अंतिम दिनों के मसीह के कथन – संकलन

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन – संकलन

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वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी
वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

आज, जैसे तुम लोग परमेश्वर को जानने और प्रेम करने की कोशिश करते हो, एक प्रकार से तुम लोगों को कठिनाई और परिष्करण से होकर जाना होगा और दूसरे में, तुम लोगों को एक मूल्य चुकाना होगा। परमेश्वर को प्रेम करने के सबक से ज्यादा कुछ भी गहरा सबक नहीं है और ऐसा कहा जा सकता है कि सबक जो मनुष्य जीवन भर विश्वास करने से सीखते हैं वह परमेश्वर को किस प्रकार से प्रेम करना होता है। अर्थात् यदि तू परमेश्वर पर विश्वास करता है तो तुझे उसे प्रेम करना होगा। यदि तू केवल परमेश्वर पर विश्वास करता है परन्तु उससे प्रेम नहीं करता है, परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त नहीं किया है, और कभी भी परमेश्वर को अपने हृदय से निकलने वाले सच्चे प्रेम से प्रेम नहीं किया है, तो परमेश्वर पर तेरा विश्वास करना व्यर्थ है; यदि परमेश्वर पर अपने विश्वास में, तू परमेश्वर से प्रेम नहीं करता है, तो तू व्यर्थ में ही जी रहा है, और तेरा सम्पूर्ण जीवन सभी जीवन से सबसे निम्न स्तर पर है। यदि, तूने अपने सम्पूर्ण जीवन भर में कभी भी परमेश्वर को प्रेम नहीं किया या संतुष्ट नहीं किया, तो तेरे जीने का क्या अर्थ रहा? और परमेश्वर पर तेरे विश्वास करने का क्या अर्थ हुआ? क्या यह प्रयासों की बर्बादी नहीं है? अर्थात् यदि लोगों को परमेश्वर पर विश्वास करना है और उससे प्रेम करना है, तो उन्हें एक कीमत अदा करनी होगी। किसी बाहरी तौर पर एक निश्चित तरीके से कार्य करने की कोशिश करने के बजाय, उन्हें अपने हृदय की गहराईयों में असली परिज्ञान की खोज करनी चाहिए। यदि तू गाने और नाचने के बारे में उत्साहित है, परन्तु सत्य को व्यवहार में लाने में अयोग्य है, तो क्या तेरे बारे में कहा जा सकता है कि तू परमेश्वर से प्रेम करता है? परमेश्वर को प्रेम करना उसकी इच्छा को सभी बातों में खोजना है, और तू अपने भीतर गहराई में खोज करता है जब भी तेरे साथ कुछ घटता है, परमेश्वर की इच्छा को समझने की कोशिश करते समय, और यह देखते समय कि इस मामले में परमेश्वर की इच्छा क्या है, वह क्या चाहता है कि तू हासिल करे, और उसकी इच्छा के प्रति तुझे कितना ध्यान देना चाहिए। उदाहरण के लिए, ऐसा कुछ होता है जब तुझे कठिनाई सहना है, उस समय तुझे समझना चाहिए कि परमेश्वर की इच्छा क्या है, और तुझे उसकी इच्छा को किस प्रकार से ध्यान में रखना चाहिए। तुझे स्वयं को संतुष्ट नहीं करना है: तुझे सबसे पहले अपने आप को एक तरफ करना होगा। देह से अधिक अधम कुछ और नहीं है। तुझे परमेश्वर को संतुष्ट करने की कोशिश करनी होगी और अपने कर्तव्य को पूर्ण करना होगा। इस प्रकार के विचारों के साथ, परमेश्वर इस मामले में तुझ पर अपनी विशेष प्रबुद्धता लाएगा और तेरा हृदय भी आराम प्राप्त करेगा। जब तेरे साथ कुछ घटता है, चाहे वो बड़ा या छोटा, सबसे पहले तुझे अपने आपको एक तरफ रखना होगा और सभी बातों में देह को सबसे निम्न समझना होगा। जितना अधिक तू देह को संतुष्ट करेगा, उतना ही अधिक यह सुविधाओं को चाहेगा; यदि तू इस समय इसे संतुष्ट करेगा, तो अगली बार यह तुझसे और अधिक की माँग करेगा और जैसे-जैसे यह बढ़ता जाएगा, तू देह को और भी अधिक प्रेम करने लगेगा। देह की हमेशा से ही असाधारण इच्छाएं रही हैं, और यह हमेशा संतुष्टि को मांगती है, और यह तुझे भीतर से प्रसन्न करता है, चाहे यह खाने की बात हो, पहनने की बात, अत्याधिक क्रोध करने की बात हो, या स्वयं की कमज़ोरी और आलस को बढ़ावा देने की बात हो ... जितना अधिक तू देह को संतुष्ट करेगा, उसकी इच्छाएं उतनी ही अधिक बढ़ती जाएंगी, और उतनी ही अधिक वह भ्रष्ट बनती जाएगी, जब तक कि वह उस बिन्दु तक न पहुंच जाए जहां पर मनुष्य की देह और भी अधिक गहरी धारणाओं को पालती है, और परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करती है और स्वयं को ऊंचा उठाती है और परमेश्वर के कार्यों के प्रति संदेह करती है। जितना अधिक तू देह को संतुष्ट करेगा, उतनी ही अधिक देह की कमज़ोरियां बढ़ती जाएंगी; तू हमेशा महसूस करेगा कि कोई भी तेरी कमज़ोरियों के साथ सहानुभूति नहीं रखता है, तू हमेशा विश्वास करेगा कि परमेश्वर बहुत दूर जा चुका है, और तू कहेगा किः परमेश्वर कैसे इतना अधिक निष्ठुर हो सकता है? वह लोगों को एक मौका क्यों नहीं देना चाहता? जब लोग देह पर बहुत अधिक कृपालु होते हैं, इसका बहुत अधिक ध्यान रखते हैं, तो वे अपने आप को खो बैठते हैं। यदि तू वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करता है और देह को संतुष्ट नहीं करता है, तो तू देखेगा कि परमेश्वर जो कुछ करेगा वह बहुत सही और अच्छा होगा और तेरे विद्रोह के लिए उसका श्राप और तेरी अधार्मिकता पर उसका न्याय उचित ठहरेगा। ऐसे समय होंगे जब परमेश्वर तुझे ताड़ना देगा और अनुशासित करेगा, तुझे तैयार करने के लिए वातावरण बनाएगा, तुझे उसके सामने आने के लिए ज़ोर डालेगा—और तू हमेशा यह महसूस करेगा कि जो कुछ परमेश्वर कर रहा है वह अद्भुत है। इस प्रकार से तू ऐसा महसूस करेगा मानो कोई अत्याधिक पीड़ा नहीं है, और यह कि परमेश्वर बहुत ही प्यारा है। यदि तू देह की कमज़ोरियों को बढ़ावा देता है, और कहता है कि परमेश्वर बहुत दूर चला जाता है तो तू हमेशा ही पीड़ा का अनुभव करेगा और हमेशा ही उदास रहेगा और तू परमेश्वर के सभी कार्य के बारे में अस्पष्ट रहेगा और ऐसे दिखाई देगा कि परमेश्वर मनुष्यों की कमज़ोरियों में कोई सहानुभूति नहीं दिखा रहा है, और मनुष्यों की कठिनाईयों से अनजान है। इस प्रकार से तू दुखी और अकेला महसूस करेगा, मानो तूने अत्याधिक अन्याय सहा है, और इस समय तू शिकायत करना प्रारम्भ कर देगा। इस प्रकार जितना अधिक तू देह की कमज़ोरियों को बढ़ावा देगा, उतना ही अधिक तू महसूस करेगा कि परमेश्वर बहुत दूर चला जाता है, जब तक कि यह इतना भयानक न हो जाए कि तू परमेश्वर के कार्य को इन्कार करने लगे, और परमेश्वर का विरोध करने लगे और पूरी तरह से अनाज्ञाकारिता से भर जाए। इस प्रकार से, तुझे देह के विरोध में विद्रोह करना होगा, और इसको बढ़ावा नहीं देना होगा: तेरा पति, पत्नी, बच्चे, सम्भावनाएं, विवाह, परिवार—इनमें से कुछ भी मायने नहीं रखता है! तुझे यह संकल्प लेना होगा: "मेरे हृदय में केवल परमेश्वर ही है और मुझे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपना अथक प्रयास करना होगा और न कि देह को संतुष्ट करना होगा।" यदि तुझमें हमेशा इस प्रकार का संकल्प रहेगा, तो जब तू सत्य को अभ्यास में लाएगा, और अपने आप को अलग कर देगा, तो तू ऐसा करना बहुत ही कम प्रयास के द्वारा कर पाएगा। ऐसा कहा जाता है कि एक बार एक किसान ने सड़क पर एक सांप देखा जो बर्फ से जमी हुई लकड़ी जैसा था। उसे किसान ने उठाया और अपने सीने से लगा लिया, और सांप ने जीवित होने के पश्चात उसे डस लिया जिससे उस किसान की मृत्यु हो गयी। मनुष्य की देह भी सांप के समान है: इसका सार उनके जीवनों को हानि पहुंचाना है—और जब पूरी तरह से उसकी मनमानी चलने लगती है, तो तू जीवन पर अपना अधिकार खो बैठता है। देह शैतान का होता है। उसके भीतर असाधारण इच्छाएं होती हैं, यह केवल अपने ही बारे में सोचता है, यह आराम पसंद करता है और फुरसत में मज़ा लेता है, सुस्ती और आलस्य में धंसता चला जाता है और इसे एक निश्चित बिन्दु तक संतुष्ट करने के बाद तू अंततः इसके द्वारा खा लिया जाएगा। अर्थात् यदि तू इसे आज संतुष्ट करेगा, तो वह अगली बार तुझसे और अधिक की मांग करेगा। उसकी हमेशा असाधारण इच्छाएं और नई मांगें रहती हैं और तेरे देह को दिए गए बढ़ावे का फायदा उठाकर तुझसे यह और भी अधिक पोषित करवाएगा और इसके सुख में रहेगा—और यदि तू इस पर विजय प्राप्त नहीं करता है, तो तू अंततः स्वयं पर अधिकार खो देगा। तू परमेश्वर के सामने जीवन प्राप्त कर सकता है या नहीं, और तेरा अंतिम अंत क्या होगा, यह इस पर निर्भर करता है कि तू देह के प्रति अपना विद्रोह कैसे करता है। परमेश्वर ने तुझे बचाया है, और तुझे चुना है और पूर्वनिर्धारित किया है, फिर भी यदि आज तू उसे संतुष्ट करने की इच्छा नहीं करता है, तो तू सत्य को अभ्यास में लाने के इच्छुक नहीं है, तुझमें अपनी देह के विरूद्ध एक ऐसे हृदय के साथ विद्रोह करने की इच्छा नहीं है जो सचमुच परमेश्वर से प्रेम करता है, अंततः तू अपने आप को समाप्त कर देगा, और इस प्रकार से अत्याधिक कष्ट सहेगा। यदि तू हमेशा अपनी देह को बढ़ावा देता है, शैतान तुझे भीतर से धीरे-धीरे खा जाएगा, और तुझे बिना जीवन के, या बिना आत्मा के स्पर्श के छोड़ देगा, जब तक कि वह दिन न आ जाए जब तू अपने भीतर पूरी तरह से अंधकार से न भर जाए। जब तू अंधकार में रहेगा, तू शैतान के कब्ज़े में रहेगा, तेरे पास परमेश्वर नहीं होगा, और उस समय तू परमेश्वर के अस्तित्व को इंकार करेगा और उसे छोड़ देगा। इस प्रकार से, यदि तू परमेश्वर से प्रेम करने की इच्छा रखता है, तो तुझे पीड़ा का मूल्य चुकाना पड़ेगा और कठिनाई को सहना पड़ेगा। यहां पर बाहरी उत्सुकता और कठिनाईयों को सहने, अधिक पढ़ने और इधर-उधर और भागने की आवश्यकता नहीं है; इसके बजाय, तुझे अपने भीतर की चीज़ों को एक तरफ रखना होगा: असाधारण विचार, व्यक्तिगत हित और तेरे स्वयं के विचार, धारणाएं और प्रेरणाएँ। यही परमेश्वर की इच्छा है।

परमेश्वर के लोगों के बाहरी स्वभाव से निपटना भी उसके कार्य का एक भाग है; लोगों के बाहरी, असामान्य मानवता से निपटना, उदाहरण के लिए, या उनकी जीवनशैली और आदतें, उनके तौर-तरीके और आचार-व्यवहार, साथ ही साथ उनके बाहरी अभ्यास और उनकी उत्सुकताएं। परन्तु जब वह कहता है कि लोग सत्य को अभ्यास में लाएं और अपने स्वभाव को बदलें, प्रमुख रूप से जिसके साथ उन्हें निपटना है वे उनके भीतर की धारणा और प्रेरणाएं हैं। केवल तेरे बाहरी स्वभाव से निपटना कठिन नहीं है; परन्तु यह तुझे उन चीज़ों को खाने से मना करने के समान जो तुझे पसंद है, जो कि आसान है। वह जो तेरे भीतर की धारणाओं को छूता है, हालांकि, छोड़ने के लिए आसान नहीं है: इसके लिए आवश्यक है कि तू देह के खिलाफ़ विद्रोह करे, और एक कीमत चुकाए, और परमेश्वर के सामने कष्ट सहे। यह विशेष तौर पर लोगों की प्रेरणाओं के साथ होता है। परमेश्वर पर उनके विश्वास के समय से आज तक, लोगों ने कई गलत प्रेरणाओं को धारण किया है। जब तू सत्य को अभ्यास में नहीं ला रहा होता है, तू ऐसा महसूस करता है कि तेरी सभी प्रेरणाएं उचित हैं, परन्तु जब तेरे साथ कुछ घटित होता है, तो तू देखेगा कि तेरे भीतर बहुत सारी गलत प्रेरणाएं हैं। इस प्रकार, जब परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाता है, वह उन्हें महसूस कराता है कि उनके भीतर कई ऐसी धारणाएं हैं जो परमेश्वर के प्रति उनके ज्ञान को बाधा पहुँचा रही है। जब तुझे समझ आता है कि तेरी प्रेरणाएं गलत हैं, यदि तू अपनी धारणाओं और प्रेरणाओं के अनुसार अभ्यास करना छोड़ पाता है और परमेश्वर के लिए गवाही दे पाता है और तेरे साथ घटित होने वाली प्रत्येक बातों पर भी अपने स्थान पर दृढ़ खड़े रहता है, तो यह साबित करता है कि तूने देह के खिलाफ़ विद्रोह किया है। जब तू अपने देह के विरूद्ध विद्रोह करता है, तो तेरे भीतर निश्चय ही एक युद्ध होगा। शैतान कोशिश करेगा और तुझे इसका अनुसरण करने के लिए बाध्य करेगा, तुझसे देह की धारणाओं का अनुसरण करवाने के लिए कोशिश करेगा और देह के हितों को बनाए रखेगा—परन्तु परमेश्वर के वचन तुझे प्रबुद्ध करेंगे और तेरे भीतर रोशनी प्रदान करेंगे, और इस समय यह तुझ पर निर्भर करता है कि तू परमेश्वर का अनुसरण करे या फिर शैतान का अनुसरण करे। परमेश्वर लोगों को कहता है कि सत्य को अभ्यास में लाओ ताकि मुख्य तौर पर अपने भीतर की चीज़ों से ठीक तरह से निपट सको, अपने विचारों, और उनकी धारणाओं से निपट सको जो परमेश्वर के हृदय के अनुसार नहीं हैं। पवित्रआत्मा लोगों के भीतर स्पर्श करता है और उनके भीतर अपने कार्य को करता है, और इसलिए जो कुछ होता है उन सब के पीछे एक युद्ध है: प्रत्येक बार जब लोग सत्य को अभ्यास में लाते हैं या परमेश्वर के प्रेम को अभ्यास में लाते हैं, एक बड़ा युद्ध होता है, और हालांकि उनके देह में सब कुछ अच्छा दिखाई दे सकता है, परन्तु उनके हृदय की गहराई में जीवन और मृत्यु का युद्ध, वास्तव में, चल रहा होगा—और केवल इस घमासान युद्ध के बाद, एक अत्याधिक परिवर्तन के बाद, विजय या हार का फैसला किया जा सकता है। किसी को यह पता नहीं रहता है कि रोयें या हंसे। क्योंकि मनुष्यों के भीतर पाई जाने वाली अधिकांश प्रेरणाएं गलत होती हैं, या क्योंकि परमेश्वर का अधिकांश कार्य उनकी धारणाओं के हिसाब से अलग होता है, जब लोग सत्य को अभ्यास में लाते हैं तो पर्दे के पीछे एक बड़ा युद्ध चल रहा होता है। इस सत्य को अभ्यास में लाने के बाद, पर्दे के पीछे लोग परमेश्वर को संतुष्ट करने का मन अंततः बनाने के पहले उदासी के असंख्य आंसू बहा चुके होंगे। इसी युद्ध के कारण लोग दुखों और शुद्धिकरण को सह पाते हैं; यही असली कष्ट सहना है। जब तेरे ऊपर युद्ध आता है, यदि तू वास्तव में परमेश्वर की ओर खड़ा रह पाता है, तो तू परमेश्वर को संतुष्ट कर पाएगा। सत्य के अभ्यास के समय आने वाला कष्ट अपरिहार्य है; यदि, जब वे सत्य को अभ्यास में लाते हैं, उनके भीतर सब कुछ ठीक होगा, तो उन्हें परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने की आवश्यकता नहीं है, और वहां पर कोई युद्ध नहीं होगा और वे पीड़ित नहीं होंगे। यह इसलिए क्योंकि लोगों के भीतर कई ऐसी बातें हैं जो परमेश्वर के द्वारा उपयोग किए जाने के लिए ठीक नहीं हैं, और देह के अधिकांश विद्रोही स्वभाव, जो लोगों को देह के साथ विद्रोह करने का सबक अधिक गहराई से सीखने की आवश्यकता है। इसी को परमेश्वर "पीड़ा" कहता है जो वह लोगों को उसके साथ हो कर गुज़रने के लिए कहता है। जब तू समस्याओं से घिरे, तो जल्दी करो और परमेश्वर से प्रार्थना करो: हे परमेश्वर! मैं तुझे संतुष्ट रखने की इच्छा रखता हूं, मैं तेरे हृदय को संतुष्ट करने के लिए अंतिम कठिनाई को सहना चाहता हूं, और चाहे कितना भी भयानक असफलताएं आएं, मैं फिर भी तुझे संतुष्ट करूंगा। यहां तक कि यदि मुझे अपना सम्पूर्ण जीवन भी तुझे देना पड़े, फिर भी मुझे तुझे संतुष्ट करना होगा! इस संकल्प के साथ, जब तू प्रार्थना करेगा तो तू अपनी गवाही में दृढ़ खड़ा रह पाएगा। हर बार जब वे सत्य को अभ्यास में लाते हैं, तब हर बार वे शुद्धिकरण से होकर गुज़रते हैं, हर बार जब वे थक जाते हैं, और हर बार जब परमेश्वर का कार्य उन पर आता है, लोग अत्याधिक पीड़ा को सहते हैं। यह सब कुछ लोगों के लिए एक परीक्षा है, और इसलिए उन सबके भीतर एक युद्ध पाया जाता है। यही एक वास्तविक मूल्य है जो उन्हें चुकाना है। परमेश्वर के वचनों को और अधिक पढ़ना और ज्यादा इधर-उधर भागना एक प्रकार का मूल्य है। यही लोगों को करना चाहिए, यह उनका कर्तव्य है, और यही उनकी ज़िम्मेदारी है जो उन्हें पूरी करनी चाहिए, परन्तु लोगों को उनके भीतर पाई जाने वाली उन बातों को एक तरफ रखना होगा जिन्हें एक तरफ रखा जाना चाहिए। यदि तू ऐसा नहीं करता है, तो चाहे तू कितनी भी अधिक पीड़ाओं को सह ले, और चाहे कितनी भी भाग-दौड़ कर ले, सब कुछ व्यर्थ होगा! अर्थात् केवल तेरे भीतर का बदलाव ही तय कर सकता है कि तेरी बाहरी कठिनाई का कोई मूल्य है या नहीं। जब तेरा आंतरिक स्वभाव बदल गया होगा और तू सत्य को अभ्यास में ला चुका होगा, तो ही तेरी सारी बाहरी पीढ़ाएं परमेश्वर के अनुमोदन को प्राप्त करेंगी; यदि तेरे भीतरी स्वभाव में कोई बदलाव नहीं आया है, तो चाहे तू कितने भी अधिक कष्टों को सह ले या तू बाहर कितना भी भाग-दौड़ कर ले, परमेश्वर की ओर से तुझे कोई भी अनुमोदन प्राप्त नहीं होगा—और परमेश्वर के द्वारा अनुमोदित कठिनाईयों का कोई मूल्य नहीं है। इसलिए, जो कीमत तू चुका रहा है वह मायने रखती है या नहीं, वह इस बात पर निर्भर करता है कि तेरे भीतर कोई बदलाव आया है कि नहीं, और इससे कि परमेश्वर की इच्छा की संतुष्टि प्राप्त करने, परमेश्वर का ज्ञान और परमेश्वर के प्रति वफादारी को प्राप्त करने के लिए तूने सत्य को अभ्यास में लाया है या नहीं, और अपनी स्वयं की प्रेरणाओं और धारणाओं के विरूद्ध विद्रोह किया है या नहीं। तूने चाहे कितनी भी भाग-दौड़ की हो, यदि तूने कभी भी अपनी स्वयं की प्रेरणाओं के विरूद्ध विद्रोह नहीं किया है, केवल बाहरी कार्यों और उत्सुकता को ही खोजा है, और कभी भी अपने जीवन पर ध्यान नहीं दिया है, तो तेरी कठिनाईयां व्यर्थ होंगी। यदि, किसी एक निश्चित वातारण में, तेरे पास कुछ कहने को है, परन्तु तू भीतर ठीक महसूस नहीं कर रहा है, तो यह तेरे भाइयों और बहनों को लाभ नहीं पहुंचाएगा और हो सकता है कि उन्हें हानि पहुंचाए, तो तू वह नहीं कहेगा, भीतर ही भीतर कष्ट सहना पसंद करेगा, क्योंकि ये वचन परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट नहीं कर सकते। इस समय में, एक युद्ध तेरे भीतर चल रहा होगा, परन्तु तू पीड़ा को सहने की इच्छा करेगा और अपने प्रेम करने वाली चीज़ों को छोड़ना चाहेगा, तू परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए इन कठिनाईयों को सहने की इच्छा रखेगा, और हालांकि तू भीतर कष्ट सहेगा, तू देह को बढ़ावा नहीं देगा और परमेश्वर का हृदय संतुष्ट हो जाएगा और इसलिए तू भी अंदर चैन महसूस करेगा। यही वास्तव में कीमत चुकाना है, और इसी कीमत की इच्छा परमेश्वर को है। यदि तू इस प्रकार से अभ्यास करेगा, तो परमेश्वर निश्चय ही तुझे आशीषित करेगा; यदि तू इसे प्राप्त नहीं कर सकता है, तो इससे कुछ भी फर्क नहीं पड़ता कि तू कितना समझता है, या तू कितना अच्छा बोल सकता है, यह सब कुछ व्यर्थ ही होगा! यदि, परमेश्वर को प्रेम करने के मार्ग पर, तू परमेश्वर की ओर खड़े होने के योग्य है जब वह शैतान के साथ युद्ध करता है, और तू शैतान के पास वापस नहीं जाता है, तब तू परमेश्वर के प्रेम को प्राप्त कर सकता है, और तू अपनी गवाही में दृढ़ खड़ा हो सकता है।

अंतिम दिनों के मसीह के कथन – संकलन

केवल वह जो परमेश्वर के कार्य को अनुभव करता है वही परमेवर में सच में विश्वास करता है परमेश्वर का प्रकटीकरण एक नया युग लाया है परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है परमेश्वर के प्रकटन को उनके न्याय और ताड़ना में देखना केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है सात गर्जनाएँ – भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य के सुसमाचार पूरे ब्रह्माण्ड में फैल जाएंगे उद्धारकर्त्ता पहले से ही एक "सफेद बादल" पर सवार होकर वापस आ चुका है जब तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देख रहे होगे ऐसा तब होगा जब परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नये सिरे से बना चुका होगा वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं बुलाए हुए बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं तुम्हें मसीह की अनुकूलता में होने के तरीके की खोज करनी चाहिए क्या तुम परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हो? मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है क्या तुम जानते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक बहुत बड़ा काम किया है केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है अपनी मंज़िल के लिए तुम्हें अच्छे कर्मों की पर्याप्तता की तैयारी करनी चाहिए तुम किस के प्रति वफादार हो? तीन चेतावनियाँ परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है सर्वशक्तिमान का आह भरना तुम लोगों को अपने कार्यों पर विचार करना चाहिए विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए भ्रष्ट मनुष्य परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में अक्षम है सेवा के धार्मिक तरीके पर अवश्य प्रतिबंध लगना चाहिए परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना चाहिए प्रतिज्ञाएं उनके लिए जो पूर्ण बनाए जा चुके हैं दुष्ट को दण्ड अवश्य दिया जाना चाहिए वास्तविकता को कैसे जानें परमेश्वर की इच्छा की समरसता में सेवा कैसे करें सहस्राब्दि राज्य आ चुका है तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है आज परमेश्वर के कार्य को जानना क्या परमेश्वर का कार्य इतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है? तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए लोगों के बीच महत्वपूर्ण अंतर परमेश्वर पर विश्वास करना वास्तविकता पर केंद्रित होना चाहिए, न कि धार्मिक रीति-रिवाजों पर जो आज परमेश्वर के कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के आज्ञाकारी हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाएँगे राज्य का युग वचन का युग है भाग एक राज्य का युग वचन का युग ह भाग दो परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है भाग एक परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है भाग दो केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है भाग एक केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है भाग दो "सहस्राब्दि राज्य आ चुका है" के बारे में एक संक्षिप्त वार्ता केवल वही जो परमेश्वर को जानते हैं, उसकी गवाही दे सकते हैं पतरस ने यीशु को कैसे जाना परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग हमेशा के लिए उसके प्रकाश में रहेंगे क्या आप जाग उठे हैं? एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता होना है वे सब जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे ही परमेश्वर का विरोध करते हैं देहधारण के महत्व को दो देहधारण पूरा करते हैं क्या त्रित्व का अस्तित्व है? भाग एक क्या त्रित्व का अस्तित्व है? भाग दो पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग एक पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग दो पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग तीन तुझे अपने भविष्य मिशन से कैसे निपटना चाहिए जब परमेश्वर की बात आती है, तो तुम्हारी समझ क्या होती है एक वास्तविक मनुष्य होने का क्या अर्थ है तुम विश्वास के विषय में क्या जानते हो? देहधारियों में से कोई भी कोप के दिन से नहीं बच सकता है सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्यों को बचाने का कार्य भी है व्यवस्था के युग में कार्य छुटकारे के युग में कार्य के पीछे की सच्ची कहानी तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई भाग एक तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई भाग दो पद नामों एवं पहचान के सम्बन्ध में भाग एक पद नामों एवं पहचान के सम्बन्ध में भाग दो केवल पूर्ण बनाया गया ही एक सार्थक जीवन जी सकता है वह मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर के प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है जिसने उसे अपनी ही धारणाओं में परिभाषित किया है? जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर भाग एक देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर भाग दो परमेश्वर सम्पूर्ण सृष्टि का प्रभु है सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है भाग एक सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है भाग दो परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग एक परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग दो परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग तीन परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है भाग एक परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है भाग दो भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग एक भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग दो भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग तीन परमेश्वर द्वारा आवासित देह का सार भाग एक परमेश्वर द्वारा आवासित देह का सार भाग दो परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग एक परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग दो परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग तीन स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का वास्तविक सार है मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग एक मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग दो मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग तीन परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे भाग एक परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे भाग दो संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - चौथा कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - पाँचवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - छठवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सातवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - आठवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - नौवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - दसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - ग्यारहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बारहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - तेरहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - चौदहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - पन्द्रहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सोलहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सत्रहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - अठारहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - उन्नीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - इक्कीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बाईसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - तेइसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - पच्चीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सत्ताईसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - अट्ठाइसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - उन्तीसवाँ कथन नये युग की आज्ञाएँ दस प्रशासनिक आज्ञाएँ जिनका परमेश्वर के चयनित लोगों द्वारा राज्य के युग में पालन अवश्य किया जाना चाहिए "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग दो "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग तीन "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग चार "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग पांच "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग छे: "परमेश्वर के काम का दर्शन" पर परमेश्वर के वचन के तीन अंशों से संकलन भाग एक "परमेश्वर के काम का दर्शन" पर परमेश्वर के वचन के तीन अंशों से संकलन भाग दो "बाइबल के विषय में" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक "बाइबल के विषय में" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग दो "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग दो "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग तीन "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग चार "जीतने वाले कार्य का भीतरी सत्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक "जीतने वाले कार्य का भीतरी सत्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग दो भाग दो "जीतने वाले कार्य का भीतरी सत्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग तीन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - चैबीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - छब्बीसवाँ कथन

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