सत्य का अनुसरण कैसे करें (8) भाग तीन

लोगों की काबिलियत का मूल्यांकन करने के लिए इस बात का उपयोग करना कि उनमें आध्यात्मिक समझ है या नहीं

अगर हम इस तरीके से सत्य सिद्धांतों का उपयोग करके लोगों की काबिलियत का मूल्यांकन करते हैं तो प्रासंगिक अभिव्यक्तियाँ वही होती हैं जिन पर हमने अभी-अभी संगति की। इसलिए अगर हम लोगों की काबिलियत का मूल्यांकन करने के लिए इस बात का उपयोग करते हैं कि उनमें आध्यात्मिक समझ है या नहीं, तो हमें इसे कैसे करना चाहिए? अच्छी काबिलियत वाले लोगों में निश्चित रूप से आध्यात्मिक समझ होती है, है ना? (हाँ।) आध्यात्मिक समझ होने का मतलब यह है कि वे सत्य समझ सकते हैं, सत्य सिद्धांतों पर पकड़ बना सकते हैं और सत्य का उपयोग करके परमेश्वर में विश्वास रखने की प्रक्रिया में आने वाली उन विभिन्न समस्याओं को हल कर सकते हैं जो सत्य सिद्धांतों से संबंधित हैं, साथ ही वे सत्य का उपयोग करके परमेश्वर के घर के विभिन्न आंतरिक मुद्दे भी सँभाल सकते हैं। तो फिर बाहरी दुनिया के विभिन्न मुद्दों के बारे में क्या कहना है? क्योंकि अच्छी काबिलियत वाले लोगों में आध्यात्मिक समझ होती है और उनके पास विभिन्न मामले सँभालने की क्षमता होती है, इसलिए वे बाहरी दुनिया के मामले सँभालने के लिए कुछ अपेक्षाकृत मानवता-आधारित सिद्धांतों या सकारात्मक चीजों के करीबी कुछ सिद्धांतों का भी उपयोग कर सकते हैं। सतही अंतरों के बावजूद विभिन्न चीजों के मूलतत्व समान ही होते हैं और विभिन्न चीजों में निहित सिद्धांत मूल रूप से वही हैं जिन पर अच्छी काबिलियत वाले लोग पकड़ बना सकते हैं, इसलिए आमतौर पर यह कहा जा सकता है कि अच्छी काबिलियत वाले लोगों में आध्यात्मिक समझ होती है। आध्यात्मिक समझ होने का मतलब आध्यात्मिक क्षेत्र से संवाद करने में समर्थ होना नहीं है; बल्कि इसका मतलब है कि व्यक्ति विभिन्न चीजों के मूलभूत नियम और सिद्धांत समझ सकता है। यह इसे कहने का एक सीधा, सादा और स्पष्ट तरीका है। बाहरी दुनिया की चीजों के मूलभूत नियम और सत्य से जुड़े सिद्धांत समझने में समर्थ होना अच्छी काबिलियत वाले लोगों की एक अभिव्यक्ति है। तो, हम औसत काबिलियत वाले लोगों की अभिव्यक्तियाँ इस आधार पर कैसे माप सकते हैं कि उनमें आध्यात्मिक समझ है या नहीं? औसत काबिलियत वाले लोगों में आधी चीजों की आध्यात्मिक समझ होती है लेकिन बाकी आधी की नहीं होती, वे कुछ हिस्सों को तो समझते हैं जबकि दूसरों को नहीं समझते। उन्हें जिन हिस्सों की आध्यात्मिक समझ होती है वे वही हिस्से होते हैं जहाँ उनकी काबिलियत पहुँच सकती है। परमेश्वर में विश्वास से संबंधित विभिन्न सत्यों के बारे में संगति सुनने से, उन्हें वे सत्य समझ आने लग सकते हैं और यहाँ तक कि किसी के निर्देश के बिना भी वे उनमें निहित उन सिद्धांतों का मतलब निकाल सकते हैं जिन पर पकड़ बनाई जानी चाहिए। जिन हिस्सों की उन्हें कोई आध्यात्मिक समझ नहीं होती है वे वही हिस्से होते हैं जहाँ उनकी काबिलियत कम पड़ती है। दूसरों के मार्गदर्शन और निर्देश के बिना उनके पास अभ्यास का कोई सिद्धांत नहीं होता है, वे अपना कर्तव्य सामान्य रूप से नहीं कर सकते हैं या समस्याएँ हल नहीं कर सकते हैं और यह जानने के लिए कि कार्य कैसे करना है और समस्याएँ कैसे सँभालनी हैं उन्हें सिंचन, मार्गदर्शन और निर्देश की जरूरत होती है—ये उनमें कोई आध्यात्मिक समझ नहीं होने की अभिव्यक्तियाँ हैं। औसत काबिलियत वाले लोगों के बारे में यह कहा जा सकता है कि उनमें मूल रूप से आध्यात्मिक समझ होती है, लेकिन अच्छी काबिलियत वाले लोगों की तुलना में उनकी आध्यात्मिक समझ का स्तर कम होता है—वे सिर्फ आधा ही समझते हैं। इसमें कहाँ कमी होती है? कमी उस परिमाण में होती है जिस तक वे सत्य सिद्धांतों पर पकड़ बनाते हैं—वे स्वतंत्र रूप से कार्य की विभिन्न मदों को पूरा नहीं कर सकते हैं। इसलिए, अगर हम खराब काबिलियत वाले लोगों का मूल्यांकन इस आधार पर करते हैं कि उनके पास आध्यात्मिक समझ है या नहीं, तो हमें यह कैसे करना चाहिए? क्या मूल्यांकन करना आसान है? क्या खराब काबिलियत वाले लोगों में आध्यात्मिक समझ होती है? (नहीं।) तुम खराब काबिलियत वाले लोगों की अभिव्यक्तियों को देखने मात्र से ही यह बता सकते हो कि उनमें कोई आध्यात्मिक समझ नहीं है क्योंकि वे सिर्फ विनियमों का पालन करते हैं। दरअसल बिना काबिलियत वाले लोगों में मानवीय आत्माएँ नहीं होती हैं और मानवीय आत्माएँ नहीं होने का मतलब है कि जानवरों की तरह उनमें भी आध्यात्मिक समझ नहीं होती है। ऐसे लोगों के मामले में यह मूल्यांकन करना अनावश्यक है कि उनके पास आध्यात्मिक समझ है या नहीं। जब आत्मा-रहित व्यक्ति किसी मामले को देखता है या विभिन्न लोगों से निपटता है, तो वह उनका मूल्यांकन नहीं कर सकता है और उसके पास सकारात्मक या नकारात्मक चीजों के बारे में कोई दृष्टिकोण नहीं होता है। उसके पास सिर्फ अपने हितों की रक्षा करने और नुकसानों से बचने के लिए कुछ जोड़-भाग होते हैं। जब तुम कोई दृष्टिकोण व्यक्त करते हो, तब अगर वह तुमसे परिचित है और जानता है कि तुममें अच्छी काबिलियत और शुद्ध समझ है और तुम एक सकारात्मक व्यक्ति हो, तो वह तुम्हारे दृष्टिकोण से सहमत होता है। लेकिन अगर वह तुमसे परिचित नहीं है तो वह तुम्हें नीची नजर से देखता है। चाहे तुम्हारा दृष्टिकोण कितना भी सही हो या यह सत्य सिद्धांतों के कितने भी अनुरूप हो, वह इसे स्वीकार नहीं करता है। वह नहीं जानता कि यह सही है, वह नहीं जानता कि यह कुछ ऐसा है जिसे लोगों द्वारा स्वीकार किया जाना चाहिए और वह नहीं जानता कि यह अच्छा दृष्टिकोण उसके लिए कितना फायदेमंद हो सकता है या यह उसे कितनी मदद प्रदान कर सकता है—वह इन सबसे अनजान है। जबकि जब कोई नकारात्मक व्यक्ति नकारात्मक दृष्टिकोण सामने रखता है, तब अगर यह नकारात्मक व्यक्ति दूसरों पर हावी होने वाला व्यक्ति है और कोई ऐसा है जिसके बारे में वह ऊँची राय रखता है और जिसका वह सम्मान करता है, तो वह उस नकारात्मक दृष्टिकोण को स्वीकार लेता है, भले ही वह यह जानता हो कि ऐसा करने के बाद उसे नुकसान होगा। यह किस तरह का व्यक्ति है? (एक ऐसा व्यक्ति जिसमें कोई काबिलियत नहीं है।) वह ऐसा व्यक्ति है जिसमें कोई काबिलियत नहीं है, जिसका मतलब है कि उसमें चीजों का भेद पहचानने की क्षमता नहीं है। चाहे उसका किसी भी परिस्थिति से सामना हो, वह उसकी असलियत नहीं देख सकता है और ऐसा कोई भी सिद्धांत नहीं जानता है जिसे उसे पकड़कर रखना चाहिए; इस तरह का व्यक्ति बुरे लोगों या कुकर्मियों का अनुसरण करते समय बुरे कर्म कर सकता है और अच्छे लोगों का अनुसरण करते समय कुछ अच्छे कर्म कर सकता है—उसमें चीजों का भेद पहचानने की क्षमता नहीं होती है। इसलिए मैं कहता हूँ कि वह आत्मा-रहित मृत व्यक्ति है। खराब काबिलियत वाले लोग बहुत सारे वर्ष अच्छी काबिलियत वाले या सकारात्मक व्यक्तियों के साथ रहने के बाद जो वे सुनते और देखते हैं उससे प्रभावित हो सकते हैं और कुछ अच्छी चीजें सीख सकते हैं, कुछ अच्छे विनियमों का पालन कर सकते हैं और कुछ सकारात्मक कहावतों और कार्य करने के तरीकों या सकारात्मक विचारों और दृष्टिकोणों का पालन कर सकते हैं। लेकिन आत्मा-रहित मृत लोग सकारात्मक विचार और दृष्टिकोण, कार्य करने के अच्छे तरीके और विनियम, अच्छी विचार श्रृंखलाएँ या कुछ सकारात्मक जीवनशैलियाँ और रोजमर्रा के जीवन का सकारात्मक सामान्य ज्ञान तक भी नहीं सीख सकते हैं या उनका पालन नहीं कर सकते हैं। जब वे स्वतंत्र रूप से रहना शुरू करते हैं तो उनके जीवनयापन की स्थिति—जो एक भ्रमित व्यक्ति की होती है—पूरी तरह से उजागर हो जाती है। ये आत्मा-रहित मृत लोगों की अभिव्यक्तियाँ हैं।

आध्यात्मिक समझ वाले लोगों में कम-से-कम औसत काबिलियत तो होती है। अगर सत्य उनकी पहुँच में होता है और वे इसे समझ सकते हैं तो वे अच्छी काबिलियत वाले लोग हैं। आध्यात्मिक समझ रहित लोग निश्चित रूप से या तो खराब काबिलियत वाले होते हैं या फिर वे लोग होते हैं जिनमें बिल्कुल भी काबिलियत नहीं होती है—इन दो तरह के लोगों में आध्यात्मिक समझ की निश्चित रूप से कमी होती है। सिर्फ अच्छी काबिलियत वाले लोगों को ही पूर्ण आध्यात्मिक समझ वाले लोग कहा जा सकता है, जबकि औसत काबिलियत वाले लोगों में औसत स्तर की आध्यात्मिक समझ होती है। यानी ऐसे कई मामले हैं जिनमें उनकी काबिलियत कम पड़ जाती है और वे आध्यात्मिक समझ हासिल करने में असमर्थ होते हैं। सिर्फ सामान्य मामलों में ही वे आध्यात्मिक समझ हासिल कर सकते हैं और चीजों को स्वतंत्र रूप से सँभाल सकते हैं। जब उनका सामना जटिल मामलों या बहुमुखी कार्यों से होता है, तब वे इन चीजों को स्वतंत्र रूप से नहीं सँभाल सकते हैं क्योंकि इनसे जुड़े सत्य सिद्धांत उनकी पहुँच और समझ से परे होते हैं। इसलिए उनकी आध्यात्मिक समझ का स्तर काफी औसत होता है। खराब काबिलियत वाले लोगों की यह विशेषता होती है कि सत्य सिद्धांत उनकी समझ से परे होते हैं और वे सिर्फ विनियमों का पालन करते हैं क्योंकि वे सत्य सिद्धांतों को नहीं समझ सकते हैं और उन्हें तो यह तक समझ नहीं आता है कि सत्य सिद्धांतों की अवधारणा क्या है और वे मानते हैं कि सत्य सिद्धांत सिर्फ विनियम हैं। इसलिए यह बहुत स्पष्ट है कि इस किस्म के लोगों में कोई आध्यात्मिक समझ नहीं होती है। उनकी आध्यात्मिक समझ की कमी की एक बड़ी विशेषता यह है कि विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों की अपनी समझ में वे जो विचार और दृष्टिकोण प्रकट करते हैं वे सभी विकृत होते हैं। यहाँ “विकृत” को कैसे समझा जाना चाहिए? इसका मतलब है सामान्य मानवीय सोच के प्रक्षेप पथ से पूरी तरह से अलग हो जाना और सामान्य मानवीय जरूरतों के प्रक्षेप पथ से पूरी तरह से अलग हो जाना—यही विकृत होना है। जब तुम इन लोगों की कही बातों के सोचने का तर्क सुनते हो, तो तुम्हें वह अजीब लगता है और हर बार जब तुम उन्हें कोई दृष्टिकोण व्यक्त करते या किसी चीज के बारे में बात करते हुए सुनते हो, तो तुम अचंभित रह जाते हो। “अचंभित” का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि जब तुम उन्हें कुछ कहते हुए सुनते हो तो तुम्हें लगता है कि यह अविश्वसनीय है और तुम मन ही मन सोचते हो, “उन्हें यह विचार कैसे आ सकता है? सामान्य लोग जो सोचते हैं यह उससे इतना अलग क्यों है? यह विचार कितना अजीब है—यह कुछ-कुछ बेतुका क्यों लगता है?” अपने दिल में तुम्हें यह विशेष रूप से अजीब और बेतुका लगता है। जिन लोगों के शब्दों से दूसरे लोग हमेशा अचंभित रह जाते हैं, वे विकृतियों की ओर प्रवृत्त लोग होते हैं—वे विशेष रूप से ऐसे होते हैं। उदाहरण के लिए, तुम उनसे पूछते हो, “क्या तुमने कुछ खाया है?” वे जवाब देते हैं, “आज तो बहुत ठंड है।” क्या इन दोनों चीजों में कोई संबंध है? (नहीं।) तुम कहते हो, “तुमने आज इतने कम कपड़े क्यों पहने हैं?” वे कहते हैं, “मैंने आज एक कप अदरक की चाय पी।” क्या उनके जवाब का तुम्हारे सवाल से कोई जरूरी संबंध है? क्या उनके जवाब में सामान्य सोच और तर्क है? (नहीं।) सामान्य सोच और तर्क वाले व्यक्ति को कैसे जवाब देना चाहिए? वह कह सकता है, “मैंने इतने कम कपड़े इसलिए पहने हैं क्योंकि अंदर बहुत गर्मी है और इसके अलावा, बाहर बहुत धूप है और तापमान अपेक्षाकृत ज्यादा है।” या वह कह सकता है, “मैंने इतने कम कपड़े इसलिए पहने हैं क्योंकि मैंने अभी-अभी व्यायाम करना खत्म किया है और मेरा शरीर गर्म हो गया है।” लेकिन अगर कोई पूछता है, “तुमने इतने कम कपड़े क्यों पहने हैं?” और वह जवाब देता है, “क्योंकि आज मैंने ऊनी अस्तर वाले जूते पहने हैं,” तो इस जवाब का सवाल से कोई लेना-देना नहीं है। उसकी विचार श्रृंखला और जब वह सोचता है तब जिस तर्क का पालन करता है वह सामान्य मानवीय सोच और तर्क के अनुरूप नहीं है। यह एक बहुत ही अजीब विचार और एक बहुत ही अजीब विचार श्रृंखला है जो सामान्य मानवीय सोच वाला कोई भी व्यक्ति नहीं सोच सकता। और इसलिए उसका जवाब सुनने के बाद तुम्हें लगता है कि यह अजीब है। तुम उससे बातचीत करना चाहते हो लेकिन तुम उससे जुड़ नहीं सकते हो—वह हमेशा अप्रासंगिक जवाब देता है जिससे बातचीत जारी रखना असंभव हो जाता है। उदाहरण के लिए, एक स्त्री कपड़े बनाना सीख रही थी और मैंने उससे पूछा, “कपड़े बनाना सीखने में तुम्हारी प्रगति कैसी है? क्या तुम गद्दीदार कपड़े बना सकती हो?” सामान्य सोच और तर्क के अनुरूप जवाब क्या होगा? (या तो “मैं बना सकती हूँ” या “मैं नहीं बना सकती।”) यह सामान्य सोच और तर्क दर्शाएगा। या वह यह भी कह सकती है, “कभी-कभी मैं जरा-सा बेहतर बनाती हूँ और मेरे प्रशिक्षक कहते हैं कि यह ठीक-ठाक है, बस मुश्किल से स्वीकार्य है। लेकिन जब कुछ ऐसे हिस्सों की बात आती है जो ज्यादा जटिल होते हैं तो मेरा कार्य अपर्याप्त होता है और उसे दोबारा करना पड़ता है।” क्या ये जवाब किसी सामान्य सोच और तर्क वाले व्यक्ति के हैं? (हाँ।) बिना सामान्य सोच और तर्क वाले इस व्यक्ति ने कैसे जवाब दिया? मैंने पूछा, “क्या तुम अभी इस प्रकार के गद्दीदार कपड़े बना सकती हो?” उसने जवाब दिया, “जब मैं पहली बार यहाँ आई थी तब मैं इस प्रकार के कपड़े बनाना सीख रही थी।” मैंने पूछा, “तो क्या तुम अभी इसे बना सकती हो?” उसने अब भी यही जवाब दिया, “जब मैं पहली बार यहाँ आई थी तब मैं इस प्रकार के कपड़े बनाना सीख रही थी।” मैंने मन में सोचा, “मुझे समझ नहीं आ रहा है। जब तुम पहली बार आई थी तब तुम इस प्रकार के कपड़े बनाना सीख रही थी, तो क्या तुम अभी इसे बना सकती हो? मैं इसका मतलब क्यों नहीं निकाल पा रहा हूँ?” जब मैंने उसका जवाब सुना तो मुझे लगा कि यह अजीब है। मैं पूछ रहा था कि क्या वह इस प्रकार के कपड़े बना सकती है और उसने कहा कि जब वह पहली बार आई थी तब वह इसे बनाना सीख रही थी। मुझे समझ नहीं आया कि वह विषय बदलने में कामयाब कैसे हो गई—उसका इस बात से क्या लेना-देना है कि वह इसे बना सकती है या नहीं? मैंने मन ही मन सोचा, “मैं तो विषय में इस बदलाव को समझ ही नहीं पा रहा हूँ।” यहाँ तक कि जब मैंने लगातार दो-तीन बार पूछा, “तो क्या तुम अभी इसे बना सकती हो?” वह यह जवाब देती रही, “जब मैं पहली बार आई थी तब मैं इसे बनाना सीख रही थी और मेरे प्रशिक्षक मुझे इसे बनाने में मेरा मार्गदर्शन कर रहे थे—मैं मुख्य रूप से इसी पर काम कर रही हूँ।” मुझे अब भी वह जवाब नहीं मिला जिसकी मुझे तलाश थी और मुझे आज भी यह नहीं पता कि वह इसे बना सकती है या नहीं। उसके शब्दों के पीछे के तर्क का और इस बात का विश्लेषण करो कि वह इस तरीके से क्यों बोली। (उसका जवाब सवाल से कुछ हद तक अप्रासंगिक था। इसे सुनने वाले लोग उसके मतलब का अनुमान लगाने का प्रयास करेंगे, लेकिन वे फिर भी नहीं जानेंगे कि वह वाकई इसे बना सकती है या नहीं।) क्या वह मुझे बताना चाहती थी या नहीं? क्या वह मुझे सटीक जवाब देना चाहती थी? यहाँ वह एक संकेत दे रही थी : “मैंने तुम्हें पहले ही बता दिया है कि जब मैं पहली बार आई थी, तब मैं मुख्य रूप से इसे बनाना सीख रही थी और अब एक हफ्ता हो गया है—इसलिए यकीनन मैं इसे बना सकती हूँ। क्या तुम्हें मेरे कहने का मतलब समझ नहीं आ जाना चाहिए? तुम्हें यह कैसे समझ नहीं आ सकता?” क्या तुम लोग उसके जवाब से यह मतलब समझ सकते हो? (नहीं।) अगर उसका जवाब तुम्हें सटीक जवाब पाने और यह जानने की अनुमति दे कि वह बना सकती है या नहीं तो उसका जवाब तर्कसंगत होगा। लेकिन उसका जवाब तुम्हें सिर्फ एक अस्पष्ट मतलब देता है और तुम्हें सही मायने में यह नहीं जानने देता कि वह बना सकती है या नहीं। जो लोग हमेशा इस तरह से बोलते हैं—क्या वे बहुत भ्रमित नहीं हैं? अगर वे जानबूझकर इस तरह से जवाब दे रहे हैं तो फिर यह चरित्र का मामला है। अगर वे जानबूझकर ऐसा नहीं कर रहे हैं और उनके जवाब का उस जवाब से कोई जरूरी संबंध नहीं है जिसे तुम पाने का प्रयास कर रहे हो तो फिर उनकी सोच और तर्क में कोई समस्या है। अगर उनकी सोच और तर्क में कोई समस्या है तो क्या इसका मतलब यह नहीं है कि उनमें खराब काबिलियत है? क्या वे विकृतियों की ओर प्रवृत्त नहीं हैं? (हाँ।) यह विकृतियों की ओर प्रवृत्त होने की एक अभिव्यक्ति है। उस महिला ने सोचा, “मैं तुम्हें बता रही हूँ कि जब मैं पहली बार आई थी तब मैं इसे बनाना सीख रही थी, इसलिए निश्चित नतीजा यही है कि मैं इसे बना सकती हूँ।” वह जो बताना चाहती थी वह यह जवाब था “मैं इसे बना सकती हूँ।” लेकिन यह सुनने के बाद सामान्य सोच वाले लोगों को सटीक जवाब नहीं मिलता है। इसलिए उसका जवाब, “जब मैं पहली बार आई थी तब मैं इसे बनाना सीख रही थी,” का उसके यह बताने की इच्छा से कोई तार्किक संबंध नहीं था कि वह इसे बना सकती है। तो क्या उसका जवाब भ्रमित शब्द नहीं था? (हाँ।) यह सोचते हुए कि वह अच्छी तरह से संवाद कर सकती है और उसने पहले ही सवाल का जवाब दे दिया है, भ्रमित शब्द कहना—क्या यह खराब काबिलियत नहीं दर्शाता है? (हाँ।) यह खराब काबिलियत की एक अभिव्यक्ति है। उस व्यक्ति के पास सामान्य मानवीय सोच और तर्क नहीं है। चाहे तुम कैसे भी पूछो, वह यह समझने में असमर्थ रहेगी कि समस्या का निचोड़ क्या है या तुम एक ही बात क्यों पूछे जा रहे हो। जब तुम तीसरी बार पूछोगे तब भी वह वही जवाब देगी और यहाँ तक कि बेसब्र भी हो जाएगी और सोचेगी “तुम क्यों पूछे जा रहे हो? मैंने तुम्हें पहले ही बता दिया और तुम्हें अब भी समझ नहीं आया है और तुम पूछे जा रहे हो!” तीन बार पूछे जाने के बाद भी वह यह समझने में असमर्थ रहेगी कि उसका जवाब अस्पष्ट है और वह नहीं है जिसकी दूसरे व्यक्ति को तलाश है, कि उसे अपनी बात दूसरे तरीके से कहनी चाहिए और साफ-साफ बताना चाहिए कि वह बना सकती है या नहीं और दूसरे व्यक्ति को अनुमान लगाने के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए। वह यह समझने में असमर्थ है कि उसके शब्द दूसरों को कैसा महसूस करवाते हैं या उन्हें सुनने के बाद दूसरा व्यक्ति कैसे प्रतिक्रिया करता है—वह इनमें से कुछ भी समझ नहीं सकती है। यह दर्शाता है कि उसमें कोई काबिलियत नहीं है। चाहे तुम कितनी भी बार पूछो, वह एक ही जवाब देगी और यह तक महसूस करेगी कि वह जो कह रही है वह सच्ची बात है और झूठ नहीं है और सोचेगी, “चाहे तुमने एक ही चीज कितनी भी बार पूछी हो, मैंने एक ही जवाब दिया है—मैं एक ईमानदार व्यक्ति होने का अभ्यास कर रही हूँ और मैं वही कह रही हूँ जो मेरे मन में है।” क्या यह खराब काबिलियत का प्रतिबिंब नहीं है? (हाँ।) जब तुम आम के बारे में पूछते हो तो इस तरह का व्यक्ति हमेशा इमली के बारे में बात करता है। जब तुम इमली के बारे में पूछते हो, तो वह हमेशा आम के बारे में बात करता है। सामान्य सोच रहित लोगों के विचार भ्रमित होते हैं और उनकी सोच अव्यवस्थित होती है। यह खराब काबिलियत की एक बड़ी अभिव्यक्ति है। संक्षेप में, ये अलग-अलग काबिलियतों वाले लोगों की अभिव्यक्तियाँ हैं। चाहे तुम उनकी काबिलियत का मूल्यांकन सत्य सिद्धांतों को समझने और लागू करने की उनकी क्षमता या इस क्षमता की कमी से करो या इससे करो कि उनके पास आध्यात्मिक समझ है या नहीं, अभिव्यक्तियाँ ये ही हैं। हालाँकि हमने कुछ हद तक सामान्य शब्दों में बात की है, लेकिन क्या तुम मूल रूप से मेरे वचनों को वास्तविक जीवन से नहीं जोड़ सकते? (हाँ।) तो क्या हमने काबिलियत के विषय को करीब-करीब संक्षेप में प्रस्तुत नहीं कर दिया है? (हाँ।) इसी के साथ काबिलियत के विषय पर हमारी चर्चा यहीं समाप्त होती है।

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें