वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन – संकलन

हमारी पिछली सभा के दौरान हमने एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय को आपस में साझा किया था। क्या तुम लोगों को स्मरण है कि वह क्या था? मुझे इसे दोहराने दो। हमारी पिछली सहभागिता का विषय था: परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर। क्या यह तुम लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण विषय है? इसका कौन सा भाग तुम लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण है? परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव या स्वयं परमेश्वर? तुम लोगों को किस में सबसे ज्यादा रूचि है? तुम लोग किस भाग के विषय में सबसे अधिक सुनना चाहते हो? मैं जानता हूँ कि तुम लोगों के लिए इस प्रश्न का उत्तर देना कठिन है, क्योंकि परमेश्वर के स्वभाव को उसके कार्य के हर एक पहलु में देखा जा सकता है, और उसके स्वभाव को हमेशा उसके कार्य और सभी स्थानों में प्रकट होता है, और वास्तव में यह स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है; परमेश्वर की सम्पूर्ण प्रबंधकीय योजना में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव, और स्वयं परमेश्वर एक दूसरे से अलग नहीं हो सकते हैं।

परमेश्वर के कार्य के विषय में हमारी पिछली सभा की विषय-वस्तु बाइबिल में दर्ज है जो बहुत पहले घटित हुई थी। वे सब के सब परमेश्वर एवं मनुष्य की कहानियां थीं, और वे मनुष्य के साथ घटित हुईं और उसी समय उन्होंने परमेश्वर की भागीदारी एवं अभिव्यक्ति को शामिल किया, अतः ये कहानियाँ परमेश्वर को जानने के लिए विशेष मूल्य एवं महत्व रखती हैं। मनुष्य की सृष्टि करने के तुरन्त बाद, परमेश्वर ने मनुष्य के साथ संलग्न होना और मनुष्य से बात करना शुरू कर किया था, और उसका स्वभाव मनुष्य पर प्रकट होना आरम्भ हो गया था। दूसरे शब्दों में, जब पहली बार परमेश्वर मनुष्य के साथ संलग्न हुआ तब से वह बिना रुके वह अपने सार और स्वरूप को मनुष्य पर सार्वजनिक करने लगा था। इसके बावजूद कि प्रारम्भिक लोग या वर्तमान लोग इसे देखने या समझने के योग्य हैं या नहीं, संक्षेप में परमेश्वर मनुष्य से बात करता है और मनुष्य के बीच कार्य करता है, अपने स्वभाव को प्रकट करता है और अपने सारको अभिव्यक्त करता है—जो एक तथ्य है, और किसी भी व्यक्ति के द्वारा इसे नकारा नहीं जा सकता है। इसका अर्थ यह भी है कि परमेश्वर का स्वभाव, परमेश्वर सार, और स्वरूप सारवह निरन्तर जारी रहता है और प्रकट होता है जब वह मनुष्य के साथ कार्य करता है और संलग्न होता है। उसने किसी भी चीज़ को मनुष्य से कभी नहीं छिपाया है या कभी गुप्त नहीं रखा है, परन्तु इसके बदले उसे सार्वजनिक किया है और बिना कुछ छिपाए अपने स्वयं के स्वभाव को सार्वजानिक किया है। इस प्रकार, परमेश्वर आशा करता है कि मनुष्य उसे जान सकता है और उसके स्वभाव एवं सार को समझ सकता है। वह नहीं चाहता है कि मनुष्य उसके स्वभाव एवं सार से ऐसा व्यवहार करे जैसे कि वे अनन्त रहस्य हों, न ही वह यह चाहता है कि मनुष्य परमेश्वर को ऐसा समझे कि वह एक पहेली हो जिसको कभी भी सुलझाया नहीं जा सकता है। जब मानवजाति परमेश्वर को जान जाती है केवल तभी मनुष्य आगे का मार्ग जान सकता है और परमेश्वर के मार्गदर्शन को स्वीकार करने के योग्य हो सकता है, और केवल ऐसी ही मानवजाति सचमुच में परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन जीवन बिता सकती है, और ज्योति में जीवन बिता सकती है, और परमेश्वर की आशीषों के मध्य जीवन बिता सकती है।

वे वचन एवं वह स्वभाव जिन्हें परमेश्वर के द्वारा जारी एवं प्रकट किया गया था वे उसकी इच्छा को दर्शाते हैं, और वे उस के सार को भी दर्शाते हैं। जब परमेश्वर मनुष्य के साथ संलग्न होता है, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह क्या कहता है या करता है, या वह कौन सा स्वभाव प्रकट करता है, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य परमेश्वर के सार और उसके स्वरूप के विषय में क्या देखता है, क्योंकि वे सभी मनुष्य के लिए परमेश्वर की इच्छा को दर्शाते हैं। इसकी परवाह किए बगैर कि मनुष्य कितना कुछ एहसास करने, बूझने या समझने के योग्य है, यह सब कुछ परमेश्वर की इच्छा को दर्शाता है—मनुष्य के लिए परमेश्वर की इच्छा! यह सन्देह से परे है! मानवजाति के लिए परमेश्वर की इच्छा है कि जिस प्रकार वह लोगों से अपेक्षा करता है वे उसी प्रकार हों, कि जो वह उनसे अपेक्षा करता है वे उसे करें, कि जिस प्रकार वह उनसे अपेक्षा करता है वे उसी प्रकार जीवन जीएं, और जिस प्रकार वह उनसे अपेक्षा करता है वे उसी प्रकार परमेश्वर की इच्छा की सम्पूर्णता को पूरा करने के योग्य बनें। क्या ये चीज़ें परमेश्वर के सार से अविभाज्य हैं? दूसरे शब्दों में, परमेश्वर अपने स्वभाव और स्वरूप को जारी करता है और उसी समय वह मनुष्य से मांग कर रहा है। इसमें कुछ असत्य नहीं है, कोई बहाना नहीं है, कोई गोपनीयता नहीं है, और कोई सजावट नहीं है। फिर भी मनुष्य जानने में क्यों असमर्थ है, और क्यों वह परमेश्वर के स्वभाव को कभी स्पष्ट रूप से एहसास करने के योग्य नहीं हो पाया है? और क्यों उसने कभी परमेश्वर की इच्छा का एहसास नहीं किया है? जिसे परमेश्वर के द्वारा जारी एवं प्रदर्शित किया गया है यह वही है जो स्वयं परमेश्वर का स्वरूप है, और उसके सच्चे स्वभाव का हर एक छोटा सा भाग एवं विशेष पहलू है—अतः मनुष्य क्यों नहीं देख सकता है? मनुष्य क्यों ज्ञान को पूरी तरह से समझने में असमर्थ है? इसका एक महत्वपूर्ण कारण है। और यह कारण क्या है? सृष्टि की उत्पत्ति के समय से ही, मनुष्य ने कभी भी परमेश्वर के साथ परमेश्वर जैसा व्यवहार नहीं किया है। प्राचीन समयों में, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर ने मनुष्य के सम्बन्ध में क्या किया था, वह मनुष्य जिसे बस अभी अभी सृजा गया था, उस मनुष्य ने उससे एक साथी से बढ़कर व्यवहार नहीं किया था, कोई ऐसा जिस पर भरोसा किया जा सके, और उसके पास परमेश्वर का कोई ज्ञान या समझ नहीं थी। दूसरे शब्दों में, वह नहीं जानता था कि इस अस्तित्व के द्वारा क्या जारी किया गया था—यह अस्तित्व जिस पर वह भरोसा रखता था और उसे अपने साथी के रूप में देखता है—वह परमेश्वर का सार था, न ही वह जानता था कि यह प्रभावशाली अस्तित्व वह परमेश्वर है जो सभी चीज़ों के ऊपर शासन करता है। सरल रूप से कहें, उस समय के लोगों के पास परमेश्वर की ज़रा सी भी जानकारी नहीं थी। वे नहीं जानते थे कि स्वर्ग एवं पृथ्वी और सभी चीज़ों को उसी के द्वारा बनाया गया है, और वे इस बात से अनजान थे कि वह कहाँ से आया था, और इसके अतिरिक्त, कि वह कौन था। वास्तव में, उस बीते समय में परमेश्वर मनुष्य से अपेक्षा नहीं करता था कि वह उसे जाने, या उसे समझे, या वह सब कुछ जो उसने किया था उसे समझे, या उसकी इच्छा के विषय में जानकारी प्राप्त करे, क्योंकि ये मानवजाति की सृष्टि के बाद के अति प्राचीन समय थे। जब परमेश्वर ने व्यवस्था के युग के कार्य के लिए तैयारियाँ प्रारम्भ की, तब परमेश्वर ने मनुष्य के लिए कुछ किया और साथ ही मनुष्य से कुछ मांग करना शुरू किया, यह बताते हुए कि किस प्रकार परमेश्वर को भेंट चढ़ाएं और आराधना करें। केवल तभी मनुष्य ने परमेश्वर के बारे में कुछ साधारण विचारों को अर्जित किया था, केवल तभी उसने मनुष्य एवं परमेश्वर के बीच के अन्तर को जाना था, और यह कि वह परमेश्वर ही है जिसने मानवजाति की सृष्टि की थी। जब मनुष्य जान गया कि परमेश्वर परमेश्वर था और मनुष्य मनुष्य था, तो उसके एवं परमेश्वर के बीच में एक निश्चित दूरी बन गई, तब भी परमेश्वर ने अपेक्षा नहीं की कि मनुष्य के पास उसके विषय में अत्याधिक ज्ञान या गहरी समझ हो। इस प्रकार, परमेश्वर ने अपने कार्य के चरणों एवं परिस्थितियों के आधार पर मनुष्य से अलग अलग अपेक्षाएं कीं। इसमें तुम लोग क्या देखते हो? तुम लोग परमेश्वर के स्वभाव के किस पहलू का एहसास करते हो? क्या परमेश्वर वास्तविक है? क्या परमेश्वर की अपेक्षाएं मनुष्य के लिए उचित हैं? परमेश्वर के द्वारा मानवजाति की सृष्टि के बाद अति प्राचीन समयों के दौरान, जब परमेश्वर ने मनुष्य पर विजय एवं सिद्धता का कार्य अभी तक नहीं किया था, और उससे बहुत सारे वचन नहीं कहे थे, तब उसने मनुष्य से थोड़ी सी ही मांग की थी। इसकी परवाह न करते हुए कि मनुष्य ने क्या किया और उसने किस प्रकार व्यवहार किया—भले ही उसने कुछ ऐसे कार्यों को किया जिनसे परमेश्वर को ठेस लगी—फिर भी परमेश्वर ने सब को क्षमा किया और सभी बातों को अनदेखा किया। क्योंकि परमेश्वर जानता था कि उसने मनुष्य को क्या दिया था, और जानता था कि मनुष्य के भीतर क्या था, इस प्रकार वह अपेक्षाओं के स्तर को जानता था जिन्हें उसे मनुष्य से करनी चाहिए। यद्यपि उस समय उसकी अपेक्षाओं का स्तर बहुत ही नीचे था, फिर भी इसका अर्थ यह नहीं है कि उसका स्वभाव महान नहीं था, या यह कि उसकी बुद्धिमत्ता एवं सर्वसामर्थता सिर्फ खोखले वचन थे। क्योंकि मनुष्य के लिए, परमेश्वर के स्वभाव और स्वयं परमेश्वर को जानने का केवल एक ही मार्ग है: परमेश्वर के प्रबंधन एवं मानवजाति के उद्धार के कार्य के चरण का अनुसरण करने के द्वारा, और उन वचनों को स्वीकार करने के द्वारा जिन्हें परमेश्वर ने मानवजाति से कहा है। परमेश्वर के स्वरूप और परमेश्वर के स्वभाव को जानने से, क्या मनुष्य परमेश्वर से अब भी कहेगा कि उसे अपने वास्तविक व्यक्तित्व को दिखाए? मनुष्य ऐसा नहीं कहेगा, और ऐसा करने की हिम्मत नहीं करेगा, क्योंकि परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप को समझने के बाद, मनुष्य पहले ही स्वयं सच्चे परमेश्वर को देख चुका होगा, और पहले ही उसके वास्तविक व्यक्तित्व को देख चुका होगा। यह अवश्य घटित होनेवाला परिणाम है।

जब परमेश्वर का कार्य एवं योजना बिना रुके निरन्तर आगे बढ़ती जाती थी, और जब परमेश्वर ने मनुष्य के साथ एक चिन्ह के रूप में मेघधनुष की वाचा को स्थापित किया कि वह जलप्रलय का इस्तेमाल करके दोबारा कभी संसार का अन्त नहीं करेगा उसके पश्चात्, परमेश्वर के पास ऐसे लोगों को हासिल करने की अत्याधिक तीव्र इच्छा थी जो उसके साथ एक मन के हो सकते थे। इसी प्रकार परमेश्वर के पास भी बहुत ही प्रबल अभिलाषा थी कि ऐसे लोगों को हासिल करे जो पृथ्वी पर उसकी इच्छा को सम्पन्न करने में समर्थ हैं, और इसके अतिरिक्त, लोगों के ऐसे समूह को हासिल करे जो अंधकार की शक्तियों को तोड़कर आज़ाद होने में समर्थ हैं, और जो शैतान के द्वारा बांधे न जाएं, और पृथ्वी पर उसकी गवाही देने में समर्थ हैं। लोगों के ऐसे समूह को हासिल करना परमेश्वर की लम्बे समय की इच्छा थी, जिस का वह सृष्टि की रचना के समय से ही इंतज़ार कर रहा था। इस प्रकार, संसार का विनाश करने के लिए परमेश्वर के द्वारा जलप्रलय का उपयोग करने के बावजूद, या मनुष्य के साथ उसकी वाचा के बावजूद, परमेश्वर की इच्छा, मन का प्रारुप, योजना, और आशाएं एक समान बनी रहीं। जो वह करना चाहता था, जिसकी उसने सृष्टि की रचना के समय के बहुत पहले से लालसा की थी, वह यह था कि मानवजाति के मध्य से उन लोगों को हासिल करे जिन्हें उसने हासिल करने की इच्छा की थी—कि लोगों के ऐसे समूह को हासिल करे जो उसके स्वभाव को बूझने एवं जानने, और उसकी इच्छा को समझने में समर्थ थे, एक ऐसा समूह जो उसकी आराधना करने में समर्थ थे। लोगों का ऐसा समूह सचमुच में उसके लिए गवाही देने में सक्षम है, और ऐसा कहा जा सकता है कि वे उसके विश्वासपात्र हैं।

आज, आओ हम परमेश्वर के कदमों के निशानों को निरन्तर याद करें और उसके कार्य के चरणों का निरन्तर अनुसरण करें, ताकि हम परमेश्वर के विचारों एवं युक्तियों को, और प्रत्येक चीज़ को उजागर कर सकें जिसका परमेश्वर से सम्बन्ध है, वे सभी चीज़ें इतने लम्बे से "भण्डार में रखी" हुई हैं। इन चीज़ों के माध्यम से हम परमेश्वर के स्वभाव को जान जाएंगे, परमेश्वर के सार को समझ पाएंगे, हम परमेश्वर को अपने हृदयों में आने की अनुमति देंगे, और हम में से प्रत्येक परमेश्वर से अपनी दूरीयों को कम करते हुए धीरे-धीरे परमेश्वर के और करीब आएगा।

हमने पिछले समय जो बातचीत की थी उसका एक भाग इस बात से सम्बन्धित है कि परमेश्वर ने मनुष्य के साथ ऐसी वाचा क्यों बांधी। इस समय, हम पवित्र शास्त्र के निम्नलिखित अंशों के विषय में विचार विमर्श करेंगे। आओ हम पवित्र शास्त्र को पढ़ने के द्वारा प्रारम्भ करें।

क. अब्राहम

1. परमेश्वर अब्राहम से एक पुत्र देने की प्रतिज्ञा करता है

(उत्पत्ति 17:15-17) फिर परमेश्‍वर ने अब्राहम से कहा, "तेरी जो पत्नी सारै है, उसको तू अब सारै न कहना, उसका नाम सारा होगा। मैं उसको आशीष दूँगा, और तुझ को उसके द्वारा एक पुत्र दूँगा; और मैं उसको ऐसी आशीष दूँगा कि वह जाति जाति की मूलमाता हो जाएगी; और उसके वंश में राज्य-राज्य के राजा उत्पन्न होंगे।" तब अब्राहम मुँह के बल गिर पड़ा और हँसा, और मन ही मन कहने लगा, "क्या सौ वर्ष के पुरुष के भी सन्तान होगी और क्या सारा जो नब्बे वर्ष की है पुत्र जनेगी?"

(उत्पत्ति 17:21-22) परन्तु मैं अपनी वाचा इसहाक ही के साथ बाँधूँगा जो सारा से अगले वर्ष के इसी नियुक्‍त समय में उत्पन्न होगा। तब परमेश्‍वर ने अब्राहम से बातें करनी बन्द की और उसके पास से ऊपर चढ़ गया।

2. अब्राहम इसहाक को बलिदान करता है

(उत्पत्ति 22:2-3) उसने कहा, "अपने पुत्र को अर्थात् अपने एकलौते पुत्र इसहाक को, जिस से तू प्रेम रखता है, संग लेकर मोरिय्याह देश में चला जा; और वहाँ उसको एक पहाड़ के ऊपर जो मैं तुझे बताऊँगा होमबलि करके चढ़ा।" अतः अब्राहम सबेरे तड़के उठा और अपने गदहे पर काठी कसकर अपने दो सेवक, और अपने पुत्र इसहाक को संग लिया, और होमबलि के लिये लकड़ी चीर ली; तब निकल कर उस स्थान की ओर चला, जिसकी चर्चा परमेश्‍वर ने उससे की थी।

(उत्पत्ति 22:9-10) जब वे उस स्थान को जिसे परमेश्‍वर ने उसको बताया था पहुँचे; तब अब्राहम ने वहाँ वेदी बनाकर लकड़ी को चुन चुनकर रखा, और अपने पुत्र इसहाक को बाँध कर वेदी पर की लकड़ी के ऊपर रख दिया। फिर अब्राहम ने हाथ बढ़ाकर छुरी को ले लिया कि अपने पुत्र को बलि करे।

कोई भी उस कार्य को बाधित नहीं कर सकता है जिसे करने का परमेश्वर ने दृढ़ निश्चय करता है

तो, तुम लोगों ने अभी अभी अब्राहम की कहानी को सुना है। जब बाढ़ ने संसार को नष्ट कर दिया उसके पश्चात् परमेश्वर के द्वारा उसे चुना गया था, उसका नाम अब्राहम था, और जब वह सौ वर्ष का था, और उसकी पत्नी सारा नब्बे वर्ष की थी, तब परमेश्वर की प्रतिज्ञा उसे मिली। परमेश्वर ने उससे क्या प्रतिज्ञा की? परमेश्वर ने वह प्रतिज्ञा की जिसका संकेत हमें पवित्र शास्त्र में मिलता हैः "मैं उसको आशीष दूँगा, और तुझ को उसके द्वारा एक पुत्र दूँगा।" परमेश्वर के द्वारा उसे पुत्र दिए जाने के पीछे क्या पृष्ठभूमि थी? पवित्र शास्त्र निम्नलिखित लेख प्रदान करता हैः "तब अब्राहम मुँह के बल गिर पड़ा और हँसा, और मन ही मन कहने लगा, क्या सौ वर्ष के पुरुष के भी सन्तान होगी और क्या सारा जो नब्बे वर्ष की है पुत्र जनेगी?" दूसरे शब्दों में, ये दम्पत्ति इतने बूढ़े थे कि सन्तान उत्पन्न नहीं कर सकते थे। जब परमेश्वर ने अब्राहम से अपनी प्रतिज्ञा की उसके पश्चात् उसने क्या किया? वह हँसता हुआ अपने मुंह के बल गिरा, और अपने आप से कहा, "क्या सौ वर्ष के पुरुष के भी सन्तान होगी?" अब्राहम ने विश्वास किया कि यह असम्भव था—जिसका अर्थ है कि परमेश्वर की प्रतिज्ञा उसके लिए एक मज़ाक के अलावा और कुछ नहीं थी। मनुष्य के दृष्टिकोण से, इसे मनुष्य के द्वारा हासिल नहीं किया जा सकता है, और उसी तरह परमेश्वर के द्वारा भी हासिल नहीं किया जा सकता था और यह परमेश्वर के लिए असम्भव था। कदाचित्, अब्राहम के लिए यह हास्यास्पद बात थी: परमेश्वर ने मनुष्य को बनाया, फिर भी ऐसा लगता है कि वह यह नहीं जानता है कि कोई व्यक्ति जो इतना वृद्ध है वह सन्तान उत्पन्न करने में असमर्थ है; वह सोचता है कि वह मुझे सन्तान उत्पन्न करने की अनुमति देगा, वह कहता है कि वह मुझे एक पुत्र देगा—वास्तव में यह असम्भव है! और इस प्रकार, अब्राहम मुँह के बल गिरा और हँसने लगा, और अपने आप में सोचने लगा: असम्भव—परमेश्वर मुझ से मज़ाक कर रहा है, यह सही नहीं हो सकता है! उसने परमेश्वर के वचनों को गम्भीरता से नहीं लिया था। अतः, परमेश्वर की दृष्टि में, अब्राहम किस प्रकार का व्यक्ति था? (धर्मी)। कहाँ यह कहा गया था कि वह एक धर्मी मनुष्य था? तुम लोग सोचते हो कि वे सभी जिन्हें परमेश्वर बुलाता है वे धर्मी, एवं पूर्ण, और ऐसे लोग होते हैं जो परमेश्वर के साथ चलते हैं। तुम लोग सिद्धान्तों में बने रहते हो! तुम लोगों को स्पष्ट रूप से देखना होगा कि जब परमेश्वर किसी को परिभाषित करता है, तो वह ऐसा मनमाने ढंग से नहीं करता है। यहाँ, परमेश्वर ने यह नहीं कहा कि अब्राहम एक धर्मी मनुष्य है। अपने हृदय में, परमेश्वर के पास प्रत्येक व्यक्ति को मापने के लिए एक मानक होता है। हालाँकि परमेश्वर यह नहीं कहता है कि अब्राहम किस प्रकार का व्यक्ति था, फिर भी अपने आचरण के लिहाज से, अब्राहम के पास परमेश्वर में किस प्रकार का विश्वास था? क्या यह एक छोटा सी कल्पना थी? या वह एक बड़े विश्वास वाला व्यक्ति था? नहीं, वह नहीं था! उसकी हँसी एवं विचारों ने यह प्रकट किया कि वह कौन था, अतः तुम लोगों का विश्वास कि वह एक धर्मी व्यक्ति था यह सिर्फ तुम लोगों की कल्पना की उपज है, यह सिद्धान्तों का आँख बन्द कर के पालन करना है, यह एक गैरज़िम्मेदार मूल्यांकन है। क्या परमेश्वर ने अब्राहम की हँसी और उसकी भावभंगिमाओं[क] को देखा था, क्या वह उसके बारे में जानता था? परमेश्वर जानता था। परन्तु क्या परमेश्वर उस कार्य को बदल देता जिसे करने के लिए उसने दृढ़ निश्चय किया था? नहीं! जब परमेश्वर ने योजना बनाई और दृढ़ निश्चय किया कि वह इस मनुष्य को चुनेगा, तो उस मामले को पहले से ही पूर्ण किया जा चुका था। न तो मनुष्य के विचार और न ही उसका व्यवहार परमेश्वर को जरा सा भी प्रभावित करेंगे, या परमेश्वर के साथ हस्तक्षेप करेंगे; परमेश्वर अपनी योजना को मनमाने ढंग से नहीं बदलेगा, न ही वह बदलेगा या मनुष्य के बर्ताव के कारण अपनी योजना में उलट-फेर करेगा, जो मूर्खतापूर्ण भी हो सकता है। तो उत्पत्ति 17:21-22 में क्या लिखा है? "परन्तु मैं अपनी वाचा इसहाक ही के साथ बाँधूँगा जो सारा से अगले वर्ष के इसी नियुक्‍त समय में उत्पन्न होगा। तब परमेश्‍वर ने अब्राहम से बातें करनी बन्द की और उसके पास से ऊपर चढ़ गया।" जो कुछ अब्राहम ने सोचा या कहा था परमेश्वर ने उन पर जरा सा भी ध्यान नहीं दिया। और उसकी उपेक्षा का कारण क्या था? यह इसलिए था क्योंकि उस समय परमेश्वर ने यह मांग नहीं की थी कि मनुष्य को बड़ा विश्वास रखना है, या वह परमेश्वर के अत्याधिक ज्ञान को रखने के योग्य हो, या इसके अतिरिक्त, जो कुछ परमेश्वर के द्वारा किया गया और कहा गया वह उसे पूरी तरह से समझने के योग्य हो। इस प्रकार, उसने यह मांग नहीं की थी कि जो कुछ उसने करने का दृढ़ निश्चय किया था, या वे लोग जिन्हें उसने चुनने का निर्णय किया था, या उसके कार्यों के सिद्धान्तों को मनुष्य पूरी तरह से समझे, क्योंकि मनुष्य का डीलडौल साधारणतः पर्याप्त नहीं था। परमेश्वर ने उस समय, अब्राहम ने जो कुछ भी किया और जिस प्रकार उसने अपने आप में व्यवहार किया उसे सामान्य माना। उसने उसकी निंदा नहीं की, या उसे फटकार नहीं लगाई, परन्तु सिर्फ़ यह कहाः "सारा से अगले वर्ष इसी नियुक्त समय में इसहाक उत्पन्न होगा।" जब उसने इन वचनों की घोषणा की उसके पश्चात्, परमेश्वर के लिए यह मामला कदम दर कदम सत्य होता गया; परमेश्वर की नज़रों में, जिसे उसकी योजना के द्वारा पूरा किया जाना था उसे पहले से ही हासिल कर लिया गया था। और इसके लिए प्रबंधों को पूरा करने के बाद, परमेश्वर वहाँ से चला गया। जो कुछ मनुष्य करता या सोचता है, जो कुछ मनुष्य समझता है, मनुष्य की योजनाएं—इनमें से किसी का भी परमेश्वर से कोई रिश्ता नहीं है। हर एक चीज़ परमेश्वर की योजनाओं के अनुसार आगे बढ़ती है, उन समयों एवं चरणों के साथ साथ जिन्हें परमेश्वर के द्वारा तय किया गया है। परमेश्वर के कार्य का सिद्धान्त ऐसा ही है। मनुष्य जो कुछ भी सोचता है या जानता है परमेश्वर इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं करता है, फिर भी न तो वह अपनी योजनाओं को यों ही जाने देता है, या न ही अपने कार्यों को त्यागता है, क्योंकि मनुष्य विश्वास नहीं करता है या समझता नहीं है। तथ्य इस प्रकार से परमेश्वर की योजना एवं विचारों के अनुसार पूरे होते हैं। यह बिलकुल वही है जिसे हम बाइबल में देखते हैं; परमेश्वर ने इसहाक को ऐसे समय में जन्म लेने दिया जिसे उसने निर्धारित किया था। क्या ये तथ्य साबित करते हैं कि मनुष्य के व्यवहार एवं आचरण ने परमेश्वर के कार्य में बाधा डाला था? उन्होंने परमेश्वर के कार्य में बाधा नहीं डाला था! क्या परमेश्वर में मनुष्य के थोड़े से विश्वास ने, और परमेश्वर के विषय में उसकी अवधारणाओं एवं कल्पनाओं ने परमेश्वर के कार्य पर असर डाला था? नहीं, उन्होंने कोई असर नहीं डाला था! थोड़ा सा भी नहीं! परमेश्वर की प्रबन्धकीय योजना किसी भी मनुष्य, मामले, या पर्यावरण के द्वारा अप्रभावित है। वह सब कुछ जिसे करने के लिए उसने दृढ़ निश्चय किया है वह समय पर एवं उसकी योजना के अनुसार खत्म एवं पूर्ण होगा, और उसके कार्य के साथ किसी भी मनुष्य के द्वारा हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है। परमेश्वर मनुष्य की कुछ मूर्खताओं एवं अज्ञानताओं पर ध्यान नहीं देता है, और यहाँ तक उसके प्रति मनुष्य के कुछ प्रतिरोध एवं अवधारणाओं को भी नज़रअंदाज़ करता है; इसके बदले, वह बिना किसी संकोच के उस कार्य को करता है जो उसे करना चाहिए। यह परमेश्वर का स्वभावहै, और उसकी सर्वसामर्थता का प्रतिबिम्ब है।

पदटिप्पणियां:

क. मूल पाठ पढ़ता है "कार्य"

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परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
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