वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन – संकलन

आगे हम अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु के द्वारा बोले गए दृष्टान्त पर नज़र डालेंगे।

3. खोई हुई भेड़ का दृष्टान्त

(मत्ती18:12-14) क्या तुम समझते हो? यदि किसी मनुष्य की सौ भेड़ें हों, और उनमें से एक भटक जाए, तो क्या वह निन्यानवे को छोड़कर, और पहाड़ों पर जाकर, उस भटकी हुई को ना ढूँढ़ेगा? और यदि ऐसा हो कि उसे पाए, तो मैं तुम से सच कहता हूँ, कि वह उन निन्यानवे भेडों के लिए जो भटकी नहीं थी, इतना आनन्द नहीं करेगा जितना कि इस भेड़ के लिए करेगा। ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्ट हो।

यह एक रूपक है—इस अंश से लोग किस प्रकार का एहसास प्राप्त करते हैं? जिस तरह से इस अलंकार को प्रदर्शित किया गया है वह मानवीय भाषा में वाक्य अलंकार का उपयोग करता है; यह कुछ ऐसा है जो मनुष्य के ज्ञान के दायरे के भीतर है। यदि परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में ऐसा कुछ कहा होता, तो लोगों ने महसूस किया होता कि वास्तव में जो परमेश्वर है यह उस के अनुरूप नहीं था, लेकिन जब मनुष्य के पुत्र ने अनुग्रह के युग में इस अंश को प्रदान किया, तब इससे लोगों को सुकून, उत्साह, और घनिष्ठता मिली। जब परमेश्वर देहधारी हुआ, जब वह एक मनुष्य के रूप में प्रकट हुआ, तो उसने मानवता पर अपने हृदय की आवाज़ को प्रकट करने के लिए बिल्कुल उचित रूपक का उपयोग किया। यह आवाज़ परमेश्वर के स्वयं की आवाज़ का और उस कार्य का प्रतिनिधित्व करता है जो वह उस युग में करना चाहता था। अनुग्रह के युग के लोगों के प्रति परमेश्वर का जो रवैय्या था यह उसे भी दर्शाता था। लोगों के प्रति परमेश्वर की मनोदृष्टि के नज़रिए से देखने से पता चलता है कि, उसने हर व्यक्ति की तुलना एक भेड़ से की है। यदि एक भेड़ खो जाती है, तो उसे खोजने के लिए जो कुछ हो सकता है वह करेगा। यह इस समय मनुष्यों के बीच परमेश्वर के कार्य के सिद्धांत को देह में दर्शाता है। परमेश्वर ने इस कार्य में अपनी दृढ़ता और मनोवृत्ति की व्याख्या करने के लिए इस दृष्टान्त को प्रयोग किया था। यह परमेश्वर के देहधारण का लाभ थाः वह मानव जाति के ज्ञान का लाभ उठा सकता था और लोगों से बात करने, और अपनी इच्छा को प्रकट करने के लिए मानवीय भाषा का उपयोग कर सकता था। उसने मनुष्यों के लिए अपनी गहरी, और ईश्वरीय भाषा की व्याख्या की एवं अनुवाद किया जिसे मानवीय भाषा, और मानवीय तरीके से समझने में लोगों को संघर्ष करना पड़ता था। इस से लोगों को उस की इच्छा को समझने में और यह जानने में सहायता मिली कि वह क्या करना चाहता था। वह मानवीय भाषा का प्रयोग करके, मानवीय दृष्टिकोण से लोगों के साथ वार्तालाप कर सकता था, और साथ ही वह उस तरीके से लोगों से बातचीत कर सकता था जिसे वे समझ सकते थे। वह मानवीय भाषा और ज्ञान का उपयोग कर के बातचीत और काम कर सकता था जिस से लोग परमेश्वर की करूणा और नज़दीकी का एहसास कर सकते थे, जिस से वे उस के हृदय को देख सकते थे। तुम लोग इसमें क्या देखते हो? यह कि परमेश्वर के वचनों और क्रियाओं में कोई निषेधात्मकता नहीं थी। जिस तरह से लोग इसे देखते हैं, हो ही नहीं सकता था कि वह बात जो परमेश्वर स्वयं कहना चाहता था, और वह कार्य जो वह करना चाहता था उसके बारे में बात करने के लिए, या अपनी स्वयं की इच्छा को प्रकट करने के लिए परमेश्वर मनुष्यों के ज्ञान, भाषा, या बोलने के तरीकों का प्रयोग कर सकता था; यह एक त्रुटिपूर्ण सोच है। परमेश्वर ने इस प्रकार के अलंकार का प्रयोग किया जिस से लोग परमेश्वर की वास्तविकता और ईमानदारी का एहसास कर सकते हैं, और उस समय काल के दौरान लोगों के प्रति उसकी प्रवृत्ति को देख सकते हैं। इस दृष्टान्त ने उन लोगों को ख्वाब से जगा दिया था जो लम्बे समय से व्यवस्था के अधीन जीवन व्यतीत कर रहे थे, और इस ने अनुग्रह के युग में रहने वाले लोगों को भी पीढ़ी दर पीढ़ी प्रेरित किया था। इस दृष्टान्त के अंश को पढ़ने से, लोग मानव जाति को बचाने हेतु परमेश्वर की सत्यनिष्ठा और उसके हृदय में मानव जाति के लिए जो बोझ है उसे जान सकते हैं।

आओ हम इस अंश के अंतिम वाक्य पर एक नज़र डालें: "ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्ट हो।" क्या ये प्रभु यीशु के स्वयं के शब्द थे, या उसके स्वर्गीय पिता के शब्द थे? सतही तौर पर, ऐसा लगता है कि वह जो बात कर रहा है वह प्रभु यीशु है, परन्तु उसकी इच्छा प्रभु यीशु की इच्छा को प्रकट कर रहा है। इसीलिए उसने कहा थाः "ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्ट हो।" उस समय लोग केवल स्वर्गीय पिता को ही परमेश्वर के रूप में पहचानते थे, और इस व्यक्ति को जिसे वे अपनी आँखों के सामने देखते थे उसे बस उसके द्वारा भेजा हुआ समझते थे, और यह कि वह स्वर्गीय पिता का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था। इसी लिए प्रभु यीशु को साथ ही साथ ऐसा कहना पड़ा था, ताकि वे सचमुच में मानव जाति के लिए परमेश्वर की इच्छा को अनुभव कर सकें, और जो कुछ उसने कहा था उसकी प्रमाणिकता और सटीकता का एहसास कर सकें। भले ही यह कहने में एक साधारण बात थी, परन्तु यह बहुत ही ज़्यादा परवाह करने वाली बात थी और इस ने प्रभु यीशु की दीनता और रहस्य को प्रकाशित किया था। इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि चाहे परमेश्वर ने देहधारण किया या उसने आध्यात्मिक क्षेत्र में काम किया, वह मनुष्य के हृदय को सब से बढ़कर जानता था, और सब से बढ़कर यह समझता था कि लोगों की जरूरतें क्या थीं, और जानता था कि लोगों को कौन सी चिंता सताती थी, और क्या उन्हें भ्रम में डालता था, इसलिए उसने इस पंक्ति को जोड़ दिया था। इस पंक्ति ने एक समस्या को उजागर किया जो मानव जाति में छुपी हुई थी। मनुष्य के पुत्र ने जो कुछ भी कहा था उसको लेकर लोग सन्देह में थे, ऐसा कहना चाहिए, जब प्रभु यीशु कह रहा था उसे यह जोड़ना पड़ा थाः "ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्ट हो।" केवल इस पूर्वकथन पर ही उसके वचन फलवन्त हो सकते थे, ताकि उनकी सटीकता तथा उनकी विश्वसनीयता पर लोगों को विश्वास दिलाया जा सके। यह दिखाता है कि जब परमेश्वर मनुष्य का एक साधारण पुत्र बन गया, तब परमेश्वर और मनुष्य जाति का सम्बन्ध बड़ा अजीब सा था, और मनुष्य के पुत्र की स्थिति बहुत व्याकुल करने वाली थी। इस से यह भी दिखता था कि उस समय मनुष्यों के बीच में प्रभु की स्थिति कितनी महत्वहीन थी। जब उसने ऐसा कहा, तो यह वास्तव में लोगों को बताने के लिए थाः तुम लोग भरोसा कर सकते हो—यह उसे नहीं दर्शाता है जो स्वयं मेरे हृदय में है, परन्तु यह परमेश्वर की वह इच्छा है जो तुम लोगों के हृदय में है। मानव जाति के लिए, क्या यह एक हास्यास्पद बात नहीं थी? भले ही परमेश्वर देह में होकर काम कर रहा था और उसके पास अनेक फायदे थे जो उसके व्यक्तित्व में नहीं थे, फिर भी उसे उनके सन्देहों और तिरस्कार का सामना करना पड़ा था साथ ही उनकी स्तब्धता और मूढ़़ता का भी। ऐसा कहा जा सकता है कि मनुष्य के पुत्र के कार्य की प्रक्रिया मानव जाति के द्वारा तिरस्कृत किए जाने के अनुभव की प्रक्रिया, और मानव जाति के द्वारा उसके विरूद्ध प्रतिस्पर्धा किए जाने के अनुभव की प्रक्रिया थी। उस से बढ़कर, यह मानव जाति के भरोसे को निरन्तर जीतने और जो उस के पास है तथा जो वह है उसके द्वारा, और अपने स्वयं के सार के द्वारा मानव जाति पर विजय पाने के लिए काम करने की प्रक्रिया थी। वह इतना नहीं था कि देहधारी परमेश्वर ज़मीन पर शैतान के विरूद्ध युद्ध कर रहा था; यह उस से अधिक था कि परमेश्वर एक सामान्य मनुष्य बन गया और उनसे संघर्ष करना प्रारम्भ कर दिया जो उस का अनुसरण करते थे, और अपने संघर्ष में मनुष्य के पुत्र ने अपनी दीनता के साथ, जो उसके पास है तथा जो वह है उसके साथ, और अपने प्रेम और बुद्धि के साथ अपना कार्य पूर्ण किया था। उसने उन लोगों को हासिल किया जिन्हें वह चाहता था, उस पहचान और स्थिति को हासिल किया जिसके वह योग्य था, और अपने सिंहासन की ओर लौट गया।

आगे, आओ हम पवित्र शास्त्र के निम्नलिखित दो अंशों को देखें।

4. सात बार के सत्तर गुने तक क्षमा करो।

(मत्ती18:21-22) तब पतरस ने आकर उस से कहा, "हे प्रभु, यदि मेरा भाई अपराध करता रहे, तो मैं कितनी बार उसे क्षमा करूँ, क्या सात बार तक?" यीशु ने उससे कहा, मैं तुझ से यह नहीं कहता कि सात बार तक वरन् सात बार के सत्तर गुने तक।

5.प्रभु का प्रेम

(मत्ती22:37-39) उसने उससे कहा, तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख। पहली और मुख्य आज्ञा तो यही है। और उसी के समान यह दूसरी भी है कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।

इन दोनों अंशों में, एक क्षमा के बारे में बात करता है और दूसरा प्रेम के बारे में बात करता है। ये दोनों विषय वास्तव में प्रभु यीशु के कार्यों को उजागर करते हैं जिन्हें यीशु अनुग्रह के युग में पूरा करना चाहता है।

जब परमेश्वर देहधारी हो गया, तो वह उसके साथ अपने कार्य का एक चरण ले कर आया—वह उसके साथ विशिष्ट कार्य और उस स्वभाव को लेकर आया जिसे वह इस युग में व्यक्त करना चाहता था। उस समयकाल में, वह सब कुछ जो मनुष्य के पुत्र ने किया था वह उस कार्य के चारों ओर घूमने लगा था जिसे परमेश्वर इस युग में करना चाहता था। वह न इससे ज़्यादा कुछ करेगा न कम। प्रत्येक चीज़ जो उसने कही और प्रत्येक प्रकार का जो काम किया वह सब इस युग से सम्बंधित था। इस के बावजूद कि उसने इसे मानवीय तरीके से मानवीय भाषा में प्रदर्शित किया या ईश्वरीय भाषा में—इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कौन सा तरीका था, या किस दृष्टिकोण से था—उसका उद्देश्य था कि जो वह करना चाहता था, जो उसकी इच्छा थी, और लोगों से जो उसकी अपेक्षाएँ थीं उन्हें समझने में उनकी सहायता कर सके। वह विभिन्न दृष्टिकोण से विभिन्न माध्यमों का उपयोग कर सकता था ताकि लोगों को उसकी इच्छा को समझने और जानने में मदद मिल सके, और वे मानव जाति को बचाने के उसके कार्य को समझ सकें। इस प्रकार हम अनुग्रह के युग में देखते हैं कि प्रभु यीशु जो मानव जाति को बताना चाहता था उसे प्रदर्शित करने के लिए बार बार मानवीय भाषा का प्रयोग करता है। उस से भी बढ़कर, हम उसे एक सामान्य मार्गदर्शक के दृष्टिकोण से भी देखते हैं जो लोगों के साथ बात कर रहा है, उन की जरूरतों को पूरा कर रहा है, और जिसके लिए उन्होंने विनती की है उस में उनकी सहायता कर रहा है। इस प्रकार का कार्य व्यवस्था के युग में देखने में नहीं आता था जो अनुग्रह के युग के पहले आया था। वह मानव जाति के साथ और ज़्यादा घनिष्ठ हो गया और उनके प्रति और अधिक तरस से भर गया था, साथ ही साथ दोनों रूपों और तरीकों में व्यावहारिक परिणामों को प्राप्त करने में और अधिक सक्षम हो गया था। सात बार के सत्तर गुने तक लोगों को क्षमा करने की अभिव्यक्ति वास्तव में इस बिन्दु को स्पष्ट करती है। इस अभिव्यक्ति की संख्या द्वारा प्राप्त उद्देश्य यह था कि लोगों को प्रभु यीशु के ईरादे को समझने की अनुमति मिल सके जब उसने उस समय ऐसा कहा था। उसका इरादा था कि लोग एक दूसरे को क्षमा कर सकें—ना केवल एक या दो बार, और ना ही सात बार, पर सात बार के सत्तर गुने तक। "सात बार के सत्तर गुने तक" यह किस प्रकार का विचार है? यह इसलिए था कि लोग जान सकें कि क्षमा करना उन की जिम्मेदारी है, ऐसा कुछ जिसे उन्हें सीखना ही होगा, और एक ऐसा मार्ग जिस पर उनको चलना ही होगा। भले ही यह मात्र एक अभिव्यक्ति थी, किन्तु इस ने एक निर्णायक बिन्दु की भूमिका निभाई थी। इस ने लोगों की सहायता की कि जो वह कहना चाहता था वे उसकी गहराई से तारीफ करें और अभ्यास के उचित तरीकों और अभ्यास में सिद्धांतों और ऊँचे स्तर की खोज करें। इस अभिव्यक्ति ने साफ साफ समझने में लोगों की सहायता की और उन्हें एक बिल्कुल सही विचार दिया कि उन्हें क्षमा करना सीखना होगा—बिना किसी शर्त और बिना किसी सीमाओं के क्षमा करना, किन्तु सहिष्णुता की मानसिकता और दूसरों को समझते हुए। जब प्रभु यीशु ने ऐसा कहा, तब उसके हृदय में क्या था? क्या वह वास्तव में सात बार के सत्तर गुने तक के बारे में सोच रहा था? वह नहीं सोच रहा था। क्या उन समयों की संख्या की गिनती हो सकती है जितनी बार परमेश्वर मनुष्य को क्षमा करेगा। ऐसे बहुत से लोग हैं जो "समयों की संख्या की गिनती" में रूचि रखते हैं जिस का जिक्र हुआ है, जो वास्तव में इस संख्या के उद्गम और अर्थ के बारे में समझना चाहते हैं। वे समझना चाहते हैं कि यह संख्या प्रभु यीशु के मुँह से क्यों निकला था; वे विश्वास करते हैं कि इस संख्या में कहीं गहरा अर्थ निहित है। वास्तव में, यह सिर्फ मानवता में परमेश्वर का बोला गया कथन है। किसी भी अभिप्राय या अर्थ को मानव जाति के प्रति प्रभु यीशु की आकांक्षाओं के साथ साथ लेना होगा। जब परमेश्वर ने देहधारण नहीं किया था, तब जो कुछ वह कहता था लोग उसे काफी हद तक नहीं समझते थे क्योंकि वह पूर्ण दिव्यता से आया था। वह दृष्टिकोण और सन्दर्भ जिन के बारे में वह कहता था वह मानव जाति के लिए अदृश्य और अगम्य था; वह आध्यात्मिक आयाम से प्रकट होता था जिसे लोग देख नहीं सकते थे। ऐसे लोग जिन्होंने देह में जीवन बिताया था, वे आध्यात्मिक आयाम से होकर गुज़र नहीं सकते थे। परन्तु परमेश्वर के देहधारण के बाद, उसने मनुष्यों से मानवीय दृष्टिकोण से बात की, और वह आध्यात्मिक आयाम के दायरे से बाहर आया और उससे आगे बढ़ गया था। वह अपने दिव्य स्वभाव, इच्छा, और प्रवृत्ति को प्रकट कर सकता था, उन चीज़ों के द्वारा जिसकी कल्पना मनुष्य कर सकते थे और उन चीज़ों के द्वारा जिन्हें उन्होंने अपने जीवन में देखा और सामना किया था, और ऐसी पद्धतियों के प्रयोग के द्वारा जिन्हें मनुष्य स्वीकार कर सकते थे, एक ऐसी भाषा में जिसे वे समझ सकते थे, और ऐसे ज्ञान के द्वारा जिस का वे आभास कर सकते थे, ताकि मानवजाति को उस मात्रा तक जितना वे सह सकते थे परमेश्वर को समझने और जानने, और उनकी क्षमता के दायरे के भीतर उसके इरादे और उसके अपेक्षित ऊँचे स्तर को बूझने की अनुमति दे सके। यह मानवता मे परमेश्वर के कार्य की पद्धति और सिद्धांत थे। यद्यपि देह में होकर कार्य करने से परमेश्वर के तरीकों और सिद्धांतों को मुख्यतः उसकी मानवता के द्वारा या उस में होकर हासिल किया गया था, फिर भी इस ने सचमुच में ऐसे परिणामों को हासिल किया जिन्हें सीधे ईश्वरीयता में होकर कार्य करने से हासिल नहीं किया जा सकता था। मानवता में परमेश्वर के कार्य ज़्यादा ठोस, प्रमाणिक, और लक्ष्य पर आधारित थे, और पद्धतियाँ कहीं ज़्यादा लचीली थीं, तथा आकार में यह व्यवस्था के युग से बढ़कर हो गया था।

नीचे, आओ हम प्रभु से प्रेम करने और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करने के बारे में बात करें। क्या यह कुछ ऐसा है जो सीधे तौर पर ईश्वरीयता में प्रकट है? कदापि नहीं ! यह सब वे चीज़ें थीं जिन्हें मनुष्य के पुत्र ने मानवता में कहा था; केवल लोग ही कुछ ऐसा कहेंगे "अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम कर। दूसरों से प्रेम करना अपने स्वयं के जीवन का लालन पालन करने के समान है," और केवल लोग ही ऐसी रीति से बात कर सकते हैं। परमेश्वर ने कभी भी इस तरह बात नहीं की थी। और कम से कम, परमेश्वर के पास अपनी ईश्वरीयता में इस प्रकार की भाषा नहीं थी क्योंकि उसे मानव जाति के प्रति अपने प्रेम को व्यवस्थित करने के लिए इस प्रकार के सिद्धांत की आवश्यकता नहीं थी कि "अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम कर," क्योंकि मानव जाति के लिए परमेश्वर का प्रेम जो उसके पास है तथा जो वह है उसका स्वाभाविक प्रकाशन है। क्या तुम लोगों ने कभी सुना है कि परमेश्वर ने कुछ ऐसा कहा "मैं मनुष्य से ऐसा प्रेम करता हूँ जैसा मैं अपने आप से प्रेम करता हूँ?" क्योंकि प्रेम परमेश्वर के सार में, और जो उसके पास है तथा जो वह है उस में है। मानव जाति के लिए परमेश्वर का प्रेम और वह जिस रीति से लोगों से व्यवहार करता है और उसकी प्रवृत्ति उसके स्वभाव का स्वाभाविक प्रकटीकरण और प्रकाशन है। उसे किसी निश्चित तरीके से जानबूझकर ऐसा करने की कोई आवश्यकता नहीं है, या अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करने के लिए जानबूझकर किसी निश्चित तरीके या एक नैतिक नियम का अनुसरण करने की कोई आवश्यकता नहीं है—उसके पास पहले से ही इस प्रकार का सार है। तुम इसमें क्या देखते हैं? जब परमेश्वर ने मानवता में होकर काम किया, तो उसकी बहुत सारी पद्धतियाँ, वचन, और सच्चाईयाँ सब कुछ मानवीय तरीके से प्रकट हो गए थे। परन्तु उस समय परमेश्वर का स्वभाव, और परमेश्वर का स्वरूप वह सब लोगों के लिए प्रकट हुआ ताकि उन्हें जाना और समझा जा सके। जो कुछ उन्होंने जाना और समझा था वह वास्तव में जो उसके पास है तथा जो वह है और उसका सार था, जो स्वयं परमेश्वर की स्वाभाविक पहचान और स्थिति को दर्शाता था। ऐसा कहना चाहिए, कि मनुष्य के पुत्र के देहधारण ने स्वयं परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव और सार को संभावित सब से बड़े पैमाने तक और जहाँ तक हो सके उतने सटीक रूप में प्रकट किया था। ना केवल मनुष्य के पुत्र की मानवता स्वर्गीय परमेश्वर के साथ मनुष्य के संवाद और परस्पर व्यवहार में एक रूकावट या एक बाधा नहीं थी, किन्तु वह मनुष्य जाति के लिए सृष्टि के प्रभु से जुड़ने का एकमात्र माध्यम और एकमात्र पुल था। इस बिन्दु पर, क्या तुम लोग यह महसूस नहीं करते हो कि अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु के द्वारा किए गए कार्य के स्वभाव और पद्धतियों और कार्य की वर्तमान स्थिति के मध्य बहुत सारी समानताएँ हैं? कार्य की यह वर्तमान स्थिति परमेश्वर के स्वभाव को प्रकट करने के लिए ढेर सारी मानवीय भाषाओं का उपयोग करती है, और यह परमेश्वर की स्वयं की इच्छा को प्रकट करने के लिए मानव जाति के दैनिक जीवन और मानवीय ज्ञान से ढेर सारी भाषाओं और पद्धतियों का भी प्रयोग करती है। एक बार जब परमेश्वर देहधारी हो गया, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह मानवीय दृष्टिकोण से बात कर रहा है या दिव्य दृष्टिकोण से, क्योंकि प्रकटीकरण की उसकी बहुत भाषा और पद्धतियाँ वे सभी मानवीय भाषा एवं पद्धतियों के माध्यम से होती थीं। अर्थात्, जब परमेश्वर देहधारी हुआ, तो यह तुम्हारे लिए उसकी सर्वशक्ति और उसकी बुद्धिमत्ता को देखने और परमेश्वर के प्रत्येक सच्चे पहलू को जानने के लिए बेहतरीन अवसर था। जब परमेश्वर देहधारी हुआ, जैसे जैसे वह बड़ा हो रहा था, उसने मनुष्य के ज्ञान, व्यावहारिक ज्ञान, भाषा, और मानवता में प्रकटीकरण की पद्धतियों को समझा, सीखा, और आभास किया। परमेश्वर के देहधारण में यह सब चीज़ें थीं जो मनुष्यों से आए थे जिन्हें उसने सृजा था। वे देह में उसके स्वभाव और उसकी ईश्वरीयता को प्रकट करने के लिए परमेश्वर के औज़ार बन गए थे, और जब वह मानवीय दृष्टिकोण से और मानवीय भाषा का प्रयोग करते हुए मनुष्यों के बीच कार्य कर रहा था, तब उन्होंने उसे अपने कार्य को अधिक उचित, अधिक प्रमाणिक, और अधिक सटीक बनाने के लिए स्वीकृति प्रदान की। इस ने लोगों के लिए इसे अधिक सुगम और आसानी से समझने योग्य बनाया, इस प्रकार ऐसे परिणामों को प्राप्त किया जिन्हें परमेश्वर चाहता था। क्या इस तरह देह में बात करना परमेश्वर के लिए अधिक व्यावहारिक नहीं था? क्या यह परमेश्वर की बुद्धि नहीं है? जब परमेश्वर देहधारी हुआ, और जब परमेश्वर का देहधारण उस कार्य को लेने में सक्षम हुआ जिसे वह करना चाहता था, यह तब हुआ जब उसने व्यावहारिक रूप से अपने स्वभाव और अपने कार्य को व्यक्त किया होगा, और यह वह समय भी था जब वह मनुष्य के पुत्र के रूप में आधिकारिक रूप से अपनी सेवकाई की शुरूआत कर सकता था। इसका मतलब था कि अब आगे से परमेश्वर और मनुष्यों के बीच कोई खाई नहीं होगी, और यह कि परमेश्वर जल्द ही सन्देशवाहकों के द्वारा संवाद के अपने कार्य को रोक देगा, और स्वयं परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से सभी वचनों को प्रकट करेगा और देह में होकर काम करेगा जिसे वह करना चाहता था। इसका अर्थ यह भी था कि वे लोग जिन्हें परमेश्वर ने बचाया था उसके बेहद करीब थे, और उसके प्रबन्धकीय कार्य ने एक नए सीमा क्षेत्र में कदम रखा था, और पूरी मानव जाति का आमना सामना एक नए युग से होने वाला था।

प्रत्येक जिस ने बाइबल पढ़ा है जानता है कि बहुत सी चीज़ें घटित हुई थीं जब यीशु का जन्म हुआ था। उनमें से सब से बड़ा था शैतानों के राजा द्वारा मार गिराया जाना, यहाँ तक कि उस बिन्दु तक जहाँ सारे बच्चों को जो दो वर्ष या उस से नीचे के थे उन्हें मारा जा रहा था। यह प्रकट है कि मनुष्यों के बीच देहधारी होकर परमेश्वर ने बड़े जोखिम का अनुमान लगा लिया था; और यह भी प्रकट है कि मानव जाति को बचाने के उसके प्रबन्ध को पूरा करने के लिए उसने एक बड़ी कीमत चुकाई है। वे बड़ी आशाएँ जो परमेश्वर को अपने कार्य के ऊपर थी जिसे उसने देह में होकर मानव जाति के मध्य किया था वे भी प्रकट थे। जब परमेश्वर का देह मानव जाति के मध्य अपने कार्य को लेने में सक्षम हुआ, तो वह कैसा महसूस कर रहा था? लोगों को उसे थोड़ा बहुत समझना चाहिए, सही है? कम से कम परमेश्वर प्रसन्न था क्योंकि वह मानव जाति के मध्य अपने नए कार्य के विकास को प्रारम्भ कर सकता था। जब प्रभु यीशु ने बपतिस्मा लिया था और अपनी सेवकाई को पूरा करने के लिए आधिकारिक रूप से अपने कार्य को प्रारम्भ किया, तो परमेश्वर का हृदय आनन्द से भर गया क्योंकि इतने सालों के इन्तज़ार और तैयारी के बाद वह अंततः एक औसत इन्सान की देह को पहन सकता था और लहू और माँस के एक मनुष्य के रूप में अपने नए कार्य को प्रारम्भ कर सकता था जिसे लोग देख और छू सकते थे। वह अंततः मनुष्य की पहचान के द्वारा लोगों के साथ आमने सामने और दिल से दिल मिला कर बात कर सकता था। परमेश्वर मानवीय भाषा में, मानवीय तरीके से मानव जाति के साथ रूबरू हो सकता था; वह मानव जाति की जरूरतों को पूरा कर सकता था, उन्हें प्रकाशमान कर सकता था, और मानवीय भाषा का उपयोग कर उनकी सहायता कर सकता था; वह एक ही मेज़ पर बैठ कर भोजन कर सकता था और उसी जगह पर उनके साथ रह सकता था। वह मनुष्यों को भी देख सकता था, चीज़ों को देख सकता था, और जैसा मनुष्य देखते हैं उस तरह हर चीज़ को देख सकता था और वो भी स्वयं अपनी आँखों से। परमेश्वर के लिए, यह पहले से ही देह में उसके कार्य की उसकी पहली विजय थी। ऐसा भी कहा जा सकता है कि यह एक महान कार्य की पूर्णता थी—यह वास्तव में वह था जिसके बारे में परमेश्वर सब से अधिक प्रसन्न था। तब से यह पहली बार था जब परमेश्वर ने मानव जाति के मध्य अपने कार्य में एक प्रकार का सुकून महसूस किया। यह सभी घटनाएँ बहुत व्यावहारिक और बहुत स्वाभाविक थी, और वह सुकून जो परमेश्वर ने महसूस किया था वह बहुत ही सच्चा था। मानव जाति के लिए, जब भी परमेश्वर के कार्य का एक नया स्तर पूरा होता था, और जब भी परमेश्वर संतुष्टि का एहसास करता था, वह तब होता था जब मानव जाति परमेश्वर के करीब आती थी, और जब लोग उद्धार के निकट आते थे। परमेश्वर के लिए, यह उस के नए कार्य की शुरूआत है, जब उसकी प्रबन्धकीय योजना ने एक कदम आगे बढा़या है, और इस के अतिरिक्त, जब उस की इच्छा पूर्ण निष्पादन तक पहुँचेगी। मानवजाति के लिए, इस प्रकार के अवसर का आगमन सौभाग्यशाली, और बहुत अच्छा है; उन सब के लिए जो परमेश्वर के उद्धार की बाट जोहते हैं, यह एक महत्वपूर्ण समाचार है। जब परमेश्वर कार्य के एक नए स्तर को करता है, तब वह एक नई शुरूआत करता है, और जब मानव जाति के मध्य इस नए कार्य और नई शुरूआत का आरम्भ और परिचय हो जाता है, यह तब होता है जब पहले से ही इस कार्य के स्तर के परिणाम को निर्धारित कर लिया जाता है, और इसे पूर्ण कर लिया जाता है, और परमेश्वर पहले से ही उसके प्रभावों और फलों को देख लेता है। यह तब भी होता है जब ये प्रभाव परमेश्वर को सन्तुष्टि का एहसास दिलाते हैं, और तब वास्तव में उसका हृदय प्रसन्न होता है। क्योंकि, परमेश्वर की नज़रों में उसने पहले से ही उन लोगों को निर्धारित कर दिया है जिन्हें वह ढूँढ़ रहा है, और पहले से ही इस समूह को प्राप्त कर लिया है, एक ऐसा समूह जो उसके कार्य को करने में सक्षम है और उसे सन्तुष्टि प्रदान कर सकता है, परमेश्वर पुनः आश्वासन का एहसास करता है, वह अपनी चिन्ताओं को दरकिनार करता है, और वह प्रसन्नता का एहसास करता है। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर का देह मनुष्य के मध्य एक नए कार्य की साहसिक यात्रा पर जाने को सक्षम हो जाता है, और वह उस कार्य को करना प्रारम्भ कर देता है जिसे उसे बिना किसी अड़चन के करना होगा, और जब उस को यह एहसास होता है कि सब कुछ पूर्ण किया जा चुका है, तो उसने उसके अन्त को पहले से ही देख लिया है। और इस अन्त के कारण वह सन्तुष्ट है, प्रसन्न दिल है। परमेश्वर की प्रसन्नता किस प्रकार व्यक्त होती है? क्या तुम लोग उसकी कल्पना कर सकते हो? क्या परमेश्वर रोयेगा? क्या परमेश्वर रो सकता है? क्या परमेश्वर ताली बजा सकता है? क्या परमेश्वर नृत्य कर सकता है? क्या परमेश्वर गाना गा सकता है? वह गीत कौन सा होगा? निस्संदेह परमेश्वर एक सुन्दर और द्रवित कर देने वाला गीत गा सकता है, एक गीत जो उसके हृदय के आनन्द और प्रसन्नता को व्यक्त कर सकता है। वह उसे मानव जाति के लिए गा सकता है, अपने आपके लिए गा सकता है, और सभी चीज़ों के लिए गा सकता है। परमेश्वर की प्रसन्नता किसी भी तरीके से व्यक्त हो सकती है—यह सब कुछ सामान्य है क्योंकि परमेश्वर के पास आनन्द और दुःख दोनों हैं, और उसके विभिन्न एहसासों को विभिन्न तरीकों से व्यक्त किया जा सकता है। यह उसका अधिकार है और यह बिल्कुल सामान्य चीज़ है। तुम लोगों को इसके बारे में कुछ और नहीं सोचना चाहिए, और तुम लोगों को उसकी प्रसन्नता या उसके किसी भी एहसास को सीमित करने के लिए उससे यह कहते हुए कि उसे यह नहीं करना चाहिए या वह नहीं करना चाहिए, उसे इस तरह नहीं करना चाहिए या उस तरह नहीं करना चाहिए, तुम लोगों को अपने स्वयं के निषेधों को परमेश्वर पर थोपना नहीं चाहिए। लोगों के हृदयों में परमेश्वर प्रसन्न नहीं हो सकता है, वह आँसू नहीं बहा सकता है, वह विलाप नहीं कर सकता है—वह किसी भावना को व्यक्त नहीं कर सकता है। जिन बातों के द्वारा हमने इन दो बार संवाद किया, उससे मैं यह विश्वास करता हूँ कि तुम लोग परमेश्वर को अब और इस तरह से नहीं देखोगे, बल्कि परमेश्वर को अनुमति दोगे कि उसके पास कुछ स्वतन्त्रता और राहत हो। यह बहुत ही अच्छी बात है। भविष्य में यदि तुम लोग सचमुच में परमेश्वर की उदासी को महसूस करने में सक्षम हो जाते हो जब तुम उसकी उदासी के बारे में सुनते हो, और तुम लोग सचमुच में उसकी प्रसन्नता को महसूस करने में सक्षम हो जाते हो जब तुम लोग उसकी प्रसन्नता के बारे में सुनते हो—कम से कम, तुम लोग स्पष्ट रूप से यह जानने और समझने में समर्थ हो गए हो कि क्या परमेश्वर को प्रसन्न करता है और क्या उसे उदास करता है—जब तुम यह महसूस करने में समर्थ हो जाते हो कि तुम उदास हो क्योंकि परमेश्वर उदास है, तुम प्रसन्न हो क्योंकि परमेश्वर प्रसन्न है, तो उसने तुम्हारे हृदय को पूरी तरह से प्राप्त कर लिया होगा और आगे से उसके साथ कोई अड़चन नहीं होगी। तुम आगे से मानवीय कल्पनाओं, विचार धारणाओं, और ज्ञान के द्वारा परमेश्वर को विवश करने की कोशिश नहीं करोगे। उस समय, परमेश्वर तुम्हारे हृदय में जीवित और सजीव होगा। वह तुम्हारे जीवन का परमेश्वर होगा और तुम्हारी हर चीज़ का स्वामी होगा। क्या तुम्हारे पास इस प्रकार की आकांक्षाएँ हैं। क्या तुम लोगों को विश्वास है कि तुम लोग इसे प्राप्त कर सकते हो?

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X

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