धर्म में आस्था रखने या धार्मिक समारोह में शामिल होने मात्र से किसी को नहीं बचाया जा सकता (भाग दो)
असल में, परमेश्वर में आस्था होना क्या होता है? क्या धर्म में विश्वास परमेश्वर में आस्था के बराबर है? जब लोग धर्म को मानते हैं, तो वे शैतान का अनुसरण करते हैं। जब वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तभी वे परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, और केवल वे लोग जो मसीह का अनुसरण करते हैं, वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करते हैं। जो व्यक्ति परमेश्वर के वचनों को अपने जीवन के रूप में जरा-भी स्वीकार नहीं करता, वह परमेश्वर में सच्चा विश्वास करने वाला व्यक्ति नहीं है। वह छद्म-अविश्वासी है, चाहे वह कितने ही वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करता रहा हो, यह किसी काम का नहीं है। अगर परमेश्वर का कोई विश्वासी सिर्फ धार्मिक रस्मों में लगा रहता है, लेकिन सत्य का अभ्यास नहीं करता है, तो वह परमेश्वर में विश्वास करने वाला व्यक्ति नहीं है, और परमेश्वर उसे स्वीकार नहीं करता है। तुम्हारे पास ऐसा क्या होना चाहिए कि परमेश्वर तुम्हें अपना अनुयायी स्वीकार करे? क्या तुम्हें उन मापदंडों का पता है जिनके अनुसार परमेश्वर किसी व्यक्ति को मापता है? परमेश्वर यह मूल्यांकन करता है कि क्या तुम सब कुछ उसकी अपेक्षाओं के अनुसार करते हो, और क्या तुम उसके वचनों पर आधारित सत्यों के आगे समर्पण और उनका अभ्यास करते हो। परमेश्वर इसी मापदंड पर किसी व्यक्ति को परखता है। परमेश्वर की परख इस बात पर आधारित नहीं है कि तुम कितने बरसों से उसमें विश्वास करते रहे हो, तुम कहाँ तक पहुँचे हो, तुम्हारे अच्छे व्यवहार कितने हैं, या तुम कितने शब्दों और धर्म-सिद्धांतों को समझते हो। उसका पैमाना इस बात पर आधारित है कि क्या तुम सत्य का अनुसरण करते हो और तुम कौन-सा रास्ता चुनते हो। बहुत-से लोग मौखिक तौर पर परमेश्वर में विश्वास करते हैं और उसका गुणगान करते हैं, पर अपने दिलों में वे परमेश्वर के वचनों से प्रेम नहीं करते। वे सत्य में दिलचस्पी नहीं रखते। वे हमेशा यही मानते हैं कि आम लोग शैतान के फलसफों या विभिन्न सांसारिक नियमों के अनुसार ही चलते हैं, और इसी तरह कोई खुद को बचाए रख सकता है, और दुनिया में मूल्य के साथ इसी तरह जिया जा सकता है। क्या ये लोग परमेश्वर में विश्वास रखने और उसका अनुसरण करने वाले लोग हैं? नहीं, वे बिल्कुल भी नहीं हैं। महान और प्रसिद्ध लोगों के शब्द खास तौर से ज्ञान से भरे प्रतीत होते हैं और लोगों को आसानी से गुमराह कर सकते हैं। तुम उनके शब्दों को सत्य मानकर उन्हें अपना जीवन-मंत्र बना लेते हो। लेकिन जब परमेश्वर के वचनों की बात आती है, लोगों से उसकी सामान्य अपेक्षा की बात आती है, जैसे कि एक ईमानदार व्यक्ति होना या आज्ञाकारी बनकर और चीजों पर बारीकी से ध्यान देकर अपना स्थान बनाए रखना, एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाना और व्यावहारिक ढंग से आचरण करना तब अगर तुम इन वचनों को अभ्यास में नहीं ला सकते हो और इन्हें सत्य नहीं मानते हो तो तुम परमेश्वर के अनुयायी नहीं हो। तुम सत्य के अभ्यास का दावा करते हो, पर अगर परमेश्वर तुमसे पूछे, “क्या तुम जिन ‘सत्यों’ का अभ्यास कर रहे हो, वे परमेश्वर के वचन हैं? तुम जिन सिद्धांतों पर अमल करते हो क्या वे परमेश्वर के वचनों पर आधारित हैं?”—तो तुम क्या जवाब दोगे? अगर तुम्हारा आधार परमेश्वर के वचन नहीं हैं, तो वे शैतान के शब्द हैं। तुम शैतान के शब्दों को जी रहे हो, और फिर भी तुम सत्य का अभ्यास करने और परमेश्वर को संतुष्ट करने का दावा करते हो। क्या यह परमेश्वर के खिलाफ ईशनिंदा का मामला नहीं है? मिसाल के तौर पर, परमेश्वर लोगों से ईमानदार बनने के लिए कहता है, फिर भी लोग यह सोचते तक नहीं कि वास्तव में ईमानदार होने का क्या मतलब है, एक ईमानदार व्यक्ति होने का अभ्यास कैसे किया जाता है, वे ऐसी कौन-सी चीजें जीते और प्रकट करते हैं, जो बेईमानी है, और ऐसी कौन-सी चीजें जीते और प्रकट करते हैं जो ईमानदारी है। परमेश्वर के वचनों के सत्य के सार पर चिंतन-मनन करने के बजाय वे अविश्वासियों की किताबें पढ़ते हैं। वे सोचते हैं, “अविश्वासियों की कहावतें भी काफी अच्छी होती हैं—वे भी लोगों से अच्छा बनने के लिए कहती हैं! मिसाल के तौर पर, ‘अच्छे लोगों का जीवन शांतिपूर्ण होता है,’ ‘निष्कपट लोग हमेशा बचे रह पाते हैं,’ ‘दूसरों को क्षमा करना मूर्खता नहीं है, इसका बाद में अच्छा फल मिलता है।’ ये सभी कथन भी सही हैं, और सत्य से मेल खाते हैं!” इसलिए वे इन शब्दों से चिपके रहते हैं। अविश्वासियों की इन कहावतों पर अमल करके वे किस तरह के व्यक्ति की तरह जीते हैं? क्या वे सत्य वास्तविकता को जी सकते हैं? (नहीं, वे नहीं जी सकते।) क्या ऐसे बहुत-से लोग नहीं हैं? वे कुछ ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं, कुछ किताबें पढ़ लेते हैं, और कुछ प्रसिद्ध कृतियों का अध्ययन कर लेते हैं, उन्हें थोड़ा परिप्रेक्ष्य मिल जाता है, और वे कुछ मशहूर कहावतें और लोकोक्तियाँ सुन लेते हैं, और इन्हें सत्य मान लेते हैं, और इन्हीं शब्दों के अनुसार चलते हुए वे अपना कर्तव्य निभाते रहते हैं, और इन्हें परमेश्वर के विश्वासी के रूप में अपने जीवन पर लागू करते रहते हैं, और यह सोचते रहते हैं कि वे परमेश्वर के दिल को संतुष्ट कर रहे हैं। क्या यह झूठ को सत्य की जगह देना नहीं है? क्या यह छल नहीं है? परमेश्वर की नजर में यह ईशनिंदा है! ये चीजें हर व्यक्ति में झलकती हैं, और थोड़ी-बहुत मात्रा में नहीं। एक ऐसा व्यक्ति जो लोगों द्वारा कहे गए लुभावने शब्दों और सही धर्म-सिद्धांतों को सत्य मानकर सीने से लगाए रखता है, जबकि परमेश्वर के वचनों को एक तरफ रखकर उन्हें नजरअंदाज कर देता है और बार-बार पढ़ने के बाद भी उन्हें आत्मसात नहीं कर पाता या परमेश्वर के वचनों को सत्य नहीं मानता, तो क्या वह परमेश्वर में विश्वास करने वाला व्यक्ति है? क्या वह परमेश्वर का अनुयायी है? (नहीं।) ऐसे लोग धर्म में विश्वास करते हैं, वे अब भी शैतान का अनुसरण करते हैं! उनका मानना है कि शैतान द्वारा कहे गए शब्द दार्शनिक हैं, वे गहरे और विशिष्ट हैं। वे उन्हें परम सत्य के प्रसिद्ध कथन मानते हैं। वे चाहे कुछ भी छोड़ दें, पर इन शब्दों को नहीं छोड़ पाते। इन शब्दों को त्यागना उनके लिए जीवन की आधारशिला को खो देने की तरह है, जैसे कि अपने दिल को उलीचकर खाली कर देना। ये किस तरह के लोग हैं? ये शैतान के अनुयायी हैं, और यही कारण है कि वे शैतान के प्रसिद्ध कथनों को सत्य मानते हैं। क्या तुम लोग अलग-अलग संदर्भों में अपनी विभिन्न मनोदशाओं का विश्लेषण करके उन्हें पहचान सकते हो? उदाहरण के लिए, कुछ लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं और अक्सर उसके वचन पढ़ते हैं, पर जब उन पर कुछ बीतती है तो वे हमेशा कहते हैं, “मेरी माँ कहती थी,” “मेरे दादा कहते थे,” “फलाँ-फलाँ मशहूर आदमी ने एक बार कहा था,” या “फलाँ-फलाँ किताब में कहा गया है।” वे कभी नहीं कहते कि “परमेश्वर के वचनों में ऐसा कहा गया है,” “परमेश्वर की हमसे इस तरह की अपेक्षाएँ हैं,” “परमेश्वर ने यह कहा है।” वे ऐसे शब्द कभी नहीं कहते। क्या वे परमेश्वर के अनुयायी हैं? (नहीं, वे नहीं हैं।) क्या इन मनोदशाओं का पता लगाना लोगों के लिए आसान है? नहीं, यह आसान नहीं है। लोगों में इन मनोदशाओं की मौजूदगी ही बहुत हानिकारक है। हो सकता है तुम तीन, पाँच, आठ या दस बरस से परमेश्वर में विश्वास कर रहे हो, पर तुम्हें अभी भी नहीं पता कि परमेश्वर के प्रति समर्पण कैसे करें या उसके वचनों का अभ्यास कैसे करें। तुम पर कुछ भी क्यों न बीते, तुम शैतानी शब्दों को ही अपना आधार मानते हो; तुम पारंपरिक संस्कृति में ही अपना आधार खोजते हो। क्या यह परमेश्वर में आस्था रखना है? क्या तुम शैतान का अनुसरण नहीं कर रहे हो? तुम शैतानी शब्दों के अनुसार जीते हो, और शैतानी स्वभाव के अनुसार जीते हो, तो क्या तुम परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं कर रहे हो? क्योंकि तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार न तो अभ्यास कर रहे हो और न जी रहे हो, परमेश्वर के पदचिन्हों पर नहीं चल रहे हो, उसकी कही बातें नहीं सुनते हो, और परमेश्वर चाहे जो भी आयोजन या अपेक्षा करे तुम उसके प्रति समर्पण नहीं कर पाते हो, तो तुम परमेश्वर का अनुसरण नहीं कर रहे हो। तुम अब भी शैतान का अनुसरण कर रहे हो। शैतान कहाँ है? शैतान लोगों के दिलों में है। शैतान के फलसफों, तर्कों और नियम-कायदों ने, उसके विभिन्न शैतानी शब्दों ने बहुत अरसे से लोगों के दिलों में जड़ें जमा रखी हैं। यह सबसे गंभीर समस्या है। अगर तुम परमेश्वर में अपनी आस्था में इस समस्या को हल नहीं कर सकते, तो तुम्हें परमेश्वर द्वारा बचाया नहीं जा सकेगा। इसलिए तुम लोगों को अक्सर अपने सारे कार्यों को, अपने विचारों और दृष्टिकोणों को और चीजें करने के अपने आधार को परमेश्वर के वचनों की कसौटी पर कसना चाहिए और अपने विचारों में चीजों का गहन-विश्लेषण करना चाहिए। तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम्हारे भीतर कौन-सी चीजें सांसारिक आचरण के फलसफे हैं, कौन-सी चीजें लोकप्रिय कहावतें हैं, कौन-सी पारंपरिक संस्कृति हैं, और कौन-सी चीजें बौद्धिक ज्ञान से आई हैं। तुम्हें पता होना चाहिए कि इनमें से किन चीजों को तुम हमेशा सही और सत्य के अनुरूप मानते हो, किन चीजों का तुम ऐसे पालन करते हो मानो वे सत्य हों, और किन चीजों को तुम सत्य का स्थान लेने देते हो। इन चीजों का तुम लोगों को विश्लेषण करना चाहिए। विशेष रूप से जिन चीजों को तुम सही और मूल्यवान मानकर सत्य की तरह देखते हो, उनकी असलियत जान पाना आसान नहीं है। लेकिन जब तुम उनकी असलियत जान लेते हो, तो तुम एक बड़ी बाधा पार कर लेते हो। ये चीजें लोगों को सत्य का अभ्यास करने, परमेश्वर के वचनों को समझने और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने से रोकने वाली बाधाओं की तरह हैं। यदि तुम सारा दिन भ्रमित और निरुद्देश्य रहते हो, और इन चीजों को लेकर जरा-भी विचार नहीं करते हो, और इन समस्याओं को सुलझाने पर कोई ध्यान नहीं देते हो, तो यही तुम्हारी परेशानी की जड़ है, यही तुम्हारे दिल में भरा हुआ जहर है। अगर इन्हें हटाया नहीं जाता, तो तुम परमेश्वर का सच्चा अनुसरण करने में असमर्थ रहोगे, और सत्य का अभ्यास या परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं कर पाओगे, और तुम्हारे लिए उद्धार प्राप्त करने का कोई रास्ता नहीं होगा।
अब जब हम इन चीजों पर संगति कर चुके हैं, तो क्या तुम लोगों ने अपने भीतर की उन मनोदशाओं, विचारों और अड़ियल दृष्टिकोणों पर विचार किया है, जो परमेश्वर की इच्छाओं, अपेक्षाओं और सत्य के उलट हैं, पर जिन्हें तुम लोग सत्य समझते रहे हो, और उन्हें सत्य मानकर उनका अभ्यास करते रहे हो? (मेरा यह नजरिया था कि आचरण करने में हमें एक अच्छा इंसान होने का जतन करना चाहिए, एक ऐसा इंसान जिसे सभी पसंद करें और जिससे सभी जुड़ना चाहें। जब मैं सत्य को नहीं समझती थी तो मुझे लगता था कि ऐसा अनुसरण उचित और सही है। पर अब इसे सत्य से मापते हुए, मुझे यह एहसास हुआ है कि ऐसा व्यक्ति खुशामदी होता है। खास तौर से धूर्त लोगों के बारे में परमेश्वर के खुलासों को पढ़ने के बाद, मैंने यह भेद पहचाना कि ऐसा करने के पीछे मेरे धूर्त इरादे थे; मैं हर मामले में दूसरों को खुश करके, और उनके दिलों में अपनी एक झूठी छाप छोड़कर और उन्हें गुमराह करके अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे को बचाए रखना चाहती थी। कभी-कभी तो मैं परमेश्वर के घर के हितों को भी ताक पर रखकर दूसरों को खुश करने में लगी रहती थी। मैं अच्छा व्यक्ति बिल्कुल भी नहीं थी, न ही मुझमें एक असली मनुष्य जैसा कुछ था। जब मुझे इन बातों का पता चला, तो मेरी इच्छा हुई कि मैं सत्य खोजूँ और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप एक ईमानदार व्यक्ति बनूँ, न कि सबको खुश रखने वाला एक खुशामदी व्यक्ति। मैं ऐसा व्यक्ति बनना चाहती थी जो तथ्यों और सत्य के अनुसार बोलता है, जो हर मामले में तथ्यों के अनुसार बात करता है, क्योंकि यह परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है।) (इस अवधि में मैंने देखा कि मैं सिर्फ अपने ऊपरी व्यवहार में बदलाव लाने पर ध्यान दे रहा था। मिसाल के तौर पर, जब कुछ भाई-बहनों ने मुझे बताया कि मैं अहंकारी हूँ और मेरे साथ सहयोग करना आसान नहीं है, तो मैंने लचीलापन दिखाते हुए उनके साथ नरमी से और दोस्ताना अंदाज में बात की। मैंने वही किया जो उन्होंने मुझसे कहा, और जब मैं किसी को अपना कर्तव्य निभाने के दौरान कोई गलती करते देखता था, तो मैं उस पर उंगली उठाने के बजाय शांति और समरसता बनाए रखता था। अभी-अभी परमेश्वर की संगति सुनते हुए, मैंने देखा है कि मैं परमेश्वर के वचनों के अनुसार नहीं चल रहा था। मैं सांसारिक आचरण के शैतानी फलसफों के अनुसार जी रहा था। मैं ऊपरी तौर पर अपने अच्छे व्यवहार से दूसरों को गुमराह कर रहा था, जबकि असल में, मैंने भ्रष्ट स्वभाव को त्यागा नहीं था। मैं सत्य का अनुसरण करने वाला व्यक्ति नहीं था, और मैं अपना बहुत सारा समय बर्बाद कर चुका था।) तुम लोग अब अतीत के कुछ गलत नजरियों और अभ्यासों को पहचानकर उनका बोध तो कर लेते हो, पर सत्य का अभ्यास करना तुम्हारे लिए बहुत दुष्कर है। इन मनोदशाओं को पहचानने और इनका बोध करने के बाद भ्रष्ट मानवजाति की दशा को लेकर तुम लोगों के क्या विचार और भावनाएँ हैं? क्या तुम यह भाँप पाए हो कि भ्रष्ट मानवजाति बड़ी सख्ती और मजबूती से शैतान के नियंत्रण में है? क्या तुम्हें इसका बोध हो चुका है? (हाँ।) तुम्हें इसका बोध कब हुआ? (जब मैंने सत्य का अभ्यास करना चाहा, शैतान की प्रकृति ने मुझे भीतर से नियंत्रित और कैद कर लिया। मेरा दिल संघर्ष करता रहा, पर सत्य का अभ्यास न कर सका, मानो मैं किन्हीं जंजीरों में जकड़ा हुआ हूँ। यह बहुत यंत्रणा भरा था।) क्या तब तुम्हें यह महसूस हुआ कि शैतान अत्यंत घृणित है? या क्या तुम समय के साथ भावशून्य हो गए और अब घृणा भी महसूस नहीं कर पाते हो? (मैं यह महसूस कर सकता था कि शैतान घृणित है।) क्या तुम्हें यह एहसास हुआ है कि मानवजाति को बचाने के लिए परमेश्वर का कार्य अत्यंत आवश्यक है? क्या तुम यह बोध कर सकते हो कि परमेश्वर द्वारा व्यक्त वचन और सत्य, जिनमें मानवजाति को उजागर करने वाले वचन भी शामिल हैं, सभी वास्तविकताएँ हैं, कि एक भी ऐसा वाक्यांश नहीं है जो वास्तविक न हो, और ये सभी पूरी तरह से तथ्यों से मेल खाते हैं, और ये ऐसे वचन हैं जो सत्य प्राप्त करने और बचाए जाने के लिहाज से मानवजाति के लिए सबसे ज्यादा जरूरी हैं? मानवजाति को परमेश्वर के उद्धार की नितांत आवश्यकता है! अगर परमेश्वर देहधारण करके अपना कार्य करने न आता, अगर परमेश्वर ने इतने सारे सत्य न व्यक्त किए होते, तो मानवजाति को उद्धार का रास्ता कहाँ से मिलता? संकेतों और चमत्कारों के लिए शैतान और दुष्ट आत्माओं पर पूरी निर्भरता बर्बादी की तरफ ले जाती है। शैतान के फलसफों, तर्कों और नियमों के अनुसार जीने वाले लोग तबाही के शिकार होते हैं। क्या अब तुम लोगों को इसकी जानकारी है? अगर तुम्हें सिर्फ इसकी जानकारी है, तो यह काफी नहीं है। यह परमेश्वर के उद्धार के लिए एक दिल की तड़प मात्र है। लेकिन क्या तुम सत्य को स्वीकार सकते हो, और न्याय और ताड़ना को स्वीकार सकते हो, और अपने भ्रष्ट स्वभाव को त्याग सकते हो—ये सब अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। परमेश्वर में विश्वास करने वालों को सत्य और सकारात्मक चीजों से प्रेम होना चाहिए, और उन्हें बुराई से और शैतान से आने वाली हर चीज से घृणा होनी चाहिए। उन्हें अपना ध्यान आत्म-चिंतन और खुद को समझने, और अपने भ्रष्ट स्वभाव के खुलासों का भेद पहचानने पर केंद्रित रखना चाहिए। उन्हें यह साफ-साफ देखना चाहिए कि उनका प्रकृति सार कुरूप और दुष्टतापूर्ण है, परमेश्वर के खिलाफ है, और परमेश्वर की घृणा का पात्र है; और उन्हें दिल की गहराइयों से खुद से वितृष्णा महसूस करने और खुद से घृणा करने में सक्षम होना चाहिए। सिर्फ तभी उनमें शैतान की प्रकृति के बंधन और जकड़ से मुक्त होने का संकल्प और शक्ति आ सकती हैं और वे सत्य का अभ्यास और परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकते हैं। इस संकल्प के बिना तुम्हारे लिए सत्य का अभ्यास करना बहुत कठिन होगा, भले ही कोई तुम्हें ऐसा करने के लिए कहे। लोगों को बंधन, खिलवाड़, यातना, कुचले जाने और अपने भ्रष्ट स्वभाव के दुरुपयोग जैसी मनोदशाओं के बीच अत्यधिक पीड़ा सहते हुए संघर्ष करते रहना चाहिए। इस संघर्ष की पीड़ा को झेलने के बाद ही वे शैतान से घृणा कर सकते हैं, और इन सबको बदलने का संकल्प और दृढ़ निश्चय कर सकते हैं। पर्याप्त कष्ट झेलने के बाद ही वे संकल्प विकसित कर सकते हैं और उनमें सत्य का अनुसरण करने और इन सबसे मुक्त होने की प्रेरणा हो सकती है। अगर तुम्हें कोई पीड़ा महसूस किए बिना या शैतान द्वारा लोगों को बर्बर बनाए जाने के बोध के बिना ऐसा लगता है कि शैतान की चीजें बहुत बढ़िया हैं, कि वे तुम्हारी देह को तृप्त कर सकती हैं, और लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं, उनकी अतिवादी इच्छाओं और उनकी बहुत-सी प्राथमिकताओं को संतुष्ट कर सकती हैं, तो क्या तुम इन सबसे मुक्त होना चाहते हो? (नहीं।) मान लो किसी धोखेबाज व्यक्ति को पता हो कि वह धूर्त है, झूठ बोलने का शौकीन है और वह सच बोलना पसंद नहीं करता है, और यह कि दूसरों के साथ कामकाज में वह हमेशा कुछ-न-कुछ छिपाने की कोशिश करता है, लेकिन फिर भी वह इस बारे में सोचते हुए मन-ही-मन खुश होता रहता है और सोचता है, “इस तरह जीना बहुत अच्छा है। मैं दूसरों की आँखों में धूल झोंकता रहता हूँ, लेकिन वे मेरे साथ ऐसा नहीं कर पाते। जहाँ तक मेरे अपने हितों, गर्व, रुतबे और अभिमान की बात है, तो मैं लगभग हमेशा संतुष्ट रहता हूँ। चीजें मेरी योजनाओं के अनुसार, त्रुटिहीन ढंग से, निर्बाध रूप से चलती हैं, और कोई उनकी असलियत नहीं देख सकता।” क्या इस तरह का व्यक्ति ईमानदार बनने को तैयार है? नहीं। ऐसा व्यक्ति धोखेबाजी और कुटिलता को बुद्धिमत्ता और ज्ञान समझता है, सकारात्मक चीजें मानता है। वह इन चीजों को सँजोता है और इनके बिना बिल्कुल भी काम नहीं कर सकता। वह सोचता है, “यह आचरण करने का सही तरीका और जीने का एकमात्र पोषक ढंग है। केवल यही जीने का मूल्यवान तरीका है और केवल इसी तरीके से दूसरे मुझसे ईर्ष्या करेंगे और मेरा आदर करेंगे। शैतानी फलसफों के अनुसार न जीना मेरे लिए मूर्खता और बेवकूफी होगी। मैं हमेशा नुकसान उठाऊँगा—मुझे धौंस दी जाएगी, मेरे साथ भेदभाव और एक नौकर की तरह व्यवहार किया जाएगा। इस तरह जीने का कोई मूल्य नहीं है। मैं कभी ईमानदार व्यक्ति नहीं बनूँगा!” क्या इस तरह का व्यक्ति अपना कपटपूर्ण स्वभाव त्याग देगा और ईमानदार होने का अभ्यास करेगा? बिल्कुल नहीं। ऐसे लोगों ने चाहे कितने समय तक भी परमेश्वर में विश्वास किया हो, चाहे कितने भी प्रवचन सुने हों, और चाहे कितने ही सत्यों को समझा हो, वे कभी भी परमेश्वर का सच्चा अनुसरण नहीं करेंगे। वे कभी भी खुशी-खुशी परमेश्वर का अनुसरण नहीं करेंगे, क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसा करने के लिए उन्हें बहुत-कुछ त्यागना होगा, बहुत कुछ छोड़ना होगा, और कष्ट और नुकसान उठाने होंगे। वे यह सब स्वीकार नहीं करेंगे। वे सोचते हैं, “परमेश्वर में विश्वास रखने का अर्थ है केवल धर्म में विश्वास करना, केवल नाम का विश्वासी होना, कुछ अच्छे व्यवहार करना, और उनके पास कोई ऐसी चीज होना जो उन्हें आध्यात्मिक पोषण दे सके, बस इतना ही। मानो कि उन्हें कोई कीमत चुकाने, कष्ट उठाने और किसी भी चीज का त्याग करने की जरूरत ही नहीं है। अगर उनके दिलों में विश्वास है और वे परमेश्वर को स्वीकारते हैं, तो परमेश्वर में इस तरह की आस्था उन्हें बचाए जाने और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने देगी! इस तरह की आस्था बहुत लाभकारी है!” क्या ऐसे लोग अंत में सत्य हासिल कर पाएँगे? (नहीं।) क्या कारण है कि वे सत्य हासिल नहीं कर पाएँगे? उन्हें सकारात्मक चीजों से कोई प्रेम नहीं है, वे प्रकाश की लालसा नहीं करते, और वे परमेश्वर के मार्ग से या सत्य से प्रेम नहीं करते। वे सांसारिक प्रवृत्तियों का अनुसरण पसंद करते हैं, वे शोहरत, लाभ और रुतबे के प्रति आसक्त हैं, वे भीड़ से अलग दिखना पसंद करते हैं, वे शोहरत, लाभ और रुतबे की पूजा करते हैं, वे महान और प्रसिद्ध लोगों की वंदना करते हैं, लेकिन असल में वे दानवों और शैतानों की पूजा करते हैं। अपने दिलों में वे सत्य या सकारात्मक चीजों का अनुसरण नहीं करते, बल्कि ज्ञानार्जन की पूजा करते हैं। वे अपने दिलों में उन लोगों को स्वीकार नहीं करते, जो सत्य का अनुसरण करते हैं और परमेश्वर की गवाही देते हैं; इसके बजाय, वे ऐसे लोगों को स्वीकारते हैं और उनका आदर करते हैं, जिनमें विशेष प्रतिभाएँ और गुण होते हैं। परमेश्वर में अपनी आस्था में वे सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर नहीं चलते, बल्कि शोहरत, लाभ, रुतबे और सत्ता के पीछे भागते हैं, वे बहुत चालाक व्यक्ति बनने का प्रयास करते हैं, जो अप्रत्याशित तरीके से जीतने की धुन में रहते हैं; वे एक महान और प्रसिद्ध हस्ती बनने के लिए खुद को समाज के ऊपरी तबकों से जोड़ने का प्रयास करते हैं। वे चाहते हैं कि सभी अवसरों पर और जहाँ भी वे उपस्थित हों, उनका भक्ति भाव के साथ स्वागत-सत्कार किया जाए; वे लोगों के आदर्श बनना चाहते हैं। वे इसी तरह का व्यक्ति बनना चाहते हैं। यह किस तरह का मार्ग है? यह राक्षसों का मार्ग है, बुराई का मार्ग है। यह परमेश्वर के किसी विश्वासी द्वारा अपनाया जाने वाला मार्ग नहीं है। वे हर परिवेश में शैतान के फलसफों, उसके तर्कों, उसकी हर चाल और हर फरेब का इस्तेमाल करते हैं, ताकि लोगों को उनके व्यक्तिगत भरोसे के कारण ठगा जा सके और उनसे अपनी आराधना और अनुसरण करवाया जा सके। यह वह मार्ग नहीं है, जिस पर परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोगों को चलना चाहिए; न केवल ऐसे लोग बचाए नहीं जाएँगे, बल्कि उन्हें परमेश्वर का दंड भी मिलेगा—इसमें जरा भी संदेह नहीं हो सकता। इसका क्या आधार है कि किसी व्यक्ति को बचाया जा सकता है या नहीं? यह इस बात पर आधारित है कि क्या वे सत्य को स्वीकार सकते हैं, परमेश्वर के कार्य के आगे समर्पण कर सकते हैं, और सत्य के अनुसरण के रास्ते पर चल सकते हैं। यह इन्हीं कारकों से निर्धारित होता है। वह कौन-सा मार्ग है, जिस पर चलकर कोई व्यक्ति अपनी आस्था में परमेश्वर का उद्धार प्राप्त कर सकता है? उन्हें परमेश्वर का अनुसरण करना चाहिए, उसके वचनों को सुनना चाहिए, उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होना चाहिए और उसकी अपेक्षाओं और सत्य के अनुसार जीना चाहिए। यही एकमात्र मार्ग है, जिस पर चलकर कोई व्यक्ति उद्धार प्राप्त कर सकता है।
4 जनवरी 2018
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?