आँकना है; यह मुसीबत को दावत देना है और अंततः असफलता ही हाथ लगेगी। क्या ऐसे लोग अपने उचित कार्यों के प्रति लापरवाह नहीं हो रहे हैं? (हाँ।) वे नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण नहीं कर रहे हैं और एक सृजित प्राणी के कर्तव्य पूरे करने के लिए उन्होंने अपनी उचित स्थितियों को मजबूती से नहीं थामा हुआ है—वे अपने क्रियाकलापों में इन सिद्धांतों का पालन नहीं कर रहे हैं, बल्कि हमेशा दिखावा करने का प्रयास कर रहे हैं। एक कहावत है : “एक बुजुर्ग औरत तुम्हें दिखाने के लिए लिपस्टिक लगाती है।” “बुजुर्ग औरत” किस उद्देश्य से ऐसा करेगी? (अपनी नुमाइश करने के लिए।) बुजुर्ग औरत तुम्हें दिखाना चाहती है : “एक बुजुर्ग औरत के रूप में मैं आम नहीं हूँ—मैं तुम्हें कुछ खास दिखाऊँगी।” वह नहीं चाहती कि उसे नीची नजर से देखा जाए, बल्कि वह चाहती है कि उसका अत्यधिक आदर और सम्मान किया जाए; वह अपनी सीमाओं को चुनौती देना चाहती है और अपनी क्षमताओं से आगे निकलना चाहती है। क्या यह घमंडी प्रकृति नहीं है? (हाँ, है।) अगर तुम घमंडी प्रकृति के हो तो इसका मतलब है कि तुम अपनी सीमाओं में नहीं रहते हो, तुम अपने पद के अनुरूप तरीके से आचरण नहीं करना चाहते हो। तुम हमेशा खुद को चुनौती देना चाहते हो। दूसरे लोग जो कुछ भी कर सकते हैं, तुम भी उसे करने में समर्थ होना चाहते हो। जब दूसरे ऐसी चीजें करते हैं जिनसे वे सबसे अलग दिखते हैं, उन्हें नतीजे हासिल होते हैं या वे योगदान करते हैं और उन्हें सभी से तारीफें मिलती हैं, तो तुम बेचैन, ईर्ष्यालु और असंतुष्ट हो जाते हो। फिर तुम अपना मौजूदा कार्य छोड़कर किसी ऐसे कार्य की जिम्मेदारी लेना चाहते हो जो तुम्हें चमकने दे और अत्यधिक सम्मान भी हासिल करना चाहते हो। लेकिन जब तुम कोई ऐसा कार्य करने में सक्षम हो ही नहीं जिससे तुम सबसे अलग दिखो, तो क्या यह समय की बर्बादी नहीं है? क्या यह अपने उचित कार्यों के प्रति तुम्हारा लापरवाह होना नहीं है? (हाँ, है।) उचित कार्यों को नजरअंदाज मत करो क्योंकि उनके प्रति लापरवाह होने का नतीजा अच्छा नहीं होगा। इससे न केवल चीजों में देरी होती है और समय बर्बाद होता है जिससे दूसरे लोग तुम्हें नीची नजर से देखने लगते हैं, बल्कि इससे परमेश्वर भी तुमसे नफरत करने लगता है और अंत में तुम खुद को सताकर काफी नकारात्मक बन जाते हो। व्यक्ति की उम्र चाहे जो भी हो—चाहे वह युवा हो, अधेड़ हो या बुजुर्ग हो—उसकी काबिलियत और प्रतिभा की सीमाएँ हैं; कोई भी पूर्ण नहीं है। पूर्ण व्यक्ति होने की बात भूल जाओ, हर चीज करना जानने, हर चीज कर पाने और हर चीज समझ पाने की बात भूल जाओ—अगर तुम्हारा स्वभाव ऐसा है तो यह परेशानी की बात है।

परमेश्वर के कार्य में ऐसा क्यों है कि जब वह सभी प्रकार के लोगों से किसी विषय या किसी प्रकार के मुद्दे पर बात करता है, तो वह अलग-अलग अवस्थाओं और स्थितियों को संबोधित करते हुए एक ही चीज के बारे में बार-बार बोलता है? जिन लोगों में आध्यात्मिक समझ नहीं होती वे सोचते हैं, “इस तरह से बोलना बहुत विस्तृत और शब्दातिरेक-पूर्ण है; हम इसे पहले से ही समझते हैं।” हो सकता है तुम पहले से ही समझते हो लेकिन दूसरे न समझते हों; और अगर तुम समझते भी हो, तो क्या तुम विभिन्न अवस्थाओं की समस्याओं का समाधान कर सकते हो? अगर नहीं कर सकते, तो इसका मतलब है कि तुम अभी भी पूरी तरह से नहीं समझते, इसलिए ऐसा दिखावा मत करो कि तुम समझते हो। लोगों की तमाम अवस्थाएँ अलग-अलग होती हैं। एक बार जब प्रत्येक प्रकार के व्यक्ति की तमाम अवस्थाओं के बारे में बात कर ली जाती है और तमाम विभिन्न अवस्थाएँ शामिल कर ली जाती हैं—अर्थात् एक बार जब किसी निश्चित प्रमुख मुद्दे के भीतर सभी प्रकार के लोगों की तमाम अवस्थाओं पर चर्चा कर ली जाती है और हर कोई सत्य के इस पहलू को समझ लेता है—केवल तभी इस मुद्दे को स्पष्ट रूप से समझाया गया होता है। मेरा इससे क्या तात्पर्य है? वह यह है कि हर कोई अपनी स्थितियों में रहते हुए अलग-अलग समस्याएँ विकसित करता है; हर किसी की समस्याएँ अलग-अलग होती हैं और हर किसी का व्यक्तित्व, उसकी खूबियाँ, और जो चीजें करने में वह अच्छा होता है वे भी, अलग-अलग होती हैं। इसलिए, हर किसी की अपनी व्यक्तिगत स्थितियाँ, अपनी कठिनाइयाँ और अपने अलग-अलग विचार और दृष्टिकोण होते हैं। लेकिन चाहे लोगों की स्थितियाँ कितनी भी अलग हों और चाहे उनकी क्षमताएँ, काबिलियत, दृष्टितल, व्यक्तित्व और आदतें कितनी भी अलग हों, मनुष्यों के भ्रष्ट स्वभाव और प्रकृति सार समान ही होते हैं। अर्थात्, चाहे लोगों की मानवता की विभिन्न स्थितियाँ कितनी भी भिन्न हों, लोगों में लक्षण समान होते हैं। मनुष्यों में लक्षण समान क्यों होते हैं? क्योंकि जिस स्वभाव सार पर मनुष्य जीवित रहने के लिए निर्भर करता है, वह समान ही होता है। इसलिए, सभी प्रकार के लोगों की अवस्थाएँ और समस्याएँ उजागर हो जाने के बाद मनुष्यों को परमेश्वर द्वारा अपेक्षित सत्यों और सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने की आवश्यकता है, और तब मानवजाति की सामान्य समस्याओं का समाधान हो जाएगा। तुम्हारा व्यक्तित्व या काबिलियत चाहे जो भी हो, तुम चाहे कितने भी सक्षम हो और चाहे तुम पुरुष हो या स्त्री, या तुम पश्चिम में पैदा हुए हो या पूर्व में, या तुम दक्षिण से हो या उत्तर से, अगर तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव सत्य स्वीकारने, परमेश्वर के वचनों का न्याय और ताड़ना स्वीकारने और सत्य का अभ्यास करने के जरिये हल हो जाते हैं, तो तुम्हारी कठिनाइयाँ हल हो जाएँगी। इसका अर्थ है कि मानवजाति की सामान्य समस्याओं के संदर्भ में लोगों में उत्पन्न होने वाली सभी विभिन्न अवस्थाओं का भी समाधान किया जा सकता है। लोगों में विभिन्न अवस्थाएँ क्यों उत्पन्न होती हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति में जो मानवता होती है, उसकी अंतर्निहित स्थितियाँ भिन्न होती हैं। उदाहरण के लिए, अगर तुम दक्षिण में रहते हो, और तुम्हारी जीने की आदतें और ढर्रे दक्षिणवासियों जैसे हैं, और तुममें कुछ ऐसे व्यक्तित्व और जीवनशैली संबंधी लक्षण भी विकसित हो जाते हैं जो दक्षिणवासियों के लिए विशिष्ट हैं, तो इस प्रकार की पृष्ठभूमि के साथ तुममें कुछ विशेष धारणाएँ और कल्पनाएँ, विशेष विचार और दृष्टिकोण और विशेष अवस्थाएँ विकसित हो जाएँगी। अगर तुम उत्तर में पैदा हुए होते, तो तुम्हारा व्यक्तित्व और जीने की आदतें उत्तरवासियों जैसी होतीं, या तुम्हारी कुछ ऐसी अवस्थाएँ होतीं जो उत्तरवासियों के रीति-रिवाजों, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, शिक्षा-पद्धतियों और अन्य ऐसी चीजों से उत्पन्न होती हैं जो उत्तरवासियों में अंतर्निहित होती हैं। इस प्रकार, दक्षिण और उत्तर में रहने वाले लोगों में उत्पन्न होने वाली अवस्थाएँ भिन्न होती हैं। लेकिन एक ही समस्या से उत्पन्न होने वाली अवस्थाओं का मूल कारण और सार एक ही होता है, इसलिए उन सभी का समाधान एक ही सत्य से किया जा सकता है। ऐसे में, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम उत्तर से हो या दक्षिण से, या पूर्व से या पश्चिम से; अगर तुम एक सृजित मनुष्य हो, तुम्हारी सभी समस्याएँ सत्य से हल की जा सकती हैं। क्या तुम समझ गए? क्या यह मुद्दा जटिल है? (अब जबकि मैंने इसकी व्याख्या सुन ली है, मुझे लगता है कि यह अब जटिल नहीं है।) तुम ऐसा क्यों कहते हो कि यह मुद्दा जटिल नहीं है? (हालाँकि लोगों की स्थितियाँ, पृष्ठभूमि और व्यक्तित्व भिन्न होते हैं और इससे प्राकृतिक रूप से विभिन्न अवस्थाएँ जन्म लेती हैं, फिर भी इन विभिन्न अवस्थाओं का मूल कारण एक ही होता है और लोगों का भ्रष्ट सार भी एक ही होता है। लोग चाहे कितना भी भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करें, उसका समाधान उन्हीं सत्यों से किया जा सकता है; इसलिए, सत्य प्रत्येक व्यक्ति की समस्याएँ हल कर सकते हैं।) लोग चाहे दक्षिण से हों या उत्तर से, पूर्व से हों या पश्चिम से, चाहे वे पुरुष हों या स्त्रियाँ, युवा हों या वृद्ध, और चाहे उनकी स्थितियाँ कैसी भी हों, उनके भ्रष्ट स्वभाव एक जैसे ही होते हैं, और इन भ्रष्ट स्वभावों से उत्पन्न विभिन्न अवस्थाओं, विचारों, दृष्टिकोणों और सत्य के प्रति रवैयों में एक आम विशेषता होती है। यह आम विशेषता क्या होती है? इन भ्रष्ट स्वभावों से उत्पन्न होने वाली हर चीज शैतान की होती है और सत्य के अनुरूप नहीं होती; बेशक, अधिक विशिष्ट रूप से कहें तो, यह कहा जा सकता है कि वह सत्य के विपरीत होती है। इसलिए, भ्रष्ट मनुष्य की जातियों, धर्मों या संस्कृतियों में चाहे कितने भी अंतर हों, और चाहे लोगों की त्वचा पीली, गोरी, भूरी या काली हो, वे सभी भ्रष्ट मनुष्य हैं और सभी मनुष्यों में परमेश्वर का विरोध करने का एक ही सार होता है। यह चीज उनमें आम होती है। इसलिए, चाहे लोग किसी भी देश से हों या किसी भी जाति के हों, उन्हें सामूहिक रूप से भ्रष्ट मनुष्य कहा जाता है। अर्थात्, चाहे लोगों की ये जातियाँ अपनी त्वचा के रंग, रूप, जीने की आदतों या जातीय संस्कृति के मामले में श्रेष्ठ हों या निम्न, गरीब हों या अमीर, और चाहे उन्होंने जो भी शिक्षा प्राप्त की हो, हर हाल में, वे नियम जिन पर वे अपने अस्तित्व के लिए निर्भर करते हैं, शैतान से आते हैं, सत्य के साथ असंगत और परमेश्वर के प्रति प्रतिरोधी होते हैं। अगर लोग उच्च धार्मिक पृष्ठभूमि वाली समृद्ध, कुलीन जाति के हों, तो भी उनका सार भ्रष्ट मनुष्यों का ही होता है, वे अभी भी शैतान की किस्म के हैं जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, वे अभी भी भ्रष्ट मनुष्य ही होते हैं, वे सभी परमेश्वर के विरोधी होते हैं, वे सब वे लोग हैं जिनका परमेश्वर के कार्य के अंतर्गत न्याय और ताड़ना की जाती है, और उनमें से जो सत्य स्वीकार सकते हैं, वे वे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर बचाना चाहता है। इसका निहितार्थ क्या है? वह यह है कि तुम्हें बचाए जाने से पहले, चाहे तुम्हारी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, शैक्षिक पृष्ठभूमि और धार्मिक पृष्ठभूमि कितनी भी ऊँची हो, तुम्हारा सार अभी भी परमेश्वर का विरोधी और परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण ही होता है। इस प्रकार, मनुष्यों का सार उनकी त्वचा के रंग, उनके धर्म, जन्मभूमि या उनकी शैक्षिक या सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के कारण नहीं बदलेगा। इसी प्रकार, चाहे व्यक्ति किसी भी जाति का हो, वह अपनी स्थितियों के कारण परमेश्वर की दृष्टि में कुलीन या नीच नहीं बनेगा। तो परमेश्वर की दृष्टि में लोगों के कुलीन या नीच होने के मूल्यांकन का क्या मानक है? केवल एक ही मानक है और वह यह है कि तुम सत्य स्वीकारते हो या नहीं। अगर तुम सत्य स्वीकारते हो, तो चाहे तुम्हारी जाति या त्वचा का रंग कुछ भी हो, तुम कुलीन हो। अगर तुम सत्य नहीं स्वीकारते, तो भले ही तुम कहो, “मेरी त्वचा गोरी है, बाल सुनहरे हैं और आँखें नीली हैं, और मेरा परिवार पीढ़ियों से शाही परिवार रहा है,” इसका कोई फायदा नहीं है! अगर तुम मनुष्यों में कुलीन हो, तो भी अगर तुम सत्य नहीं स्वीकारते तो परमेश्वर की नजर में तुम अभी भी एक भ्रष्ट मनुष्य हो, तुम किसी भी अन्य भ्रष्ट मनुष्य के समान हो—कोई अंतर नहीं है। चाहे मानवजाति के कितने भी सदस्य तुम्हारा आदर करें, तुम्हारी आराधना करें और तुम्हें भेंट चढ़ाएँ, इससे कोई लाभ नहीं होगा और परमेश्वर की नजर में तुम्हारा रुतबा, तुम्हारी पहचान और तुम्हारा सार नहीं बदलेगा। मानवजाति के मूल्यांकन के लिए परमेश्वर का मानक—जो निस्संदेह मानवजाति के मूल्यांकन के लिए परमेश्वर द्वारा नियत उच्च मानदंड और मानक भी है—सत्य के आधार पर उसका मूल्यांकन करना है। अगर तुम सत्य से प्रेम करते हो और उसका अभ्यास करते हो, तो तुम कुलीन हो; अगर तुम सत्य का अभ्यास नहीं करते, तो तुम्हारी यह पुरानी देह एक भ्रष्ट मनुष्य है; इसका मूल्य एक दमड़ी भी नहीं है, और यह जमीन पर रहने वाली चींटी के बराबर भी मूल्यवान नहीं है। उन सूक्ष्मजीवों को छोड़कर जिन्हें लोग देख नहीं सकते, चींटियाँ सभी जीवित प्राणियों में अपेक्षाकृत छोटी हैं। उनके जीने के ढर्रे, अस्तित्व के नियम और सहज प्रवृत्तियाँ परमेश्वर द्वारा निर्धारित नियमों का पूरी तरह से पालन करती हैं। उनके काम-और-आराम की समय-सारणी जलवायु और चारों ऋतुओं के घटते-बढ़ते तापमान के अनुसार बदलती है और वे इन नियमों और विधियों को अग्रसक्रिय रूप से कभी नहीं बदलेंगी। लेकिन मनुष्य अलग हैं। मनुष्य हमेशा यथास्थिति और दुनिया बदलना चाहते हैं, वे हमेशा महत्वाकांक्षाएँ रखते हैं और लगातार विश्वासघात और विद्रोह में लगे रहते हैं। हालाँकि चींटियों में सत्य स्वीकारने की क्षमता नहीं होती, न ही उनमें सत्य समझने की क्षमता होती है, फिर भी कम से कम वे परमेश्वर का विरोध नहीं करतीं। मनुष्य अलग हैं; वे परमेश्वर पर आक्रमण करने और उसका विरोध करने के लिए अग्रसक्रिय रूप से आगे आएँगे। इसलिए, परमेश्वर की नजर में, जिन मनुष्यों ने सत्य प्राप्त नहीं किया है और जिन्हें बचाया नहीं गया है, उनका कोई मूल्य नहीं है। क्या यह एक तथ्य नहीं है? (यह तथ्य है।) इस तथ्य के आधार पर लोगों का मूल्यांकन और चरित्र-चित्रण करना सत्य सिद्धांतों के पूर्णतः अनुरूप है। इन मुद्दों पर संगति के जरिये लोगों को मनुष्य के सार और उस प्रभाव के बारे में जो परमेश्वर का कार्य हासिल करना चाहता है, सही विचार और समझ होनी चाहिए। सत्य के इस पहलू को समझने के बाद क्या लोगों को सुसमाचार सुनाते समय या उनके साथ जुड़ते और संगति करते समय तुम कम बाधित नहीं होगे, चाहे वे किसी भी प्रकार के व्यक्ति हों—चाहे उनकी धार्मिक पृष्ठभूमि हो या न हो, समाज में उनकी प्रतिष्ठा और रुतबा हो या निम्न सामाजिक रुतबा हो, और चाहे वे गोरे हों या अश्वेत? (हाँ।) अगर तुम ये सत्य नहीं समझते तो तुम हमेशा अन्य जातियों के लोगों को उच्च दृष्टि से देखोगे या महसूस करोगे कि तुम उनकी थाह नहीं पा सकते और नहीं जानते कि उनके साथ संगति या मेलजोल कैसे करें। क्या ये सत्य समझना तुम लोगों को उन लोगों के साथ जुड़ने में मदद नहीं करता? यह तुम लोगों को संपूर्ण मानवजाति को सही रवैये और सही दृष्टिकोण से देखने में मदद करेगा। सत्य समझने का यही लाभ है। जब तुम सत्य समझते हो, तो चीजों के प्रति तुम्हारा परिप्रेक्ष्य सही होगा और वह अपेक्षाकृत उदार भी होगा, उतना संकीर्ण नहीं। अन्यथा एक अगुआ या कार्यकर्ता के रूप में तुममें हमेशा आत्मविश्वास की कमी रहेगी। पहले, तुम्हें लगेगा कि तुम्हारे पास जीवन का अनुभव नहीं है। दूसरे, तुम्हें लगेगा कि तुम्हारे पास पर्याप्त अनुभव नहीं हैं। तीसरे, तुम्हें लगेगा कि तुम बोलने में अच्छे नहीं हो और ज्यादातर लोगों की दशाओं की असलियत नहीं जान सकते; खासकर जब तुम बुजुर्ग लोगों को देखते हो, तो तुम डरोगे और घबराओगे और बोलने की हिम्मत नहीं करोगे। कुछ लोग कहते हैं, “खासकर जब मैं देखता हूँ कि लंबे समय से धर्म में विश्वास रखने वालों को बाइबल का कुछ ज्ञान है, तो मुझे समझ नहीं आता कि उन्हें सुसमाचार कैसे सुनाऊँ, और मैं डर जाता हूँ और खुद को उनसे हीन समझता हूँ।” तुम बहुत सारे सत्य समझते हो तो फिर तुम्हें किस बात का डर है? क्या यह मामलों की असलियत जानने में असमर्थ होना नहीं है? जब लोग सत्य समझ लेते हैं तो उन्हें इन मामलों और समस्याओं को सुलझाने में समर्थ होना चाहिए, और वे अब इन चीजों से बाधित नहीं होंगे।

आज हमने जिन विषयों पर संगति की है, उनके जरिये तुम लोगों ने सत्य के किन पहलुओं को समझा है? क्या तुम्हें परमेश्वर का कार्य और परमेश्वर लोगों को कैसे बचाता है, लोगों को बचाने के परमेश्वर के तरीके और लोगों के वे पहलू जिन्हें परमेश्वर बदलता है, स्पष्ट हैं? (हाँ।) अब जबकि तुम्हें ये चीजें स्पष्ट हैं, तो क्या तुम सत्य का अभ्यास करने और हर चीज का मूल्यांकन सत्य से करने का महत्व और भी ज्यादा महसूस नहीं करते? (हाँ।) क्या तुम यह और भी ज्यादा नहीं सोचते कि सत्य का अनुसरण करना और उसे समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है? अगर व्यक्ति सत्य नहीं समझता तो वह किसी भी मामले की असलियत नहीं जान सकता, वह सभी प्रकार के लोगों की असलियत नहीं जान सकता, और वह सभी देशों और जातियों के लोगों की असलियत नहीं जान सकता, और इसलिए वह मूर्ख है, मंदबुद्धि है। जब कुछ लोग चश्मा पहनने वाले लोगों को देखते हैं तो मान लेते हैं कि वे प्रोफेसर या बुद्धिजीवी हैं, इसलिए वे बाधित महसूस करते हैं और बोलने की हिम्मत नहीं करते, और जब भी वे लंबे और सुंदर लोगों को देखते हैं, तो वे उनसे हीन महसूस करते हैं। क्या सत्य समझने के बाद लोग मूल रूप से इन चीजों से प्रभावित नहीं होंगे? इसका एक पहलू तो यह है कि वे खुद को बाधित नहीं करेंगे; दूसरा पहलू यह है कि वे—कुछ हद तक—लोगों और चीजों से निपटने के संबंध में अपना रवैया और दृष्टिकोण सुधारेंगे और उन्हें इस बारे में कुछ अंतर्दृष्टि भी प्राप्त होगी। यह उनके कर्तव्य निर्वहन के लिए लाभदायक होगा, खासकर जब बात सभी स्तरों पर अगुआओं और कार्यकर्ताओं द्वारा कार्य के निर्वहन की हो।

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें