सत्य का अनुसरण कैसे करें (12) भाग एक
सत्य का अनुसरण करने का पहला अभ्यास : त्याग देना
अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को त्याग देना
I. परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग देना : परमेश्वर के कार्य के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग देना
च. परमेश्वर का कार्य लोगों की जन्मजात स्थितियों को नहीं बदलता, बल्कि इसका लक्ष्य उनके भ्रष्ट स्वभावों को बदलना है
पिछली बार हमने किस विषय के बारे में संगति की थी? हमने तीन पहलुओं—जन्मजात स्थितियाँ, मानवता और भ्रष्ट स्वभाव—की कुछ विशिष्ट अभिव्यक्तियों के बारे में संगति की थी। हमने इन विशिष्ट अभिव्यक्तियों पर चर्चा की थी और इस तरीके से यह भेद पहचाना था कि वे इन तीनों पहलुओं में से किस पहलू से संबंधित हैं। अगर तुम लोग दैनिक जीवन में इन अभिव्यक्तियों को देखो जिनके बारे में हमने संगति की थी तो तुम मूलतः उन्हें निरूपित और श्रेणीबद्ध कर सकते हो—जैसे कि क्या वे जन्मजात स्थितियों से संबंधित हैं या मानवता से संबंधित हैं या फिर भ्रष्ट स्वभावों से संबंधित हैं। जहाँ तक उन अभिव्यक्तियों का प्रश्न है जिनके बारे में संगति नहीं की गई थी, तो क्या अब तुम लोग जानते हो कि उन्हें इन सिद्धांतों के अनुसार या उनके द्वारा अभिव्यक्त किए गए सार के अनुसार कैसे श्रेणीबद्ध करना है? (हमें लगता है कि हम इस मामले में पहले से कुछ हद तक बेहतर हैं—हम इस दिशा में मनन करने में समर्थ हैं, लेकिन हम अभी तक भेद पहचानने में समर्थ होने के बिंदु तक पूरी तरह से नहीं पहुँचे हैं।) तुम आमतौर पर उन अभिव्यक्तियों का भेद पहचान सकते हो जिनके बारे में हमने संगति की थी, लेकिन जहाँ तक उन अभिव्यक्तियों का प्रश्न है जिनके बारे में संगति नहीं की गई थी और जिनका इससे पहले संगति की गई अभिव्यक्तियों से कोई संबंध नहीं है, तो तुम्हें नहीं पता कि तुम उनका भेद पहचानने में समर्थ हो या नहीं। (सही कहा।) पिछले कुछ धर्मोपदेशों में हमने जन्मजात स्थितियों के भीतर रुचियों, शौक और खूबियों की कुछ अभिव्यक्तियों और साथ ही इन पहलुओं से संबंधित उन मुद्दों पर भी संगति की थी जो लोगों में अभिव्यक्त होते हैं। हमने इन मुद्दों के संबंध में लोगों का जो रवैया और अभ्यास का मार्ग होना चाहिए उसके बारे में और साथ ही उन लोगों से परमेश्वर की अपेक्षाओं के बारे में भी संगति की थी जिनमें रुचियाँ, शौक और खूबियाँ होती हैं। इस बारे में संगति मुख्य रूप से लोगों को उन विचारों और दृष्टिकोणों के बारे में—साथ ही अभ्यास के उस मार्ग के बारे में भी जो उन्हें समझना चाहिए—बताने के लिए है जो उनके पास रुचियों, शौक और खूबियों के संबंध में होने चाहिए और साथ ही इन पहलुओं में शामिल परमेश्वर के इरादों और अपेक्षाओं के बारे में भी बताने के लिए है जिन्हें उन्हें समझना चाहिए। रुचियों, शौक और खूबियों के मुद्दों के संबंध में हमने सिर्फ सामान्य अर्थ में संगति की थी और इस बारे में विशिष्ट रूप से संगति नहीं की थी कि इन मामलों में लोगों के क्या त्रुटिपूर्ण विचार और दृष्टिकोण हैं, वे अभ्यास के कौन-से त्रुटिपूर्ण मार्ग अपना सकते हैं या इस मामले में परमेश्वर की अपेक्षाओं के संबंध में उनकी क्या त्रुटिपूर्ण समझ है। तो चलो, अब हम इन मुद्दों के आधार पर जो लोगों में हैं, उन विशिष्ट मुद्दों पर विस्तार से संगति करें जिन्हें लोगों को रुचियों, शौक और खूबियों के संबंध में समझना चाहिए।
7. रुचियों और शौक और खूबियों के बीच का अंतर
क्या तुम लोगों ने ध्यान दिया है कि तुम लोगों में रुचियों, शौक और खूबियों के संबंध में कौन-सी भ्रामक या विरूपित समझ है? क्या ऐसा है कि ज्यादातर मुद्दों के मामले में तुम लोग सिर्फ उसी हद तक समझते हो जहाँ तक मैं संगति करता हूँ और उसके बाद तुम न तो चिंतन करते हो और न ही कही गई बातों की तुलना अपने जीवन की चीजों से करते हो, फिर भी तुम लोगों को लगता है कि तुम सब कुछ समझते हो और मुद्दों को बहुत सरल मानते हो? सबसे पहले इस प्रश्न के बारे में सोचो : क्या रुचियों और शौक और खूबियों में कोई अंतर है? (हाँ।) क्या अंतर है? अगर तुम यह देख सकते हो कि इनमें अंतर है तो वे किस तरह से भिन्न हैं? (कोई रुचि या शौक होने का मतलब सिर्फ यह है कि व्यक्ति को एक विशेष चीज सच में पसंद है, इसका आवश्यक रूप से यह मतलब नहीं है कि व्यक्ति में उस क्षेत्र में कोई खूबी है।) अंतर के मुख्य बिंदु लगभग बता दिए गए हैं—यह करीब-करीब ऐसा ही है। मानवता के परिप्रेक्ष्य से रुचियों और शौक का मतलब है व्यक्ति की किसी विशेष प्रकार की विशेषीकृत गतिविधि या एक तरह की चीज में रुचि होना, उसका उस पर ध्यान देने या उसे करने का इच्छुक होना। यानी उसकी व्यक्तिगत पसंद का अपेक्षाकृत झुकाव उन चीजों की तरफ होता है जिनमें उसकी रुचि होती है और जिनके बारे में वह जुनूनी होता है। इस संबंध में पेशेवर कौशलों के प्रति उसकी बस जरा-सी पसंद नहीं होती है बल्कि उसकी उनमें बहुत ज्यादा रुचि होती है, जो पसंद या प्यार के उस स्तर को पार कर जाती है जो उसका आम चीजों के प्रति हो सकता है। रुचियाँ और शौक यही होते हैं। लेकिन उसकी जिस विशेषीकृत गतिविधि या चीज में रुचि होती है और जिसके बारे में वह जुनूनी होता है उसके प्रकार के संबंध में, उसकी काबिलियत के लिहाज से क्या वह उसमें निपुण होता है, क्या वह उसे अच्छी तरह से कर सकता है और वह उसे किस स्तर तक कर सकता है—इनमें से कुछ भी निश्चित नहीं है। इसलिए, रुचियों और शौक का मतलब वे चीजें हैं जिनमें लोगों की रुचि होती है और जिन्हें वे पसंद करते हैं, जिन चीजों में वे बार-बार शामिल होने को तैयार रहते हैं और दैनिक जीवन में जिन पर ध्यान देने और जिन्हें करने के लिए समय और ऊर्जा लगाने को तैयार रहते हैं। जहाँ तक यह प्रश्न है कि वे इन चीजों को कितनी अच्छी तरह से कर सकते हैं, तो यह उनकी काबिलियत और इस बात पर निर्भर करता है कि वे इनमें निपुण हैं या नहीं। मान लो कि यह कोई ऐसी चीज है जिसमें उनकी विशेष रूप से रुचि है और जिसके बारे में वे विशेष रूप से जुनूनी हैं और साथ ही वे इसमें निपुण भी हैं—यानी इस चीज में रुचि होने और इसके बारे में जुनूनी होने के अतिरिक्त वे इसे बहुत अच्छी तरह से कर भी सकते हैं, महत्वपूर्ण नतीजे भी हासिल कर सकते हैं और बड़ी-बड़ी उपलब्धियाँ भी प्राप्त कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में, इस रुचि और शौक में उनकी निपुणता औसत व्यक्ति से बेहतर होती है और उनकी ग्रहण क्षमता, सीखने की रफ्तार और इस क्षेत्र के सिद्धांतों पर पकड़ बनाने की उनकी रफ्तार औसत व्यक्ति से ज्यादा होती है। जब ऐसी अभिव्यक्तियाँ मौजूद होती हैं तब इसे खूबी होना कहा जाता है। दूसरे लोगों को स्वतंत्र रूप से कोई चीज अच्छी तरह से कर सकने से पहले औपचारिक, लंबे समय के पेशेवर प्रशिक्षण, शिक्षा, ज्ञान प्राप्ति और अभ्यास से गुजरने की और संबंधित पेशेवरों से मार्गदर्शन, अगुआई, जाँच, मानकीकरण और सलाह वगैरह-वगैरह प्राप्त करने की जरूरत पड़ सकती है। हालाँकि खूबियों वाले लोगों में पेशेवर प्रशिक्षण या व्यवस्थित शिक्षा से गुजरे बिना आमतौर पर उन पेशेवर कौशलों के बारे में एक विशेष स्तर का बोध होता है जिनमें वे निपुण होते हैं। उनके पास इस क्षेत्र में कुछ व्यावहारिक समझ, प्रायोगिक अनुभव या व्यक्तिगत उपलब्धियाँ होती हैं। और पेशेवर प्रशिक्षण से इस क्षेत्र में उनकी खूबी और भी ऊँचे स्तर तक पहुँच सकती है। संक्षेप में, खूबी होने का मतलब है उन चीजों में जिनमें व्यक्ति की रुचि है और जिनके बारे में वह जुनूनी है, बहुत ही निपुण होना और औसत व्यक्ति से आगे निकलना। “निपुण” होने का क्या मतलब है? (किसी विशेष क्षेत्र में खूबी होना, इन चीजों के बारे में अपेक्षाकृत जानकार होना और उन्हें सहज दक्षता से सँभालना।) किसी चीज में निपुण होना सिर्फ उसके बारे में जानकार होना नहीं है; बल्कि इसका मतलब इस क्षेत्र में असाधारण योग्यता और अपेक्षाकृत मजबूत जन्मजात प्रतिभा होना है। यहाँ तक कि दूसरों से संकेतकों के बिना भी वे ऐसी चीजें समझ सकते हैं जिन्हें दूसरे नहीं समझ पाते हैं। और किसी प्रतिष्ठित शिक्षक से औपचारिक प्रशिक्षण या अनुदेशन को साथ मिलाकर वे इस क्षेत्र में और भी बेहतर कर सकते हैं। कोई खूबी होने की बात करते समय इसका मतलब होता है कि व्यक्ति किसी विशेष रुचि या शौक में विशेष रूप से मजबूत है और उस क्षेत्र में उसकी असाधारण नैसर्गिक क्षमता है। इस क्षेत्र में उसकी बोध क्षमता, उसकी ग्रहण क्षमता और उसकी सीखने की क्षमता ये सभी असाधारण रूप से मजबूत हैं और वह इस पर बहुत जल्दी पकड़ बना लेता है। वह इस क्षेत्र में औसत व्यक्ति की तुलना में काफी निपुण होता है। कोई खूबी होने का यही मतलब है।
अब जब तुम समझते हो कि खूबियाँ क्या होती हैं तब आओ, हम रुचियों और शौक के बारे में बात करें। रुचियों और शौक, और खूबियों में क्या अंतर है? क्या रुचियाँ और शौक खूबियों के समान हैं? (वे समान नहीं हैं।) रुचियाँ और शौक खूबियों के समान क्यों नहीं हैं? (क्योंकि किसी चीज में रुचि होने का आवश्यक रूप से मतलब उसे अच्छी तरह से करने में समर्थ होना नहीं है और न ही आवश्यक रूप से इसका मतलब उसमें निपुण होना है; इसके अलावा इसका आवश्यक रूप से यह मतलब नहीं है कि व्यक्ति उस चीज को बहुत जल्दी समझ सकता है।) रुचियाँ और शौक होने का मतलब है कि तुम्हें चीजों की एक खास श्रेणी पसंद है, लेकिन वह तुम्हारी खूबी है या नहीं, यह बात तुम्हारी बोध क्षमता, तुम्हारी सीखने की क्षमता और तुम्हारी ग्रहण क्षमता पर निर्भर करती है क्योंकि ये इस क्षेत्र से संबंधित हैं, और साथ ही यह बात तुम्हारी स्वाभाविक अभिक्षमता और तुम इसमें स्वाभाविक रूप से निपुण हो या नहीं, इस पर निर्भर करती है। अगर तुम इसमें निपुण हो तो यह तुम्हारी खूबी है। अगर तुम इसमें निपुण नहीं हो और यह सिर्फ तुम्हारी व्यक्तिगत पसंद है—एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें तुम्हारी रुचि है—लेकिन तुम्हारी काबिलियत कमजोर है और तुम्हारी स्वाभाविक अभिक्षमता में कमी है, मतलब कि इस रुचि और शौक के संबंध में तुममें बोध क्षमता कम है, तुम इसमें बिल्कुल भी निपुण नहीं हो, इसे अनाड़ीपन से करते हो, तुममें कार्य-कुशलता की कमी है और तुम इस क्षेत्र में कोई नतीजा हासिल नहीं करते हो तो यह क्षेत्र तुम्हारी खूबी नहीं है—यह तुम्हारे लिए सिर्फ रुचि और शौक के स्तर पर बना रहता है। यह सिर्फ तुम्हारी रुचि और शौक क्यों है, तुम्हारी खूबी क्यों नहीं है? क्योंकि तुम इसमें निपुण नहीं हो। उदाहरण के लिए, कुछ लोग कहते हैं, “मुझे सच में गायन पसंद है।” उन्हें यह कितना पसंद है? सुबह जिस पल उनकी आँख खुलती है तब से वे पॉप गाने चलाते रहते हैं; वे हर तरह के गाने सुनते हैं जिनमें विदेशी गाने, पश्चिमी और चीनी ऑपेरा भी शामिल हैं—वे ऐसी कोई भी चीज सुनना पसंद करते हैं जिसे संगीत माना जाता है। वे गाना भी चाहते हैं, लेकिन एक बड़ी समस्या है—वे स्वाभाविक रूप से सुर-बधिर होते हैं या इस क्षेत्र में बस उनमें कोई खूबी होती ही नहीं है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो कई वर्षों तक गायन का अध्ययन करने के बाद भी सही तकनीकें नहीं ढूँढ़ सकते हैं। वे नहीं जानते हैं कि सबसे मधुर तरीके से कैसे गाना है, अपने गायन को कैसे दिल को छू लेने वाला बनाना है या अपने गायन से अच्छे नतीजे कैसे हासिल करने हैं। वैसे तो बचपन से ही वे गायन पसंद करते हैं और यह उनकी रुचियों और शौक में से एक होता है, लेकिन अपनी जन्मजात स्थितियों की सीमाओं के कारण उनकी रुचि और शौक एक रुचि और शौक के स्तर तक ही बने रह सकते हैं—यह कोई खूबी नहीं है। उदाहरण के लिए, जब कोई गायन में निपुण व्यक्ति भजन सीखता है तब वह केवल तीन बार गाकर उसकी मुख्य धुन गा सकता है। और चार-पाँच बार गाने के बाद वह लगभग पूरा गाना गा सकता है। हालाँकि जो लोग गाने सुनने का आनंद लेते हैं लेकिन गायन में निपुण नहीं होते हैं, वे तीन बार सुनने के बाद भी हो सकता है कि सामान्य धुन को याद रखने में असमर्थ हों। यहाँ तक कि पाँच बार सुनने के बाद भी हो सकता है कि वे अब भी उसे गाने में असमर्थ हों और उन्हें लगातार बोल या संगीत की स्वर-लिपि देखने की जरूरत पड़े। जब वास्तव में गायन की बात आती है तब वे गाने का भाव नहीं समझ सकते या आवाज की सही स्थिति नहीं पा सकते। वे बोल याद रखने में भी विफल हो जाते हैं और कभी-कभी वे धुन से भी हट जाते हैं। इसके अलावा, अपेक्षाकृत भावपूर्ण गाने गाते समय वे भावनाओं की अभिव्यक्ति को कभी भी उचित रूप से नियंत्रित नहीं कर सकते हैं। दूसरे लोग कहते हैं कि उनका गायन सुनने में अप्रिय लगता है और आनंददायक नहीं होता है, लेकिन वे हतोत्साहित नहीं होते हैं या हार नहीं मानते हैं—वे फिर भी सीखने और गाने में लगे रहते हैं। यकीनन गायन एक व्यक्तिगत स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकार है; कोई उन पर प्रतिबंध नहीं लगा रहा है। लेकिन आज हम जिस बारे में संगति कर रहे हैं, वह रुचियों और शौक, और खूबियों में अंतर है। इन अभिव्यक्तियों को देखते हुए, उनकी रुचि और शौक कोई ऐसी चीज नहीं है जिसमें वे निपुण हों। तो हमें इस मामले के बारे में स्पष्ट रूप से संगति क्यों करनी होगी? लोगों को यह समझने में मदद करने के लिए कि उनकी रुचियाँ और शौक उनकी खूबियों के समान नहीं हैं। अगर तुम्हारी जन्मजात स्थितियों के सभी पहलुओं के आधार पर तुम किसी विशेष क्षेत्र में निपुण नहीं हो तो भले ही यह तुम्हारी रुचि और शौक हो, तुम्हारी जन्मजात स्थितियों की सीमाएँ यह तय करती हैं कि तुम्हारी रुचि और शौक तुम्हारी खूबी नहीं है। वैसे तो यह तुम्हें सच में पसंद है, इस हद तक कि तुम इससे अपने जीवन जितना ही प्रेम करते हो, लेकिन बदकिस्मती से यह बस वह है ही नहीं जिसमें तुम निपुण हो। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों को नृत्य करना सच में पसंद होता है। जब भी उन्हें संगीत सुनाई देता है तब उनका शरीर ताल और धुन के साथ हिलने-डुलने लगता है और हिलते-डुलते हुए वे बहुत ही खुशी महसूस करते हैं। हालाँकि उनके प्राकृतिक नैन-नक्श अच्छे नहीं हैं, उनका कद ज्यादा लंबा नहीं है, उनके हाथ-पैर विशेष रूप से लंबे नहीं हैं और उनकी शारीरिक बनावट भी विशेष रूप से आकर्षक नहीं है। कुल मिलाकर उनका नृत्य देखने में बहुत मोहक नहीं होता है। लेकिन उन्हें बस नृत्य करना पसंद है और कभी-कभी वे सार्वजनिक स्थानों पर या सड़क के किनारे पूरी तरह से आत्म-संतुष्टि से नृत्य करते हैं। राह चलते लोगों को यह बेतुका लगता है, फिर भी वे ऐसे नाचते हैं मानो आसपास कोई है ही नहीं, वे इस बात से पूरी तरह से बेपरवाह होते हैं कि दूसरे लोग उन्हें कैसे देखते हैं, मानो उन्हें बिल्कुल भी कोई जागरूकता न हो। वे इस हद तक इसके प्रति जुनूनी होते हैं। वैसे तो उन्हें लगता है कि वे बहुत अच्छी तरह से नृत्य करते हैं, लेकिन वास्तव में वे इसमें निपुण नहीं होते हैं। वे नृत्य के सार पर पकड़ नहीं बना सकते हैं और न ही उन्हें पता होता है कि नृत्य की कौन-सी गतियाँ उचित हैं, कौन-सी गतियाँ सुंदर हैं और कौन-सी गतियाँ भिन्न-भिन्न प्रकार की मानव भावनाओं को व्यक्त करने में बेहतर ढंग से समर्थ हैं। यानी वे नृत्य से संबंधित बहुत-से पहलुओं को सच में नहीं समझते हैं। यहाँ तक कि पेशेवर शिक्षक के मार्गदर्शन लेने और पेशेवर नृत्यशाला से प्रशिक्षण लेने पर भी वे अपनी जन्मजात काबिलियत के लिहाज से इसमें निपुण नहीं होते हैं और इसके सार पर पकड़ नहीं बना सकते हैं। इसलिए उनकी जन्मजात स्थितियों के सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए, नृत्य करना उन्हें पसंद तो है लेकिन वह ऐसा कुछ नहीं है जिसमें वे निपुण हैं। भले ही उन्हें यह सच में अच्छा लगता हो और वे इसके नशे में चूर हो जाते हों, कैमरे या दर्पण के सामने नृत्य करते समय अपनी खुद की गतियों और अंदाज की तारीफ करते हों, लेकिन अगर हम वास्तविक परिस्थिति को देखें तो वे नृत्य में निपुण नहीं होते हैं। दूसरे शब्दों में, नृत्य उनकी सिर्फ रुचि और शौक है, उनकी खूबी नहीं है।
कुछ लोगों को साहित्य सच में अच्छा लगता है। उन्हें लेख लिखना, कविता पाठ करना और लिखना अच्छा लगता है, उन्हें साहित्यिक मंच अच्छे लगते हैं और उन्हें उपन्यास और विभिन्न साहित्यिक कृतियाँ पढ़ना भी अच्छा लगता है, चाहे वे विदेशी हों या देशी, आधुनिक हों या शास्त्रीय—उन्हें ये सभी कृतियाँ अच्छी लगती हैं। उन्हें वे विभिन्न शब्दावलियाँ और भाषा-शैलियाँ अच्छी लगती हैं जिनका लेखक अपनी साहित्यिक कृतियों में उपयोग करते हैं और उन्हें वे विभिन्न विचार भी अच्छे लगते हैं जिन्हें लेखक अपनी कृतियों में व्यक्त करते हैं। क्या यह उनकी रुचि और शौक है? (हाँ।) यह बिल्कुल स्पष्ट है कि यह उनकी रुचि और शौक है। व्यक्ति की जिस चीज में रुचि होती है, उसको अपने दिल और दिमाग में जो अच्छा लगता है, वह जन्मजात होता है—यह कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे वह जीवन में बाद में अर्जित करता है और यह उसके माता-पिता या परिवार द्वारा विकसित की गई चीज तो और भी कम है। कुछ लोग साहित्य पसंद करते हैं और उन्होंने कई साहित्यिक कृतियाँ पढ़ी होती हैं। कुछ लोगों ने विश्वविद्यालय में साहित्य का व्यवस्थित रूप से अध्ययन किया होता है। कुछ लोगों ने तो साहित्य के पेशेवर प्रोफेसर के रूप में भी कार्य किया होता है या वे साहित्य से संबंधित कार्यों और पेशों में संलग्न होते हैं, यहाँ तक कि वे लंबे समय से इन पेशों में होते हैं; उन्होंने अपना ज्यादातर जीवन अपनी रुचि और शौक से संबंधित मामलों को सँभालने में बिताया होता है; व्यावहारिक रूप से उनके जीवन के हर दिन में वह साहित्य शामिल होता है जिसमें उनकी रुचि होती है और जिसके बारे में वे जुनूनी होते हैं। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि उनकी रुचि और शौक सही मायने में उनकी खूबी है? आवश्यक रूप से नहीं—तुम्हें यह देखना होगा कि क्या उनके पास साहित्य का ऐसा ज्ञान या ऐसे विचार और दृष्टिकोण हैं जो आम लोगों से बेहतर या विशिष्ट हैं। अगर साहित्य में उन्होंने जिस पर पकड़ बनाई है और जो बूझा है, वह सिर्फ वही है जो उन्होंने किताबों से सीखा है या जिसमें सिर्फ पारंपरिक सामान्य ज्ञान शामिल है जिसे कोई भी सीख सकता है और जिस पर कोई भी पकड़ बना सकता है तो इसे खूबी नहीं माना जा सकता है। उदाहरण के लिए, अगर तुम उन्हें कोई लेख लिखने के लिए कहते हो तो उसमें कोई व्याकरण-संबंधी त्रुटि नहीं होती है, उसमें विराम चिह्नों का सही ढंग से उपयोग किया गया होता है, अनुच्छेद अच्छी तरह से संरचित होते हैं और लेख की कुल मिलाकर संरचना काफी अच्छी होती है। यहाँ तक कि पूरे लेख में अलंकृत भाषा का भी बहुत उपयोग किया गया होता है। लेकिन इसमें एक समस्या है—जब किसी विशेष बात, किसी विशेष दृष्टिकोण या किसी विशेष कथानक को व्यक्त करने की बात आती है तब उनके पास अभिव्यक्ति की कोई अनूठी विधि नहीं होती है और न ही उनके पास अभिव्यक्ति की विशेष रूप से कलात्मक या चतुर विधियाँ होती हैं। ये गुण उनकी सभी साहित्यिक कृतियों में गैर-मौजूद होते हैं। यानी उनके लेख काफी अच्छी तरह से संरचित और बेहद पेशेवर दिखाई देते हैं जिनमें ध्यान से चुने हुए शब्द होते हैं, लेकिन उनमें विचारों और दृष्टिकोणों, परिघटनाओं या कथानकों को व्यक्त करने की वह अनूठी विधि नहीं होती है जो एक कुशल साहित्य वृत्तिक में होनी चाहिए। उनके ज्यादातर लेख अपेक्षाकृत औसत दर्जे के होते हैं। विचारों की अभिव्यक्ति का उनका ढाँचा और तरीका विशेष रूप से कठोर, कड़ा और हठधर्मी होता है; वे न तो नवोन्मेषी होते हैं और न ही अनूठे होते हैं, उनमें बुद्धिमत्ता और चतुराई की कमी होती है और उन्हें निश्चित रूप से सुरुचिपूर्ण नहीं माना जा सकता है। यह परिघटना क्या दर्शाती है? (वे लेखन में निपुण नहीं हैं और न ही उनमें इसके लिए कोई अभिक्षमता है।) वे लेखन में निपुण नहीं हैं और वे घटनाओं की पृष्ठभूमि या ऐसी कहानियों के मूलरूप के आधार पर लचीले ढंग से कहानियों की रचना नहीं कर सकते हैं। अंत में जब लोग उनके लेख और साहित्यिक कृतियाँ पढ़ते हैं, तब वे सब एक ही फॉर्मूले पर बनी हुई नीरस और एकरस लगती हैं। हम ऐसा क्यों कहते हैं कि वे नीरस और एकरस लगती हैं? कुल मिलाकर उनके लेख काफी अच्छी तरह से संरचित, मानकीकृत और पेशेवर लगते हैं; जब तकनीकी पहलुओं की बात आती है तब औसत व्यक्ति को आलोचना करने के लिए कम चीजें मिलेंगी—यहाँ तक कि संरचना भी लगभग हमेशा एक जैसी ही होती है। वैसे तो वे साहित्यिक कृतियों के विभिन्न रूपों को सीख सकते हैं जिनमें विदेशी पद्य, गद्य और कथा लेखन शामिल हैं, लेकिन वे उन्हें अपनी साहित्यिक रचना के अनुसार ढालने या उपयोग करने में कभी सक्षम नहीं होते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके साहित्यिक कौशल और प्रवीणता का स्तर हमेशा रुचियों और शौक के स्तर पर ही बना रहेगा, वह कभी भी खूबी के स्तर तक नहीं पहुँचेगा। यह संभव है कि उन्हें साहित्य का बहुत ज्ञान हो, लेकिन उनके पास सच में कोई साहित्यिक प्रवीणता नहीं होती है। दूसरे शब्दों में, साहित्य में उनका कोई नवप्रवर्तन नहीं होता है, वे अपनी खुद की कोई प्रतिनिधिक रचना नहीं रच सकते हैं और उनमें अनूठे विचारों और दृष्टिकोणों, और अभिव्यक्ति के अनूठे तरीके की कमी होती है। इससे यह सिद्ध होता है कि साहित्य उनकी खूबी नहीं है। उनके पास साहित्य के बारे में शिक्षा और सामान्य ज्ञान सिर्फ इसलिए होता है क्योंकि इस क्षेत्र में उनकी रुचि और शौक है, लेकिन साहित्य में उनकी कोई खूबी नहीं होती है। देखो, बहुत-से लोग किताबें पढ़ते हैं जिनमें विभिन्न साहित्यिक कृतियाँ शामिल होती हैं; बहुत-से लोग साहित्य प्रेमी या साहित्य रचनाकार होने का दावा करते हैं, लेकिन साहित्य रचना में लगे लोगों में से कितने लोगों के पास सच में अपनी खुद की रचनाएँ हैं? कितने लोगों ने ऐसी साहित्यिक कृतियाँ लिखी हैं जो समय की कसौटी पर खरी उतर सकती हैं और उत्कृष्ट साहित्य बन सकती हैं? बहुत कम, है ना? इनमें से ज्यादातर लोगों में साहित्य के प्रति थोड़ी-सी जन्मजात रुचि और जुनून होता है और बाद में वे पेशेवर स्कूलों में सीखते, प्रशिक्षण लेते और अभ्यास करते हैं और संयोग से साहित्य से संबंधित कार्य करने लगते हैं। वैसे तो वे साहित्य से संबंधित कार्य में लगे रहते हैं जिससे ऐसा संकेत मिलता प्रतीत हो सकता है कि यह रुचि और शौक जीवन भर उनके साथ रहने में समर्थ है, लेकिन इस क्षेत्र में कार्य करते हुए वे कितनी पूर्ण कृतियाँ रचते हैं, वे कितने योगदान देते हैं और उनकी कितनी मौलिक रचनाएँ हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि साहित्य में उनमें कोई खूबी है या नहीं। बहुत-से लोग ऐसे पेशे में लग जाते हैं जो उन्हें अच्छा लगता है और जिसके बारे में वे जुनूनी होते हैं और उससे वे आजीविका या कुछ लाभ हासिल करते हैं, लेकिन उन्हें इस पेशे में अच्छे नतीजे नहीं मिलते हैं। यह इस बात को साबित करने के लिए काफी है कि उन्हें जो पेशा अच्छा लगता है और जिसके बारे में वे जुनूनी हैं, वह उनकी खूबी नहीं है। दूसरी तरफ, कुछ लोग अपनी रुचियों और शौक से संबंधित पेशे में नहीं होने के बावजूद वास्तविक उपलब्धियाँ हासिल करने में समर्थ होते हैं क्योंकि यह उनकी खूबी है। उदाहरण के लिए, कुछ आविष्कारक होते हैं, कुछ ऐसे लोग होते हैं जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान दिए हैं, कुछ ऐसे जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी अनूठी शैलियों की शुरुआत की है और कुछ विभिन्न क्षेत्रों की प्रमुख हस्तियाँ होती हैं, वगैरह-वगैरह। इसलिए इन स्थितियों को देखते हुए, रुचियाँ और शौक होने का आवश्यक रूप से मतलब उन क्षेत्रों में खूबी होना नहीं है। हालाँकि कुछ लोग रुचियों, शौकों और खूबियों के बीच के संबंध का भेद नहीं पहचान सकते। उन्हें लगता है कि उनकी रुचियाँ और शौक ही उनकी खूबियाँ हैं, लेकिन जिस क्षेत्र में उनकी रुचि और जुनून होता है, उसमें कई वर्षों तक कार्य करते रहने के बाद भी उन्हें वास्तव में कोई नतीजा नहीं मिलता। इन चीजों पर स्पष्टता हासिल करने के बाद लोगों को अपनी रुचियों और शौक, और अपनी खूबियों से कैसे पेश आना चाहिए? यह बहुत आसान है—उन्हें उनसे सही ढंग से पेश आना चाहिए। अगर परमेश्वर का घर यह चाहता है कि तुम किसी ऐसे विशेष क्षेत्र में कोई कर्तव्य करो जिसमें तुम्हारी रुचियों और शौक से संबंधित पेशेवर ज्ञान, कौशल या प्रतिभाएँ शामिल हैं तो तुम्हें उससे कर्तव्य करने के सिद्धांतों के अनुसार पेश आना चाहिए—तुम्हें न तो उसे अस्वीकार करना चाहिए, न बड़े-बड़े विचार बोलने चाहिए और न ही उतावला होना चाहिए। अगर यह कोई ऐसी चीज है जिसमें तुम निपुण नहीं हो, यह तुम्हारी क्षमता से परे कोई चीज है जिसे तुम नहीं कर सकते हो तो नकारात्मक मत बनो और न ही परमेश्वर के बारे में शिकायत करो; तुम्हें इससे सही ढंग से पेश आने में समर्थ होना चाहिए। इससे सही ढंग से पेश आने का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि अगर तुम्हें लगता है कि इस क्षेत्र में तुम्हारी रुचि और इसके लिए तुम्हारा जुनून अनूठे हैं, लेकिन इससे संबंधित कार्य को करते समय तुम कभी भी परमेश्वर के घर की अपेक्षाएँ पूरी नहीं कर पाते हो और न ही तुम कभी परमेश्वर के घर द्वारा अपेक्षित सिद्धांतों को प्राप्त कर पाते हो तो तुम जो कुछ भी हासिल कर सकते हो तुम्हें वह हासिल करना चाहिए। परमेश्वर कभी भी मछलियों को जमीन पर रहने या सूअरों को उड़ने को मजबूर नहीं करता है। परमेश्वर जानता है कि तुम कितना हासिल कर सकते हो और तुम कितना भार उठा सकते हो। ज्यादा अनुभव होने पर तुम्हें भी यह पता चल जाएगा। वास्तविक हालातों और अपनी जन्मजात स्थितियों के आधार पर तुम जितना हासिल करने में समर्थ हो उतना हासिल करो—अपने लिए चीजों को मुश्किल मत बनाओ। अगर तुम सक्षम हो तो खुद को रोककर मत रखो; अगर तुम सक्षम नहीं हो तो नकारात्मक मत बनो या खुद को अपनी क्षमता से परे जाने के लिए मजबूर मत करो—इससे सही ढंग से पेश आओ।
तुम्हें परमेश्वर में विश्वास रखते हुए इतने सारे वर्ष हो गए हैं और तुममें से ज्यादातर लोगों को अपना कर्तव्य करते हुए तीन वर्षों से भी ज्यादा समय हो गया है—यह सिर्फ एक-दो वर्षों की बात नहीं है कि तुम परमेश्वर के घर में एक विशेष कर्तव्य कर रहे हो। तो तुम जो कर्तव्य करते हो या जो विशेष पेशेवर कार्य करते हो, उसके संबंध में, क्या तुम इस बारे में अपने दिल में स्पष्ट हो कि तुम कितना प्राप्त कर सकते हो, किस स्तर तक पहुँच सकते हो और तुम अपनी क्षमताओं का कितना और किस हद तक उपयोग कर सकते हो? (हाँ।) तुम इन सब के बारे में लगभग स्पष्ट हो। कुछ लोग अभी तक किसी विशेष कर्तव्य में प्रवीणता तक नहीं पहुँचे हैं क्योंकि उन्होंने बहुत कम अभ्यास किया है। हालाँकि दूसरे लोग बहुत सारे वर्षों से यह कार्य कर रहे हैं और उन्होंने बहुत सारा अभ्यास किया है, लेकिन फिर भी वे परमेश्वर के घर द्वारा अपेक्षित सिद्धांतों तक नहीं पहुँच सकते हैं। वे इस क्षेत्र में बहुत निपुण नहीं हैं। वैसे तो उन्हें यह कर्तव्य करना सच में अच्छा लगता है और वे इस कर्तव्य को करने के बारे में जुनूनी हैं और इसे करके सम्मानित और खुश महसूस करते हैं, लेकिन वे इसमें बस निपुण नहीं हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर के घर की अपेक्षाएँ क्या हैं, वे उन्हें किसी भी तरह से पूरी नहीं कर सकते। ऐसा नहीं है कि वे विद्रोही और उद्दंड हैं और न ही ऐसा है कि वे अपने हिस्से की जिम्मेदारी पूरी नहीं करते हैं; बल्कि ऐसा है कि उनकी जन्मजात स्थितियाँ इसे हासिल नहीं कर सकती हैं और उनकी जन्मजात स्थितियों की सीमाएँ हैं। तो फिर क्या किया जाना चाहिए? बस चीजों को अपने ढर्रे पर चलने दो—नकारात्मक मत बनो, कमजोर मत बनो और न ही शिकायत करो या अपने दिल में यह महसूस करो कि यह अन्यायपूर्ण है। कुछ लोग कहते हैं, “मुझे नृत्य करना अच्छा लगता है, लेकिन मैं नृत्य करने में पैदाइशी अनाड़ी हूँ और मैं आकर्षक नहीं हूँ। मैं नृत्य कर्तव्य करना चाहता हूँ लेकिन नहीं कर सकता। तो फिर मुझे क्या करना चाहिए? मैं सच में नृत्य करना चाहता हूँ।” नृत्य करने की तुम्हारी इच्छा तुम्हारी व्यक्तिगत इच्छा और तुम्हारी पसंद है, लेकिन क्या परमेश्वर को तुम्हारी पसंदें पूरी करनी ही पड़ेंगी? नहीं करनी पड़ेंगी। परमेश्वर के घर के सिद्धांत हैं जिनकी वह अपेक्षा करता है और उसकी शर्तें हैं। कौन-सा व्यक्ति कौन-सा कार्य करेगा, इसका चयन सिद्धांतों पर आधारित होता है। तुम अपनी व्यक्तिगत इच्छा, व्यक्तिगत पसंद या व्यक्तिगत मिजाज के आधार पर जबरन यह माँग नहीं कर सकते कि परमेश्वर का घर तुम्हें संतुष्ट करे—यह अनुचित है। अगर तुम इस क्षेत्र में कर्तव्य करने के लिए उपयुक्त नहीं हो तो अपने दिल में चुपचाप उन लोगों के लिए आशीषों की कामना करो जो इस क्षेत्र में कर्तव्य कर सकते हैं। तुम जो भी कर सकते हो, बस वह करो या तुम पर्दे के पीछे के गुमनाम कार्यकर्ता बन सकते हो—मार्गदर्शन और जाँच में मदद कर सकते हो, नृत्य वीडियो के पूर्वाभ्यास या प्रोडक्शन के बाद के संपादन में मदद कर सकते हो, विभिन्न सामग्रियाँ खोजने में मदद कर सकते हो या सत्य की तलाश करने में मदद कर सकते हो। ऐसे बहुत सारे कार्य हैं जो विभिन्न क्षेत्रों में किए जा सकते हैं और तुम्हारी रुचियों और शौक से संबंधित कार्य का दायरा व्यापक है। तुम्हें आवश्यक रूप से पर्दे पर होने वाला व्यक्ति होने की जरूरत नहीं है—तुम पर्दे के पीछे का कार्य अंशकालिक रूप से भी स्वीकार सकते हो। यह भी अपना कर्तव्य करना है। इस तरीके से तुम अपनी व्यक्तिगत कामनाएँ भी पूरी करते हो और अपना कर्तव्य करने के जरिए परमेश्वर को संतुष्ट करने के सिद्धांत और मानक पर भी खरे उतरते हो—यह कितना बढ़िया है! क्या यह एक तीर से दो शिकार करना नहीं है? (हाँ।) चूँकि परमेश्वर ने तुम्हारी जन्मजात स्थितियों के हिस्से के रूप में तुम्हें इस क्षेत्र में खूबियाँ नहीं दी हैं, इसलिए तुम्हारे पास कोई विकल्प नहीं है। तुम सिर्फ इस कारण से शिकायत नहीं कर सकते, बड़बड़ा नहीं सकते या नाराजगी नहीं रख सकते कि तुममें इस क्षेत्र में जन्मजात रूप से कमी है और तुम इस क्षेत्र में प्रतिभा चयन के लिए परमेश्वर के घर के मानक को पूरा नहीं कर सकते, और फिर तुम इस क्षेत्र में कर्तव्य करने के लिए अनिच्छुक हो जाते हो, यहाँ तक कि जब परमेश्वर का घर तुमसे इसे करने की अपेक्षा करता है, तब भी तुम इसे करने से इनकार करते हो—ऐसा करना अनुचित है। यह कर्तव्य करने का सही रवैया नहीं है। तुम जो भी कर सकते हो, बस उसे करो। तुम इसे करने से इनकार नहीं कर सकते, यहाँ तक कि परमेश्वर का घर तुमसे इसे करने की अपेक्षा करता है, तो फिर तुम सिर्फ इसलिए इसे करने से इनकार नहीं कर सकते क्योंकि तुम इसके लिए उपयुक्त नहीं हो या इसमें निपुण नहीं हो। ऐसा करके तुम अपना कर्तव्य नहीं कर रहे हो—तुम अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं को पूरा कर रहे हो और अपना खुद का उद्यम चला रहे हो। तुम अपना कर्तव्य परमेश्वर के प्रति समर्पण के रवैये से नहीं कर रहे हो और न ही परमेश्वर के प्रति सच्चाई और वफादारी के रवैये से कर रहे हो। यह अनुचित है। यह ऐसी चीज है जो लोगों को समझनी चाहिए। एक चीज तो यह है कि रुचियों, शौक और खूबियों को सही ढंग से समझो; इसके अलावा रुचियों, शौक और खूबियों से सही ढंग से पेश आओ।
कुछ लोगों को लेख लिखना और साहित्य से संबंधित कार्य करना अच्छा लगता है। वे हमेशा लेखों को सुधारना और प्रूफरीडिंग करना चाहते हैं, हर रोज लेखों के साथ कार्य करना चाहते हैं। हालाँकि कई कारणों से—व्यक्तिपरक कारणों से भी और वस्तुनिष्ठ कारणों से भी—वे इस कार्य के लिए उपयुक्त नहीं होते हैं। एक चीज तो यह है कि साहित्य के क्षेत्र में उनके पास आधारभूत ज्ञान की कमी होती है; दूसरी चीज यह है कि उनकी काबिलियत अपेक्षाकृत खराब होती है और उनमें बोध क्षमता नहीं होती है। इसलिए, भले ही वे साहित्य के बारे में जुनूनी हों और कई वर्षों तक अभ्यास करते रहें, फिर भी वे लेखन क्षमता प्राप्त करने के मानक तक नहीं पहुँच सकते हैं। हालाँकि परमेश्वर का घर यह अपेक्षा करता है कि पाठ आधारित कार्य में जुटने के लिए लोगों में कम से कम मूलभूत काबिलियत हो। अगर उनकी काबिलियत पाठ आधारित कार्य करने के लिए उपयुक्त नहीं है और यहाँ तक कि उनके द्वारा लेखों को सुधारना और प्रूफरीडिंग करना भी मानक के अनुरूप नहीं हैं तो वे सिर्फ कोई दूसरा कर्तव्य ही चुन सकते हैं। हो सकता है कि वे कुछ सामान्य मामलों वाले कार्य करने या कुछ सामग्री इकट्ठा करने के लिए बस किसी तरह उपयुक्त हों। संक्षेप में, अपने दिल में उन्हें जो पाठ आधारित कार्य अच्छा लगता है, वह ऐसा कुछ है जिसे वे नहीं कर सकते हैं—भले ही उन्हें पाठ आधारित कार्य करने से बर्खास्त न किया जाए, वे सिर्फ कुर्सियाँ ही तोड़ेंगे और उन्हें कोई वास्तविक नतीजा नहीं मिलेगा। लोगों को ऐसा मामला शुद्ध तरीके से कैसे समझना चाहिए? (उन्हें परमेश्वर के घर की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना और विवेकी होना सीखना चाहिए।) यह सामान्य दिशा है—लोगों को विशिष्ट रूप से कैसे अभ्यास करना चाहिए? अगर यह कोई ऐसा व्यक्ति है जिसमें विरूपणों की संभावना है तो वह कहेगा, “हर कोई कहता है कि रुचियाँ और शौक परमेश्वर द्वारा दिए जाते हैं, वे जन्मजात स्थितियाँ हैं। चूँकि परमेश्वर ने मुझे यह रुचि और शौक दिया है, तो निश्चित रूप से परमेश्वर ने मुझे इससे संबंधित कार्य में जुटने के लिए नियत किया है। चूँकि यह परमेश्वर द्वारा नियत किया गया है, तो परमेश्वर के घर में इस रुचि और शौक से संबंधित कार्य मुझे दिया जाना चाहिए—इसमें मुझे हिस्सा मिलना चाहिए। अगर मुझे यह कार्य करने के लिए नहीं कहा जाता है तो यह लोगों के साथ समस्या है—इसका मतलब है कि लोग मुझे नीची नजर से देखते हैं, इसका मतलब है कि अगुआओं और कार्यकर्ताओं को नहीं पता कि लोगों का आकलन कैसे करना है। इधर मैं हूँ, एक गुणी व्यक्ति, लेकिन यहाँ कोई भेद पहचानने वाला प्रतिभा का पारखी नहीं है, जो मेरी प्रतिभा पहचान सके! मुझे साहित्य बहुत ही पसंद है और मैं इसमें सच में निपुण हूँ—लेखों को सुधारना मेरे लिए बहुत ही ज्यादा आसान है। मुझे सुसमाचार का प्रचार करने या शारीरिक श्रम करने के लिए भेजना—क्या यह तोप से मक्खी मारना नहीं है? क्या यह प्रतिभाशाली व्यक्ति को बरबाद करना नहीं है? क्या यह सोने को मिट्टी में दबा देने जैसा नहीं है? मैं कुछ नहीं कर सकता—नीची छत के तले सिर झुकाने के सिवाय कोई विकल्प नहीं होता! लेकिन एक कहावत है : सच्चा सोना अंततः चमकता ही है। बस प्रतीक्षा करनी होगी—शायद परमेश्वर मेरा शोधन कर रहा है, मेरी परीक्षा ले रहा है। एक दिन मैं निश्चित रूप से उस कार्य में जुट जाऊँगा जो परमेश्वर ने मेरे लिए नियत किया है, वह कार्य जो मेरी रुचि से संबंधित है। अच्छी चीजें प्रतीक्षा करने लायक होती हैं। जब तुम सब लोग हटा दिए जाओगे तब वही मेरे चमकने का समय होगा—तभी वह समय होगा जब मुझे अपने कौशलों का उपयोग करने का मौका मिलेगा! जैसे कि कहावत है, ‘सज्जन के बदला लेने में देर क्या और सबेर क्या’ और ‘जहाँ जीवन है वहाँ आशा है।’” तुम इन दृष्टिकोणों के बारे में क्या सोचते हो? ये गलत हैं, है ना? ऐसे लोग निश्चित रूप से ख्याली पुलाव पका रहे हैं और यहाँ तक कि दीर्घकालिक योजनाएँ भी बना रहे हैं, लेकिन उनमें वास्तव में वास्तविक क्षमता है या नहीं, यह अज्ञात है। कुछ लोग तो यह तक महसूस करते हैं कि उनके साथ अन्याय हुआ है और कहते हैं, “मैं स्वाभाविक रूप से गुणी साहित्यिक प्रतिभा हूँ, लेकिन फिर भी मुझे शारीरिक श्रम करने के लिए भेज दिया गया है जहाँ मैं दिन भर कीचड़ में सना रहता हूँ। और मैं इस बारे में किससे गुहार लगा सकता हूँ? मैं कुछ नहीं कर सकता—परमेश्वर ने इसी तरीके से इसकी योजना बनाई है। मेरे पास क्या विकल्प है?” दरअसल प्रूफरीडिंग टीम पहले ही उनकी परीक्षा ले चुकी है और उनकी लेखन क्षमता अपर्याप्त है। उनके पास कोई साहित्यिक आधार नहीं है, यहाँ तक कि वे सही विराम चिह्नों का भी उपयोग नहीं करते हैं। जहाँ कहीं भी वाक्य को तोड़ना चाहिए या विराम देना चाहिए, वहाँ वे अल्पविराम का उपयोग करते हैं। फिर भी वे खुद को साहित्यिक प्रतिभा के धनी मानते हैं, उनका विश्वास है कि शारीरिक श्रम करना प्रतिभा की बरबादी है। उनके दिल शिकायतों से भरे हुए हैं : “मैं साहित्य के प्रति प्रेम के साथ पैदा हुआ था। बचपन में मुझे कहानियों की किताबें पढ़ना पसंद था। जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ, मैं प्रसिद्ध लोगों की कृतियाँ पढ़ना पसंद करने लगा। मैंने देशी लेखकों की भी और विदेशी लेखकों की भी कई उत्कृष्ट साहित्यिक कृतियाँ पढ़ी हैं; मैंने नाटक, गद्य, पद्य सहित सभी विधाओं से बहुत सारी कृतियाँ पढ़ी हैं। पाठ आधारित कार्य करना मेरे लिए बहुत आसान है; लेख लिखना मेरे लिए बच्चों का खेल है। लेकिन अब मुझे देखो—मेरी हालत यह है कि मैं गंदा, थका देने वाला श्रम करने को मजबूर हूँ। साहित्य के प्रति मेरा प्रेम जो मेरे आधे जीवन मेरे साथ रहा है, उसको परमेश्वर के घर में नकार दिया गया है। जीवन भर मैंने जो सारा ज्ञान इकट्ठा किया है, उसका परमेश्वर के घर में कोई उपयोग नहीं हुआ है—मेरे साहित्यिक करियर का अंत हो गया है! मैं सोचा करता था कि परमेश्वर का घर वह जगह है जहाँ सत्य के पास शक्ति होती है, जहाँ निष्पक्षता और धार्मिकता के पास शक्ति होती है। मेरे जैसे व्यक्ति को—एक महान प्रतिभा को, एक साहित्य प्रेमी को—दुनिया में नजरअंदाज कर दिया गया और नीची नजर से देखा गया, मुझे अपने कौशल उपयोग में लाने का कोई मौका नहीं मिला। मैंने सोचा था कि परमेश्वर के घर में मैं अपने बचे हुए प्रयास लगा पाऊँगा। जोश से भरपूर मैंने प्रूफरीडिंग टीम के लिए आवेदन किया और सिर्फ यही पाया कि मेरा चयन नहीं हुआ है। जरा मुझे देखो—मैं जो यहाँ खड़ा हूँ, कौन कह सकता है कि मैं एक साहित्य प्रेमी हूँ, एक साहित्यिक प्रतिभा हूँ? इस गंदे, थका देने वाले श्रम के कारण मेरी सारी स्वाभाविक साहित्यिक प्रतिभा मिट चुकी है। अब मेरे मुँह से जो चीजें निकलती हैं वे सिर्फ अशिष्ट और गँवारू शब्द ही होते हैं।” वे अपने दिलों में बहुत दुखी महसूस करते हैं। वैसे तो वे जोर से कहते हैं कि वे परमेश्वर के आयोजन के प्रति समर्पण करते हैं और परमेश्वर का घर उनसे जो भी करने को कहेगा, वे करेंगे, लेकिन अपने दिलों में उनके पास गलत आत्म-मूल्यांकन होता है, उन्होंने गलती से अपनी रुचियों और शौक को अपनी खूबियाँ मान ली हैं, उन्हें कुछ ऐसा मान लिया है जो परमेश्वर के उपयोग के लिए उपयुक्त है, उन्हें अपनी जगह नहीं मिली है, उन्होंने अपनी वास्तविक स्थिति को नहीं पहचाना है, वे अपना खुद का माप नहीं जानते हैं और उन्हें यह नहीं मालूम कि क्या उनकी रुचियाँ और शौक वास्तव में वही हैं जिनमें वे निपुण हैं—वे इन सब बातों के बारे में अस्पष्ट और अनजान हैं, लेकिन फिर भी वे साहित्यिक प्रतिभा के धनी होने का दावा करते हैं, बस खुद को साहित्यिक गुरु पुकारने से रह जाते हैं। इसका अंतिम नतीजा क्या होता है? (वे कलीसिया की व्यवस्थाओं के बारे में शिकायतों से भरे होते हैं और अपने दिलों में समर्पण करने के अनिच्छुक होते हैं।) अपने दिलों में उन्हें लगातार लगता है कि उनके साथ अन्याय हुआ है। वैसे तो अपना कर्तव्य करते समय वे कामचोरी नहीं करते हैं और पूरी मेहनत कर सकते हैं—बस मुश्किल से समर्पण करते हैं—लेकिन अपने गलत आत्म-मूल्यांकन के कारण उन्हें लगता है कि उनके साथ अन्याय हुआ है। उनके मन में एक विचार बार-बार कौंध उठता है : “दुनिया में तेज घोड़े तो बहुत सारे हैं, लेकिन घोड़ों के पारखी लोग थोड़े-से हैं।” कौन-से तेज घोड़े? घोड़ों के कौन-से पारखी लोग? चूँकि किसी खास क्षेत्र में उनकी जरा-सी रुचि और जुनून होता है और बाद में वे उसका सुव्यवस्थित रूप से अध्ययन करते हैं, इसलिए वे खुद को बेमिसाल समझते हैं, खुद को “तेज घोड़ा” समझते हैं और मानते हैं कि वे प्रतिभाशाली हैं। क्या यह आत्म-जागरूकता की कतई कमी नहीं है? वे बस यही मानते हैं कि रुचियाँ और शौक परमेश्वर द्वारा दिए गए हैं लेकिन वे यह पहचानने में विफल हो जाते हैं कि परमेश्वर ने उन्हें क्या काबिलियत दी है। वे इस बारे में अस्पष्ट होते हैं कि क्या वे वास्तव में उन चीजों में निपुण हैं जिनमें उनकी रुचि है और जिनके बारे में वे जुनूनी हैं और क्या वे वास्तव में अपनी रुचियों और शौक से संबंधित कार्य और कर्तव्य अच्छी तरह से कर सकते हैं, क्या वे उनमें योग्य हैं और क्या वे उनकी जिम्मेदारी उठा सकते हैं। वे इस बारे में अस्पष्ट हैं और इस बारे में नहीं जानते हैं। क्या यह बहुत परेशानी वाली बात नहीं है? (हाँ।) क्योंकि वे अपनी जगह पहचान नहीं सकते या ढूँढ़ नहीं सकते, इसलिए उन्हें लगता है कि उनके साथ बहुत अन्याय हुआ है। वे बाहर से क्या प्रदर्शित करते हैं? वे अक्सर आहें भरते हैं और परमेश्वर के सामने बार-बार अपना संकल्प व्यक्त करते हैं, यह उम्मीद करते हैं कि एक दिन परमेश्वर उनके लिए एक अवसर बनाएगा, उनकी शिकायतों का निवारण करेगा, उनके लिए न्याय कायम रखेगा और उन्हें अपनी रुचियों और शौक से संबंधित कर्तव्य करने की उनकी कामना पूरी करने की अनुमति देगा। वह गीत देखो जिसे वे अक्सर गाते हैं : “मैं आगे के मार्ग के बारे में नहीं सोचता।” अगली पंक्ति क्या है? (“मेरा एकमात्र परम कर्तव्य परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलना है।”) जिनके पास वास्तव में यह आध्यात्मिक कद है, जिनके पास वास्तव में यह वास्तविकता है और जो सही मायने में परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलने में समर्थ हैं, उनके लिए यह गीत गाना पूरी तरह से उपयुक्त है—यह बिल्कुल उचित है। लेकिन जब इस तरह का व्यक्ति यह गीत गाता है तब उसकी भावनात्मक अवस्था क्या होती है? वह इसे किस स्थिति में गा रहा होता है? (जब वह शिकायत कर रहा होता है और उसे लगता है कि उसके साथ अन्याय हुआ है।) तो जब वह गाता है तब क्या वह जो गाता है वह आक्रोश से भरा नहीं होता है? (हाँ।) वह जो गाता है वह शिकायतों, उद्दंडता और असंतोष से भरा होता है—यह दुख और आक्रोश के सिवाय और कुछ नहीं होता। जिस समय तुम उसे यह गीत गाते हुए सुनते हो यह वही समय होता है जब वह सबसे ज्यादा उदास होता है। चीन में एक कहावत है—वह क्या है? “पुरुष गाकर दुख व्यक्त करते हैं, महिलाएँ रोकर दुख व्यक्त करती हैं और बूढ़ी दादी-नानी निरर्थक चीजें बड़बड़ाकर दुख व्यक्त करती हैं।” देखो, विभिन्न प्रकार के लोग अपना दुख विभिन्न तरीकों से व्यक्त करते हैं। कुछ महिलाएँ जब ऐसी परिस्थिति का सामना करती हैं तब वे बस रोती रहती हैं, चुपके-चुपके लगातार अपने आँसू पोंछती रहती हैं। वे इसे जाने नहीं दे सकती और हर बार जब वे इसके बारे में सोचती हैं तब उनकी आँखें आँसुओं से लाल हो जाती हैं और उनके दिलों को यह महसूस होता है कि उनके साथ अन्याय हुआ है और वे व्यथित महसूस करती हैं। वे इस मामले को सही तरीके से बस सँभाल ही नहीं पाती हैं। दरअसल यह बहुत ही सरल मामला है—रुचियाँ और शौक, और खूबियाँ सहज रूप से दो अलग-अलग चीजें हैं। अगर तुममें कोई विशेष खूबी है, चाहे वह तुम्हारी रुचि और शौक हो या न हो, तो तुम उस खूबी से संबंधित कार्य के लिए बहुत अच्छी तरह से उपयुक्त हो—यानी तुम्हारी जन्मजात काबिलियत, प्रतिभा या योग्यता तुम्हें उस विशेष चीज को करने में निपुण बनाती है और तुम उसे अच्छी तरह से कर सकते हो—ऐसे में जब तुम वह कार्य करते हो तब तुम कुछ निश्चित नतीजे हासिल कर सकते हो और वह तुम्हारे द्वारा किए जाने के लिए अपेक्षाकृत उपयुक्त होता है। लेकिन अगर तुम्हारी इस क्षेत्र में सिर्फ रुचि और शौक है और इसमें तुम्हारी कोई खूबी नहीं है तो जरूरी नहीं कि तुम उसे अच्छी तरह से कर सको। यह बहुत ही सरल मामला है। लोगों की जिद और विरूपित समझ, और साथ में उनकी बेवकूफी और अज्ञानता के कारण जब वे उस कार्य को करने में असमर्थ होते हैं जिसमें उनकी रुचि है तो वे हतोत्साहित, हताश और नकारात्मक हो जाते हैं और शिकायत करते हैं, वे सभी तरह की नकारात्मक भावनाओं से लबालब भरे होते हैं। इसलिए, लोगों के लिए अपनी रुचियों, शौक और खूबियों की वास्तविक स्थिति को समझना बहुत जरूरी है। जैसे ही वे समझ जाएँ, उन्हें उनसे सही ढंग से पेश आना होगा—यह एक पहलू है। दूसरा पहलू यह है कि उन्हें परमेश्वर के घर की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना होगा और परमेश्वर के घर द्वारा अपेक्षित सिद्धांतों के अनुसार अपना कर्तव्य पूरा करना होगा। अगर परमेश्वर का घर तुमसे किसी विशेष क्षेत्र में तुम्हारा कर्तव्य करने की अपेक्षा करता है, लेकिन तुम कार्य के इस क्षेत्र में निपुण नहीं हो, तुम्हारी उसमें सिर्फ रुचि है और तुम उसके बारे में सिर्फ जुनूनी हो और उस कार्य को करने के शौकीन हो और फिर भी परमेश्वर के घर द्वारा अपेक्षित निम्नतम मानक के अनुसार तुम उसके लिए मुश्किल से योग्य हो सकते हो तो तुम्हें समर्पण करना चाहिए और अपनी जिम्मेदारी पूरी करने का प्रयास करना चाहिए—इनकार करने या ठुकराने के लिए सभी प्रकार के वस्तुनिष्ठ बहाने मत ढूँढ़ो। यकीनन अगर विभिन्न क्षेत्रों में तुम्हारी जन्मजात स्थितियाँ सीमित हैं या तुम्हारी कुछ वास्तविक समस्याएँ हैं और परमेश्वर का घर तुम्हें इस क्षेत्र में कर्तव्य करने की अनुमति नहीं दे सकता है तो तुम्हें शिकायतें नहीं होनी चाहिए और न ही तुम्हें नकारात्मक या कमजोर होना चाहिए। तुम जो भी कर सकते हो, बस उसे करो। जहाँ तक तुम्हारी रुचियों और शौक का प्रश्न है, उन्हें अपने लिए रखो—कलीसिया के लोग दखलंदाजी नहीं करेंगे और न ही वे तुमसे कुछ चीजों में रुचि रखने या उनके बारे में जुनूनी होने का अधिकार छीनेंगे। वह तुम्हारा निजी मामला है। हालाँकि जब कर्तव्य करने की बात आती है तब तुम्हें अपनी रुचियों, शौक और खूबियों से संबंधित सभी विभिन्न मुद्दों को स्पष्ट रूप से समझना होगा और तुम्हें उन सभी से सही ढंग से पेश आने में समर्थ होना होगा—यह सबसे महत्वपूर्ण चीज है। तुम समझ रहे हो? (हाँ।)
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?