जीवन प्रवेश कर्तव्य निभाने से प्रारंभ होता है (भाग दो)
मानक स्तरीय ढंग से अपना कर्तव्य निभाने के लिए पहले तुम्हारी उचित मानसिकता होनी चाहिए। जब भ्रष्ट स्वभाव प्रकट हो तो तुम्हें अपनी दशा भी सुधारनी होगी। जब तुम अपने कर्तव्य के प्रति सही ढंग से पेश आने में सक्षम होते हो, जब तमाम तरह के लोगों, घटनाओं और चीजों से होने वाली बेबसी और उनके प्रभावों से मुक्त हो चुके हो, जब खुद को पूरी तरह से परमेश्वर को समर्पित कर सकते हो, तभी तुम अपना कर्तव्य ठीक से निभा सकोगे। ऐसा करने का राज यही है कि अपने कर्तव्य और जिम्मेदारियों को सर्वोपरि रखो। अपना कर्तव्य निभाने की प्रक्रिया में तुम्हें हमेशा अपनी जाँच करनी चाहिए : “क्या अपने कर्तव्य करने के प्रति मेरा अनमना रवैया है? कौन-सी चीजें मेरे लिए बाधा डालती हैं और मुझे अपना कर्तव्य निभाने में अनमना बनाती हैं? क्या मैं पूरे दिल और दम-खम से अपना कर्तव्य निभा रहा हूँ? क्या इस तरह काम करके परमेश्वर मुझ पर भरोसा करेगा? क्या मेरा हृदय परमेश्वर को पूरी तरह समर्पित हो चुका है? क्या मेरा इस तरह कर्तव्य निभाना सिद्धांतों के अनुरूप है? क्या इस तरह कर्तव्य निभाने से सर्वोत्तम नतीजे प्राप्त होंगे?” तुम्हें अक्सर इन सवालों पर चिंतन करना चाहिए। जब तुम्हें समस्याएँ दिखाई दें तो सक्रिय होकर सत्य खोजना चाहिए और इन्हें हल करने के लिए परमेश्वर के प्रासंगिक वचन तलाशने चाहिए। इस तरह तुम अपना कर्तव्य ठीक से निभा सकोगे और तुम्हारे दिल को शांति और खुशी मिलेगी। अगर कर्तव्य निभाते हुए बार-बार परेशानियाँ सामने आएँ तो इनमें से अधिकतर समस्याएँ तुम्हारे इरादों के कारण आती हैं—ये भ्रष्ट स्वभाव की समस्याएँ हैं। जब किसी व्यक्ति का भ्रष्ट स्वभाव प्रकट हो जाता है, तो उसके हृदय में समस्याएँ होंगी और उसकी दशा असामान्य रहेगी, जिसका सीधा असर उसकी कर्तव्य क्षमता पर पड़ेगा। व्यक्ति की कर्तव्य क्षमता पर असर डालने वाली समस्याएँ बड़ी और गंभीर होती हैं; ये परमेश्वर के साथ उसके संबंध को सीधे प्रभावित कर सकती हैं। उदाहरण के लिए, जब कुछ लोगों के परिवारों पर विपदा आती है तो वे परमेश्वर को लेकर धारणाएँ और गलतफहमियाँ विकसित कर लेते हैं। कुछ लोग इसलिए नकारात्मक हो जाते हैं क्योंकि जब वे अपने कर्तव्यों में कष्ट झेलते हैं तो उन्हें न कोई देखता है, न ही उनकी प्रशंसा करता है। कुछ लोग अपना कर्तव्य ठीक से नहीं निभाते, हमेशा अनमने बने रहते हैं, और जब उनकी काट-छाँट की जाती है तो वे परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत करने लगते हैं। कुछ लोग अपना कर्तव्य निभाने के अनिच्छुक इसलिए होते हैं क्योंकि वे हमेशा बचने का रास्ता ढूँढ़ने में लगे रहते हैं। ये सारी समस्याएँ परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध पर सीधा असर डालती हैं। ये सारी समस्याएँ भ्रष्ट स्वभाव की समस्याएँ हैं। ये सभी इस तथ्य से उपजती हैं कि लोग परमेश्वर को नहीं जानते, वे हमेशा अपनी खातिर साजिश रचते हैं और अपने बारे में सोचते हैं, जो उन्हें परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होने या परमेश्वर की योजनाओं के प्रति समर्पण करने से रोकता है। इससे तमाम तरह के नकारात्मक भाव उत्पन्न होते हैं। जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, वे बिल्कुल ऐसे ही होते हैं। जब उन पर छोटे-छोटे संकट आते हैं तो वे नकारात्मक और कमजोर हो जाते हैं, अपना कर्तव्य निभाने में खीझ निकालते हैं, परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह कर उसका प्रतिरोध करते हैं और अपना काम त्यागना और परमेश्वर को धोखा देना चाहते हैं। ये सारी चीजें भ्रष्ट स्वभाव से उपजी बेबसी के विभिन्न दुष्परिणाम हैं। जो व्यक्ति सत्य से प्रेम करता है, वह अपने जीवन, भविष्य और नियति को परे रखकर सिर्फ और सिर्फ सत्य का अनुसरण कर इसे हासिल करना चाहता है। ऐसे लोग मानते हैं कि समय अपर्याप्त है, उन्हें डर लगा रहता है कि वे अपना कर्तव्य अच्छे से नहीं निभा पाएँगे, खुद को पूर्ण नहीं बना पाएँगे, इसलिए वे हर चीज को त्याग पाते हैं। उनकी मानसिकता सिर्फ परमेश्वर की ओर मुड़ने और उसके लिए समर्पित होने की होती है। वे किसी भी परेशानी से विचलित नहीं होते, और अगर वे खुद को नकारात्मक या कमजोर महसूस करते हैं तो परमेश्वर के वचनों के कुछ अंश पढ़कर सहज रूप से इसका समाधान कर लेते हैं। जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं वे परेशान होते हैं, और तुम उनके साथ सत्य के बारे में चाहे जितनी संगति कर लो, वे अपनी समस्याएँ पूरी तरह से हल करने में असमर्थ होते हैं। भले ही वे क्षण भर के लिए सचेत होकर सत्य को स्वीकारने में सक्षम हो जाएँ, फिर भी वे बाद में इससे पीछे हट जाएँगे, इसलिए ऐसे व्यक्तियों को सँभालना बहुत मुश्किल होता है। ऐसा नहीं है कि वे सत्य के बारे में कुछ नहीं समझते, बल्कि बात यह है कि वे अपने दिल में सत्य को सँजोते या स्वीकारते नहीं हैं। आखिरकार इस हालत में वे अपनी इच्छा, अपने स्वार्थ, भविष्य, अपनी नियति और मंजिल को परे नहीं रख पाते, जो फिर हमेशा उनके लिए बाधा डालते रहते हैं। अगर कोई व्यक्ति सत्य को स्वीकारने में सक्षम होता है तो जैसे-जैसे वह सत्य को समझेगा, उसके भ्रष्ट स्वभाव से संबंधित सारी चीजें अपने आप गायब हो जाएँगी, और उसे जीवन प्रवेश और आध्यात्मिक कद प्राप्त होगा; वह आगे अज्ञानी बच्चा नहीं रहेगा। जब किसी व्यक्ति के पास आध्यात्मिक कद होता है तो वह चीजों को समझने में अधिक से अधिक सक्षम होगा, तमाम तरह के लोगों में अधिक से अधिक भेद पहचान सकेगा, और किसी भी व्यक्ति, घटना या चीज के आगे बेबस नहीं होगा। कोई कुछ भी कहे या करे, वह प्रभावित नहीं होगा। वह शैतान की बुरी शक्तियों के दखल या झूठे अगुआओं और मसीह-विरोधियों के गुमराह करने और बाधाएँ डालने से प्रभावित नहीं होगा। यदि ऐसा होता है तो क्या धीरे-धीरे उस व्यक्ति का आध्यात्मिक कद बढ़ता नहीं जाएगा? जितना ही व्यक्ति सत्य को समझेगा, उसके जीवन में उतनी ही प्रगति होगी, और उसके लिए अपना कर्तव्य सफलतापूर्वक करना और सत्य वास्तविकता में प्रवेश करना आसान हो जाएगा। जब तुम जीवन प्रवेश कर लोगे और तुम्हारे जीवन में धीरे-धीरे प्रगति होने लगेगी तो तुम्हारी दशा ज्यादा से ज्यादा सामान्य होने लगेगी। जो लोग, घटनाएँ और चीजें कभी तुम्हें बाधित और बेबस करती थीं, वे तुम्हारे लिए समस्या नहीं रहेंगी। अपना कर्तव्य निभाने में तुम्हें कोई समस्या नहीं आएगी, और परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध अधिक से अधिक सामान्य होता जाएगा। जब तुम यह जान जाओगे कि परमेश्वर पर कैसे भरोसा करना है, जब तुम यह जान लोगे कि परमेश्वर के इरादे कैसे खोजने हैं, जब तुम जान जाओगे कि तुम्हारा स्थान क्या है, जब तुम जान जाओगे कि तुम्हें क्या करना है और क्या नहीं करना है, कौन-से मामलों की जिम्मेदारी लेने की जरूरत है और कौन-से मामलों की नहीं, तो क्या तुम्हारी दशा ज्यादा से ज्यादा सामान्य नहीं होती जाएगी? इस तरह जीवन जीना तुम्हें थकाएगा नहीं, क्या थकाएगा? थकना तो दूर रहा, तुम खासतौर पर अधिक चैन और खुशी महसूस करोगे। तब क्या इसके नतीजे में तुम्हारा दिल रोशनी से नहीं भर जाएगा? तुम्हारी मानसिकता सामान्य हो जाएगी, तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव के खुलासे घट जाएँगे, और तुम परमेश्वर की उपस्थिति में रहकर सामान्य मानवता के साथ जी सकोगे। जब लोग तुम्हारा मानसिक दृष्टिकोण देखेंगे तो पाएँगे कि तुममें बहुत बड़ा बदलाव आ चुका है। वे तुम्हारे साथ संगति करने को तैयार रहेंगे, अपने दिल में शांति और आनंद महसूस करेंगे, और लाभान्वित भी होंगे। जैसे-जैसे तुम्हारा आध्यात्मिक कद बढ़ेगा, तुम्हारी कथनी-करनी और अधिक उचित और सिद्धांत सम्मत होती जाएगी। जब तुम कमजोर और नकारात्मक लोगों को देखोगे तो उनकी ठोस मदद कर पाओगे—उन्हें बेबस नहीं करोगे या भाषण नहीं सुनाओगे, बल्कि अपने व्यावहारिक अनुभवों के सहारे मदद कर उन्हें लाभान्वित करोगे। इस तरह तुम परमेश्वर के घर में सिर्फ परिश्रम नहीं कर रहे होगे, बल्कि तुम ऐसे उपयोगी व्यक्ति भी बन जाओगे जो अपने कंधों पर बोझ लेने और परमेश्वर के घर में बहुत सार्थक कार्य करने में सक्षम है। क्या परमेश्वर ऐसे ही व्यक्ति को पसंद नहीं करता? अगर तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसे परमेश्वर पसंद करता है, तो क्या सब लोग भी तुम्हें पसंद नहीं करेंगे? (बिल्कुल चाहेंगे।) परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति से क्यों प्रसन्न होता है? क्योंकि ऐसे व्यक्ति उसके सामने व्यावहारिक कार्य करने में सक्षम होते हैं, चापलूसी करने के आदी नहीं होते, व्यावहारिक कार्य करते हैं, और अपने सच्चे अनुभवों के बारे में बताकर दूसरे लोगों की मदद और अगुआई कर सकते हैं। वे कोई भी समस्या हल करने में दूसरों की मदद करने में सक्षम होते हैं, और जब कलीसिया के कार्य में परेशानियाँ आती हैं तो वे सक्रिय रूप से समस्या सुलझाकर आगे का रास्ता दिखा सकते हैं। इसे ही समर्पण के साथ कर्तव्य निभाना कहते हैं। वे अपने भाई-बहनों की समस्या हल करने में मदद करते हैं, जो उनके जीवन प्रवेश को साबित करता है। वे इतने ज्यादा व्यावहारिक कार्य कर सकते हैं, इससे साबित होता है कि वे सत्य का अभ्यास करते हैं और परमेश्वर की उपस्थिति में रहते हैं। चूँकि उनके पास सत्य वास्तविकता होती है, इसलिए वे दूसरों को भी सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने की राह दिखा पाते हैं। यदि तुम्हारे पास सत्य वास्तविकता या सच्चे अनुभव न हों तो क्या तुम दूसरों को परमेश्वर की उपस्थिति में ला सकते हो? यदि तुम खुद परमेश्वर की उपस्थिति में नहीं रहते तो दूसरों को भी उसकी उपस्थिति में नहीं ला सकते। यदि तुम सत्य सिद्धांतों की बिल्कुल भी खोज किए बिना अपना कर्तव्य निभाने भर के लिए केवल श्रम करते हो और परमेश्वर को संतुष्ट करने के इच्छुक नहीं हो तो फिर तुम परमेश्वर की उपस्थिति में नहीं रह रहे हो। जो परमेश्वर की उपस्थिति में नहीं रहते, क्या वे उसकी जाँच-पड़ताल को स्वीकार कर पाते हैं? क्या वे परमेश्वर की परीक्षा का सामना कर पाते हैं? क्या वे परीक्षणों के बीच दृढ़ता से खड़े रह पाते हैं? (नहीं, वे ऐसा नहीं कर पाते।) क्या इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर के लिए गवाही दे सकता है? क्या ऐसे लोग उसकी गवाही दे सकते हैं? (नहीं, वे नहीं दे सकते।) किस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर की गवाही नहीं दे पाता? क्या ये ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर में सच्चा विश्वास रखते हैं? कम-से-कम अभी तक तो उन्होंने परमेश्वर के वचनों की सत्य वास्तविकता में प्रवेश नहीं किया है, और वे अभी परमेश्वर के वचनों के बाहर ही हैं। जो जीवन प्रवेश किए बिना कई वर्षों से परमेश्वर पर विश्वास करता रहा हो, जो परमेश्वर की गवाही देना तो दूर रहा, अपनी अनुभवजन्य गवाही के बारे में भी न बता सके, जो किसी को सफलतापूर्वक सुसमाचार का प्रचार न कर सके—वह परमेश्वर का गवाह कहलाने लायक नहीं है। लिहाजा जिसका आध्यात्मिक कद अपरिपक्व है और जीवन प्रवेश नहीं हुआ है, वह परमेश्वर की गवाही कभी नहीं दे सकता। यहाँ निहितार्थ यह है कि इस किस्म का व्यक्ति परमेश्वर की उपस्थिति में नहीं जीता। अगर तुम परमेश्वर की उपस्थिति में नहीं जीते हो, तुमने जीवन प्रवेश नहीं किया है, परमेश्वर की गवाही नहीं दी है, तो क्या वह तुम्हें अपने अनुयायियों में से एक के रूप में स्वीकार करेगा? नहीं करेगा। परमेश्वर ने तुम्हें अपना कर्तव्य निभाने का अवसर दिया है, और तुम इसके लिए तैयार भी हो, लेकिन तुम्हारा व्यवहार देखकर वह जान चुका है कि इतने लंबे समय तक उस पर विश्वास करने के बावजूद तुम उसकी गवाही नहीं दे सकते हो। तुम्हारे पास सच्चा अनुभवजन्य ज्ञान नहीं है, यही नहीं तुम अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार जीते हो, तुममें सत्य वास्तविकता नहीं है, और तुम परमेश्वर की उपस्थिति में नहीं रहते। अगर वह तुम्हारा परीक्षण करता है तो तुम इसे बर्दाश्त नहीं कर पाते; अगर वह तुम्हारी काट-छाँट करता है तो तुम इसे सह नहीं पाते; अगर वह तुम्हारा न्याय करता है और तुम्हें ताड़ना देता है, तो तुम अपना काम त्यागकर मनःस्थिति बिगाड़ बैठते हो, और ऐसे में वह यही सोचेगा : “यह व्यक्ति तो बाघ जैसा है जिसे छूने की हिम्मत कोई नहीं कर सकता! मैं जहाँ कहीं अपना कार्य करने या बोलने जाता हूँ, ऐसा व्यक्ति मेरा अनुसरण करने और मेरे साथ रहने लायक नहीं है।” वह ऐसा क्यों कहेगा? क्योंकि ऐसा व्यक्ति सत्य को नहीं समझता, उसके पास शुद्ध समझ नहीं है, उसके पास सच्चे अनुभव नहीं हैं, और वह परमेश्वर के इरादों को भी नहीं समझता। अगर वह परमेश्वर के इरादों को नहीं समझता, तो क्या वह उसके अनुरूप हो सकता है? अगर वह परमेश्वर के इरादों को नहीं समझता तो क्या वह इन्हें बूझ सकता है? क्या वह सत्य को स्वीकार सकता है? कहना मुश्किल है, और ये सभी अज्ञात राशियाँ हैं। लिहाजा अगर ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के साथ हो तो वह हर बात में उसे लेकर शंकाएँ पालेगा और उसे समझ नहीं पाएगा, जिससे परमेश्वर के प्रति हर मोड़ पर तमाम तरह की गलतफहमियाँ, शिकायतें और आलोचनाएँ पनपेंगी। अंत में यह विश्वासघात को जन्म देगा। क्या परमेश्वर किसी ऐसे व्यक्ति को चाहेगा जो उससे विश्वासघात करे? क्या परमेश्वर उसे अपना अनुयायी बनने दे सकता है? नहीं, वह ऐसा नहीं कर सकता। अगर तुम चाहते हो कि परमेश्वर तुम्हें अपने अनुयायियों में एक के रूप में मान्यता देना चाहे, तो पहले अपने जीवन प्रवेश पर ध्यान देना होगा। इसकी शुरुआत खुद को जानने, अपना भ्रष्ट स्वभाव छोड़ने लायक होने, अपने कर्तव्य पर टिके रहने की क्षमता हासिल करने और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अपना कर्तव्य अच्छे से निभाने से करनी होगी—यही सर्वोपरि है। जीवन प्रवेश पर ध्यान केंद्रित करने का उद्देश्य अपना कर्तव्य अच्छे से निभाना है; मूलतः बात तुम्हारे कर्तव्य निभाने पर निर्भर है। तुम्हें अपना कर्तव्य निभाने के जरिए जीवन प्रवेश का अनुसरण शुरू कर देना चाहिए और जीवन प्रवेश के माध्यम से तब तक बूंद-दर-बूंद सत्य को समझना और पाना चाहिए, जब तक कि तुम एक ऐसे मुकाम पर नहीं पहुँच जाते जहाँ तुम्हारा आध्यात्मिक कद हो, जहाँ तुम्हारा जीवन धीरे-धीरे बढ़ता रहे और तुम्हारे पास सत्य के व्यावहारिक अनुभव हों। फिर तुम्हें अभ्यास के सभी प्रकार के सिद्धांत साध लेने चाहिए ताकि तुम किसी भी व्यक्ति, घटना या चीज से बेबस या बाधित हुए बिना अपना कर्तव्य निभा सको। इस तरह तुम हौले-हौले परमेश्वर की उपस्थिति में रहने लगोगे। तुम किसी भी तरह के व्यक्ति, घटना या वस्तु से बाधित नहीं होओगे, और तुम्हें सत्य का अनुभव होगा। जैसे-जैसे तुम्हारा अनुभव भरपूर होता जाएगा, तुम परमेश्वर की गवाही देने में अधिक सक्षम होते जाओगे, और जैसे-जैसे तुम परमेश्वर की गवाही देने में अधिक सक्षम होओगे, तुम धीरे-धीरे उपयोगी व्यक्ति बनते जाओगे। उपयोगी व्यक्ति बनने पर तुम परमेश्वर के घर में मानक स्तरीय ढंग से अपना कर्तव्य निभा सकोगे, तुम एक सृजित प्राणी की जगह खड़े होने और परमेश्वर की व्यवस्थाओं और आयोजनों के प्रति समर्पण करने में सक्षम रहोगे, और तुम दृढ़ता से खड़े रह सकोगे। जो व्यक्ति परमेश्वर की स्वीकृति पाता है, सिर्फ वही मानक स्तर का सृजित प्राणी होता है। तभी तुम उस सब के योग्य बनोगे जो परमेश्वर ने तुम्हें दिया है।
सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने की कुंजी क्या है? तुम्हें सत्य का अभ्यास करने और सैद्धांतिक ढंग से मामलों को सँभालने के तरीके सीखने होंगे। हमेशा कसमें खाते रहने और अपना संकल्प जताने का फायदा क्या है? यदि तुम हमेशा कसमें खाकर अपना संकल्प व्यक्त करते रहते हो, फिर भी सत्य का अभ्यास नहीं कर पाते, तो यह बिल्कुल फिजूल है। सबसे अहम और सबसे वास्तविक चीज यह है कि तुम अपना कर्तव्य निभाने की प्रक्रिया में जीवन प्रवेश प्राप्त करो, सत्य खोजते हुए उन तमाम समस्याओं को हल करो जो कर्तव्य निभाने की राह में सामने आती हों, और अपने कर्तव्य के प्रति अपने गलत रवैयों को उलट दो। जीवन प्रवेश करने का अर्थ क्या है? इसका अर्थ है, तुम्हें सत्य का अनुभव और ज्ञान हो चुका है, और तुम इसका सटीक अभ्यास कर पा रहे हो। क्या तुम सब लोगों ने अभी जीवन प्रवेश कर लिया है? क्या तुम परमेश्वर की गवाही देने में सक्षम हो? क्या तुम अब भी अधिकांश समय धर्म-सिद्धांत पर ही चिपके तो नहीं रहते? क्या तुम वास्तव में सत्य का ज्ञान या अनुभव लिए बिना धर्म-सिद्धांत पर ही तो नहीं अटके हो? यदि तुम सत्य का सच्चा अनुभव और ज्ञान हासिल नहीं कर सकते तो परमेश्वर की गवाही भी नहीं दे सकते। अधिकांश समय तुम्हारा ज्ञान संवेदी होता है। तुम विरोधाभास में हो, सोचते हो कि यह और वह, दोनों चीजें सही हैं; जब परमेश्वर कुछ कहता है तो तुम्हें लगता है कि मानो वह तुम्हारे लिए सत्य है, और जब वह कुछ और कहता है तो वह भी सत्य होता है। तुम्हें लगता है, मानो परमेश्वर के सभी वचन सत्य हैं, और तुम सबके लिए आमीन कहते हुए उनकी प्रशंसा करते हो, लेकिन उन्हें अनुभवजन्य रूप से अपने ऊपर लागू करके तुलना करने में सक्षम नहीं हो पाते। जब तुम कुछ करते हो तब भी भ्रमित रहते हो और यह नहीं जानते कि अपनी समस्याएँ हल करने के लिए किन सत्यों का उपयोग करना है। क्या तुम लोगों में से ज्यादातर इसी स्थिति में नहीं हैं? यद्यपि तुम धर्म-सिद्धांत काफी समझते हो और इसका बहुत बखान भी कर सकते हो लेकिन तुम इसका उपयोग अपने वास्तविक जीवन में नहीं कर सकते हो। तुम अब भी नहीं जानते कि सत्य का अभ्यास कैसे करना है, न ही यह जानते हो कि अपने वास्तविक जीवन में परमेश्वर के वचनों को कैसे लागू करना है, और तुम पर चाहे जो कुछ बीतती हो, तुम अपनी समस्याएँ हल करने के लिए सत्य खोजना नहीं जानते हो। इसका कारण यह है कि तुम्हारा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है। जब तुम यह जान जाते हो कि तुम लोग अपने वास्तविक जीवन में परमेश्वर के वचनों का अनुभव, अभ्यास और उन पर अमल कैसे करो, और यह भी कि अपने पर कुछ बीतने पर समस्याएँ हल करने के लिए सत्य कैसे तलाशें, तो तुम लोगों के जीवन में विकास होगा। सत्य के अभ्यास के तरीके को जानना यह संकेत है कि तुम्हारे जीवन का विकास हो रहा है। एक दिन जब तुम सत्य के सहारे समस्याएँ हल करने लगोगे, जब तुम्हें परमेश्वर का कुछ ज्ञान हो जाएगा, जब तुम परमेश्वर के बारे में अपना सच्चा ज्ञान साझा करके उसके कार्यों, उसके पवित्र और धार्मिक स्वभाव, और उसकी सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि की गवाही दे सकोगे, तब तुम सचमुच परमेश्वर की गवाही देने में सक्षम होगे और तुम परमेश्वर के काम आने योग्य हो जाओगे। अगर तुम बहुत कुछ समझते हो और दिन-दिन भर धर्म-सिद्धांत का बखान कर सकते हो, लेकिन अपनी समस्या से जुड़ी कोई चीज हल नहीं कर सकते या उन्हें हल करना नहीं जानते, तो इससे साबित होता है कि तुम जिन चीजों को समझते हो वे सत्य नहीं हैं, बल्कि वे सिर्फ शब्द और धर्म-सिद्धांत हैं। भले ही तुम कोई धर्म-सिद्धांत बहुत व्यावहारिक ढंग से कहते हो, हकीकत में यह केवल संवेदी ज्ञान होता है जिसने अभी तार्किकता हासिल नहीं की है। भले ही तुम्हें सुनकर लोग निर्माण पाएँ, तुम्हारे जैसी भावनाएँ महसूस करने लगें, और तुम्हारा ज्ञान उन पर कुछ असर छोड़ने में भी कामयाब रहे, लेकिन तुम इस पर न तो बहुत स्पष्टता से कुछ कह सकोगे, न ही तुम पूरी तरह समस्याएँ ही हल कर सकोगे। यह साबित करता है कि तुमने जिन धर्म-सिद्धांतों के बारे में बात की है वे मात्र संवेदी ज्ञान हैं। तुम यह भी नहीं कह सकते कि वे सत्य वास्तविकता हैं, खुद तुम्हारे सत्य वास्तविकता में प्रवेश की तो बात ही दूर है। तो अब तुम शब्द और धर्म-सिद्धांत के बारे में बोलने की समस्या का समाधान कैसे करोगे? इसके लिए यह जरूरी है कि अपना कर्तव्य निभाते हुए तुम तमाम तरह की जो भ्रष्टता प्रकट करते हो, उसके बारे में आत्मचिंतन करो, तुम्हारे सामने जो भी समस्या आती है उसके मूल आधारों पर आत्मचिंतन करो, और फिर सत्य खोजकर और परमेश्वर के वचनों का उपयोग कर अपने प्रकट हुए भ्रष्ट स्वभाव का संपूर्ण समाधान करो। तुम्हारे भीतर जो प्रकट होता है, वह चाहे अहंकार और आत्मतुष्टता हो या कुटिलता और धोखेबाजी, स्वार्थ और नीचता हो या अनमनापन और परमेश्वर से झूठ बोलना, तुम्हें इन भ्रष्ट स्वभावों पर तब तक आत्मचिंतन करना होगा जब तक कि तुम उन्हें साफ-साफ समझ न लो। इस तरह तुम जान लोगे कि अपना कर्तव्य निभाते समय तुममें कौन-सी समस्याएँ मौजूद हैं और तुम उद्धार पाने से कितनी दूर हो। जब तुम अपना भ्रष्ट स्वभाव अच्छी तरह देख लोगे, केवल तभी यह जान पाओगे कि अपना कर्तव्य निभाने में परेशानियाँ और बाधाएँ कहाँ हैं। तभी तुम समस्याओं को उनकी जड़ से हल कर पाओगे। उदाहरण के लिए, मान लो कि तुम अपना कर्तव्य निभाने में जिम्मेदारी लेने के बजाय हमेशा लापरवाही से काम करते हो, जिससे काम में नुकसान होता है, लेकिन तुम सिर्फ अपनी इज्जत की चिंता करते हो, तो अपनी स्थिति और कठिनाइयों के बारे में खुलकर संगति करने या गहन आत्म-विश्लेषण और आत्म-ज्ञान का अभ्यास करने के बजाय हमेशा अनमने ढंग से चीजों से निपटने के बहाने ढूँढ़ते रहते हो। तुम्हें यह समस्या कैसे हल करनी चाहिए? तुम्हें आत्मचिंतन करते हुए परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए : “हे परमेश्वर, यदि मैं ऐसा बोलता हूँ तो यह सिर्फ इज्जत बचाने के लिए है। यह मेरा भ्रष्ट स्वभाव बोल रहा है। मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए। मुझे खुद को खुलकर उघाड़ना चाहिए, और अपने दिल के सच्चे उद्गार प्रकट करने चाहिए। मैं अपने मिथ्या अभिमान को बचाने के बजाय शर्म और बदनामी सहने को तैयार हूँ। मैं सिर्फ परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहता हूँ।” इस तरह अपने खिलाफ विद्रोह करके और अपने दिल के सच्चे उद्गार व्यक्त कर तुम ईमानदार व्यक्ति बनने का अभ्यास कर रहे हो, और यही नहीं, तुम न तो अपनी इच्छा के अनुसार चल रहे हो, न शर्म से बचने की कोशिश कर रहे हो। तुम परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने, परमेश्वर के इरादों के अनुसार सत्य का अभ्यास करने, मन लगाकर अपना कर्तव्य पूरे करने और अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करने में सक्षम हो। इस तरीके से तुम सत्य का अभ्यास करते हुए अपना कर्तव्य तो बखूबी निभा ही रहे हो, परमेश्वर के घर के हितों का भी संरक्षण कर रहे हो, और इससे परमेश्वर के दिल को भी संतोष मिलता है। यह जीने का एक न्यायसंगत और सम्मानजनक तरीका है जो परमेश्वर और मनुष्यों, दोनों के सामने रखने लायक है। यह कितना शानदार है! इस प्रकार का अभ्यास थोड़ा कठिन जरूर है लेकिन यदि तुम्हारे प्रयास और अभ्यास इसी दिशा में हैं तो एक-दो बार असफल होने के बावजूद तुम अवश्य ही सफल होगे। और सफलता का तुम्हारे लिए क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि जब तुम सत्य का अभ्यास करते हो, तो तुम वह कदम उठाने में सक्षम हो जाते हो जो तुम्हें शैतान के बंधनों से मुक्त करता है, एक ऐसा कदम जो तुम्हें अपने खिलाफ विद्रोह करने देता है। इसका अर्थ है कि तुम अपने मिथ्या अभिमान और प्रतिष्ठा को दरकिनार कर अपने लाभ की खोज बंद करने और स्वार्थी और नीचतापूर्ण चीजें न करने में सक्षम हो। जब तुम इसे अभ्यास में लाते हो, तो तुम लोगों को यह दिखाते हो कि तुम ऐसे व्यक्ति हो, जो सत्य से प्रेम करता है, जो सत्य की कामना करता है, जो न्याय और प्रकाश की कामना करता है। यह वह नतीजा है जो तुम सत्य का अभ्यास कर हासिल करते हो। साथ ही, तुम शैतान को शर्मिंदा भी करते हो। शैतान ने तुम्हें भ्रष्ट किया, तुम्हें अपने लिए जीना सिखाया, तुम्हें स्वार्थी और सिर्फ अपनी प्रतिष्ठा के बारे में सोचने वाला बनाया। लेकिन अब ये शैतानी चीजें तुम्हें और नहीं बाँध सकतीं, तुम उनके बंधनों से छूट चुके हो, तुम अब मिथ्या अभिमान, प्रतिष्ठा या अपने निजी हितों से नियंत्रित नहीं हो, और तुम सत्य का अभ्यास करते हो, और इसलिए शैतान अपमानित होता है, और वह कुछ नहीं कर सकता है। उस स्थिति में क्या तुम विजयी नहीं हो जाते? जब तुम विजयी हो जाते हो तो क्या तुम परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में दृढ़ता से खड़े नहीं होते? क्या तुम एक अच्छी लड़ाई नहीं लड़ते? जब तुम एक अच्छी लड़ाई लड़ते हो, तो तुम्हारे दिल में शांति, आनंद और राहत की भावना होती है। अगर अपने जीवन में तुम अक्सर दोषारोपण करने की भावना रखते हो, अगर तुम्हारे हृदय को सुकून नहीं मिलता, अगर तुम शांति या आनंद से रहित हो, और अक्सर सभी प्रकार की चीजों के बारे में चिंता और घबराहट से घिरे रहते हो, तो यह क्या प्रदर्शित करता है? केवल यह कि तुम सत्य का अभ्यास नहीं करते, परमेश्वर के प्रति अपनी गवाही में अडिग नहीं रहते। जब तुम शैतान के स्वभाव के बीच जीते हो, तो तुम्हारे अक्सर सत्य का अभ्यास करने में विफल होने, सत्य से विश्वासघात करने, स्वार्थी और नीच होने की संभावना है; तुम केवल अपनी छवि, अपना नाम और रुतबा, और अपने हित कायम रखते हो। हमेशा अपने लिए जीना तुम्हें बहुत दर्द देता है। तुम इतनी स्वार्थपूर्ण इच्छाओं, उलझावों, बेड़ियों, शंकाओं और झंझटों में जकड़े हुए हो कि तुम्हें लेशमात्र भी शांति या आनंद नहीं मिलता। भ्रष्ट देह के लिए जीने का मतलब है अत्यधिक कष्ट उठाना। सत्य का अनुसरण करने वाले लोग अलग होते हैं। वे सत्य को जितना अधिक समझते हैं, उतने ही अधिक स्वतंत्र और मुक्त होते जाते हैं; वे सत्य का जितना अधिक अभ्यास करते हैं, उतने ही अधिक शांति और आनंद से भर उठते हैं। जब वे सत्य को हासिल कर लेंगे तो पूरी तरह प्रकाश में रहेंगे, परमेश्वर के आशीष का आनंद लेंगे, और उन्हें कोई कष्ट नहीं होगा।
अभी तुम सब लोग आम तौर पर किस दशा में जी रहे हो? अधिकांश समय सकारात्मक दशा में रहते हो या नकारात्मक दशा में? (हम अधिकांश समय नकारात्मक दशा में रहते हैं।) हमेशा नकारात्मक दशा में रहने वाले किसी व्यक्ति के लिए अपना कर्तव्य त्यागे बिना अपने कर्तव्य निभाने में जुटे रहना कोई साधारण बात नहीं है! तुम सभी लोग अक्सर नकारात्मक रहते हो और इसका हल नहीं जानते हो। कभी-कभी तुम्हें अपनी नकारात्मक दशाओं के हल के लिए अत्यधिक प्रयास करने पड़ते हैं, और जब तुम्हारे मुताबिक बात नहीं बनती तो तुम फिर से नकारात्मक हो जाते हो। तुम हमेशा अपनी नकारात्मकता में ही लोटते रहते हो, चाह कर भी खड़े नहीं हो पाते हो; कोई भी कर्तव्य ठीक से नहीं निभा सकते, और तुम इतने अक्षम होते हो कि तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता है। क्या इस तरह जीना थकाऊ नहीं है? (बिल्कुल है।) तो फिर तुम नकारात्मकता की समस्या से पूरी तरह कैसे निपटते हो? तुम्हें कुछ-कुछ सत्य अवश्य समझना होगा। तुम जितना भी धर्म-सिद्धांत बघारो, उससे तुम्हारी समस्या हल नहीं होने वाली। जब एक बार कोई व्यक्ति सचमुच सत्य समझ लेता है, अपने सामने आने वाली नकारात्मकता या किसी भी समस्या को हल करने में सक्षम हो जाता है तो फिर उसके लिए अपना कर्तव्य निभाना उतना थकाऊ नहीं रहता। केवल सत्य हासिल करके ही कोई स्वतंत्र और मुक्त हो सकता है। इस समय तुम सब लोगों में एक ही सबसे बड़ी कमी सत्य की है, लेकिन सत्य रातो-रात हासिल नहीं हो जाता। इसके लिए तुम्हें परमेश्वर के कार्य का सच्चा ज्ञान होना चाहिए और लोगों के भ्रष्ट स्वभाव को साफ-साफ देखने लायक होना चाहिए। इसमें समय लगता है, और इसे समझने के लिए तुम्हें सत्य खोजना होगा। तुम सब लोगों को भ्रष्ट स्वभाव के साथ जीने की पीड़ा का एहसास है और तुम्हें इसका गहरा प्रत्यक्ष अनुभव है। जब तुम सत्य का अभ्यास करने और सत्य सिद्धांतों का पालन करने में सक्षम होकर सत्य को समझ लेते हो तो उससे जो शांति और खुशी मिलती है, क्या तुम लोगों ने उसे अनुभव किया है? क्या तुम्हारे पास ऐसे कई अनुभव हैं? अगर वास्तव में ऐसे अनुभव भरपूर मात्रा में हैं तो इसका मतलब है कि तुम्हारे पास सत्य वास्तविकता पूरी तरह है। तुम्हें रोशनी में और परमेश्वर की उपस्थिति में रहने का एहसास होगा। अगर तुम कभी-कभी परमेश्वर के प्रबोधन का थोड़ा-सा भी आनंद पा लेते हो तो तुम्हें बहुत खुशी होगी। यदि तुम लोगों पर भरोसा करने के बजाय कभी-कभी परमेश्वर पर भरोसा करते हो और परमेश्वर तुम्हें थोड़ी-सी भी रोशनी देता है, तुम्हें आगे का वह रास्ता दिखाता है जिसके बारे में तुमने सोचा भी नहीं था और मामले का निपटान हो जाता है तो तुम्हें बहुत खुशी होगी। बार-बार ये छोटे-छोटे अनुभव होना काफी नहीं है; तुम्हें अब भी सत्य की दिशा में जुटे रहना होगा। एक ओर तुम लोगों को दर्शनों के सत्य को समझना होगा, परमेश्वर के कार्य की पूर्ण रूप से स्पष्ट समझ हासिल करनी होगी, और परमेश्वर के स्वभाव का सच्चा ज्ञान लेना होगा। इस तरह अपना कर्तव्य निभाने के दौरान जब तुम्हारा दोबारा समस्याओं से सामना होगा तो कम से कम न तो धारणाएँ पनपेंगी, न ही विद्रोह का भाव उत्पन्न होगा। यह चीजों का एक पहलू है। इसके अतिरिक्त तुम्हें जीवन प्रवेश की दिशा में प्रयास करने होंगे। उन सत्यों को संक्षेपित करना होगा, जिनका अभ्यास और जिनमें प्रवेश करना है, जैसे स्वयं को जानना, ईमानदार व्यक्ति बनना, परमेश्वर के प्रति समर्पण सीखना, परमेश्वर पर कैसे भरोसा करना है, अपना कर्तव्य समर्पित होकर कैसे निभाना है, तमाम तरह के लोगों में भेद पहचानना कैसे सीखना है, शैतान के साथ कैसा सलूक करना है, तुम्हारी बुद्धि कैसी होनी चाहिए, आदि-आदि। सत्य के इन विभिन्न पहलुओं का अनुभव और इनमें प्रवेश करके ही तुम परमेश्वर का भय मानोगे और बुराई से दूर रहोगे, और पूर्ण व्यक्ति बनोगे। तो सत्य वास्तविकता के कितने पहलुओं में तुम लोगों ने अभी तक प्रवेश किया है? सत्य वास्तविकता के किन पहलुओं में तुमने अभी तक प्रवेश नहीं किया है? तुम्हें अपने मन में इसका हिसाब रखना होगा। जब तुम अभ्यास से संबंधित कई पहलुओं में प्रवेश कर लोगे तो तुम्हारा जीवन पहले ही प्रगति कर चुका होगा, और तुममें सचमुच आध्यात्मिक कद होगा। जब तुम लोगों का आध्यात्मिक कद किसी निश्चित स्तर तक बढ़ जाएगा तब तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग में प्रवेश कर सकोगे, और तुम्हें सच्चा आध्यात्मिक कद हासिल होगा। यह ऐसा मामला नहीं है जिसमें हड़बड़ी की जाए—एक ही कौर में हाथी को नहीं निगला जा सकता। अभी तुम्हारी ऐसी कौन-सी चीज है जिसे हल करना सबसे आवश्यक और महत्वपूर्ण है? वह यही है कि तुम्हें अपना कर्तव्य ठीक से निभाना है, और कर्तव्य निभाते हुए जीवन प्रवेश करना है। यही महत्वपूर्ण है। प्रयास बढ़ाने भर से बात नहीं बनेगी—तुम्हें इसमें अपना दिल भी झोंकना होगा। परमेश्वर यह नहीं चाहता कि एक सृजित प्राणी के रूप में कर्तव्य निभाते हुए तुम अपना श्रम बेचो, बल्कि वह यह चाहता है कि तुम उसे अपनी ईमानदारी अर्पित करो। अपना कर्तव्य निभाते हुए तुम्हें जीवन प्रवेश करना ही चाहिए। जब तुम जीवन प्रवेश कर लोगे, तभी तुम्हारे पास जीवन होगा, जब तुम्हारे पास जीवन होगा, तभी तुम बढ़ सकते हो, और जिनके पास जीवन होता है, सिर्फ उन्हीं के पास सत्य होता है।
10 अगस्त 2015
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?