मद दस : वे सत्य का तिरस्कार करते हैं, सिद्धांतों की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाते हैं और परमेश्वर के घर की व्यवस्थाओं की उपेक्षा करते हैं (भाग तीन) खंड तीन
4. पदोन्नत या बर्खास्त किए जाने पर उनका व्यवहार
कलीसिया में, कुछ लोगों के पास कार्य करने के लिए थोड़ी-सी काबिलियत और कुछ कार्य क्षमता होती है। जब उन्हें पदोन्नत किया जाता है तो उनमें अत्यधिक उत्साह होता है, वे सक्रिय रूप से अपने कर्तव्य निभाते हैं, जिम्मेदारी लेते हैं, कीमत चुकाने को तैयार रहते हैं और उनमें वफादारी भी होती है। लेकिन कार्य करने में अक्षमता के कारण जब उन्हें उनके पद से बर्खास्त कर दिया जाता है और वे अपना रुतबा खो बैठते हैं, तो परमेश्वर के प्रति उनका रवैया बदल जाता है। जब उनके पास रुतबा था तो वे परमेश्वर से इस तरह बात करते थे : “हमारे परिवार के भाई-बहन ऐसे हैं, हमारे परिवार के भवन की मरम्मत कराने की जरूरत है, हमारे परिवार के आँगन को साफ-सुथरा रखने की जरूरत है...।” उनकी हर बात का संबंध “हमारे परिवार” से होता था। जब उन्हें पदोन्नत किया गया तो वे परमेश्वर के घर का हिस्सा बन गए, प्रतीत होता था कि उनका दिल परमेश्वर के साथ एकमत हो गया है, एक परिवार की तरह, वे परमेश्वर के दिल को ध्यान में रखते हुए और उसके साथ मिलकर परमेश्वर के घर के कार्य सँभालने और परमेश्वर के साथ समान स्तर पर बातचीत करने में सक्षम थे। जब उन्हें पदोन्नत कर एक महत्वपूर्ण पद पर रखा गया तो उन्होंने सम्मानित महसूस किया और साथ ही उन्हें अपनी जिम्मेदारी का भी एहसास हुआ। वे चाहे मुझसे बात कर रहे हों या भाई-बहनों से, अपनी बातचीत में अक्सर “हमारा परिवार” कहा करते थे। यह सुनकर तुम्हें लगेगा कि यह व्यक्ति बुरा नहीं है, नेक-दिल है, मिलनसार है, परमेश्वर के घर को अपना घर मानता है, हर चीज की बहुत परवाह करता है और बहुत जिम्मेदारी लेता है, पहले से ही हर चीज का सारा आगा-पीछा सोच लेता है, सत्य का अनुसरण करने वाला और कीमत चुकाने के लिए उत्साहित लगता है। लेकिन जब उसे बर्खास्त कर दिया जाता है तो क्या वह तब भी इसी तरह बोलता है? बर्खास्त होते ही उसकी वह पहले वाली मनःस्थिति नहीं रहती—वह रवैया नहीं रहता। अब वे लोग “हमारा परिवार” नहीं कहते और जब उनसे कुछ करने के लिए कहा जाता है, तो वे उतने उत्साहित नहीं रहते। वे क्या सोचते हैं? “पहले जब तुमने मुझे पदोन्नत किया था, तो मेरे पास रुतबा था और मैं पूरे दिल से तुम्हारे साथ था। अब जबकि मेरे पास कोई रुतबा नहीं रहा, हम अब एक परिवार नहीं रहे, इसलिए तुम इसे खुद करो। तुम इसे कैसे करते हो, इस बारे में मुझसे राय-मशविरा मत करो और मुझे बताओ भी मत, इसका मुझसे कोई लेना-देना नहीं है। मैं तुम्हारे लिए केवल संदेश देता रहूँगा और बस इतना ही—तुम मुझे जो कुछ भी करने के लिए कहोगे, मैं वह थोड़ा-बहुत कर दूँगा, लेकिन अब तुम्हारे साथ मेरा दिल एकमत नहीं है।” फिर वे तुम्हारे साथ एक बाहरी व्यक्ति जैसा व्यवहार करते हैं। अगर तुम उनसे कुछ करने के लिए कहते हो, तो वे ऐसे काम करते हैं मानो वे किसी और के लिए काम कर रहे हों और सतही तौर पर आधे-अधूरे मन से काम करते हैं। हो सकता है पहले वे पाँच कार्य करते रहे हों, लेकिन अब एक-दो ही करते हैं, बस प्रक्रिया से गुजरते हैं, काम चलाते हैं, कुछ सतही कार्य करते हैं, और हो गई छुट्टी। ऐसा क्यों है? वे कहते हैं : “पहले मैं पूरे दिल से तुम्हारे साथ था, तुम्हारी इस या उस चीज में मदद करता था, तुम्हारे मामलों को अपने ही मामले मानता था, अपना साझा काम मानता था, तुम्हारी ओर से कार्य करता था। लेकिन फिर तुमने मेरी भावनाओं की जरा-सी भी कद्र किए बिना मुझे बर्खास्त कर दिया! तुम मेरी भावनाओं की कद्र नहीं करते—मैं तुम्हारे लिए कैसे काम कर सकता हूँ? अगर तुम मुझे फिर से पदोन्नत करो और मुझे रुतबा प्रदान करो तो यह ठीक रहेगा। लेकिन अगर तुम मुझे रुतबा प्रदान नहीं करते तो भूल जाओ। अगर तुम कार्य करने के लिए मुझे फिर से बुलाना चाहते हो तो पहले की तरह काम नहीं बनेगा। अगर तुम मेरा उपयोग करते हो तो तुम्हें मुझे शोहरत और रुतबा देना होगा। अगर कोई रुतबा न हो और इसके बजाय तुम सिर्फ आदेश देते हो और मुझसे कोई कार्य करने की अपेक्षा करते हो तो इसमें पहचान कहाँ है? इसका कुछ स्पष्टीकरण होना चाहिए!” अब जब तुम बोलते हो तो यह प्रभावी नहीं रहता है। जब तुम उन्हें कुछ करने के लिए कहते हो, तो वे पहले जैसे समर्पित नहीं रहते, अपना पूरा दिल और दिमाग समर्पित नहीं करते; उनका रवैया बदल चुका है। अगर तुम दोबारा उनसे कुछ करने के लिए कहते हो या अगर परमेश्वर का घर उनसे कुछ करने के लिए कहता है तो वे इसे एक अतिरिक्त कार्य के रूप में, एक बाहरी व्यक्ति के मामले के रूप में लेते हैं, मानो उनका इसे करने के लिए आगे बढ़ना तुम्हारा पहले ही बहुत बड़ा सम्मान है। उन्हें लगता है कि अगर वे ऐसा नहीं करते तो यह अनुचित लगता है, खासकर इसलिए कि वे परमेश्वर में विश्वास रखते हैं। लेकिन अगर वे ऐसा करने के लिए आगे बढ़ते भी हैं तो वे अनिच्छा से ऐसा करते हैं और आधे-अधूरे मन से कार्य करते हैं। वे ऐसा क्यों करते हैं? वे सोचते हैं, “मैंने पहले तुम पर 100 प्रतिशत भरोसा किया था, तुम्हारे मसलों को अपना माना था, फिर भी तुमने मुझे ऐसे ही किनारे कर दिया, जिससे मेरे दिल और आत्मसम्मान को ठेस पहुँची; तुमने मेरी उपेक्षा की। तो ठीक है, अगर तुम मेरे प्रति निर्दयी हो तो मुझे निर्मम होने का दोष मत देना। अगर तुम मेरा दोबारा इस्तेमाल करो, तो शायद मैं पहले जैसा न रह पाऊँ, क्योंकि हमारा रिश्ता पहले ही टूट चुका है। मुझ पर इतनी आसानी से हुक्म नहीं चलाया जा सकता कि बुलाते ही आ जाऊँ और दूर भेजने पर चला जाऊँ। मैं कौन हूँ? अगर परमेश्वर में विश्वास रखने की बात न होती तो क्या मैं दूसरों को खुद से इस तरह चालाकी करने देता?” जब मसीह-विरोधियों को बर्खास्त कर दिया जाता है और वे अपना रुतबा खो बैठते हैं तो उनके रवैये में ऐसा अहम बदलाव आ सकता है। जब उनके पास रुतबा था, तब भले ही वे परमेश्वर के घर को “हमारा परिवार” कहते थे और अक्सर इस बारे में बात करते थे, वे परमेश्वर के घर के मामलों को वास्तव में अपना नहीं मानते थे। बर्खास्त होने और अपना रुतबा खोने के बाद अगर परमेश्वर का घर उन्हें अपना कर्तव्य निभाने के लिए कहता है तो वे मोलभाव किए बिना ऐसा करने के लिए इच्छुक नहीं होते हैं, और तब भी उन्हें किसी स्पष्टीकरण या किसी प्रकार की पहचान की जरूरत होती है। कुछ लोग तो ऐसा भी कहते हैं, “पिछली बार तुमने मुझे बर्खास्त कर दिया था, ऐसे ही मुझे किनारे कर दिया था। अगर तुम मुझसे अब कुछ कराना चाहते हो तो मैं ऐसा तभी करूँगा जब पवित्र आत्मा द्वारा प्रयुक्त व्यक्ति मुझसे व्यक्तिगत रूप से बात करे या स्वयं देहधारी परमेश्वर मुझसे बात करने आए, वरना, भूल जाओ!” वे कितने ढीठ हैं! मुझे बताओ, क्या परमेश्वर के घर को ऐसे लोगों का उपयोग करना चाहिए? (नहीं।) उन्हें लगता है कि वे कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं, लेकिन वास्तव में परमेश्वर का घर ऐसे लोगों को महत्व नहीं देता है। तुम कितने ही प्रतिभाशाली, सक्षम और अगुआई करने में कुशल क्यों न हो, परमेश्वर का घर तुम्हारा उपयोग नहीं करेगा। कुछ लोग पूछ सकते हैं, “क्या ऐसा इसलिए है कि तुम बुरे लोगों के आगे घुटने नहीं टेकते हो?” नहीं; यह परमेश्वर के घर का प्रशासनिक आदेश है, उसका लोगों को उपयोग करने का सिद्धांत है। अगर परमेश्वर के घर में मसीह-विरोधियों को अपने हाथ में शक्ति रखने की अनुमति दी गई, तो क्या यह भाई-बहनों और कलीसिया के लिए अच्छी बात होगी या बुरी बात? (बुरी बात।) क्या परमेश्वर का घर इतना बुरा काम कर सकता है? कदापि नहीं। जब उनके मसीह-विरोधी होने का खुलासा नहीं हुआ था, तब परमेश्वर के घर ने उन्हें सेवा करने के लिए अनिच्छा से पदोन्नत किया। एक बार यह खुलासा हो जाने पर भी कि वे मसीह-विरोधी हैं, क्या परमेश्वर का घर उन्हें पदोन्नत कर सकता था? यह मुमकिन नहीं है। वे कल्पनाएँ करते रहते हैं और खयाली पुलाव पकाते रहते हैं। कुछ मसीह-विरोधी इस तरह सोचते हैं : “हुँह, मेरे बिना परमेश्वर के घर का काम नहीं चल सकता। परमेश्वर के घर में मेरे सिवाय यह कार्य कोई नहीं सँभाल सकता है। मेरी जगह कौन ले सकता है?” मसीह-विरोधी यह दावा करना चाहते हैं। आओ, उन्हें दिखा दें कि परमेश्वर के घर में इन मसीह-विरोधियों के बिना परमेश्वर का कार्य सुचारु रूप से आगे बढ़ सकता है और पूरा हो सकता है या नहीं।
अब परमेश्वर के घर में विभिन्न प्रकार के कार्यों की सुचारु प्रगति और विकास—क्या इसका कोई संबंध तमाम तरह के मसीह-विरोधियों और बुरे लोगों को कलीसिया से बहिष्कृत और निष्कासित करने से है? ये आपस में बहुत अधिक जुड़े हुए हैं! मसीह-विरोधियों को इसका एहसास नहीं है; वे इस बात से अनजान हैं कि वास्तव में उन्हें बहिष्कृत, निष्कासित और प्रतिबंधित करने से ही परमेश्वर के घर का कार्य सुचारु रूप से आगे बढ़ सकता है—वे तो दूसरों से श्रेष्ठ होने की अकड़ भी दिखाते हैं और शिकायत भी करते हैं! तुम किस बारे में शिकायत कर रहे हो? तुम सोचते हो तुम्हारे पास प्रतिभा और दिमाग है, काबिलियत और कार्य क्षमता है, लेकिन तुम परमेश्वर के घर में क्या कर सकते हो? ये लोग केवल शैतान के सेवकों की भूमिका निभाते हैं, परमेश्वर के कार्य में बाधा डालने और उसे बिगाड़ने का काम करते हैं। उनकी मौजूदगी के बिना परमेश्वर के चुने हुए लोगों का कलीसियाई जीवन, उनका कर्तव्य निभाने का जीवन और रोजमर्रा का जीवन, सभी बहुत सुस्थिर, अधिक सहज और शांतिपूर्ण होगा—कुछ ऐसा जिसका मसीह-विरोधियों को एहसास नहीं है। ये मसीह-विरोधी अपनी क्षमताओं को ज्यादा आँकते हैं और उन्हें एहसास ही नहीं होता कि वे असल में क्या हैं। उन्हें लगता है कि परमेश्वर का घर उनके बिना नहीं चल सकता, उनके बिना काम नहीं हो सकता और कार्य पूरा नहीं हो सकता और उनके बिना पेशेवर कार्य की विभिन्न मदें आगे नहीं बढ़ सकतीं। वे यह नहीं समझते हैं कि परमेश्वर के घर में धार्मिकता और सत्य की ही सत्ता चलती है। वे यह क्यों नहीं जानते? मसीह-विरोधी इतनी सरल-सी बात क्यों नहीं समझ पाते? इससे केवल यही पता चलता है कि मसीह-विरोधियों का सार सत्य के प्रति विमुख और शत्रुतापूर्ण है। वास्तव में सत्य से विमुख होने और सत्य के प्रति शत्रुतापूर्ण होने के कारण ही वे नहीं जानते कि सत्य क्या है और सकारात्मक चीजें क्या हैं। इसके विपरीत वे सोचते हैं कि परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाले उनके दुष्ट, दुर्भावनापूर्ण व्यवहार अच्छे और सही हैं, इनमें कोई गलती नहीं है। वे मानते हैं कि केवल वे ही सत्य को समझते हैं, परमेश्वर के प्रति वफादार हैं, और केवल वे ही परमेश्वर के घर में सत्ता सँभालने के लायक हैं। वे गलत हैं! परमेश्वर के घर में सत्य की ही सत्ता चलती है। सभी मसीह-विरोधियों की निंदा की जानी चाहिए, उन्हें अस्वीकार कर हटा देना चाहिए; उन्हें संभवतः परमेश्वर के घर में जगह नहीं मिल सकती और उन्हें हमेशा के लिए अस्वीकार ही किया जा सकता है।
कुछ मसीह-विरोधियों के पास कुछ गुण, थोड़ी-सी काबिलियत और थोड़ी क्षमता होती है और वे सत्ता के खेल खेलने में कुशल होते हैं। उन्हें लगता है कि परमेश्वर के घर में उन्हें ही पदोन्नत कर महत्वपूर्ण पदों पर बैठाया जाना चाहिए। लेकिन आज इस पर गौर करें, तो ऐसा नहीं है। ये लोग निंदित हुए हैं, प्रतिबंधित और अस्वीकृत हुए हैं, और कुछ लोग तो कलीसिया से निष्कासित या बहिष्कृत किए जा चुके हैं। उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि महान योग्यताओं और ऊँचे कौशलों वाले उनके जैसे “श्रेष्ठ” व्यक्ति सचमुच परमेश्वर के घर में ठोकर खाएँगे और अस्वीकृत कर दिए जाएँगे। वे समझ ही नहीं सकते कि ऐसा क्यों है। तो क्या हमें उन पर कार्य करते रहना चाहिए? इसकी कोई जरूरत नहीं है। क्या तुम शैतानों से तर्क कर सकते हो? शैतानों से तर्क करने की कोशिश करना बहरों को उपदेश देने के समान है; शैतानों को निरूपित करने का एक ही तरीका है—वे तर्क से अप्रभावित रहते हैं। यह वैसा ही है, जैसा कुछ लोग कहते हैं, “परमेश्वर लोगों से ईमानदार होने के लिए कहता है, लेकिन ईमानदार होने में इतना अच्छा क्या है? थोड़े-से झूठ बोलने, लोगों को धोखा देने में क्या बुराई है? कुटिल और धोखेबाज होने में क्या खराबी है? बेवफा होने में क्या खराबी है? धूर्त और लापरवाह होने में क्या खराबी है? परमेश्वर की आलोचना करने में क्या खराबी है? परमेश्वर के बारे में धारणाएँ रखने में क्या खराबी है? परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करने में क्या खराबी है, यह कौन सी बड़ी गलती है? यह वास्तव में सिद्धांत का मसला नहीं है!” कुछ लोग तो यह भी कहते हैं, “क्या किसी सक्षम व्यक्ति के लिए अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित करना बहुत सामान्य बात नहीं है? इस दुनिया में यही चलता है कि बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है, यह दुनिया कमजोरों को शिकार बनाने वाले ताकतवर लोगों की है। यदि तुममें योग्यता है तो तुम्हें आगे बढ़कर अपना राज्य बनाना चाहिए, इसमें गलत क्या है? हर किसी के पास उतनी ही ताकत है जितनी उसकी योग्यता निर्धारित करती है, और उन्हें उतने ही लोगों पर शासन करना चाहिए जितने की उनकी शक्ति अनुमति देती है!” दूसरे लोग कहते हैं, “व्यभिचारी होने में क्या खराबी है? व्यभिचार में समस्या क्या है? दुष्ट प्रवृत्तियों का अनुसरण करने में क्या गलत है?” और इसी तरह की तमाम बातें। इन शब्दों को सुनने के बाद तुम लोग क्या महसूस करते हो? (घृणा।) सिर्फ घृणा? इन शब्दों को सुनने के बाद व्यक्ति को ऐसा महसूस होता है, “हम सब मानव एक ही चमड़ी के बने हैं, तो फिर ऐसा क्यों है कि कुछ लोग इन नकारात्मक चीजों से घृणा करना तो दूर रहा, इन्हें सँजोते भी हैं? और कुछ लोग इन चीजों से घृणा क्यों करते हैं? लोगों के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों है? जो लोग सत्य और सकारात्मक चीजों से विमुख रहते हैं, वे सकारात्मक चीजों को आखिर क्यों पसंद नहीं करते? वे नकारात्मक चीजों को इतना क्यों सँजोते हैं, यहाँ तक कि इन्हें खजाना मानते हैं? वे इन नकारात्मक चीजों की दुष्टता और घिनौनेपन को क्यों नहीं पहचान सकते?” लोगों के दिल में ऐसे विचार उठते हैं। मसीह-विरोधियों के मुँह से ये शब्द सुनकर, लोग एक तो घृणा महसूस करते हैं तो दूसरे अवाक भी रह जाते हैं। ऐसे लोगों की प्रकृति अपरिवर्तनीय होती है; वे बदल नहीं सकते, इसी कारण से परमेश्वर कहता है कि वह दानवों या शैतानों को नहीं बचाता। परमेश्वर का उद्धार मानवजाति के लिए है, जानवरों या राक्षसों के लिए नहीं। इन मसीह-विरोधियों जैसे लोगों को ही वास्तव में परमेश्वर दानव और जानवर कहता है; उन्हें मानवजाति में गिना नहीं जा सकता। यह स्पष्ट है, है ना?
5. बदलती परिस्थितियों में कलीसिया के प्रति उनका व्यवहार
मसीह के साथ मसीह-विरोधियों का व्यवहार उनकी मनःस्थिति पर निर्भर करता है—अभी-अभी इस मद के कितने पहलुओं पर संगति की गई? एक पहलू यह है कि काट-छाँट किए जाने से सामना होने पर वे मसीह के साथ एक खास तरीके से व्यवहार करते हैं। और कौन-से पहलू हैं? (जब वे देहधारी परमेश्वर के बारे में धारणाओं को जन्म देते हैं, जब उन्हें पदोन्नत या बर्खास्त किया जाता है और जब मसीह का शिकार किया जा रहा था।) ये कुल मिलाकर चार पहलू हो गए। चलो संगति जारी रखें। मसीह-विरोधी सत्य से विमुख होते हैं, इसलिए वे परमेश्वर में विश्वास सत्य हासिल करने के लिए नहीं रखते—वे परमेश्वर में विश्वास आशीष पाने के लिए रखते हैं; उनकी अपनी योजनाएँ, इरादे और उद्देश्य होते हैं। यही नहीं, उन्हें सत्ता और रसूख पसंद है, इसलिए वे देखो-और-इंतजार करो के रवैये के साथ परमेश्वर में विश्वास रखते हैं। वे कैसे देखते और इंतजार करते हैं? इसका मतलब है कि विश्वास रखते हुए वे यह जायजा भी लेते हैं कि क्या परमेश्वर के घर में लोगों की संख्या बढ़ रही है, सुसमाचार कार्य कैसे फैल रहा है, यह सुचारु रूप से हो रहा है या नहीं और क्या परमेश्वर के घर का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। इसके अलावा, वे यह भी देखते हैं कि क्या परमेश्वर के घर में अपने कर्तव्य निभाने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है, क्या अधिकाधिक लोग परमेश्वर के लिए स्वेच्छा से सेवा कर रहे हैं और क्या अधिकाधिक लोग परमेश्वर के घर के लिए कार्य करने को तैयार हैं। वे यह जायजा भी लेते हैं कि परमेश्वर के घर में कर्तव्य निभा रहे लोगों की सामाजिक और शैक्षिक पृष्ठभूमि कैसी है, समाज में उनकी पहचान और उनका रुतबा वास्तव में कैसा है। निरीक्षण के जरिये वे देखते हैं कि अधिकाधिक लोग परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, परमेश्वर के घर में लोगों की संख्या बढ़ रही है और परमेश्वर के घर में अपने कर्तव्य निभाने के लिए और भी अधिक लोग अपने परिवारों, नौकरियों और संभावनाओं को त्यागने के लिए तैयार हैं। इन चीजों को देखकर उन्हें लगता है कि वे अब और उदासीन नहीं रह सकते और उन्हें भी सदस्य बनकर खुद को भी परमेश्वर के घर के कार्य के प्रति और कर्तव्य निभाने वाले लोगों की श्रेणी के प्रति समर्पित कर देना चाहिए ताकि भविष्य में मिलने वाले आशीषों में उनकी भी हिस्सेदारी हो सके। भले ही वे परमेश्वर के घर में अपने कर्तव्य निभा कर अपनी भूमिका निभा सकते हैं, फिर भी वे अपनी संभावनाओं और नियति को कभी नहीं छोड़ते और अपने दिल में लगातार हिसाब लगाते रहते हैं। चूँकि इस समूह की, इन मसीह-विरोधियों की ऐसी महत्वाकांक्षाएँ और ऐसे स्वभाव हैं, इससे तय होता है कि जैसे-जैसे परमेश्वर के घर का रुतबा और शोहरत बढ़ेगी, वैसे-वैसे मसीह और परमेश्वर के प्रति उनका रवैया बदलता जाएगा। इसलिए अपने कर्तव्य निभाने की प्रक्रिया में, एक लिहाज से, वे अपनी संभावनाओं और नियति की खातिर पुरजोर ढंग से योजना बना रहे हैं, हिसाब लगाते रहते हैं और इंतजाम कर रहे हैं; दूसरे लिहाज से, वे यह भी देख रहे हैं कि परमेश्वर के घर का विकास हो रहा है, देश-विदेश में इसका प्रभाव है, क्या धीरे-धीरे लोगों की संख्या बढ़ रही है, क्या कलीसिया का विस्तार लगातार फैल रहा है, क्या कलीसिया समाज के कुछ नामी-गिरामी लोगों के साथ जुड़ चुकी है, क्या इसने पश्चिम में किसी स्तर की शोहरत हासिल कर ली है और क्या इसने एक ठोस बुनियाद डाल ली है। वे लगातार इन मामलों पर नजर रखकर पूछताछ कर रहे हैं। यहाँ तक कि कलीसिया के कार्य में हिस्सा न लेने वाले और अपने कर्तव्य न निभाने वाले कुछ लोग अपनी संभावनाओं और नियति की खातिर लगातार हिसाब लगाते रहते हैं और कलीसिया के विकास के बारे में बड़ी जिज्ञासा दिखाते हैं। इस प्रकार वे कलीसिया की वेबसाइट पर यह जानकारी भी खोजते हैं और कलीसिया के भीतर इन मामलों के बारे में पूछताछ भी करते हैं। जब उन्हें पता चलता है कि विदेशों में परमेश्वर के घर का कार्य सुचारु रूप से फैल रहा है और अधिक आशाजनक हो रहा है, कि पश्चिम में कार्य बेहतर ढंग से फैल रहा है और स्थिति सुधर रही है, तो वे दिल से आश्वस्त महसूस करते हैं। क्या उनकी आश्वस्ति की यह भावना उनमें सच्चे बदलाव का संकेत देती है? (नहीं।) वे आश्वस्त तो महसूस करते हैं मगर देहधारी परमेश्वर के प्रति, मसीह के प्रति उनका रवैया सिर्फ थोड़े अधिक “सम्मान” और प्रशंसा वाला होता है, इसमें सच्चा समर्पण नहीं होता।
जब मसीह मुख्य भूमि चीन में कार्य कर रहा था तो मसीह-विरोधी अक्सर सोचते थे, “क्या देहधारी परमेश्वर को गिरफ्तार किया जा सकता है? क्या वह सत्तारूढ़ अधिकारियों के हाथों में पड़ सकता है?” इस तरह सोचकर उनके मन में इस “तुच्छ व्यक्ति” के प्रति थोड़ी अवमानना का भाव पैदा हो गया। जब उन्होंने सुना कि देहधारी परमेश्वर के पास अक्सर घर नाम की जगह नहीं होती, अपना सिर टिकाने की कोई जगह नहीं होती और पकड़े जाने से बचने के लिए वह जहाँ भी संभव हो छिप जाता है तो देहधारी परमेश्वर के लिए उनकी थोड़ी-सी जिज्ञासा और बहुत अनिच्छापूर्ण “सम्मान” पूरी तरह चकनाचूर हो गया। लेकिन जब उन्होंने सुना कि देहधारी परमेश्वर, मसीह, संयुक्त राज्य अमेरिका में है, स्वतंत्रता की उस भूमि में है जिसके लिए मानवजाति लालायित रहती है तो उन्हें देहधारी परमेश्वर के प्रति ईर्ष्या महसूस हुई—सम्मान नहीं, बल्कि ईर्ष्या। लेकिन जब उन्होंने सुना कि देहधारी परमेश्वर पश्चिम में है, मानवजाति उसे अस्वीकार कर रही है, उसकी बदनामी और निंदा कर रही है, उसकी आलोचना कर रही है तो मसीह-विरोधियों के दिलों में उथल-पुथल भरी लहरें उठने लगीं : “तुम परमेश्वर हो तो लोग तुम्हें स्वीकार क्यों नहीं करते? तुम परमेश्वर हो तो धार्मिक दुनिया तुम्हें स्वीकार क्यों नहीं करती, बल्कि तुम्हारे बारे में इतनी सारी बेबुनियाद अफवाहें क्यों फैलाती है? तुम अपना बचाव करने के लिए आगे क्यों नहीं आते? तुम्हें वकीलों की टीम नियुक्त करनी चाहिए! जरा ऑनलाइन उन मानहानिकारक और निंदात्मक शब्दों को देखो, धार्मिक दुनिया की ओर से गढ़ी गई अफवाहों को देखो जो तुम्हें बहुत भयावह रूप में पेश करती हैं! हमें तुम्हारा अनुसरण करने में शर्मिंदगी महसूस होती है और इन बातों का उल्लेख करना भी अजीब लगता है। तुम पूरब और पश्चिम में निंदित हो, धार्मिक दुनिया द्वारा, मानवजाति और इस दुनिया द्वारा अस्वीकृत हो। हम तुम्हारा अनुसरण करके अपमानित महसूस करते हैं।” मसीह-विरोधियों की यही मानसिकता है। अपने दिलों में अपमानित महसूस करते हुए उनमें इस “तुच्छ व्यक्ति,” जिस रूप में उन्होंने उसे अपनी नजरों और दिलों से देखा था, के लिए तिरस्कार और सहानुभूति भी विकसित हुई—एक अत्यधिक अनिच्छित सहानुभूति। यह सहानुभूति कैसे उत्पन्न हुई? उन्होंने सोचा, “तुम व्यक्तिगत लाभ-हानि की चिंता किए बगैर इतना महान कार्य कर रहे हो, जिसे निःस्वार्थ समर्पण माना जा सकता है। इतनी बड़ी पीड़ा और अपमान सहने के पीछे तुम्हारा लक्ष्य क्या है? तार्किक रूप से कहें तो तुम अवश्य एक अच्छे इंसान होगे; वरना तुम इतना बड़ा अपमान कैसे झेल सकते थे और इतनी ज्यादा पीड़ा कैसे सह सकते थे? यह काफी दयनीय है और आसान नहीं है; तुम दिल से बहुत अन्याय महसूस करते होगे।” इस प्रकार उन्हें मसीह के प्रति थोड़ी-सी सहानुभूति महसूस हुई। उन्होंने विचार किया, “अगर मैं होता तो इतनी बड़ी पीड़ा सह न पाता; मैं मानवजाति के सामने अपना पक्ष रखूँगा। एक ओर मैं उन ऑनलाइन झूठी अफवाहों को मिटाने के लिए वकीलों की एक टीम नियुक्त करूँगा, तो दूसरी ओर धार्मिक दुनिया को कुछ चमत्कार और अजूबे दिखाऊँगा ताकि वे देख लें कि परमेश्वर कौन है—कौन सच्चा है और कौन झूठा है—बदनामी और निंदा करने वालों का मुँह बंद करने, उन्हें दंडित करने और सबक सिखाने के लिए मैं ऐसा करूँगा। क्या वे आगे ऐसा करने का दुस्साहस करेंगे? तुम ऐसा क्यों नहीं करते? तुम कभी अपना बचाव क्यों नहीं करते? क्या इसका यह कारण है कि तुममें शक्ति, साहस या बहादुरी की कमी है? वास्तव में क्या चल रहा है? कहीं यह कायरता तो नहीं है? ओह, तुमने अपने दिल में बहुत कुछ छिपा रखा है, इतने बड़े अन्याय को सहते हुए और चुप रहकर, अभी भी कार्य फैला रहे हो और कलीसिया में लोगों से धैर्यपूर्वक और गंभीरता से बात कर रहे हो, उनका पोषण कर रहे हो, फिर भी वे हमेशा धारणाएँ पालते हैं और विद्रोही बने रहते हैं। तुम्हारा दिल दुख रहा होगा! यह देखते हुए कि तुम यह सब सह सकते हो, तुम वास्तव में काफी अच्छे इंसान हो और सहानुभूति के पात्र हो।” उनकी सहानुभूति इसी तरह से उत्पन्न हुई। यह मसीह-विरोधियों की सहानुभूति है। मसीह-विरोधियों के उजागर होने से लेकर अब तक, यह एकमात्र “अच्छाई” है जो उन्होंने की है। यह “अच्छाई” कितनी अच्छी तरह की गई है? क्या यह वास्तविक है? (नहीं।)
मसीह-विरोधी लोग मसीह का अनुसरण करते हैं और उन्होंने वर्षों तक मसीह के बोले वचन स्वीकार किए हैं, फिर भी उन्होंने इस जीवन में मसीह को अपने रक्षक के रूप में स्वीकार करके कभी भी सम्मानित महसूस नहीं किया, न कभी उन्होंने मसीह की तरह पीड़ा सहते हुए खुद को सम्मानित महसूस किया, न ही मसीह की तरह खुद को दुनिया द्वारा निंदित होते और ठुकराए जाते सम्मानित महसूस किया। इसके बजाय वे मसीह की पीड़ा को उसका तिरस्कार करने और उसे नकारने का साधन और सबूत मानते हैं। उनमें मसीह के साथ इन सभी कष्टों को साझा करने की इच्छा या रवैया नहीं है। बल्कि वे तमाशबीनों के रूप में खड़े हैं, मसीह द्वारा सहन किए गए तमाम कष्ट देख रहे हैं, यह देख रहे हैं कि मानवजाति मसीह के साथ कैसा व्यवहार करती है और वे इन अवलोकनों को मसीह के प्रति अपने व्यवहार का आधार बनाते हैं। जब परमेश्वर के नाम की घोषणा की जाती है और सुसमाचार कार्य सारी मानवजाति के बीच धीरे-धीरे फैलता है और सुसमाचार के कार्य की संभावनाएँ आशाजनक दिखती हैं, तो धीरे-धीरे मसीह-विरोधी लोग देहधारी परमेश्वर के करीब आने लगते हैं और उसके प्रति थोड़ा-सा सम्मान और ईर्ष्या महसूस करते हैं। इसके साथ ही वे परमेश्वर के घर के करीब आने, परमेश्वर के घर का सदस्य बनने और परमेश्वर का कार्य फैलाने में भागीदार बनने का प्रयास करने के लिए बहुत जतन करते हैं। क्या बस इतनी ही बात है? क्या यह इतना सरल है? नहीं; वे परमेश्वर के घर में विभिन्न कार्य परियोजनाओं के विस्तार की स्थिति के आधार पर परमेश्वर के घर और मसीह के प्रति अपना रवैया बदलते हैं, वे ऐसा कभी भी और कहीं भी करते हैं। अगर वे सुनते हैं कि मानवजाति के बीच, और विशेष रूप से पश्चिम में, लोगों की कोई जाति कहती है कि “ये वचन वास्तव में परमेश्वर के वचन हैं, इनमें वास्तव में अधिकार है! परमेश्वर के वचनों से हम परमेश्वर का सार देखते हैं, हम सुनिश्चित हैं कि यह साधारण व्यक्ति परमेश्वर है, और यही मार्ग सच्चा मार्ग है,” तो मसीह-विरोधी चुपचाप अपने दिलों में खुशी मनाते हैं : “खुशकिस्मती से मैंने नहीं छोड़ा; यह सचमुच सच्चा मार्ग है! देखो, पश्चिमवाले भी कह रहे हैं कि देहधारी परमेश्वर कहाँ है। मुझे उसके वचनों को और अधिक सुनना चाहिए, मुझे जल्दी से धर्मोपदेशों को सुनने की जरूरत है!” इस पल मसीह-विरोधियों को लगता है कि परमेश्वर की वाणी बहुत सुंदर है, उनकी आत्मा को शुद्ध करने वाली है, और उसे सँजोना चाहिए। लेकिन जब परमेश्वर के घर को विदेशों में और मानवजाति के बीच अपना कार्य फैलाने में कभी-कभी कुछ असफलताओं का सामना करना पड़ता है या जब परमेश्वर के घर के कार्य में बाधा पड़ती है या यह प्रभावित होता है, इसमें बाहरी ताकतें दखल देती हैं, या यहाँ तक कि जब परमेश्वर के घर को कुछ कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तो मसीह-विरोधियों के दिल में फिर से ज्वार उठने लगता है : “देहधारी परमेश्वर कहाँ है? क्या वह बोल रहा है? इस मामले को कैसे सँभाला जा रहा है? क्या परमेश्वर चीजों को सही करता है? क्या परमेश्वर के चुने हुए लोग डर गए हैं? क्या किन्हीं लोगों ने परमेश्वर का घर छोड़ दिया है? क्या बाहरी दुनिया के कोई नामचीन या वरिष्ठ लोग परमेश्वर के घर के लिए दिल खोलकर बोल रहे हैं या कार्रवाई कर रहे हैं या इसके पक्ष में खड़े हैं? मैंने सुना है ऐसा कोई नहीं है। तो फिर क्या किया जाना चाहिए? क्या परमेश्वर की कलीसिया का अंत हो गया है? क्या मुझे संभव होते ही बाहर निकल जाना चाहिए?” क्या यह बहुत बड़ी उथल-पुथल है? इस समय जब वे परमेश्वर के धर्मोपदेश दोबारा सुनते हैं तो सोचते हैं : “अब उन खोखले वचनों की बात मत करो या उनके बारे में इतनी ऊँची बातें मत करो। मैं अब तुम्हारी बातें नहीं सुनने वाला। दुनिया परमेश्वर के घर को किसी भी क्षण निगल सकती है; वे वचन किस काम के हैं? क्या वे लोगों को बचा सकते हैं? परमेश्वर के घर का प्रभाव पलक झपकते ही गायब हो सकता है; इसके सारे लोग यूँ ही तितर-बितर हो जाएँगे।” वे अब मेरी बातें सुनना पसंद नहीं करते। क्या उनमें कोई सम्मान बचा है? कोई सहानुभूति? (कुछ भी नहीं।) क्या बचा है? बस देखने और मजाक उड़ाने की इच्छा बची है। कुछ लोग पर्दे के पीछे गंदी बातें कहते हैं, हानिकारक शब्द बोलते हैं और परमेश्वर के घर के दुर्भाग्य पर खुश होते हैं : “मुझे लगता है कि परेशानी बढ़ रही है, मुझे नहीं लगता कि तुम दृढ़ता से खड़े रह सकते हो। क्या वे सत्य किसी काम के हैं? क्या तुम्हारे वचन असरदार हैं? अब क्या? मुसीबत आ चुकी है, है ना?” उनका राक्षसी पक्ष उभरकर सामने आ जाता है। क्या मसीह-विरोधी हर चीज वही नहीं करते जो दानव करते हैं? उनमें सबसे बुनियादी मानवीय नैतिकता भी नहीं होती; वे पूरी तरह से दुष्ट हैं, जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं! वे परमेश्वर के घर से खाना खाते हैं, परमेश्वर के वचनों का पोषण पाते हैं, परमेश्वर की रक्षा और अनुग्रह का आनंद लेते हैं, लेकिन संकट का पहला संकेत पाते ही वे बाहरी लोगों का साथ देते हैं, परमेश्वर के घर के हितों के साथ विश्वासघात करते हैं और इसके दुर्भाग्य पर खुशियाँ मनाते हैं। वे दानव नहीं तो क्या हैं? वे पूरी तरह से दानव हैं! जब वे देखते हैं कि परमेश्वर का घर रफ्तार पकड़ रहा है तो वे देहधारी परमेश्वर के सामने “धम्म” से घुटनों के बल बैठ जाते हैं, मानो वे परमेश्वर के अनुयायी हों। लेकिन जब वे परमेश्वर के घर को शैतान द्वारा घिरा हुआ और निंदित देखते हैं तो वे परमेश्वर के सामने दंडवत होना बंद कर देते हैं। इसके बजाय वे गर्व से तनकर खड़े होते हैं, खुद को इतना गरिमामय मानते हैं कि किसी के सामने घुटने नहीं टेक सकते और तुम्हारा मजाक उड़ाने की ताक में बैठे रहते हैं। तुमसे बात करते हुए उनका लहजा और स्वर तेज हो जाता है; वे नौकरशाही लहजे में बोलने लगते हैं, असामान्य व्यवहार करने लगते हैं, उनका राक्षसी आचरण उभरने लगता है, तेजी से बदलने लगता है। मुझे बताओ, वो दिन कब आएगा जब ये लोग परमेश्वर का भय मानेंगे? (कभी नहीं।) बिल्कुल सही कहा, यह बिल्कुल सच्चा कथन है। ये लोग शैतान की बिरादरी के हैं; वे परमेश्वर का भय कभी नहीं मानेंगे क्योंकि वे सत्य को स्वीकार नहीं करते हैं—वे शैतान के हैं। यही शैतानी प्रकृति सार है, यही उन मसीह-विरोधियों का घिनौना चेहरा है जो शैतान के हैं। वे हमेशा परमेश्वर के घर का मजाक उड़ाने के लिए तैयार रहते हैं, हमेशा देहधारी परमेश्वर की हँसी उड़ाने की फिराक में रहते हैं, लगातार ऐसी सामग्री तैयार करने और इकट्ठा करने में लगे रहते हैं जिससे मसीह को और परमेश्वर के सार को नकारा जा सके, और वे हमेशा बाहरी लोगों का साथ देने और परमेश्वर के घर के हितों के साथ विश्वासघात करने के लिए तैयार रहते हैं। परमेश्वर के घर को जितनी अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है, मसीह-विरोधी उतने ही अधिक खुश और आनंदित होते हैं। जब भाई-बहन सामान्य रूप से अपने कर्तव्य निभाने की स्थिति में रहते हैं और परमेश्वर के घर का सारा काम व्यवस्थित रहता है तो ये मसीह-विरोधी असहज और असंतुष्ट रहते हैं, वे कामना करते हैं कि परमेश्वर के घर पर तुरंत मुसीबतें आ जाएँ और उम्मीद करते हैं कि परमेश्वर के घर का काम सुचारु रूप से न चले, कि उसे असफलताओं और बाधाओं का सामना करना पड़े। संक्षेप में कहें तो अगर परमेश्वर के घर में सब कुछ ठीक चल रहा हो और भाई-बहन सामान्य ढंग से अपने कर्तव्य निभाने और सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर सकते हों, तो मसीह-विरोधियों के दिलों को कोई खुशी नहीं मिलती। जब भाई-बहन परमेश्वर के वचन सुनते हैं, उसके वचनों के अनुसार अभ्यास करते हैं, परमेश्वर और मसीह को महान मानकर उनका सम्मान करते हैं, मसीह की गवाही दे सकते हैं और उसका उन्नयन कर सकते हैं तो मसीह-विरोधियों के लिए यह सबसे असहनीय समय होता है, ऐसा समय जब उनका सर्वाधिक न्याय होता है और उन्हें यातना मिलती है।
मसीह-विरोधी परमेश्वर के घर के विभिन्न समाचारों के बारे में पूछताछ करते रहते हैं। अगर वे लंबे समय तक यह पता नहीं लगा पाते कि परमेश्वर के घर के सुसमाचार कार्य को फैलाना कैसा चल रहा है, परमेश्वर के घर में विभिन्न पेशेवर कार्य कैसे आगे बढ़ रहे हैं, क्या वे सुचारु रूप से आगे बढ़ रहे हैं, क्या विदेशों में लोगों की तादाद बढ़ रही है, क्या कलीसिया का परिमाण बढ़ रहा है, क्या विभिन्न देशों में कलीसियाएँ स्थापित की गई हैं, या अगर वे यह नहीं सुन सकते कि अधिक अभिलाषी व्यक्तियों या समाज में प्रतिष्ठित लोगों का परमेश्वर के घर में प्रवेश हो रहा है तो उन्हें लगता है कि देहधारी परमेश्वर में विश्वास रखना ऊबाऊ और अरुचिकर है। वे देहधारी परमेश्वर पर ध्यान देना बंद कर देते हैं, यहाँ तक कि इस बात पर विचार करने लगते हैं कि अन्य अधिक जीवंत या प्रभावशाली संप्रदायों से जुड़ जाएँ। लेकिन, अगर वे कभी-कभार परमेश्वर के घर के बारे में कुछ अच्छी खबरें सुनते हैं, जैसे कि भाई-बहनों की गवाहियों के ऐसे वीडियो जो कुछ मानवाधिकार संगठनों की रुचि जगाते हैं और काफी ध्यान खींचते हैं, तो उनके दिल खुशी, आशा और आनंद से भर उठते हैं। उदाहरण के लिए, अगर परमेश्वर का घर किसी मशहूर समूह का ध्यान खींचता है या उससे कवरेज पाता है तो वे और भी अधिक प्रसन्न और उत्साहित हो जाते हैं : “ऐसा लगता है कि यह साधारण व्यक्ति बिल्कुल भी सीधा-सादा नहीं है; लगता है वह कुछ बड़ा हासिल करने जा रहा है!” अगर सौभाग्य से कोई जानी-मानी हस्ती या नेता कलीसिया के नाम का उल्लेख कर दे, तो मसीह-विरोधी और भी उत्तेजित हो जाते हैं : “इस जीवन में मैंने सबसे बड़ा और सबसे सटीक विकल्प चुना है, वह है सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण करना। अब से मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर को कभी न छोड़ने, परमेश्वर मानकर उससे पेश आने और अपने दिल में उसके प्रति श्रद्धा रखने का निर्णय लिया है, क्योंकि इस परमेश्वर का सम्मान अमुक नेता करता है। अगर वह उसका आदर करता है, तो मुझे भी उसका आदर करना चाहिए। नेतागण इस परमेश्वर का नाम लेते हैं और उसे मान्यता देते हैं तो उसमें विश्वास रखने और उसका अनुसरण करने में भला क्या पछतावा हो सकता है? क्या मुझे और भी अधिक दृढ़ता से उसका अनुसरण नहीं करना चाहिए? अब से मैंने दृढ़ निश्चय कर लिया है कि मैं कभी भी सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया छोड़ने का विचार मन में नहीं लाऊँगा। मुझे अच्छे से कार्य करना चाहिए, और भी कष्ट सहना चाहिए, और भी अधिक कीमत चुकानी चाहिए, कार्य करते समय भाई-बहनों से अधिक सलाह-मशविरा करना चाहिए और कलीसिया जो भी कहती है उसका पालन करना चाहिए। हो सकता है कि भविष्य में जैसे-जैसे कलीसिया का विस्तार होगा और उसे अधिक शोहरत मिलेगी, मुझे एक ऊँची उपाधि मिल सकती है और मैं श्रेष्ठ हो सकता हूँ!” इस बारे में सोचकर वे अपने दिल में खुशी महसूस करते हैं : “मैंने इतना अच्छा, इतना सटीक विकल्प चुना! मैं कितना चतुर हूँ! मैंने तो पहले छोड़ने के बारे में भी सोच लिया था—उस समय मैं कितना मूर्ख और अज्ञानी था! मैं युवा और मनमौजी था, मेरे गलत विकल्प चुनने और गलत निर्णय लेने की आशंका रहती थी। अब जब मैं बड़ा हो गया हूँ, मैं अधिक स्थिर हो गया हूँ और छिपना जानता हूँ, और आखिरकार मुझे उम्मीद नजर आती है। शुक्र है कि मैं छोड़-छाड़कर नहीं गया, मैंने उन अफवाहों पर विश्वास नहीं किया, मैं उनसे गुमराह नहीं हुआ या उनके बहकावे में नहीं आया। वह काफी खतरनाक था! मुझे आइंदा और अधिक सावधान रहने की जरूरत है। ऐसा लगता है कि यह व्यक्ति असाधारण है, और मुझे उसके साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए!” जोश और आवेग में आकर उन्होंने चढ़ावे के लिए कुछ आरोग्य उत्पाद और अच्छी चीजें खरीदीं और उन पर लिखा : “इन चीजों के साथ अपने प्यारे परमेश्वर को समर्पित।” नीचे उन्होंने अपने नाम के साथ लिखा : “विशेष भेंट, सादर समर्पित ... नाम ... तारीख।” यह एक खास और कीमती भेंट थी, लेकिन इसके पीछे एक कहानी है, एक गुप्त मंसूबा है। यह सुनकर क्या तुम लोग यह नहीं कहोगे, “तो परमेश्वर को लोग जो चढ़ावे देते हैं उन्हें तुम इस तरह समझते आ रहे हो”? ऐसा नहीं है कि मैं इसे इस तरह समझता हूँ, न ही सभी लोग इस तरह पेश आते हैं और न ही सारे चढ़ावे ऐसे मंसूबों के साथ आते हैं। लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि कुछ लोगों का चढ़ावे चढ़ाने का कार्यकलाप वास्तव में ऐसे इरादों और ऐसी पृष्ठभूमि से प्रभावित और प्रेरित होता है। क्या यह एक वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण है? (हाँ।)
मसीह-विरोधी जब अपने मन में हर चीज का हिसाब लगाते हैं तो उनका मुख्य विचार अपना स्वार्थ होता है। वे स्वार्थी और नीच होते हैं, हर चीज में उनका अपना ही हिसाब-किताब होता है। जहाँ तक परमेश्वर के घर में विभिन्न कार्यों की प्रगति का संबंध है, सत्य का अनुसरण करने वाले ज्यादातर लोगों के साथ ही अधिकतर सामान्य विश्वासी भी ऐसे मामलों के बारे में जानना और पूछताछ करना नहीं चाहते हैं, क्योंकि इन सामान्य मामलों के बारे में जानने का, सत्य का अनुसरण करने से कोई लेना-देना नहीं है। इनके बारे में जागरूक होना किसी काम का नहीं है; इनके बारे में जागरूक होने का मतलब यह नहीं है कि तुम्हारे पास जीवन या सत्य है, न ही इनके प्रति अज्ञानता का मतलब यह है कि तुम छोटे आध्यात्मिक कद के हो। ये मामले सत्य से संबंधित नहीं हैं और न ही ये सत्य समझने या परमेश्वर का भय मानने में किसी तरह की मदद करते हैं। यह वह स्तर है जिस तक विवेकशील लोग पहुँच सकते हैं। लेकिन मसीह-विरोधी इन मामलों को सर्वोच्च सत्य मानते हुए इनसे दृढ़ता से चिपके रहते हैं। वे इन मामलों के बारे में पूछताछ करते हैं और जानकारी इकट्ठा करते हैं। इन मामलों के बारे में जानकारी एकत्र करने के बाद वे इसे अपने तक ही सीमित नहीं रखते; वे इसे सब जगह फैलाते हैं, उन्हें लगता है कि इन चीजों के बारे में सभी भाई-बहन जिज्ञासु होते हैं, लेकिन हकीकत में बहुत से लोगों को इनमें कोई दिलचस्पी नहीं होती है। मैं स्वयं इन मामलों के बारे में शायद ही कभी पूछता हूँ। इनमें शामिल किसी व्यक्ति से अगर मैं संयोगवश मिलता हूँ तो हो सकता है मैं इसके बारे में बात कर लूँ, लेकिन मैं पूछताछ करने के लिए सक्रिय रूप से लोगों को नहीं खोजता। मैं एक ही स्थिति में पूछताछ करता हूँ : कोई कार्य कैसे किया जाना चाहिए, तुम लोगों के कार्य की प्रगति कैसी है, क्या कोई समस्या तो नहीं आ रही है या कोई भूल-चूक तो नहीं हो रही है। मैं केवल इस मामले में पूछताछ करता हूँ, इसके सिवाय जिज्ञासावश या चिंता के कारण मैं बिल्कुल भी पूछताछ नहीं करता हूँ। मेरी पूछताछ केवल कार्य के संबंध में होती है, जानकारी के स्रोत को लेकर या जिज्ञासावश नहीं। सत्य से प्रेम न करने वाले मसीह-विरोधी इन मामलों की तह में जाने के उत्सुक रहते हैं और ऐसा करने के पीछे उनका एक विशेष उद्देश्य होता है। परमेश्वर के कार्य के सही या गलत होने संबंधी राय बनाने के लिए और यहाँ तक कि यह राय बनाने के लिए कि क्या मसीह परमेश्वर है, वे बाहरी परिस्थितियों और परिवेशों का उपयोग करते हैं, जिनमें विभिन्न अवधियों में और विभिन्न सम्प्रदायों, नस्लों और जातीय समूहों के बीच कलीसिया की परिस्थितियाँ भी शामिल होती हैं। वे किस प्रकार के प्राणी हैं? क्या वे परमेश्वर में विश्वास रखते हैं? साफ तौर पर वे छद्म-विश्वासी हैं। चाहे तुम सत्य पर कितनी ही संगति कर लो, वे उसे सुन या समझ नहीं सकते। लेकिन वे कलीसिया के बाहरी मूल्यांकनों और विभिन्न देशों में कलीसिया की स्थिति और परिस्थितियों के बारे में बहुत विस्तार से पूछताछ करते हैं, जो वास्तव में छद्म-विश्वासियों से भिन्न नहीं है। गुप्त एजेंडा रखने वाले छद्म-विश्वासियों की यही अभिव्यक्तियाँ हैं। क्या तुम लोगों के इर्द-गिर्द ऐसे लोग हैं? तुम लोगों ने ध्यान नहीं दिया होगा। हर बार जब हम सभा करके मसीह-विरोधियों के विभिन्न सार उजागर करते हैं तो इनमें से कुछ लोगों की निंदा की जाती है। एक बार उजागर हो जाने पर उनके असली रंग छिप जाते हैं और वे अपना चेहरा दिखाने की हिम्मत नहीं कर पाते। खासकर इस संगति के बाद कुछ लोग पूछताछ करने का साहस नहीं करेंगे। लेकिन भले ही वे अब सीधे तौर पर पूछने की हिम्मत न करें, फिर भी वे पर्दे के पीछे गपशप जमा करते हैं। वे भाई-बहनों के बीच में पूछना बंद कर देते हैं लेकिन चोरी-छिपे इंटरनेट पर पूछताछ करते हैं। साथ ही, वे यह पता लगाने के सारे जतन करते हैं कि गैर-विश्वासी, विभिन्न संप्रदाय और पश्चिमी देश हमारी कलीसिया के बारे में क्या सोचते हैं और क्या कहते हैं, मानो वे बौरा गए हों। क्या यह थोड़ा पागलपन नहीं है? वे जुनूनी हैं, वे खुद से बेबस हैं। जो लोग सत्य से प्रेम नहीं करते और सत्य से विमुख होते हैं, वे समझ से परे होते हैं।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?