सत्य का अनुसरण कैसे करें (7) भाग पाँच
अपनी काबिलियत के साथ सही तरीके से कैसे पेश आएँ
इस बारे में संगति करने के बाद कि काबिलियत क्या है और लोगों की काबिलियत के स्तरों और प्रकारों को कैसे विभाजित करना है, जब तुम लोगों ने सुनना समाप्त किया तो उसके बाद क्या तुम्हें कोई लाभ प्राप्त हुआ? (हाँ।) क्या तुम सही मायने में जानते हो कि तुम्हारी अपनी काबिलियत खराब है? (हाँ।) बिना काबिलियत वाले कुछ लोग कहते हैं : “ऐसा कैसे है कि मेरे पास कोई काबिलियत नहीं है? अगर मेरी काबिलियत औसत या खराब होती तो भी वह ठीक होता।” कोई भी व्यक्ति बिना काबिलियत वाला होने, मूर्ख, नासमझ या निकम्मा होने के स्तर तक गिरने का इच्छुक नहीं होता है, लेकिन इसे किस्मत का खेल कहो कि कुछ लोग अपनी मुख्य अभिव्यक्तियों और इन वर्षों में अपना कर्तव्य करने के नतीजों के आधार पर खुद का मूल्यांकन करते हुए सही मायने में बिना काबिलियत वाले लोगों के स्तर तक गिर जाते हैं। क्या यह कुछ लोगों को नकारात्मक बना देता है? जब कई चीजें स्पष्ट नहीं की जाती हैं, तो लोग मूर्खतापूर्वक सोचते हैं, “मुझमें क्षमता है, मुझमें योग्यता है, मैं बुद्धिमान हूँ, मेरी काबिलियत खराब नहीं है, मैं महान हूँ, मैं परमेश्वर के राज्य में कोई हूँ, मैं एक स्तंभ हूँ, मुख्य आधार हूँ,” वे मूर्खतापूर्वक अपने ख्याली पुलाव पकाते रहते हैं, काफी अच्छा महसूस करते हैं, काफी आत्मविश्वासी होते हैं, सोचते हैं कि उनके पास संभावना और उम्मीद है; वे नकारात्मक नहीं हैं और उद्देश्य के साथ जीते हैं। लेकिन जैसे ही वे सच्चे तथ्य जान लेते हैं, वे उदास हो जाते हैं, सोचते हैं, “क्या इसका मतलब यह नहीं है कि मेरे उद्धार प्राप्त करने की कोई उम्मीद नहीं है?” और नकारात्मक दशा में पहुँच जाते हैं। अगर ये बातें स्पष्ट नहीं की जाती हैं तो लोग मूर्खतापूर्वक घमंडी हो जाते हैं; व्यक्ति जितना ज्यादा मूर्ख होता है, वह उतना ही ज्यादा घमंडी होता है और उसका घमंड उतना ही ज्यादा असीम होता है। चतुर लोग इन वर्षों में सत्य की आपूर्ति स्वीकारने के बाद चिंतन करेंगे और आत्म-परीक्षण करेंगे, सत्य की तुलना खुद से करेंगे और धीरे-धीरे उनके घमंडी स्वभाव के प्रकाशन कम हो जाएँगे। व्यक्ति की काबिलियत जितनी ज्यादा खराब होती है, वह उतना ही ज्यादा मूर्खतापूर्वक घमंडी होता है। क्या ऐसी कहावत नहीं है : “वे कुछ भी नहीं हैं, फिर भी वे किसी के सामने नहीं झुकते”? यह कहावत काफी उपयुक्त है; जो लोग कुछ भी नहीं हैं वे किसी के सामने नहीं झुकते हैं। क्यों? वह इसलिए क्योंकि उनकी काबिलियत बहुत ही खराब होती है। किस हद तक? बुद्धिमत्ता नहीं होने और अपनी योग्यता की सीमा नहीं जानने की हद तक, यह नहीं जानने की हद तक कि उनकी बुद्धिमत्ता कसौटी पर कितनी खरी उतरती है, यह नहीं जानने की हद तक कि हमेशा ऐसे लोग होते हैं जो उनसे बेहतर हैं और यह नहीं जानने की हद तक कि अच्छी काबिलियत क्या है। और उनका घमंड किस हद तक पहुँच जाता है? इस हद तक कि लोगों को यह देखने में घिनौना और मतली लानेवाला लगता है—यह मूर्खतापूर्ण घमंड है। “वे कुछ भी नहीं हैं, फिर भी वे किसी के सामने नहीं झुकते” का मतलब है कि वे कुछ भी नहीं कर सकते, उनके जीवन के मामले पूरी तरह से गड़बड़ हैं, वे किसी भी चीज की असलियत नहीं देख पाते हैं, उनके कोई विचार या दृष्टिकोण नहीं हैं और वे यह नहीं बता पाते हैं कि क्या दूसरों के दृष्टिकोण सही हैं या क्या वे सटीक हैं और वे बस मूर्खतापूर्वक अपने घमंड पर अड़े रहते हैं, सोचते हैं, “मेरे पास क्षमता है, मेरे पास सामर्थ्य है, मैं बुद्धिमान हूँ, मैं दूसरों से बेहतर हूँ!” मुझे बताओ, क्या बेहतर यह है कि उन्हें मूर्खतापूर्वक घमंडी बने रहने दिया जाए जो किसी के सामने नहीं झुकते या यह है कि उन्हें यह बता दिया जाए कि उनकी काबिलियत खराब है, वे कुछ भी नहीं हैं, बस मूर्ख, निकम्मे लोग हैं और मानसिक रूप से कमजोर हैं, जिससे वे नकारात्मक बन जाते हैं? तुम लोग क्या चुनते हो? (उन्हें नकारात्मक बनने दो क्योंकि अगर वे मूर्खतापूर्वक घमंडी हैं, तो यह संभावना है कि वे सिद्धांतों का उल्लंघन करने वाली चीजें करेंगे और वे कलीसिया के कार्य को अस्त-व्यस्त कर सकते हैं।) अगर वे नकारात्मक बन जाते हैं तो वे मानवता की सूझ-बूझ पर लौट सकते हैं और ज्यादा संयमित रह सकते हैं, अस्त-व्यस्त करने वाली चीजें कम कर सकते हैं। यह उनके लिए एक सुरक्षा है। वैसे तो उन्होंने ऐसी बहुत सारी चीजें नहीं की हैं जो दूसरों के लिए फायदेमंद हों, लेकिन अस्त-व्यस्त करने वाली चीजें कम करने का यह मतलब है कि वे बहुत ही कम अपराध और बुरे कर्म करेंगे और भविष्य में उनके दंडित होने की संभावना कम हो जाएगी, है ना? (हाँ।) बिना इस पर चर्चा किए कि क्या वे उद्धार प्राप्त कर सकते हैं क्योंकि यह कुछ ऐसी चीज है जो अपेक्षाकृत दूर है, क्या परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करने और परमेश्वर के स्वभाव को नाराज करने की उनकी संभावना कम हो जाएगी? और क्या उनके जीवित बचने की संभावना बढ़ जाएगी? (हाँ।) इन लाभों के परिप्रेक्ष्य से देखा जाए तो लोगों को अपनी खुद की काबिलियत पहचानने देना और अंत में यह एहसास होने देना कि उनमें कोई काबिलियत नहीं है और उन्हें नकारात्मक बनने देना वास्तव में एक अच्छी चीज साबित होती है। नहीं तो जब लोग कहते हैं, “तुम कुछ भी नहीं हो, फिर भी तुम किसी के सामने नहीं झुकते—यह मूर्खतापूर्ण घमंड है!” तो वे बस इसकी असलियत देख ही नहीं पाते हैं या इसे पहचान ही नहीं पाते हैं; वे उद्दंड हो जाते हैं और फिर भी सोचते हैं, “मेरी काबिलियत खराब नहीं है! और तुम कहते हो कि मैं मूर्खतापूर्वक घमंडी हूँ। मैं किसी मूर्ख से कहीं बेहतर हूँ!” इससे यह और साबित होता है कि वे सही मायने में मूर्ख हैं, उनकी बुद्धिमत्ता बहुत ही कम है और इसलिए उन्हें और ज्यादा यह तथ्य स्वीकारने की जरूरत है कि उनमें कोई काबिलियत नहीं है। यह तथ्य स्वीकारने के क्या लाभ हैं? यह तुम्हें नकारात्मक बनाने के लिए नहीं है, बल्कि तुम्हें अपने साथ सही ढंग से व्यवहार करने और मूर्खतापूर्ण तरीके से कार्य करने से बचने में मदद करने के लिए है। लोग घमंडी होते हैं क्योंकि उनका स्वभाव भ्रष्ट होता है और उनमें बिल्कुल भी आत्म-ज्ञान नहीं होता है। हालाँकि कुछ लोगों का घमंड सामान्य घमंड होता है। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों के पास कैद किए जाने और कष्ट सहने से पूँजी होती है, उन्होंने कुछ तरीकों से कलीसिया में योगदान दिया होता है या उनके पास ऐसे गुण होते हैं जो उन्हें दूसरों से बेहतर बनाते हैं; क्योंकि उनके पास कुछ पूँजी होने के साथ-साथ घमंडी स्वभाव भी होता है, इसलिए इसे अब भी समझ में आने वाली बात मानी जा सकती है कि वे घमंड प्रकट करते हैं। लेकिन अगर तुम कुछ भी नहीं हो, अगर तुम मूल रूप से कुछ भी पूरा नहीं कर पाते हो, तुमने कोई योगदान नहीं दिया है और इससे भी बढ़कर यह कि तुम्हारे पास कोई खूबी नहीं है, फिर भी तुम घमंडी हो, तो इसका कोई मतलब नहीं निकलता है—इसमें तर्कसंगतता की कमी है। अब यह तुम्हें स्पष्ट कर दिया गया है : तुममें कोई काबिलियत नहीं है, तुम कुछ भी नहीं हो और तुम्हारे पास किसी भी तरह की कोई खूबी भी नहीं है। तुम्हारा मन खाली है और विचारों वाले लोगों की तुलना में तुम्हारे मन में विचारों की कमी है। वैसे इसके बावजूद भी तुम मनुष्य हो, लेकिन तुम उनसे बहुत पीछे हो; परमेश्वर की नजर में तुम मनुष्य होने का मानक पूरा नहीं करते हो। तो, तुम अब भी किस बात को लेकर घमंड कर रहे हो? परमेश्वर के वचनों के अनुसार तुम मनुष्य होने का मानक पूरा नहीं करते हो। परमेश्वर की नजर में तुम्हारे साथ मनुष्य जैसा व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन क्योंकि परमेश्वर का अनुग्रह अपार है, इसलिए परमेश्वर ने तुम्हारा उन्नयन किया है, तुम्हें चुना है और तुम्हारे साथ मनुष्य जैसा व्यवहार किया है, तुम्हें परमेश्वर के घर में कर्तव्य करने की अनुमति दी है। क्या परमेश्वर तुम्हारे साथ मनुष्य जैसा व्यवहार इसलिए करता है ताकि वह तुम्हें परमेश्वर और उसके द्वारा तुम्हें प्रदान किए गए सत्य के साथ ऐसे मूर्खतापूर्वक घमंडी तरीके से व्यवहार करता देखे? तुम्हें अपने कर्तव्य और अपने जीवन के साथ इस तरीके से व्यवहार करता देखे? नहीं। चूँकि परमेश्वर तुम्हारे साथ मनुष्य जैसा व्यवहार करता है और तुम्हें वे विभिन्न सत्य बताता है जिन्हें मनुष्यों को समझना चाहिए, इसलिए वह उम्मीद करता है कि तुम एक सच्चे मनुष्य बन सको, उम्मीद करता है कि तुम उन विचारों को स्वीकार सको जो मनुष्यों के पास होने चाहिए और तुम मूर्खतापूर्वक घमंडी नहीं बनोगे। इसलिए नकारात्मक होना गलत है—तुम्हें नकारात्मक नहीं होना चाहिए। चूँकि परमेश्वर ने तुम्हारी काबिलियत के आधार पर तुम्हारे साथ व्यवहार या तुम्हें अनदेखा नहीं किया है, बल्कि तुम्हारे साथ एक सामान्य व्यक्ति जैसा व्यवहार किया है और इस तरीके से तुम्हारा उपयोग किया है, इसलिए तुम्हें परमेश्वर के इस अनुग्रह की अपेक्षाएँ पूरी करनी चाहिए और परमेश्वर को निराश नहीं करना चाहिए। तुम्हारी जो भी काबिलियत है और तुम जो भी कार्य कर सकते हो, बस उस कार्य को अच्छी तरह से करो। बड़बोले विचार बोलने का प्रयास मत करो, वह मत करो जो एक व्यक्ति को नहीं करना चाहिए और ऐसे अति भव्य विचार या महत्वाकांक्षाएँ मत रखो जो एक व्यक्ति को नहीं रखनी चाहिए। वह करो जो एक व्यक्ति को करना चाहिए और परमेश्वर के उत्कर्ष की अपेक्षाएँ पूरी करो। क्या यह उचित नहीं है? क्या यह नकारात्मक होने की समस्या नहीं सुलझाता है? (हाँ।)
अलग-अलग काबिलियत वाले लोगों की विभिन्न अभिव्यक्तियों का भेद पहचानने और ये विशिष्ट उदाहरण प्रदान करने का उद्देश्य यह है कि तुम्हें उनके साथ खुद को जोड़कर देखने में मदद मिले। यह इसलिए है ताकि तुम अपनी स्थिति को सही ढंग से पहचान सको, अपनी काबिलियत और विभिन्न स्थितियों से तार्किकता के साथ निपट सको, परमेश्वर द्वारा तुम्हारे प्रकाशन, न्याय और तुम्हारी काट-छाँट या तुम्हारे लिए व्यवस्थित कार्य से तार्किकता के साथ निपट सको, और तुम प्रतिरोध और विकर्षण दिखाने के बजाय अपने दिल की गहराइयों से समर्पण कर सको और आभारी हो सको। जब लोग अपनी काबिलियत के साथ तार्किकता से निपट सकते हैं और फिर अपनी स्थिति को सटीकता से पहचान सकते हैं, व्यावहारिक रूप से ऐसे सृजित प्राणियों के रूप में पेश आते हैं जिन्हें परमेश्वर चाहता है अपनी अंतर्निहित काबिलियत के आधार पर उन्हें जो करना चाहिए वह उचित रूप से करते हैं और अपनी निष्ठा और अपना सारा प्रयास समर्पित करते हैं तो वे परमेश्वर की संतुष्टि प्राप्त करते हैं। चूँकि परमेश्वर ने तुम्हें यह काबिलियत और ये स्थितियाँ दी हैं, इसलिए परमेश्वर तुम्हें ऐसी चीजें करने के लिए मजबूर नहीं करेगा जो तुम्हारे लिए कठिन हैं, वह मछली को जमीन पर रहने के लिए मजबूर नहीं करेगा। परमेश्वर ने तुम्हें जितना दिया है, वह तुमसे उतना ही अर्पित करने के लिए कहता है। परमेश्वर ने तुम्हें जो नहीं दिया है, उसकी वह अत्यधिक माँग नहीं करेगा। अगर तुम लगातार अपने लिए अत्यधिक ऊँची अपेक्षाएँ रखते हो, एक मजबूत व्यक्ति, एक महामानव, असाधारण व्यक्ति बनने का प्रयास करते हो, तो यह दर्शाता है कि तुममें एक भ्रष्ट स्वभाव है—यह महत्वाकांक्षा है। अगर तुम्हारी काबिलियत अच्छी है तो तुम ज्यादा कार्य स्वीकार सकते हो; अगर तुम्हारी काबिलियत औसत है तो तुम सिर्फ कम कार्य ही स्वीकार सकते हो। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम क्या कर्तव्य कर सकते हो, उसे अपना सब कुछ दे दो, अपनी निष्ठा दे दो और सिद्धांतों के अनुसार कार्य करो—बड़बोले विचार बोलने का प्रयास मत करो। हमेशा यह साबित करने की चाहत रखना कि तुम साधारण व्यक्ति नहीं हो, हमेशा यह चाहत रखना कि दूसरे लोग तुम्हारा बहुत सम्मान करें—यह गलत है। यह आत्म-जागरूकता की बड़ी कमी दर्शाता है, अपने खुद का माप नहीं जानना दर्शाता है। अगर तुम अपनी महत्वाकांक्षा और इच्छाओं के अनुसार अनुसरण करते रहोगे, तो तुम्हारे लिए चीजों का नतीजा अच्छा नहीं निकलेगा। इसलिए, खराब काबिलियत वाले लोगों को हमेशा अगुआ, टीम प्रमुख या पर्यवेक्षक बनने की आकांक्षा नहीं रखनी चाहिए; उन्हें बहुत ऊँचा लक्ष्य नहीं रखना चाहिए। अगर तुम्हारी काबिलियत खराब है तो बस कर्तव्यनिष्ठा से वे चीजें करो जो खराब काबिलियत वाले लोग कर सकते हैं। अगर तुम्हारे पास विचारों की कमी है और तुम कोई कार्य नहीं कर सकते हो तो इसके लिए जबरदस्ती मत करो—चूँकि परमेश्वर ने तुम्हें वह काबिलियत नहीं दी है, इसलिए उसने तुम्हारे लिए अत्यधिक ऊँची अपेक्षाएँ नहीं रखी हैं। जहाँ तक सत्य सिद्धांतों की बात है, उनका वहाँ तक अभ्यास करो जहाँ तक तुम उन्हें समझ और स्वीकार सकते हो—यह सबसे महत्वपूर्ण है। तुम जो चीजें बूझने में समर्थ हो, वे तुम्हें परमेश्वर द्वारा दी गई हैं। क्या तुमने ये चीजें अपने कर्तव्य या परमेश्वर द्वारा तुम्हें सौंपे गए आदेश पर लागू की हैं? अगर तुमने इन्हें लागू किया है तो तुमने अपना सब कुछ दे दिया है और अपनी निष्ठा अर्पित कर दी है। परमेश्वर संतुष्ट होगा और तुम एक सृजित प्राणी के रूप में मानक-स्तर के होगे। अगर तुम्हारी काबिलियत खराब है तो परमेश्वर तुमसे अच्छी काबिलियत वाले लोगों के लिए मानक के अनुसार अपेक्षाएँ बिल्कुल नहीं करेगा। परमेश्वर ऐसा नहीं करेगा। बिना काबिलियत वाले लोग लोगों के बीच सबसे निम्न स्तर की काबिलियत वाले होते हैं। अगर परमेश्वर के विश्वासियों में से कुछ में कोई काबिलियत न हो तो उन्हें कैसे अभ्यास करना चाहिए? क्या तुम लोग परमेश्वर का अनुसरण करना चाहते हो? क्या तुम यह मानते हो कि परमेश्वर मनुष्य से संबंधित सभी चीजों पर संप्रभु है? क्या तुम परमेश्वर के आयोजन और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना चाहते हो? अगर तुम स्वीकारने और समर्पण करने को तैयार हो, तो अपने दिल को शांत करो और तुम्हारे लिए परमेश्वर की सारी व्यवस्थाएँ स्वीकार करो। अपनी काबिलियत के अनुसार तुम सिर्फ कुछ ऐसे कार्य कर सकते हो जिनके लिए शारीरिक श्रम की जरूरत पड़ती है, ऐसे कार्य जो दिखाई नहीं देते हैं, जिन्हें नीची नजर से देखा जाता है और जिन्हें लोग याद नहीं रखते हैं—अगर तुम्हारी यह स्थिति है तो तुम्हें इसे परमेश्वर से स्वीकार लेना चाहिए और शिकायतें नहीं रखनी चाहिए और इससे भी ज्यादा यह कि तुम्हें अपनी इच्छाओं के आधार पर अपने कर्तव्य नहीं चुनने चाहिए। परमेश्वर का घर तुम्हारे लिए जो भी व्यवस्था करता है, उसे करो और जब तक यह तुम्हारी काबिलियत में है, तुम्हें उसे अच्छी तरह से करना चाहिए। उदाहरण के लिए, अगर तुम्हें सूअर पालने के लिए नियुक्त किया गया है तो तुम्हें उन्हें अच्छी तरह से खाना खिलाना चाहिए ताकि भाई-बहन अच्छा सूअर का माँस खा सकें। अगर तुम्हें मुर्गियाँ पालने के लिए नियुक्त किया गया है तो तुम्हें उन्हें अच्छी तरह से खाना खिलाना और सँभालना चाहिए ताकि वे अंडे देने के मौसम में सामान्य रूप से अंडे दें और तुम्हें उन्हें दूसरे जानवरों से भी सुरक्षित रखना चाहिए, इसे ऐसे करना चाहिए कि तुम्हारी पाली मुर्गियों को देखने वाला हर व्यक्ति यह कहे कि इन्हें अच्छी तरह से पाला गया है। यह साबित करता है कि तुम परमेश्वर की बनाई सभी चीजों को सँजोते हो और तुम उनका अच्छी तरह से प्रबंध कर सकते हो; यह साबित करता है कि चाहे यह किसी भी तरह का जीव या जानवर हो, तुम उसे सँजो सकते हो और उसका अच्छी तरह से प्रबंध कर सकते हो, इसे अपने द्वारा पूरी की जाने वाली जिम्मेदारी और कर्तव्य के रूप में लेते हो। भले ही तुम कोई और कार्य न कर सको, भले ही तुम कलीसिया के कार्य में कोई मुख्य और निर्णायक भूमिका न निभा सको और तुम्हारा कोई बड़ा योगदान न हो, लेकिन अगर तुम किसी साधारण कार्य में अपना पूरा प्रयास और निष्ठा लगा पाते हो और सिर्फ परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास करते हो, तो यह काफी है। परमेश्वर ने तुम्हारा जो उन्नयन किया है, यह उसे विफल करना नहीं है। कामों को लेकर इस आधार पर नखरे मत करो कि वे गंदे या थकाऊ हैं या नहीं, कि दूसरे लोग तुम्हें उन्हें करते देखते हैं या नहीं, कि लोग तुम्हारी तारीफ करते हैं या नहीं, या उन्हें करने के लिए वे तुम्हें नीची नजर से देखते हैं या नहीं। इन चीजों के बारे में मत सोचो; बस इसे परमेश्वर से स्वीकारने, समर्पण करने और तुम्हें जो कर्तव्य पूरे करने चाहिए उन्हें करने का प्रयास करो। जब मैं बिना काबिलियत वाले लोगों की अभिव्यक्तियों के बारे में संगति करता हूँ तो हो सकता है मैं कहूँ कि तुम एक मूर्ख, निकम्मे व्यक्ति हो और मानसिक रूप से कमजोर हो। लेकिन अगर तुम तुम्हें सौंपे गए कामों की जिम्मेदारी उठा सकते हो और अंत में तुम परमेश्वर के तुम्हारे उन्नयन को या उस जीवन श्वास को निराश नहीं करते हो जो परमेश्वर ने तुम्हें प्रदान किया है, तुम व्यर्थ जीते या खाते नहीं हो, तुम परमेश्वर द्वारा मानवजाति के लिए प्रदान की गई किसी भी भौतिक चीज का व्यर्थ आनंद नहीं लेते हो और तुम परमेश्वर के मुँह से निकले वचनों की अपेक्षाएँ पूरी करने में विफल नहीं होते हो, तो यह पर्याप्त है। भले ही काबिलियत के लिहाज से तुम एक पूर्ण व्यक्ति होने का मानक पूरा नहीं करते हो, लेकिन अगर तुम इस निष्ठा और ईमानदारी से अपना कर्तव्य और कार्य कर सकते हो, तो कम-से-कम, परमेश्वर के दिल में तुम एक सृजित प्राणी के रूप में मानक-स्तर के हो। परमेश्वर यही निष्ठा और ईमानदारी चाहता है; वह एक ऐसा सृजित प्राणी चाहता है जो मानक-स्तर का हो। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर का घर तुम्हारे लिए क्या कर्तव्य व्यवस्थित करता है, तुम उसे परमेश्वर से स्वीकारते हो और स्वीकार सकते हो और समर्पण कर सकते हो। यह सबसे कीमती चीज है। अगर तुमने वह किया है जो परमेश्वर तुमसे अपेक्षा करता है और तुमने वह सब कुछ अर्पित किया है जो तुम अर्पित करने में समर्थ हो, तो क्या अब भी परमेश्वर तुमसे और ऊँची माँगें करेगा? अगर परमेश्वर की नजर में तुम्हारी ईमानदारी और निष्ठा कीमती है तो तुम्हारे जीवन का मूल्य है। क्या यह समझ अच्छी है? (हाँ।)
कुछ लोग कहते हैं : “मुझे अब भी लगता है कि मैं इसे नहीं समझता। परमेश्वर लोगों के लिए सभी प्रकार की काबिलियतें क्यों पूर्व-निर्धारित करता है? चूँकि परमेश्वर चाहता है कि लोग उसके लिए गवाही दें, सत्य का अभ्यास करें और अपने भ्रष्ट स्वभाव छोड़ दें, तो वह लोगों को अच्छी काबिलियत क्यों नहीं दे सकता? क्या परमेश्वर के लिए लोगों को अच्छी काबिलियत देना इतना कठिन है? अगर परमेश्वर ऐसा कर दे कि लोगों के पास सभी क्षेत्रों में क्षमताएँ हों—संज्ञानात्मक क्षमता, आकलन करने की क्षमता, चीजों को पहचानने की क्षमता, चीजों पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता, फैसला लेने की क्षमता, नवाचार क्षमता और इससे भी ज्यादा चीजों का मूल्यांकन करने और उन्हें परखने की क्षमता—लोगों को सभी क्षेत्रों में क्षमताएँ देने से क्या लोगों की काबिलियत अच्छी नहीं होगी? अगर वह लोगों को औसत काबिलियत दे दे, तो भी क्या फिर वे औसत स्तर तक सत्य समझने में समर्थ नहीं होंगे? अगर लोग सत्य समझ सकते हैं तो क्या फिर वे सत्य का अभ्यास करने में समर्थ नहीं होंगे? और क्या वे अपने भ्रष्ट स्वभाव छोड़ने और उद्धार प्राप्त करने में समर्थ नहीं होंगे?” लोगों द्वारा ऐसे विचार रखने में क्या समस्या है? लोग यह नहीं समझते हैं कि परमेश्वर उन्हें इतनी नितांत औसत काबिलियत क्यों देता है। अच्छी काबिलियत वाले अगुआ ढूँढ़ना कठिन है और कलीसिया का कार्य अच्छी तरह से करना बेहद कठिन है। लोग सोचते हैं, “अगर परमेश्वर ने लोगों को अच्छी काबिलियत दी होती तो क्या अगुआओं को ढूँढ़ना आसान नहीं होता? क्या कलीसियाई कार्य करना आसान नहीं होता? परमेश्वर लोगों को अच्छी काबिलियत क्यों नहीं देता है?” परमेश्वर के घर के पूरे कार्य के परिप्रेक्ष्य से इसे देखा जाए तो यकीनन अगर अच्छी काबिलियत वाले लोग और ज्यादा होते तो कलीसियाई कार्य सचमुच आसान होता। लेकिन एक आधार है : परमेश्वर के घर में परमेश्वर अपना कार्य कर रहा है और लोग निर्णायक भूमिका नहीं निभाते हैं। इसलिए चाहे लोगों की काबिलियत अच्छी हो, औसत हो या खराब हो, इससे परमेश्वर के कार्य के नतीजे तय नहीं होते हैं। जो अंतिम नतीजे प्राप्त किए जाने हैं, वे परमेश्वर द्वारा पूरे किए जाते हैं। हर चीज की अगुआई परमेश्वर करता है, हर चीज पवित्र आत्मा का कार्य है। परमेश्वर के कार्य के परिप्रेक्ष्य से इस मामले को इस तरह से समझाया जाना चाहिए—यह एक कारण है। एक और कारण है : शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद लोग शैतान के भ्रष्ट स्वभाव को अपने जीवन के सार के रूप में अपना लेते हैं; यानी वे सभी अपने भ्रष्ट स्वभावों के अनुसार जीने लगते हैं और उनका जीवन उनके भ्रष्ट स्वभावों द्वारा ही नियंत्रित होता है। इसके अलावा, अगर किसी के पास अच्छी या असाधारण काबिलियत है और सभी क्षेत्रों में उसकी क्षमताएँ पूरी, परिपूर्ण और त्रुटिरहित हैं, तो यह उसके भ्रष्ट स्वभावों को बढ़ावा देगा। इससे उसके भ्रष्ट स्वभाव बेलगाम तरीके से बढ़ जाएँगे जिससे वह बेकाबू हो जाएगा और इस कारण से वह व्यक्ति ज्यादा घमंडी, अड़ियल, धोखेबाज और दुष्ट बन जाएगा। सत्य स्वीकारने में उसकी कठिनाई बढ़ जाएगी और उसके भ्रष्ट स्वभावों को हल करने का कोई तरीका नहीं होगा। यह एक और कारण है। इसके अलावा परमेश्वर लोगों को ऐसी काबिलियत इसलिए देता है क्योंकि परमेश्वर जिस मानवजाति को बचाना चाहता है वह अंतर्निहित रूप से ऐसी अधूरी मानवजाति है जिसकी सभी पहलुओं में क्षमताएँ औसत हैं और उनमें दोष हैं। और यही नहीं, परमेश्वर के वचन और सत्य जानने का कार्य सिर्फ विभिन्न क्षमताओं का उपयोग करके पूरा नहीं होता है; इसके लिए एक प्रक्रिया की जरूरत होती है। इस प्रक्रिया में क्या शामिल है? इसमें परिवेश में बदलाव, व्यक्ति की आयु में बढ़ोतरी, जीवन अनुभवों और ज्ञान में बढ़ोतरी और विभिन्न परिवेशों के जरिये प्राप्त अनुभव शामिल हैं, जो लोगों की अंतर्निहित काबिलियत और सहज ज्ञान की नींव पर धीरे-धीरे उन्हें यह समझने और जानने की अनुमति देते हैं कि वास्तव में परमेश्वर के वचनों में सत्य क्या बताता है; फिर वे परमेश्वर के वचन स्वीकारते हैं और उनका अभ्यास करते हैं। ऐसी प्रक्रिया के जरिये परमेश्वर के वचनों के सत्य को व्यक्ति में समाहित किया जाता है ताकि वह उसका जीवन बन जाए—यह जीने का सिद्धांत या फलसफा और जीने का साधन नहीं बनता है; बल्कि परमेश्वर के वचन उसके अस्तित्व के लिए नींव बन जाते हैं। ऐसा व्यक्ति एक नया व्यक्ति, एक नवजात जीवन होता है। यह एक अनिवार्य प्रक्रिया है। अगर सभी पहलुओं में तुम्हारी काबिलियत और क्षमताएँ असाधारण रूप से अच्छी और ऊँची हों, तो भी इन प्रक्रियाओं को छोड़ा नहीं जा सकता। एक सृजित मनुष्य के रूप में कोई भी व्यक्ति अंततः परमेश्वर के वचनों को अपने जीवन में ढालने में पूरी प्रक्रिया के ऐसे किसी भी चरण को नहीं छोड़ सकता जिसे अनुभव किया जाना चाहिए। यानी, हर किसी में परमेश्वर के प्रति धारणाएँ, कल्पनाएँ, प्रतिरोध, विरोध और विद्रोह जन्म लेंगे। वे सभी लोग बाधाओं, विफलताओं, ठोकरों, बर्खास्तगी, काट-छाँट, न्याय और ताड़ना से गुजरेंगे, विभिन्न परिवेशों का अनुभव करेंगे, विभिन्न प्रकार के लोगों का सामना करेंगे और ऐसी अन्य प्रक्रियाओं से गुजरेंगे। चाहे तुम्हारी काबिलियत कितनी भी अच्छी या ऊँची हो या सभी पहलुओं में तुम्हारी क्षमताएँ कितनी भी मजबूत हों, इनमें से किसी भी प्रक्रिया या चरण को छोड़ा नहीं जा सकता है। इसलिए, अगर परमेश्वर तुम्हें असाधारण रूप से ऊँची काबिलियत और क्षमताएँ दे भी दे, तो भी यह बरबादी ही होगी। तुम्हारे लिए एक साधारण, औसत व्यक्ति होना बेहतर है। हालाँकि तुम्हारी मानवता में कुछ दोष हो सकते हैं लेकिन तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर सकते हो, परमेश्वर के वचन सुनने के बाद उन्हें समझ सकते हो और अपनी कमजोरियों और दोषों को पहचान सकते हो। इस तरह, एक बात यह है कि तुम जो प्राप्त करते हो वह ज्यादा ठोस होता है और तुम परमेश्वर से ज्यादा प्राप्त करते हो; दूसरी बात यह है कि तुम ज्यादा सटीकता से अपनी प्राकृतिक क्षमताएँ जान जाते हो और तुम ज्यादा तर्कसंगत बन जाते हो। यही कारण है कि परमेश्वर हर किसी को अच्छी काबिलियत देने का इरादा नहीं रखता है—वह लोगों को औसत काबिलियत देता है।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?