वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन – संकलन

 भाग एक    

(I) परमेश्वर के अधिकार, परमेश्वर के धर्मी स्वभाव, एवं परमेश्वर की पवित्रता का अवलोकन

जब तुम अपनी प्रार्थनाओं को समाप्त करते हो, तो क्या तुम लोगों के हृदय को परमेश्वर की उपस्थिति में शांति महसूस होती है? (हाँ) यदि किसी व्यक्ति के हृदय को शांत किया जा सकता है, तो वे परमेश्वर के वचन को सुनने एवं समझने में सक्षम होंगे और वे सत्य को सुनने एवं समझने में सक्षम होंगे। यदि तुम्हारा हृदय शांत होने में असमर्थ है, यदि तुम्हारा हृदय हमेशा भटकता रहता है, या हमेशा अन्य चीज़ों के बारे में सोचता रहता है, तो यह तुम्हारे एक साथ आकर परमेश्वर के वचन को सुनने पर असर डालेगा। अतः, जिस पर हम इस समय चर्चा कर रहे हैं उसके केन्द्र में क्या है? आइए हम सब उस मुख्य बिन्दु पर अतीत को थोड़ा बहुत याद करें। स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है उसे जानने के लिहाज से, वह पहला भाग क्या है जिस पर हमने चर्चा की थी? (परमेश्वर का अधिकार।) दूसरा क्या था? (परमेश्वर का धर्मी स्वभाव।) और तीसरा? (परमेश्वर की पवित्रता।) हम ने कितनी बार परमेश्वर के अधिकार की चर्चा की है? क्या इसने तुम लोगों पर कोई प्रभाव छोड़ा है? (दो बार।) परमेश्वर के धर्मी स्वभाव के बारे में क्या? (एक बार।) जितनी बार हमने परमेश्वर की पवित्रता पर चर्चा की है उसने कदाचित् तुम लोगों पर एक प्रभाव छोड़ा है, लेकिन क्या उस विशिष्ट विषयवस्तु ने तुम सभी लोगों पर कोई प्रभाव छोड़ा है जिस पर हमने हर बार चर्चा की है। पहले भाग पर "परमेश्वर का अधिकार," जिसने तुम लोगों पर अत्यंत गहरी छाप छोड़ी थी, किस भाग ने तुम लोगों पर सबसे अधिक प्रभाव छोड़ा था? (परमेश्वर के वचन का अधिकार एवं परमेश्वर जो सभी चीज़ों का शासक है।) महत्वपूर्ण बिन्दुओं के बारे में बात कीजिए। (पहला, परमेश्वर ने अधिकार एवं परमेश्वर के वचन की सामर्थ का संचार किया था; परमेश्वर अपने वचन के समान ही भला है और उसका वचन सच्चा साबित होगा। यह परमेश्वर का वास्तविक सार है।) (स्वर्ग एवं पृथ्वी की उसकी सृष्टि और वह सब जो उसके भीतर है उनमें परमेश्वर का अधिकार निहित है। कोई भी मनुष्य परमेश्वर के अधिकार को पलट नहीं सकता है। परमेश्वर सभी चीज़ों का शासक है और वह सभी चीज़ों को नियन्त्रित करता है।) (परमेश्वर इंद्रधनुष एवं मनुष्य के साथ बांधी गई वाचाओं का उपयोग करता है।) यह एक विशिष्ट विषयवस्तु है। क्या कोई और बात थी? (शैतान के लिए परमेश्वर की आज्ञाएँ थीं कि वह अय्यूब की परीक्षा ले सकता है, लेकिन उसके जीवन को नहीं ले सकता है। इससे हम परमेश्वर के वचन के अधिकार को देखते हैं।) यह ऐसी समझ है जिसे तुम लोगों ने संगति को सुनने के बाद हासिल की थी, सही है? क्या जोड़ने के लिए कोई और बात है? (हम मुख्य रूप से यह पहचानते हैं कि परमेश्वर का अधिकार परमेश्वर की अद्वितीय हैसियत एवं पद स्थिति को दर्शाता है, और कोई भी सृजा गया या न सृजा गया प्राणी उसके अधिकार को धारण नहीं कर सकता है।) (परमेश्वर मनुष्य के साथ एक वाचा बांधने के लिए बोलता है और वह इंसान के ऊपर अपनी आशीषों को रखने के लिए बोलता है, ये सभी परमेश्वर के वचन के अधिकार के उदाहरण हैं।) (उसके वचन के माध्यम से स्वर्ग एवं पृथ्वी और सभी चीज़ों की सृष्टि में हम परमेश्वर के अधिकार को देखते हैं, और देहधारी परमेश्वर से हम उसके वचन को देखते हैं जो परमेश्वर के अधिकार को भी धारण किए हुए है, ये दोनों परमेश्वर की अद्वितीयता के प्रतीक हैं। जब प्रभु यीशु ने लाजर को आज्ञा दी कि कब्र में से बाहर निकल आए तब हम देखते हैं कि ज़िन्दगी और मौत परमेश्वर के नियन्त्रण में हैं, जिसे नियन्त्रित करने के लिए शैतान के पास कोई शक्ति नहीं है, और यह कि चाहे परमेश्वर का कार्य देह में किया गया हो या आत्मा में, उसका अधिकार अद्वितीय है।) क्या तुम लोगों के पास जोड़ने के लिए कोई और बात है? (हम देखते हैं कि जीवन की छः घटनाक्रमों को परमेश्वर के द्वारा निर्देशित किया गया है।) बहुत अच्छा! और क्या? (मनुष्य के प्रति परमेश्वर की आशीषें भी उसके अधिकार को दर्शाती हैं।) जब हम परमेश्वर के अधिकार के बारे में बात करते हैं, तो "अधिकार शब्द के विषय में तुम लोगों की समझ क्या है? परमेश्वर के अधिकार के दायरे के भीतर, जो कुछ परमेश्वर अंजाम देता है और प्रगट करता है उसमें, लोग क्या देखते हैं? (हम परमेश्वर की सर्वसामर्थता एवं बुद्धिमत्ता को देखते हैं।) (हम देखते हैं कि परमेश्वर का अधिकार हमेशा मौजूद है और यह कि वह सचमुच में, एवं वाकई में अस्तित्व में है।) (हम जगत के ऊपर बड़े पैमाने पर उसकी प्रभुता में परमेश्वर के अधिकार को देखते हैं, और जिस तरह वह मानव जीवन को नियन्त्रण में लेता है हम इसे छोटे पैमाने पर देखते हैं। जीवन की छः घटनाक्रमों से हम देखते हैं कि परमेश्वर वास्तव में हमारे जीवन के प्रत्येक पहलू की योजना बनाता है और नियन्त्रित करता है।) (इसके अतिरिक्त, हम देखते हैं कि परमेश्वर का अधिकार स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है, उसका प्रतिनिधित्व करता है, और कोई भी सृजा गया या न सृजा गया प्राणी इसे धारण नहीं कर सकता है। परमेश्वर का अधिकार उसकी हैसियत का प्रतीक होता है।) "परमेश्वर की हैसियत और परमेश्वर की पद स्थिति का प्रतीक," ऐसा प्रतीत होता है कि तुम लोगों को इन वचनों की सैद्धान्तिक समझ है। मैंने अभी अभी तुम सब लोगों से क्या प्रश्न पूछा था, क्या तुम लोग इसे दोहरा सकते हो? (जो कुछ परमेश्वर अंजाम देता है और प्रगट करता है उसमें, हम क्या देखते हैं?) तुम लोग क्या देखते हो? क्या ऐसा हो सकता है कि तुम लोग केवल परमेश्वर के अधिकार को ही देखते हो? क्या तुम लोग केवल परमेश्वर के अधिकार को ही महसूस करते हो? (हम परमेश्वर की वास्तविकता को, परमेश्वर की सच्चाई को, और परमेश्वर की विश्वासयोग्यता को देखते हैं।) (हम परमेश्वर की बुद्धि को देखते हैं।) परमेश्वर की विश्वासयोग्यता, परमेश्वर की सच्चाई, और कुछ लोगों ने कहा था परमेश्वर की बुद्धि। वहाँ और क्या है? (परमेश्वर की सर्वसामर्थता।) (परमेश्वर की धार्मिकता एवं अच्छाई को देखना।) तुम लोगों ने अभी तक कील के सिरे पर ठीक से प्रहार नहीं किया है, अतः थोड़ा और सोचिए। (परमेश्वर का अधिकार एवं सामर्थ मानवजाति के विषय में उसके उत्तरदायित्व लेने, अगुवाई करने, और प्रबंधन में प्रगट एवं प्रतिबिम्बित हुआ है। यह बिलकुल वास्तविक एवं सत्य है। वह हमेशा से अपना कार्य कर रहा है और कोई भी सृजा गया या न सृजा गया प्राणी इस अधिकार एवं सामर्थ को धारण नहीं कर सकता है।) क्या तुम सभी अपनी अपनी लेखन पुस्तिकाओं (नोट्स) की ओर देख रहे हो? क्या तुम लोगों के पास वास्तव में परमेश्वर के अधिकार का कोई ज्ञान है? क्या तुम लोगों में से किसी ने सचमुच में उसके अधिकार को समझा है? (जब हम छोटे से थे तब से परमेश्वर ने हमारी निगरानी की है और हमारी सुरक्षा की है, और हम इस में परमेश्वर के अधिकार को देखते हैं। हम हमेशा उन स्थितियों को नहीं समझते थे जो हम पर आ पड़ती थीं, लेकिन दृश्य के पीछे परमेश्वर हमेशा हमारी सुरक्षा कर रहा था; यह भी परमेश्वर का अधिकार है।) बहुत अच्छा, ठीक कहा!

जब हम परमेश्वर के अधिकार, एवं उस मुख्य बिन्दु के बारे में बात करते हैं तो ध्यान कहाँ केन्द्रित होता है? हमें इस विषयवस्तु पर चर्चा करने की आवश्यकता क्यों है? सबसे पहले, लोग परमेश्वर के अधिकार को समझने, देखने, और महसूस करने में सक्षम हैं। जो कुछ तुम देखते हो और जो कुछ तुम महसूस करते हो वे परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के वचन, एवं संसार के ऊपर परमेश्वर के नियन्त्रण से हैं। अतः, वह सब जिसे लोग परमेश्वर के अधिकार के माध्यम से देखते हैं, वह सब जिसे वे परमेश्वर के अधिकार के माध्यम से सीखते हैं, और जो कुछ वे परमेश्वर के अधिकार के माध्यम से जानते हैं, तो इनसे कौन सी से सच्ची समझ प्राप्त होती है? सबसे पहले, इस विषयवस्तु पर चर्चा करने का उद्देश्य यह है कि लोग परमेश्वर की हैसियत (रुतबे) को सृष्टिकर्ता के रूप में एवं सभी चीज़ों के मध्य उसकी पद स्थिति के रूप में स्थापित करें। दूसरा, जब लोग उन सभी चीज़ों को देखते हैं जिन्हें परमेश्वर ने किया है एवं कहा है और अपने अधिकार के माध्यम से नियन्त्रित किया है, तो यह उन्हें परमेश्वर की बुद्धि एवं सामर्थ को देखने की अनुमति देता है। यह उन्हें अनुमति देता है कि हर एक चीज़ का नियन्त्रण करने के लिए परमेश्वर की महान सामर्थ को देखें और यह देखें कि वह कितना बुद्धिमान है जब वह ऐसा करता है। क्या यह परमेश्वर के अद्वितीय अधिकार का केन्द्र बिन्दु एवं मुख्य बात नहीं है जिस पर हमने पहले चर्चा की थी? ज़्यादा समय नहीं बीता है और फिर भी कुछ लोगों ने इसे भुला दिया है, जो यह साबित करता है कि तुम लोगों ने परमेश्वर के अधिकार को पूरी तरह से नहीं समझा है; कोई यह भी कह सकता है कि तुम लोगों ने परमेश्वर के अधिकार को नहीं देखा है। क्या अब तुम लोग इसे थोड़ा बहुत समझते हो? जब तुम परमेश्वर के अधिकार को कार्य करते हुए देखते हो, तो तुम सचमुच में क्या महसूस करोगे? क्या तुमने वाकई में परमेश्वर की सामर्थ को महसूस किया है? (हमने किया है।) जब तुम संसार की उसकी सृष्टि के बारे में परमेश्वर के वचन को पढ़ते हो तो तुम उसकी सामर्थ को महसूस करते हो, एवं उसकी सर्वसामर्थ्य को महसूस करते हो। जब तुम मनुष्यों की नियति के ऊपर परमेश्वर के प्रभुत्व को देखते हो, तो तुम क्या महसूस करते हो? क्या तुम उसकी सामर्थ्य एवं उसकी बुद्धि को महसूस करते हो? (हम महसूस करते हैं।) यदि परमेश्वर ने इस सामर्थ को धारण नहीं किया होता, यदि उसने इस बुद्धि को धारण नहीं किया होता, तो क्या वह संसार के ऊपर और मनुष्यों की नियति के ऊपर प्रभुता रखने के योग्य होता? (नहीं होता।) यदि किसी के पास अपने कार्य को करने की योग्यता नहीं है, यदि वह आवश्यक क्षमता को धारण नहीं करता है और उसमें उपयुक्त कौशल एवं ज्ञान की कमी है, तो क्या वे अपने कार्य के लायक हैं? वे निश्चित रूप से योग्य नहीं होंगे; महान कार्य करने के लिए किसी व्यक्ति की क्षमता इस बात पर निर्भर होती है कि उनकी योग्यताएँ कितनी महान हैं। परमेश्वर ऐसी सामर्थ साथ ही साथ ऐसी बुद्धि को धारण किए हुए है, और इस प्रकार उसके पास वह अधिकार है; यह अद्वितीय है। क्या तुम संसार में किसी ऐसे प्राणी या व्यक्ति को जानते हो जो उसी सामर्थ्य को धारण किए हुए है जो परमेश्वर के पास है? क्या कोई ऐसा है जिसके पास स्वर्ग एवं पृथ्वी और सभी चीज़ों की सृष्टि करने की सामर्थ है साथ ही साथ उनके ऊपर नियन्त्रण एवं प्रभुत्व है? क्या कोई व्यक्ति या कोई चीज़ है जो पूरी मानवता पर शासन कर सकता है एवं उसका नेतृत्व कर सकता है और सदा-मौजूद एवं सर्वउपस्थित दोनों हो सकता है? (नहीं, कोई नहीं है।) क्या अब तुम लोग उन सब का अर्थ समझते हो जो परमेश्वर के अद्वितीय अधिकार में सम्मिलित है? क्या तुम लोगों के पास कुछ समझ है? (हमारे पास है।) हमने अब उन बिन्दुओं का पुनःअवलोकन किया है जो परमेश्वर के अधिकार को समाविष्ट (घेरते) करते हैं।

वह दूसरा भाग क्या है जिसके बारे में हमने बात की थी? (परमेश्वर का धर्मी स्वभाव।) हमने परमेश्वर के धर्मी स्वभाव के सम्बन्ध में बहुत सी बातों की चर्चा नहीं की थी। ऐसा क्यों है? इसके लिए एक कारण हैः इस चरण में परमेश्वर का कार्य मुख्य रूप से न्याय एवं ताड़ना है। राज्य के युग में, विशेष रूप से, परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को स्पष्ट रूप से प्रगट किया गया है। उसने ऐसे वचन कहे हैं जिन्हें उसने सृष्टि के आरम्भ के समय से कभी नहीं कहा था; और उसके वचनों में सभी लोगों ने, उन सभी ने जिन्होंने उसके वचन को देखा है, और उन सभी ने जिन्होंने उसके वचन का अनुभव किया है उन्होंने उसके धर्मी स्वभाव को प्रगट होते हुए देखा है। सही है? तो हम परमेश्वर के धर्मी स्वभाव के बारे में जो कुछ चर्चा कर रहे हैं उसका मुख्य बिन्दु क्या है? जो कुछ तुम लोगों ने सीखा है क्या उसके विषय में तुम लोगों ने एक गहरी समझ को विकसित कर लिया है? क्या तुम लोगों ने अपने किसी अनुभव से समझ प्राप्त की है? (परमेश्वर के द्वारा सदोम को इसलिए जलाया गया क्योंकि उस समय के लोग बहुत भ्रष्ट हो गए थे और इसके परिणामस्वरूप उन्होंने परमेश्वर के क्रोध को आकृष्ट किया था। इसी से ही हम परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को देखते हैं।) पहले, आइए हम एक नज़र डालें: यदि परमेश्वर ने सदोम का नाश नहीं किया होता, तो क्या तुम उसके धर्मी स्वभाव के बारे में जानने में सक्षम हो पाते? तुम तब भी उसे जानने में सक्षम होते। सही है? तुम इसे उन वचनों में देख सकते हो जिन्हें उसने राज्य के युग में व्यक्त किया है, और साथ ही उसके न्याय, ताड़ना, एवं अभिशापों में भी देख सकते हो जिन्हें मनुष्य के विरूद्ध अंजाम दिया गया था। उसके द्वारा नीनवे को बख्श दिए जाने से क्या तुम लोग परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को देखते हो? (हाँ, हम देखते हैं।) इस युग में, तुम परमेश्वर की दया, प्रेम एवं सहनशीलता की कुछ बातों को देख सकते हो। तुम इसे देख सकते हो जब मनुष्य पश्चाताप करते हैं और उनके प्रति परमेश्वर का हृदय परिवर्तित होता है। परमेश्वर के धर्मी स्वभाव पर चर्चा करने के लिए इन दो उदाहरणों को आधार वाक्य के रूप में उपयोग करने से, यह देखना बिलकुल स्पष्ट हो जाता है कि उसके धर्मी स्वभाव को प्रगट किया गया है। फिर भी, वास्तविकता में जो कुछ बाइबल की इन दो कहानियों में दर्ज किया गया है यह उन तक सीमित नहीं है। परमेश्वर के वचन एवं उसके कार्य के माध्यम से अब जो कुछ तुम लोगों ने सीखा एवं देखा है उससे, उनके विषय में तुम लोगों के वर्तमान अनुभवों से, परमेश्वर का धर्मी स्वभाव क्या है? अपने स्वयं के अनुभवों से चर्चा करें। (उन परिवेशों में जिन्हें परमेश्वर ने लोगों के लिए सृजा है, जब वे सत्य की खोज करने में एवं परमेश्वर की इच्छा के अंतर्गत कार्य करने में सक्षम होते हैं, तो वे उसके प्रेम एवं दया को देखते हैं। परमेश्वर उनका मार्गदर्शन करता है, उन्हें अद्भुत रूप से प्रकाशित करता है, और उन्हें उस प्रकाश को महसूस करने की अनुमति देता है जो उनके भीतर होता है। जब लोग परमेश्वर के विरूद्ध हो जाते हैं, और उसका सामना करते हैं और उसकी इच्छा के विरूद्ध हो जाते हैं, तो उनके भीतर अंधेरा हो जाता है, मानो परमेश्वर ने उन्हें त्याग दिया हो। इससे हमने परमेश्वर के धर्मी स्वभाव की पवित्रता का अनुभव किया है; परमेश्वर पवित्र राज्य में प्रगट होता है और वह मलिनता के स्थानों से छिपा हुआ है।) (हमारे अनुभवों से हम पवित्र आत्मा के कार्य में परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को देखते हैं। जब हम निष्क्रिय होते हैं, या यहाँ तक कि परमेश्वर के विरूद्ध जाते हैं और उसका विरोध करते हैं, तो जो पवित्र आत्मा वहाँ है, वह छिप जाता है और कोई कार्य नहीं करता है। कई बार हम प्रार्थना करते हैं और हम परमेश्वर को महसूस नहीं करते हैं, या यहाँ तक कि प्रार्थना तो करते हैं और यह नहीं जानते हैं कि उससे क्या कहना है, लेकिन जब किसी व्यक्ति की दशा बदलती है और वे परमेश्वर के साथ सहयोग करने के लिए तैयार होते हैं और अपनी स्वयं की धारणाओं एवं कल्पनाओं को एक तरफ रख देते हैं और बेहतर होने के लिए संघर्ष करते हैं, तो यही वह समय है जब परमेश्वर का मुस्कुराता हुआ चेहरा धीरे धीरे प्रकट होना शुरू हो जाता है।) क्या तुम लोगों के पास जोड़ने के लिए कोई और बात है? (परमेश्वर छिप जाता है जब मनुष्य उससे विश्वासघात करता है और वह उसकी उपेक्षा करता है।) (जिस रीति से परमेश्वर लोगों से व्यवहार करता है उसमें मैं उसके धर्मी स्वभाव को देखता हूँ। हमारे भाई और बहन डीलडौल एवं क्षमता में अलग अलग हैं, और जो कुछ परमेश्वर हम में से प्रत्येक से अपेक्षा करता है वह भी भिन्न है। हम सभी विभिन्न मात्राओं में परमेश्वर के अद्भुत प्रकाशन को प्राप्त करने में सक्षम हैं, और इस रीति से मैं परमेश्वर की धार्मिकता को देखता हूँ। यह इसलिए है क्योंकि मनुष्य ठीक इसी रीति से मनुष्य से बर्ताव नहीं कर सकता है, केवल परमेश्वर ही ऐसा कर सकता है।) हम्म, तुम सभी ने कुछ व्यवहारिक ज्ञान की बातें कही हैं।

क्या तुम लोग परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को जानने के विषय में मुख्य बिन्दु को समझते हो? इस सम्बन्ध में, किसी व्यक्ति के पास अनुभव से बहुत सारे वचन हो सकते हैं, लेकिन कुछ मुख्य बिन्दु हैं जिनके विषय में मुझे तुम लोगों को बताना चाहिए। परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को समझने के लिए, किसी व्यक्ति को पहले परमेश्वर की भावनाओं को समझना होगा: वह किस से नफरत करता है, वह किससे घृणा करता है, और वह किससे प्यार करता है, वह किसको बर्दाश्त करता है, वह किसके प्रति दयालु है, और किस प्रकार का व्यक्ति उस दया को प्राप्त करता है। यह जानने हेतु एक महत्वपूर्ण बिन्दु है। इसके अलावा, किसी व्यक्ति को यह समझना होगा कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर कितना प्रेमी है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उसके पास लोगों के लिए कितनी दया एवं प्रेम है, परमेश्वर बर्दाश्त नहीं करता है कि कोई उसके रुतबे एवं पद स्थिति को ठेस पहुँचाए, न ही वह यह बर्दाश्त करता है कि कोई उसकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाए। यद्यपि परमेश्वर लोगों से प्यार करता है, वह उन्हें बर्बाद नहीं करता है। वह लोगों को अपना प्यार, अपनी दया एवं अपनी सहनशीलता देता है, लेकिन उसने नीच कार्य में कभी उनकी सहायता नहीं की है; उसके पास अपने सिद्धान्त एवं अपनी सीमाएँ हैं। इसकी परवाह किए बगैर कि तुमने स्वयं में किस हद तक परमेश्वर के प्रेम का एहसास किया है, इसकी परवाह किए बगैर कि वह प्रेम कितना गहरा है, तुम्हें परमेश्वर से कभी ऐसा बर्ताव नहीं करना चाहिए जैसा तुम किसी अन्य व्यक्ति से करोगे। जबकि यह सच है कि परमेश्वर लोगों से ऐसा बर्ताव करता है जैसे वे उसके करीब हों, यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर को किसी अन्य व्यक्ति के रुप में देखता है, मानो वह सृष्टि का मात्र कोई अन्य प्राणी हो, जैसे कोई मित्र या आराधना की कोई वस्तु, तो परमेश्वर उनसे अपने मुख को छिपा लेगा और उन्हें त्याग देगा। यह उसका स्वभाव है, और वह बर्दाश्त नहीं करता है कि इस मुद्दे पर कोई उससे लापरवाही के साथ बर्ताव करे। अतः परमेश्वर के वचन में उसके धर्मी स्वभाव के विषय में अकसर कहा गया हैः इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुमने कितनी सड़कों पर यात्रा की है, तुमने कितना अधिक काम किया है या तुमने परमेश्वर के लिए कितना कुछ सहन किया है, क्योंकि जैसे ही तुम परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को ठेस पहुँचाते हो, तो जो कुछ तुमने किया है उसके आधार पर वह तुममें से प्रत्येक को बदला देगा। क्या तुमने इसे देखा है? (हाँ, हमने देखा है।) तुमने इसे देखा है, सही है? इसका अर्थ यह है कि हो सकता है कि परमेश्वर लोगों को ऐसा देखे जैसे वे उसके करीब हैं, लेकिन लोगों को परमेश्वर से एक मित्र या एक रिश्तेदार के रूप में व्यवहार नहीं करना चाहिए। परमेश्वर को अपने हमउम्र दोस्त के रूप में मत समझिए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुमने उससे कितना अधिक प्रेम प्राप्त किया है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उसने तुम्हें कितनी अधिक सहनशीलता दी है, तुम्हें कभी भी परमेश्वर से मात्र एक मित्र के रूप में बर्ताव नहीं करना चाहिए। यह परमेश्वर का धर्मी स्वभाव है। तुम समझ गए, ठीक है? (हाँ।) क्या मुझे इसके विषय में और अधिक कहने की ज़रूरत है? क्या इस मुद्दे पर तुम लोगों के पास पहले से ही कोई समझ है? सामान्य रूप से कहें, तो यह वह अत्यंत आसान गलती है जिसे लोग इस बात की परवाह किए बगैर करते हैं कि वे सिद्धान्तों को समझते हैं या नहीं, या मानो उन्होंने इसके विषय में पहले कुछ नहीं सोचा है। जब लोग परमेश्वर को ठेस पहुँचाते हैं, तो ऐसा शायद किसी घटना, या किसी बात की वजह से नहीं होता है जिसे वे बोलते हैं, लेकिन इसके बजाए यह ऐसी मनोवृत्ति के कारण होता है जिसे वे थामे हुए हैं और ऐसी दशा के कारण होता है जिसमें वे हैं। यह एक बहुत ही भयावह बात है। कुछ लोगों का मानना है कि उनके पास परमेश्वर की समझ है, यह कि वे उसे जानते हैं, वे शायद ऐसी चीज़ों को भी कर सकते हैं जो परमेश्वर को प्रसन्न करेंगी। वे महसूस करना शुरू कर देते हैं कि वे परमेश्वर के तुल्य हैं और यह कि वे चतुराई से परमेश्वर के मित्र हो गए हैं। इस प्रकार की भावनाएँ खतरनाक रूप से गलत हैं। यदि तुम्हारे पास इसकी गहरी समझ नहीं है, यदि तुम इसे स्पष्ट रूप से नहीं समझते हो, तब परमेश्वर को ठेस पहुँचाना और उसके धर्मी स्वभाव को ठेस पहुँचाना बहुत आसान होता है। अब तुम इसे समझ गए हो, सही है? (हाँ।) क्या परमेश्वर का धर्मी स्वभाव अद्वितीय नहीं है? क्या यह मानवजाति के व्यक्तित्व के बराबर है? क्या यह मनुष्य के व्यक्तिगत गुणों के बराबर है? कभी नहीं, ठीक है? (हाँ।) अतः, तुम्हें नहीं भूलना चाहिए कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर लोगों से कैसा बर्ताव करता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह लोगों के बारे में किस प्रकार सोचता है, परमेश्वर की पद स्थिति, अधिकार, और हैसियत कभी नहीं बदलती है। मानवजाति के लिए, परमेश्वर हमेशा से सब का परमेश्वर और सृष्टिकर्ता है! तुम समझ गए, सही है? (हाँ।)

तुम लोगों ने परमेश्वर की पवित्रता के बारे में क्या सीखा है? शैतान की बुराई के विपरीत होने के अलावा, परमेश्वर की पवित्रता की चर्चा में मुख्य विषय क्या था? क्या यह वही नहीं है जो परमेश्वर के पास है और जो परमेश्वर है? क्या जो परमेश्वर के पास है और जो परमेश्वर है वह स्वयं परमेश्वर के लिए अद्वितीय है? (हाँ) उसकी सृष्टि में किसी के भी पास यह नहीं है, अतः हम कहते हैं कि परमेश्वर की पवित्रता अद्वितीय है, जो ऐसी बात है जिसे तुम लोग सीख सकते हो। हमने परमेश्वर की पवित्रता पर तीन सभाएँ की थीं। क्या तुम लोग अपने स्वयं के वचनों में, अपनी स्वयं की समझ के साथ इसका वर्णन कर सकते हो, कि तुम लोग परमेश्वर की पवित्रता के विषय में क्या विश्वास करते हो? (पिछली बार जब परमेश्वर ने हमसे संवाद किया था तब हमने कुछ किया था: हम उसके सामने नीचे झुक गए थे। हमने सुना था कि वह कहाँ खड़ा होता है और हमने देखा था कि हम उसकी अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे थे; परमेश्वर के सामने हमारा जबरदस्ती झुकना उसकी इच्छा के अनुरूप नहीं था और इससे हमने परमेश्वर की पवित्रता को देखा था।) बिलकुल सही, ठीक है? क्या कोई और बात है? (मानवजाति के लिए परमेश्वर के वचनों में, हम देखते हैं कि वह सरल रूप से और स्पष्ट रूप से बोलता है, वह सीधा एवं प्रासंगिक है। शैतान गोलमोल तरीके से बोलता है और वह झूठ से भरा हुआ है। पिछली बार जब हम परमेश्वर के सामने दण्डवत् करते हुए लेटे हुए थे तब जो कुछ हुआ था उससे, हम ने देखा था कि उसके वचन एवं उसके कार्य हमेशा सैद्धान्तिक होते हैं। वह हमेशा बिलकुल स्पष्ट एवं संक्षिप्त होता है जब वह हमें बताता है कि हमें किस प्रकार कार्य करना चाहिए, हमें किसका पालन करना चाहिए, और हमें किस प्रकार कार्यवाही करनी चाहिए। लेकिन लोग इस तरह के नहीं होते हैं; जब शैतान के द्वारा मानवजाति को भ्रष्ट कर दिया गया था उसके पश्चात्, लोगों ने अपने कार्यों एवं वचनों में अपने स्वयं के व्यक्तिगत उद्देश्यों और अपनी स्वयं की व्यक्तिगत इच्छाओं को हासिल करने का प्रयास किया था। जिस तरह से परमेश्वर मानवजाति की देखरेख करता है, उस देखभाल एवं सुरक्षा से जिन्हें वह उन्हें देता है, हम देखते हैं कि वह सब जो परमेश्वर करता है वह सकारात्मक है, एवं यह बिलकुल स्पष्ट है। इसी रीति से हम परमेश्वर की पवित्रता के सार के प्रकाशन को देखते हैं।) बढ़िया कहा! क्या कोई इसमें किसी और बात को जोड़ सकता है? (हम परमेश्वर की पवित्रता देखते हैं जब वह शैतान की बुराई को प्रगट कर देता है और जैसे ही परमेश्वर हमें उसके सार को दिखाता है तो यह बेहतर होता है कि हम उसे जानें और हम मानवजाति के सभी कष्टों के स्रोत को जान सकते हैं। अतीत में, हम उस पीड़ा से अनजान थे जो शैतान के अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत था। यह केवल तब हुआ है जब परमेश्वर ने इसे प्रगट किया जिससे हमने देखा कि सारे कष्ट जो प्रसिद्धि एवं सौभाग्य के अनुसरण से आते हैं उन सब को शैतान के द्वारा उत्पन्न किया गया है। यह केवल इस माध्यम से ही होता है कि हम महसूस करते हैं कि परमेश्वर की पवित्रता मानवजाति का सच्चा उद्धार है। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर उद्धार पाने हेतु हमारे लिए परिस्थितियों को तैयार करता है; जबकि शायद वह हमें एक धनी परिवार में पैदा नहीं करता है, तब भी वह यह देखता है कि हम एक उपयुक्त परिवार में और एक उपयुक्त वातावरण में पैदा हों। वह साथ ही साथ हमें शैतान की हानि एवं उत्पीड़न को सहने की अनुमति नहीं देता है, ताकि अंतिम दिनों में परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने में हमारे पास परिस्थितियाँ, सामान्य विचार एवं सामान्य तर्क हो सके। इन सब में हम परमेश्वर की योजनाओं, उसके प्रबंधों, एवं वह किस प्रकार उन्हें क्रियान्वित करता है उनकी सटीकता को भी देखते हैं। उसने हमें शैतान के प्रभाव से बचाया है और इसमें हम बेहतर ढंग से परमेश्वर के विस्तृत कार्य को देख सकते हैं और हम मानवजाति के लिए परमेश्वर की पवित्रता और उसके प्रेम को देखते हैं।) क्या उसमें जोड़ने के लिए कोई और बात है? (क्योंकि हम परमेश्वर की पवित्रता के मूल-तत्व को नहीं समझते हैं, आराधना में हमारा उसके सामने नीचे लेटना मिलावटी है, इसका एक गूढ़ उद्देश्य होता है और इसे जानबूझकर किया जाता है, जो परमेश्वर को दुःखी करता है। इसी से ही हम परमेश्वर की पवित्रता को भी देखते हैं। परमेश्वर शैतान से बिलकुल अलग है; शैतान चाहता है कि लोग उससे अत्यधिक प्यार एवं उसकी चापलूसी करें और उसकी आराधना करें। शैतान में सिद्धान्तों की कमी है।) बहुत अच्छा! जो कुछ हमने परमेश्वर की पवित्रता के बारे में संगति की है उससे, क्या तुम लोगों ने परमेश्वर की सारता को देखा है? (हमने देखा है।) तुम लोगों ने और क्या देखा है? क्या तुम लोगों ने देखा है कि किस प्रकार परमेश्वर सभी सकारात्मक चीज़ों का स्रोत है? क्या तुम लोग यह देखने में सक्षम हो कि किस प्रकार परमेश्वर सत्य एवं न्याय का मूर्त रूप है? क्या तुम लोग देखते हो कि किस प्रकार परमेश्वर प्रेम का स्रोत है? क्या तुम लोग देखते हो कि किस प्रकार वह सब जिसे परमेश्वर करता है, वह सब जिसे वह जारी करता है, और वह सब जिसे वह प्रगट करता है वह त्रुटिहीन है? (हमने इसे देखा है।) ये अनेक उदाहरण परमेश्वर की पवित्रता के विषय में समस्त मुख्य बिन्दु हैं जिन्हें मैं बताता हूँ। सम्भवतः फिलहाल ये वचन तुम लोगों के लिए महज सिद्धान्त हैं, लेकिन एक दिन जब तुम उसके वचन एवं उसके कार्य से सच्चे स्वयं परमेश्वर का अनुभव करते हो एवं उसकी गवाही देते हो, तब तुम अपने दिल की गहराई से कहोगे कि परमेश्वर पवित्र है, यह कि परमेश्वर मानवजाति से भिन्न है, और यह कि उसका हृदय पवित्र है और उसका स्वभाव पवित्र है, और उसका सार पवित्र है। यह पवित्रता मनुष्य को उसकी सारता को देखने की अनुमति देती है और साथ ही साथ मनुष्य को यह देखने की भी अनुमति देती है कि परमेश्वर की पवित्रता का सार निष्कलंक है। उसकी पवित्रता का सार यह निर्धारित करता है कि वह स्वयं अद्वितीय परमेश्वर है, और यह मनुष्य को दिखाता है, और साबित करता है कि वह स्वयं अद्वितीय परमेश्वर है। क्या यह मुख्य बिन्दु नहीं है? (यह है।)

आज हमने पिछली सभाओं की विषयवस्तु के अनेक भागों का अवलोकन किया है। हम यहाँ अपने अवलोकन को पूरा करेंगे। मैं आशा करता हूँ कि तुम लोग प्रत्येक वस्तु एवं विषय के मुख्य बिन्दुओं को दिल से लोगे। उनके विषय में बस यह न सोचो कि वे सिद्धान्त हैं; वास्तव में उनके माध्यम से पढ़ें और जब तुम लोगों के पास समय हो तो उनका पता लगाने का प्रयास करो। अपने हृदय में उन्हें याद रखो और उन्हें अमल में लाओ और तुम वाकई में वह सब सीखोगे जिसे मैंने परमेश्वर के स्वभाव और जो उसके स्वरूप उसके सच्चे प्रकाशन के विषय में कहा है। फिर भी, तुम उन्हें कभी नहीं समझ पाओगे यदि तुम केवल उन्हें लिख लोगे और उनको नहीं पढ़ोगे या उन पर विचार नहीं करोगे। अब तुम समझ गए, सही है! इन तीन मदों पर वार्तालाप करने के बाद, लोगों ने परमेश्वर की हैसियत, उसके सार, और उसके स्वभाव के विषय में एक सामान्य—या यहाँ तक कि विशिष्ट—समझ प्राप्त कर लिया होगा। लेकिन क्या उनके पास परमेश्वर की पूर्ण समझ होगी? (नहीं।) अब, परमेश्वर के विषय में तुम लोगों की अपनी समझ में, क्या ऐसे अन्य क्षेत्र हैं जहाँ तुम लोग महसूस करते हो कि तुम लोगों को एक गहरी समझ की आवश्यकता है? कहने का तात्पर्य है, जब तुमने परमेश्वर के अधिकार, उसके धर्मी स्वभाव, एवं उसकी पवित्रता की समझ को प्राप्त कर लिया है उसके बाद, कदाचित् तुमने अपने मन में उसकी अद्वितीय हैसियत एवं पद स्थिति के विषय में एक पहचान स्थापित कर ली है, फिर भी तुम्हें अपने अनुभव के माध्यम से उसके कार्यों, उसकी सामर्थ, एवं उसके सार को जानना होगा और उसकी सराहना करनी होगी इससे पहले कि तुम एक गहरी समझ को प्राप्त कर सको। तुम लोगों ने अभी इन संगतियों को सुना है अतः तुम लोग अपने अपने हृदय में विश्वास के इस लेख को स्थापित कर सकते हो: परमेश्वर सचमुच में मौजूद है, और यह एक तथ्य है कि वह सभी चीज़ों को आज्ञा देता है। किसी भी मनुष्य को उसके धर्मी स्वभाव को ठेस नहीं पहुँचना चाहिए और उसकी पवित्रता एक निश्चितता है जिस पर कोई मनुष्य प्रश्न नहीं कर सकता है। ये तथ्य हैं। ये संगतियाँ परमेश्वर की हैसियत एवं पद स्थिति को अनुमति देती हैं कि लोगों के हृदय में एक नींव डालें। जब इस नींव को स्थापित कर दिया जाता है उसके बाद, लोगों को सचमुच में परमेश्वर को जानने के लिए और अधिक समझ की तलाश करनी चाहिए।

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X

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