सत्य का अनुसरण कैसे करें (3) भाग तीन
2. अपनी जन्मजात स्थितियों से सही ढंग से पेश कैसे आएँ
परमेश्वर के कार्य के लक्ष्य और उसका वास्तविक महत्व समझने के बाद लोगों को अपनी अंतर्निहित स्थितियों का सही ढंग से सामना करने के लिए कैसे कार्य करना चाहिए? कितने सिद्धांत हैं? (मैं जो सोच सकता हूँ वह यह है कि लोगों को अपने व्यक्तित्व, काबिलियत और अन्य स्थितियों को सही ढंग से देखना चाहिए, अलौकिक चीजों का अनुसरण करना और अतिमानव बनने की कोशिश करना बंद कर देना चाहिए, जो कुछ वे करने में सक्षम हैं उसे अपनी पूरी क्षमता से करना चाहिए और खुद को वे चीजें हासिल करने पर मजबूर नहीं करना चाहिए जो उनकी पहुँच से परे हैं। इस तरह, उनका जीवन अधिक मुक्त होगा और उनकी मानवता अधिक से अधिक सामान्य होती जाएगी।) सबसे पहले, अगर तुम मूर्खतापूर्ण या बेवकूफी भरी चीजें करने से बचना चाहते हो, तो तुम्हें पहले अपनी स्थितियाँ समझनी होंगी : तुम्हारी काबिलियत कैसी है, तुम्हारी खूबियाँ क्या हैं, तुम किसमें अच्छे हो और किसमें अच्छे नहीं हो, साथ ही तुम अपनी उम्र, लिंग, अपने ज्ञान और अपनी अंतर्दृष्टियों और जीवन के अनुभव के आधार पर क्या कर सकते हो और क्या नहीं कर सकते। अर्थात् तुम्हें इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए कि तुम जो कर्तव्य निभाते हो और जो काम करते हो उसमें तुम्हारे मजबूत बिंदु और कमजोरियाँ क्या हैं और तुम्हारे व्यक्तित्व की कमियाँ और खूबियाँ क्या हैं। जब तुम अपनी स्थितियों, खूबियों और कमियों के बारे में स्पष्ट हो जाते हो, तब तुम्हें यह देखना चाहिए कि किन खूबियों और मजबूत बिंदुओं को बनाए रखना चाहिए, किन कमियों और खामियों पर काबू पाया जा सकता है और किन पर बिल्कुल भी काबू नहीं पाया जा सकता—इन चीजों के बारे में तुम्हें स्पष्ट होना चाहिए। यह स्पष्टता हासिल करने के लिए एक ओर तुम्हें सत्य खोजना चाहिए, परमेश्वर के वचनों की अपनी वास्तविक स्थिति से तुलना करके इन बातों पर चिंतन करना चाहिए और इन बातों का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए, और साथ ही, परमेश्वर से इन चीजों को प्रकट करने की प्रार्थना करनी चाहिए। दूसरी ओर, तुम अपने आस-पास के भाई-बहनों से भी पूछ सकते हो और उनसे अनुबोधन और संकेत प्राप्त कर सकते हो। इस तरह, तुम्हें अपनी गहरी समझ प्राप्त होगी, और खुद को जानने के मामले में तुम्हारे पास अधिक विचार और सूत्र होंगे। कुछ समस्याएँ ऐसी होती हैं जिन्हें लोग हल नहीं कर सकते हैं। मिसाल के तौर पर, हो सकता है कि तुम दूसरों से बात करते समय घबरा जाते हो; जब तुम्हें स्थितियों का सामना करना पड़ता है तो हो सकता है कि तुम्हारे पास अपने विचार और नजरिये होते हों, लेकिन तुम उन्हें स्पष्टता से कह नहीं पाते हो। जब बहुत सारे लोग मौजूद होते हैं तो तुम विशेष रूप से घबरा जाते हो; तुम बेतुके ढंग से बोलते हो और तुम्हारा मुँह कँपकँपाता है। कुछ लोग तो हकलाते भी हैं; दूसरे लोगों के मामले में, अगर विपरीत लिंग के सदस्य मौजूद होते हैं तो वे और भी कम बोधगम्य होते हैं, उन्हें यह पता ही नहीं होता है कि क्या कहना है या क्या करना है। क्या इस पर काबू पाना आसान है? (नहीं।) कम-से-कम थोड़े समय में तुम्हारे लिए इस दोष पर काबू पाना आसान नहीं है क्योंकि यह तुम्हारी जन्मजात स्थितियों का हिस्सा है। अगर कई महीनों के अभ्यास के बाद भी तुम घबराते हो तो घबराहट दबाव में बदल जाएगी, जो तुम्हें बोलने, लोगों से मिलने, सभाओं में हिस्सा लेने या धर्मोपदेश देने से डराकर तुम्हें नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगी और ये डर तुम्हें कुचल देंगे। तो तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम इस मुद्दे पर सोच-विचार कर सकते हो और दूसरों से इस बारे में बात कर सकते हो; देखो कि जब दूसरे लोगों के सामने यह समस्या आती है तो उनकी मानसिकता क्या होती है और वे इसे कैसे सुलझाते हैं और फिर तुम्हें भी इसी तरह से अभ्यास करना चाहिए। मान लो कि आज की सभा में तुम काफी अच्छी मनःस्थिति में हो; तुम प्रसन्नचित्त हो, और यही नहीं, तुम परमेश्वर के वचन पढ़कर प्रभावित भी होते हो, और तुम खुद को अभिव्यक्त करने की खास इच्छा महसूस करते हो। संयोग से यह एक छोटा समूह है जिसमें कुछ ही लोग हैं, इसलिए तुम कुछ शब्द संगति करने की कोशिश करते हो और इसे लेकर काफी अच्छा महसूस करते हो, घबराते नहीं हो। ऐसे में, जब तुम किसी दबाव में नहीं होते और तुमने बिल्कुल भी तैयारी नहीं की होती, तो तुम खुलकर खुद को अभिव्यक्त करते हो, और हर कोई इससे सचमुच प्रभावित और आत्मिक रूप से प्रेरित होता है। क्या यह प्रगति नहीं है? बस छोटे समूहों में, जहाँ कम लोग हों, बोलने और संगति करने का अभ्यास शुरू करो, और धीरे-धीरे तुम सामान्य रूप से बोल पाओगे और तुम्हारी घबराहट धीरे-धीरे कम होती जाएगी। इस तरह अभ्यास करने से सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त होंगे। पहले, इसका अभ्यास करने के लिए एक छोटा समूह, जिसमें कम लोग हों, या एक अनौपचारिक माहौल चुनो, जहाँ तुम बिना किसी तैयारी के इस तरह बातचीत और संगति करो मानो गपशप कर रहे हो, ताकि अपनी यह कमी दूर कर सको। कभी-कभी, एक मिनट बोलने के बाद तुम्हें थोड़ी घबराहट महसूस हो सकती है, जितना ज्यादा तुम बोलते हो उतना ही तुम्हें आत्मविश्वास कम होता महसूस हो सकता है और जितना तुम जारी रखते हो उतना ही तुम्हारे पास कहने के लिए कम बचेगा; ऐसे मामलों में और मत बोलो—जल्दी से अपनी बात खत्म करो और रुक जाओ। कभी-कभी, तुम्हारे कुछ देर बोलने के बाद हर कोई सुनने का इच्छुक हो सकता है और बहुत मुक्त महसूस कर सकता है; ऐसे माहौल में तुम्हारी घबराहट और तनाव तुम्हें पता चले बिना ही दूर हो जाएँगे। सिर्फ ऐसी ही परिस्थितियों में तुम्हारी यह कमी धीरे-धीरे सुधर सकती है—लेकिन इस पर काबू नहीं पाया जा सकेगा। अगर तुम्हें लगता है कि एक महीने के प्रशिक्षण के बाद भी तुम्हारी स्थिति में ज्यादा सुधार नहीं हुआ है और तुम्हारे दिल में ऐसा दबाव भी पैदा हो गया है जिससे तुम और ज्यादा घबरा जाते हो, जो तुम्हारे सामान्य कार्य, जीवन और कर्तव्य के निर्वहन को प्रभावित करता है तो तुम्हें प्रशिक्षण जारी रखने की जरूरत नहीं है। अगर तुम अपना कर्तव्य सामान्य रूप से कर पाते हो तो इतना ही काफी है। बस अपने कर्तव्य को अच्छी तरह निभाने पर ध्यान केंद्रित करो—यह सही है। उस कमी, उस दोष को अपने दिल में रखो, खामोशी से परमेश्वर से प्रार्थना करो और फिर बोलने और लोगों से मिलने-जुलने के लिए उपयुक्त अवसर ढूँढ़ो, हर शब्द को साफ-साफ, सुव्यवस्थित और स्पष्ट ढंग से बोलकर तुम जो भी कहना चाहते हो उसे व्यक्त करो। इस तरह तुम्हारी कमी, यह दोष, धीरे-धीरे सुधर जाएगा। संभव है कि एक-दो वर्ष बाद तुम उम्र के साथ ज्यादा परिपक्व हो जाओ और अपने आस-पास के लोगों से ज्यादा परिचित हो जाओ और उनकी नजर, राय और जब सभी एक साथ होते हैं तो उस दौरान बना माहौल अब तुम्हारे लिए दबाव, बंधन या बेबसी पैदा न करे—तब हो सकता है कि इन लोगों के बीच तुम्हारा दोष काबू में आ जाए और दूर हो जाए। इसी प्रकार के व्यक्ति में इस दोष का सबसे गंभीर रूप होता है; वह इसे केवल ऐसे परिवेशों में लंबे समय तक तपकर और प्रशिक्षण लेकर दूर कर पाता है। यकीनन, ऐसे लोग भी हैं जो तीन से पाँच महीने की छोटी अवधि में धीरे-धीरे इस दोष को दूर कर लेते हैं। वे आम परिस्थितियों में दूसरों से मिलते-जुलते और बातचीत करते समय घबराते नहीं हैं, सिवाय तब जब उन्हें बड़े अवसरों का सामना करना पड़ता है। इसलिए अगर तुम इस कमी, इस दोष पर थोड़े समय में काबू पा सकते हो तो ऐसा करो। अगर इस पर काबू पाना कठिन है तो इसे लेकर परेशान मत होओ, इससे संघर्ष मत करो और खुद को चुनौती मत दो। यकीनन, अगर तुम इस पर काबू नहीं पा सकते हो तो तुम्हें नकारात्मक महसूस नहीं करना चाहिए। अगर तुम अपने जीवनकाल में इसे कभी दूर न कर पाओ तो भी परमेश्वर तुम्हारी निंदा नहीं करेगा क्योंकि यह तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव नहीं है। तुम्हारा मंच पर आने का भय, तुम्हारी घबराहट और डर—ये अभिव्यक्तियाँ तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव को नहीं दर्शाती हैं; चाहे वे जन्मजात हों या जीवन में बाद के परिवेश के कारण पैदा हुई हों, हद-से-हद वे एक कमी हैं, तुम्हारी मानवता का एक दोष हैं। अगर तुम इसे लंबे समय में, यहाँ तक कि अपने जीवनकाल में भी नहीं बदल पाते हो तो भी इसके बारे में सोचते मत रहो, इसे खुद को बेबस मत करने दो और न ही तुम्हें इसके कारण नकारात्मक बनना चाहिए क्योंकि यह तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव नहीं है; इसे बदलने का प्रयास करने या इससे संघर्ष करने का कोई फायदा नहीं है। अगर तुम इसे बदल नहीं पाते हो तो इसे स्वीकार कर लो, इसे मौजूद रहने दो और इसके साथ सही ढंग से पेश आओ क्योंकि तुम इस कमी, इस दोष के साथ-साथ जी सकते हो—तुममें इसका होना परमेश्वर के अनुसरण और अपने कर्तव्य निर्वहन को प्रभावित नहीं करता है। अगर तुम सत्य स्वीकार कर सकते हो और अपनी पूरी क्षमता से अपने कर्तव्य कर सकते हो तो तुम अभी भी बचाए जा सकते हो; यह तुम्हारे द्वारा सत्य स्वीकार करने और तुम्हारे उद्धार प्राप्त करने को प्रभावित नहीं करता है। इसलिए तुम्हें अक्सर अपनी मानवता में किसी कमी या दोष से बेबस नहीं होना चाहिए और न ही तुम्हें अक्सर नकारात्मक और हतोत्साहित होना चाहिए या यहाँ तक कि न अपने कर्तव्य छोड़ने चाहिए और न सत्य का अनुसरण करना छोड़ना चाहिए और न उसी कारण से बचाए जाने का मौका खोना चाहिए। यह कतई इसके लायक नहीं है; ऐसा कोई बेवकूफ, जाहिल व्यक्ति ही करेगा।
कुछ लोग गाते समय केवल मध्यम सुरों तक ही पहुँच पाते हैं और चाहे कितना भी अभ्यास कर लें, उच्च सुरों तक नहीं पहुँच पाते। तो इसके बारे में क्या किया जा सकता है? बस मध्यम और निम्न सुरों के दायरे में ही गाओ; उन्हीं सुरों को अच्छी तरह से गाना ठीक है। अगर तुम यह कहते हुए लगातार खुद को चुनौती देते रहना चाहते हो, “मैं मध्यम सुरों को अच्छा गा सकता हूँ। मैं खुद को उच्च सुरों तक पहुँचने की चुनौती देना चाहता हूँ,” तो अगर तुम इस चुनौती में सफल हो जाओ, तो भी यह निरर्थक होगा, और इसका मतलब यह नहीं होगा कि तुमने सत्य प्राप्त कर लिया है। ज्यादा से ज्यादा, इसका मतलब बस इतना होगा कि तुमने एक अतिरिक्त कौशल हासिल कर लिया है, तुम एक अतिरिक्त कर्तव्य निभा सकते हो, तुम कुछ और गीत गा सकते हो, और तुम थोड़ा और ज्यादा चर्चा में रह सकते हो। लेकिन इससे क्या होगा? क्या ज्यादा चर्चा में रहने का मतलब यह है कि तुम सत्य का ज्यादा अभ्यास कर रहे हो? क्या इन दोनों चीजों के बीच कोई संबंध है? (नहीं।) अगर तुम मध्यम सुरों को गा सकते हो तो उन्हें अच्छी तरह गाओ। अगर तुम उच्च सुरों को अच्छी तरह नहीं गा सकते लेकिन उन्हें गाने के लिए जोर लगाते हो और अंततः सही ढंग से नहीं गा पाते और थकान से खुद को बीमार भी कर लेते हो, तो परमेश्वर इसे याद नहीं रखेगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम उच्च सुरों को गा सकते हो या मध्यम सुरों को, अगर तुम अच्छा गा सकते हो, समर्पित रह सकते हो और बिना लापरवाही किए या धूर्तता और ढिलाई बरते, या बिना बेतहाशा दुष्कर्म किए, या भव्य लगने वाले विचार झाड़े बिना अपने कर्तव्य में सर्वस्व दे सकते हो, और तुम—चाहे तकनीक के संदर्भ में हो या भावना, तान संबंधी गुणवत्ता और सुरों के संदर्भ में—एक मानक, सुंदर तरीके से गाने का प्रयास करते हो जो दिल को छू जाए, और इस तरह गाने का प्रयास करते हो जो लोगों को भावुक कर सके, परमेश्वर के सामने लोगों के दिल शांत कर सके और जब लोग तुम्हें सुनें तो उन्हें आत्मिक उन्नयन मिले, तो यह मानक स्तर के तरीके से अपना कर्तव्य निभाना है। अगर तुम हमेशा अपनी सीमाओं को चुनौती देना चाहते हो और हमेशा व्यक्तिगत उल्लेखनीय प्रगति हासिल करना और खुद से आगे निकलना चाहते हो, तो यह अपना शैतानी भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करना है और यह अपना कर्तव्य निभाना नहीं है। अपना काम ठीक से करने और जो कुछ तुम ठीक से कर सकते हो उसे करने के बाद अपने खाली समय में अपने कर्तव्य के लिए कुछ उपयोगी चीज सीखना ठीक है, लेकिन परमेश्वर इसकी अपेक्षा नहीं करता। मान लो, तुम मध्यम सुरों को अच्छे से गाते हो और अपने खाली समय में उच्च सुरों को गाने का अभ्यास करते हो। कुछ समय बाद तुम्हें सफलता मिलती है और दो-तीन साल की कड़ी मेहनत के बाद तुम उच्च सुरों को भी अच्छी तरह से गाने में समर्थ हो जाते हो। तुम मध्यम और उच्च दोनों सुरों को गाने में और ये दोनों कर्तव्य पूरे करने में समर्थ हो; तुम ये दोनों कर्तव्य सत्य सिद्धांतों के अनुसार निभाने और पूरे मन से, बिना किसी लापरवाही, धूर्तता या ढिलाई के या भव्य लगने वाले विचार झाड़े बिना गाने में समर्थ हो। यह और भी बेहतर है, यह एक अच्छा कर्म है, और परमेश्वर इसे याद रखेगा। लेकिन मान लो, तुम इसे हासिल नहीं कर सकते, और फिर भी हमेशा सोचते हो, “परमेश्वर को मुझसे बहुत उम्मीदें हैं, अगर मैं सिर्फ बीच के सुरों को गाता हूँ तो क्या मैं धूर्त और सुस्त नहीं हूँ? परमेश्वर संतुष्ट नहीं है!” यह तुम्हारी अपनी कल्पना है। तुम परमेश्वर के बारे में अटकलें लगा रहे हो, और “कुलीन लोगों को तुच्छ लोगों के मानदंड से मापने” के अभ्यास में संलग्न हो। परमेश्वर ने तुमसे ऐसी कोई अपेक्षाएँ नहीं की हैं। परमेश्वर तुमसे यही अपेक्षा करता है कि तुम अपनी अंतर्निहित काबिलियत और क्षमताओं के दायरे में वह काम अच्छी तरह से करो जो तुम्हें करना चाहिए, और अगर तुम परमेश्वर द्वारा अपेक्षित सिद्धांतों के अनुसार उसे अच्छी तरह से करते हो, तो परमेश्वर तुम्हें पहले ही पूरे अंक दे चुका होगा। लेकिन अगर तुम जो काम करने में समर्थ हो उसे अच्छी तरह से करने की कोशिश नहीं करते, और तुम उसे सिद्धांतों के अनुसार नहीं करते, हमेशा धूर्त और सुस्त रहते हो और हमेशा भव्य लगने वाले विचार झाड़ना चाहते हो, और गायन की विभिन्न तकनीकों का अभ्यास नहीं करते, लेकिन फिर भी अपनी सीमाओं को चुनौती देना चाहते हो, तो तुम्हारा ऐसा करना विवेकहीन है, यह अहंकार और अज्ञानता की अभिव्यक्ति है, और परमेश्वर इससे प्रसन्न नहीं होगा। वह यह बिल्कुल नहीं कहेगा, “यह व्यक्ति मध्यम सुरों को गा सकता है और उच्च सुरों को भी गाने की कोशिश कर रहा है। हालाँकि यह उच्च सुरों को अच्छी तरह नहीं गा सकता, लेकिन यह इसकी कर्तव्यनिष्ठा है, और यह काफी है।” परमेश्वर तुम्हें इस नजर से नहीं देखेगा, इसलिए अपने बारे में अच्छा महसूस मत करो। परमेश्वर सिर्फ यह देखता है कि क्या तुम अपने पद के अनुरूप तरीके से आचरण करते हो और क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सृजित प्राणी के कर्तव्यों का निर्वहन अच्छी तरह से करता है। वह यह देखता है कि परमेश्वर द्वारा तुम्हें दी गई अंतर्निहित परिस्थितियों के तहत, क्या तुम अपने कर्तव्य निर्वहन में अपना पूरा दिल और ताकत लगाते हो और क्या तुम सिद्धांतों के अनुसार कार्य करते हो और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप परिणाम प्राप्त करते हो। अगर तुम इन सभी चीजों को पूरा कर पाते हो तो परमेश्वर तुम्हें पूरे अंक देता है। मान लो तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार चीजें नहीं करते और अगर तुम कड़ी मेहनत और प्रयास करते भी हो तो भी वह सब अपनी शान दिखाने और दिखावा करने के लिए होता है और तुम सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य नहीं करते या परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपने कर्तव्य निर्वहन में अपना पूरा दिल और शक्ति नहीं लगाते। उस स्थिति में, तुम्हारी अभिव्यक्तियाँ और व्यवहार परमेश्वर के लिए घृणित है। परमेश्वर उनसे नफरत क्यों करता है? परमेश्वर कहता है कि तुम उचित कार्यों पर ध्यान केंद्रित नहीं कर रहे हो, तुमने अपने कर्तव्य निर्वहन में अपना पूरा दिल, शक्ति या मन नहीं लगाया है और तुम सही मार्ग पर नहीं चल रहे हो। परमेश्वर ने तुम्हें जो काबिलियत, गुण और प्रतिभाएँ दी हैं, वे पहले से ही पर्याप्त हैं—बात बस इतनी है कि तुम संतुष्ट नहीं हो, अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित नहीं हो, तुम्हें कभी भी अपनी जगह पता नहीं होती है, तुम हमेशा भव्य लगने वाले विचार झाड़ने और दिखावा करने की इच्छा रखते हो जिससे अंत में तुम अपने कर्तव्यों में गड़बड़ कर देते हो। परमेश्वर ने तुम्हें जो काबिलियत, गुण और प्रतिभाएँ दी हैं, तुमने उनका उपयोग नहीं किया है, तुमने पूरा प्रयास नहीं किया है और तुमने कोई परिणाम प्राप्त नहीं किया है। हालाँकि तुम काफी व्यस्त रहते होगे, लेकिन परमेश्वर कहता है कि तुम एक विदूषक जैसे हो, ऐसे व्यक्ति नहीं हो जो अपनी जगह जानता है और अपने उचित कार्यों पर ध्यान केंद्रित करता है। परमेश्वर ऐसे लोगों को पसंद नहीं करता है। इसलिए, चाहे तुम्हारी योजनाएँ और लक्ष्य कुछ भी हों, अगर तुम अंततः परमेश्वर द्वारा अपेक्षित सिद्धांतों के अनुसार अपने पूरे हृदय, अपने पूरे मन और अपनी पूरी शक्ति के साथ, उस अंतर्निहित काबिलियत, गुणों, प्रतिभाओं, क्षमताओं और अन्य स्थितियों के आधार पर अपना कर्तव्य नहीं निभाते जो परमेश्वर ने तुम्हें दी हैं, तो परमेश्वर याद नहीं रखेगा कि तुमने क्या किया है, और तुम अपना कर्तव्य नहीं निभा रहे होगे, बल्कि तुम बुराई कर रहे होगे।
क्या तुमने अपनी जन्मजात स्थितियों—यानी अपनी खुद की स्थितियों, खूबियों और कमियों—से सही तरीके से निपटने के अभ्यास का सिद्धांत समझ लिया है? (हाँ।) पहला कदम क्या है? पहले, परमेश्वर द्वारा दिए गए अंतर्निहित और मौजूदा गुणों, क्षमताओं और शक्तियों का, और उन तकनीकी या व्यावसायिक कौशलों का भी, जिन्हें तुम प्राप्त और हासिल कर सकते हो, भरपूर इस्तेमाल करो और पीछे मत हटो। अगर तुम इन सभी बातों के संदर्भ में परमेश्वर को संतुष्ट कर चुके हो और तुम्हें लगता है कि तुम अभी और भी ऊँचाइयाँ छू सकते हो, तो जो कुछ तुम्हारी काबिलियत हासिल कर सकती है उसके दायरे में उन तकनीकी या व्यावसायिक कौशलों पर गौर करो जिनमें तुम सुधार कर सकते हो या कोई उल्लेखनीय प्रगति कर सकते हो। तुम अपनी काबिलियत से जो प्राप्त कर सकते हो, उसके आधार पर सीखना और सुधार करना जारी रख सकते हो। तो व्यक्ति को परमेश्वर के कार्य के बारे में अपनी धारणाएँ और कल्पनाएँ त्यागने का अभ्यास कैसे करना चाहिए? सबसे पहले, तुम्हें यह समझना है कि तुम्हारी जन्मजात स्थितियाँ क्या हैं, परमेश्वर ने तुम्हें क्या दिया है, तुम्हें उन चीजों का इस्तेमाल कैसे करना चाहिए, और उनकी पूरी क्षमता को कैसे उजागर करना चाहिए और उनका अधिकतम लाभ कैसे उठाना चाहिए, और अपना कर्तव्य निष्ठापूर्वक निभाने के लिए उन्हें बाधाओं के बजाय बुनियादी स्थितियों में कैसे बदलना चाहिए। अपनी खूबियों को समझो और उन्हें काम में लाओ। अपनी कमियों और दोषों को समझो और अगर तुम उन्हें थोड़े समय में बदल सकते हो तो बदल दो; अगर उन्हें बदलना आसान नहीं है तो उन्हें अपना कर्तव्य निभाने की प्रक्रिया में ठोकरें या रुकावटें मत बनने दो, उनसे बाधित या प्रभावित मत हो, और उन्हें अपने हाथ-पैर बाँधने वाली बेड़ियाँ मत बनने दो। उदाहरण के लिए मान लो, तुम खराब स्वास्थ्य और कमजोर शारीरिक बनावट के साथ पैदा हुए हो, और तुम लगातार इस पर काबू पाना चाहते हो, और एक सामान्य व्यक्ति की तरह खाना-पीना और देर तक जागना चाहते हो, लेकिन परमेश्वर ने तुम्हें वह पूँजी नहीं दी है। तो तुम्हें अपनी स्थितियों के अनुसार हर दिन का सामना करना चाहिए और परमेश्वर द्वारा अपेक्षित सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना चाहिए। खुद को चुनौती मत दो और अपनी कमियों और दोषों को परमेश्वर का अनुसरण करने, अपना कर्तव्य निभाने और सत्य का अनुसरण करने के अपने मार्ग में ठोकरें और रुकावटें मत बनने दो; उन्हें अपने नकारात्मक होने का कारण मत बनने दो, और इससे भी बढ़कर, सत्य का अनुसरण करना या अपना कर्तव्य निभाना मत छोड़ो, या सिर्फ इसलिए दूसरों से ईर्ष्या और घृणा मत करो क्योंकि तुममें कुछ कमियाँ, दोष और अपर्याप्तताएँ हैं—इनमें से कुछ नहीं होना चाहिए। तुम्हें अपनी कमियों और दोषों के साथ सही ढंग से पेश आना चाहिए; अगर तुम उन्हें बदल नहीं सकते तो तुम्हें उन्हें रहने देना चाहिए, और फिर परमेश्वर के इरादे समझने के लिए सत्य खोजना चाहिए, और उन्हें सही ढंग से समझने में सक्षम होना चाहिए और उनसे बाधित नहीं होना चाहिए। तुम्हें ऐसा क्यों करना है? यही वह विवेक है जो सामान्य मानवता में होना चाहिए। अगर तुम्हारी मानवता का विवेक सामान्य है तो तुम्हें अपनी कमियों और दोषों का सही तरीके से सामना करना चाहिए; तुम्हें उन्हें मान और स्वीकार लेना चाहिए। यह तुम्हारे लिए फायदेमंद है। उन्हें स्वीकारने का मतलब उनसे बेबस होना नहीं है और न ही इसका मतलब उनके कारण अक्सर नकारात्मक होना है, बल्कि इसका मतलब उनसे बेबस न होना है, यह पहचानना है कि तुम भ्रष्ट मानवजाति के एक साधारण सदस्य हो जिसमें अपने खुद के दोष और कमियाँ हैं और कुछ भी शेखी बघारने लायक नहीं है, कि यह परमेश्वर ही है जो लोगों को उनका कर्तव्य निभाने के लिए उन्नत करता है और परमेश्वर उनमें अपने वचन और जीवन को क्रियान्वित करने का इरादा रखता है, ताकि वे उद्धार प्राप्त कर सकें और शैतान के प्रभाव से बच सकें—कि यह पूरी तरह से परमेश्वर द्वारा लोगों को उन्नत करना है। दोष और कमियाँ हर किसी में होती हैं। तुम्हें अपने दोषों और कमियों को अपने साथ मौजूद रहने देना चाहिए; उनसे मत बचो या उन्हें मत छिपाओ और उनके कारण अक्सर अंदर से दमित महसूस मत करो या यहाँ तक कि उनके कारण हमेशा हीन महसूस मत करो। तुम हीन नहीं हो; अगर तुम पूरे दिल से, पूरी शक्ति से, पूरे मन से और अपनी पूरी क्षमता से अपना कर्तव्य निभा सकते हो और तुम्हारा दिल ईमानदार है तो परमेश्वर के सामने तुम सोने जितने बेशकीमती हो। अगर अपना कर्तव्य निभाते हुए तुम कीमत नहीं चुका सकते और तुममें निष्ठा नहीं है तो अगर तुम्हारी जन्मजात स्थितियाँ औसत व्यक्ति से बेहतर भी हों, तो भी तुम परमेश्वर के सामने बेशकीमती नहीं हो, तुम्हारी कीमत रेत के एक कण जितनी भी नहीं है। क्या तुम समझ गए? (हाँ।) चाहे वह तुम्हारा प्राकृतिक रूप हो, तुम्हारी प्राकृतिक काबिलियत और प्रतिभाएँ या तुम्हारी मानवता के किसी पहलू की कमियाँ और अपर्याप्तताएँ, उन्हें खुद को बेबस और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी निष्ठा और समर्पण को प्रभावित मत करने दो, उन्हें सत्य के तुम्हारे अनुसरण को प्रभावित मत करने दो, और बेशक, इससे भी बढ़कर उन्हें तुम्हारे उद्धार के बड़े मामले को प्रभावित मत करने दो। तुम्हें अपनी कमियों और अपर्याप्तताओं का सही ढंग से सामना करना चाहिए और उन्हें अपने साथ सह-अस्तित्व में रहने देना चाहिए, अर्थात् तुम्हें अब उन्हें बदलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वे तुम्हारे पूरे दिल, दिमाग और शक्ति से किए जाने वाले तुम्हारे कर्तव्य निर्वहन को जरा भी प्रभावित नहीं करेंगी, और बेशक, वे सिद्धांतों के अनुसार किए जाने वाले तुम्हारे कर्तव्य निर्वहन को भी प्रभावित नहीं करेंगी, और परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास में तुम्हारे जीवन भर के सत्य के अनुसरण को तो बिल्कुल भी प्रभावित नहीं करेंगी, या इस बात को प्रभावित नहीं करेंगी कि तुम लोगों या चीजों को कैसे देखते हो और सत्य के अनुसरण की प्रक्रिया में तुम कैसे आचरण और कार्य करते हो। बेशक, तुम्हें हमेशा यह सोचते हुए खुद से माँगें नहीं करनी चाहिए, “यह दोष मत दिखाओ, दूसरों को मेरी कमियाँ मत दिखाओ, और दूसरों को मुझे नीची नजर से मत देखने दो!” अगर तुम ऐसा करते हो तो तुम बहुत थकाऊ जीवन जियोगे। अगर तुम अपनी कमियों और खामियों को अपने साथ सह-अस्तित्व में रहने देते हो, तो उन्हें अस्तित्व में रहने दो, और अगर दूसरे तुम्हारी कमियाँ देख भी लें, तो यह तुम्हारे लिए फायदेमंद भी हो सकता है, और एक सुरक्षा भी, जो तुम्हें अहंकारी और घमंडी बनने से रोकेगी। बेशक, कई लोगों को अपनी कमियाँ और खामियाँ प्रकट करने के लिए साहस की जरूरत होती है। कुछ लोग कहते हैं, “हर कोई अपनी खूबियाँ और गुण प्रकट करता है। कौन जानबूझकर अपनी कमजोरियाँ और खामियाँ प्रकट करेगा?” ऐसा नहीं है कि तुम जानबूझकर उन्हें प्रकट करते हो, बल्कि तुम उन्हें प्रकट होने देते हो। उदाहरण के लिए, अगर तुम डरपोक हो और अक्सर बहुत सारे लोगों के आस-पास होने पर बोलते समय घबरा जाते हो, तो तुम दूसरों से यह कहने की पहल कर सकते हो, “मैं बोलते समय आसानी से घबरा जाता हूँ; मैं बस यह चाहता हूँ कि हर कोई मेरी स्थिति समझे और मेरी आलोचना न करे।” तुम अपनी कमियाँ और खामियाँ हर किसी के सामने प्रकट करने की पहल करो, ताकि वह तुम्हारी स्थिति समझ सके और तुम्हें सहन कर सके, और ताकि हर कोई तुम्हें जान जाए। जितना ज्यादा हर कोई तुम्हें जानेगा, तुम्हारा दिल उतना ही ज्यादा शांत होगा, और तुम अपनी कमियों और खामियों से उतने ही कम बाधित होगे। यह असल में तुम्हारे लिए फायदेमंद और मददगार होगा। हमेशा अपनी कमियाँ और खामियाँ छिपाना यह साबित करता है कि तुम उनके साथ सह-अस्तित्व में नहीं रहना चाहते। अगर तुम उन्हें अपने साथ सह-अस्तित्व में रहने देते हो, तो तुम्हें उन्हें प्रकट करना होगा; शर्मिंदा या हतोत्साहित महसूस मत करो, और खुद को दूसरों से हीन मत समझो, या यह मत सोचो कि तुम बेकार हो और तुम्हारे बचाए जाने की कोई उम्मीद नहीं है। जब तक तुम सत्य का अनुसरण कर सकते हो और अपना कर्तव्य सिद्धांतों के अनुसार पूरे दिल, पूरी शक्ति और पूरे मन से निभा सकते हो और तुम्हारा हृदय सच्चा है और तुम परमेश्वर के प्रति लापरवाह नहीं हो, तब तक तुम्हारे बचाए जाने की उम्मीद है। अगर कोई कहता है, “देखो तुम कितने निकम्मे और डरपोक हो। तुम कुछ शब्द बोलने पर ही इतने घबरा जाते हो और तुम्हारा पूरा चेहरा लाल हो जाता है,” तो तुम्हें कहना चाहिए, “मुझमें खराब काबिलियत है और मैं अच्छी तरह नहीं बोल पाता। अगर तुम लोग मुझे प्रोत्साहित करो, तो मुझे बोलने का अभ्यास करने का साहस मिलेगा।” यह मत सोचो कि तुम निकम्मे हो या शर्मिंदगी का कारण हो। चूँकि तुम जानते हो कि तुम्हारी मानवता में ये दोष और समस्याएँ हैं, इसलिए तुम्हें उनका सामना करना चाहिए और उन्हें स्वीकारना चाहिए। उनकी वजह से किसी भी तरह प्रभावित मत हो। रही बात कि ये दोष और खामियाँ कब बदलेंगी, तो इसकी चिंता मत करो। बस इस तरह सामान्य रूप से जीने और अपना कर्तव्य निभाने पर ध्यान केंद्रित करो। तुम्हें बस यह याद रखना है : मानवता के ये दोष और खामियाँ नकारात्मक चीजें या भ्रष्ट स्वभाव नहीं हैं, और अगर वे भ्रष्ट स्वभाव नहीं हैं तो वे तुम्हारे कर्तव्य निर्वहन या सत्य के तुम्हारे अनुसरण को प्रभावित नहीं करेंगी, और तुम्हारे उद्धार की प्राप्ति को तो वे बिल्कुल भी प्रभावित नहीं करेंगी; बेशक, इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि वे इस बात को प्रभावित नहीं करेंगी कि परमेश्वर तुम्हें कैसे देखता है। क्या इससे तुम्हारा मन शांत नहीं होता? (हाँ, होता है।) अगर तुम्हें अभी भी दूसरे लोगों द्वारा तुच्छ समझे जाने की चिंता है, तो यह तुम्हारे अहंकारी स्वभाव की समस्या है और तुम्हें इस अहंकारी स्वभाव का समाधान करना चाहिए। अपने दोषों और खामियों से सही तरीके से निपटने के लिए यही अभ्यास का मार्ग है। क्या इस तरह अभ्यास करने से तुम्हारे लिए इन चीजों को त्यागना और इनसे अब और बाधित नहीं होना आसान नहीं हो जाता है? (हो जाता है।)
क्या व्यक्ति के सामान्य कर्तव्य निर्वहन और उसकी मानवता के दोषों और खामियों का एक-दूसरे पर प्रभाव पड़ेगा? (परमेश्वर की संगति के जरिये अब मैं समझता हूँ कि मानवता के दोष और खामियाँ भ्रष्ट स्वभाव नहीं हैं, और वे लोगों के सामान्य कर्तव्य निर्वहन को प्रभावित नहीं करेंगी। अगर लोग सत्य सिद्धांतों के अनुसार अपने कर्तव्य निभाते हैं तो उन्हें अच्छे परिणाम प्राप्त होंगे। जहाँ तक मानवता के दोषों और अपर्याप्तताओं का प्रश्न है, अगर हम उन पर काबू पाने में समर्थ हैं तो हम ऐसा कर सकते हैं। अगर हम उन्हें थोड़े समय में दूर नहीं कर सकते तो हमें उन्हें मौजूद रहने देना चाहिए और उनसे सही तरीके से पेश आने में समर्थ होना चाहिए।) अगर तुम्हारी शिक्षा का स्तर कम है, लेकिन तुम्हें अपने कर्तव्य में शैक्षिक ज्ञान का उपयोग करने की आवश्यकता है, तो क्या यह एक प्रकार की कमी नहीं है? (है।) तो यह कठिनाई कैसे हल की जा सकती है? (इसके बजाय मैं कोई ऐसा कर्तव्य निभा सकता हूँ जो मेरे शिक्षा के स्तर के हिसाब से मेरे लिए उपयुक्त हो। या, अगर यह कर्तव्य मेरे लिए उपयुक्त है लेकिन इसके लिए एक निश्चित मात्रा में शैक्षिक ज्ञान की आवश्यकता है, तो मैं अपने साथ सहयोग करने के लिए कुछ शिक्षित भाई-बहनों की तलाश कर सकता हूँ—हम अपनी कमजोरियों की भरपाई के लिए एक-दूसरे की खूबियों का उपयोग कर सकते हैं और यह कर्तव्य एक-साथ पूरा कर सकते हैं।) क्या सत्य शिक्षा के निम्न स्तर की भरपाई कर सकता है? (कर सकता है, क्योंकि जब व्यक्ति के पास सत्य होता है तो वह चीजों की असलियत जान सकता है।) शिक्षा ज्ञान के स्तर की चीज है। चाहे तुम कितने भी ज्ञानी क्यों न हो, अगर तुम सत्य नहीं समझते, तो बोलते या लेख लिखते समय तुम केवल सही व्याकरण इस्तेमाल कर पाओगे, तुम सत्य से संबंधित मुद्दे स्पष्ट रूप से समझाने या हल करने में समर्थ नहीं हो पाओगे। इसलिए, शिक्षा महत्वपूर्ण नहीं है; सत्य शिक्षा से ज्यादा महत्वपूर्ण है। निस्संदेह, अगर तुम्हारे पास शिक्षा का आधार नहीं है, और अगर जो कर्तव्य तुम निभाते हो उसमें शैक्षिक ज्ञान शामिल है, तो तुम उसमें सक्षम नहीं होगे। लेकिन अगर तुम सत्य समझते हो तो तुम दूसरों का मार्गदर्शन कर सकते हो—तुम सत्य सिद्धांतों के लिहाज से जाँच कर सकते हो। अगर तुम्हारी शिक्षा का स्तर कम है और तुममें खुद को अभिव्यक्त करने की क्षमता नहीं है, और तुम सत्य पर धर्मोपदेश देना या संगति करना चाहते हो, तो तुम अपने प्रारूप व्यवस्थित करने में मदद के लिए कोई शिक्षित व्यक्ति खोज सकते हो। फिर जब तुम संगति करोगे या धर्मोपदेश दोगे, तो तुम्हारे लिए नतीजे प्राप्त करना आसान हो जाएगा। लेकिन कम से कम तुम्हें सत्य समझना होगा। अगर तुम सत्य नहीं समझते, और तुम अशिक्षित भी हो, तो तुम शैक्षिक ज्ञान से जुड़े कर्तव्य नहीं निभा पाओगे, इसलिए तुम्हें अपने शैक्षिक स्तर के अनुरूप कर्तव्य निभाना चाहिए। क्या इससे समस्या हल नहीं होती? (होती है।) तो, सत्य का अनुसरण करना सबसे महत्वपूर्ण चीज है, चाहे तुम इसे किसी भी परिप्रेक्ष्य से देखो। तुम मानवता की खराबियों और कमियों से बच सकते हो, लेकिन सत्य का अनुसरण करने के मार्ग से कभी नहीं बच सकते। चाहे तुम्हारी मानवता कितनी भी पूर्ण या महान क्यों न हो या चाहे दूसरे लोगों की तुलना में तुममें कम खामियाँ और खराबियाँ हों और तुम्हारे पास ज्यादा शक्तियाँ हों, इससे यह प्रकट नहीं होता है कि तुम सत्य समझते हो और न ही यह सत्य की तुम्हारी तलाश की जगह ले सकता है। इसके विपरीत, अगर तुम सत्य का अनुसरण करते हो, बहुत सारा सत्य समझते हो और तुम्हें इसकी पर्याप्त रूप से गहरी और व्यावहारिक समझ है, तो इससे तुम्हारी मानवता की कई खराबियों और समस्याओं की भरपाई हो जाएगी। मिसाल के तौर पर, मान लो कि तुम दब्बू और अंतर्मुखी हो, तुम हकलाते हो और तुम ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं हो—यानी, तुममें बहुत सारी कमियाँ और अपर्याप्तताएँ हैं—लेकिन तुम्हारे पास व्यावहारिक अनुभव है और वैसे तो तुम बात करते समय हकलाते हो, फिर भी तुम स्पष्टता से सत्य की संगति कर सकते हो और यह संगति हर सुनने वाले को उन्नत करती है, समस्याएँ हल करती है, लोगों को नकारात्मकता से उबरने में सक्षम बनाती है और परमेश्वर के बारे में उनकी शिकायतें और गलतफहमियाँ दूर करती है। देखो, वैसे तो तुम अपने शब्दों को हकलाकर बोलते हो, फिर भी वे समस्याएँ हल कर सकते हैं—ये शब्द कितने महत्वपूर्ण हैं! जब आम लोग उन्हें सुनते हैं तो वे कहते हैं कि तुम एक अशिक्षित व्यक्ति हो और जब तुम बोलते हो तो व्याकरण के नियमों का पालन नहीं करते हो और कभी-कभी तुम जिन शब्दों का उपयोग करते हो, वे वाकई उपयुक्त नहीं होते हैं। हो सकता है कि तुम क्षेत्रीय भाषा या रोजमर्रा की भाषा का उपयोग करते हो और तुम्हारे शब्दों में वह उत्कृष्टता और शैली नहीं होती है जो वाक्पटुता से बोलने वाले उच्च-शिक्षित लोगों में होती है। लेकिन तुम्हारी संगति में सत्य वास्तविकता होती है, यह लोगों की कठिनाइयाँ हल कर सकती है और जब लोग इसे सुनते हैं तो उसके बाद उनके चारों तरफ के सारे काले बादल छँट जाते हैं और उनकी सभी समस्याएँ सुलझ जाती हैं। देखो, क्या सत्य को समझना महत्वपूर्ण नहीं है? (है।) मान लो कि तुम सत्य नहीं समझते हो और भले ही तुम्हारे पास कुछ शैक्षिक ज्ञान हो और तुम वाक्पटुता से बोलते हो, लेकिन जब हर कोई तुम्हें बोलते हुए सुनता है तो वह सोचता है, “तुम्हारे शब्द सिर्फ धर्म-सिद्धांत हैं, उनमें रत्ती भर भी सत्य वास्तविकता नहीं है और वे वास्तविक समस्याएँ बिल्कुल भी हल नहीं कर पाते हैं तो क्या तुम्हारे ये सारे शब्द खोखले नहीं हैं? तुम सत्य नहीं समझते हो। क्या तुम बस एक फरीसी नहीं हो?” वैसे तो तुमने बहुत-से धर्म-सिद्धांत बोले, लेकिन समस्याएँ अनसुलझी रह गई हैं और तुम सोचते हो, “मैं तो बहुत सच्चाई और गंभीरता से बोल रहा था। तुम लोगों को मेरी बातें क्यों समझ में नहीं आई हैं?” तुमने ढेरों धर्म-सिद्धांत बोले लेकिन जो नकारात्मक थे वे नकारात्मक ही रह गए हैं और जिन लोगों को परमेश्वर के बारे में गलतफहमियाँ थीं, उनमें वे गलतफहमियाँ अब भी हैं और उनके कर्तव्यों के निर्वहन में जो भी कठिनाइयाँ मौजूद हैं उनमें से कोई भी हल नहीं हुई है—इसका मतलब है कि तुमने जो शब्द बोले वे सिर्फ बेहूदा बातें थीं। चाहे तुम्हारी मानवता में कितनी भी कमियाँ और दोष क्यों न हों, अगर तुम्हारे बोले गए शब्दों में सत्य वास्तविकता है तो तुम्हारी संगति समस्याएँ हल कर सकती है; अगर तुम्हारे बोले गए शब्द धर्म-सिद्धांत हैं और उनमें जरा-सा भी व्यावहारिक ज्ञान नहीं है तो चाहे तुम कितनी भी बातें क्यों न करो, तुम लोगों की वास्तविक समस्याएँ हल करने में समर्थ नहीं होगे। चाहे लोग तुम्हें कैसे भी क्यों न देखें, जब तक तुम जो चीजें कहते हो वे सत्य के अनुरूप नहीं होतीं और वे लोगों की दशाओं को संबोधित नहीं कर पातीं या लोगों की कठिनाइयाँ हल नहीं कर पातीं तब तक लोग उन्हें नहीं सुनना चाहेंगे। तो ज्यादा महत्वपूर्ण क्या है : सत्य या लोगों की अपनी स्थितियाँ? (सत्य ज्यादा महत्वपूर्ण है।) सत्य का अनुसरण करना और सत्य को समझना सबसे महत्वपूर्ण चीजें हैं। इसलिए चाहे तुम्हारी मानवता या तुम्हारी जन्मजात स्थितियों के लिहाज से तुममें कोई भी कमी क्यों न हो, तुम्हें उनसे बेबस नहीं होना चाहिए। बल्कि तुम्हें सत्य का अनुसरण करना चाहिए और सत्य को समझकर अपनी विभिन्न कमियों की भरपाई करनी चाहिए और अगर तुम्हें खुद में कुछ कमियों का पता चलता है तो तुम्हें उन्हें जल्दी से ठीक कर लेना चाहिए। कुछ लोग सत्य का अनुसरण करने पर ध्यान केंद्रित नहीं करते हैं, बल्कि वे हमेशा अपनी मानवता में कठिनाइयों, दोषों और कमियों को हल करने और अपनी मानवता की समस्याओं को सुधारने पर ध्यान केंद्रित करते हैं और यह पता चलता है कि वे स्पष्ट नतीजे प्राप्त किए बिना कई वर्षों तक प्रयास करते हैं और इसके फलस्वरूप वे खुद से निराश हो जाते हैं और सोचते हैं कि उनकी मानवता बहुत ही ज्यादा खराब है और वे सुधार के योग्य नहीं हैं। क्या यह बहुत बेवकूफी भरी बात नहीं है?
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?