मद पाँच : वे लोगों को गुमराह करने, फुसलाने, धमकाने और नियंत्रित करने का काम करते हैं (खंड दो)
मसीह-विरोधियों द्वारा लोगों को गुमराह करने, फुसलाने, धमकाने और नियंत्रित करने का गहन-विश्लेषण
I. मसीह-विरोधियों द्वारा लोगों को गुमराह करने का गहन-विश्लेषण
पिछली सभा में, हमने मसीह-विरोधियों की विभिन्न अभिव्यक्तियों की चौथी मद पर अपनी संगति पूरी की थी। आज, हम पाँचवीं मद पर संगति शुरू करेंगे : मसीह-विरोधियों द्वारा लोगों को गुमराह करना, फुसलाना, धमकाना और नियंत्रित करना। मसीह-विरोधियों की अभिव्यक्तियों के इस पहलू में चार क्रियाएँ शामिल हैं और इन चार क्रियाओं और मसीह-विरोधियों के व्यवहार से हम उनके स्वभाव को देख सकते हैं। पहली क्रिया है “गुमराह करना।” इसमें किस तरह का स्वभाव निहित है? यह दुष्टता है। अब, “फुसलाने” के बारे में क्या विचार है? फुसलाने में आमतौर पर प्रिय शब्दों का उपयोग किया जाता है या अप्रिय शब्दों का? (प्रिय शब्दों का।) तो, किस तरह का स्वभाव इस व्यवहार को नियंत्रित करता है? दुष्टता। “धमकाने” और “नियंत्रित करने” के बारे में क्या विचार है—कौन-सा स्वभाव इन्हें नियंत्रित करता है? (क्रूरता।) सही कहा, क्रूरता। पाँचवीं मद से हम मसीह-विरोधियों के स्वभाव को देख सकते हैं। इस मद में मसीह-विरोधियों की प्राथमिक अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? (दुष्टता और क्रूरता।) दुष्टता और क्रूरता के ये दो स्वभाव बहुत ही प्रमुख और स्पष्ट होते हैं। आओ इन व्यवहारों पर एक-एक करके चर्चा करें, “गुमराह करने” से शुरू करते हैं। “गुमराह करने” का आमतौर पर क्या मतलब होता है? क्या इसमें ईमानदारी की कोई अभिव्यक्ति शामिल है? क्या इसमें कोई ईमानदार शब्द हैं? (नहीं हैं।) इसमें कोई ईमानदार शब्द नहीं हैं—इसमें सब झूठ है, इसमें एक व्यक्ति गलत प्रभावों, झूठे कथनों और भ्रामक शब्दों का उपयोग कर दूसरों को यह विश्वास दिलाता है कि जो कुछ वह कहता है वह सही है जिससे दूसरे लोग उसे स्वीकार कर उस पर भरोसा कर लें। “गुमराह करने” का यही अर्थ है। क्या गुमराह किए गए लोग सत्य प्राप्त करते हैं या सही रास्ते पर चलते हैं? वे इनमें से कुछ भी हासिल नहीं करते हैं। लोगों को गुमराह करने का व्यवहार और अभ्यास निश्चित रूप से सकारात्मक के बजाय नकारात्मक है। जो लोग गुमराह किए गए हैं वे मूल रूप से ठगे गए हैं; वे वास्तविक तथ्यों, वास्तविक स्थिति या सही संदर्भ को नहीं समझते हैं और फिर वे गलत मार्ग और दिशा और गलत व्यक्ति का अनुसरण करना चुनते हैं। गुमराह करने का यह प्रभाव उन लोगों पर पड़ता है जो इसके झाँसे में आ जाते हैं। यह शॉपिंग मॉल में विज्ञापनों की तरह है : वे बहुत अच्छे से लिखे गए होते हैं और जब लोग उन्हें देखते हैं तो वे उन्हें सच मान लेते हैं, लेकिन खरीदारी करने के बाद उन्हें पता चलता है कि वे उत्पाद बेकार हैं। इसे धोखा खाना कहते हैं। तो, मसीह-विरोधियों के इस तरह से लोगों को गुमराह करने वाला व्यवहार करने के पीछे क्या उद्देश्य है? वे कौन-से तरीके अपनाते हैं, वे कौन-से शब्द कहते हैं और लोगों को गुमराह करने के लिए वे क्या-क्या करते हैं? आओ, सबसे पहले उनके उद्देश्य के बारे में बात करते हैं। अगर उनका कोई उद्देश्य ही नहीं होता तो क्या उन्हें लोगों को फुसलाने और गुमराह करने के लिए प्रयास करने या सुखद बातें कहने की आवश्यकता होती? अविश्वासियों के बीच एक कहावत है, “मुफ्त की दावत जैसी कोई चीज नहीं होती है।” अगर तुम इसे नहीं समझ सकते तो तुम धोखा खाओगे। दुनिया इतनी दुष्ट है, लोग एक-दूसरे के खिलाफ साजिश करते हैं और एक-दूसरे को गाली देते हैं। भ्रष्ट मानवता का जीवन यही है। मसीह-विरोधी लोगों को गुमराह करने के लिए गोल-गोल बातें करने में क्यों मेहनत करते हैं? वे एक स्पष्ट उद्देश्य से बोलते और कार्य करते हैं, जो सत्ता और लोगों पर नियंत्रण के लिए होड़ करना है—इसमें कोई संदेह नहीं है। उनके उद्देश्य राजनेताओं के उद्देश्यों से अलग नहीं हैं। तो, मसीह-विरोधी लोगों को गुमराह करने के लिए कौन-सी रणनीति अपनाते हैं? वे ऐसा कैसे करते हैं? सबसे पहले, वे तुम्हें अपने जैसा बनाते हैं। एक बार जब तुम उनके बारे में अच्छी धारणा बना लेते हो तो तुम उनसे सावधान नहीं रहोगे : तुम उन पर भरोसा करोगे और फिर तुम उनकी अगुआई को स्वीकार कर स्वेच्छा से उनकी आज्ञा का पालन करोगे। तुम उनकी कही हुई हर बात को और उनके कहे हुए हर काम को सुनने के इच्छुक होगे। सुनने का इच्छुक होने का क्या मतलब है? इसका मतलब है विवेक का अभ्यास न करना और सिद्धांतों के बिना सुनना और आज्ञापालन करना। क्या मसीह-विरोधी निंदा के शब्दों या तरीकों का उपयोग करके लोगों को गुमराह करने का प्रभाव प्राप्त कर सकते हैं? बिल्कुल नहीं। तो, इस प्रभाव को प्राप्त करने के लिए वे आमतौर पर कौन-से तरीके अपनाते हैं? अधिकतर वे ऐसे शब्दों का उपयोग करते हैं जो मानवीय धारणाओं के साथ-साथ मानवीय भावनाओं के सिद्धांतों से भी मेल खाते हैं। कभी-कभी वे कुछ ऐसे शब्द और धर्म-सिद्धांत भी बोलते हैं जो सत्य से मेल खाते हैं। इससे उनके लिए लोगों को गुमराह करने का अपना लक्ष्य हासिल करना आसान हो जाता है और लोगों द्वारा उन्हें स्वीकारने की संभावना भी होती है। उदाहरण के लिए, जब भाई-बहन कुछ गलत करते हैं, जिससे कलीसिया के काम को नुकसान होता है और वे निराश और कमजोर महसूस करते हैं तो मसीह-विरोधी उनका समर्थन करने और उनकी मदद करने के लिए सत्य की संगति नहीं करते हैं। इसके बजाय वे कहते हैं, “लोगों का कमजोर होना एक सामान्य घटना है—यह सामान्य है। मैं भी अक्सर कमजोर हो जाता हूँ। परमेश्वर इन चीजों को याद नहीं रखता।” वास्तव में, क्या वे जानते हैं कि परमेश्वर इन चीजों को याद रखता है या नहीं? नहीं, वे नहीं जानते। वे कहते हैं, “इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस मामले को ठीक से संभाला नहीं गया। बस अगली बार इसे ठीक कर लेना। परमेश्वर के घर को नहीं पता है और कोई भी इसकी जाँच नहीं कर रहा है। जब तक मैं इसके बारे में ऊपर नहीं बताता, तब तक ऊपरी अगुआओं को इसके बारे में पता नहीं चलेगा, ऊपरवाले को तो निश्चित रूप से पता नहीं चलेगा और फिर परमेश्वर को भी नहीं पता चलेगा—इसलिए, परमेश्वर इस मामले पर ध्यान नहीं देगा। हम सभी भ्रष्ट लोग हैं; भ्रष्टता तुममें है और मुझमें भी। एक अगुआ के रूप में, मैं एक अभिभावक की तरह हूँ : तुम लोग जो भी गलतियाँ करते हो, वे मेरी जिम्मेदारी हैं। यह मेरी गलती है कि मेरा आध्यात्मिक कद छोटा है और मैं तुम लोगों को सहारा और सहायता नहीं दे पाया, जिसके कारण तुम लोग गलत ढंग से काम कर बैठे। अगर मेरा आध्यात्मिक कद बड़ा होता तो मैं तुम लोगों की मदद कर सकता था और तुम लोगों ने कोई गलती नहीं की होती। इस मामले की जिम्मेदारी मेरी है। हालाँकि इससे कलीसिया के काम को कुछ नुकसान हुआ होगा, लेकिन हम इसे खुद ही सुलझा सकते हैं और मामला यहीं खत्म हो जाएगा। किसी को भी इस मामले में पूछताछ नहीं करनी चाहिए और इसकी सूचना उच्च अधिकारियों को नहीं देनी चाहिए; इसे तुम्हारे और मेरे बीच ही रहने दो। अगर मैं दूसरे भाई-बहनों को इस बारे में नहीं बताता तो कोई भी इसकी सूचना उच्च अधिकारियों को नहीं देगा और मामला खत्म हो जाएगा। हमें बस प्रार्थना करनी है और परमेश्वर के सामने शपथ लेनी है कि हम फिर कभी ऐसा कुछ नहीं करेंगे या ऐसी गलती नहीं करेंगे। एक अगुआ के तौर पर मेरी जिम्मेदारी है कि मैं तुम लोगों की सुरक्षा करूँ। परमेश्वर इतना ऊँचा है—क्या उससे सुरक्षा माँगना हमारे लिए यथार्थवादी है? इसके अलावा, परमेश्वर लोगों के जीवन में इन तुच्छ मामलों की परवाह नहीं करता है, इसलिए तुम लोगों की रक्षा करने की जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से एक अगुआ के तौर पर मेरे कंधों पर आती है। तुम लोगों का आध्यात्मिक कद छोटा है, इसलिए यदि तुम कोई गलती करते हो तो दोष मैं लूँगा। चिंता मत करो, यदि ऐसा समय आता है कि कुछ वास्तव में गलत हो जाता है और ऊपरवाले को इसका पता चल जाता है या ऊपरवाला यह जान जाता है तो मैं तुम लोगों के लिए खड़ा रहूँगा।” जब लोग यह सुनते हैं तो वे सोचते हैं, “कितनी अच्छी बात है! मैं जिम्मेदारी लेने को लेकर बहुत चिंतित था—यह अगुआ बहुत बढ़िया है!” क्या उन्हें गुमराह नहीं किया गया है? क्या मसीह-विरोधियों ने जो कुछ कहा है उसमें कुछ ऐसा है जो सत्य के अनुरूप है? क्या ऐसा कुछ है जो लोगों के लिए फायदेमंद या शिक्षाप्रद है? क्या ऐसा कुछ है जो सिद्धांतों के आधार पर मामलों को सँभालता है? (नहीं।) तो, ये किस तरह के शब्द हैं? ये ऐसे शब्द हैं जो संबंध बनाने के लिए मानवीय भावुकताओं, सहानुभूति और क्षमा का उपयोग करते हैं, रिश्ते को एक निश्चित स्तर तक ले जाने के लिए भावनाओं और मित्रता पर जोर देते हैं, जिससे लोगों को लगता है कि मसीह-विरोधी विशेष रूप से समझदार हैं, विशेष रूप से लोगों को क्षमा करने वाले और सहनशील हैं। लेकिन इसमें कोई सिद्धांत या सत्य नहीं हैं। यह सतही समझ क्या है? यह सिर्फ चीजों को छुपाना है, यह एक बच्चे को बहलाने जैसा है। यहाँ कौन-सी रणनीति अपनाई जा रही है? भाई-बहनों के हितों की कीमत पर और परमेश्वर के घर के हितों के साथ विश्वासघात करके लोगों को मूर्ख बनाने और गुमराह करने के अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए उन्हें बहलाना, बरगलाना, संबंध बनाना, चीजों को छुपाना और एक अच्छा इंसान होने का दिखावा करना है। इसका अंतिम परिणाम क्या है? यह लोगों को परमेश्वर से दूर करता है, परमेश्वर के खिलाफ सावधान रहने के लिए बाध्य करता है और मसीह-विरोधियों के करीब ले जाता है। गुमराह होने के बाद भी, ये लोग कहते हैं, “जब मैंने वह गलती की तो मैं बहुत चिंतित था। मैंने परमेश्वर से कई बार प्रार्थना की, लेकिन उसने मुझे सांत्वना नहीं दी। मैं अपने दिल में अस्थिरता और बेचैनी महसूस कर रहा था और मुझे परमेश्वर से कोई समाधान नहीं मिल पाया। लेकिन अब सब ठीक है; जब तक मैं अगुआ के पास जाता रहूँगा, मेरी सारी समस्याएँ हल हो जाएँगी। मैं वाकई बहुत भाग्यशाली हूँ कि मुझे ऐसा अगुआ मिला है। हमारा अगुआ सभी से बेहतर है!” इस समय, उनके दिल और दृष्टिकोण पहले से ही मसीह-विरोधियों की ओर मुड़ चुके हैं और वे उनके द्वारा नियंत्रित हो चुके हैं। वे मसीह-विरोधियों द्वारा कैसे नियंत्रित हो सकते हैं? क्योंकि उन्हें इन मसीह-विरोधियों में सुरक्षा की भावना मिलती है। उन्हें सहानुभूति मिलती है और उनके दिल की गहराई में उन्हें संतुष्टि और आराम मिलता है। यह दर्शाता है कि उन्हें गुमराह किया गया है।
अतीत में, ऊपरवाले को पता चला कि किसी कलीसिया में खराब मानवता वाला कोई व्यक्ति है, जो बिना किसी पश्चात्ताप के लगातार बाधा और गड़बड़ी पैदा करने वाले काम कर रहा है, इसलिए उसने स्थानीय कलीसिया के अगुआ से कहा कि इस व्यक्ति को दूर करो। जब स्थानीय कलीसिया अगुआ ने यह सुना तो उसने सोचा, “उसे दूर करो? मुझे इस बारे में सोचना होगा। वह मेरे ही लोगों में से एक है—तुम लोग उसे ऐसे ही दूर नहीं कर सकते। मुझे उसके बचाव के लिए खड़ा होना होगा। ऊपरवाले को मामले की वास्तविक स्थिति समझ में नहीं आती। उसे ऐसे ही दूर करने की कोशिश करना वाकई हदें पार करना है। उसका दिल टूट जाएगा!” वह मौखिक रूप से उस व्यक्ति को दूर करने के लिए सहमत हो गया, लेकिन उसके दिल में ऐसा करने का कोई इरादा नहीं था। क्या तुम अनुमान लगा सकते हो कि वह इससे कैसे निपटा होगा? उसने इस पर विचार किया, “मैं इस स्थिति से इस तरह कैसे निपट सकता हूँ कि नीचे के लोग मेरे उनके अगुआ होने से संतुष्ट हों और ऊपरवाला मुझसे घृणा न करे?” इस पर विचार करने के बाद, उसने एक योजना बनाई। उसने सभी को एक साथ सभा में बुलाया और कहा, “आज, हमारे पास निपटने के लिए एक विशेष मामला है। यह क्या है? कोई ऐसा व्यक्ति है जिससे ऊपरवाला बहुत संतुष्ट नहीं है और वह उसे दूर करना चाहता है। तो, हमें इसके बारे में क्या करना चाहिए? आओ, हम सभी मतदान करके तय करें कि उसे दूर करना है या नहीं।” मतों की गणना की गई, और लगभग 80-90% लोगों ने उस व्यक्ति को दूर करने के लिए सहमति व्यक्त की, लेकिन कुछ व्यक्ति इससे असहमत भी थे। हम इस बारे में बात नहीं करेंगे कि ये असहमत लोग दुष्ट व्यक्ति के कट्टर अनुयायी थे या उन्होंने अन्य कारणों से ऐसा किया, बात जो भी हो, कुछ लोग असहमत थे और सभी की राय एक नहीं थी। फिर अगुआ ने कहा, “मतदान के माध्यम से मैंने देखा है कि अलग-अलग मत हैं। यह एक महत्वपूर्ण मामला है और हमें इन मतों का सम्मान करना चाहिए। हमें लोकतंत्र का पालन करने की आवश्यकता है। देखो, पश्चिमी लोकतांत्रिक प्रणाली कितनी महान है : हमें कलीसिया में भी उसी तरह का अभ्यास करना चाहिए, हमें लोकतंत्र और मानवाधिकारों को प्राप्त करने के लिए अपनी पूरी क्षमता से प्रयास करना चाहिए। अब, चूँकि कुछ विरोधी मत हैं, इसलिए हम इस व्यक्ति को दूर नहीं कर सकते। हमें अपने भाई-बहनों की राय का सम्मान करना चाहिए। भाई-बहन कौन हैं? वे परमेश्वर के चुने हुए लोग हैं! हम उनकी राय को अनदेखा नहीं कर सकते। परमेश्वर के चुने हुए लोगों में से अगर कोई एक भी असहमत हो तो हम दूर करने की इस कार्रवाई को आगे नहीं बढ़ा सकते।” वास्तव में, उसने जो कहा उसका कोई आधार नहीं था, परमेश्वर ने कभी ऐसी बातें नहीं कही हैं। वह बस बकवास कर रहा था। बाद में जब ऊपरवाले ने पाया कि दुष्ट व्यक्ति अभी भी दूर नहीं हुआ है तो उसने स्थानीय अगुआ से इस काम को जल्दी करने के लिए कहा। उसने वादा करते हुए कहा, “ठीक है, यह जल्द ही हो जाएगा।” उसके वादे का क्या मतलब था? इसका मतलब था कि वह टाल-मटोल करेगा। उसने सोचा, “तुम मुझसे उसे दूर करने के लिए कह रहे हो, लेकिन मैं यह तुरंत नहीं कर सकता। कौन जाने, अगर पर्याप्त समय बीत जाता है तो शायद तुम लोग इसे भूल जाओ और मुझे उसे दूर करने की जरूरत ही नहीं पड़े।” बाद में, उसने सभी को एक और सभा के लिए बुलाया और फिर से मतदान के लिए कहा। संगति और पहचान लेने से, यह सभी को स्पष्ट हो गया कि उस व्यक्ति को वास्तव में दूर करने की आवश्यकता है। विरोधी मत कम हो गए, लेकिन उसे दूर करने के खिलाफ अभी भी एक मत था। फिर से अगुआ ने उसे यह कहते हुए दूर नहीं किया, “जब तक उसे दूर करने के खिलाफ एक भी मत है, हम उसे दूर नहीं कर सकते।” अधिकांश लोगों ने सोचा, “यदि ऊपरवाले ने दूर करने का आदेश दिया है तो उसे दूर कर दो। निश्चित रूप से ऊपरवाला इस मामले को स्पष्टता से देख सकता है? यकीनन उसने कोई गलती नहीं की?” क्या ऊपरवाले की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना एक सिद्धांत है? क्या यह सत्य है? (हाँ।) इस अगुआ को नहीं पता था कि यह सत्य है। उसने क्या किया? उसने कहा, “अभी भी एक मत उसे दूर करने के खिलाफ है, इसलिए हम ऐसा नहीं कर सकते। हमें अपने भाई-बहनों की राय का पूरी तरह से सम्मान करना चाहिए। इसे ही सर्वोच्च मानवाधिकार कहा जाता है।” बाद में जब ऊपरवाले ने फिर से मामले के बारे में पूछताछ की तो अगुआ उनके साथ लापरवाही से पेश आता रहा और टाल-मटोल करता रहा। आखिरकार, जब ऊपरवाले ने देखा कि वह दुष्ट व्यक्ति को दूर नहीं कर रहा है तो उसने उस अगुआ को भी बर्खास्त करके दूर कर दिया। ऊपरवाले ने उसे अगुआ बनाया और उसने उसकी बात नहीं सुनी; ऊपरवाले के पास उसे इस्तेमाल करने और बर्खास्त करने का अधिकार है—यह एक प्रशासनिक आदेश है। इसके बाद उसके सहयोगियों को भी दूर कर दिया गया। क्या ऊपरवाले की व्यवस्थाओं पर सभी को मतदान करने की आवश्यकता है? (नहीं।) क्यों नहीं? तुम इसका कारण नहीं बता सकते; ऐसा लगता है कि तुम उस गुमराह अगुआ से काफी मिलते-जुलते हो, है ना? मुझे बताओ, क्या ये शब्द जिन पर मैं तुम लोगों के साथ संगति कर रहा हूँ, धर्म-सिद्धांत हैं या वास्तविकताएँ? (वास्तविकताएँ।) अगर लोग इनका अभ्यास करें और इन्हें लागू करें तो क्या यह सटीक होगा? (हाँ।) अगर यह सटीक है तो क्या सभी के लिए इस पर मत डालकर अपनी राय देना आवश्यक है? (नहीं।) क्या ऊपरवाला किसी को दूर करने का आदेश देकर उसके साथ गलत कर सकता है? बिल्कुल नहीं। तो, जब ऊपरवाले ने इस दुष्ट व्यक्ति को दूर करने का आदेश दिया और इस अगुआ ने इसे लागू करने से इनकार कर दिया तो यहाँ समस्या क्या थी? (खुली अवज्ञा।) यह सिर्फ खुली अवज्ञा से कहीं ज्यादा है, यह एक स्वतंत्र राज्य का निर्माण करना है। जब ऊपरवाले ने दुष्ट व्यक्ति को दूर करने का आदेश दिया तो इस नकली अगुआ ने उसे टाल दिया और इसे लागू नहीं किया और यहाँ तक कि उसने मतदान भी कराया और जनमत सर्वेक्षण किया। वह किस जनमत का सर्वेक्षण कर रहा था? जनमत क्या है? बहुमत क्या है? क्या बहुसंख्यक लोग सत्य समझते हैं या उनके पास सत्य है? (नहीं।) ज्यादातर लोगों में विवेक ही नहीं है तो क्या वे सत्य समझने वाले लोग हो सकते हैं? इस अगुआ ने जनमत सर्वेक्षण भी किया—क्या इससे वास्तव में कोई समस्या हल हो सकती है? क्या यह आवश्यक है? बहुसंख्यक लोगों में विवेक की कमी है और ऊपरवाले ने व्यक्तिगत रूप से दुष्ट व्यक्ति की निगरानी की और उसे दूर करने का आदेश दिया, लेकिन इस मसीह-विरोधी ने टाल-मटोल की और उस दुष्ट व्यक्ति को दूर नहीं किया, बल्कि एक दुष्ट व्यक्ति को आश्रय और सुरक्षा प्रदान की, उसे कलीसिया में रहने दिया और बाधा डालने दी। जहाँ भी दुष्ट लोग मौजूद हैं, वहाँ अराजकता है और व्यवस्था की कमी होती है। परमेश्वर के चुने हुए लोग अपने कर्तव्यों को सामान्य रूप से नहीं कर सकते हैं और कलीसिया का कार्य सामान्य रूप से नहीं चल सकता है। केवल दुष्ट लोगों को तुरंत दूर करने से ही यह सुनिश्चित हो सकता है कि कलीसिया का कार्य सामान्य रूप से चले। हालाँकि, जहाँ मसीह-विरोधी सत्ता में हैं वहाँ जो लोग परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान पहुँचाते हैं, बाधा डालते हैं, गैर-वाजिब तरीके से काम करते हैं और अपने कर्तव्यों का पालन बिना किसी ईमानदारी के करते हैं, उन्हें दूर नहीं किया जा सकता है। मसीह-विरोधी बेकाबू होकर कलीसिया में बुरी चीजें करते हुए उन बुरे लोगों और छद्म-विश्वासियों को आश्रय और सुरक्षा देते हैं। वे किस बहाने से ऐसा करते हैं? इस बहाने से कि वे अधिकारी हैं, इसलिए उन्हें अन्य लोगों का मालिक होना चाहिए। वे परमेश्वर के घर में खुद को बतौर अधिकारी पेश करते हैं और वे अन्य लोगों के मालिक बनना चाहते हैं। मुझे बताओ, मनुष्य का मालिक कौन है? (परमेश्वर।) परमेश्वर और सत्य मनुष्य के मालिक हैं। वे मसीह-विरोधी कुछ भी नहीं हैं! वे इन लोगों के मालिक बनना चाहते हैं, लेकिन वे यह भी नहीं जानते कि उनका मालिक कौन है! क्या वे बदमाश नहीं हैं? मसीह-विरोधी इस तरीके का उपयोग लोगों को यह बताने के लिए करते हैं : “मैं तुम लोगों का मालिक हो सकता हूँ। यदि तुम लोगों को कोई शिकायत है, कोई असंतोष है, या यदि तुमने कोई अन्याय या कठिनाई झेली है तो मैं, तुम्हारे अगुआ के रूप में, तुम लोगों के लिए इसे ठीक कर सकता हूँ।” जो लोग सत्य या वास्तविक तथ्य नहीं समझते हैं, वे फिर उन मसीह-विरोधियों द्वारा गुमराह कर दिए जाते हैं। वे उन्हें पूर्वज और परमेश्वर मानते हैं, उनका अनुसरण तथा उनकी आराधना करते हैं। जो लोग सत्य समझते हैं, वे ऐसे मसीह-विरोधियों का सामना करने पर कैसा महसूस करते हैं? वे उनसे घृणा करते और उन्हें नकारते हैं, कहते हैं, “तो तुम हमारे मालिक बनना चाहते हो और हमें नियंत्रित करना चाहते हो? यह कतई नहीं हो सकता! हमने तुम्हें अपना अगुआ इसलिए चुना है ताकि तुम हमें अपने सामने नहीं, बल्कि परमेश्वर के सामने ले जाओ।” इसका मतलब है कि वे मसीह-विरोधियों की चालों को समझ गए हैं। मसीह-विरोधी मालिक होने के बहाने लोगों को गुमराह करते हैं, उन्हें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि यह उनकी जरूरतों के अनुरूप है, चाहे वे जरूरतें भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक, आध्यात्मिक या अन्य जरूरतें हों। जो लोग सत्य या वास्तविक तथ्य नहीं समझते, वे अक्सर मसीह-विरोधियों के भ्रम के झाँसे में आ जाते हैं, वे इस हद तक गुमराह हो जाते हैं कि इसके बाद वे न केवल पलटकर सोचने में असमर्थ होते हैं, बल्कि उन मसीह-विरोधियों के पक्ष में बोल भी सकते हैं और उनका बचाव भी कर सकते हैं। यह तथ्य कि वे मसीह-विरोधियों के पक्ष में बोल सकते हैं और उनका बचाव कर सकते हैं, पर्याप्त रूप से दर्शाता है कि उन्हें वास्तव में गुमराह किया गया है—क्या यही मामला नहीं है? (यही मामला है।) लोग परमेश्वर में विश्वास क्यों करते हैं? क्या यह उद्धार पाने के लिए नहीं है? यदि तुम मसीह-विरोधियों का अनुसरण करते हो तो क्या तुम परमेश्वर का विरोध और उसके साथ विश्वासघात नहीं कर रहे हो? क्या तुम उन ताकतों के पक्ष में नहीं खड़े हो रहे हो जो परमेश्वर के प्रति शत्रुता का भाव रखती हैं? उस स्थिति में, क्या परमेश्वर तब भी तुम्हें चाहेगा? यदि तुम नाम के लिए परमेश्वर का अनुसरण करते हो, अब भी किसी व्यक्ति का अनुसरण करते हो तो परमेश्वर तुम्हें कैसे देखेगा और तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार करेगा? यदि तुम परमेश्वर को नकारते हो तो क्या वह तुम्हें ठुकरा नहीं देगा? यदि लोग इतना जरा-सा धर्म-सिद्धांत भी नहीं समझते हैं तो क्या वे सत्य समझ सकते हैं? क्या ये लोग भ्रमित नहीं हैं?
लोगों को गुमराह करना मसीह-विरोधियों के लिए कभी-कभार की अभिव्यक्ति नहीं है; वे अक्सर ऐसा करते हैं, यह उनका काम करने का सतत सिद्धांत है, या कहा जा सकता है कि यह उनका आधार, तरीका और काम करने की शैली है—यह उनके काम करने की सतत शैली है। अन्यथा, कौन उनका सम्मान करेगा? पहले तो, वे सत्य नहीं समझते। दूसरे, उनमें खराब मानवता होती है। तीसरे, उनमें परमेश्वर का भय मानने वाला दिल भी नहीं होता है। तो वे लोगों को पूरी तरह से उनकी अधीनता स्वीकार करने, उनका सम्मान करने और उनकी प्रशंसा करने के लिए मजबूर कर पाने में सक्षम कैसे हैं? वे दिखावा करने के लिए विभिन्न साधनों और तरीकों पर भरोसा करते हैं, लोगों को उनका सम्मान करने और उनकी पूजा करने के लिए मजबूर करते हैं। वे लोगों को गुमराह करने के लिए इन तरीकों का इस्तेमाल करते हैं, उन पर झूठी छाप छोड़ते हैं, उन्हें दिखाते हैं कि वे आध्यात्मिक हैं, वे परमेश्वर से प्रेम करते हैं, वे कीमत चुकाते हैं, वे अक्सर सही शब्द कहते हैं, सही सिद्धांत पेश करते हैं और वे भाई-बहनों के हितों की रक्षा करते हैं। फिर, वे लोगों में सम्मान और प्रशंसा की भावना पैदा करने के लिए इस झूठी छाप का इस्तेमाल करते हैं, लोगों को गुमराह करने और उनसे अपना अनुसरण करवाने के अपने लक्ष्य को प्राप्त करते हैं। जब वे इस तरह लोगों को गुमराह करते हैं तो क्या वे जो कुछ भी करते हैं वह सत्य के अनुरूप होता है? हालाँकि वे सब कुछ सही कहते हैं, लेकिन जो चीजें करते हैं वे निश्चित रूप से सत्य के अनुरूप नहीं होतीं। विवेकहीन लोग समस्या को नहीं देख सकते। लोगों को गुमराह करने के सार को लेकर उनके कार्य ऐसे होते हैं कि लोगों के लिए यह देखना मुश्किल हो जाता है कि वे सत्य के अनुरूप नहीं हैं। अगर यह देखा जा सकता तो क्या लोग उनकी धोखाधड़ी को नहीं पहचान जाते? वास्तव में, वे जो करते हैं और जो प्रकट करते हैं वह एक झूठी आध्यात्मिकता होती है। तो, झूठी आध्यात्मिकता की अभिव्यक्ति क्या है? झूठी आध्यात्मिकता से संबंधित कई व्यवहार, कार्यकलाप और कथन सही लगते हैं, लेकिन वे वास्तव में केवल बाहरी कार्य हैं और उनका सत्य का अभ्यास करने से कोई लेना-देना नहीं है। ठीक फरीसियों की तरह जिन्होंने प्रभु यीशु का विरोध किया था : वे अपने हाथों में शास्त्रों को पकड़े गलियों के कोनों पर जोर से प्रार्थना करते थे, “हे मेरे प्रभु...” कहते हुए लोगों को अपनी धर्मपरायणता दिखाते थे। नतीजतन, आजकल “फरीसी” उन लोगों के लिए एक वैकल्पिक शब्द बन गया है जो पाखंडी हैं। फरीसी से पहले कौन-सा विशेषण आता है? पाखंडी। वास्तव में, अगर “फरीसी” शब्द का उल्लेख किया जाता है तो “पाखंडी” कहे बिना तुम जान जाओगे कि यह एक सकारात्मक शब्द नहीं है—यह “बदमाश” या “शैतान” के समान है और इसका वही अर्थ है। झूठी आध्यात्मिकता की बात करें तो, आजकल बहुत से लोग आध्यात्मिकता के बारे में बात नहीं करते हैं और जब भी कोई आध्यात्मिकता का उल्लेख करता है तो वे इसके पहले कौन-सा शब्द जोड़ते हैं? (झूठी।) सही कहा, झूठी। ज्यादातर मामलों में, लोगों को गुमराह करने की मसीह-विरोधियों की अभिव्यक्तियाँ वास्तव में झूठी आध्यात्मिकता की अभिव्यक्तियाँ होती हैं। झूठी आध्यात्मिकता से जुड़े शब्द, कार्यकलाप और व्यवहार काफी अच्छे, काफी धर्मनिष्ठ और सत्य के अनुरूप लगते हैं। जब वे देखते हैं कि कोई कमजोर है तो वे अपना खाना भूल जाते हैं और उनकी सहायता करने के लिए दौड़ पड़ते हैं। जब वे देखते हैं कि किसी के घर में कोई समस्या है तो वे अपने स्वयं के मामलों की उपेक्षा कर उनकी मदद करने के लिए दौड़ पड़ते हैं। हालाँकि, उनकी मदद में कुछ सही शब्द या सुखद लगने वाले और सहानुभूतिपूर्ण शब्द कहना शामिल है, लेकिन इतनी सारी बातचीत के बाद भी, दूसरे व्यक्ति की वास्तविक समस्याएँ हल नहीं होती हैं। फिर उनके इस तरह से कार्य करने का उद्देश्य क्या है? लोग उनके व्यवहार से विशेष रूप से प्रभावित होते हैं और उन्हें लगता है कि जरूरत के समय में भरोसा करने के लिए इस तरह के अगुआ का होना अद्भुत है—वे वास्तव में खुश होते हैं। इसलिए, यह कहा जा सकता है कि मसीह-विरोधी न केवल लोगों को गुमराह करने के लिए शब्दों का उपयोग करते हैं, बल्कि साथ ही वे लोगों को गुमराह करने के लिए विभिन्न व्यवहारों का भी उपयोग करते हैं ताकि उन्हें यह विश्वास हो सके कि वे अत्यधिक आध्यात्मिक, उल्लेखनीय और उनके विश्वास और भरोसे के योग्य हैं। कुछ लोग यह भी सोच सकते हैं, “परमेश्वर में विश्वास करना कुछ ज्यादा ही अमूर्त लगता है, लेकिन हमारे अगुआ में विश्वास करना व्यावहारिक है। यह बहुत वास्तविक और सच्चा है : तुम उसे छू सकते हो और देख सकते हो और जब तुम चीजों से निपट रहे होते हो तो तुम उससे पूछ सकते हो और उससे सीधे बात कर सकते हो। यह कितना अद्भुत है!” ऐसे नतीजे प्राप्त करके मसीह-विरोधी अपने उद्देश्यों तक पहुँच चुके होते हैं, लेकिन जिन लोगों को उन्होंने गुमराह किया है वे दुखी हो जाते हैं। कुछ समय तक मसीह-विरोधी द्वारा गुमराह किए जाने के बाद जब ये लोग फिर से परमेश्वर के सामने आते हैं तो वे अब प्रार्थना करना या अपने दिलों को उसके सामने खोलना नहीं जानते हैं। इसके अलावा, जब ये लोग मिलते हैं तो वे एक-दूसरे की चापलूसी करते हैं, आध्यात्मिक होने का दिखावा करते हैं, एक-दूसरे को गुमराह करते हैं और धोखा देते हैं। अंत में, मसीह-विरोधी यहाँ तक दावा करते हैं, “हमारी कलीसिया में हर एक भाई-बहन परमेश्वर से प्रेम करता है। जब समस्याएँ आती हैं तो इनमें से हर एक मौके पर खड़ा रहता है—उन्हें बड़ा लाल अजगर गिरफ्तार कर ले तो भी वे सभी अपनी गवाही पर दृढ़ रहेंगे। हमारे बीच एक भी यहूदा नहीं है—मैं इसकी गारंटी देता हूँ!” बाद में पता चलता है कि जब वे गिरफ्तार हुए तो उनमें से अधिकांश यहूदा बन गए। क्या वे बदमाशों का गिरोह नहीं हैं? मसीह-विरोधी इन खोखले शब्दों और नारों का उपयोग भाई-बहनों को मूर्ख बनाने, गुमराह करने और धोखा देने के लिए करते हैं। अधिकांश लोग मूर्ख और अज्ञानी हैं, वे पहचान नहीं कर पाते और वे मसीह-विरोधी को मनमाने ढंग से व्यवहार करने देते हैं। ऊपरवाले की कार्य व्यवस्थाओं में लंबे समय से इस बात पर जोर दिया गया है कि जब परिस्थितियाँ आती हैं तो उन्हें कैसे सँभालना है और क्या काम करना है, जिसका लक्ष्य यह सुनिश्चित करना होता है कि परमेश्वर के सभी चुने हुए लोग सुरक्षित वातावरण में अपने कर्तव्य कर सकें। गिरफ्तारी और उत्पीड़न की स्थिति में, नुकसान को यथासंभव कम किया जाना चाहिए। यदि परमेश्वर के सभी चुने हुए लोग गिरफ्तार हो जाते हैं और जेल चले जाते हैं और उनका कलीसियाई जीवन पूरी तरह से समाप्त हो जाता है तो क्या इससे उनके जीवन प्रवेश में कमी नहीं आती? जेल में परमेश्वर के वचनों को खाए-पिए बिना, क्या किसी व्यक्ति का जीवन परिपक्व हो सकता है? वे केवल भजनों के कुछ शब्द याद रख सकते हैं और हर दिन उनका जीवन उन कुछ शब्दों पर निर्भर करता है। जब वे रात में प्रार्थना करते हैं तो वे इसे केवल अपने दिल में चुपचाप कर सकते हैं और वे अपने होठों को हिलाने की हिम्मत नहीं कर सकते। उनके दिलों में केवल यही विचार रह जाते हैं, “धोखा मत दो, यहूदा मत बनो, परमेश्वर की गवाही पर दृढ़ रहो और उसकी महिमा करो, उसका अपमान मत करो,” इसके अलावा और कुछ नहीं—लोगों के पास बस इतना ही आध्यात्मिक कद है। मसीह-विरोधी इन बातों पर विचार नहीं करते। उन्हें मसीह-विरोधी क्यों कहा जाता है? वे बिना हिचकिचाए दूसरों को गाली देते हैं और भाई-बहनों को नुकसान पहुँचाते हैं! ऊपरवाले की कार्य व्यवस्था के तहत लोगों को अपने कर्तव्यों को सुरक्षित वातावरण में पूरा करने और यथासंभव दुर्घटनाओं से बचने की जरूरत है, लेकिन मसीह-विरोधी लोग अपने काम करते समय इन कार्य व्यवस्थाओं का पालन नहीं करते हैं। वे सुरक्षा की अनदेखी करते हुए अपनी मर्जी के अनुसार चिल्लाते और काम करते हैं। कुछ मूर्ख व्यक्ति पहचान नहीं कर पाते और सोचते हैं, “ऊपरवाला हमेशा सुरक्षा की बात क्यों करता है? वे दुर्घटनाओं से इतना क्यों डरते हैं? डरने की क्या बात है? सब कुछ परमेश्वर के हाथ में है!” क्या ऐसी बातें करना मूर्खता नहीं है? शायद तुम्हारा आध्यात्मिक कद छोटा हो, शायद तुममें समझ की कमी हो और शायद तुम मामलों को ठीक से न समझ पाओ, लेकिन तुम मूर्खतापूर्ण कार्य नहीं कर सकते! ऊपरवाले ने व्यवस्था की है कि लोगों को निश्चित परिस्थितियों में कैसे इकट्ठा होना चाहिए और उन्हें किन सिद्धांतों का पालन करना चाहिए—ये सभी विस्तृत व्यवस्थाएँ किस लिए हैं? वे ठीक परमेश्वर के चुने हुए लोगों की सुरक्षा के लिए हैं, ताकि वे सामान्य और सुरक्षित तरीके से सभा कर सकें और अपने कर्तव्य कर सकें। सुरक्षा रहने से तुम परमेश्वर में विश्वास करना जारी रखते हो, अपना कलीसियाई जीवन जीते हो और परमेश्वर के वचनों को सामान्य रूप से खाते-पीते हो। यदि तुम्हारी सुरक्षा ही चली जाए, यदि तुम्हें बड़े लाल अजगर द्वारा गिरफ्तार कर लिया जाए और जेल में तुम परमेश्वर के वचनों को सुन या पढ़ नहीं सकते, तुम भजन नहीं गा सकते और तुम किसी सभा में नहीं जा सकते—तब भी तुम परमेश्वर में कैसे विश्वास कर सकते हो? शायद तुम केवल नाम के विश्वासी बनकर रह जाओ। मसीह-विरोधी इन मामलों की परवाह नहीं करते; उन्हें लोगों के जीवन और मृत्यु की परवाह नहीं है। अपनी महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं को संतुष्ट करने के लिए, वे सभी को खड़े होकर आँख मूँदकर यह चिल्लाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, “हमें परिस्थितियों से डर नहीं लगता—हमारे पास परमेश्वर है!” जो मूर्ख हैं वे कुछ भी नहीं समझते हैं और इन शब्दों से गुमराह हो जाते हैं। हर किसी के पास अस्पष्ट और खोखले विचार होते हैं, वे सोचते हैं, “हम परमेश्वर में विश्वास करते हैं और परमेश्वर हमारी रक्षा करता है; अगर हमारे साथ कुछ होता है तो यह परमेश्वर की अनुमति से होता है।” क्या ये खोखले शब्द नहीं हैं? मसीह-विरोधी और जो लोग सत्य नहीं समझते हैं, वे इसी तरह कार्य करते हैं। हो सकता है भाई-बहन ये न समझ सकें, लेकिन एक ऐसा अगुआ होने के नाते जो अक्सर कार्य व्यवस्थाओं पर संगति करता है, तुम्हें इन मामलों से अनभिज्ञ नहीं होना चाहिए। तुम्हें कार्य व्यवस्था के अनुसार कार्य करना चाहिए और अपनी महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं को संतुष्ट करने के लिए हमेशा बहुत अधिक बोलने की इच्छा नहीं रखनी चाहिए, यह भी नहीं सोचना चाहिए कि जितने अधिक लोग तुम्हारी बात सुनें उतना ही बेहतर है और जितने अधिक लोग होंगे उतना ही अधिक जोशीला तुम्हारा भाषण होगा। इस बात की परवाह किए बिना कि माहौल कितना सुरक्षित है, मसीह-विरोधी अपने से नीचे के लोगों को जीतने और उन्हें अपनी बात सुनाने के लिए अपने खाली समय में एक साथ इकट्ठा करते हैं जो अंततः इन लोगों को उनके पतन की ओर ले जाता है।
मसीह-विरोधी लोग बड़ी-बड़ी बातें कहने और लोगों को गुमराह करने के लिए कुछ खोखले, झूठे आध्यात्मिक और सैद्धांतिक आधारों का इस्तेमाल करने में माहिर होते हैं। बहुत से लोग जो पहचान नहीं कर पाते, वे बस उनकी बात सुनते हैं और मसीह-विरोधी चाहे जैसे उनके साथ हेरफेर करें, वे उनकी बात मानते हैं, परिणामस्वरूप उन्हें परेशानी और गिरफ्तारी का सामना करना पड़ता है। ये परेशानियाँ कैसे पैदा हो सकती हैं? कुछ लोग कह सकते हैं कि ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर ने उनकी रक्षा नहीं की। लेकिन क्या यह परमेश्वर के बारे में शिकायत करना नहीं है? इस मामले का दोष परमेश्वर पर नहीं डाला जा सकता। परमेश्वर लोगों को विभिन्न परिस्थितियों में अपने कार्य का अनुभव करने देता है। यदि तुम कार्य व्यवस्थाओं पर आधारित सिद्धांतों के अनुसार अपना अभ्यास करते हो, जब माहौल अनुकूल हो तो चाहे कितने भी लोग एक साथ इकट्ठा हों, तुम सामान्य रूप से परमेश्वर के वचन खा-पी सकते हो, परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर सकते हो और वे कर्तव्य कर सकते हो जो तुम्हें करने चाहिए तो परमेश्वर तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा और तुम पर अपना कार्य करेगा। यदि तुम ऊपरवाले की अपेक्षाओं के विरुद्ध जाते हो और अपनी इच्छा के अनुसार आँख मूँदकर कार्य करते हो और कुछ होता है तो यह केवल मूर्खता और अज्ञानता है। परमेश्वर शोधन करने के लिए सभी को जेल में डालने का इरादा नहीं रखता है। उसका इरादा है कि प्रत्येक व्यक्ति उसके वचनों को ठीक से खाए-पीए और उसके कार्य का अनुभव करे। हालाँकि, मसीह-विरोधी इसे नहीं समझते। वे अपने तर्क में विश्वास करते हैं और सोचते हैं कि परमेश्वर की सुरक्षा के रहते डरने की कोई बात नहीं है। उन्हें परमेश्वर की सुरक्षा के सिद्धांतों की कोई समझ नहीं है और वे आँख मूँदकर विनियमों का पालन करते हैं, हमेशा परमेश्वर को सीमांकित करते हैं। बहुत से लोग उनसे गुमराह हो जाते हैं और उनके साथ आँख मूँदकर काम करते हैं, ऊपरवाले से आने वाली व्यवस्थाओं को अनदेखा करते हैं, परिणामस्वरूप, कुछ होता है और वे गिरफ्तार हो जाते हैं और जेल में यातनाएँ सहते हैं। जब मुसीबत आती है तो इन लोगों का आध्यात्मिक कद कैसा होता है? उनमें बस थोड़ा-सा उत्साह होता है, वे थोड़ा-सा धर्म-सिद्धांत समझते हैं और कुछ नारे लगा सकते हैं, लेकिन उन्हें परमेश्वर का बिल्कुल भी ज्ञान नहीं होता, उन्हें सत्य की कोई वास्तविक समझ, ज्ञान या अनुभव नहीं होता और लोगों को बचाने के लिए परमेश्वर कैसे काम करता है, इसकी कोई समझ नहीं होती। वे परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए बस उत्साह पर भरोसा करते हैं और उनमें थोड़ा-सा संकल्प होता है। क्या इस तरह के आध्यात्मिक कद वाले लोग गिरफ्तार होने और जेल में डाले जाने पर गवाही दे सकते हैं? बिल्कुल नहीं। जैसे ही वे विश्वासघात करते हैं, परिणाम क्या होते हैं? वे सोचने लगते हैं, “क्या परमेश्वर सर्वशक्तिमान नहीं है? सब कुछ उसके हाथ में है तो वह मुझे क्यों नहीं बचाता? वह मुझे इस तरह से पीड़ित क्यों होने देता है? क्या परमेश्वर है भी? क्या यह संभव है कि इतने उत्साही बनकर हमने गलती की? यदि हमारे अगुआओं ने हमें गुमराह किया है तो परमेश्वर उन्हें अनुशासित क्यों नहीं करता? परमेश्वर हमें यहाँ क्यों लाया? उसने हमें ऐसी परिस्थिति का सामना क्यों करने दिया?” शिकायतें सामने आने लगती हैं, तुरंत बाद परमेश्वर को नकारा जाना शुरू हो जाता है : “परमेश्वर के कार्य मनुष्य की इच्छा के अनुरूप नहीं होते। हो सकता है कि उसके कार्य हमेशा सही न हों और जरूरी नहीं कि वह सत्य ही हो।” अंत में, बहुत पीड़ा झेलने और कुछ समय तक इसे सहने के बाद, वे जो थोड़ा बहुत धर्म-सिद्धांत जानते थे और जो थोड़ा बहुत उत्साह उनमें था, वह भी रफूचक्कर हो जाता है। वे परमेश्वर को नकारते हैं और अपनी आस्था खो देते हैं, यहाँ तक कि यहूदा बन जाते हैं। जेल से रिहा होने के बाद, वे यहाँ तक सोचते हैं कि, “अब मुझे परिस्थितियों के बारे में फिर कभी चिंता करने की जरूरत नहीं है। देखो, जो लोग परमेश्वर में विश्वास नहीं करते, वे कितने अच्छे से जी रहे हैं : बाहर उनके पास बहुत स्वतंत्रता है। हम गुप्त रूप से विश्वास करके क्या कर रहे हैं? अगर देश विश्वास करने से मना करता है तो बस विश्वास करना बंद कर दो।” क्या ऐसे लोग बाद में भी परमेश्वर में विश्वास कर सकते हैं? (नहीं, वे नहीं कर सकते।) वे क्यों नहीं कर सकते? परमेश्वर अब उन्हें नहीं चाहता। परमेश्वर तुम्हें सिर्फ एक बार चुनता है और तुम पहले ही अपना मौका खो चुके हो, इसलिए परमेश्वर तुम्हें दूसरी बार नहीं चाहेगा। ऐसे लोगों के लिए उद्धार पाने की कितनी उम्मीद है? शून्य, कोई उम्मीद नहीं बची है। यह वह परिणाम है जो मसीह-विरोधियों के मनमाने ढंग से व्यवहार करने और लोगों को गुमराह करने के लिए कुछ झूठे आध्यात्मिक सिद्धांतों का उपयोग करने का होता है, जिसके कारण लोग बाहरी आध्यात्मिकता और उत्साह का अनुसरण करने लगते हैं। परिणाम क्या है? (वे बर्बाद हो जाते हैं।) परमेश्वर उन्हें बचाता है या नहीं, यह परमेश्वर का काम है, लेकिन कम से कम अभी के लिए, ऐसा लगता है कि जब लोगों का परमेश्वर में आस्था का मार्ग इस बिंदु पर पहुँचता है तो उनकी संभावनाएँ और गंतव्य मूल रूप से बर्बाद हो जाते हैं। अब सब कुछ इस पर आकर टिक जाता है कि इसका कारण कौन हैं? ये मसीह-विरोधी ही हैं जो इसका कारण हैं। यदि वे इस तरह आँख मूँदकर काम न करते, बल्कि कार्य व्यवस्थाओं के अनुसार काम करते, ऊपरवाले की अपेक्षाओं के अनुसार भाई-बहनों की अगुआई करते और सभी को परमेश्वर के सामने लाते तो ये चीजें नहीं होतीं। क्या तब भी इन लोगों के बचने की उम्मीद होती? (बिल्कुल।) इन लोगों के पास अभी भी उद्धार की उम्मीद होती। चूँकि मसीह-विरोधियों की महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ बहुत बढ़ गई हैं, अगर कोई उनकी रक्षा करने और उनकी बात सुनने वाला न हो तो उन्हें लगता है कि जीवन उबाऊ और नीरस है। वे उन भ्रमित लोगों के साथ जो उनका अनुसरण करते हैं, युद्धबलि और खिलौनों की तरह व्यवहार करते हैं और उन सभी को अपनी अगुआई का पालन करने के लिए मजबूर करते हैं। उन्हें लगता है कि वे सक्षम हैं और उनके पास सुख हैं और यह जीवन जीने लायक है। अपनी महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं को पूरा करने के लिए वे इन तथाकथित आध्यात्मिक और सुखद लगने वाले शब्दों का उपयोग उन लोगों को गुमराह करने के लिए करते हैं जो उनका अनुसरण करते हैं और उन्हें गुमराह करने के बाद, उन्हें सच्चे मार्ग और परमेश्वर के वचनों से भटका देते हैं, अपना अनुसरण करवाने के लिए उन्हें परमेश्वर से दूर ले जाते हैं और मसीह-विरोधियों का मार्ग अपनाने के लिए बाध्य कर देते हैं। इसका अंतिम परिणाम क्या होता है? इन लोगों की संभावनाएँ और गंतव्य बर्बाद हो जाते हैं और वे अपने उद्धार का मौका खो देते हैं। जब लोग परमेश्वर में सही तरीके से विश्वास नहीं करते हैं और दूसरे लोगों का अनुसरण करते हैं तो इसके क्या परिणाम होते हैं? क्या तुम लोग अभी भी किसी ऐसे व्यक्ति से ईर्ष्या करते हो जो आध्यात्मिक लगता है? (नहीं, हम नहीं करते।) “आध्यात्मिक” शब्द के बारे में क्या विचार है? यह खोखला है। लोग दैहिक हैं—वे सृजित प्राणी हैं। यदि तुम वास्तव में आध्यात्मिक होते तो तुम्हारी देह अब अस्तित्व में नहीं होती और तब तुम कितने आध्यात्मिक होते? क्या यह सिर्फ खोखली बात नहीं है? तो, तुम देखते हो कि “आध्यात्मिक” शब्द अपने आप में टिकता नहीं है; यह सिर्फ खोखली बात है। भविष्य में, यदि तुम किसी को यह कहते हुए सुनो कि वह आध्यात्मिकता का अनुसरण कर रहा है तो उसे बताओ, “तुम्हें एक ईमानदार व्यक्ति बनने और परमेश्वर के सामने रहने का प्रयास करना चाहिए—यह अधिक यथार्थवादी है। यदि तुम आध्यात्मिकता का अनुसरण करते हो तो यह एक बंद रास्ता है! आध्यात्मिकता का कभी भी अनुसरण मत करो; यह ऐसी चीज नहीं है जिसका लोग अनुसरण करते हैं—यह टिकता ही नहीं है।” मुझे बताओ, कौन कई वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास करने के बाद आध्यात्मिक व्यक्ति बन गया है? धर्म की वे प्रसिद्ध हस्तियाँ और बाइबल के टिप्पणीकार, क्या वे आध्यात्मिक हैं? वे सभी पाखंडी हैं, उनमें से कोई भी आध्यात्मिक नहीं है। जिन लोगों ने “आध्यात्मिक” शब्द का आविष्कार किया है, वे इस खोखले शब्द का उपयोग दूसरों को गुमराह करने के लिए कर रहे हैं। वे बदमाश और शैतान हैं। किस तरह का व्यक्ति ऐसी खोखली बातें कह सकता है? क्या उन्हें आध्यात्मिक समझ है? (नहीं, उन्हें नहीं है।) यदि तुम यह भी नहीं समझ सकते कि लोगों को परमेश्वर में विश्वास करते समय क्या करना चाहिए या उन्हें किसका होना चाहिए तो क्या तुम सत्य समझ सकते हो? तुम स्वाभाविक रूप से एक सृजित प्राणी हो, मानवता के एक सदस्य हो जिसे शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है। किसी चीज के होने के लिहाज से तुम देह के हो—यह मनुष्यों का गुण है। बेशक, अगर तुम दैहिक होना चाहते हो तो तुम शैतान के हो : यह दुनिया के रास्ते पर चलना है। जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें सत्य का अनुसरण करना चाहिए—यह सही है। अगर लोग आध्यात्मिक या परमेश्वर-जैसा होने की चाहत रखते हैं तो क्या वे इसके योग्य हैं? चाहे वे कैसे भी इसका अनुसरण करें, यह बेकार है। परमेश्वर में विश्वास करने के लिए यह सही मार्ग नहीं है। इसलिए, आध्यात्मिक या परमेश्वर-जैसा होने की चाहत सिर्फ एक नारा है, एक झूठा आध्यात्मिक सिद्धांत है, जो सत्य से संबंधित नहीं है। अगर तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो और परमेश्वर का अनुसरण करते हो तो तुम्हें एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य ठीक से निभाना चाहिए और परमेश्वर के प्रति समर्पित होने और उसे संतुष्ट करने में सक्षम होना चाहिए। यही सत्य वास्तविकता है।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?