सत्य का अभ्यास करना क्या है? (भाग दो)
किसी व्यक्ति के मन में परमेश्वर के प्रति सच्ची आस्था कैसे पैदा होती है? अनुभव से। अनुभव से यह कैसे पैदा होती है? अगर तुम हर व्यक्ति, हर घटना, और हर चीज का सामना करते हुए परमेश्वर के इरादे खोजकर उस पर चिंतन-मनन कर सको, और इसके जरिए परमेश्वर को समझ सको, तो लंबे अनुभव के बाद, तुम धीरे-धीरे परमेश्वर की सच्ची समझ पा सकोगे—यह केवल शब्दों में समझ नहीं, बल्कि तुम्हारे भीतर की गहरी अंतर्दृष्टि होगी। जिस परमेश्वर में तुम्हारा दिल विश्वास रखता है और जिसे तुम्हारा मुख स्वीकार करता है, वह तुम्हारे दिल में रहता है, और कोई भी उसे तुमसे छीन नहीं सकता। यह ठीक अय्यूब की तरह है, जब उसे परीक्षणों से गुजारा गया तो उसके दोस्तों ने कहा, “तुमने पाप किया है, परमेश्वर का अपमान किया है। शीघ्र यहोवा परमेश्वर से क्षमा माँगो!” अय्यूब ने ऐसा नहीं सोचा, लेकिन क्यों? इस वजह से कि दशकों के जीवन के बाद, परमेश्वर के बारे में उसकी समझ अनुभव पर आधारित नहीं थी; उसने नहीं कहा : “परमेश्वर आशीष देता है, वह मनुष्य के प्रति दयालु है, और कभी उन्हें वंचित नहीं रखता।” उसने जो अनुभव किया वह यह था कि परमेश्वर मनुष्य को देता है, मगर छीन भी लेता है। जब वह मनुष्य को चीजें देता है तो कभी-कभी वह ताड़ना भी देता है, अनुशासित भी करता है और दंड भी देता है। परमेश्वर लोगों के साथ जो करता है वह इंसानों के मन, सोच या कल्पना से तय नहीं होता है। इसलिए अय्यूब के दशकों के जीवन-अनुभव ने उससे यह निष्कर्ष निकलवाया कि “यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है” (अय्यूब 1:21)। यानी परमेश्वर का हर कार्य, भले ही इंसान की नजरों में उसे अच्छा माना जाए या बुरा, उसके आयोजनों का अंश है। अगर बुरी घटनाएँ होनी हैं, तो भी शैतान परमेश्वर की अनुमति के बिना इंसान के खिलाफ कुछ करने की हिम्मत नहीं करता। मानवजाति परमेश्वर के हाथों में है, और उसकी संप्रभुता में उसे किसी भी बात का डर नहीं। अगर तुम शैतान के हाथों में पड़ भी गए, तो ऐसा परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन ही होगा, और परमेश्वर की अनुमति के बिना शैतान तुम्हें छूने की हिम्मत भी नहीं कर सकता। अय्यूब को इस स्तर की समझ थी, और इसलिए परमेश्वर के कुछ भी करने पर उसने शिकायत नहीं की। उसने साफ तौर पर देखा कि यहोवा परमेश्वर ही सच्चा परमेश्वर है जो सभी पर संप्रभु है, और वे तमाम देवदूत, दुष्ट आत्माएँ और दानव परमेश्वर नहीं हैं। सभी चीजों पर कौन संप्रभु है? मानवजाति और जो कुछ भी है, उस पर कौन संप्रभु है? परमेश्वर ही है। सामान्य शब्दों में कहें तो परमेश्वर महानतम है। किसी व्यक्ति का परिवार, उसकी जमा-पूँजी, वे अपने दिन आराम से या पीड़ा में गुजारते हैं, और उनका जीवनकाल—ये सब परमेश्वर के हाथ में हैं। अय्यूब को इस विषय का गूढ़ अनुभव था, और उसके जीवन में सिर्फ एक या दो बार का नहीं। जब भी कुछ घटा और वह समझ पाया कि यह परमेश्वर की संप्रभुता में हुआ है, तो यह उसकी स्मृति में गहरे अंकित हो गया। इससे उसे एक गूढ़ भावना और समझ मिली कि ये चीजें संयोग से या मनुष्य या शैतान की इच्छा से नहीं हुईं, बल्कि यह परमेश्वर का कार्य था, और वह इस बारे में शिकायत नहीं कर सका। ऐसे विकराल परीक्षणों से गुजरने पर अय्यूब ने निजी तौर पर क्या अनुभव किया? यह कि परमेश्वर सर्वोच्च है, परमेश्वर बुद्धिमान है। परमेश्वर चाहे जो भी करे, वह हमेशा उसकी प्रशंसा कर सकता है। अगर तुम्हारे साथ ऐसी चीजें घटती हैं मगर तुम इन्हें समझ नहीं पाते तो राय मत बनाओ या फैसला मत सुनाओ। अगर तुम नहीं जानते कि परमेश्वर का अच्छा इरादा क्या है तो इसे खोजो, प्रतीक्षा करो और फिर इसके प्रति समर्पण करो। अभ्यास करने का यही सबसे अच्छा तरीका है, सबसे अच्छा मार्ग है, वरना तुम अपमानित और शर्मिंदा होओगे। अय्यूब को इन चीजों की बहुत गहरी अनुभवजन्य समझ थी। अगर तुम हमेशा परमेश्वर को गलत समझते हो तो तुम कभी भी सत्य हासिल नहीं कर पाओगे और परमेश्वर के आशीष जब्त करा बैठोगे। बहुत-सी तकलीफें सहकर भी तुम कुछ हासिल नहीं कर पाओगे, क्योंकि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध असामान्य है, तुम परमेश्वर से परमेश्वर की तरह पेश नहीं आते, तुम उसके कार्य को नहीं समझते, और तुम सच में उसके प्रति समर्पण नहीं करते। इस कारण से तुम परमेश्वर का सच्चा ज्ञान हासिल नहीं कर पाओगे। परमेश्वर बोलता और कार्य करता है, तुम्हारे लिए वह चाहे कैसे भी अपने दिल का खून क्यों न खपाए, तुम्हारे लिए चाहे कैसा भी परिवेश बनाए, यह सब अंततः इसलिए है ताकि तुम परमेश्वर को जान सको। परमेश्वर को जान लेने के बाद उसके साथ तुम्हारा संबंध करीबी और ज्यादा सामान्य हो जाएगा। परमेश्वर किसी के उकता जाने से उसके साथ खिलवाड़ करना तो दूर, बिना किसी कारण के कुछ भी नहीं करता, और अगर लोग उसके कार्य का तरीका न समझ पाएँ तो यह सामान्य बात है। लेकिन उन्हें सत्य खोजना चाहिए और कम से कम परमेश्वर के बारे में फैसला नहीं सुनाना चाहिए—यही है एक विवेकशील व्यक्ति होने का अर्थ। जैसा कि पतरस ने कहा था, चाहे परमेश्वर लोगों के साथ खिलौनों जैसा बर्ताव करे या वह उनके साथ जैसे चाहे वैसा बर्ताव करे, वह हमेशा सही होता है। “अगर परमेश्वर मुझसे एक खिलौने जैसा बर्ताव करता, तो मैं तैयार और इच्छुक क्यों नहीं होता?” किस कारण से पतरस ने यह बात कही? (पतरस के अनुभव के कारण ये शब्द निकले। उसे एहसास हुआ कि परमेश्वर कुछ भी करे, उसके इरादे हमेशा नेक होते हैं।) कभी-कभी तुम परमेश्वर के इरादे नहीं समझ सकोगे, फिर तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम्हें प्रतीक्षा करने, उसे खोजने और पहचानने की कोशिश करनी चाहिए। हालाँकि अय्यूब और पतरस ने दो अलग समय में जीवन जिया, उनकी पृष्ठभूमि भिन्न थी, उन्होंने अलग-अलग चीजों का अनुभव किया, अलग-अलग वचन बोले, फिर भी अभ्यास के उनके तरीके और मार्ग एक ही थे, और घटनाएँ घटने पर परमेश्वर के प्रति उनका रवैया एक समान था। बस इतना ही अंतर था कि उन्होंने इस विचार को व्यक्त करने के लिए अलग भाषा का प्रयोग किया। लेकिन इससे लोग क्या समझते हैं? यह कि परमेश्वर क्या चाहता है यह खोजते और इसकी प्रतीक्षा करते समय, तुम्हें समर्पण का अभ्यास करना चाहिए। बेचैन न हो। सबसे पहले यह रवैया रखना ठीक है। चीजें घटने पर अगर तुम ज्यादा ही बेचैन हो जाते हो और सत्य खोजना न जानकर, परमेश्वर के बारे में शिकायत करते रहते हो, तो दिक्कत आएगी ही। कुछ लोग कहते हैं, “मुझे समझ नहीं आता! परमेश्वर हमसे इस तरह पेश क्यों आता है? अगर हमें दानव और शैतान समझा जाएगा तो मैं समर्पण नहीं कर सकता। यह अविवेकपूर्ण और अन्यायपूर्ण है!” जब तुम्हारा इंसानी मन, धारणाएँ, कल्पनाएँ, विद्रोहीपन और अवज्ञा काबू में न हों तो क्या तुम तब भी परमेश्वर का मार्गदर्शन पाने के योग्य हो? समर्पण इतना आसान नहीं है कि तुम कह दो कि मैं समर्पण करता हूँ या किसी धर्म-सिद्धांत का प्रचार कर दो या छोटा-सा संकल्प व्यक्त कर दो और थोड़ा-सा आत्म-संयम रख लो। यह इतना आसान नहीं है। अगर तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हो तो तुम्हारा अंतिम पुरस्कार उसके बारे में जानना, वह तुम्हारे लिए जो परिवेश खड़े करता है उन्हें समझना और वास्तविक समझ रखना है। यानी तुम परमेश्वर के हृदय और उसके श्रमसाध्य इरादों को समझोगे और यह समझोगे कि वह इस्पात न बनने वाले खराब लोहे से निराश हो जाता है। परमेश्वर नहीं चाहता कि तुम भ्रष्ट स्वभावों के साथ जियो, बल्कि यह चाहता है कि तुम उनसे बच निकलो। इसलिए उसे ऐसे तरीके इस्तेमाल करने होते हैं, जैसे कि न्याय करना, ताड़ना देना, काट-छाँट करना, फटकारना और अनुशासित करना, और वह भी ऐसे कि लगता है परमेश्वर तुम्हारी भावनाओं के प्रति असंवेदनशील है, मानो वह तुम्हें निंदित और दंडित कर रहा है, या तुम्हारे साथ खिलवाड़ कर रहा है। फिर तुम क्या करते हो? अगर तुम परमेश्वर के इस तरह कार्य करने पर भी उसके श्रमसाध्य इरादों की थाह ले सकते हो तो यही काफी है—तुम सचमुच समर्पण कर पाओगे। परीक्षण के दौरान अय्यूब ने कहा था, “यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है।” इस मामले में उसकी समझ क्या थी? “मेरी हर चीज यहोवा परमेश्वर की दी हुई है, और अगर वह चाहे तो इसे छीन सकता है, क्योंकि वह परमेश्वर है और उसके पास यह सामर्थ्य है। मुझे इनकार करने का कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि मेरे पास जो कुछ भी है उसी से मिला है।” अय्यूब ने यही समझा और अनुभव किया। उस समय उसका संकल्प क्या था? “मुझे परमेश्वर को समझना होगा, सूझ-बूझ वाली चीजें करनी होंगी, और एक विवेकशील इंसान बनना होगा। ये सब मुझे परमेश्वर ने दिया था, और वह कभी भी इन्हें छीन सकता है। मैं इस बारे में परमेश्वर से बहस करने की कोशिश नहीं कर सकता; ऐसा करना उसके खिलाफ विद्रोह करना होगा। परमेश्वर के कार्यों को ठुकराने से उसका दिल दुखेगा, और ऐसा करने पर मैं सच्चा नेक इंसान या सच्चा सृजित प्राणी नहीं रह पाऊँगा।” उस समय उसने ऐसे ही अभ्यास किया था, और इस अभ्यास के क्या परिणाम उसे मिले? दरअसल असली परिणाम यह नहीं था कि वह पहले से ज्यादा धनवान हो गया, या उसके पास पहले से ज्यादा मवेशी और भेड़ हो गए, या उसके पहले से ज्यादा सुंदर बच्चे हो गए। ये तो बस वे चीजें थीं जो उसे परमेश्वर के अनुग्रह के अतिरिक्त मिली थीं। इस अनुभव से, परमेश्वर ने वास्तव में जो उसे दिया, वह थी उसके बारे में उसकी बेहतर समझ, समर्पण, उसके साथ करीबी संबंध, और उसके दिल की समीपता। अय्यूब परमेश्वर के हर कार्य को समझ पा रहा था, और अब वह बेतुके या धृष्टतापूर्ण बातें नहीं कहता था, न ही ऐसी बातें कहता था, जो परमेश्वर का दिल दुखाते हों। क्या अपने भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा पाने का यह अर्थ नहीं है? शैतान अब तुम पर काबू नहीं कर सकता; तुम अब उसके नहीं, बल्कि परमेश्वर के नियंत्रण में हो। परमेश्वर जो भी करे, तुम समर्पण कर सकते हो, और तुम उसके बन चुके हो। उस समय अय्यूब की दशा ऐसी ही थी, उसका रवैया ऐसा ही था। इसके अलावा, उसने ऐसा करके वास्तविकता में प्रवेश किया, इस कारण से आखिरकार परमेश्वर उसके समक्ष प्रकट हुआ। क्या परमेश्वर के प्रकटन ने, चाहे वह किसी भी रूप में रहा हो, परमेश्वर के बारे में उसकी समझ को गहराई दी? (बिल्कुल दी।) हाँ, इससे यकीनन उसकी समझ को गहराई मिली। मूल रूप से, दंतकथाओं में परमेश्वर के बारे में सुनने से लेकर, उसके अस्तित्व की पुष्टि करने और उसे देखने तक—इनमें से तुम परमेश्वर द्वारा दिए जाने वाले अनुग्रह की तुलना में, मानवजाति के लिए बड़े आशीष किसे मानोगे? (परमेश्वर को देखना बड़ा आशीष है।) यकीनन। जब लोग परमेश्वर में विश्वास तो रखते हैं, मगर सत्य को नहीं समझते, तो वे हमेशा चाहते हैं कि परमेश्वर उनकी रक्षा करे, उन पर अनुग्रह बरसाए, उन्हें दूसरों से ऊपर उठाए और उनके पूरे परिवार को सुरक्षा और खुशहाली का आशीष दे। वे जहाँ भी जाते हैं, प्रचार करने में सक्षम होना चाहते हैं और चाहते हैं कि दूसरे उनसे ईर्ष्या करें और उनकी सराहना करें। लोग बस यही चाहते हैं, लेकिन उन्हें उस महानतम आशीष का ज्ञान नहीं है जो परमेश्वर देना चाहता है। वे सिर्फ बाहरी भौतिक अनुग्रह पाना चाहते हैं, मगर उनके सारे अनुरोध उन्हें परमेश्वर के हृदय से बहुत दूर ले जाते हैं। वे सबसे महान सौभाग्य गँवा देते हैं, और परमेश्वर के आशीष खो देते हैं। अगर तुम परमेश्वर को नहीं जान सकते, और सत्य प्राप्त नहीं कर सकते, तो क्या तुम उसकी मौजूदगी में जी सकने में समर्थ हो? क्या तुम सच में परमेश्वर की सभी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कर सकते हो? यह बिल्कुल नामुमकिन है।
सत्य को अभ्यास में लाने और सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने की प्रक्रिया, वास्तव में खुद को समझने और अपने भ्रष्ट स्वभाव का त्याग करने की प्रक्रिया है। यह परमेश्वर से आमने-सामने सहभागिता करने और उसे जान पाने की भी प्रक्रिया है। तुम कहते हो कि तुमने सत्य को अभ्यास में लाया है, मगर फिर तुम परमेश्वर को कैसे नहीं जानते? परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंध में समीपता क्यों नहीं आई है? तुम कहते हो कि तुम हर दिन प्रार्थना कर उसके सामने अपना दिल खोल देते हो, तो क्या समय की इस अवस्था में तुम खुद को उसके करीब महसूस करते हो? क्या तुम्हें लगता है कि परमेश्वर में तुम्हारी आस्था बढ़ी है? इस दौरान, क्या तुम्हें लगता है कि तुमने परमेश्वर की ज्यादा समझ हासिल की है, उसके बारे में तुम्हारी शिकायतें कम हुई हैं, और तुम उसे पहले से कम गलत समझते हो और उसके खिलाफ कम विद्रोह करते हो? अगर तुम्हें खुद में ऐसा कुछ भी नजर नहीं आता, और तुम पहले जैसे ही हो, तो तुमने सत्य को अभ्यास में नहीं लाया है, समय बरबाद किया है, सिर्फ प्रयास किया है। कोई भी तुम्हें श्रम करने या प्रयास करने को मजबूर नहीं कर रहा है, और इसी तरह कोई भी तुम्हें सत्य का अभ्यास करने से रोक नहीं रहा है। इसे तुमने खुद चुना है और तुम ही श्रम करने के मार्ग पर चल रहे हो। अगर लोग सत्य को अभ्यास में नहीं लाते या सत्य का अनुसरण नहीं करते, तो वे श्रमिक बनने से नहीं बच सकते। सत्य को अभ्यास में लाना लोगों के लिए बेहद मुश्किल है। वे नहीं जानते कि परमेश्वर के प्रति आत्मसमर्पण कैसे करें, और हमेशा कड़ी मेहनत करके संतुष्ट हो जाते हैं। आखिरकार किसी तरह कुछ धर्म-सिद्धांतों को समझ लेने के बाद, वे नहीं जान पाते कि सत्य को अभ्यास में कैसे लाएँ। इसके बजाय, वे दोबारा श्रम करने में लग जाते हैं, मगर उन्हें इसका एहसास तक नहीं होता। इसलिए, तुम्हें समय-समय पर आत्म-चिंतन करने, खुद को जाँचने, और इस दौरान हुई प्राप्तियों पर भाई-बहनों के साथ संगति करने में समय लगाना चाहिए। तुम कहते हो, “मेरे मन में अभी भी परमेश्वर को लेकर बहुत-सी गलतफहमियाँ हैं, और मैं अभी तक उनमें से बहुत-सी गलतफहमियों को सुलझा नहीं पाया हूँ।” कोई दूसरा व्यक्ति कहता है, “इन दिनों मुझे लगता है कि मुझे परमेश्वर के हृदय की थोड़ी समझ हासिल हुई है। मानवजाति को दुख सहने देना परमेश्वर के लिए अच्छी बात है। मैं कष्ट सहने से डरता था, और दुख-दर्द आने पर छुप जाना या भाग जाना चाहता था। अब मुझे लगता है कि लोग केवल थोड़ा दुख-दर्द सहने के बाद ही परमेश्वर के समक्ष शांतचित्त होकर बैठ सकते हैं, और अपना ध्यान बाहरी मामलों में भटकने से रोक सकते हैं। पीड़ा सहना अच्छा है, इसलिए लोगों का परीक्षण और शोधन करने के लिए परमेश्वर हमेशा कठिन परिवेश खड़े करता है। मुझे लगता है कि मैं परमेश्वर का थोड़ा-बहुत प्रयोजन और श्रमसाध्य इरादे को समझता और महसूस करता हूँ। परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह अच्छा होता है!” तुम्हें इसी तरह संगति करनी चाहिए। तुम संगति करके बहुत लाभ पाओगे। अगर कुछ लोग अपने खाली समय में गपशप करने, दूसरों पर राय बनाने या बहस छेड़ने वाली अन्य बातें कहने के लिए इकट्ठा हो जाएँ, तो भले ही ऐसा लग सकता है कि वे परमेश्वर में अपनी आस्था या जीवन अनुभवों के बारे में बातें कर रहे हैं, लेकिन अगर उनके दिलों में सुकून नहीं है, तो उन्हें यह अभ्यास करना चाहिए कि सत्य को कैसे खोजें और कैसे उसके लिए प्रयास करें, और कैसे परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी करने के प्रयास करें। अगर तुम हमेशा सत्य का इस तरह अनुसरण करोगे, तो पवित्र आत्मा तुम्हारे भीतर कार्य कर तुम्हें प्रबुद्ध करेगा। तुम्हारे अंदर जिन सत्यों की कमी है, उन्हें अनुसरण के लायक बोझ मानो, अभ्यास और अनुभव करो, और सत्य प्राप्त करने का प्रयास करो। तुम्हें इसे कैसे अभ्यास में लाना चाहिए? तुम्हें उस व्यक्ति की तलाश करनी चाहिए और उससे मार्गदर्शन माँगना चाहिए, जिसे उन बातों के बारे में सत्य की समझ हो जिन्हें तुम नहीं समझ पाते या पकड़ नहीं पाते। अगर तुम हमेशा इस तरह अभ्यास करोगे, तो तुम सत्य को और अधिक समझ पाओगे और बहुत लाभान्वित होगे। ज्यादातर समय तुम लोग सत्य पर संगति करने का तरीका नहीं जानते, सिर्फ काम पर चर्चा करने पर ध्यान देते हो, और हमेशा सिद्धांतों की नहीं, तरीकों की चर्चा करते हो। यह विषयांतर है, जबकि दरअसल तुम्हें काम के बारे में चर्चा करते समय, सत्य सिद्धांतों से जुड़े मामलों पर संगति करनी चाहिए; इससे तुम्हारे खुद के जीवन प्रवेश को लाभ पहुँचेगा। जब तुम सत्य सिद्धांतों से जुड़े मामलों पर स्पष्ट संगति कर चुके होगे, तो तुम्हें जीवन प्रवेश का मार्ग मिलेगा। यह काम करने और कर्तव्य निभाने के लिए ही नहीं, तुम्हारे खुद के जीवन प्रवेश के लिए भी लाभकारी है। क्या यह दोनों हाथों में लड्डू होना नहीं है? तुम्हें परमेश्वर में अपने विश्वास के अनुभव के बारे में शुद्ध और खुले तौर पर संगति करनी चाहिए, ताकि तुम्हें परिणाम मिलें और जीवन प्रवेश हासिल हो। हमेशा गपशप करने या राय बनाने का जीवन प्रवेश में कोई फायदा नहीं है, और इससे व्यक्ति परमेश्वर में विश्वास रखकर उद्धार पाने का अपना मौका खो देता है। परमेश्वर में विश्वास रखने का अर्थ है कि व्यक्ति को हमेशा सत्य को अभ्यास में लाने पर ध्यान देना चाहिए। तुम जितना इसे अभ्यास में लाओगे, तुम्हारे लिए उद्धार के अवसर उतने ही अधिक होंगे। अगर तुम सत्य को बहुत कम समझते हो, तो तुम्हें इसे और ज्यादा खोजना चाहिए। सत्य की समझ हासिल करके और इसे अभ्यास में लाकर ही, तुम वास्तविक बदलाव का अनुभव कर सकते हो, और उद्धार की अधिक और सुनिश्चित आशा पा सकते हो।
16 जुलाई 2017
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