मद आठ : वे दूसरों से केवल अपने प्रति समर्पण करवाएँगे, सत्य या परमेश्वर के प्रति नहीं (भाग तीन) खंड तीन
मसीह-विरोधियों का दूसरों से सत्य या परमेश्वर के प्रति नहीं, बल्कि केवल अपने प्रति समर्पण कैसे करवाने का गहन-विश्लेषण
IV. थोड़ा अनुभव और ज्ञान हासिल कर लेने पर मसीह-विरोधियों द्वारा सत्य का प्रतिरूप होने का दिखावा करने का गहन-विश्लेषण
पिछली बार हमने मसीह-विरोधियों की अभिव्यक्तियों की आठवीं मद पर संगति की थी—वे चाहते हैं कि दूसरे लोग केवल उनके प्रति समर्पण करें, सत्य या परमेश्वर के प्रति नहीं। मद आठ को कुल मिला कर चार उप-विषयों में विभाजित किया गया है। हमने पहले तीन उप-विषयों पर संगति समाप्त कर ली है, तो चौथा उप-विषय क्या है? (थोड़ा अनुभव, ज्ञान और सबक हासिल कर लेने और कुछ सबक सीख लेने के बाद मसीह-विरोधी सत्य का प्रतिरूप होने का दिखावा करते हैं।) यह मद आठ का चौथा उप-विषय है। बेशक, इसमें मद आठ के विषय की अभिव्यक्तियों का एक पहलू भी शामिल है—ये संबंधित हैं। यह विषय क्या है? वे चाहते हैं कि दूसरे लोग केवल उनके प्रति समर्पण करें, सत्य या परमेश्वर के प्रति नहीं। आओ, इस उप-विषय को विभाजित कर दें और इस पर थोड़ा-थोड़ा करके चर्चा करें। अनुभव, ज्ञान और सबक क्रमशः क्या हैं? ये किस प्रकार के लोगों के पास होते हैं? किस प्रकार के लोग इनसे लैस होना पसंद करते हैं? किस प्रकार के लोग स्वयं को सत्य के बजाय इन चीजों से लैस करने पर जोर देते हैं? किस प्रकार के लोग इन चीजों को सत्य के रूप में लेते हैं? पहले, एक चीज सुनिश्चित है : इन लोगों की काबिलियत चाहे जो हो, और उनका बोध चाहे जैसा हो, उन्हें ज्ञान से अत्यधिक प्रेम होता है और ज्ञान के प्रति उनका प्रेम सत्य वास्तविकता के प्रति उनके प्रेम से बढ़कर होता है। परमेश्वर में अपने विश्वास में वे जिस लक्ष्य और दिशा का अनुसरण करते हैं, वह कुछ तथाकथित अनुभव और ज्ञान प्राप्त करने के लिए होता है। वे इस ज्ञान और अनुभव का उपयोग खुद को सशस्त्र करने और आकर्षक बनाने के लिए करते हैं, ताकि वे और अधिक सुरुचिपूर्ण, सजीले, परिष्कृत, सम्मानित और आराध्य बनने के लिए और अधिक सक्षम बन सकें। उन्हें लगता है कि इस ज्ञान और अनुभव के साथ उनका जीवन अधिक मूल्यवान, संतोषप्रद और आत्मविश्वास से पूर्ण है। अपनी दृष्टि में, वे खुद को इस ज्ञान और धर्मशास्त्र तथा व्यावहारिक बुद्धि, ज्ञान और सबक के तमाम पहलुओं से जुड़ी कहावतों से लैस करने के लिए परमेश्वर में विश्वास रखते हैं। वे मानते हैं कि खुद को इन चीजों से लैस करके वे परमेश्वर के घर और लोगों के इस समूह में जगह पा सकते हैं। इसलिए, वे हर दिन अपने दिल में जिस बारे में सोचते हैं, जिसकी आराधना करते हैं, और जिसका पालन करते हैं, वह सब ज्ञान, अनुभव, आदि से जुड़ा हुआ है।
आओ पहले गौर करें कि ज्ञान, अनुभव और सबक के कौन-से प्रकार उपलब्ध हैं, और साथ ही इनमें से किन प्रकारों के लिए कहा जा सकता है कि ये सत्य का प्रतिरूप होने का दिखावा करते हैं। पहले, यह निश्चितता के साथ कहा जा सकता है कि इन चीजों का सत्य से कोई लेना-देना नहीं है, ये सत्य के अनुरूप नहीं हैं और सत्य के प्रतिकूल हैं। ये चीजें ऐसी हो सकती हैं जो लोगों की धारणाओं के अनुसार सही हैं, ऐसी चीजें हैं जो उनकी धारणाओं के अनुसार सकारात्मक, सुंदर और अच्छी हैं। लेकिन दरअसल, परमेश्वर की दृष्टि में, ये चीजें सत्य से संबंधित नहीं हैं और ये चीजें मूल रूप से लोगों द्वारा सत्य की निंदा का स्रोत भी हैं, लोगों द्वारा परमेश्वर के प्रतिरोध और उसके प्रति उनकी धारणाओं की जड़ और स्रोत हैं। अनुभव, ज्ञान और सबक—क्या ये चीजें प्राप्त करने वालों के बीच उम्र और लिंग का अंतर होता है? (नहीं, कोई अंतर नहीं है।) बहुत संभव है कि नहीं है। कुछ लोगों में गुण होते हैं। गुण क्या हैं? उदाहरण के लिए, किसी सिद्धांत या कहावत को सुनने और ऐसे सिद्धांत की केंद्रीय या मूल अवधारणा को समझ लेने के बाद कुछ लोगों का दिमाग तुरंत प्रतिक्रिया करता है। वे फौरन जान लेते हैं कि ऐसे सिद्धांत या कहावत को कैसे समझाएँ और उसे अपनी उस भाषा में कैसे बदलें जिसका वे दूसरों से बात करते समय प्रयोग करते हैं। इन चीजों को सुनने के बाद, वे उन्हें तुरंत याद कर लेते हैं; यह उनके अत्यधिक बोधगम्य होने के कारण नहीं है, बस उनकी स्मरणशक्ति ही उत्कृष्ट है, जोकि एक प्रकार का विशेष गुण है। क्या ऐसा कोई है जिसमें ऐसा गुण है? (हाँ है।) ऐसे लोग हैं जो तुम्हारे कोई बात कहने के बाद, तुरंत उसका उपयोग करके किसी और चीज के बारे में निष्कर्ष निकाल सकते हैं। किसी विषय के एक पहलू के बारे में जानकारी प्रस्तुत करने पर वे दूसरे क्षेत्रों में उसे प्रयुक्त कर सकते हैं। वे विचार-विमर्श के विषय का उपयोग कर अपने स्वयं के विचार प्रस्तुत करने में बहुत अच्छे होते हैं। जब बाहरी चीजों और सिद्धांतों की—इन तर्कसंगत और भाषाई चीजों की—बात आती है, तो वे बहुत अच्छे होते हैं। यानी वे शब्दों का खेल खेलने में और सिद्धांतों का प्रयोग कर दूसरों को फुसला कर विश्वास दिलाने में माहिर होते हैं। कुछ लोग होते हैं जिनमें इस प्रकार के गुण होते हैं। वे अत्यधिक वाक्पटु और काफी फुर्तीली सोच और प्रतिक्रियाओं वाले होते हैं। सत्य के किसी पहलू को सुन कर अपनी तुच्छ चालाकी और गुणों से वे सत्य के इस पहलू को ज्ञान और सबक का एक प्रकार समझ लेते हैं और फिर ऐसी सीख का उपयोग वे दूसरों से संगति करने और तथाकथित सिंचन और चरवाही का कार्य करने के लिए उपयोग करते हैं। इसका लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता है? क्या इसके कुछ अच्छे नतीजे निकलते हैं? (नहीं, अच्छे नतीजे नहीं होते।) ऐसा क्यों है? (यह व्यावहारिक नहीं है, और इसको सुन कर लोगों के सामने अभ्यास का कोई मार्ग नहीं होता है।) इन लोगों की बातें सुनने के बाद दूसरे लोग सोचते हैं कि उनकी कही हुई सारी बातें सही हैं, उनका एक भी शब्द गलत नहीं है, और एक भी शब्द सिद्धांतों के विरुद्ध नहीं है—ये सब के सब सही हैं। लेकिन इन्हें अभ्यास में लाने पर उन्हें लगता है कि ये शब्द खोखले हैं, और अभ्यास करते समय कोई लक्ष्य या दिशा नहीं है, और इन शब्दों का अभ्यास के सिद्धांतों के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता। तो ये शब्द क्या हैं? (धर्म-सिद्धांत।) ये एक प्रकार के धर्म-सिद्धांत हैं, एक प्रकार का ज्ञान हैं। मसीह-विरोधियों की ऐसी अभिव्यक्तियाँ अत्यंत स्पष्ट और विशिष्ठ होती हैं। वे सत्य को ज्ञान के रूप में, शैक्षणिक चीज के रूप में, सिद्धांत के रूप में लेते हैं। चीजों को सिर्फ आधा-अधूरा समझ कर वे हमेशा माँग करते हैं कि दूसरे लोग अमुक-अमुक काम करें। जब दूसरे लोग नहीं समझते या उनसे विस्तार से समझाने को कहते हैं, तो मसीह-विरोधी लोग स्पष्ट रूप से समझा नहीं पाते बल्कि खंडन करते हुए उत्तर देते हैं : “तुम सत्य से प्रेम नहीं करते हो। यदि तुम सत्य से प्रेम करते तो तुम मेरी बात समझ जाते और तुम्हारे पास अभ्यास का मार्ग होता।” यह सुनने के बाद, ऐसे लोग जो भ्रमित हैं और पहचान नहीं पाते, वे सोचते हैं, “सही है। यदि मैं वास्तव में सत्य से प्रेम करता तो उनकी बातों को समझ जाता।” जिन लोगों में पहचानने की क्षमता नहीं होती, उन्हें लगता है कि यह व्यक्ति जो कह रहा है वह सही है—वे सत्य नहीं समझते हैं। वे जिम्मेदारी खुद पर डाल लेते हैं, और इस तरह मसीह-विरोधियों द्वारा गुमराह हो कर वे अपना संतुलन खो बैठते हैं।
आओ, अब अनुभव के बारे में चर्चा करें। अनुभव एक लंबे दौर तक चीजों से गुजरकर निचोड़ा गया तरीका है। जिन लोगों ने दो दिन काम किया है, क्या उन्हें कोई अनुभव होता है? (नहीं होता है।) तो जिन्होंने दस-बीस वर्ष काम किया है, उन्हें अवश्य अनुभव होता है। कुछ लोगों को लगता है कि उन्हें कई वर्ष कार्य करने का अनुभव है, और कुछ मामलों से सामना होने पर उन्हें क्या करना चाहिए, कुछ खास तरह के लोगों से उन्हें कैसे निपटना चाहिए, और किस प्रकार के लोगों से उन्हें किस प्रकार के धर्म-सिद्धांतों की बात करनी चाहिए, वे ये सब जानते हैं। परिणामस्वरूप जब एक दिन कुछ नया होता है जिसे वे नहीं जानते, तो वे पिछले 20 वर्षों के काम के लेखे-जोखे पर नजर दौड़ाते हैं, उस पर विचार करते हैं, और इन पुरानी कहावतों और अभ्यासों को अंधाधुंध तरीके से लागू कर देते हैं। जब वे इस प्रकार कार्य करते हैं, तो जो लोग सत्य नहीं समझते हैं वे अभी भी सोचते हैं कि वे जो कर रहे हैं वह सत्य के अनुरूप है, जबकि सत्य समझने वाले लोग देखकर कहते हैं, “यह व्यक्ति आँखें मूँद कर कार्य कर रहा है। इसके कार्य में कोई सिद्धांत नहीं है; वह पूरी तरह से अनुभव के भरोसे है और वह परमेश्वर का इरादा नहीं समझता है, न ही वह समझता है कि कार्य किस तरह से करे कि परमेश्वर के घर के हितों की सुरक्षा हो और लोगों से पेश आने के परमेश्वर के घर के सिद्धांतों का पालन हो। वह विनियमों को आँखें मूँद कर लागू कर रहा है।” यहाँ एक समस्या है। यदि औसत व्यक्ति ने केवल थोड़े समय काम किया हो, तो शायद उसके पास यह कहने के लिए पूँजी न हो कि, “मेरे पास अनुभव है; मैं डरता नहीं हूँ। मैंने अनेक वर्षों तक कार्य किया है। ऐसा किस प्रकार का व्यक्ति है जिसे मैंने नहीं देखा है, और ऐसे कौन-से मामले हैं, जिनसे मैं नहीं निपटा हूँ?” लेकिन ये लोग यह कहने की हिम्मत करते हैं। भले ही तुम बहुत सारी चीजों और विभिन्न प्रकार के कुछ लोगों से निपट चुके हो, फिर भी क्या तुम यह गारंटी दे सकते हो कि तुम हर मामले से निपटने में और हर व्यक्ति से व्यवहार करते समय सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर रहे हो? वास्तविकता में, यह चीज ऐसी नहीं है जिसकी गारंटी देने की तुम हिम्मत कर सको। लेकिन जो लोग अनुभव और रोजमर्रा को सत्य मानते हैं, वे किसी के आपत्ति उठाने पर कहते हैं, “मैं अनेक वर्षों से काम करता आ रहा हूँ। तुम जितने मार्गों पर चले हो, उनसे ज्यादा मैंने पुल पार किए हैं, फिर भी तुम मुझसे असहमत होने की हिम्मत करते हो? घर जा कर प्रार्थना करो, क्यों नहीं करते!” उनके सामने कोई भी हिम्मत नहीं करता कि “नहीं” कहे, भिन्न मत व्यक्त करे, या असहमति का एक शब्द कहे। यह कैसा व्यवहार है? यह सत्य को अनुभव मानना और खुद को सत्य का प्रतिरूप मानना है। कुछ लोग कहते हैं : “मैं स्वयं को सत्य का प्रतिरूप नहीं मानता ऐसी पदवी कौन धारण करने का साहस करेगा? केवल परमेश्वर ही सत्य है। मैंने कभी भी उस तरह से कार्य नहीं किया, न ही मैंने कभी ऐसा सोचा है।” व्यक्तिपरक ढंग से तुम उस तरह से नहीं सोचते हो, न ही वैसा करने का इरादा रखते हो। लेकिन वस्तुपरक ढंग से, तुम्हारे काम करने के तरीके, तुम्हारा व्यवहार, और तुम्हारे क्रियाकलापों का सार अंततः तुम्हारा उस व्यक्ति के रूप में चरित्र-चित्रण करते हैं जो स्वयं को सत्य का प्रतिरूप मानता है। तुम लोगों से अपने सुझावों का अक्षरशः पालन क्यों करवाते हो? यदि तुम स्वयं को परमेश्वर नहीं मानते, और तुम बस एक साधारण व्यक्ति हो तो क्या तुम इस योग्य हो कि दूसरों से अपनी आज्ञा मनवाओ? (नहीं, मैं नहीं हूँ।) एक परिस्थिति में लोग तुम्हारी आज्ञा मान सकते हैं, और वह यह है कि तुम सत्य समझते हो—यदि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य समझता है। लेकिन फिर, भले ही तुम सत्य समझने वाले व्यक्ति हो, फिर भी तुम बस एक साधारण व्यक्ति ही हो, और क्या एक साधारण व्यक्ति सत्य का प्रतिरूप हो सकता है? (नहीं, वह नहीं हो सकता।) यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के बोले हुए सभी वचनों को और उन सभी सत्यों को समझ ले जिनको समझने की परमेश्वर मनुष्य से अपेक्षा करता है तो क्या वह व्यक्ति सत्य का प्रतिरूप बन सकता है? (नहीं, नहीं बन सकता।) कुछ लोग कहते हैं : “ऐसा शायद इस वजह से है क्योंकि वे पूर्ण नहीं बनाए गए हैं। पतरस एक पूर्ण बनाया गया व्यक्ति था। क्या पतरस को सत्य का प्रतिरूप कहा जा सकता है?” पूर्ण बनाए जाने से कोई सत्य का प्रतिरूप नहीं बन जाता, और जानते हो क्यों? (सार में अंतर होता है।) सार में अंतर होता है; यह इसका एक पहलू है। क्या मनुष्य सत्य का प्रतिरूप बन सकता है—यह एक ऐसा मामला है जिस पर हमें अवश्य विचार-विमर्श करना चाहिए। ऐसा क्यों कहा जाता है कि मनुष्य संभवतः सत्य का प्रतिरूप नहीं हो सकता? क्या सत्य का प्रतिरूप महज सार का प्रश्न है? कुछ लोग कहते हैं : “मनुष्य एक सृजित प्राणी के रूप में जन्म लेता है, और वह जो स्वर्ग में है वह सहज ही सृष्टिकर्ता है। हमें इस मामले के बारे में बहस करने की जरूरत नहीं है—परमेश्वर सदा ही सत्य का प्रतिरूप रहेगा। तो फिर क्या यह इस वजह से है कि मसीह सत्य समझता है और उसके पास यह सत्य है कि वह सत्य का प्रतिरूप है? यदि हमने परमेश्वर से सारे सत्य प्राप्त कर लिए हैं तो क्या हमें भी सत्य का प्रतिरूप कहा जा सकता है?” दूसरे लोग कहते हैं : “हमें नहीं कहा जा सकता। मैं सोचता था कि जब लोग और अधिक सत्यों को समझ लेंगे तो वे मसीह बन सकेंगे, परमेश्वर बन सकेंगे। अब मैं जानता हूँ कि इस सार का स्थान कोई नहीं ले सकता, इसे बदला नहीं जा सकता।” उनकी समझ इस बिंदु पर पहुँच गई है। तो क्या तुम इस मामले को और अधिक समझने में सक्षम हो? जैसे ही तुम लोगों के साथ मेरी संगति पूरी हो चुकी होगी, वैसे ही तुम्हें यह मामला समझ में आ जाना चाहिए। जब हम सत्य के प्रतिरूप की बात करते हैं, तो आखिर यह “प्रतिरूप” क्या है? यह शब्द थोड़ा अमूर्त है, इसलिए आओ हम इसे सरलतम शब्दों में व्यक्त करें। परमेश्वर स्वयं सत्य है, उसके पास समस्त सत्य हैं। परमेश्वर सत्य का स्रोत है। प्रत्येक सकारात्मक वस्तु और प्रत्येक सत्य परमेश्वर से आता है। वह समस्त चीजों और घटनाओं के औचित्य एवं अनौचित्य के विषय में न्याय कर सकता है; वह उन चीजों का न्याय कर सकता है जो घट चुकी हैं, वे चीजें जो अब घटित हो रही हैं और भावी चीजें जो कि मनुष्य के लिए अभी अज्ञात हैं। परमेश्वर सभी चीजों के औचित्य एवं अनौचित्य के विषय में न्याय करने वाला एकमात्र न्यायाधीश है, और इसका तात्पर्य यह है कि सभी चीजों के औचित्य एवं अनौचित्य के विषय में केवल परमेश्वर द्वारा ही निर्णय किया जा सकता है। वह सभी चीजों की कसौटी जानता है। वह किसी भी समय और स्थान पर सत्य को व्यक्त कर सकता है। परमेश्वर सत्य का प्रतिरूप है, जिसका आशय यह है कि वह स्वयं सत्य के सार से युक्त है। भले ही मनुष्य अनेक सत्यों को समझता हो और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया गया हो, फिर भी क्या उसका सत्य के प्रतिरूप से कुछ लेना-देना होता? नहीं। यह सुनिश्चित है। जब मनुष्य को पूर्ण बनाया जाता है, परमेश्वर के वर्तमान कार्य और परमेश्वर द्वारा मनुष्य से अपेक्षित बहुत-से मानकों के बारे में, तो वे अभ्यास की सही परख और अभ्यास के तरीकों के बारे में जान सकेंगे, और वे परमेश्वर के इरादों को पूरी तरह से समझ सकेंगे। वे यह अंतर कर सकते हैं कि कौन-सी चीज परमेश्वर से और कौन-सी चीज मनुष्य से आती है, कि क्या सही है और क्या गलत है। पर फिर भी कुछ चीजें ऐसी होती हैं जो मनुष्य की पहुँच से दूर और असपष्ट रहती हैं, जिन्हें परमेश्वर द्वारा बताए जाने के बाद ही वह जान सकता है। क्या मनुष्य ऐसी चीजों को जान सकता है या उनके बारे में भविष्यवाणी कर सकता है जो परमेश्वर ने उसे अभी नहीं बताई हैं? बिल्कुल नहीं। इसके अतिरिक्त, यदि मनुष्य परमेश्वर से सत्य को प्राप्त कर भी ले, और उसके पास सत्य वास्तविकता हो और उसे बहुत से सत्यों के सार का ज्ञान हो, और उसके पास गलत सही को पहचानने की क्षमता हो, तब क्या उसमें सभी चीजों पर नियंत्रण व शासन करने की क्षमता आ जाएगी? उनमें यह क्षमता नहीं होगी। परमेश्वर और मनुष्य में यही अंतर है। सृजित प्राणी केवल सत्य के स्रोत से ही सत्य को प्राप्त कर सकते हैं। क्या वे मनुष्य से सत्य प्राप्त कर सकते हैं? क्या मनुष्य सत्य है? क्या मनुष्य सत्य प्रदान कर सकता है? वह ऐसा नहीं कर सकता और बस यहीं पर अंतर है। तुम केवल सत्य ग्रहण कर सकते हो, इसे प्रदान नहीं कर सकते। क्या तुम्हें सत्यधारी व्यक्ति कहा जा सकता है? क्या तुम्हें सत्य का प्रतिरूप कहा जा सकता है? बिल्कुल नहीं। सत्य का प्रतिरूप होने का वास्तव में क्या सार है? यह सत्य प्रदान करने वाला स्रोत है, सभी चीजों पर शासन और प्रभुता का स्रोत, और इसके अलावा यह वह एकमात्र कसौटी और मानक है जिसके अनुसार सभी चीजों और घटनाओं का आकलन किया जाता है। यही सत्य का प्रतिरूप है। मसीह-विरोधी अक्सर इस बात को स्वीकारने से इनकार कर देते हैं। वे मानते हैं कि ज्ञान शक्ति है, अनुभव वह अस्त्र है जिससे लोगों को शक्तिशाली बनने के लिए खुद को लैस करना चाहिए, और जब लोगों के पास अनुभव, ज्ञान और ये सबक होते हैं, तो वे सभी चीजों को नियंत्रित कर सकते हैं। वे लोगों के भाग्य को नियंत्रित कर सकते हैं, उनके विचारों को नियंत्रित और प्रभावित कर सकते हैं, और लोगों के व्यवहार को भी प्रभावित कर सकते हैं। या कुछ लोग सोचेंगे कि ये चीजें लोगों को निर्देश दे सकती हैं, लोगों के मन बदल सकती हैं और लोगों के स्वभाव बदल सकती हैं। ये किस प्रकार के विचार हैं? (मसीह-विरोधियों के विचार।) ये मसीह-विरोधियों के विचार हैं। मानवजाति की नियति पर परमेश्वर संप्रभुता क्यों रख सकता है? परमेश्वर सभी सकारात्मक चीजों की वास्तविकता है, और उसके वचन सभी सकारात्मक चीजों की वास्तविकता हैं। परमेश्वर का सार क्या है? उसका सार सत्य है, और इसी वजह से वह मानवजाति की नियति पर संप्रभुता रखने में सक्षम है। मसीह-विरोधी इस बात को स्वीकारना तो दूर रहा, उसे समझते या पहचानते भी नहीं हैं। वे लोगों की, ज्ञान की और समाज की चीजों को ही सत्य मानते हैं और उन चीजों को सत्य मानते हैं जिनका दुष्ट मानवजाति सम्मान करती है, और वे लोगों को गुमराह करने, नियंत्रित करने और कलीसिया और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के बीच जगह पाने के लिए इन चीजों का उपयोग करने की कोशिश करते हैं। लोगों को गुमराह करने का उनका प्रयोजन क्या है? इन चीजों का अध्ययन कर उनसे स्वयं को लैस करने का उनका प्रयोजन क्या है? यह लोगों को ऐसा बनाना है कि वे उनकी आज्ञा मानें और उनकी बात सुनें। लोगों से अपनी बात मनवाने का उनका प्रयोजन क्या है? (उन्हें नियंत्रित करना।) सही है, उनका प्रयोजन उन्हें नियंत्रित करना है। इसका अर्थ है कि जब वे कुछ बातें कहेंगे तो लोग उनका पालन करेंगे और फिर वे उनके साथ हेरफेर कर सकेंगे, और वे लोग उनके साधन और दास बन जाएँगे। चूँकि लोग उनके दृष्टिकोणों और उनके तथाकथित अनुभवों, ज्ञान और सबक को स्वीकारते हैं, इसलिए फिर ये लोग उनकी आराधना करते हैं। क्या उनकी आराधना करने का अर्थ उनकी बात सुनना नहीं है? (हाँ, बिल्कुल है।) क्या उनकी बात सुनने का यह अर्थ नहीं है कि इन लोगों के साथ आसानी से हेरफेर की जा सकती है? क्या मसीह-विरोधी सफल नहीं हो गए हैं? (हाँ, बिल्कुल हो गए हैं।) जब एक बार कोई उनकी बात सुन लेता है, तो क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि वे परमेश्वर से दूर कर दिए गए हैं? (हाँ, बिल्कुल यही अर्थ है।) इससे मसीह-विरोधी खुश हो जाते हैं; यही उनका प्रयोजन है। वास्तव में, अपने दिल की गहराई में, वे अनिवार्यतः स्पष्ट रूप से नहीं मानते कि वे सत्य के प्रतिरूप हैं और वे ही सत्य हैं, लेकिन वे अवश्य ऐसा ही सोचते हैं और ऐसा ही करते हैं। वे क्यों इस तरह से सोचते और कार्य करते हैं? वे मानते हैं कि ज्ञान, अनुभव और जो कुछ भी उनके गुणों से आया है वह सही है, और वे इन चीजों का उपयोग लोगों को नियंत्रित करने और लोगों पर मजबूत पकड़ बनाए रखने के लिए करते हैं। उनका कुछ ज्ञान, अनुभव और सबक जाहिर तौर पर शैतानी शब्द हैं जो लोगों को बरगलाने के लिए होते हैं। कुछ के अपने कुचक्र होते हैं, धूर्त साजिशें होती हैं, और छिपे हुए षड्यंत्र होते हैं, भले ही वे स्पष्ट न हों, और जो लोग इनकी असलियत नहीं समझ पाते वे गुमराह किए जाते हैं। गुमराह किए जाने के क्या नतीजे होते हैं? लोग परमेश्वर से बहुत दूर हो जाते हैं, और सत्य समझना बंद कर देते हैं, मानवीय ज्ञान, अनुभव और सबक को सत्य मान लेते हैं, और परमेश्वर के वचनों को दरकिनार कर देते हैं। लोग परमेश्वर के वचनों के बारे में बहुत अस्पष्ट हो जाते हैं, पर वे इस ज्ञान और अनुभव की बड़ी परवाह करते हैं और उसे सम्मान देते हैं, यहाँ तक कि उसका अभ्यास करने और उसे लागू करने के लिए मेहनत करते हैं। यही मसीह-विरोधियों के क्रियाकलापों का प्रयोजन है। यदि उनमें लोगों को हेरफेर करने, लोगों को नियंत्रित करने और उन्हें आज्ञाकारी बनाने की ऐसी महत्वाकांक्षा न होती, तो क्या वे स्वयं को इन चीजों से लैस करते? वे इस दिशा में कोई प्रयास नहीं करते। उनका एक लक्ष्य है; उनके प्रयोजन की भावना अत्यंत स्पष्ट है। यह स्पष्ट प्रयोजन क्या है? (लोगों को नियंत्रित करना।) यह लोगों को नियंत्रित करने के लिए है। चाहे वे लोगों के एक पूरे समूह को नियंत्रित करें या उनके एक हिस्से को, क्या सैद्धांतिक आधार के बिना वे किसी को भी नियंत्रित करने में सक्षम होंगे? उन्हें पहले विचारों और सिद्धांतों का एक ऐसा संग्रह पाना होगा जो लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं के अनुरूप हो, लोगों की पसंद के सबसे अनुरूप हो, और फिर उसे लोगों के बीच फैलाने के लिए उन्हें हर संभव साधनों का उपयोग करना होगा। इसका अर्थ है लोगों का मत परिवर्तन करना, उनके विचारों पर कार्य करना, उनके मन में निरंतर अपने विचार बैठाना, और निरंतर लोगों को इन विचारों और दृष्टिकोणों को सुनने, इनसे परिचित होने और इन्हें स्वीकारने को तैयार करना। दरअसल, लोगों को निष्क्रिय रूप से एक विचारधारा में शिक्षित किया जा रहा है और निष्क्रिय रूप से उनकी बुद्धि भ्रष्ट की जा रही है, और वे अनजाने ही इन नजरियों को स्वीकार लेते हैं। चूँकि लोगों में सही और गलत में भेद करने की भीतरी क्षमता नहीं होती, सत्य समझने से पहले उनमें इन चीजों का प्रतिरोध करने की क्षमता नहीं होती—उनके भीतर इसके लिए कोई प्रतिरोधक साधन नहीं होते हैं। जब लोग इन भ्रांतिपूर्ण नजरियों को स्वीकार लेते हैं, तो वे तुरंत इनकी गिरफ्त में आ जाते हैं। “गिरफ्त में आ जाने” का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि इन नजरियों को स्वीकारने के बाद लोग ज्यादा-से-ज्यादा इस बात को मानने पर दृढ़ हो जाते हैं कि ये चीजें सही हैं और वे स्वयं को और दूसरों को विश्वास दिलाने के लिए इन नजरियों का निरंतर उपयोग करते हैं। उन्हें गुमराह और नियंत्रित किया गया है, और शैतान जब लोगों को गुमराह करता है तो इसी तरह अपना लक्ष्य प्राप्त करता है।
कुछ लोग जिन्होंने दुनिया में कुछ विशेष पेशेवर कौशल सीखे हैं, या जिन लोगों का समाज में एक विशेष सामाजिक रुतबा है, परमेश्वर के घर में आने के बाद उनके पास एक सामान्य विचार होता है, जो उन्हें एक आम अभिव्यक्ति देता है। यह विचार क्या है? वे स्वयं को समाज का अभिजात वर्ग मानते हैं। अभिजात वर्ग क्या होता है? यह उन लोगों का वर्ग है जो भीड़ से अलग दिखते हैं। उन्होंने कुछ विशेष उच्च शिक्षा प्राप्त की होती है, और उनकी प्रतिभाएँ, काबिलियत और गुण बाकी लोगों से बेहतर होते हैं। बाकी लोगों से बेहतर होने का अर्थ क्या है? इसका अर्थ है कि लोगों के एक समूह में, उनकी सोच, विवेक और वाक्पटुता असाधारण होती है, और उनमें कुछ विशेष चीजों और कौशल को समझने की विशिष्ट क्षमता होती है। इसे बाकी लोगों से बेहतर होना कहते हैं, और इन लोगों को समाज का अभिजात वर्ग कहा जाता है। प्रत्येक देश इस प्रकार के लोगों को आगे बढ़ाता है। उनको आगे बढ़ाने का प्रयोजन क्या है? देश का अपेक्षाकृत तेजी से विकास करना। जब ऐसे लोग विभिन्न पदों पर समर्पित हो कर कार्य करते हैं, तो जीवन के सभी क्षेत्रों में विकास को गति मिलती है। समाज में ऐसे लोगों का रुतबा ऊँचा होता है या नीचा? (ऊँचा।) निश्चित रूप से उनका साधारण रुतबा नहीं होता। उनमें कुछ विशिष्ट प्रतिभाएँ होती हैं, उन्होंने कुछ विशेष ज्ञान सीखा होता है, और उन्होंने कुछ विशेष शिक्षा प्राप्त की होती है। उनकी काबिलियत, प्रतिभाएँ, और सीखा हुआ ज्ञान साधारण लोगों की अपेक्षा ऊँचा होता है। यदि ये लोग कलीसिया में आएँ, तो उनकी मानसिकता क्या होती है? उनका पहला विचार क्या होता है? पहले, वे सोचते हैं : “कमजोर भालू भी एक हिरण से ताकतवर होता है। हालाँकि परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद, मैं संसार के पीछे नहीं भागता या प्रसिद्धि का आनंद नहीं लेता, लेकिन मैंने जो विशेष शिक्षा प्राप्त की है, ज्ञान सीखा है, और प्रतिभाएँ प्राप्त की हैं, उन्हें देखते हुए मुझे तुम लोगों के बीच अगुआ बनना चाहिए। परमेश्वर के घर में, मुझे ही मुख्याधार और स्तंभ होना चाहिए। मुझे ही वह व्यक्ति होना चाहिए जो अगुआई और मार्गदर्शन करे।” क्या वे ऐसा नहीं सोचते? यह सोच किस बात पर आधारित है? यदि वे एक दीन-हीन किसान होते, तो क्या वे इस तरह सोचने की हिम्मत करते? (वे नहीं करते।) क्यों नहीं? (उनके पास पूँजी नहीं होती।) ऐसा सोचने के लिए उनके पास पूँजी नहीं होती। तो किस प्रकार के लोग ऐसा सोच सकते हैं? वे सभी ऐसे लोग हैं जिनके पास विशेष ज्ञान, प्रतिभाएँ, गुण और तथाकथित काबिलियत हैं। जब वे परमेश्वर के घर आते हैं, तो सोचते हैं : “मैं अब संसार के पीछे नहीं भागता हूँ। दुनिया बहुत बुरी है, इसलिए मैं इसके बजाय परमेश्वर के घर आ कर वहाँ प्रयास करूँगा। परमेश्वर के घर में, कम-से-कम मैं एक अगुआ या कार्यकर्ता का पद प्राप्त कर सकूँगा।” क्या वे अच्छे इरादे पालते हैं? (नहीं पालते।) वे अच्छे इरादे क्यों नहीं पालते? जो चीजें उन्होंने सीखी हैं और उनका सामाजिक रुतबा, उन्हें भयंकर हानि पहुँचाते हैं। यदि वे सत्य का अनुसरण न करें, तो वे जीवन भर ऐसे पद से कभी नीचे नहीं आएँगे। उन्हें हमेशा लगेगा कि वे बादलों के बीच हैं, लेकिन दरअसल, परमेश्वर की दृष्टि में वे किसी भी साधारण सृजित प्राणी से बिल्कुल अलग नहीं हैं। वे खुद को हमेशा बादलों के बीच रखेंगे। क्या यह खतरनाक नहीं है? यदि वे गिर गए, तो वे बड़ी जोर से गिरेंगे, और उनका जीवन खतरे में पड़ सकता है! ऐसे लोगों को क्यों लगता है कि उनका रुतबा ऊँचा होना चाहिए, उनकी आराधना की जानी चाहिए, उनके आसपास अनेक लोगों को घूमते रहना चाहिए, सभी चीजों में उनकी सलाह ली जानी चाहिए, उनकी राय सुनी जानी चाहिए, और हर चीज में सबसे पहले उनके बारे में सोच कर उन्हें सबसे पहले रखना चाहिए? वे इतने सारे “चाहिए” के बारे में क्यों सोचते हैं? क्योंकि वे अपने सामाजिक रुतबे, ज्ञान, और अपनी सीखी हुई विशेष चीजों को बहुत अधिक महत्त्व देते हैं। वे सोचते हैं, “चाहे जितना अधिक या जितना भी ऊँचा सत्य क्यों न बोला जाए, मेरी ये चीजें अभी भी मूल्यवान हैं; ये सत्य से अधिक मूल्यवान हैं और सत्य इनका स्थान नहीं ले सकता। समाज में, मैं एक कंपनी का मालिक हूँ। मैं हजारों लोगों का प्रबंध करता हूँ। मेरे हाथ हिलाते ही सबको मेरी बात सुननी पड़ती है। मेरे पास ऐसी विशाल शक्ति है—तो जरा सोच लो मैं किस प्रकार का पद और रुतबा सँभालता हूँ! परमेश्वर के घर के इन छोटे लोगों के बीच, मुझसे ऊँचे कितने लोग हैं? जब मैं आसपास देखता हूँ तो मुझे ज्यादा विशेष लोग नजर नहीं आते। यदि मुझे उनका प्रबंध करना हो तो यह कोई समस्या नहीं होगी; यह कोई बड़ी बात नहीं होगी!” मान लो कि तुम उन्हें बताते हो : “ठीक है। अच्छी बात है कि तुम यह महत्वाकांक्षा रखते हो। मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा, मैं तुम्हें कलीसिया का एक अगुआ बनाए जाने के लिए सिफारिश करूँगा। तुम इन लोगों को परमेश्वर के समक्ष लाओ, ताकि वे जान लें कि परमेश्वर के वचनों को कैसे पढ़ें और सत्य को कैसे अभ्यास में लाएँ, और तुम कमजोर, निराश और अपना कर्तव्य न करने वालों को प्रोत्साहित करो।” वे कहेंगे : “बड़ा आसान है। जब मैं कारोबार में था, तब मैंने लोगों को उनके सोचने के तरीके के बारे में परामर्श देने का उस तरह का सारा कार्य किया। यह ऐसा काम है जिसमें मैं निपुण हूँ।” जब कलीसिया के तीस से ज्यादा लोग उनके हाथों में सौंप दिए जाते हैं, उसके बाद क्या होता है? दो महीने से भी कम समय में, जो कमजोर थे वे और अधिक कमजोर हो जाते हैं, जो निराश थे वे और अधिक निराश हो जाते हैं, और सुसमाचार का प्रचार करने वाले लोग लोगों को हासिल नहीं कर पाते। जो लोग परमेश्वर के वचन पढ़ने का तरीका नहीं जानते, वे सभा का वक्त होते ही उनींदे हो जाते हैं, और वे ऊपरवाले के धर्मोपदेश सुनना भी नहीं चाहते हैं। जब पूछा जाता है : “क्या तुम काफी काबिल नहीं हो?” तो वे कहते हैं : “हाँ, मैं मालिक था। मेरी काबिलियत जाहिर है!” दुनिया में तुम जिस प्रकार के भी मालिक हो, यह व्यर्थ है। यदि तुम सत्य नहीं समझते हो, तो तुम कलीसिया का कार्य करने में आमजन हो। यदि इन लोगों को सुसमाचार कार्य का प्रभार लेने दिया गया, तो वे केवल व्यर्थ और सतही औपचारिकताओं में ही शामिल होंगे, उन्हें कोई नतीजे नहीं मिलेंगे, और दर्जनों लोगों वाली कलीसिया का सिंचन अच्छे ढंग से नहीं होगा। यहाँ क्या हो रहा है? ऐसे ज्ञानी लोग पहले कंपनियों के मालिक और समाज में अधिकारी हुआ करते थे, तो परमेश्वर के घर में आने पर वे अपने कौशल क्यों नहीं दिखा सकते? (पवित्र आत्मा उनका संरक्षण नहीं करता है।) पवित्र आत्मा उनका संरक्षण नहीं करता, यह एक पहलू है, लेकिन मुख्य कारण क्या है? वे सत्य नहीं समझते हैं, इसलिए जब लोगों की अवस्थाओं, उनके भ्रष्ट स्वभावों, मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षाओं, मनुष्य को उजागर करने वाले परमेश्वर के वचनों, और परमेश्वर के बोलने के तरीके की बात आती है, तो उनमें आध्यात्मिक समझ का अभाव होता है, और इन चीजों के साथ जो घट रहा है उसकी असलियत नहीं समझ पाते और वे बस आँखें मूँद कर सतही ढंग से कार्य करते हैं। वे सोचते हैं कि कलीसिया का कार्य दुनिया में कोई कारोबार चलाने जैसा है, और जब तक वे लोगों को प्रेरित करते रहते हैं और उनका जोश बढ़ाते रहते हैं, तो उन्होंने अच्छा काम किया होगा। वे सोचते हैं कि उन्हें एक लिहाज से लोगों को उनके सोचने के तरीके पर परामर्श देनी चाहिए और एक दूसरे लिहाज से दुनिया की चीजों से निपटने के स्थापित तरीकों का बढ़िया उपयोग करना चाहिए, अपने से ऊपर के लोगों को रिश्वत देने और अपने से नीचे के लोगों को खरीदने की कोशिश करनी चाहिए। वे मानते हैं कि अगर तुम यह सुनिश्चित कर दो कि लोगों को पैसा मिले, तो वे तुम्हारी बात सुनेंगे और तुम्हारे पीछे चलेंगे—वे सोचते हैं कि यह बस इतना सरल है। बाहरी चीजों में सत्य शामिल नहीं होता। परमेश्वर में विश्वास रखने में, हर काम में सत्य और स्वभाव परिवर्तन शामिल होते हैं। क्या उनके द्वारा बाहरी दुनिया में उपयोग किए गए तरीकों का यहाँ उपयोग करना कारगर होगा? (नहीं।) इससे काम नहीं चलेगा। जब लोगों की अवस्थाओं और कमजोरियों से निपटने, उन्हें अच्छी तरह सहारा देने, परमेश्वर को लेकर लोगों की धारणाओं से निपटने, भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करने पर लोगों को स्वयं को जानने देने, और लोगों को ईमानदार बनाने के तरीकों की बात आती है, तो उन्हें कुछ पता नहीं होता और वे बकवास भी करते हैं और आँखें मूँद कर विनियम थोप देते हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति अनाड़ियों जैसी और बिना आध्यात्मिक समझ के बात कहता है, तो वे कहेंगे कि यह व्यक्ति कमजोर काबिलियत वाला है और सत्य का अनुसरण नहीं करता। वे बस आँखें मूँद कर विनियम लागू करते हैं, और वे हर तरह से तब तक ऐसा करते हैं जब तक दूसरों के सामने आगे बढ़ने का कोई रास्ता नहीं रहता, वे उन्हें बाधित और हतोत्साहित करते हैं। जो लोग अपना कर्तव्य निभाते हैं, उनमें अब इसके लिए ऊर्जा नहीं होती, जबकि जो लोग निराश होते हैं, वे और अधिक निराश हो जाते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि यदि ऐसा व्यक्ति कलीसिया की अगुआई करता हो, तो उनके लिए परमेश्वर के वचन घर पर पढ़ना बेहतर होगा। ऐसा किस कारण से हुआ? जब वे कलीसिया की अगुआई करते हैं, तो वे लोगों को हतोत्साहित करते हैं, जिससे लोग परमेश्वर में विश्वास नहीं रखना चाहते हैं। लोग विश्वास क्यों नहीं रखना चाहते हैं? इस वजह से कि मूल रूप से लोगों की दृष्टि स्पष्ट थी, लेकिन इस व्यक्ति के क्रियाकलाप उन्हें बाधित और भ्रमित करते हैं। शुरुआत में इन लोगों के दिलों में कोई सत्य नहीं थे—उन्हें केवल धर्म-सिद्धांतों की समझ थी। इस व्यक्ति द्वारा बाधित होने के बाद, वे और अधिक भ्रमित हो जाते हैं, और अब पवित्र आत्मा के कार्य को समझ नहीं पाते। स्वयं परमेश्वर का अस्तित्व भी थोड़ा अस्पष्ट हो जाता है। तो लोगों को इस मुकाम तक लाने के लिए वे किस तरह के तरीकों का उपयोग करते हैं? उदाहरण के लिए, क्या यह कथन “मनुष्य का सृजन परमेश्वर ने किया” सत्य है? (बिल्कुल।) तुम्हें इस कथन को सिद्ध करने के लिए अपनी असली अंतर्दृष्टि, समझ और अनुभव का उपयोग करना चाहिए ताकि भाई-बहन और अधिक दृढ़ता से मान सकें कि यह कथन सत्य और सही है और उन्हें विश्वास हो जाए कि मानवजाति परमेश्वर से आई, और इस तरह से परमेश्वर में उनकी आस्था बढ़े। एक बार जब व्यक्ति को परमेश्वर में आस्था होती है, तो जब वे अनुशासन स्वीकारते हैं या कोई कठिनाई या उत्पीड़न सहते हैं तो उनके दिलों में शक्ति होगी। यह एक तथ्य है। लेकिन ये लोग क्या कहते हैं? “एक टीवी कार्यक्रम है जिसके अनुसार यह खोजा गया है कि 10 करोड़ वर्ष पहले इंसान जनजातियों में रहते थे।” जब वे अपने ज्ञान का दिखावा कर इतिहास के बारे में ऐसी बातें करते हैं, तो जो भी उनकी बात सुनता है वह भ्रमित हो जाता है : “क्या यह नहीं कहा गया है कि मनुष्य का सृजन परमेश्वर ने किया? जब तुम इसे इस तरह से व्यक्त करते हो तो यह ऐसा नहीं लगता। क्या मनुष्य बंदरों से आया?” देखो, वे लोगों को कहाँ ले गए हैं? क्या यह लोगों को हानि पहुँचाना नहीं है? (बिल्कुल है।) जब भी मौका मिलता है, वे अपने ज्ञान का दिखावा करते हैं, और इतिहास, फलसफे के बारे में बताते हैं, यह बताते हैं कि वे दुनिया में सरकारी अधिकारियों से कैसे निपटते हैं, साँठ-गाँठ कैसे करते हैं, और इन चीजों का दिखावा करते हैं। जब वे इस तरह दिखावा करते हैं, और कुछ भाई-बहन जो आध्यात्मिक कद में छोटे हैं, कमजोर हैं, और जिनकी आस्था कम है, जब वे ये बातें सुनते हैं तो उनके दिल किस ओर रुख करते हैं? (संसार की ओर भागते हैं।) सही है। यह किस चीज के बराबर है? ये लोग जो उन्हें सौंपे गए थे, उन लोगों का ध्यान वे नहीं रख पाए। वे स्पष्ट रूप से गैर माहिर हैं। न सिर्फ वे जीवन-प्रवेश के मामले नहीं समझते हैं, बल्कि वे यह भी नहीं समझते कि उनका काम क्या है, जीवन के आध्यात्मिक मामलों या स्वभाव परिवर्तन को समझना तो दूर की बात है। वे इनमें से किसी को भी नहीं समझते, फिर भी वे सत्य समझने का दिखावा करते हैं और परमेश्वर के चुने हुए लोगों की अगुआई करने के लिए चरवाहा बनना चाहते हैं। क्या यह बेतुका नहीं है? यदि तुम जीवन के आध्यात्मिक मामलों को नहीं समझते हो, तो अगुआ के तौर पर चुने जाने पर तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम कहते हो : “मैं एक जन सामान्य हूँ, और मैंने कभी कलीसिया की अगुआई नहीं की है। मुझे खोजना होगा और समझना होगा कि इस बारे में कार्य व्यवस्थाओं में क्या निर्धारित किया गया है, और इसे लागू करने के बारे में संगति करने के लिए ऐसे लोगों को ढूँढ़ना होगा जो इसे समझते हों, या उन भाई-बहनों को ढूँढ़ना होगा जो सत्य समझते हों, और उनके साथ सहयोग करना होगा।” क्या यह सही रवैया है? (बिल्कुल।) लेकिन कुछ लोग यह नहीं करते हैं। वे घमंड दिखाते हुए कहते हैं, “तुम चाहते हो कि मैं दूसरों के साथ सहयोग करूँ—मुझसे ज्यादा वरिष्ठ योग्यताएँ किसके पास हैं? मुझसे ऊँचा सामाजिक रुतबा किसका है? मैं समाज में काफी प्रसिद्ध हूँ। जो भी मुझसे मिले उसे मुझे थोड़ा आदर देना चाहिए।” वे बस डींग हाँकते हैं और अपनी काबिलियतों का दिखावा करते हैं। जब वे इस तरह से कलीसिया की अगुआई करते हैं, तो क्या तब भी भाई-बहनों को सत्य वास्तविकता में प्रवेश की उम्मीद होती है? (उन्हें नहीं होती।) नहीं होती। और भले ही स्थिति ऐसी हो, ये लोग अभी भी दूसरों से हर चीज के बारे में रिपोर्ट करते हैं। ये दानव थोड़े वक्त के लिए यूनिवर्सिटी गए थे, और उन्हें थोड़ा ज्ञान है, और नतीजतन वे समाज में अकड़ दिखाने, ठगने, और हर तरह की बुरी चीजें करने की हिम्मत करते हैं। उनके पास जीवित रहने के कुछ साधन हैं, इसलिए कुछ हासिल करने के लिए वे परमेश्वर के घर आना चाहते हैं। अपने पूर्वजों के लिए गौरव लाने और रुतबा प्राप्त करने के लिए वे सत्य का प्रतिरूप होने का दिखावा भी करना चाहते हैं ताकि परमेश्वर के चुने हुए लोग उनकी बात सुनें और उनके पीछे चलें। उनके लिए “सत्य का प्रतिरूप” का अर्थ क्या है? इसका अर्थ है, “तुम लोगों को मेरे सभी विचारों, दृष्टिकोणों और राय को सत्य के रूप में कायम रखना चाहिए। मैंने तुम्हारे लिए एक नियम तय किया है : तमाम बिल, भले ही वे पाँच डॉलर से नीचे के हों, उनकी सूचना मुझे देनी होगी।” दूसरे लोग कहते हैं : “पाँच डॉलर की सूचना देना जरूरी नहीं होनी चाहिए। हमारे पास भी अधिकार का एक दायरा है। क्या हम सिर्फ सिद्धांत के अनुसार कार्य नहीं कर सकते हैं?” वे क्या सोचते हैं? “ऐसा कैसे ठीक हो सकता है? यह एक बहुत बड़ी बात है। मैं अगुआ हूँ। सिर्फ मेरा ही निर्णय अंतिम निर्णय होता है!” हालाँकि वे यह नहीं कहते, मगर वे अपने दिलों में ऐसा ही सोचते हैं। वे लोगों को इसी तरह नियंत्रित करते हैं। वे कुछ भी ऐसा कर सकते हैं जो बुरा है या जो दूसरों को धोखा देता है। जब वे दूसरों को धोखा देते हैं और उन्हें हानि पहुँचाते हैं, तो वे पलक भी नहीं झपकाते, उनके दिल की धड़कन नहीं रुकती, और वे भीतर से बिल्कुल बेचैनी महसूस नहीं करते हैं। परमेश्वर के घर में पद मिलने पर वे उसे लेने की हिम्मत करते हैं। एक बार वह पद ले लेने के बाद, वे छोड़ना नहीं चाहते और वे दूसरों से अपनी आज्ञा का पालन करवाने के लिए खुद को सत्य का प्रतिरूप दिखाते हैं। क्या ऐसे लोग अस्तित्व में हैं? (बिल्कुल हैं।)
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?