सत्य का अनुसरण कैसे करें (11) भाग चार
कलाओं से प्रेम करना
चलो अब कलाओं से प्रेम करने पर एक नजर डालते हैं। जो लोग कलाओं से प्रेम करते हैं, उन्हें गाने, नाचने और वाद्य-यंत्र बजाने का जन्मजात शौक होता है और उन्हें प्रस्तुति देने में भी आनंद आता है। जितने ज्यादा लोग होते हैं, वे उतने ही ज्यादा उत्साहित हो जाते हैं; वे हर व्यक्ति को खुश करने और सुकून पहुँचाने के लिए कोई मनोरंजन कार्यक्रम प्रस्तुत करना, मसखरेपन से भरी बातें करना, प्रहसन करना, गीत गाना, नाचना या वाद्ययंत्र बजाना चाहते हैं। कलाओं से प्रेम करना किस प्रकार की अभिव्यक्ति है? पहले, हमें यह देखना चाहिए कि कलाओं में सकारात्मक चीजें शामिल हैं या नकारात्मक। अगर तुम लोग इस बारे में स्पष्ट नहीं हो, तो मैं तुम लोगों से पूछता हूँ : क्या तुम लोगों को लगता है कि गाना और नाचना मानवता की वैध आवश्यकताएँ हैं? (हाँ।) वे मानवता की वैध आवश्यकताएँ हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि लोग अपने गायन, भाव-भंगिमा या किसी तरह के कलात्मक तरीके का उपयोग जीवन को मजेदार बनाने, जीवन का आनंद बढ़ाने या अपनी कोई मनोदशा व्यक्त करने के लिए करते हैं। क्या इसे वैध माना जा सकता है? (हाँ।) अब, चलो अपने मूल विषय पर लौटते हैं—कलाओं से प्रेम करना, गाना और नाचना पसंद करना, वाद्य-यंत्र बजाना और इनकी प्रस्तुति करना—इस प्रकार की अभिव्यक्तियाँ किस श्रेणी के अंतर्गत आती हैं? (रुचियाँ और शौक के अंतर्गत।) चूँकि ये रुचियाँ और शौक हैं, तो ये किसके अंतर्गत आते हैं? (जन्मजात स्थितियों के अंतर्गत।) कुछ बच्चे पाँच-छह साल की उम्र से ही संगीत सुनना और नृत्य देखना पसंद करते हैं और जब वे संगीत की ताल सुनते हैं, तो उनके हाथ-पैर थिरकने लगते हैं और उन्हें नाचने की तीव्र इच्छा महसूस होती है। यह जन्मजात है। कुछ लोग संगीतमय ट्रैक और नृत्य-संगीत सुनकर उसे सीखना चाहते हैं, लेकिन असमर्थ रहते हैं, यहाँ तक कि दस से बीस या तीस साल की उम्र में भी नहीं सीख पाते। उनके लिए नृत्य सीखने का प्रयास करना बहुत ही कठिन होता है और इसमें वे विशेष रूप से अनाड़ी होते हैं। यह भी जन्मजात है। इसके विपरीत, जो लोग जन्मजात रूप से गाना और नाचना पसंद करते हैं, वे संगीत का बजना सुनते ही खुशी-खुशी नाचना शुरू कर सकते हैं। जब वे किसी को गाना गाते हुए सुनते हैं, तब वे उसके साथ-साथ गा सकते हैं और उससे सीख सकते हैं और बस कुछ ही बार अभ्यास करने के बाद वे उस गाने को खुद ही गा सकते हैं। यह साबित करता है कि इस तरह के लोगों के लिए ये चीजें जन्मजात होती हैं और ये उनके खून में होती हैं; वे दिल से इन चीजों को पसंद करते हैं और इनमें निपुण भी होते हैं। बिना किसी के सिखाए वे जानते हैं कि इन्हें कैसे करना है। कुछ ऐसे भी विशेष रूप से असाधारण लोग होते हैं जो महज सात-आठ साल की उम्र में ही किसी क्षेत्रीय ऑपेरा की कुछ पंक्तियाँ गा सकते हैं और उनके गाने में असली होने का वह एहसास होता है; वह एकदम सही सुर और सही लय में होता है—यह सचमुच दुर्लभ है! कुछ बच्चे तो कुछ पॉप गीत भी गा सकते हैं और कुछ बच्चे भारतीय नृत्य, शिनजियांग नृत्य या आधुनिक नृत्य जैसी शैलियों में नाच सकते हैं। जब वे नृत्य-गीत या संगीत सुनते हैं, तो उन्हें सहज रूप से पसंद करते हैं और उनके शरीर तुरंत ही संगीत की धुन पर थिरकना शुरू कर देते हैं। अगर तुम उन्हें गाने नहीं देते, तो वे छिप-छिपाकर मन ही मन गाते हैं या फिर कोई ऐसी जगह ढूँढ़ लेते हैं जहाँ वे ऊँची आवाज में गा सकें। वे बस गाना चाहते हैं और उन्हें गाना पसंद होता है और उन्हें कोई भी रोक नहीं सकता। न तो उनके माता-पिता का उन पर कोई प्रभाव पड़ा होता है, न ही किसी ने उन्हें सिखाया होता है। बचपन से ही उनमें ये खूबियाँ या शौक मौजूद होते हैं। यह स्पष्ट है कि यह एक जन्मजात स्थिति है—कलाओं में उनकी जन्मजात रुचि होती है। अगर उन बच्चों की कलाओं में रुचि है, तो क्या उनका इस काम में लग जाना जरूरी है—क्या उनका जीवन भर इसी उद्योग में काम करना जरूरी है? यह जरूरी नहीं है। यह परमेश्वर के विधान पर निर्भर करता है, इस बात पर निर्भर करता है कि परमेश्वर कैसे अपनी संप्रभुता का इस्तेमाल और चीजों की व्यवस्था करता है। अगर परमेश्वर उनके लिए कलाओं में काम करने की व्यवस्था करता है तो वे अपनी पूरी जिंदगी इसी उद्योग से बँधे रहेंगे। लेकिन अगर परमेश्वर ने उनके लिए इस उद्योग में काम करने की व्यवस्था या विधान तय नहीं किया है तो उनके पास केवल यह रुचि और शौक होगा; और भले ही उन्हें इस काम में आनंद आता हो, उनके लिए इस काम में संलग्न होना संभव नहीं होगा। कुछ लोग बचपन से ही कलाओं को पसंद करते हैं। अपने बच्चे में यह रुचि और शौक देखकर उनके माता-पिता सोचते हैं, “चलो इसे विकसित करते हैं। मुमकिन है हमारे परिवार में कोई कलात्मक प्रतिभा पैदा हो जाए। शायद हमारा बच्चा मशहूर भी हो जाए और एक स्टार भी बन जाए!” इसलिए वे अपने बच्चे को नाचने-गाने की पढ़ाई में विकसित करने लगते हैं और आखिरकार बच्चे का दाखिला एक कला अकादमी में हो जाता है। हालाँकि स्नातक होने के बाद भी कलाओं में बच्चे की रुचि और शौक मजबूत बना रहता है, फिर भी वह इस उद्योग में काम कर सकता है या नहीं, यह अनिश्चित रहता है। संभव है कि जब वह इस काम में संलग्न होने वाला हो तब उसका मन बदल जाए और फिर इस कार्य के प्रति उसका रवैया और दृष्टिकोण बदल जाए और यह भी संभव है कि वस्तुगत परिस्थितियों के भीतर विभिन्न कारणों से वह इस उद्योग का हिस्सा बनने से चूक जाए। ये सभी चीजें संभव हैं; यह परमेश्वर की पूर्वनियति पर निर्भर करता है। लेकिन अगर इसे इसकी मूल वजह से देखें, तो बच्चे की रुचि और शौक उसकी जन्मजात स्थिति होती है—उसके पैदा होने से भी पहले परमेश्वर ने उसके लिए यह खूबी व्यवस्थित कर दी थी और उसकी मानवता में कुछ खास गुण जोड़ दिए थे, जिससे वह जन्मजात रूप से संगीत, नृत्य और कला के दूसरे पहलुओं के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील और उनमें निपुण बन जाता है। इस तरह वह अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में गाने और नाचने के प्रति एक खास लगाव प्रकट करता है। चाहे उसका व्यक्तित्व जिंदादिल हो या शर्मीला, चाहे उसे बात करना पसंद हो या बात करना पसंद न हो, हर हाल में, उसकी रग-रग में कुछ ऐसा गहरा बसा होता है जिसे मिटाया नहीं जा सकता—उसे गाना पसंद होता है, नाचना पसंद होता है और इसकी प्रस्तुति देना पसंद होता है। कुछ लोग भले ही गाते समय बेहद ऊर्जावान हो जाते हों और अपनी आत्मा में मुक्ति की भावना महसूस करते हों, फिर भी जब तुम उनसे बात करते हो तब वे बहुत शर्मीले होते हैं और वे खुद को व्यक्त करने या लोगों से घुलने-मिलने में माहिर नहीं होते। दूसरों के साथ मेल-जोल रखते समय वे विशेष रूप से अकड़े हुए और तनावग्रस्त रहते हैं, यहाँ तक कि घबराए और डरे हुए भी होते हैं, वे नहीं जानते कि इन स्थितियों से कैसे निपटें। लेकिन जब वे प्रस्तुति देने के लिए मंच पर कदम रखते हैं, तो वे ऐसा बड़ी आसानी से कर लेते हैं; ऐसा लगता है मानो वे कोई अलग इंसान बन गए हों। गैर-विश्वासी कहते हैं कि यह उनके क्षेत्र का “संरक्षक देवता” है जो उन्हें रोजी-रोटी कमाने की यह क्षमता देता है—क्या यह सही है? असल में, यह परमेश्वर का विधान है। किसी व्यक्ति में कौन-सी खूबियाँ, रुचियाँ और शौक जन्मजात होते हैं, यह परमेश्वर की पूर्वनियति से जुड़ा होता है। व्यक्ति में जो भी खूबियाँ और शौक होते हैं, वे सभी परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत होते हैं। अगर परमेश्वर तुम्हें कोई रुचि और शौक देता है, तो तुम उसे अपने दिल की गहराइयों से पसंद करते हो और उसकी सराहना करते हो और उसके प्रति विशेष रूप से जुनूनी महसूस करते हो। जब तुम इस काम में लगते हो या इस काम से जुड़ा हुआ कुछ करते हो, तब तुम अंदर से विशेष रूप से शांति और सुकून महसूस करते हो और तुम्हें उसमें खास दिलचस्पी भी होती है। इसलिए, अगर तुममें किसी तरह की कोई खूबी है, तो जब परमेश्वर के घर के कार्य को उसकी जरूरत होती है, तब तुम्हें वह संबंधित कर्तव्य करना चाहिए। तुम्हारे लिए यह अपनी खूबी का इस्तेमाल करने का सबसे अच्छा मौका है। इसी तरह, चूँकि यह खूबी तुम्हें परमेश्वर ने दी है, इसलिए यह तुम्हारी निजी संपत्ति नहीं है; तुम इसका अपनी मर्जी से गलत इस्तेमाल नहीं कर सकते। जब परमेश्वर के घर के कार्य को इसकी जरूरत हो, तब तुम्हें इसे इस्तेमाल में लाना चाहिए और परमेश्वर को अर्पित करना चाहिए, अपने कर्तव्य में इसका उपयोग करना चाहिए। यह तुम्हारे लिए उद्धार पाने की एक अनुकूल स्थिति है और यह एक बेहतरीन अवसर भी है जो परमेश्वर ने तुम्हें दिया है—तुम्हें कुछ बचाकर रखे बिना इसे अच्छी तरह से इस्तेमाल में लाना चाहिए और इसे अच्छे से लागू करना चाहिए। इस तरह, एक ओर तो तुम अपनी खूबी का इस्तेमाल कर पाओगे और दूसरी ओर, तुम परमेश्वर के प्रेम का आभार चुकाने का अपना कर्तव्य भी पूरा कर पाओगे। क्या यह बढ़िया नहीं है? (हाँ, है।)
परमेश्वर ने लोगों को कुछ खास तरह की खूबियाँ दी हैं और चाहे प्राचीन काल हो या आधुनिक काल, इनमें से एक—कला—को कभी गंभीरता से नहीं लिया गया और इसे हमेशा निम्न वर्गों की चीजों में सूचीबद्ध किया गया है। विशेष रूप से, कुछ अपेक्षाकृत परंपरागत और सामंती सामाजिक परिवेशों में तमाम लोग कलाओं को हमेशा एक पूर्वाग्रह के साथ देखते हैं और कुछ लोग कलाओं के साथ हमेशा भेदभाव करते हैं। लोगों के बीच कलाओं को इसी तरह से निरूपित किया जाता है और उनका यह दर्जा, रुतबा या परिभाषा लोगों की धारणाओं, उनके सामंती विचारों या उन विकृत और भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों के कारण है जिन्हें शैतान लोगों के मन में डालता है। एक और कारक भी है, वह यह कि बुरे समाज और दुष्ट प्रवृत्तियों के प्रभाव के कारण इस उद्योग में एक बुरा माहौल बन गया है, इसलिए लोग कला-उद्योग का खराब आकलन करते हैं। इस उद्योग से जुड़े कुछ लोगों ने कलाओं में अपनी रुचियों और खूबियों का उपयोग कई नकारात्मक और दुष्टतापूर्ण चीजें करने के लिए किया है, जिसने कलाओं को बदनाम किया है और कलाओं की प्रकृति को विकृत कर दिया है। नतीजतन, लोगों ने कला-जगत के बारे में कई नकारात्मक राय विकसित कर ली हैं और वे उन लोगों को, जो कलाओं के क्षेत्र में काम करते हैं या जिनकी इस क्षेत्र में रुचि और शौक हैं, नकारात्मक व्यक्ति समझते हैं। लेकिन, समाज और मानवजाति इस प्रकार की खूबी को चाहे जिस भी नजर से देखें, संक्षेप में, अगर कोई व्यक्ति—चाहे वह परमेश्वर के घर का सदस्य हो या परमेश्वर के घर के बाहर का व्यक्ति—इस क्षेत्र में कोई खूबी या रुचि और शौक रखता है, तो इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि यह खूबी और शौक जन्मजात स्थितियाँ हैं। ठीक इसी कारण से कि ये जन्मजात स्थितियाँ हैं, इसलिए ये न तो नकारात्मक हैं और न ही दुष्टतापूर्ण। केवल कुछ विशेष युगों में कुछ गलत विचारों और सिद्धांतों के निर्देशन के कारण ही कलाओं और उनसे जुड़े लोगों को दुष्ट और नकारात्मक चीजों के रूप में निरूपित किया गया है। यह ऐसी चीज है जो पूरे इतिहास में बार-बार घटित हुई है। यह ठीक वैसा ही है जैसे सोयाबीन से सुगंधित टोफू बनाया जा सकता है जिसे लोग चाव से खाते हैं, लेकिन टोफू को फफूँद जैसे सूक्ष्मजीवों के साथ किण्वित करके बदबूदार टोफू भी बनाया जा सकता है। सिर्फ इसलिए कि तुम बदबूदार टोफू खाना पसंद नहीं करते, तुम यह नहीं कह सकते कि सोयाबीन खराब है। क्या यह तार्किक विचार सही है? (नहीं।) यह स्पष्ट रूप से गलत है; यह विरूपित है। इसलिए, भले ही समाज में कला-समूहों के भीतर कुछ गंदी और कुरूप चीजें हैं, फिर भी तुम यह नहीं कह सकते कि कलाएँ अपने आप में गंदी, कुरूप और नकारात्मक हैं और यह तो तुम बिल्कुल भी नहीं कह सकते कि जो लोग कलाओं को पसंद करते हैं और उनमें कुशल हैं, वे सभी दुष्ट और कुरूप नकारात्मक व्यक्ति हैं। यह गलत तर्क है; यह सही समझ नहीं है। यदि उनमें से कुछ लोगों के दुष्ट होने के कारण तुम यह कहते हो कि जिन कलाओं में वे निपुण हैं, वे भी दुष्टतापूर्ण हैं, तो यह एक बहुत बड़ी गलती है। परमेश्वर लोगों को जो विभिन्न खूबियाँ प्रदान करता है, उनका उद्देश्य मानव जगत की सेवा करना है। अगर मानवजाति का कोई सांस्कृतिक जीवन न होता, तो वह अत्यंत नीरस होता। परमेश्वर द्वारा लोगों के लिए सांस्कृतिक जीवन की व्यवस्था करना कोई गलत बात नहीं है। वे सभी दुष्टतापूर्ण चीजें दानवों और शैतान के कारण उत्पन्न होती हैं, जो अवसर का लाभ उठाकर गड़बड़ियाँ पैदा करते हैं। हालाँकि, पूर्ण मानवजाति की तुलना में—वह मानवजाति जिसे अंततः पूर्ण किया जाएगा—परमेश्वर द्वारा रचित यह वर्तमान मानवजाति अभी पूर्ण नहीं है और इसमें कुछ कमियाँ हैं, फिर भी इसका यह अर्थ नहीं कि परमेश्वर द्वारा रचित यह मानवजाति दुष्ट या नकारात्मक है—ये दोनों भिन्न संकल्पनाएँ हैं। क्या तुम समझते हो? (हाँ।) चाहे यह दुष्ट युग और दुष्ट संसार कलाओं को और गायन और नृत्य में रुचियों, शौकों या खूबियों को किसी भी स्थान पर क्यों न रखे, फिर भी किसी भी सूरत में इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ये मानवजाति की आवश्यकताएँ हैं और ये कुछ विशेष लोगों की निजी रुचियाँ और शौक भी हैं। चूँकि ये रुचियाँ और शौक हैं, इसलिए ये लोगों में जन्मजात होते हैं और ये ऐसी चीजें हैं जिनके साथ लोग जन्म लेते हैं, जिसका अर्थ है कि ये परमेश्वर से आते हैं और परमेश्वर द्वारा दिए जाते हैं। लोगों के जन्म लेने से पहले ही परमेश्वर वह व्यवसाय पूर्व-निर्धारित कर चुका होता है जिसमें उनमें से प्रत्येक व्यक्ति संलग्न होगा : कुछ लोग व्यवसाय करने के लिए वाणिज्य की श्रेणी में रखे जाते हैं, कुछ श्रमिक बनने के लिए कारखानों में रखे जाते हैं, कुछ खेती करने के लिए कृषि में रखे जाते हैं, कुछ शिक्षक बनने के लिए शिक्षा में रखे जाते हैं और कुछ कलाकार बनने के लिए कलाओं में रखे जाते हैं। परमेश्वर ने लोगों के जन्म से पहले ही उनमें विभिन्न प्रकार की खूबियाँ डाल दी होती हैं। यानी हर व्यक्ति के दैहिक जीवन में उसकी रुचियाँ, शौक और खूबियाँ अलग होती हैं। तुम्हारे जन्म लेने से पहले ही परमेश्वर ने तुममें कुछ खास और अलग चीजें जोड़ दी थीं। अगर तुममें रुचियाँ, शौक या खूबियाँ नहीं हैं, तो तुम्हें यह शिकायत नहीं करनी चाहिए कि परमेश्वर ने तुममें ये चीजें नहीं जोड़ीं। इनके बिना भी तुम जी सकते हो और अपना कर्तव्य कर सकते हो। दूसरों के मुकाबले तुममें किसी चीज की कमी नहीं है, क्योंकि कर्तव्य करने का जो मौका दूसरों को मिलता है, वही मौका तुम्हें भी मिलता है। तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव भी वैसे ही हैं जैसे दूसरों के होते हैं; बस लोगों की जन्मजात स्थितियाँ अलग-अलग होती हैं—हर व्यक्ति की अपनी खूबियाँ और कमजोरियाँ होती हैं। तो मुख्य बात क्या है? मुख्य बात मानवता में अंतर की है। जिस व्यक्ति की जन्मजात स्थितियों के भीतर कुछ खास रुचियाँ, शौक और खूबियाँ होती हैं, वह कोई खास प्रतिभाशाली व्यक्ति नहीं होता और जिस व्यक्ति की जन्मजात स्थितियों के भीतर कोई रुचि, शौक या खूबी नहीं होती, वह किसी तरह का प्रतिभाहीन व्यक्ति नहीं होता। हर कोई कमोबेश एक जैसा ही होता है। बात बस इतनी है कि परमेश्वर तुम्हें जो कुछ भी देता है, वह तुमसे उसी की अपेक्षा करता है और तुम्हें अपने कर्तव्य में उसका इस्तेमाल करना चाहिए, जो कुछ वह तुम्हें नहीं देता, उसकी अतिरिक्त अपेक्षा वह तुमसे नहीं करता। भले ही परमेश्वर ने तुम्हें रुचियाँ और शौक या खूबियाँ न दी हों, फिर भी तुम्हारी मानवता के भीतर मौजूद विभिन्न चीजें या स्थितियाँ तुम्हारे लिए कोई काम करने या कोई कर्तव्य करने के लिए काफी हैं। अगर तुम उसे नहीं कर पाते, तो हो सकता है कि तुम उन लोगों की श्रेणियों से बाहर हो जो कर्तव्य करते हैं और यह पूरी तरह से दूसरा मामला होगा।
कलाओं से प्रेम करने के विषय पर हमारी चर्चा यहीं समाप्त होती है। इस प्रकार की खूबी का निरूपण अब तुम्हें स्पष्ट हो जाना चाहिए। ऐसा मत सोचो कि जो लोग कलाओं से प्रेम करते हैं, वे अजीब या दुष्ट होते हैं। अगर तुम ऐसा सोचते हो, तो तुम्हारी समझ बहुत ही विरूपित है। तुम्हें ऐसे लोगों के साथ सही तरीके से व्यवहार करना चाहिए, उनके साथ सही ढंग से मेलजोल करना चाहिए और उन्हें उन पेशेवर तकनीकों का उपयोग अपने कर्तव्यों में करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए जिनमें वे कुशल हैं और जिन्हें वे समझते हैं। अगर तुम एक अगुआ या कार्यकर्ता हो, तो तुम्हें ऐसे लोगों को अपनी खूबियों का पूरा उपयोग करने में मदद करने, उन्हें मार्गदर्शन और दिशानिर्देश देने के लिए सही तरीके का इस्तेमाल करना सीखना होगा, ताकि वे सही राह पर आ सकें और अपनी रुचियों और शौकों से संबंधित कोई कर्तव्य निभा सकें और इस तरह मानक के अनुरूप सृजित प्राणी बन सकें और परमेश्वर द्वारा दी गई विभिन्न रुचियों, शौकों और खूबियों के योग्य बन सकें। अगर वे अपनी रुचियों और शौकों से संबंधित कोई कर्तव्य नहीं निभा पाते हैं, तो उनका कोई अन्य कर्तव्य निभाना भी ठीक है। हालाँकि, उन्हें अपनी निजी रुचियाँ और शौक रखने से रोका नहीं जाना चाहिए, क्योंकि यह मानवता का एक भाग है।
इसी पर मुझे एक बात याद आ रही है—अभी-अभी परमेश्वर के घर में कुछ नए गायकों ने गाने रिकॉर्ड किए हैं। पूरी लगन से पेशेवर ज्ञान हासिल करने और गाने का अभ्यास करने के बाद ये नए गायक आखिरकार मुकम्मल गाने रिकॉर्ड करने में सक्षम रहे हैं, जहाँ वे अब तक परदे के पीछे काम कर रहे थे, वहीं अब मुख्य मंच पर आकर प्रस्तुति दे रहे हैं। भले ही उनका गायन पेशेवर मानक से थोड़ा कम हो और अभी तक पेशेवर गायकों के स्तर तक न पहुँचा हो और उसमें सुधार की गुंजाइश हो—उनमें से कुछ बिना ज्यादा अनुभवजन्य कौशल के गाते हैं, कुछ गायकों की आवाज उतनी सुरीली नहीं है और उनकी प्रस्तुति आँखों को उतनी सुखद नहीं लगती है—फिर भी, अपना कर्तव्य निभाने के प्रति उनका रवैया प्रोत्साहन के योग्य है। एक शौकिया गायक से आगे बढ़कर एक नौसिखिया गायक, एक अनुभवहीन गायक के तौर पर परदे पर आना एक ऐसी चीज है जो प्रोत्साहन के योग्य है। तो इस मामले में मैं तुम लोगों से क्या कहना चाहता हूँ? यही कि जब इन नए गायकों द्वारा रिकॉर्ड किए गए भजन के वीडियो इंटरनेट पर अपलोड किए जाएँ, तो तुम लोगों को उन्हें थोड़ा प्रोत्साहन देना चाहिए। तुम कुछ अच्छे सुझाव भी दे सकते हो जिनसे उन्हें फायदा हो सके, लेकिन उनमें नुक्स मत निकालो, उन्हें अपमानजनक तरीके से नीचा मत दिखाओ और उनकी हद से ज्यादा आलोचना मत करो। यह रवैया ठीक नहीं है; कम से कम, इसमें प्रेम और सहनशीलता की कमी है और यह वह रवैया नहीं है जो किसी को अपने भाई-बहनों के प्रति रखना चाहिए। तो फिर उनके साथ व्यवहार करने का सही तरीका क्या है? तुम्हें उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए और उनका हौसला थोड़ा बढ़ाना चाहिए और फिर उन्हें कुछ सही सुझाव देने चाहिए; केवल यही उनके लिए फायदेमंद है। कम से कम उनमें मंच पर खड़े होने और परमेश्वर की स्तुति में भजन गाने का साहस तो है, जो परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए फायदेमंद है। इसलिए, हर किसी को उनका अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करने में मदद करनी चाहिए और हर किसी को बिल्कुल भी गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणियाँ नहीं करनी चाहिए और न ही उनसे ईर्ष्या करनी चाहिए। हमें खुश और प्रसन्न होना चाहिए कि परमेश्वर के घर में ऐसे और भी लोग हैं जिनमें गाने की प्रतिभा है—यह एक अच्छी बात है। जिन लोगों में इस क्षेत्र में खूबियाँ हैं, उन सभी को उनका इस्तेमाल करने दिया जाना चाहिए; उन सभी को अवसर दिए जाने चाहिए। उनमें खुद ज्यादा आत्मविश्वास नहीं होता और उनकी जो थोड़ी-बहुत रुचियाँ और शौक होते हैं, उन्हें पूरा करने का उनके पास कोई जरिया नहीं होता। अगर उनमें इस कर्तव्य को अच्छी तरह से करने की इच्छा है और उन्होंने भजन के वीडियो रिकॉर्ड किए हैं, तो उन्हें देखकर तुम्हें कम से कम दो-तीन बार उन्हें सुनना चाहिए—ध्यान से और गौर से सुनना चाहिए—और उन्हें कुछ प्रोत्साहन देना चाहिए। उनकी पीठ पीछे उन्हें नुकसान मत पहुँचाओ। तुम्हें दूसरे भाई-बहनों से कहना चाहिए कि वे उनके गाए हुए गीत ज्यादा सुनें और उन्हें ज्यादा लाइक दें। उनमें से कुछ लोग सच्ची भावना के साथ बहुत अच्छा गाते हैं, हर पंक्ति का उच्चारण बहुत स्पष्ट रूप से करते हैं; उनका पहनावा और चाल-ढाल गरिमापूर्ण और उचित होता है, जिससे वे दूसरों को सही लगते हैं। हालाँकि, दूसरों की आवाज और तकनीकी परिपक्वता में थोड़ी कमी हो सकती है। अगर तुम्हें संगीत के बारे में थोड़ी जानकारी है और तुम कमियाँ पकड़ सकते हो, तब भी उनका मजाक मत उड़ाओ; उनके साथ सही तरीके से पेश आओ, उन्हें प्रोत्साहित करो और समर्थन दो। परिवार के सदस्य के तौर पर, एक भाई या बहन के तौर पर तुम्हारा यही रवैया होना चाहिए। बुरे लोगों की नकल करके ऐसी चीजें मत करो जो दूसरों को छोटा दिखाती हों या दूसरों को नीचा दिखाती हों। अगर तुम खुद मंच पर नहीं जा सकते, लेकिन जब कोई और जाता है, तो तुम ईर्ष्यालु हो जाते हो, उसे नुकसान पहुँचाते हो और उसकी पीठ पीछे क्षुद्र टिप्पणियाँ करते हो, तो यह मानवता की कमी है। इस तरह आचरण करना अच्छा नहीं है—यह घिनौना है। अगर तुम उनकी कमियाँ पकड़ सकते हो, तब भी तुम्हें उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए। तुम्हें ऐसा इसलिए करना चाहिए क्योंकि वे भाई-बहन हैं—वे पेशेवर नहीं हैं, न ही उन्होंने पेशेवर प्रशिक्षण लिया है—और जिस तरह से वे अभी गा पा रहे हैं, वह विशुद्ध रूप से उनके अपने अन्वेषण, अभ्यास और कड़ी मेहनत का नतीजा है। तो फिर उन्हें प्रोत्साहित क्यों न करें? अगर तुम प्रोत्साहित करना और सहनशील होना सीख जाते हो और उनके गाने में कुछ कमियाँ देखने के बाद भी उनके साथ प्यार और सहनशीलता के साथ सही तरीके से पेश आते हो, तो यह दर्शाता है कि तुममें मानवता है। कुछ लोग हमेशा परमेश्वर के घर के गायकों की तुलना गैर-विश्वासी दुनिया के पेशेवर गायकों से करते हैं और इसलिए परमेश्वर के घर के गायकों को नीची निगाह से देखते हैं और यहाँ-वहाँ नुक्स निकालते हैं। यह मानवता की कमी है। अगर तुम हमेशा दूसरों की कमियाँ निकालते हो और हमेशा सोचते हो कि तुम दूसरों से बेहतर और श्रेष्ठ हो, तो फिर तुम ऐसा गीत क्यों नहीं गा सकते जो लोगों को भावविभोर कर दे? दूसरों में नुक्स मत निकालो। कलीसिया में गाने वाले गायक पेशेवर पृष्ठभूमियों से नहीं आते, लेकिन एक चीज है जो उनके बारे में खास है : यह काम करते समय वे कोई करियर नहीं बना रहे होते—वे अपना कर्तव्य कर रहे होते हैं। उनका कर्तव्य अपनी आवाज का इस्तेमाल करके परमेश्वर के वचनों को गाना और परमेश्वर के वचनों की गवाही देना और परमेश्वर के वचनों का प्रसार करना है। इसलिए तुम्हें उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए। क्या ऐसा करना अच्छी बात नहीं है? (हाँ, है।) यही मानवता का होना है। जब तुम किसी नए गायक को गाते हुए सुनो, तो यह कहते हुए उसमें नुक्स मत निकालो, “इस व्यक्ति की आवाज अच्छी नहीं है। यह परिष्कृत नहीं है। यह ताल से भटक रहा है और इसका सुर भी सही नहीं लग रहा है—मैं तो नहीं सुनूँगा! किसी को भी इसे नहीं सुनना चाहिए और किसी को भी इसे लाइक नहीं देना चाहिए!” इस मामले में तुम इतने नुक्ताचीन क्यों हो रहे हो? थोड़ा-बहुत बेसुरा गाना, बिना किसी मँजे हुए हुनर के गाना या गैर-पेशेवर ढंग से गाना—क्या यह सत्य सिद्धांतों के खिलाफ है? यह सत्य सिद्धांतों के खिलाफ नहीं है। वे अपना कर्तव्य निभा रहे हैं, इसलिए तुम्हें उनके गायन को कर्तव्य करने के सिद्धांतों के अनुसार मापना चाहिए, न कि अपनी पसंद और परिप्रेक्ष्यों के आधार पर। साफ-साफ कहूँ तो—तुम जानते ही क्या हो? अगर तुम गायन के बारे में इतना ही जानते हो, तो तुमने एक भी गाना अनुकरणीय मानक के अनुरूप क्यों नहीं गाया है? चूँकि तुमने अनुकरणीय मानक के अनुरूप नहीं गाया है, इसलिए तुम्हें दूसरों की आलोचना करने का कोई अधिकार नहीं है। बेशक, अगर तुम अनुकरणीय मानक के अनुरूप भी गा सको, तब भी तुम्हें दूसरों की आलोचना नहीं करनी चाहिए। उनके द्वारा इस कार्य का निष्पादन अपने आप में कला-उद्योग में संलग्न होना या कलाओं में काम करना नहीं है—यह एक कर्तव्य करना और परमेश्वर के वचनों का प्रसार करना है, जिसकी प्रकृति भिन्न है। चाहे वे अच्छा गाते हों या नहीं, वे जो कुछ भी कर रहे हैं उसे पूरे दिल से कर रहे हैं—वे अपना कर्तव्य कर रहे हैं। जहाँ तक उनके पेशेवर स्तर की बात है, तो वह अलग मामला है। पेशेवर मानक पर तो सीखने और लंबे समय तक अभ्यास करने के माध्यम से धीरे-धीरे ही पहुँचा जा सकता है। परमेश्वर के घर में जो नए गायक हैं, वे अभी उसी स्तर पर हैं। लोगों को उनके साथ सही तरीके से पेश आना चाहिए—हर किसी को उन्हें प्रोत्साहन और सहयोग देना चाहिए। उनमें नुक्स मत निकालो और न ही खुद पर इतराओ। अगर तुम खुद पर इतराओगे, तो तुम लोगों को घिनौने लगोगे। अगर तुम खुद पर इतराते नहीं हो और कुछ और बार सुनते हो, तो लोग तुम्हें बहुत अच्छा इंसान समझेंगे, ऐसा इंसान जिसके पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल है, जिसका दिल परमेश्वर के घर के साथ है और जिसमें सहनशीलता है, तब यह तुम्हारी मानवता की एक खूबी, एक गुण होगा। अगर तुम ऐसा करते हो, तो लोग तुम्हें पसंद करेंगे और परमेश्वर भी तुम्हें पसंद करेगा। अगर तुम दिखावा करते हो, हमेशा दूसरों की गलतियाँ निकालकर यह दिखाते हो कि तुम मेधावी और विशेषज्ञ हो, तो तुम परमेश्वर के घर के कार्य को नुकसान पहुँचाते हो और उसमें बाधा डालते हो। अगर तुम कार्य को नुकसान पहुँचाते हो, तो क्या परमेश्वर तुम्हें पसंद करेगा? (नहीं।) परमेश्वर तुम्हें पसंद नहीं करेगा और भाई-बहन भी तुम्हें पसंद नहीं करेंगे। गायकों ने तुम्हें कैसे नाराज किया है? तुम्हें इस तरह दिखावा करने और उन्हें नुकसान पहुँचाने की क्या जरूरत है? क्या तुम सिर्फ एक इंसान को नुकसान पहुँचा रहे हो? नहीं, तुम परमेश्वर के घर के कार्य के लिए रुकावट बन रहे हो, तुम परमेश्वर के लिए रुकावट बन रहे हो। अगर तुम ऐसा करते हो, तो क्या परमेश्वर तुम्हें पसंद करेगा? अगर तुम्हें उनके गाए गानों में कुछ कमियाँ नजर आती भी हैं, तब भी तुम्हें उनकी आलोचना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि किसी भी विशेषीकृत काम में पेशेवर मानक तक पहुँचना कोई एक रात में होने वाली चीज नहीं है। यह आसान नहीं है—इसके लिए हुनर को सान पर चढ़ाने और अभ्यास करने और विशेषज्ञों से मार्गदर्शन लेने की जरूरत होती है; इसके अलावा, हर किसी की अपनी अलग प्रतिभा होती है। यहाँ तक कि परमेश्वर भी उनसे पेशेवर मानक के आधार पर अपेक्षाएँ नहीं करता, तो फिर तुममें ऐसी क्या योग्यता है जो तुम उनसे ऐसी अपेक्षा करते हो? हमेशा दूसरों से यह माँग करना कि वे एक खास स्तर तक पहुँचें, तर्कसंगत नहीं है; यह अहंकार है और दिखावा करना है। जब दूसरे लोग सुर्खियों में रहते हैं, तो तुम दिल में परेशान हो जाते हो और बेहद ईर्ष्यालु हो जाते हो, अपने मिथ्याभिमान को संतुष्ट करने के लिए हमेशा कुछ ताने मारना या कड़वे बोल बोलना चाहते हो। ऐसा करना कितना नीच काम है! यह घिनौना और नीच काम है और ऐसे व्यक्ति के पास जमीर और विवेक नहीं होता। तुम्हें ऐसी चीजें करनी चाहिए, जो दूसरों के लिए लाभदायक हों, ऐसी चीजें जो दूसरों की सराहना के योग्य हों और जिन्हें परमेश्वर भी याद रखे। ऐसी चीजें मत करो, जो दूसरों को नुकसान पहुँचाएँ। क्या तुम इसे याद रखोगे? (हाँ।) अगर तुम सहनशील, मददगार और उत्साहवर्धक नहीं हो सकते और कलीसिया के कार्य की रक्षा और सुरक्षा के लिए आगे नहीं आ सकते, अगर तुममें इस मानवता की कमी है, तो कम से कम ऐसी चीजें मत करो और मत कहो जो दूसरों को नुकसान पहुँचाएँ। यह वह न्यूनतम चीज है जो की जानी चाहिए—यह सीमा है।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?