मद नौ : वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते और वे व्यक्तिगत यश के बदले उन हितों के साथ विश्वासघात तक कर देते हैं (भाग दस) खंड एक

II. मसीह-विरोधियों के हित

घ. उनकी संभावनाएँ और नियति

पिछली बार जब हम मिले थे तो हमने किस विषय पर संगति की थी? (परमेश्वर ने “सेवाकर्ता” की उपाधि से पेश आने के मसीह-विरोधियों के तरीकों पर संगति की थी। सबसे पहले, परमेश्वर ने इस विषय पर संगति की कि परमेश्वर “सेवाकर्ताओं” को किस प्रकार परिभाषित करता है। परमेश्वर ने सेवाकर्ता का कार्य छोड़ चुके व्यक्ति और अभी भी सेवाकर्ता का कार्य कर रहे व्यक्ति के बीच के अंतर पर भी संगति की थी और अंत में, परमेश्वर ने “सेवाकर्ता” के संबंध में मसीह-विरोधियों के दृष्टिकोणों और लक्ष्यों का गहन-विश्लेषण किया।) तो मसीह-विरोधी “सेवाकर्ता” की भूमिका के प्रति कैसा दृष्टिकोण और रवैया रखते हैं? वे क्या कहते हैं और क्या करते हैं? (“सेवाकर्ता” के प्रति मसीह-विरोधियों का अस्वीकृति और घृणा वाला रवैया होता है। वे इस उपाधि को ही स्वीकार नहीं करते, चाहे यह किसी से भी प्राप्त हुई हो और वे इस बात पर विश्वास करते हैं कि सेवाकर्ता होना अपमानजनक है। वे विश्वास करते हैं कि सेवाकर्ता परमेश्वर द्वारा मानवता के सार के आधार पर परिभाषित नहीं किए जाते हैं, बल्कि यह परमेश्वर द्वारा मनुष्य की पहचान और महत्व को चुनौती देना और उनका तिरस्कार करना है।) (मसीह-विरोधी यह प्रसिद्ध उक्ति कहते हैं : “जब दूसरे सुर्खियाँ बटोर रहे हों तो मैं पर्दे के पीछे जाकर काम नहीं करूँगा।” मसीह-विरोधी दूसरों से बस सेवा पाना चाहते हैं और सोचते हैं कि परमेश्वर को सेवा प्रदान करना लज्जाजनक कार्य है और इसलिए जब वे महसूस करते हैं कि वे स्वयं सेवाकर्ता हैं, तो वे परमेश्वर के घर में सेवा देना जारी नहीं रखना चाहते और इसकी जगह पलायन का रास्ता खोजना शुरू कर देते हैं और यहाँ तक कि वे विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न करने लगेंगे और विनाशकारी काम करेंगे।) “सेवाकर्ता” के प्रति मसीह-विरोधियों के रवैये पर विचार करें, तो हमें उनका सार क्या दिखाई देता है? (उनका सार परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण और सत्य से घृणा करने वाला है।) और यह कैसा स्वभाव है, जब उनका सार परमेश्वर एवं सत्य के प्रति शत्रुतापूर्ण है? (यह दुष्ट और क्रूर स्वभाव है।) सही है, यह दुष्ट और क्रूर स्वभाव है। परमेश्वर में विश्वास के लिए मसीह-विरोधियों की पहली प्रेरणा और इरादा क्या हैं? वे क्या पाना चाहते हैं? उनकी महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ क्या हैं? क्या वे सेवाकर्ता बनने आते हैं? क्या वे परमेश्वर में विश्वास करके एक अच्छा व्यक्ति बनने और सही पथ पर चलने के रवैये से आते हैं? (नहीं।) तो वे किस लिए आते हैं? सही कहें तो आशीष पाने के लिए और विशेष रूप से, वे राजाओं की तरह शासन करना, परमेश्वर के साथ राजाओं की तरह शासन करना और वे उच्च-स्तरीय और बेहतरीन चीजें पाना चाहते हैं। इसलिए, जब परमेश्वर कहता है कि वे लोग सेवाकर्ता हैं, तो यह मसीह-विरोधियों की आशीष पाने और राजाओं की तरह शासन करने की महत्वाकांक्षाओं तथा इच्छाओं के पूरी तरह प्रतिकूल होता है, यह उनकी अपेक्षाओं से बाहर की बात हो जाती है और उन्होंने कभी नहीं सोचा होता है कि परमेश्वर लोगों को यह उपाधि देगा। मसीह-विरोधी इस तथ्य को स्वीकार नहीं कर पाते हैं। और वे जब इस तथ्य को स्वीकार नहीं कर पाते हैं तो क्या कर सकते हैं? क्या वे इस तथ्य को स्वीकारना और खुद में बदलाव लाने का प्रयास करते हैं? वे न तो इस तथ्य को स्वीकारने और न ही अपनी महत्वाकांक्षाओं और स्वभावों में बदलाव लाने का प्रयास करते हैं। इसलिए, अगर उन्हें कहा जाता है कि वे सेवाकर्ता हैं और वे आशीष पाने के अपने इरादे तथा इच्छा से वंचित कर दिए जाते हैं तो वे कलीसिया में टिके नहीं रह सकेंगे। जिस क्षण उन्हें सत्य का एहसास होता है और पता चलता है कि ऐसी अभिव्यक्तियों वाले उनके जैसे लोग सेवाकर्ता हैं, वे सारी आशाएँ छोड़ देते हैं और अपना असली रंग दिखा देते हैं। वे सेवाकर्ता के रूप में अपनी यथास्थिति को बदलने का प्रयास नहीं करते, न ही वे “सेवाकर्ताओं” के प्रति अपने गलत रवैये और दृष्टिकोण में बदलाव लाने और सत्य के अनुसरण की राह पर चलने का प्रयास करते हैं। यही कारण है कि परमेश्वर चाहे जो भी व्यवस्था करे, ऐसे लोग उन व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण नहीं करेंगे और उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे, और वे सत्य की तलाश नहीं करेंगे। इसकी जगह, वे अपना दिमाग चलाकर खुद को सेवाकर्ता के तमगे से मुक्ति दिलाने का कोई मानवीय तरीका सोचने का प्रयास करते हैं और वे इस पहचान को मिटाने के लिए हरसंभव कार्य करते हैं। मसीह-विरोधियों की इस अभिव्यक्ति पर विचार करें तो मसीह-विरोधियों का रोम-रोम सत्य का विरोधी है। वे सत्य पसंद नहीं करते, वे सत्य स्वीकार नहीं करते और सत्य के बारे में उनके अपने विचार, उनकी अपनी धारणाएँ होती हैं, लेकिन सामान्य तरीके से नहीं। बल्कि वे सकारात्मक चीजों तथा सत्य के प्रति दिल की गहराई से अत्यधिक विमुखता, नफरत और यहाँ तक कि शत्रुता महसूस करते हैं—यही मसीह-विरोधियों का सार है।

तुम लोगों द्वारा अभी-अभी दिए गए उत्तरों से मैं देख सकता हूँ कि तुम लोगों ने प्रत्येक संगति के कथ्य का सारांश नहीं निकाला है, और न ही बाद में प्रार्थना-पाठ किया या उस पर मनन किया। पिछली बार हमने तीन मुख्य पहलुओं पर संगति की थी : पहला था सेवाकर्ता क्या है इसे परिभाषित करना; दूसरा था वे तरीके जिनसे मसीह-विरोधी “सेवाकर्ता” की उपाधि से पेश आते हैं या विशिष्ट रूप से कहें तो सेवाकर्ता बनने के लिए उनकी अनिच्छा की सटीक अभिव्यक्तियाँ तथा व्यवहार क्या हैं और इसके पीछे के सही कारण क्या हैं; और तीसरा था कि चूँकि मसीह-विरोधी सेवाकर्ता बनने के लिए अनिच्छुक होते हैं तो उनके इरादे क्या हैं, यानी कि वे क्या करना चाहते हैं, उनकी महत्वाकांक्षाएँ क्या हैं और परमेश्वर में विश्वास करने का उनका उद्देश्य क्या है। मूलतः, हमने इन तीन पहलुओं में से “वे तरीके जिनसे मसीह-विरोधी ‘सेवाकर्ता’ की उपाधि से पेश आते हैं” के उप-विषय पर संगति की और इन तीन पहलुओं के जरिए हमने मसीह-विरोधियों द्वारा “सेवाकर्ता” की उपाधि से पेश आने में उपयोग किए जाने वाले विभिन्न अभ्यासों और व्यवहारों का तथा इस बारे में उनके विचारों और दृष्टिकोण का गहन-विश्लेषण किया। तुम लोग सुनने के बाद प्रत्येक संगति के कथ्य पर मनन नहीं करते। तुम इन चीजों को केवल थोड़े समय के लिए याद रखते हो, लेकिन अगर लंबा वक्त गुजर जाता है तो तुम ये चीजें भूल जाते हो। अगर तुम सत्य समझना और पाना चाहते हो तो तुम्हें दिल से प्रयास करना होगा और बार-बार प्रार्थना करनी होगी और मनन करना होगा—तुम्हारे दिल में ये चीजें होनी जरूरी हैं। अगर तुम ऐसा नहीं करते, अगर तुम लोग इन चीजों को दिल से नहीं लेते और कोई प्रयास नहीं करते, और इन चीजों के बारे में अपने दिल में नहीं सोचते तो तुम लोग कुछ हासिल नहीं कर सकोगे। कुछ लोग कहते हैं, “मसीह-विरोधियों का मामला मेरे लिए बहुत दूर का विषय है। मैं कोई मसीह-विरोधी बनने की योजना नहीं बना रहा हूँ और मैं उनकी तरह बुरा व्यक्ति नहीं हूँ। मैं कर्तव्यनिष्ठा से केवल सबसे मामूली व्यक्ति बनूँगा और मेरे लिए यही ठीक है। मुझे जो भी करने के लिए कहा जाएगा, वह मैं करूँगा और मैं मसीह-विरोधियों का रास्ता नहीं चुनूँगा। इसके अलावा, अगर मेरा स्वभाव थोड़ा-बहुत मसीह-विरोधियों जैसा हुआ भी तो मैं समय के साथ इसमें धीरे-धीरे सुधार कर लूँगा और वह बस एक साधारण भ्रष्ट स्वभाव है, और इतना गंभीर नहीं है। इसे सुनने का कोई मतलब नहीं है।” क्या यह दृष्टिकोण सही है? (नहीं।) क्यों नहीं? अगर कोई स्वभाव में बदलाव करना चाहता है तो सबसे महत्वपूर्ण यह है कि उसे समझना चाहिए कि किसी भी तरह की परिस्थिति में उसके भ्रष्ट स्वभावों से कैसी स्थितियाँ, विचार और दृष्टिकोण उत्पन्न हो सकते हैं। इन चीजों को समझकर ही ऐसे लोग जान सकते हैं कि उनके अपने भ्रष्ट स्वभाव क्या हैं, ये किन क्षेत्रों में परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं और सत्य के विरुद्ध जाते हैं और उनके भीतर ऐसा क्या है जो सत्य के प्रतिकूल है; जब वे इन बातों को जान जाते हैं तो वे इन समस्याओं और भ्रष्ट स्वभावों का समाधान कर सकते हैं और सत्य वास्तविकता में प्रवेश प्राप्त कर सकते हैं। अगर तुम्हें प्रकट होने वाले विभिन्न भ्रष्ट स्वभावों, या विभिन्न परिस्थितियों में उत्पन्न हो सकने वाली विभिन्न स्थितियों की समझ नहीं है और तुम्हें उन तरीकों की समझ नहीं है, जिनसे ये चीजें सत्य का विरोध करती हैं या ये समझ नहीं है कि समस्याएँ कहाँ उत्पन्न होती हैं तो तुम इन समस्याओं का समाधान कैसे करोगे? अगर तुम इन समस्याओं का समाधान करना चाहते हो तो तुम्हें सबसे पहले यह समझना होगा कि उनका स्रोत कहाँ है, उनकी स्थिति क्या है, विशिष्ट समस्याएँ कहाँ उत्पन्न होती हैं, और इसके बाद यह तय करना होगा कि तुम्हें इसमें प्रवेश कैसे करना है। इस तरह से, तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों और उत्पन्न होने वाली विभिन्न स्थितियों का एक-एक कर समाधान किया जा सकता है। लगता है कि तुम लोग अभी भी सत्य वास्तविकता में प्रवेश या भ्रष्ट स्वभावों के समाधान एवं स्वभाव में बदलाव प्राप्त करने के संबंध में बहुत स्पष्ट नहीं हो; तुम अभी भी सही राह पर नहीं हो।

5. मसीह-विरोधी कलीसिया में अपने रुतबे को कैसे लेते हैं

आज हम मसीह-विरोधियों के हितों से संबंधित अंतिम विषय पर संगति करेंगे : मसीह-विरोधी कलीसिया में अपने रुतबे को कैसे लेते हैं। जब कलीसिया में उनके रुतबे की बात आती है तो मसीह-विरोधी कैसी अभिव्यक्तियाँ दर्शाते हैं, वे क्या करते हैं और ये करते समय उनके दृष्टिकोण तथा स्वभाव सार क्या होते हैं—हम इन्हें तीन पहलुओं में बाँटेंगे और एक-एक कर इनका गहन-विश्लेषण करेंगे। पहला पहलू है “दिखावे के साथ,” दूसरा है “पाखंड के साथ” और तीसरा है “सबसे ऊपर होकर।” इन तीनों में से प्रत्येक पहलू बहुत ही कम शब्दों में लिखा गया है और इसे संक्षिप्त माना जा सकता है, फिर भी प्रत्येक पहलू में मसीह-विरोधियों के अनेक विविध क्रियाकलाप, अभिव्यक्तियाँ और कथन, साथ ही उनके रवैये और स्वभाव शामिल हैं। विचार करो कि मैंने आज के विषय पर संगति करने के लिए इन तीन पहलुओं को परिभाषित क्यों किया। मसीह-विरोधी कलीसिया में अपने रुतबे को कैसे लेते हैं, इस विषय को पढ़ने के बाद तुम लोगों ने अपने मन में इसे कैसे परिभाषित किया? तुम्हारे मन में क्या विचार आए? अधिकांश लोग अपने मन में निस्संदेह रूप से मसीह-विरोधियों के अत्याचार, उनके रुतबा जताने, लोगों पर उनकी विजय और कलीसिया में उनके द्वारा सत्ता हथिया लेने की बात ही सोचते हैं, अर्थात् वे हमेशा अधिकारी बनना, अपना रुतबा जताना, सत्ता प्राप्त करना, लोगों पर नियंत्रण स्थापित करना चाहते हैं—मूलतः, लोग यही बातें सोचते हैं। ये अपेक्षाकृत स्पष्ट पहलू हैं, जो मसीह-विरोधी अक्सर कलीसिया में अभिव्यक्त करते हैं, तो इनके अलावा, अन्य अभिव्यक्तियाँ क्या होती हैं, जिन्हें लोग देख नहीं पाते। मसीह-विरोधी कलीसिया में अपनी अच्छी पकड़ बनाने, रुतबा हासिल करने और उच्च प्रतिष्ठा तथा सत्ता प्राप्त करने एवं अधिक लोगों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए और क्या करते हैं? उनकी अन्य अभिव्यक्तियाँ क्या होती हैं? ये मसीह-विरोधियों के अधिक भ्रामक, कपटपूर्ण और प्रच्छन्न तरीके और साधन होते हैं और उनके दिल में कुछ अज्ञात विचार और गुप्त इरादे तथा लक्ष्य भी हो सकते हैं, है ना? तो चलो, उन सब पर एक-एक कर संगति करें।

i. दिखावे के साथ

पहला पहलू है “दिखावे के साथ।” “दिखावा” शब्द का शाब्दिक अर्थ समझना आसान है और यह स्पष्ट रूप से प्रशंसनीय शब्द नहीं है। जब किसी के बारे में कहा जाता है कि वह दिखावा अच्छा कर लेता है, तो इसका अर्थ है कि वह जो भी करता है वह दिखावा है, वह जो भी करता है उसे दूसरे समझ नहीं सकते, और वह दूसरों के साथ केवल सतही तौर पर कार्य करता है और बोलता है, तो जो व्यक्ति इस तरह से कार्य और व्यवहार करता है, वह निश्चित रूप से बहुत धूर्त व्यक्ति है। वह एक ईमानदार व्यक्ति नहीं है और वह एक सरल, निष्कपट व्यक्ति नहीं है, बल्कि वह शातिर दिमाग है, बहुत गूढ व्यक्ति है और दूसरों को धोखा देने में माहिर है। यह “दिखावा” शब्द की सबसे बुनियादी समझ है। तो ऐसे में मसीह-विरोधियों के व्यवहार और क्रियाकलापों और इस तरह के व्यवहार के बीच क्या संबंध है? वे ऐसा क्या करते हैं जो दिखाता है कि उनमें दिखावे का सार है? दिखावे में संलिप्त होने का उनका असली उद्देश्य क्या है? असल में उनका इरादा क्या है? उन्हें दिखावा क्यों करना पड़ता है? ये चीजें उस विषय से बहुत गहरा संबंध रखती हैं जिस पर हम आज संगति करेंगे।

मसीह-विरोधी वे लोग हैं जो दूसरों के पीछे रहने को तैयार नहीं हैं। वे दूसरों पर निर्भर होने, दूसरे लोगों का आदेश, निर्देश और आज्ञा मानने को तैयार नहीं हैं और वे साधारण बने रहने और दूसरों द्वारा तुच्छ समझे जाने के लिए तैयार नहीं हैं। बल्कि वे ऐसे लोग होते हैं, जो प्रतिष्ठा चाहते हैं, चाहते हैं कि दूसरे लोग उन्हें बहुत सम्मान दें और बहुत महत्व दें। इसके अतिरिक्त, कलीसिया में और दूसरे लोगों के बीच वे और भी अधिक ऐसे व्यक्ति बनना चाहते हैं, जो दूसरों को आदेश दें, दूसरों को अपने लिए काम करने का निर्देश दें। वे अपनी प्रतिष्ठा, प्रभाव तथा शक्ति के जरिए अपनी इच्छाएँ पूरी करना चाहते हैं और वे साधारण लोग बनना नहीं चाहते, जिन्हें कोई भी आदेश और काम करने का निर्देश दे सके। ये वे अनुसरण और इच्छाएँ हैं जो अन्य लोगों के बीच मसीह-विरोधियों में होती हैं। जब बात दूसरों के बीच अपने रुतबे की हो तो मसीह-विरोधी बहुत संवेदनशील हो जाते हैं। समूह में होने पर, उनका मानना है कि उनकी उम्र कोई मायने नहीं रखती, उनका शारीरिक स्वास्थ्य कोई मायने नहीं रखता। मायने यह रखता है कि अधिकांश लोग उन्हें कैसे देखते हैं, अधिकांश लोग उन्हें समय देते हैं या नहीं और अपने भाषणों तथा क्रियाकलापों में उन्हें स्थान देते हैं या नहीं, अधिकांश लोगों के दिलों में उनका रुतबा और उनका स्थान ऊँचा है या साधारण, अधिकांश लोग उन्हें बड़ा आदमी मानते हैं या साधारण या उन्हें कुछ खास नहीं मानते, आदि; अधिकांश लोग उनकी परमेश्वर में आस्था रखने की योग्यता को कैसे देखते हैं, लोगों में उनकी बातों का वजन कितना है, अर्थात् कितने लोग उनकी बातों का अनुमोदन करते हैं, कितने लोग उनकी प्रशंसा करते हैं, उन्हें समर्थन देते हैं, उन्हें ध्यान से सुनते हैं और वे जो कुछ कहते हैं उसे आत्मसात करते हैं; इसके अतिरिक्त, अधिकांश लोगों की नजर में, उनकी आस्था बहुत ज्यादा है या बहुत कम, पीड़ा सहन करने का उनका संकल्प कैसा है, वे कितना त्याग करते हैं और कितना खपते हैं, परमेश्वर के घर में उनका योगदान कितना है, परमेश्वर के घर में उनका पद उच्च है या निम्न, अतीत में उन्होंने कौन-सी पीड़ा झेली है और उन्होंने कौन-से महत्वपूर्ण काम किए हैं—यही वे चीजें हैं, जिनके बारे में वे सबसे ज्यादा चिंतित रहते हैं। मसीह-विरोधी अक्सर अपने मन में पद और क्रम का आकलन करते हैं, अक्सर तुलना करते हैं कि कलीसिया में सबसे ज्यादा गुणी कौन है, कलीसिया में सबसे बेहतर वक्ता और वाक्पटु कौन है, व्यावसायिक रूप से सबसे ज्यादा कुशल कौन है और प्रौद्योगिकी के मामले में सबसे ज्यादा दक्ष कौन है। जब वे इन चीजों की तुलना करते हैं, तब वे विभिन्न व्यावसायिक कौशलों का अध्ययन करने का प्रयास करते रहते हैं और इनमें दक्षता और महारत हासिल करने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। मसीह-विरोधी मुख्य रूप से उपदेश देने और परमेश्वर के वचनों की इस तरह से व्याख्या करने के लिए कोशिश करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जिससे उनकी प्रतिभा का प्रदर्शन हो और दूसरे लोग उन्हें सम्मान दें। जब वे ऐसा प्रयास कर रहे होते हैं, तब वे यह जानने का प्रयास नहीं करते कि सत्य को कैसे समझें या सत्य वास्तविकता में कैसे प्रवेश करें, बल्कि इसकी जगह वे यह सोच रहे होते हैं कि इन शब्दों को कैसे याद किया जाए, वे और ज्यादा लोगों के सामने कैसे अपने गुणों का प्रदर्शन कर सकते हैं जिससे कि और ज्यादा लोग जान सकें कि वे वाकई कुछ हैं, कि वे महज साधारण लोग नहीं हैं बल्कि वे सक्षम हैं और यह कि वे साधारण लोगों से ऊँची श्रेणी में हैं। इस तरह के विचारों, इरादों और मतों को प्रश्रय देते हुए, मसीह-विरोधी लोगों के बीच रहते हैं और सब तरह की अलग-अलग चीजें करते रहते हैं। चूँकि यह उनकी राय है और चूँकि उनके ये लक्ष्य और महत्वाकांक्षाएँ हैं, वे अच्छे व्यवहार, सही कथन और छोटे-बड़े सभी प्रकार के अच्छे क्रियाकलाप करने से खुद को रोक नहीं सकते। ये व्यवहार और क्रियाकलाप उन लोगों को, जिन्हें कोई आध्यात्मिक समझ नहीं है, जो मूलतः सत्य का अनुसरण नहीं करते और जो केवल अच्छे आचरण पर ध्यान केंद्रित करते हैं, मसीह-विरोधियों से ईर्ष्या और उनकी प्रशंसा करने और यहाँ तक कि उनकी नकल और अनुसरण करने के लिए प्रेरित करते हैं, और इस तरह मसीह-विरोधियों का लक्ष्य पूरा हो जाता है। जब मसीह-विरोधी ऐसे इरादे और महत्वाकांक्षाएँ रखते हैं, तो वे कैसे व्यवहार करते हैं? इसी विषय पर हम आज संगति करेंगे। यह विषय संगति के लिए उपयुक्त है और इससे भी अधिक यह तुम में से प्रत्येक के लिए ध्यान देने और जानने योग्य विषय है।

मसीह-विरोधी सत्य के विरोधी होते हैं, वे सत्य बिल्कुल नहीं स्वीकारते—जो स्पष्ट रूप से एक तथ्य की ओर संकेत करता है : मसीह-विरोधी कभी सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य नहीं करते, वे कभी सत्य का अभ्यास नहीं करते—जो कि एक मसीह-विरोधी की सबसे मुखर अभिव्यक्ति है। प्रतिष्ठा और रुतबे के अलावा, आशीष और पुरस्कार पाने के अलावा एक और चीज जिसका वे अनुसरण करते हैं वह है देह के सुखों और रुतबे से मिलने वाले लाभों का आनंद; और ऐसी स्थिति में वे स्वाभाविक रूप से गड़बड़ियाँ और बाधाएँ पैदा करते हैं। इन तथ्यों से पता चलता है कि वे जिन चीजों के पीछे भागते हैं, और जैसा उनका व्यवहार और अभिव्यक्तियाँ हैं, वे सारी चीजें परमेश्वर को नापसंद हैं। और ये सब सत्य का अनुसरण करने वाले लोगों का क्रियाकलाप और व्यवहार तो बिल्कुल नहीं होता। उदाहरण के लिए, कुछ मसीह-विरोधी जो पौलुस की तरह होते हैं, वे कर्तव्य करते समय कष्ट उठाने का संकल्प लेते हैं, पूरी-पूरी रात जागते हैं, बिना खाए-पिए काम करते रहते हैं, अपने शरीर को वश में रख सकते हैं, किसी भी बीमारी और परेशानी से निकल सकते हैं। यह सब करने का उनका उद्देश्य क्या होता है? इसके जरिए वे लोगों को यह दिखाना चाहते हैं कि जब परमेश्वर के आदेश की बात आती है तो वे खुद को दरकिनार कर आत्म-त्याग कर सकते हैं; उनके लिए कर्तव्य ही सबकुछ है। वे यह सब दिखावा लोगों के सामने करते हैं, जब लोग आसपास होते हैं, तो वे जब आराम करना चाहिए, तब आराम नहीं करते, बल्कि जानबूझकर देर तक काम करते हैं, जल्दी उठते हैं और देर से सोने जाते हैं। लेकिन मसीह-विरोधी जब सुबह से शाम तक खुद को इस तरह थकाते हैं तो कर्तव्य निभाने में उनकी कार्यकुशलता और प्रभावशीलता के बारे में क्या कहेंगे? ये बातें तो उनकी सोच के दायरे से ही बाहर होती हैं। वे यह सब सिर्फ लोगों के सामने करने की कोशिश करते हैं, ताकि लोग उनका कष्ट देख सकें, और यह देख सकें कि वे अपने बारे में सोचे बिना किस तरह खुद को परमेश्वर के लिए खपाते हैं। वे इस बारे में बिल्कुल नहीं सोचते कि वे जो कर्तव्य कर रहे हैं और जो काम कर रहे हैं, वह सत्य सिद्धांतों के अनुसार हो भी रहा है या नहीं, वे इसके बारे में थोड़ा भी नहीं सोचते। वे केवल यही सोचते हैं कि सभी लोग उनके अच्छे व्यवहार को देख रहे हैं या नहीं, सबको इसकी जानकारी हो रही है या नहीं, क्या उन्होंने सब पर अपनी छाप छोड़ दी है और क्या यह छाप उनमें प्रशंसा और स्वीकार्यता का भाव पैदा करेगी, क्या ये लोग उनकी पीठ पीछे उन्हें शाबाशी देंगे और उनकी प्रशंसा करते हुए कहेंगे, “ये लोग वास्तव में कष्ट सह सकते हैं, इनकी सहनशक्ति और असाधारण दृढ़ता की भावना हममें से किसी के बस की बात नहीं। ये वे लोग हैं जो सत्य का अनुसरण करते हैं, जो कष्ट सहकर भारी बोझ उठा सकते हैं, ये लोग कलीसिया के स्तंभ हैं।” यह सुनकर मसीह-विरोधी संतुष्ट हो जाते हैं। मन में सोचते हैं, “मैं कितना चतुर हूँ जो ऐसा दिखावा किया, ऐसा करके मैंने कितनी चालाकी की! मुझे पता था कि लोग सिर्फ बाहर की चीजें देखते हैं, और उन्हें ये अच्छे व्यवहार पसंद हैं। मुझे पता था कि अगर मैं इस तरह से पेश आऊँगा, तो इससे लोगों की स्वीकृति मिलेगी, इससे मुझे शाबाशी मिलेगी, वे लोग तहेदिल से मेरी प्रशंसा करेंगे, और इस तरह वे मुझे पूरी तरह एक नई रोशनी में देखेंगे, और फिर कभी कोई मुझे हिकारत से नहीं देखेगा। और अगर कभी ऊपरवाले को पता चल भी गया कि मैं असली काम नहीं कर रहा और मुझे बर्खास्त कर दिया गया, तो निस्संदेह बहुत-से लोग मेरे समर्थन में खड़े हो जाएँगे, जो मेरे लिए रोएँगे, मुझसे रुकने का आग्रह करेंगे और मेरे पक्ष में बोलेंगे।” वे गुप्त रूप से अपने नकली व्यवहार पर आनंदित रहते हैं—और क्या यह आनंद भी एक मसीह-विरोधी के प्रकृति सार को प्रकट नहीं करता? और यह क्या सार है? (दुष्टता।) सही है—यह दुष्टता का सार ही है। दुष्टता के इस सार के नियंत्रण में, मसीह-विरोधी आत्मतुष्टि और आत्मप्रशंसा की स्थिति उत्पन्न करते हैं, जिसके कारण वे गुप्त रूप से अपने दिल में परमेश्वर के विरुद्ध हल्ला मचाते हैं और उसका विरोध करते हैं। ऊपरी तौर पर, वे बड़ी कीमत चुकाते-से दिखते हैं और उनकी देह काफी पीड़ा सहती है, लेकिन क्या वे सच में परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील हैं? क्या वे सच में परमेश्वर के लिए खुद को खपाते हैं? क्या वे अपना कर्तव्य निष्ठापूर्वक कर सकते हैं? नहीं, वे नहीं कर सकते। अपने दिल में वे गुप्त रूप से परमेश्वर से प्रतिस्पर्धा करते हैं, सोचते हैं, “क्या तुमने नहीं कहा कि मैं सत्य से रहित हूँ? क्या तुमने नहीं कहा कि मेरा स्वभाव भ्रष्ट है? क्या तुमने नहीं कहा कि मैं घमंडी और दंभी हूँ और यह कि मैं अपना राज्य स्थापित करने का प्रयास करता हूँ? क्या तुमने नहीं कहा कि मुझे कोई आध्यात्मिक समझ नहीं है, कि मैं सत्य को नहीं समझता और इसलिए सेवाकर्ता हूँ? मैं तुम्हें दिखाऊँगा कि मैं कैसे सेवा देता हूँ और जब मैं इस तरह सेवा देता हूँ और इस तरह काम करता हूँ तो भाई-बहन मेरे बारे में क्या सोचते हैं। मैं तुम्हें दिखाऊँगा कि मैं इस तरह काम करके और अधिक लोगों की सराहना पा सकता हूँ या नहीं। और एक दिन जब तुम मुझे दूर भेजना और मेरी निंदा करना चाहोगे तो मैं देखूँगा कि असल में तुम इसका प्रबंधन कैसे करते हो!” मसीह-विरोधी अपने दिल में इस तरह से परमेश्वर से प्रतिस्पर्धा करते हैं और सत्य के अनुसरण को इन अच्छे व्यवहारों से बदलने का प्रयास करते हैं। ऐसा करके वे परमेश्वर द्वारा कार्य करके लोगों को सत्य का अभ्यास करने की ओर ले जाने के उस व्यावहारिक प्रभाव को बेअसर करने का प्रयास करते हैं जिससे वे स्वभावगत बदलाव प्राप्त कर सकते हैं। सार रूप में, वे इस व्याख्या का उपयोग न्याय और ताड़ना के जरिए मनुष्य को बचाने के परमेश्वर के कार्य को नकारने और उसकी निंदा करने के लिए करते हैं और वे विश्वास करते हैं कि परमेश्वर द्वारा लोगों का न्याय करना गलत और अप्रभावी है। मसीह-विरोधियों के ये विचार और दृष्टिकोण दुष्ट, कपटी, परमेश्वर के प्रतिरोधी और परमेश्वर के विरुद्ध हैं। जब परमेश्वर ने उनकी स्पष्ट रूप से निंदा नहीं की हो, तो वे अपने दिल में परमेश्वर से प्रतिस्पर्धा करना शुरू कर देते हैं; जब परमेश्वर ने उनका खुलासा और उनके व्यवहार की निंदा नहीं की हो, तब वे दूसरों को गुमराह करने और लोगों का दिल जीतने के लिए दिखावे का उपयोग करने लगते हैं ताकि परमेश्वर के वचनों को नकार सकें और इस तथ्य को नकार सकें कि केवल सत्य का अनुसरण करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है और परमेश्वर के इरादे पूरे किए जा सकते हैं। क्या यह उनकी व्याख्या का सार नहीं है? क्या मसीह-विरोधियों का स्वभाव दुष्ट नहीं है? अपनी पीड़ा के पीछे, वे ऐसी महत्वाकांक्षाएँ और मिलावटें पालते हैं और इसी कारण से परमेश्वर ऐसे लोगों और ऐसे स्वभाव से घृणा करता है। लेकिन, मसीह-विरोधी कभी भी इस तथ्य को नहीं देखते या स्वीकार नहीं करते। परमेश्वर मनुष्य के अंतरतम हृदय का अवलोकन करता है, जबकि मनुष्य, मनुष्य का केवल बाहरी रूप देखता है—मसीह-विरोधियों के बारे में सबसे बेवकूफी वाली बात ये है कि वे इस तथ्य को स्वीकार नहीं करते, न ही इसे देख सकते हैं। और इसलिए वे खुद को लोगों के सामने प्रस्तुत करने और आकर्षक दिखाने के लिए अच्छे व्यवहार का उपयोग करने का हर संभव प्रयास करते हैं, ताकि दूसरे यह सोचें कि वे कष्ट और कठिनाई झेल सकते हैं, वह पीड़ा झेल सकते हैं जो आम लोग नहीं झेल सकते, वह काम कर सकते हैं जो आम लोग नहीं कर सकते, ताकि दूसरे लोग यह सोचें कि उनमें सहनशक्ति है, कि वे अपने शरीर को वश में कर सकते हैं, और उन्हें अपने स्वयं के दैहिक हितों या आनंद की कोई परवाह नहीं है। कभी-कभी तो वे इरादतन अपने कपड़े तब तक पहनेंगे, जब तक कि वे थोड़े गंदे न हो जाएँ और उन्हें धोएँगे नहीं, यहाँ तक कि तब भी नहीं धोएँगे जब उनमें से बदबू आने लग जाए; वे वह सब कुछ करेंगे जिससे दूसरे लोग उनकी आराधना करें। जितना ज्यादा वे दूसरों के सामने जाएँगे, उतना ही ज्यादा वे हर संभव दिखावा करेंगे, ताकि लोग देख सकें कि वे सामान्य लोगों से अलग हैं, कि परमेश्वर के लिए खुद को खपाने की उनकी इच्छा सामान्य लोगों से ज्यादा है, कि पीड़ा सहने का उनका संकल्प सामान्य लोगों से ज्यादा दृढ़ है और यह कि उनमें कष्ट सहने की क्षमता सामान्य लोगों से अधिक है। मसीह-विरोधी इस तरह की परिस्थितियों में ऐसे व्यवहार करते हैं और इन व्यवहारों के पीछे मसीह-विरोधियों की दिली इच्छा ये होती है कि लोग उनकी आराधना करें और उनके बारे में ऊँचा सोचें। और जब वे अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेते हैं, जब उन्हें लोगों से प्रशंसा सुनने को मिलती है और जब वे देखते हैं कि लोग उन्हें ईर्ष्या, प्रशंसा और सराहना के भाव से देखते हैं, तब वे अपने दिल में प्रसन्न और संतुष्ट होते हैं।

मसीह-विरोधियों के पीड़ा सहन करने और कीमत चुकाने वाले सतही अच्छे व्यवहार तथा असल में परमेश्वर के इरादों के लिए विचारशील होने, वफादार होने और परमेश्वर के लिए अपने-आप को ईमानदारी से खपाने वाला होने में क्या अंतर है? (इरादा अलग है। जो खुद को परमेश्वर के लिए वास्तव में खपाते हैं, वे सिद्धांतों की खोज पर, काम के नतीजों पर और काम की दक्षता पर ध्यान केन्द्रित करेंगे। मसीह-विरोधी खुद को परमेश्वर के लिए खपाते दिखेंगे, लेकिन यह केवल दूसरों से सम्मान प्राप्त करने के लिए होगा। वे काम की दक्षता और काम के नतीजों की बिल्कुल चिंता नहीं करते।) सही है, उनके भाषणों तथा क्रियाकलापों के इरादों, प्रेरणा और स्रोत में अंतर है—यह बिल्कुल अलग है। जो लोग उनकी तरह पीड़ा सहन करते हैं और सत्य का अनुसरण करते हैं, वे इस पीड़ा के दौरान सिद्धांतों की तलाश करते हैं। सिद्धांतों की तलाश करना कम से कम यह दिखाता है कि उनमें समर्पण की मानसिकता है; वे अपने काम या अपने लिए काम करने का प्रयास नहीं करते, उनके क्रियाकलापों में समर्पण और परमेश्वर का भय मानने वाला दिल होता है और वे बिल्कुल स्पष्ट रूप से जानते हैं कि वे अपना कर्तव्य कर रहे हैं और इंसान के उद्यम में संलग्न नहीं हैं। हालाँकि मसीह-विरोधी भी ऐसे ही पीड़ा सहते दिखाई देते हैं, लेकिन वे ऐसा आधे-अधूरे मन से करते हैं और इसका लोगों के सामने बस दिखावा करते हैं; वे सत्य सिद्धांतों की तलाश नहीं करते, उनके क्रियाकलापों में समर्पण या परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय नहीं होता, उनके दिल परमेश्वर के सामने उपस्थित नहीं होते और वे लोगों को जीतने और लोगों का समर्थन हासिल करने के लिए ऐसे व्यवहार और अभिव्यक्तियों का उपयोग करने का प्रयास करते हैं। यहाँ एक अंतर है, है ना? मसीह-विरोधियों के व्यवहार के सार को देखते हुए, क्या हम कह सकते हैं कि उनके द्वारा पीड़ा सहन करना केवल एक दिखावा है? (हाँ।) यह इस बात को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि पीड़ा सहन करने का उनका व्यवहार और अभिव्यक्ति बस एक औपचारिकता है और लोगों के सामने दिखावा है—वे परमेश्वर के समक्ष कार्य नहीं कर रहे हैं। यह एक पहलू है। दूसरा पहलू यह है कि दिखावे और धोखेबाजी में मसीह-विरोधियों से ज्यादा पारंगत कोई नहीं होता—तो वे अनुकूलन में काफी सक्षम होते हैं और अक्सर लोगों को गुमराह करने और धोखा देने के लिए कुछ चालाकीपूर्ण तरीके उपयोग में लाते हैं, जिससे लोगों से अपनी आराधना करवाने के अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकें। वे यही काम सबसे अच्छी तरह कर सकते हैं, यह उनके खून में है, उनमें यह चालाकी और गिरगिट वाला सार जन्मजात होता है। उदाहरण के लिए, कुछ मसीह-विरोधी ऐसे होते हैं, जिनकी बातों और व्यवहार से लगता है कि वे बहुत दयालु और विनम्र हैं, जो कभी दूसरों की कमियाँ उजागर नहीं करते, जो सामंजस्य स्थापित करना जानते हैं, जो तुरंत दूसरों की आलोचना या निंदा नहीं करते, जो लोगों के निराश और कमजोर होने पर तुरंत मदद के लिए पहुँचते हैं। उन्हें देखकर लगता है कि वे सहृदय और दयालु हैं, अच्छे व्यक्ति हैं। जब लोग मुश्किल में होते हैं, वे कभी-कभी बातों से उनकी मदद करते हैं, और कभी-कभी कुछ क्रियाकलापों से; कभी-कभी ऐसा भी होता है कि वे उनकी मदद के लिए उन्हें कुछ पैसे या कोई वस्तु दान कर देते हैं। बाहर से उनके क्रियाकलाप अच्छे प्रतीत होते हैं। अधिकांश लोग सोचते हैं कि वे इसी प्रकार के व्यक्ति से मिलना और जुड़ना चाहते हैं; ऐसे लोग उन्हें डराने या परेशान करने का काम नहीं करेंगे और वे उनसे अधिक मदद ले सकते हैं—भौतिक या मानसिक सहयोग ले सकते हैं, उदाहरण के लिए, उच्च आध्यात्मिक सिद्धांतों, आदि में मदद। बाहर से, ऐसे लोग कुछ भी गलत नहीं करते : वे कलीसिया में विघ्न-बाधा उत्पन्न नहीं करते और जिस भी समूह में होते हैं, वहाँ तालमेल लाते प्रतीत होते हैं; उनके संचालन और मध्यस्थता में प्रत्येक व्यक्ति प्रसन्न दिखता है, लोग मिल-जुलकर रहते हैं और उनमें झगड़ा या विवाद नहीं होता। जब वे वहाँ होते हैं तो प्रत्येक व्यक्ति को लगता है कि वे एक-दूसरे के साथ कितनी अच्छी तरह मिल-जुलकर रहते हैं, वे एक-दूसरे के कितने करीब हैं। जब वे चले जाते हैं तो कुछ लोग एक दूसरे से गपशप करने लगते हैं, एक-दूसरे का बहिष्कार करने लगते हैं, ईर्ष्या करना और विवाद करना शुरू कर देते हैं; केवल जब ये मसीह-विरोधी उनके बीच होते हैं और शांति का आह्वान करते हैं, तभी सभी लोग बहस करना बंद करते हैं। ये मसीह-विरोधी अपने काम में बहुत सक्षम प्रतीत होते हैं, लेकिन एक चीज है, जो दिखाती है कि वे वास्तव में क्या कर रहे हैं : जिस किसी को वे सिखाते हैं और जिस किसी की वे अगुआई करते हैं, उनमें से प्रत्येक व्यक्ति शब्द और धर्म-सिद्धांत बोल सकता है, वे सभी जानते हैं कि अपना रुतबा कैसे जताना है और दूसरों को उपदेश कैसे देना है, वे सभी जानते हैं कि लोगों की चापलूसी कैसे करनी है और उन्हें मक्खन कैसे लगाना है, वे जानते हैं कि धूर्त और धोखेबाज कैसे बनना है, वे जानते हैं कि किन लोगों को क्या कहना है, वे लोगों की खुशामद करना जानते हैं और बाहर से, बिल्कुल शांत दिखाई देते हैं। इन मसीह-विरोधियों ने कलीसिया को क्या बना दिया है? एक धार्मिक संगठन। और नतीजा क्या निकला? लोग अपने शैतानी फलसफों के अनुसार जीते हैं और सत्य का अनुसरण करने के इच्छुक नहीं हैं, और उनके पास कोई जीवन प्रवेश नहीं है, और उन्होंने पवित्र आत्मा के कार्य को बिल्कुल खो दिया है। इस तरह से मसीह-विरोधी भाई-बहनों को नुकसान पहुँचाते हैं और उन्हें तबाही की तरफ ले जाते हैं—और फिर भी, वे अभी भी सोचते हैं कि उन्होंने बड़ा योगदान दिया है, कि उन्होंने भाई-बहनों के लिए महान काम किए हैं और उन्हें महान आशीष दिलाए हैं। वे अक्सर भाई-बहनों को सिखाते हैं कि जब वे किसी भाई या बहन को समस्या में देखें तो उसके प्रति विनम्र और धैर्यवान, सहनशील और विचारशील बनें, कटुभाषी न बनें या दूसरों को ठेस न पहुँचाएँ, और वे दूसरों को निर्देश देते हैं कि बैठते या खड़े होते समय वे कौन-सी मुद्रा अपनाएँ या कौन-से वस्त्र पहनें। वे अक्सर भाई-बहनों को यह नहीं सिखाते कि सत्य को कैसे समझें या सत्य वास्तविकता में कैसे प्रवेश करें, बल्कि ये सिखाते हैं कि विनियमों का पालन और अच्छा व्यवहार कैसे करें। उनकी शिक्षाओं के तहत, लोगों का एक-दूसरे से मिलना-जुलना परमेश्वर के वचनों पर आधारित नहीं होता है, न ही सत्य सिद्धांतों पर आधारित होता है, बल्कि खुशामदी व्यक्ति बनने के सांसारिक आचरणों के फलसफों पर आधारित होता है। बाहर से, कोई भी एक दूसरे को नुकसान नहीं पहुँचाता, कोई भी दूसरे की विफलताएँ नहीं बताता, लेकिन कोई किसी को यह भी नहीं बताता कि वे वास्तव में क्या सोच रहे हैं और वे अपनी भ्रष्टता, विद्रोहीपन, कमियों और अपराधों के बारे में खुलकर बात नहीं करते हैं और उन पर संगति नहीं करते हैं। इसकी जगह, वे सतही स्तर पर बड़बड़ाते रहते हैं कि किसने पीड़ा सही है और कीमत चुकाई है, कौन अपने कर्तव्य करने में निष्ठावान रहा, कौन भाई-बहनों के लिए लाभप्रद रहा है, किसने परमेश्वर के घर में उल्लेखनीय योगदान दिया है, किसे सुसमाचार का प्रचार करने के कारण गिरफ्तार किया गया है और दंड दिया गया है—वे इन्हीं विषयों पर बातें करते हैं। मसीह-विरोधी दूसरों के सामने खुद को आकर्षक ढंग से पेश करने और ढोंग करने के लिए केवल अच्छे व्यवहार—बाहर से विनम्र, धैर्यवान, सहनशील और मददगार होने—का ही उपयोग नहीं करते; वे दूसरों को इस अच्छे व्यवहार से संक्रमित करने के लिए व्यक्तिगत उदाहरण रखने की कोशिश भी करते हैं और उन्हें इसका अनुकरण करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। उनके अच्छे व्यवहार के पीछे का उद्देश्य केवल लोगों के आकर्षण का केंद्र बनना और लोगों को उनके बारे में ऊँचा सोचने के लिए प्रेरित करना है। जब परमेश्वर के चुने व्यक्ति अपने आत्मज्ञान के बारे में बोलते हैं और अपने भ्रष्ट स्वभावों का गहन-विश्लेषण करते हैं, तब वे चुप रहते हैं और खुद अपनी भ्रष्टता का गहन-विश्लेषण करने का कोई प्रयास बिल्कुल नहीं करते। जब भाई-बहन एक दूसरे की भ्रष्टता के खुलासों को उजागर करते हैं और काट-छाँट करते हैं तो केवल मसीह-विरोधी ही सबके प्रति नम्रता, धैर्य और सहनशीलता का व्यवहार करते हैं; वे किसी के द्वारा प्रकट की गई भ्रष्टता को उजागर नहीं करते और यहाँ तक कि भाई-बहनों की उनके अच्छे व्यवहार और बदलाव के लिए सराहना और प्रशंसा भी करते हैं; वे प्रिय, विचारशील, सहनशील तथा राहत देने वाले व्यक्ति का अभिनय करते हुए लोगों को खुश रखने वाले व्यक्ति की भूमिका निभाते हैं। ये उन मसीह-विरोधियों की अभिव्यक्तियाँ हैं जो दिखावा करने, धोखा देने और लोगों को गुमराह करने में सर्वाधिक माहिर हैं।

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