सत्य का अनुसरण कैसे करें (6) भाग तीन

नंबर 5 : संज्ञानात्मक क्षमता

पाँचवीं क्षमता संज्ञानात्मक क्षमता है। संज्ञानात्मक क्षमता किसे संदर्भित करती है? इसका मुख्य जोर व्यक्ति की चीजों की समझ की मात्रा पर होता है। किसी व्यक्ति की संज्ञानात्मक क्षमता का मूल्यांकन करने के लिए यह देखना चाहिए कि उसकी किसी चीज की समझ की मात्रा कितनी है और उस चीज का सार समझने के लिए उसे किस निर्धारित समय-सीमा की आवश्यकता पड़ती है। अगर उसे जिस निर्धारित समय-सीमा की आवश्यकता पड़ती है, वह बहुत कम है और उसकी समझ की मात्रा पर्याप्त गहरी है जो उस चीज का सार समझने के स्तर तक पहुँचती है तो उसमें संज्ञानात्मक क्षमता होती है। अगर किसी व्यक्ति द्वारा किसी चीज को समझने के लिए अपेक्षित निर्धारित समय-सीमा सामान्य सीमा के भीतर होती है और वह उस चीज का सार समझ सकता है, उसके कारण और परिणाम और उसके भीतर की समस्याओं की जड़ और सार स्पष्ट रूप से देख सकता है और फिर अपने दिल में उस चीज की समझ रखता है—और इससे भी बेहतर, अगर वह उस चीज की परिभाषा दे सकता है और उसके बारे में कोई निष्कर्ष निकाल सकता है—तो इसे अच्छी काबिलियत होना कहा जाता है। यानी सामान्य मानवता की सोच रखने वाले एक सामान्य व्यक्ति के रूप में, चाहे तुम पुरुष हो या महिला, चाहे तुम अभी-अभी वयस्क हुए हो या पहले ही प्रौढ़ावस्था या वृद्धावस्था में प्रवेश कर चुके हो, अगर इस चीज के सार के बारे में तुम्हारी समझ सामान्य निर्धारित समय-सीमा के भीतर हासिल हो जाती है तो तुम्हारी काबिलियत अच्छी मानी जाती है। अगर इस चीज को समझने के लिए तुम्हें एक सामान्य व्यक्ति से तीन या चार गुना ज्यादा निर्धारित समय सीमा की आवश्यकता पड़ती है—यानी अगर अच्छी काबिलियत वाले व्यक्ति को तीन दिन चाहिए लेकिन तुम्हें दस दिन की या यहाँ तक कि एक महीने की आवश्यकता पड़ती है—और जब तक तुम इस मामले की घटनाओं का पूरा क्रम स्पष्ट रूप से समझते हो और जब इस मामले से होने वाले नुकसान और नकारात्मक परिणाम पहले ही सामने आ चुके होते हैं, तभी तुम इस मामले की गंभीरता और इसकी जड़ और सार समझते हो तो ज्यादा से ज्यादा तुम्हारी काबिलियत औसत है। दूसरे शब्दों में, अगर अभी तक इस मामले के गंभीर परिणाम नहीं आए हैं लेकिन कुछ नकारात्मक परिणाम पहले से ही लगातार सामने आ रहे हैं और इस प्रक्रिया के दौरान ही तुम धीरे-धीरे इस मामले की जड़ और सार का संज्ञान लेते हो और एक परिभाषा और निष्कर्ष पर पहुंचते हो तो तुम्हारी काबिलियत औसत मानी जाती है। लेकिन अगर इस मामले के नकारात्मक या गंभीर परिणाम सामने आने के बाद ही तुम्हें अचानक एहसास होता है और तुम समझते हो कि इस मामले की प्रकृति क्या है तो तुम्हारी काबिलियत बेहद खराब है। अगर इस मामले के पहले ही नकारात्मक परिणाम आ गए हैं और तुम अभी भी नहीं जानते कि इस मामले के साथ क्या समस्या है या समस्या की जड़ क्या है और तुम अभी भी उसके बारे में कोई निष्कर्ष नहीं निकाल सकते तो तुममें कोई काबिलियत नहीं है। संज्ञानात्मक क्षमता इन चार स्तरों में विभाजित की जाती है। पहले वे लोग हैं जिनमें अच्छी काबिलियत होती है। यानी जब कोई चीज अभी-अभी सामने आई हो और तुम्हें कुछ घंटों के भीतर ही तुरंत निष्कर्ष निकालने की जरूरत हो—और यह एक ऐसी अत्यावश्यक स्थिति हो जहाँ अगर तुम तुरंत कोई निर्णय नहीं लेते, मामले को सँभालने और हल करने के लिए कोई योजना नहीं बनाते या उसका आगे बढ़ना रोकने के लिए कोई नुकसान-नियंत्रण योजना तक नहीं बनाते तो इसके नकारात्मक परिणाम होंगे—अगर इस समयावधि के भीतर तुम इस मामले की जड़ का संज्ञान ले सकते हो और तुरंत और निर्णायक रूप से सटीक आकलन कर सकते हो, सटीक रूप से निर्णय ले सकते हो और निष्कर्ष निकाल सकते हो और फिर उसे सँभालने के लिए उचित योजना बना सकते हो तो इसका मतलब है कि तुममें अच्छी काबिलियत है। लेकिन मान लो तुम सिर्फ महसूस करते हो कि इस मामले में कुछ समस्या है लेकिन तुम नहीं जानते कि समस्या कहाँ है या उसकी जड़ क्या है और इस मामले को सँभालने की सामान्य समयावधि के भीतर तुम्हारे पास कोई निष्कर्ष, निर्णय या उसे सँभालने की कोई योजना नहीं है। इसके बजाय तुम सिर्फ निष्क्रिय रूप से प्रतीक्षा करते हो और उसका आगे का विकास देखते हो और सिर्फ उसके आगे के विकास के जरिये यह पहचानने की कोशिश करते हो कि इस मामले का सार वास्तव में क्या है और एक आकलन करते हो जो बहुत सटीक नहीं होता और उसके बाद, प्रतीक्षा करना और देखना जारी रखते हो और मामला पूरी तरह से विकसित होने से पहले, हो सकता है कि तुम समस्या का सार मुश्किल से ही देख पाओ या मुश्किल से ही कोई समाधान पेश कर पाओ, लेकिन तुम्हारा सँभालना अभी भी त्वरित नहीं होता। अगर ऐसा है तो तुम्हारी काबिलियत बहुत औसत है। अगर यह मामला पूरी तरह से विकसित हो गया है और परिणाम पहले ही सामने आ चुके हैं, समस्या का सार पहले ही पूरी तरह से उभर चुका है और सिर्फ तभी तुम्हें एहसास होता है कि यह मामला खराब है और तुम देखते हो कि उसकी अंतर्निहित जड़ क्या है—या शायद तुम जड़ बिल्कुल भी देख तक नहीं सकते, बल्कि सिर्फ निष्क्रिय रूप से उस मामले का अंतिम परिणाम भुगतते हो या उसका सामना करते हो—इसका मतलब है कि तुम्हारी काबिलियत खराब है। खराब काबिलियत वाले लोगों की एक और अभिव्यक्ति यह होती है कि अगर ऐसे मामले फिर से होते हैं तो फिर भी उनका रवैया वही रहता है, उसे सँभालने का तरीका वही होता है और वे उसे उसी गति से सँभालते हैं। यानी हर बार जब भी ऐसे मामले होते हैं, वे हमेशा उन्हें उसी तरह, उसी गति और दक्षता के साथ सँभालते हैं। चाहे कितनी भी चीजें घटित हों, वे उनके सार का भेद पहचानने में समर्थ नहीं होते, न ही वे सांसारिक मामलों पर अपने विचारों या दृष्टिकोणों में तदनुसार कोई बदलाव करते हैं। ये खराब काबिलियत वाले लोग होते हैं। ठीक इसलिए कि वे खराब काबिलियत वाले लोग होते हैं, उनमें स्वतंत्र रूप से जीने की क्षमता का अभाव होता है; यानी उनमें जीवित रहने के बारे में या जीवन के बारे में कोई दृष्टिकोण नहीं होता। यह खराब काबिलियत वाले होने का संकेत है। बिना काबिलियत वाले लोगों की अभिव्यक्ति यह होती है : जब कोई मामला पहले ही हो चुका होता है, यहाँ तक कि हो सकता है परिणाम भी सामने आ गए हों, तब भी उन्हें पता नहीं होता कि क्या हुआ है, मानो वे सपना देख रहे हों। यह कोई काबिलियत और कोई संज्ञानात्मक क्षमता नहीं होना है। क्या तुम समझे? (हाँ।) संज्ञानात्मक क्षमता मुख्य रूप से विभिन्न लोगों और घटनाओं के सार और उनकी समस्याओं की जड़ों को समझने को संदर्भित करती है; यही संज्ञानात्मक क्षमता है। इसका मतलब है कि एक निश्चित प्रकार के लोगों की अभिव्यक्तियाँ, प्रकाशन और मानवता देखकर तुम जान सकते हो कि वे किन समस्याओं का सामना कर रहे हैं, जिस परिवेश में वे रहते हैं उसमें उनकी समस्याओं की जड़ क्या है, साथ ही तुम वर्तमान में जो घटनाएँ देख रहे हो उनका सार क्या है और उनके भीतर समस्याओं की जड़ कहाँ निहित है। संज्ञानात्मक क्षमता मुख्य रूप से दो पहलुओं को संदर्भित करती है : लोगों, घटनाओं और चीजों के सार की असलियत जानना और उनकी समस्याओं की जड़ की असलियत जानना। संज्ञानात्मक क्षमता के बारे में तुम लोग और क्या समझ सकते हो? क्या कोई इसे ज्ञान को समझने और सीखने की क्षमता के रूप में समझता है? (नहीं।) हम जिस संज्ञानात्मक क्षमता की बात कर रहे हैं उसमें मुख्य रूप से लोगों और घटनाओं को देखने की क्षमता शामिल है। तुम जिस मानक से लोगों और घटनाओं को देखते हो, अगर वह बहुत नीचा है, तुम्हारी समझ बहुत उथली है या तुम किसी व्यक्ति, घटना या चीज का सार नहीं समझ सकते तो तुम्हारी संज्ञानात्मक क्षमता बहुत खराब है या वह है ही नहीं। चाहे तुम्हारे आस-पास के लोग कितने ही स्पष्ट रूप से गलत बातें कहें या गलत दृष्टिकोण व्यक्त करें, वे कितने ही गलत कार्य करें या कितनी ही स्पष्ट भ्रष्टता प्रकट करें, अगर तुम समस्या के सार का पता नहीं लगा सकते, नहीं जानते कि वे किस प्रकार के लोग हैं, क्या वे सही लोग हैं, क्या वे सत्य का अनुसरण करने वाले लोग हैं, उनका चरित्र कैसा है या ऐसे लोगों का सार क्या है—अगर तुम इनमें से कुछ नहीं जानते—तो तुममें कोई संज्ञानात्मक क्षमता नहीं है। किसी व्यक्ति या मामले का सामना करने पर तुम्हारे पास आकलन के लिए कोई मानक नहीं होता। मामला बीत जाने के बाद तुम्हारे पास ऐसी समस्याओं के सार के बारे में कोई निष्कर्ष नहीं होता, और तो और, तुम्हें इसकी कोई समझ भी नहीं होती; और अवश्य ही तुम्हारे पास ऐसे मामले सँभालने के लिए सिद्धांत या उनके लिए अभ्यास के मार्ग नहीं होते—यही है संज्ञानात्मक क्षमता न होने का अर्थ। संज्ञानात्मक क्षमता मुख्य रूप से लोगों, घटनाओं और चीजों को समझने की व्यक्ति की क्षमता को संदर्भित करती है। इस क्षमता पर हमारी चर्चा यहीं समाप्त होती है।

नंबर 6 : आकलन करने की क्षमता

छठी क्षमता है आकलन करने की क्षमता। आकलन करने की क्षमता तब होती है, जब किसी मामले का सामना करने पर तुम यह निर्णय ले सकते हो कि वह उचित है या अनुचित, सही है या गलत और सकारात्मक है या नकारात्मक, और फिर उसके साथ पेश आने और उसे सँभालने का उपयुक्त तरीका निर्धारित करने के लिए अपने निर्णय का इस्तेमाल कर सकते हो। आम तौर पर, जब कोई व्यक्ति किसी मामले का सामना करता है, चाहे उसने उसे पहले देखा हो या नहीं, पहले अनुभव किया हो या नहीं और चाहे मामला अपेक्षाकृत सकारात्मक हो या अपेक्षाकृत नकारात्मक, तो उसे उसके प्रति कैसा रवैया अपनाना चाहिए? क्या उसे अस्वीकार कर देना चाहिए या उसे अंगीकार करके स्वीकार लेना चाहिए? इसे स्पष्ट रूप से देखने के बाद अगर तुम अपना रुख रखते हो और ऐसे सटीक विचार रखते हो जो सत्य सिद्धांतों के अनुरूप हों तो यह साबित होता है कि तुममें आकलन करने की क्षमता है। उदाहरण के लिए, जब तुम किसी व्यक्ति को कुछ कहते हुए सुनते हो तो उस पर विचार करने के बाद तुम यह निर्धारित कर सकते हो कि इसका क्या मतलब है, वक्ता क्या उद्देश्य हासिल करना चाहता है, वह ये शब्द क्यों बोलता है, वह ऐसे शब्द और लहजा इस्तेमाल क्यों करता है और इसे कहते समय उसकी आँखों में एक खास तरह का भाव क्यों होता है। तुम उसकी बातों के पीछे छिपे इरादे, उद्देश्य और अभिप्रेरणाएँ देख सकते हो। चाहे तुम बाद में इन अंतर्निहित इरादों और अभिप्रेरणाओं को कैसे भी सँभालो, तुम मौके पर घटित होने वाले मामले के पीछे छिपी कुछ समस्याएँ समझ सकते हो। तुम जानते हो कि वह क्या करना चाहता है, वह इसे इस तरह क्यों करना चाहता है, वह क्या उद्देश्य हासिल करना चाहता है, वह अपने शब्दों से क्या प्रभाव डालना चाहता है और उसमें क्या गुप्त साधन, षड्यंत्र और साजिशें शामिल हैं। तुम कुछ संकेत देख सकते हो, इस बात से अवगत हो सकते हो कि यहाँ समस्या कोई साधारण समस्या नहीं है, यहाँ तक कि तुम्हारे दिल में सतर्कता की भावना भी हो सकती है। यह साबित करता है कि तुममें आकलन करने की क्षमता है। अगर तुममें आकलन करने की क्षमता है तो इसका मतलब है कि तुम अच्छी काबिलियत वाले व्यक्ति हो। चाहे किसी के शब्द कितने भी मधुर लगें, धर्म-सिद्धांत की दृष्टि से वे सत्य के कितने भी अनुरूप हों, दूसरों को उसका रवैया कितना भी ईमानदार लगे या उसका उद्देश्य कितना भी गहरा छिपा हो, तुम फिर भी उसके बाहरी प्रकाशनों, घटनाओं या उसकी बातों से समस्या का अंदाजा लगा सकते हो—यह साबित करता है कि तुममें अच्छी काबिलियत और आकलन करने की क्षमता है। उदाहरण के लिए, किसी मामले का सामना करते समय, चाहे वह मामला कितना भी आगे बढ़ गया हो, तुम उस मामले की प्रक्रिया समझकर उसका सार और समस्या की जड़ देख सकते हो। यह आकलन करने की क्षमता है। उदाहरण के लिए, जब कलीसिया में मसीह-विरोधी और बुरे लोग गड़बड़ कर रहे हों और बाधा डाल रहे हों तो इन लोगों में से कौन सरगना है, कौन अनुयायी है, कौन इस मामले में मुख्य भूमिका निभाता है और कौन निष्क्रिय है, साथ ही इस मामले का लोगों पर किस तरह का प्रभाव पड़ेगा और अगर यह मामला आगे बढ़ता है तो क्या प्रतिकूल परिणाम होंगे, तुम इस मामले की बुनियादी परिस्थितियाँ समझकर पूरी स्थिति के बारे में निर्णय ले सकते हो। भले ही उस समय तुम्हारा निर्णय, मामला आखिरकार जिस तरह से सामने आता है उससे, कुछ भिन्न हो, फिर भी कम से कम तुम्हारे पास इस मामले को सँभालने के लिए एक दृष्टिकोण, एक रवैया और सटीक सिद्धांत होता है। यह ये साबित करने के लिए पर्याप्त है कि तुममें इस मामले के संबंध में आकलन करने की क्षमता है। यानी तुममें यह आकलन करने की क्षमता है कि मामले का सरगना या मामला भड़काने वाला कौन है या भविष्य में यह मामला किस हद तक बढ़ेगा और तुम्हें इसे सँभालने और प्रतिकूल परिणामों की ओर ले जाने से रोकने के लिए किस तरह के रवैये और सिद्धांतों का इस्तेमाल करना चाहिए। अगर तुममें आकलन करने की क्षमता है, तुम्हारे निर्णय लेने का तर्क और तरीका सही है और तुम्हारे निर्णय लेने का आधार कम से कम मानवता के अनुरूप है या इससे भी बेहतर यह कि वह सत्य सिद्धांतों के अनुरूप है, तो इससे साबित होता है कि तुममें आकलन करने की क्षमता है। भले ही तुम्हारा फैसला उस मामले से ही कुछ हद तक विसंगत हो, फिर भी अगर तुम्हारे निर्णय का कोई आधार है, तुम्हारा निर्णय मामला आगे बढ़ने के प्रतिमानों के अनुरूप है और समान या सदृश समस्याओं के मूल और सार के अनुरूप है—और साथ ही सत्य सिद्धांतों के भी अनुरूप है—तो यह भी कहा जा सकता है कि तुममें आकलन करने की क्षमता है। आकलन करने की क्षमता होना साबित करता है कि तुम समस्याओं के बारे में सोच सकते हो। अगर तुम्हारे निर्णय मामले की जड़, सार और अन्य तमाम पहलुओं के अनुरूप हैं तो इससे साबित होता है कि तुम अच्छी काबिलियत वाले व्यक्ति हो।

व्यक्ति चाहे जिन लोगों या मामलों का सामना करे, वह उन्हें सँभालने और हल करने के लिए आगे की योजना सिर्फ तभी बना सकता है जब उसकी सोच सही हो और सिर्फ इस निर्णय के आधार पर बना सकता है कि मामला उचित है या अनुचित, सही है या गलत या सकारात्मक है या नकारात्मक। अगर व्यक्ति समस्याओं के बारे में सोचना नहीं जानता—विशेष रूप से कहें तो, अगर वह समस्याओं का निर्णय नहीं कर सकता—तो वह समस्याएँ सँभाल भी नहीं सकता, यानी उसमें समस्याएँ सँभालने की क्षमता नहीं होती। समस्याएँ सँभालने वाला कोई भी व्यक्ति इस निर्णय के आधार पर ऐसा करता है कि मामला सही है या गलत; वरना समस्या हल करने की उसकी योजना में और उसके अभ्यास के मार्ग में आधार का अभाव होगा। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति तुम्हें रिपोर्ट करता है कि एक कलीसिया विशेष में कलीसियाई जीवन अच्छा नहीं है; ज्यादातर लोग नकारात्मक और उदासीन हैं, सभा में आने या अपना कर्तव्य निभाने के लिए अनिच्छुक हैं। तुम ऐसी प्रघटना का निर्णय कैसे करते हो? क्या यह एक वास्तविक जीवन की समस्या है? (हाँ।) चूँकि यह एक वास्तविक जीवन की समस्या है, इसलिए तुम्हें इसे सँभालने और हल करने के लिए अभ्यास की एक विशिष्ट योजना बनाने की आवश्यकता है। समस्या हल करने से पहले क्या तुम्हें यह निर्णय लेने की आवश्यकता नहीं है कि इस समस्या की जड़ और सार क्या है और यह किन लोगों के कारण उत्पन्न हो रही है? क्या तुम्हें इनका निर्णय लेने की आवश्यकता नहीं है? (हाँ, है।) सिर्फ सोच-विचार करके ही तुम निर्णय ले सकते हो और निर्णय लेने के बाद ही तुम समस्या की जड़ पहचान सकते हो और फिर समस्या की जड़ और सार के आधार पर तुम समस्या सँभालने के लिए उचित, उपयुक्त तरीके और उसके समाधान की योजनाएँ तय कर सकते हो। अगर तुम्हें पता चला कि एक कलीसिया विशेष में कलीसियाई जीवन अच्छा नहीं है, लेकिन तुम उसका कारण नहीं जानते तो तुम यह कैसे निर्णय लोगे कि समस्या की जड़ कहाँ है? (मैं पहले सोचूँगा कि यह समस्या सीधे कलीसिया के अगुआ से संबंधित है। अगर कलीसिया के अगुआ में आध्यात्मिक समझ नहीं है, उसने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास किया है लेकिन वह सत्य नहीं समझता, अपने सामने आने वाली कोई भी समस्या नहीं सँभाल सकता और यह नहीं जानता कि परमेश्वर के चुने हुए लोगों की परमेश्वर के वचन खाने-पीने या सत्य के बारे में संगति करने के लिए अगुआई कैसे की जाए तो ऐसे नकली अगुआ वाली कलीसिया में अच्छा कलीसियाई जीवन नहीं होगा।) यह एक निर्णय है। आम तौर पर, सरल समस्याओं के लिए अगर निर्णय सटीक है तो यह तुम्हें समस्या की जड़ समझने दे सकता है। लेकिन कुछ समस्याएँ जटिल होती हैं और अगर तुम्हारे द्वारा समझी गई जानकारी पूरी नहीं है तो संभव है कि तुम्हारा एकमात्र निर्णय तुम्हें समस्या की जड़ नहीं समझने दे। तो क्या दूसरा और तीसरा निर्णय भी होता है? (हाँ।) तीन निर्णय होने पर यह संभव है कि उनमें से एक सबसे सटीक हो। तो फिर तुम लोग अन्य कौन-से निर्णय सोच सकते हो? (मैं जो सोच सकती हूँ वह यह है कि इस कलीसिया के लोगों में आम तौर पर खराब काबिलियत और सत्य समझने की खराब क्षमता है और वे सत्य से प्रेम नहीं करते। यही कारण है कि वहाँ कलीसियाई जीवन के परिणाम खराब होते हैं।) क्या यह स्थिति की वास्तविकता के अनुरूप है? यह दूसरा निर्णय है। क्या कोई अन्य निर्णय हैं? (मैं इस बारे में भी सोचूँगी कि क्या इस कलीसिया में विघ्न डालने वाले बुरे लोग हैं।) यह तीसरा निर्णय है। इन तीनों निर्णयों में से कौन-सा निर्णय वास्तविक स्थिति के अनुरूप और ज्यादा यथार्थपरक है और कौन-सा खोखला है? (मुझे लगता है कि दूसरा निर्णय कुछ हद तक खोखला है। वास्तव में, अगर कलीसिया के पास कार्य के लिए जिम्मेदार अगुआ के रूप में कोई उपयुक्त व्यक्ति है तो कलीसियाई जीवन के परिणाम अच्छे होंगे। परमेश्वर के वचन खाने-पीने और सत्य समझने से भाई-बहनों में निश्चित रूप से अपने कर्तव्य निभाने की प्रेरणा होगी। मुझे लगता है कि पहला और तीसरा निर्णय ज्यादा यथार्थपरक हैं।) दूसरा निर्णय खोखला धर्म-सिद्धांत है। पहला और तीसरा निर्णय वास्तविक स्थिति के अनुरूप हैं और सटीक हैं। एक ओर ये दोनों निर्णय तार्किक सोच पर आधारित हैं; दूसरी ओर ये कुछ ऐसी परिघटनाओं पर आधारित हैं जो आम तौर पर वास्तविक जीवन में पाई जाती हैं। अगर तुम सामान्य परिघटनाएँ समझ सकते हो, तो इससे साबित होता है कि तुम्हारी सोच सही और तर्क के अनुरूप है। अगर तुम वास्तविक स्थिति नहीं समझ सकते और तुम्हारा निर्णय वास्तविक जीवन से जुड़ा नहीं है तो इससे साबित होता है कि तुम्हारी सोच में तर्क की कमी है और उसमें समस्याएँ हैं और तुम समस्याओं को अयथार्थपरक, गैर-वस्तुनिष्ठ तरीके से देखते हो। पहला और तीसरा निर्णय वस्तुनिष्ठ हैं। एक स्थिति यह हो सकती है कि कलीसिया का अगुआ यह नहीं जानता कि कार्य कैसे किया जाए। खुद उसके पास जीवन प्रवेश में कोई मार्ग नहीं है, इसलिए जब कलीसिया और भाई-बहनों की अगुआई करने की बात आती है तो उसके पास बिलकुल भी कोई मार्ग नहीं होता। नतीजतन, वहाँ कलीसियाई जीवन नहीं सुधरता। वास्तव में, कलीसिया में ज्यादातर लोग ईमानदारी से परमेश्वर में विश्वास करते हैं और उनमें प्रेरणा होती है, लेकिन कलीसियाई जीवन वास्तव में कोई परिणाम नहीं देता। हर सभा एक ही नियत क्रम का पालन करती है : गाना, प्रार्थना करना, परमेश्वर के वचन पढ़ना, और फिर अगुआ या उपयाजक कुछ सतही समझ या धर्म-सिद्धांत साझा करता है। वहाँ बहुत कम लोग वास्तविक अनुभवजन्य समझ के बारे में बोल पाते हैं। इसके अलावा, कलीसिया के अगुआ की काबिलियत खराब और अनुभव उथला होता है और वह समस्याएँ हल करने के लिए सत्य पर संगति करने में असमर्थ रहता है। इस प्रकार कलीसियाई जीवन नीरस और आनंदहीन लगता है। वहाँ कई सभाएँ हुई हैं लेकिन किसी को उनसे कुछ हासिल नहीं हुआ है, इसलिए ज्यादातर लोगों को लगता है कि ऐसी सभाओं में जाना घर पर परमेश्वर के वचन पढ़ने से कम लाभदायक है और वे उनमें शामिल होने के लिए अनिच्छुक हो जाते हैं। कुछ लोग एक-दो साल तक परमेश्वर में विश्वास करने और कुछ सत्य समझने के बाद कर्तव्य निभाना चाहते हैं। लेकिन कलीसिया के कुछ अगुआ नहीं जानते कि कौन-से लोग किस कर्तव्य के लिए उपयुक्त हैं या वे किस तरह के काम के लिए उपयुक्त हैं। वे लोगों को उचित रूप से व्यवस्थित करने या उनका उपयोग करने में समर्थ नहीं हैं, न ही वे लोगों के कर्तव्य निभाने में उनका समर्थन और सहायता करने के लिए अपने अनुभव इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे कुछ लोग नकारात्मक और अपने कर्तव्य निभाने के लिए अनिच्छुक हो सकते हैं। असल में, अपना कर्तव्य निभाने के इच्छुक ज्यादातर लोग अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभा सकते हैं; उन्हें बस समर्थन और सहायता नहीं मिलती। अगर कलीसिया के अगुआ और उपयाजक परमेश्वर के वचनों के अनुसार लोगों का समर्थन और सहायता कर सकें तो कलीसिया में अपना कर्तव्य निभाने के इच्छुक लोगों की संख्या बढ़ जाएगी और वे सामान्य रूप से अपना कर्तव्य निभा पाएँगे। चूँकि कलीसिया के अगुआ और उपयाजक नहीं जानते कि काम कैसे करना है, इसलिए कलीसियाई जीवन खराब परिणाम देता है और कुछ समस्याएँ लंबे समय तक अनसुलझी रहती हैं और कुछ समय बाद कई लोग नकारात्मक हो जाते हैं और उनमें कोई प्रेरणा नहीं रहती; यह परमेश्वर के चुने हुए लोगों को अपने कर्तव्य निभाने में प्रभावित करता है। अगर कलीसियाई जीवन के परिणाम खराब रहते हैं तो इसका मुख्य कारण यह है कि कलीसिया के अगुआ और उपयाजक नहीं जानते कि कलीसिया का कार्य कैसे करना है। यह एक स्थिति है। दूसरी स्थिति तब होती है जब मसीह-विरोधी और बुरे लोग सत्ता पर कब्जा कर लेते हैं और कलीसिया में विघ्न पैदा करते हैं, और ऐसा समय-समय पर होता रहता है। जब कलीसिया के अगुआ काम करना नहीं जानते और मसीह-विरोधी और बुरे लोग सत्ता में भी होते हैं जो लगातार गुट बनाते हैं, स्वतंत्र राज्य स्थापित करते हैं और दूसरों को सताते और दबाते हैं तो इससे कुछ भाई-बहनों को, जो ईमानदारी से परमेश्वर में विश्वास करते हैं और अपना कर्तव्य निभाने के लिए तैयार होते हैं, दबाया, सताया जाता है और अलग-थलग किया जाता है। वे अपना कर्तव्य निभाना चाहते हैं लेकिन उन्हें कोई अवसर नहीं मिलता, जिससे वे नकारात्मक और कमजोर हो जाते हैं। ईमानदारी से परमेश्वर में विश्वास करने वाले इन लोगों को मसीह-विरोधियों और उनके संगी-साथियों के साथ सभा करने में कोई आनंद नहीं आता। मसीह-विरोधी हमेशा सत्ता पर कब्जा करना और खुद को स्थापित करना चाहते हैं। जब परमेश्वर में ईमानदारी से विश्वास करने वाले लोग सभाओं में शामिल होते हैं तो वे सत्य और ज्यादा समझना और अपने अनुभव साझा करना चाहते हैं, लेकिन मसीह-विरोधी उन्हें दबाते हैं और उन्हें अवसर नहीं देते। नतीजतन, कलीसियाई जीवन अव्यवस्थित हो जाता है; लोग अव्यवस्था में बिखर जाते हैं और सभाएँ आनंददायक नहीं रह जातीं। लोगों में जो थोड़ा-बहुत उत्साह और प्रेम रहा होता है, वह खो जाता है और वे अब अपना कर्तव्य निभाने के लिए तैयार नहीं होते। कलीसियाई जीवन के खराब परिणाम इनमें से किसी भी कारण से हो सकते हैं। यही है जिसके बारे में तुम लोग सोच सकते हो और जिसका निर्णय ले सकते हो। निर्णय के जरिये तुम जिस निष्कर्ष पर पहुँचते हो, अगर वह वास्तविक स्थिति से जुड़ा है, भले ही वह आंशिक रूप से जुड़ा हो या सिर्फ संभावित समस्या की पहचान करता हो, तो यह आकलन करने की क्षमता होने की अभिव्यक्ति है। कम से कम, निर्णय के जरिये तुम जिस निष्कर्ष और राय पर पहुँचते हो वे वास्तविक स्थिति से जुड़े होते हैं, वे धर्म-सिद्धांत, खोखले या ऐसी चीज नहीं होते जो अस्तित्व में ही नहीं है। यह साबित करता है कि तुममें आकलन करने की क्षमता है। यदि हर मामले के बारे में तुम्हारे द्वारा निकाले गए निष्कर्ष इस चीज के सामान्य प्रतिमानों के अनुरूप नहीं होते कि चीजें कैसे विकसित होती हैं या वास्तविक जीवन में कोई मामला कैसे सामने आता है, और वे पूरी तरह से काल्पनिक, खोखले, अवास्तविक और असत्य हैं और उनका वास्तविक स्थितियों से कोई संबंध नहीं है तो इसका मतलब है कि तुममें आकलन करने की क्षमता नहीं है या तुम निर्णय लेने में अक्सर गलतियाँ करते हो। फिर दूसरे निर्णय के बारे में क्या, जिसका तुम लोगों ने पहले उल्लेख किया था, कि कलीसियाई जीवन के खराब परिणाम इस कलीसिया के लोगों की खराब काबिलियत और उनके सत्य से प्रेम नहीं करने के कारण हैं—यह किस तरह का निर्णय है? (इस निर्णय में त्रुटि है।) इसे निर्णय में त्रुटि करना कहा जाता है। अगर तुम उन स्थितियों को पूरी तरह से नहीं समझ सकते जो ऐसे मामलों के साथ अक्सर होती हैं—यानी होने वाली कुछ सबसे संभावित स्थितियाँ—और तुम निर्णय के जरिये केवल एक स्थिति प्रस्तुत करते हो या तुम संभव स्थितियों के बारे में सोच सकते हो लेकिन असंभव स्थितियों के बारे में भी सोच सकते हो, तो यह क्या साबित करता है? यह साबित करता है कि तुम्हारी आकलन करने की क्षमता औसत है। आकलन करने की औसत क्षमता वाले व्यक्ति के पास किसी मामले के बारे में कुछ विचार होते हैं लेकिन वह निश्चित नहीं हो सकता। ऐसे मामलों में वह जो निर्णय लेता है वह गलत होता है। अगर व्यक्ति के निर्णय कभी सही होते हैं और कभी गलत, और कुछ वास्तविक स्थिति के अनुरूप होते हैं जबकि अन्य नहीं होते, लेकिन गलत निर्णय अपेक्षाकृत ज्यादा बार होते हैं, तो यह दर्शाता है कि उसकी आकलन करने की क्षमता खराब है। मान लो निर्णय के जरिये वह जिन निष्कर्षों पर पहुँचता है वे पूरी तरह से खोखले होते हैं, इस चीज के प्रतिमानों के बिल्कुल भी अनुरूप नहीं होते कि चीजें कैसे विकसित होती हैं, और आम या अक्सर होने वाली घटनाओं के अनुरूप तो बिल्कुल भी नहीं होते, तथ्यों से पूरी तरह से असंबंधित होते हैं। उनके निर्णय कल्पनाओं के सिवाय कुछ नहीं होते, चीजें कैसे विकसित होती हैं इसके प्रतिमानों से या मानवता के सार से उनका कोई संबंध नहीं होता, और वे वास्तविक जीवन के संदर्भ और आसपास के परिवेश से पूरी तरह से बेमेल होते हैं। यानी, मान लो उनके निर्णय वास्तविकता से असंबंधित हैं—वे आकलन के जरिये जो कुछ भी प्रस्तुत करते हैं वह वास्तविक जीवन में कभी नहीं हो सकता, और वे जो बोलते हैं वह समस्या का सार बिल्कुल भी नहीं होता। अगर ऐसा है तो इस व्यक्ति में आकलन करने की कोई क्षमता नहीं है।

यह आँकने के लिए कि किसी व्यक्ति में आकलन करने की क्षमता है या नहीं, मुख्य बात यह देखना है कि विभिन्न प्रकार के लोगों और विभिन्न प्रकार की चीजों के बारे में उसके निर्णय सटीक हैं या नहीं। उदाहरण के लिए, मान लो तुम किसी व्यक्ति को रोते हुए देखते हो और तुम्हें नहीं पता कि वह क्यों रो रहा है। तुम देख सकते हो कि वह बहुत व्यथित और बहुत दुखी होकर रो रहा है और वह समय-समय पर प्रार्थना भी कर रहा है और परमेश्वर के वचन भी पढ़ रहा है, और वह किसी भी उस व्यक्ति को जवाब नहीं देता जो उससे बात करता है। तुमसे यह निर्णय लेने के लिए कहा जाता है कि इस व्यक्ति के साथ क्या हो रहा है और तुम कहते हो, “उसे घर की याद आ रही होगी। कुछ समय पहले उसकी माँ बीमार हो गई थी इसलिए वह घर जाना चाहता है।” क्या यह निर्णय सटीक है? कुछ लोग कहते हैं, “वह नकारात्मक महसूस कर रहा होगा। ज्यादातर समय जब लोग रोते हैं तो ऐसा इसलिए होता है कि उनकी भावनाएँ आहत हो गई होती हैं। उदाहरण के लिए, लोग तब रोते हैं जब उन्हें धौंस दी जाती है या धोखा दिया जाता है। जब वह किसी समस्या का सामना करता है और उसके साथ गलत व्यवहार किया जाता है तो वह हमेशा रोता है और दूसरों से बात करने या मिलने-जुलने का इच्छुक नहीं होता। यह नकारात्मक महसूस करने की अभिव्यक्ति है।” कुछ दूसरे लोग यह निर्णय लेते हैं : “वह अक्सर बाहर सुसमाचार का प्रचार करता था और अपना कर्तव्य निभाता था, लेकिन अब वह लंबे समय से कलीसिया के भीतर अपना कर्तव्य निभा रहा है और हो सकता है वह इसका आदी न हो और घुटन महसूस करता हो।” क्या कोई अन्य संभावनाएँ हैं? कुछ लोग कहते हैं, “शायद उसे कल मांस खाने को नहीं मिला, जिससे वह परेशान होकर रो रहा है।” दूसरे लोग कहते हैं, “कल वह मुझसे बात करने आया था। मुझे लगा वह बस पास से गुजर रहा है इसलिए मैंने उस पर सरसरी निगाह डाली और कुछ नहीं कहा। क्या इससे वह नाराज हो गया होगा? क्या वह इस वजह से रो रहा होगा?” इस मामले का वास्तविक स्थिति के अनुरूप तरीके से कैसे निर्णय किया जाए? क्या इसका निर्णय लेना आसान है? (मैं कुछ निर्णय ले सकता हूँ। अभी-अभी बताए गए कुछ कारण—घर की याद, आहत भावनाएँ या खिन्न, दमित मनोदशा—संभवतः ये सभी स्थितियाँ व्यक्ति के रोने का कारण बन सकती हैं। लेकिन मांस न खाने या किसी से बात करते समय अनदेखा किए जाने जैसी छोटी-छोटी बातें व्यक्ति के रोने के लिए पर्याप्त नहीं होनी चाहिए।) कौन-से कारण हैं जो व्यक्ति को बुरी तरह रुला सकते हैं? शिकायतें, उदासी, किसी व्यक्ति या चीज की याद आना, ऋण की भावना। इसलिए तुम्हें उससे पूछना चाहिए, “तुम रो क्यों रहे हो? क्या तुम इसलिए रो रहे हो कि तुम्हारे साथ गलत व्यवहार किया गया है और तुम दुखी हो या इसलिए कि तुम आत्मचिंतन कर रहे हो और महसूस कर रहे हो कि तुम परमेश्वर के बहुत ऋणी हो?” उसके साथ इस तरह दिल को छूने वाली बातचीत करके तुम जान जाओगे कि वह क्यों रो रहा है। संक्षेप में, यह संभव नहीं है कि वह इसलिए रो रहा हो कि उसने ठीक से खाना नहीं खाया या मांस नहीं खा सका, न ही यह संभव है कि वह इसलिए रो रहा हो कि दूसरों ने उसे अनदेखा किया या उससे आँखें फेर लीं। बेशक, सामान्य परिस्थितियों में थोड़ी-सी कठिनाई सहने से व्यक्ति नहीं रोएगा और कभी-कभार अच्छे मूड में नहीं होना भी उसे नहीं रुलाएगा। जो चीजें व्यक्ति को रुला सकती हैं वे आम तौर पर ऊपर बताई गई कुछ स्थितियाँ ही होती हैं। तुम उन सामान्य स्थितियों के आधार पर उसके रोने का कारण तय कर सकते हो और फिर तुम उसकी सामान्य, सतत अभिव्यक्तियों के आधार पर निर्णय ले सकते हो—जैसे कि यह तथ्य कि वह आम तौर पर तब तक नहीं रोता जब तक कि उसका सामना किसी दुखद या ऐसी चीज से नहीं होता जो उसका घाव हरा कर दे, वह आसानी से आँसू नहीं बहाता, और वह विशेष रूप से परेशान करने वाले मामलों और ऐसी चीजों के बारे में बात किए जाने पर ही रोता है जो विशेष रूप से उसकी आत्मा को छूती हैं या जब उसने कुछ गलत किया होता है या कोई गंभीर गलती की होती है और वह परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ महसूस करता है—इस संदर्भ के आधार पर निर्णय लेने से तुम कमोबेश यह समझ सकते हो कि वह क्यों रो रहा है। एक स्थिति यह है कि वह तब रोएगा जब परिवार का कोई सदस्य गंभीर रूप से बीमार हो जाए या उसकी मृत्यु हो जाए, दूसरी स्थिति यह है कि वह खुद किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हो और व्यथित हो। या फिर, वह इसलिए रो सकता है कि उसने कुछ गलत किया है और इस तरह कोई अपराध किया है, और उसे लगता है कि वह परमेश्वर का ऋणी है, वह अपना मार्ग बदलने की पूरी कोशिश करना चाहता है लेकिन फिर भी उसमें कमजोरियाँ हैं और वह उन पर काबू पाने में असमर्थ है; ये जटिल भावनाएँ एक-साथ मिलकर उसे रुला देती हैं। ये निर्णय वास्तविक स्थिति के साथ अपेक्षाकृत सुसंगत हैं। उसकी सतत अभिव्यक्तियों और उसके व्यक्तित्व की विशेषताओं के आधार पर निर्णय लेने से तुम इस बात का मूल कारण पता लगा सकते हो कि वह अभी क्यों रो रहा है। इस तरह निर्णय लेना अपेक्षाकृत ज्यादा सटीक होगा। एक ओर ऐसे लोगों का आध्यात्मिक कद और वर्तमान में उनके द्वारा अनुभव की जा रही कुछ समस्याओं को समझकर और दूसरी ओर उनकी मानवता के दोषों के साथ-साथ उनके द्वारा अक्सर प्रकट की जाने वाली कुछ भ्रष्टता और कमजोरियाँ समझकर तुम मूल रूप से दायरे को सीमित कर सकते हो और इस दायरे के भीतर इस व्यक्ति की समस्या का मूल कारण क्या है, इसका निर्णय ले सकते हो। इस तरह से निर्णय लेना अपेक्षाकृत सटीक होगा।

हमने अब लोगों की आकलन करने की क्षमता के संदर्भ में अच्छी काबिलियत, औसत काबिलियत और खराब काबिलियत वाले लोगों की अभिव्यक्तियों के बारे में संगति समाप्त कर ली है, है ना? (हाँ।) सबसे खराब काबिलियत वाले लोगों की श्रेणी भी है। चाहे कुछ भी हो जाए या वे किसी को कुछ भी करते हुए देखें, ऐसे लोग निर्णय लेना नहीं जानते। क्यों नहीं जानते? क्योंकि उनकी काबिलियत बहुत खराब होती है, उनके पास आकलन करने की क्षमता नहीं होती और वे नहीं जानते कि चीजों के बारे में निर्णय कैसे लिया जाए। उदाहरण के लिए, मान लो वे किसी को कुछ नकारात्मक कहते हुए सुनते हैं। जब इस नकारात्मक कथन के सार और प्रकृति की बात आती है तो वे नहीं जानते कि उनके निर्णय लेने का आधार क्या होना चाहिए, उन्हें इसका कोई अंदाजा नहीं होता। इसका मतलब है वे नहीं जानते कि समस्याओं के बारे में कैसे सोचें और नहीं जानते कि चीजों का निर्णय कैसे लें। जब वे किसी को कुछ करते हुए देखते हैं तो वे मामले के सार के आधार पर यह निर्णय नहीं ले सकते कि इस मामले की प्रकृति क्या है या इस व्यक्ति का चरित्र कैसा है; वे नहीं जानते कि अपने आचरण के अनुभव के आधार पर इन चीजों का निर्णय कैसे लें, और परमेश्वर के वचनों के आधार पर उनका निर्णय लेना तो वे और भी कम जानते हैं। इसलिए उनमें आकलन करने की क्षमता नहीं होती। चीजों का निर्णय लेने में समर्थ नहीं होने का मूल कारण क्या होता है? यही कि ऐसे व्यक्तियों को समस्याओं के बारे में सोचना नहीं आता और जब लोगों और चीजों को देखने की बात आती है तो उन्हें नहीं पता होता कि उनके किस पहलू को देखना है, उन्हें कैसे देखना है या उन्हें किस आधार पर देखना है। और वे नहीं जानते कि बाद में क्या निष्कर्ष निकालने हैं, निष्कर्ष कैसे निकालने हैं या निष्कर्ष पर पहुँचने के बाद इस प्रकार के व्यक्ति या मामले से कैसे पेश आना है और उन्हें कैसे सँभालना है। उनके दिमाग या तो खाली होते हैं या धुँधले। यह आकलन करने की क्षमता नहीं होना है। आकलन करने की क्षमता से रहित लोगों की मुख्य समस्या यह होती है कि वे किसी सिद्धांत को नहीं समझते या आत्मसात नहीं करते, यहाँ तक कि उन्हें आचरण करने का अनुभव भी नहीं होता। इसलिए जब वे विभिन्न प्रकार के लोगों के साथ मिलते-जुलते हैं तो वे नहीं जानते कि किस प्रकार के लोगों के साथ जुड़ना उचित है और किस प्रकार के लोगों के साथ नहीं; वे नहीं जानते कि कौन-से लोग हैं जो अपेक्षाकृत दयालु हैं और जिनके पास कुछ सशक्त बिंदु भी हैं जिनसे वे अपनी कमियों की भरपाई करने के लिए सीख सकते हैं और जो उनकी मदद कर सकते हैं और उन्हें लाभ पहुँचा सकते हैं; किस तरह के लोगों को बर्दाश्त किया जा सकता है और उनके साथ अनिच्छा से रहा जा सकता है; और किस तरह के लोगों में इतनी ज्यादा बुराई होती है कि उनके साथ जुड़ना आसानी से परेशानी या विवादों को आमंत्रित कर सकता है और इसलिए उनसे दूर ही रहना चाहिए—वे इन सब के बारे में अनभिज्ञ होते हैं। संक्षेप में, आकलन करने की क्षमता से रहित ये लोग कुछ नहीं जानते और किसी व्यक्ति या मामले का निर्णय नहीं ले सकते। लेकिन उनका एक अपना तरीका भी होता है, एक निश्चित नियम जिसका वे पालन करते हैं। वे कहते हैं, “मैं चाहे किसी के साथ भी चीजें सँभालूँ या किसी से भी बात करूँ, मैं बस मजाक करके उन्हें टाल देता हूँ। मैं किसी से दुश्मनी नहीं रखता। चाहे वह अच्छा व्यक्ति हो या बुरा, चाहे वह वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करता हो या नहीं करता हो, चाहे वह सत्य से प्रेम करता हो या उससे विमुख हो—मैं उसके साथ हिल-मिलकर रहता हूँ और किसी को नाराज नहीं करता। जब मैं बुरे लोगों को देखता हूँ तो उनसे दूर रहता हूँ; जब मैं भोले-भाले लोगों को देखता हूँ तो उन्हें धौंस देता हूँ।” ठीक यही उनका शैतानी तर्क है। वे नहीं जानते कि उन्हें किस तरह के लोगों के साथ जुड़ना चाहिए, किस तरह के लोगों से दूर रहना चाहिए और किस तरह के लोगों के साथ कभी जुड़ना या कोई व्यवहार करना नहीं चाहिए। वे जरा भी भेद पहचानने की क्षमता का इस्तेमाल नहीं करते और सभी को एक-जैसा समझते हैं, सभी लोगों के साथ एक-जैसा व्यवहार करते हैं। चाहे कोई भी हो, अगर वे उस व्यक्ति के बारे में अनुकूल राय नहीं रखते तो वे उसे बाहरी या दुश्मन ही मानेंगे। कोई व्यक्ति कितना भी अच्छा हो, अगर वह उन्हें कोई लाभ नहीं देता तो वे उस व्यक्ति के साथ सतर्कता से पेश आएँगे। वे किसी के सामने अपना दिल नहीं खोलते और सभी के साथ सतर्क नजरिया अपनाते हैं। ऐसे लोग अच्छी काबिलियत वाले होते हैं या खराब काबिलियत वाले? (खराब काबिलियत वाले।) खराब काबिलियत होने पर भी उनके ऐसे विचार कैसे हो सकते हैं? ऐसे लोग बस छोटी सोच वाले होते हैं। बिना काबिलियत वाले लोगों और मानसिक रूप से अक्षम लोगों के बीच क्या अंतर होता है? बिना काबिलियत वाले लोग मानसिक रूप से कमजोर और मूर्ख होते हैं। खाने-पहनने, इज्जत बनाए रखने और लाभ लेने व नुकसान नहीं उठाने के लिए कुछ हिसाब-किताब रखने के अलावा उनमें कोई काबिलियत नहीं होती। दूसरी ओर, मानसिक रूप से अक्षम लोगों के पास अपने हितों की रक्षा करने या लाभ लेने के लिए कोई हिसाब-किताब तक नहीं होता—उनके पास कोई विचार ही नहीं होता। मानसिक रूप से कमजोर और मूर्ख लोगों के पास कुछ हिसाब-किताब होने के अलावा जीवित रहने की कोई क्षमता, कोई काबिलियत और आकलन करने की कोई क्षमता बिल्कुल नहीं होती। इसलिए वे किसी व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करते हैं इसके कोई सिद्धांत नहीं होते; वे बस अपनी भावनाओं के अनुसार चलते हैं। जब तक उन्हें लगता है कि तुम उनके साथ अच्छा बर्ताव नहीं करते हो, तब तक वे तुमसे दूर रहेंगे, तुम्हारे प्रति प्रतिरोधी महसूस करेंगे, अपने दिल में तुमसे नफरत करेंगे और तुम्हें नकारेंगे। चाहे तुम उनके प्रति कितनी भी सद्भावना रखो या कैसे भी उनकी मदद करो, जब तक वे इसे स्पष्ट रूप से नहीं समझ सकते तब तक वे यह महसूस नहीं करेंगे कि तुम उनके प्रति मित्रवत हो या तुम उनके लिए बिल्कुल भी हानिकारक नहीं हो। वे यह नहीं पहचान सकते कि लोग, घटनाएँ और चीजें उचित हैं या अनुचित, सही हैं या गलत, सकारात्मक हैं या नकारात्मक—वे इन चीजों का निर्णय नहीं ले सकते। उनके पास सिर्फ कुछ हिसाब-किताब होता है। जब वे लाभ ले लेते हैं तो वे खुश महसूस करते हैं; जब वे लाभ नहीं ले पाते हैं तो उन्हें लगता है कि उन्हें नुकसान हो गया है, उनके साथ गलत व्यवहार किया गया है, दूसरों ने उनका मजाक उड़ाया है और वे संकल्प लेते हैं कि अगली बार वे दूसरों को लाभ नहीं लेने देंगे या दूसरों को दिखावा नहीं करने देंगे या अपने से इक्कीस नहीं होने देंगे—वे दूसरों को कोई मौका नहीं देंगे। मुझे बताओ, क्या उनके दिमाग में ये हिसाब-किताब होना ही काबिलियत होना माना जाता है? यह मानसिक रूप से अक्षम होने से थोड़ा ही बेहतर है, लेकिन जब क्षमताओं की बात आती है तो उनमें कोई क्षमता नहीं होती—उनमें विभिन्न प्रकार के मामले सँभालने के लिए विभिन्न क्षमताएँ नहीं होतीं। वे बस मूर्ख और मानसिक रूप से कमजोर होते हैं। ऐसे लोगों में कोई काबिलियत नहीं होती। क्या तुम समझते हो? (हाँ।) एकमात्र ऐसी चीज जो उन लोगों के पास होती है लेकिन मानसिक रूप से अक्षम लोगों के पास नहीं होती, वह है ये हिसाब-किताब; मानसिक रूप से अक्षम लोगों के पास ये हिसाब-किताब तक नहीं होते। जब ऐसे लोग यह सुनते हैं तो वे आश्वस्त नहीं होते; वे कहते हैं, “तुम दावा करते हो कि मेरे पास आकलन करने की क्षमता नहीं है? कुछ अमेरिकी डॉलर और सोना एक-साथ रखो और देखो कि क्या मैं उन्हें पहचान नहीं सकता। मैं उनमें अंतर बता सकता हूँ! सोना पीला होता है और अमेरिकी डॉलर कागजी मुद्रा है! प्लैटिनम और चाँदी एक-साथ रखो और देखो कि क्या मैं निर्णय नहीं ले सकता! प्लैटिनम और चाँदी सफेद रंग की अलग-अलग रंगतें हैं—मैं यह बता सकता हूँ!” क्या यह मूर्खतापूर्ण नहीं है? यह अत्यंत मूर्खतापूर्ण है। वे सिर्फ इन चीजों के बीच अंतर करने में सक्षम होते हैं और फिर भी इसके बारे में दिखावा करना चाहते हैं और साबित करना चाहते हैं कि वे मूर्ख नहीं हैं। उन्होंने बहुत-सी मूर्खतापूर्ण चीजें की होती हैं, बहुत-सी ऐसी चीजें जो काबिलियत की कमी प्रदर्शित करती हैं—वे उनके बारे में बात क्यों नहीं करते और उन्हें समझने की कोशिश क्यों नहीं करते? चूँकि उनमें काबिलियत की कमी होती है, चूँकि उनकी काबिलियत बहुत खराब होती है और वे इन चीजों को पहचान नहीं सकते या इनमें अंतर नहीं कर सकते, ठीक इसलिए वे एक-दो चीजें ऐसी लाते हैं जिन्हें मानसिक रूप से अक्षम लोग नहीं कर सकते, यह साबित करने के लिए कि वे मानसिक रूप से विकलांग नहीं हैं, यह साबित करने के लिए कि उनमें कुछ बुद्धि और काबिलियत है। क्या यह मूर्खता नहीं है? यह उनकी मूर्खता को और अधिक साबित करता है। जिन लोगों में काबिलियत नहीं है उनकी अभिव्यक्तियों पर हमारी संगति भी अब पूरी हो गई है। किसी व्यक्ति में आकलन करने की क्षमता है या नहीं, इसका प्राथमिक पैमाना क्या है? यही कि उनके पास सामान्य मानवता की सोच है या नहीं। अगर तुममें सामान्य मानवता की सोच नहीं है तो तुम किसी चीज का निर्णय नहीं ले पाओगे। अगर तुममें सामान्य मानवता की सोच है तो तुम्हारे निर्णयों में कुछ गलतियाँ हो सकती हैं, लेकिन कम से कम, यह दर्शाता है कि तुममें आकलन करने की क्षमता है और तुम सामान्य मानवता की सोचने की क्षमता रखते हो। तुम्हारे द्वारा लिए गए निर्णय अटकलें नहीं हैं, मान्यता नहीं हैं, काल्पनिक नहीं हैं, न ही वे अनुमान हैं। बल्कि वे मामले के सभी पहलुओं पर विचार करके निकाले गए विभिन्न निष्कर्ष और मत हैं। इसे ही आकलन करने की क्षमता कहते हैं।

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