सत्य का अनुसरण कैसे करें (3) भाग पाँच

जमीर के बारे में—हमने पहले क्या कहा था कि वह किसे संदर्भित करता है? वह सामान्य मानवता वाली न्याय और दयालुता की भावना को संदर्भित करता है। व्यक्ति को जमीर वाला कहलाने के लिए ईमानदार और दयालु होना चाहिए। तो, परमेश्वर में विश्वास करने लगने के बाद सामान्य मानवता वाली ईमानदारी और दयालुता को कैसे इष्टतम और उन्नत किया जा सकता है? उसे सत्य समझने की नींव पर निर्मित किया जाना चाहिए। अर्थात्, सत्य समझने के बाद जिस मानदंड के अनुसार वह आचरण और क्रियाकलाप करता है, वह एक सकारात्मक लक्ष्य होगा, जिसका उसके लिए और अन्य सभी के लिए सकारात्मक प्रभाव, मूल्य और महत्व होगा। एक बार जब वह सत्य समझ लेता है, तब वह हर चीज को परमेश्वर द्वारा सिखाए गए सत्य सिद्धांतों के आधार पर देखेगा और सँभालेगा। दूसरों की नजर में ऐसा व्यक्ति काफी ईमानदार होता है। ईमानदारी का क्या अर्थ है? ईमानदार होने का अर्थ है, दाएँ-बाएँ नहीं भटकना, उतावलेपन, भावनाओं, निजी हितों या रिश्तों या व्यक्तिगत इरादों की ओर न भटकना, बल्कि सबसे सही, सबसे उचित लक्ष्य की ओर अभ्यास करना, जो लोगों के आदर, सराहना और उच्च सम्मान के सबसे योग्य हो—या फिर यह कहा जा सकता है, उस लक्ष्य की ओर अभ्यास करना जिसे परमेश्वर अच्छा मानता है और स्वीकृति देता है। क्या यह उस “ईमानदारी” से श्रेष्ठ नहीं है जो साधारण भ्रष्ट मनुष्य की नजर में होती है? (हाँ, है।) इस ईमानदारी का क्या अर्थ है? यह पूरी तरह से सत्य सिद्धांतों के अनुरूप है, पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों पर आधारित है और जमीर की नींव पर निर्मित है। जब व्यक्ति सत्य समझता है तब उसके पास समस्याएँ हल करने और मामले सँभालने के तरीके और सिद्धांत होते हैं, इसलिए क्या उस व्यक्ति का जमीर पूर्णतः पूर्ण नहीं है? क्या उसे इष्टतम नहीं किया गया है? (हाँ।) तो क्या एक सच्चे व्यक्ति, एक सच्चे सृजित प्राणी में ऐसा जमीर नहीं होना चाहिए? क्या उसमें इस अर्थ में ईमानदारी नहीं होनी चाहिए? (हाँ।) एक सच्चे व्यक्ति में इस अर्थ में ईमानदारी होनी चाहिए जो सत्य के अनुरूप हो, न कि उस अर्थ में जिसके बारे में लोग बोलते हैं—दृढ़तापूर्वक ईमानदार और निष्पक्ष, खुले दिल वाला और निष्कपट या “एक मर्दाना इंसान कुछ नहीं छिपाता और हमेशा अपने क्रियाकलापों पर अडिग रहता है।” यह उतावलापन है, इसमें कोई वास्तविक विषयवस्तु नहीं है और यह पूरी तरह से लोगों द्वारा किया जाने वाला दिखावा है। ईमानदारी का आधार सत्य होता है; इसके अभ्यास वास्तव में जिए गए होते हैं। इसका अर्थ है कि सामान्य मानवता वाले व्यक्ति में सत्य उसका स्रोत और प्रारंभिक बिंदु होता है और वह परमेश्वर के वचनों के अनुसार विभिन्न मामलों के साथ पेश आने और उन्हें सँभालने में सक्षम होता है—इसे ईमानदारी कहते हैं। दयालुता के बारे में तो कहने की और भी ज्यादा जरूरत नहीं है; कम से कम, यह जमीर और विवेक के मानक से बढ़कर है। दयालुता में पाखंड नहीं होता, क्रूरता तो बिल्कुल भी नहीं होती। यह पूरी तरह से उन तरीकों के आधार पर क्रियाकलाप करना है जो लोगों के लिए लाभदायक और उन्नयन करने वाले होते हैं और साथ ही साथ परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप होते हैं; यह पूरी तरह से परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने, परमेश्वर को संतुष्ट करने और परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करने के लक्ष्य और मानदंड के आधार पर क्रियाकलाप करना है। यह विश्व में, पूरे ब्रह्मांड में सबसे दयालु और सबसे अद्भुत चीज है। वह व्यक्ति जिसके पास परमेश्वर के वचन या सत्य उसके जीवन के रूप में होते हैं, उसका हृदय निश्चित रूप से सबसे दयालु होता है, क्योंकि वह सत्य स्वीकारने में सक्षम होता है और यह परमेश्वर द्वारा लोगों से अपेक्षित मानक को पूरी तरह से पूरा करता है। चूँकि उसमें इस तरह की मानवता होती है, इसलिए यह कहना उचित है कि वह ईमानदार है, और यह कहना भी उचित है कि वह दयालु है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह सत्य स्वीकारने और उसका अभ्यास करने में सक्षम होता है, और वह अपने कर्तव्य के प्रदर्शन में अपनी भावनाओं के अनुसार नहीं चलता या महत्वाकांक्षाएँ या इच्छाएँ नहीं रखता और वह अपने भीतर परंपरागत संस्कृति के विष नहीं पालता, और नैतिकता और मानवता को मापने का उसका मानक शैतान के किसी फलसफे, विचार या दृष्टिकोण से दूषित नहीं होता—वह पूरी तरह से सत्य के अनुरूप होता है। तो मुझे बताओ, क्या ऐसे जमीर और विवेक से युक्त मानवता पहले ही बहुत इष्टतम नहीं होती? (हाँ।) चूँकि इस तरह के व्यक्ति में सत्य होता है और चूँकि जीवन का जो सार वह जीता है वह सत्य होता है, इसलिए उसकी मानवता जिसमें ऐसा जीवन सार होता है, त्रुटिहीन होती है। अगर तुम लोगों को “त्रुटिहीन” शब्द सुनना पसंद नहीं है तो मैं इसे “इष्टतम” भी कह सकता हूँ। कम से कम, परमेश्वर की नजर में वह इष्टतम होता है और परमेश्वर उससे प्रेम करता है। परमेश्वर लोगों में अपने वचनों और सत्य को डालने के लिए उनमें मौजूद जमीर की थोड़ी-सी जागरूकता, विवेक और शर्म की भावना का इस्तेमाल करता है। जब परमेश्वर के वचनों के सत्य को तुममें डाला जाता है, तो न सिर्फ तुम्हारे जमीर और विवेक कमजोर नहीं होते या छिपे नहीं रहते, बल्कि वे ज्यादा सामान्य और इष्टतम हो जाते हैं। परमेश्वर ऐसा ही मनुष्य चाहता है। चलो इसे त्रुटिहीन न कहें, इष्टतम कहें। त्रुटिहीन क्यों न कहें? अगर मैं त्रुटिहीन कहूँ, तो आध्यात्मिक समझ नहीं रखने वाले कुछ लोग कहेंगे, “क्या तुमने यह नहीं कहा था कि त्रुटिहीन लोग मत बनो?” इसलिए मुझे इस शब्द से बचना होगा, कहीं कुछ लोग गलत न समझ लें। दरअसल, अगर कोई चीज परमेश्वर की नजर में इष्टतम है तो सृजित मानवजाति के बीच उसे त्रुटिहीन कहा जा सकता है। यह त्रुटिहीनता लोगों की कल्पनाओं में व्याप्त त्रुटिहीनता नहीं है, बल्कि एक सुंदर और अच्छी चीज है, न्याय की शक्ति है और एक सकारात्मक चीज भी है जो लोगों की प्रशंसा, लालसा, स्नेह, सम्मान और सँजोए जाने के योग्य है। इसलिए, अगर तुम चाहते हो कि तुम्हारा जमीर तुम्हारे आचरण में मानवता की निम्नतम सीमा नहीं लाँघने पर ही न अटक जाए, बल्कि अपने जमीर को और ज्यादा संवेदनशील, और ज्यादा जागरूक बनाना चाहते हो, और यह चाहते हो कि तुम्हारा विवेक परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी करे, तो तुम्हारे पास सिर्फ एक ही मार्ग है। यह मार्ग मानवता की विभिन्न कमियों और दोषों पर काबू पाना नहीं है, बल्कि सत्य का अनुसरण करना, परमेश्वर द्वारा लोगों को सिखाए गए विभिन्न सत्यों में प्रयास करना और यह समझना है कि विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों के संबंध में तुम्हारे लिए परमेश्वर के अपेक्षित मानक क्या हैं, और तुम्हें इन लोगों, घटनाओं और चीजों को कैसे देखना चाहिए, इनके साथ कैसे पेश आना चाहिए और इन्हें कैसे सँभालना चाहिए। परमेश्वर के पास इन सभी पहलुओं के लिए अपेक्षित सिद्धांत और मानक हैं। तुम्हारा क्या कार्य है? वह है इन मानकों के अनुसार इस दिशा, इस लक्ष्य की ओर अभ्यास करना। पहले, खोजो और समझो कि सत्य का अभ्यास करने के मानक क्या हैं। इसके बाद, परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानकों के अनुसार खुद से अपेक्षाएँ करो और साथ ही, अपनी धारणाओं और कल्पनाओं में उन विभिन्न विचारों, दृष्टिकोणों, नियमों, विनियमों आदि को त्याग दो, जो परमेश्वर के वचनों या सत्य के अनुरूप नहीं हैं। फिर, परमेश्वर के वचनों को धीरे-धीरे अपने अभ्यास के सिद्धांत बनने दो। त्याग देना सीखते समय यह मत भूलो : त्याग देने का उद्देश्य तुम्हें एक खाली हृदय वाला व्यक्ति बनाना नहीं है; परमेश्वर चाहता है कि तुम्हारे जीवन में सामग्री हो। यह सामग्री किसे संदर्भित करती है? यह विभिन्न मामलों के लिए परमेश्वर के अपेक्षित सिद्धांतों को संदर्भित करती है। निस्संदेह, परमेश्वर नहीं चाहता कि लोग अभ्यास के विभिन्न सिद्धांतों को खोखले सिद्धांतों में बदल दें, उनके बारे में सिर्फ बात करें लेकिन उन्हें अभ्यास में न लाएँ। इसके बजाय, वह आशा करता है कि लोग इन सत्य सिद्धांतों को दृढ़ता से अपने जीवन का हिस्सा बना सकें और परमेश्वर के वचनों को अपने वास्तविक जीवन में उतार सकें। उदाहरण के लिए, कर्तव्य निभाने को लें—इस संबंध में परमेश्वर लोगों से किस मानक की अपेक्षा करता है? इस मानक की कि वे व्यावहारिक तरीके से और अपने उचित स्थान के अनुसार आचरण करें। अर्थात् अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हें व्यावहारिक होना चाहिए, लापरवाह या सतही नहीं होना चाहिए, बेमन से या दूसरों को दिखाने के लिए काम नहीं करना चाहिए और दिखावा भी नहीं करना चाहिए; बेशक, इससे भी अहम यह है कि तुम्हें सत्य सिद्धांतों के अनुसार क्रियाकलाप करने चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के बताए तरीके से क्रियाकलाप करने चाहिए, और तुम्हें वे चीजें करने से बचना चाहिए जिन्हें करने से परमेश्वर मना करता है। अगर तुम वे चीजें करने से पूरी तरह नहीं बच सकते तो उन्हें कम करना शुरू करो, अपनी इच्छाओं और प्राथमिकताओं के खिलाफ विद्रोह करो, और धीरे-धीरे उन्हें करना पूरी तरह से छोड़ दो—क्या यह हासिल करना आसान नहीं है? (हाँ, है।) उद्धार का अनुसरण करने की प्रक्रिया में तुम्हें परमेश्वर के वचनों द्वारा उजागर किए गए विभिन्न भ्रष्ट स्वभावों का समाधान करना चाहिए और उन्हें त्याग देना चाहिए। बेशक, इन भ्रष्ट स्वभावों को त्याग देना अंतिम लक्ष्य नहीं है। अंतिम लक्ष्य, इन भ्रष्ट स्वभावों को त्याग देने की पूर्व शर्त पर, परमेश्वर के वचन और परमेश्वर की अपेक्षाएँ स्वीकारना है। उन्हें स्वीकारना तुम्हारी मनोदशा बदलने की खातिर नहीं है, न ही यह तुम्हें गरिमा के साथ जीने में सक्षम बनाने के लिए है; यह तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव त्याग देने की खातिर है। यह अंतिम लक्ष्य है, क्योंकि अपने भ्रष्ट स्वभाव त्याग देने के बाद ही तुम उद्धार प्राप्त कर सकते हो।

लोगों के उद्धार पाने में सबसे बड़ी बाधा उनके भ्रष्ट स्वभाव हैं। तुम्हारी कम शिक्षा, बुढ़ापा या बोलने का अस्पष्ट तरीका और खुद को अभिव्यक्त करने की क्षमता का अभाव—इनमें से कोई भी उद्धार पाने में सबसे बड़ी बाधा नहीं है। अपने कर्तव्य में तुम्हारा खराब पेशेवर कौशल और उसे ठीक से न समझ पाना—यह भी तुम्हारे उद्धार में सबसे बड़ी बाधा नहीं है। तो फिर उद्धार पाने में सबसे बड़ी बाधा क्या है? वह है तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव। बेशक, परमेश्वर के वचनों में उजागर किए गए मनुष्य के विभिन्न भ्रष्ट स्वभाव हल करना लोगों के लिए आसान नहीं है। ऐसा इसलिए नहीं है कि लोग अपने भ्रष्ट स्वभाव त्यागने के लिए तैयार नहीं हैं, न ही इसलिए कि उनके विचार और दृष्टिकोण पुराने हो गए हैं, और बेशक, यह उनकी मानवता में दोषों या खामियों के कारण तो और भी नहीं है, न ही यह इसलिए है कि लोग सुन्न हैं, प्रतिक्रिया करने में धीमे हैं, इत्यादि—इनमें से कोई भी समस्या की जड़ नहीं है। तो फिर ऐसा क्यों है? ऐसा सिर्फ इसलिए है क्योंकि लोगों के भ्रष्ट स्वभाव उनके दिलों में जड़ें जमा चुके हैं, लोग उन्हें सिर्फ इसलिए नहीं त्याग सकते कि वे उन्हें त्याग देना चाहते हैं, और इसलिए उनके भ्रष्ट स्वभाव अक्सर उनके द्वारा अपने कर्तव्य निभाने के दौरान विघ्न और परेशानी पैदा करने के लिए बाहर निकल आते हैं। उदाहरण के लिए, मान लो तुम एक कलीसिया के अगुआ हो और तुमने कुछ गलत किया और तुम्हारी काट-छाँट की गई। ऐसे में, तुम्हें इसे स्वीकारना चाहिए, मानना चाहिए कि तुमने कुछ गलत किया है, पश्चात्ताप करने के लिए तैयार रहना चाहिए और उस गलत तरीके को बदलकर सत्य सिद्धांतों के अनुसार काम करना चाहिए। यह एक बहुत ही आसान बात है, लेकिन तुम इसे नहीं कर सकते। तुम सोचते हो, “क्या मेरी इस तरह काट-छाँट इसलिए की गई कि मैं उन्हें अप्रिय लगता हूँ और वे मुझे बर्खास्त करना चाहते हैं?” तुम्हारे दिल में शिकायतें और गलतफहमियाँ पैदा होती हैं, यहाँ तक कि तुम परमेश्वर से बहस करने की भी कोशिश करते हो, “चूँकि मैं तुम्हें अप्रिय लगता हूँ और तुम मुझे बर्खास्त कर हटा देना चाहते हो, तो ठीक है, चलो इसे स्पष्ट कर लेते हैं। मैंने अठारह साल की उम्र में परमेश्वर में विश्वास करना शुरू किया, परिवार और करियर त्यागकर, शादी और परिवार छोड़कर मैं इन तमाम सालों में एक अगुआ रहा हूँ—इनका हिसाब कैसे किया जाएगा?” जितना ज्यादा तुम हिसाब लगाते हो, उतने ही ज्यादा कुतर्क करने लगते हो। क्या यह सिर्फ त्याग देने में असमर्थ होना है? नहीं। तुम इन चीजों को त्याग क्यों नहीं सकते? यहाँ एक मूल समस्या है। जब तुम्हारी काट-छाँट की जाती है, तब तुम अन्याय महसूस करते हो, शिकायत करते हो और अपने दिल में अवज्ञाकारी महसूस करते हो, और तुम बहस करने और खुद को सही ठहराने की कोशिश भी करते हो, यहाँ तक कि दूसरों से अपना पक्ष लेने के लिए कहते हो। तुम ऐसा क्यों करते हो? (क्योंकि हमारे अंदर भ्रष्ट स्वभाव हैं।) इसका सिर्फ एक ही कारण है, एक ही मूल कारण : तुम्हारे अंदर भ्रष्ट स्वभाव हैं जिनका समाधान नहीं हुआ है। तुम में से कुछ लोग कहेंगे, “क्या ऐसा इसलिए है कि मेरी जन्मजात काबिलियत और क्षमता अपर्याप्त हैं और मैं काम नहीं कर सकता?” हो सकता है कि तुम में से कुछ के लिए यह एक कारण हो; खराब काबिलियत के कारण तुम काम के लिए अक्षम हो, और तुम सत्य भी नहीं समझते, इसलिए तुम ऐसे काम करते हो जिनसे विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न होती हैं। क्या यह वाकई सिर्फ इसलिए है कि तुम्हारी काबिलियत खराब है? यह सिर्फ एक पहलू है। मूल समस्या यह है कि तुम्हारे जमीर के साथ कोई समस्या है। तुम्हारे जमीर के साथ यह समस्या सीधे तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों से संबंधित है। तुमने ऐसी चीजें कीं जिनसे विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न हुईं और तुम्हारी काट-छाँट की गई—तुम्हें इसे किस तरीके से लेना चाहिए? काम के लिए अपने अक्षम होने के मामले को तुम किस तरीके से लेते हो? अगर तुम सत्य का अभ्यास कर सको तो ये समस्याएँ नहीं हैं और तुम इन्हें सही तरीके से ले सकते हो। लेकिन ज्यादातर लोग इन चीजों का सामना करने पर कैसे व्यवहार करते हैं? वे बहस करने की कोशिश करते हैं, शिकायत करते हैं, नकारात्मक हो जाते हैं, यहाँ तक कि उतावले होकर बोल भी देते हैं, “क्या ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं है कि तुम्हें लगता है कि मेरी काबिलियत खराब है और मैं सक्षम नहीं हूँ? क्या परमेश्वर ने ही मुझे यह काबिलियत नहीं दी है? फिर भी तुम शिकायत करते हो कि मैं काम नहीं कर सकता! अगर मैं तुम्हें अप्रिय लगता हूँ तो तुम्हें पहले ही बता देना चाहिए था!” अगर उनकी काट-छाँट करते समय कुछ कठोर शब्द इस्तेमाल कर दिए जाएँ तो वे सोचते हैं, “क्या आशीष पाने की मेरी उम्मीद खत्म हो गई है? इस जीवन में तो मेरी हैसियत खतरे में है ही, शायद आने वाले संसार में भी मुझे कोई उम्मीद नहीं है।” क्या उनका सत्य खोजने का कोई इरादा है? क्या वे अपने हृदय में समर्पण कर सकते हैं? उनके लिए समर्पण करना आसान नहीं है। अंतिम विश्लेषण में, ये तमाम अभिव्यक्तियाँ इसलिए हैं क्योंकि लोगों में भ्रष्ट स्वभाव हैं। तुम्हारी काबिलियत खराब है और तुम काम के लिए अक्षम हो—यह मानवता की प्राकृतिक खामियों या दोषों में से सिर्फ एक है; यह कोई समस्या नहीं है। अगर तुम्हारी प्राकृतिक खामियाँ और दोष बहुत ज्यादा भी हों और तुम कार्य के लिए अक्षम भी हो तो भी परमेश्वर को तुमसे जरा भी अरुचि या घृणा नहीं है। लेकिन, कार्य के लिए अक्षम होने के अलावा तुम अपनी समस्याएँ भी नहीं पहचानते, शिकायत भी करते हो, प्रतिरोधी महसूस करते हो, और अंत में नकारात्मक हो जाते हो और अपना काम छोड़ देते हो—यह क्या है? यह भ्रष्ट स्वभाव है। तुम्हें इसी का समाधान करने की आवश्यकता है। ठीक है? (हाँ।) अपने भ्रष्ट स्वभावों का समाधान हो जाने के बाद तुम उस कार्य में उपयोग के लिए योग्य हो जाओगे जिसके लिए तुम्हारी काबिलियत और तुम्हारी मानवता की स्थितियाँ सक्षम हैं। लेकिन अगर तुम अपने भ्रष्ट स्वभावों का समाधान नहीं करते और सत्य के अनुसार अभ्यास नहीं कर सकते, काट-छाँट के प्रति समर्पण नहीं कर सकते या उजागर किए जाने के लिए तैयार नहीं हो सकते, तो चाहे तुम्हारी काबिलियत कितनी भी अच्छी हो, तुम्हारी मानवता की स्थितियाँ कितनी भी श्रेष्ठ हों, तुम उपयोग के योग्य नहीं होगे। समझे? (समझा।) मुझे बताओ, अभी हमने जिस पर संगति की, उसका क्या आशय था? (परमेश्वर में विश्वास करने में सबसे महत्वपूर्ण बात अपने भ्रष्ट स्वभाव जानना है। जोर अपने भ्रष्ट स्वभाव सुलझाने पर होना चाहिए, न कि अपनी मानवता के बाहरी दोष या कमियाँ सुलझाने पर। जब हम स्थितियों का सामना करते हैं तो हमेशा बाहरी मामलों में उलझे रहते हैं, अनिवार्य समस्याएँ हल करने में मूलतः असमर्थ रहते हैं और काट-छाँट के प्रति समर्पण या परमेश्वर द्वारा स्थापित परिवेशों के प्रति समर्पण हासिल करने में भी असमर्थ रहते हैं।) अगर तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों का समाधान हो जाता है, और जिन मामलों का तुम सामना करते हो उनमें तुम सत्य सिद्धांतों को समझ सकते हो, और तुम जानते हो कि सिद्धांतों के अनुसार उन्हें कैसे सँभालना है, तो तुम अपना कर्तव्य निभाने में उपयोग के लिए योग्य होगे। चाहे तुम्हारी काबिलियत उच्च हो या निम्न और चाहे तुममें कितनी भी प्रतिभा हो, अगर तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों का समाधान नहीं होता तो चाहे तुम्हें किसी भी पद पर रखा जाए, तुम उपयोग के लिए योग्य नहीं होगे। इसके विपरीत, अगर तुम्हारी काबिलियत और क्षमताएँ सीमित हैं, लेकिन तुम विभिन्न सत्य सिद्धांत समझते हो, जिनमें वे सत्य सिद्धांत शामिल हैं जिन्हें तुम्हें अपने कार्य के दायरे में समझना-बूझना चाहिए, और तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों का समाधान हो गया है, तो तुम उपयोग के लिए योग्य व्यक्ति होगे। समझ गए? इन वचनों को पूरी तरह से समझने के लिए हो सकता है तुम लोगों को कुछ समय तक इन्हें आत्मसात करना पड़े।

वर्तमान में ज्यादातर लोग अभी भी अपना कर्तव्य निभाने में गुणों पर निर्भर रहते हैं और विनियमों का पालन करते हैं। जब तक वे पाप या बुराई नहीं करते, तब तक वे मानते हैं कि उन्होंने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया है। अपने भ्रष्ट स्वभावों का समाधान करने के लिए वे सत्य का अनुसरण और आत्मचिंतन करने पर ध्यान केंद्रित नहीं करते। ज्यादातर लोग बस तरीकों और व्यवहारों में उलझे और धँसे रहते हैं, लेकिन सत्य खोजने और सिद्धांतों के अनुसार काम करने पर ध्यान केंद्रित नहीं करते। वे केवल वही करने से संतुष्ट हैं जो वे कर सकते हैं और कोशिश करते हैं कि विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न नहीं हों या चीजों को नुकसान नहीं पहुँचे, और बस हो गया। ज्यादातर लोगों ने अभी तक काट-छाँट या उजागर किए जाने का अनुभव नहीं किया है, न ही ताड़ना और न्याय का अनुभव किया है, कठोर परीक्षणों के चरण का तो बिल्कुल भी अनुभव नहीं किया है, इसलिए ज्यादातर लोगों के भ्रष्ट स्वभाव बदलने शुरू नहीं हुए हैं। यह अच्छी खबर नहीं है, लेकिन यह एक तथ्य है। मैं एक उदाहरण देता हूँ, और फिर तुम लोग समझ जाओगे कि क्या हो रहा है। देखो, अब कर्तव्य निभाने वाले ज्यादातर लोग साधारण अनुयायी हैं; उनके पास रुतबा नहीं है और वे उस मुकाम तक नहीं पहुँचे हैं जहाँ वे रुतबे और ताकत के साथ कार्य की कोई मद पूरी कर रहे हों। ज्यादातर लोग जिस मूल सिद्धांत का पालन करते हैं, वह है आज्ञाकारी और समर्पित होना। वे सोचते हैं कि हर हाल में अगुआ ऊपरवाले की कार्य-व्यवस्थाओं के अनुसार संगति कर रहे हैं, इसलिए वे बस वही करते हैं जो अगुआ कहते हैं, उसी तरह से करते हैं जिस तरह से अगुआ उनसे करने को कहते हैं, और सोचते हैं कि सही या गलत का भेद पहचानने या यह जाँचने की कोई जरूरत नहीं है कि यह सत्य के अनुरूप है या नहीं, और जब तक वे गलतियाँ नहीं करते, तब तक सब ठीक है। क्या यही सत्य सिद्धांतों का एक व्यक्ति के जीवन के रूप में होना है? (नहीं।) तो किन परिस्थितियों में यह पता लगाया जा सकता है कि सत्य तुम्हारे जीवन के रूप में है या नहीं? यह तब होता है जब तुम्हें कलीसिया का कार्य करने के लिए एक अगुआ के रूप में चुना जाता है; यह लोगों को सबसे ज्यादा बेनकाब करता है। मामले सँभालने में तुम्हारे पास सिद्धांत हैं या नहीं और तुम अपने भ्रष्ट स्वभावों को कितना प्रकट करते हो, यह साबित कर सकता है कि तुम्हारे पास सत्य वास्तविकता है या नहीं, और क्या तुम अगुआ या कार्यकर्ता बनने के योग्य हो। अगर तुम भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हो तो तुम्हें इसे कैसे लेना चाहिए? तुम्हें अपने बारे में खुलकर बताते हुए सत्य पर संगति करनी चाहिए या खुद को छिपाना और छद्मवेश धारण करना चाहिए? यही वह समय भी होता है जब लोग सबसे ज्यादा बेनकाब होते हैं। कलीसिया में ज्यादातर लोग चीजों को सत्य सिद्धांतों के अनुसार देखने में असमर्थ होते हैं; इसके बजाय, वे इन चीजों को अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार और अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर देखते हैं और उन पर टिप्पणी करते हैं। ज्यादातर लोग सोचते हैं, “जब तक मैं अपने कर्तव्य में कोई बड़ी गलती नहीं करता और काम इसी तरह आगे बढ़ाता रहता हूँ तब तक यह काफी है। अगर मैं कोई बड़ी गलती करता हूँ और मुझे आत्म-चिंतन के लिए अलग-थलग कर दिया जाता है या किसी बी समूह में भेज दिया जाता है, तो यह बस मेरी बदकिस्मती है।” यह स्थिति क्या चित्रित करती है? हालाँकि अपना कर्तव्य निभाने की प्रक्रिया में तुम आज्ञाकारी और समर्पित रह पाते हो और जो कहा जाता है उसे करते हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सत्य तुम्हारे जीवन के रूप में है और इसका मतलब यह भी नहीं कि तुम वह व्यक्ति हो जो परमेश्वर के प्रति समर्पण करता है। जब तुम्हें अगुआ के रूप में चुन लिया जाता है और तुम वह पद प्राप्त कर लेते हो, तब तुम बेनकाब हो जाओगे। क्यों? पद प्राप्त कर लेने पर तुम जो चाहोगे वो करोगे, हर चीज का प्रभार ले लोगे, पूर्ण प्रभुत्व जताओगे और एक स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लोगे; तुम उतावलेपन के आधार पर, अपने भ्रष्ट स्वभावों के आधार पर और अपनी इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं के आधार पर क्रियाकलाप करोगे। इसलिए, तुम अभी भी उपयोग के लिए योग्य नहीं हो। अब तक, यह कहा जा सकता है कि निन्यानबे प्रतिशत लोग इसी तरह की अवस्था और स्थिति में हैं। हालाँकि ज्यादातर लोगों ने कई वर्षों तक अपना कर्तव्य निभाया है और बाहरी तौर पर अपेक्षाकृत आज्ञाकारी और नियमों का पालन करने वाले हो गए हैं, लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि अब उनमें भ्रष्ट स्वभाव नहीं हैं? (नहीं।) उनका व्यवहार अब स्वच्छंद नहीं रहा, बाहरी तौर पर वे नियमों का पालन करने वाले हैं और उनमें थोड़ी संतों जैसी मर्यादा दिखाई देती है, लेकिन उनके भ्रष्ट स्वभाव जरा भी नहीं बदले हैं क्योंकि वे अपने भ्रष्ट स्वभावों का समाधान करने के लिए सक्रिय रूप से सत्य नहीं खोजते। जब उनके काम में समस्याएँ आती हैं, तो चाहे अगुआ द्वारा उनकी काँट-छाँट की जाए या ऊपरवाले द्वारा, वे ज्यादा से ज्यादा यही सोचते हैं, “ठीक है, अगर वे मुझे इसे ठीक करने के लिए कहते हैं तो मैं इसे ठीक कर दूँगा। मैं बस थोड़ी कठिनाई और सह लूँगा, थोड़ा समय और लगा दूँगा और जल्दी से इसे दोबारा कर दूँगा।” उनका रवैया और मानसिकता बस इसी तरह की होती है। यह सत्य के प्रति समर्पण नहीं दर्शाता, सच्चा समर्पण नहीं दर्शाता। यह मानसिकता कहाँ से आती है? यह इस तथ्य से आती है कि परमेश्वर में अपने विश्वास में लोगों में एक सकारात्मक लालसा होती है, अच्छे लोग बनने की लालसा, मानक के अनुरूप सृजित प्राणी बनने की लालसा। यह इच्छा लोगों के दैनिक जीवन में और उनके कर्तव्य-निर्वहन में इस तरह की मानसिकता लाती है; इंसानी शब्दावली में वह यह है : “परेशानी पैदा मत करो, आओ हम सब अच्छा व्यवहार करें।” “अच्छा व्यवहार” का क्या अर्थ है? क्या यह एक सत्य सिद्धांत है? यह बस तुम्हें आज्ञा मानने, नियमों का पालन करने और परेशानी पैदा नहीं करने के लिए प्रेरित करता है। यह लोगों के लिए न्यूनतम अपेक्षा है, और यह सत्य सिद्धांत के स्तर तक नहीं पहुँचता। तो सत्य सिद्धांत क्या है? यही कि तुम्हें सक्रिय रूप से परमेश्वर के इरादे खोजने चाहिए। जब तुम भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हो, जब तुम स्वार्थपूर्ण इच्छाएँ रखते हो या उतावलापन प्रकट करते हो, जब भ्रष्ट स्वभाव तुम्हारे अंदर किसी स्थिति को जन्म देते हैं, तब तुम्हें सक्रिय रूप से इन अभिव्यक्तियों की तुलना परमेश्वर के वचनों से करनी चाहिए। परमेश्वर की प्रबुद्धता, मार्गदर्शन, सहायता, समर्थन से, यहाँ तक कि परमेश्वर के वचनों के कठोर न्याय और ताड़ना से भी, धीरे-धीरे तुम परमेश्वर के वचनों के प्रति अपना रवैया बदलते हो, परमेश्वर के वचनों की तुम्हारी स्वीकृति का स्तर अधिकाधिक ऊँचा होता जाता है और तुम परमेश्वर के वचनों को स्वीकार कर उन्हें आमीन कहते हो। तब तुम परमेश्वर के वचनों को अपने भीतर स्वीकारते हो, भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों को त्याग देते हो, और फिर मनुष्य की विरासत थामे नहीं रहते; तुम सत्य स्वीकारने में सक्षम हो जाते हो, और तुम अपने आस-पास के लोगों, घटनाओं और चीजों को सँभालने में सक्षम हो जाते हो, और परमेश्वर के वचनों और सत्य सिद्धांतों के अनुसार लोगों, घटनाओं और चीजों के प्रति अपना परिप्रेक्ष्य, रुख और दृष्टिकोण बदल लेते हो। यही तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों का समाधान करने का मार्ग है। तो क्या अब तुम लोगों के पास इस तरह का सक्रिय अभ्यास है? मुझे लगता है कि निन्यानबे प्रतिशत लोगों के पास नहीं है। ज्यादातर लोगों के अनुभवजन्य गवाहियों के लेख एक ऐसे परिवेश का अनुभव करने के बारे में होते हैं जिसने उन्हें एक खास तरीके से काम करने और अपने क्रियाकलापों में “परमेश्वर के प्रति समर्पण” हासिल करने को मजबूर किया। वे यह सोचकर अपने आप में काफी खुश महसूस करते हैं कि उनके पास सत्य वास्तविकता है। भले ही तुमने गवाही का एक लेख लिखा हो, यह वास्तव में तुम्हारे अपने बारे में बढ़ा-चढ़ाकर बातें करने, अपने लिए गवाही देने और खुद को स्थापित करने के लिए है : “देखो, मेरे पास एक गवाही है। मैंने परमेश्वर को निराश नहीं किया। मैंने इस परिवेश में अपना कर्तव्य निभाया!” कुछ दूसरे लोगों के अनुभवजन्य गवाही लेख इस बारे में हैं कि उनकी काट-छाँट की जाने के बाद कैसे वे चिंतन करते हैं और उन्हें यह एहसास होता है कि वे लापरवाह थे और उन्होंने परमेश्वर को संतुष्ट नहीं किया और अब वे पश्चात्ताप करने को तैयार हैं। भले ही पश्चात्ताप करने का एक दौर आता हो जिसमें लगता हो कि वे अब लापरवाह नहीं रहे, लेकिन क्या उनके भ्रष्ट स्वभाव बदल गए होते हैं? नहीं। परदे के पीछे वे अभी भी बहुत अहंकारी और दबंग होते हैं। वे जिस नजरिये, परिप्रेक्ष्य और दृष्टिकोण से लोगों और चीजों को देखते हैं और उनसे निपटते हैं वे परमेश्वर के वचनों पर बिल्कुल भी आधारित नहीं होते। इसलिए उनके भ्रष्ट स्वभाव बदलने बिल्कुल भी शुरू नहीं हुए! तो, तुम किस बदलाव के बारे में बात करते हो? यह मात्र व्यवहार, जीवनशैली और शायद उस लहजे, अभिव्यक्ति के तरीके और शैली में बदलाव है जिसमें तुम दूसरों से बातचीत करते हो और मामलों को संभालते हो। तुम्हारी आस्था भी मजबूत हुई है; तुम विभिन्न परिवेशों में काट-छाँट किए जाने के अनेकों मामलों से गुजरने के बाद सत्य की खोज करने में सक्षम हो, अब बहुत से सत्य समझते हो और परमेश्वर का अनुसरण करने का तुम्हारा संकल्प पहले से अधिक दृढ़ हुआ है—ये सभी पहलू बदल गए हैं। ये बदलाव लोगों को उद्धार पाने में अधिक आश्वस्त बनाते हैं, सत्य का अनुसरण करने के लिए अधिक इच्छुक बनाते हैं, और परमेश्वर का अनुसरण करने के प्रति अधिक आशावान और अधिक आशावादी बनाते हैं। जो भी परीक्षण या कष्ट उनके रास्ते में आते हैं, वे इतने नकारात्मक नहीं होंगे कि अपनी आस्था ही छोड़ दें। लेकिन ये बदलाव सिर्फ सामान्य मानवता में बाहरी तौर पर जीने में होते हैं। ये अपेक्षाकृत सकारात्मक और अग्रसक्रिय विचार और दृष्टिकोण धीरे-धीरे लोगों के दिलों में अपनी जगह बना लेते हैं। ये बदलाव इस बात के संकेत हैं कि उनके दिल जागृत और पुनर्जीवित हो रहे हैं। यानी लोग ज्यादा अग्रसक्रिय और आकांक्षी हो जाते हैं और सकारात्मक चीजों की ज्यादा लालसा करते हैं, परमेश्वर के वचनों, उसके कार्य और उसकी अपेक्षाओं का अनुसरण करने के प्रति ज्यादा आश्वस्त हो जाते हैं। स्वाभाविक रूप से, उनके पास परमेश्वर द्वारा किए जा रहे सबसे महत्वपूर्ण कार्य—लोगों को बचाने के कार्य—के बारे में भी ज्यादा स्पष्ट अवधारणा होती है। इन स्थितियों के आधार पर बहुत से लोग अपने कर्तव्यों का पहले की तुलना में ज्यादा व्यावहारिक तरीके से, नियमों का ज्यादा पालन करने वाले ढंग से और ज्यादा आज्ञाकारिता से निर्वहन करते हैं। उनके कर्तव्यों की कुशलता में सुधार आता है, विशेष रूप से तकनीकी कार्यों में, जो अब और तेजी से आगे बढ़ने लगता है। अब वे पहले जैसे सुस्त नहीं रहते हैं जब कुछ दिनों में समाप्त होने वाले कार्यों में एक हफ्ता या उससे ज्यादा समय लग जाता था—अब नतीजे कुछ ही दिनों में मिल जाते हैं। यकीनन, यह अच्छी खबर है। लेकिन बुरी खबर क्या है? वह यह है कि तुम लोग जो भी प्रकट और प्रदर्शित करते हो, वे सिर्फ व्यवहार, सोच और मानसिकता में बदलाव हैं, वे तुम्हारे अवचेतन में मौजूद तत्वों के जागृत होने के कुछ अपेक्षाकृत सकारात्मक, सक्रिय, आशावादी संकेत हैं। लेकिन, इन संकेतों का अर्थ यह नहीं है कि तुम लोगों के भ्रष्ट स्वभाव बदलने शुरू हो गए हैं। यह खबर बहुत अच्छी नहीं है, है ना? (नहीं, यह नहीं है।) वैसे तो यह बहुत अच्छी खबर नहीं है, लेकिन भ्रष्ट मानवजाति के लिए उद्धार प्राप्त करने की यह एक अवश्यंभावी प्रक्रिया है। लोग आध्यात्मिक रूप से इतने ही दयनीय और कमजोर हैं, इतने ही अपरिपक्व हैं और उनके जीवन प्रवेश और भ्रष्ट स्वभावों को छोड़ने की रफ्तार इतनी ही धीमी है। इस धीमी गति का मूल कारण यह है कि ऐसी मानवजाति में सत्य स्वीकार करने की क्षमता की कमी होती है और वे सत्य, सकारात्मक चीजों और परमेश्वर से आने वाली हर चीज के प्रति इतने ही सुन्न होते हैं।

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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