सत्य का अनुसरण कैसे करें (12) भाग दो

बहुत-से लोगों की किसी विशेष क्षेत्र में रुचियाँ और शौक होते हैं। ऐसे भी कुछ लोग होते हैं जिनकी कोई रुचि या शौक नहीं होता है। यानी जब किसी भी पेशे या किसी भी प्रकार की विशिष्ट गतिविधियों की बात आती है या उन विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों की बात आती है जिनके संपर्क में दुनिया में लोग बार-बार आते हैं, तब उनकी कोई विशेष रुचि या जुनून नहीं होता है—वे बस आम लोग हैं। उदाहरण के लिए, अगर कोई उनसे पूछता है कि क्या वे साहित्य के बारे में जुनूनी हैं, क्या वे आमतौर पर डायरी लिखते हैं या लेख लिखते हैं तो वे कहते हैं, “मैं इसके बारे में जुनूनी नहीं हूँ और न ही मैं इसमें निपुण हूँ। जैसे ही मैं पढ़ना-लिखना शुरू करता हूँ, मुझे सिरदर्द होने लगता है।” अगर उन्हें कुछ सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक कृतियाँ पढ़ने को दी जाती हैं तो उन्हें वे बोझिल लगती हैं और वे अपने दिलों में पूरी तरह से अनिच्छुक होते हैं। कुछ तो यहाँ तक कहते हैं, “हर समय पाठ को घूरते रहने से मेरी आँखों पर जोर पड़ता है और मैं बूढ़ा हो जाता हूँ, इसलिए मुझे साहित्य पसंद नहीं है।” अगर तुम उनसे पूछते हो कि क्या उन्हें नृत्य करना पसंद है तो वे कहते हैं, “नृत्य कोई उचित काम नहीं है, यह तो लोग तब करते हैं जब वे निठल्ले होते हैं और जब उनके पास करने के लिए कुछ बेहतर नहीं होता है। मुझे नृत्य करना पसंद नहीं है।” देखो, वे इसे पसंद नहीं करते हैं और इसके लिए एक कारण भी ढूँढ़ लेते हैं, और कहते हैं कि यह उचित काम नहीं है। दूसरे लोग परमेश्वर की स्तुति करने के लिए नृत्य करते हैं—यह कितनी सकारात्मक चीज है! परमेश्वर की स्तुति करने के लिए गीत गाना, नृत्य करना, वीणा और सारंगी बजाना—यह प्राचीन काल से किया जा रहा है; यह ऐसी चीज है जिसका परमेश्वर अनुमोदन करता है, तो यह उचित काम कैसे नहीं हो सकता? लेकिन उनके लिए, वे जो भी चीज पसंद नहीं करते हैं उसे नीचा दिखाते हैं और उसके बारे में उसे बतौर नकारात्मक चीज पेश करते हुए बोलते हैं। जब उनसे पूछा जाता है, “तुम्हें नृत्य करना पसंद नहीं है—तो क्या तुम्हें गीत गाना पसंद है?” “क्या ‘गीत गाना’? जैसे ही मैं गीत गाना शुरू करता हूँ, मैं बेसुरा हो जाता हूँ। मुझे खुद इसे सुनना असहनीय लगता है। मुझे गीत गाना पसंद नहीं है। यह तो सिर्फ अब परमेश्वर में विश्वासी के रूप में मैंने परमेश्वर के वचनों के कुछ भजन और अनुभवजन्य भजन सीखने शुरू किए हैं। परमेश्वर में विश्वास रखने से पहले मैंने कभी भी गीत नहीं गाए; जब दूसरे गाते थे तब मैं सुनने को भी तैयार नहीं होता था।” “तो फिर जब तुम्हारा मिजाज खुश होता है तब तुम खुद को कैसे व्यक्त करते हो?” “जब मेरा मिजाज खुश होता है तब मैं बस एक झपकी ले लेता हूँ।” “तो जब तुम दर्दनाक मामलों का सामना करते हो और तुम्हारा मिजाज दुखी होता है तब तुम क्या करते हो?” “तब मैं कुछ नाश्ता कर लेता हूँ या बस एक झपकी ले लेता हूँ।” “तुम्हें गीत गाना पसंद नहीं है—तो क्या तुम्हें संगीत सुनना पसंद है?” “मुझे उसमें रुचि नहीं है और मुझे समझ नहीं आता कि संगीत में क्या व्यक्त किया जा रहा है। तुम सब लोग कहते हो कि संगीत लोगों की विभिन्न भावनाओं को व्यक्त करता है, यह लोगों के विचारों और अनुभूतियों को व्यक्त करता है, लेकिन मुझे ये चीजें समझ नहीं आती हैं और मैं इनसे जुड़ नहीं पाता हूँ। संगीत एक उच्च कला है—मेरे जैसा तुच्छ व्यक्ति संगीत से जुड़ नहीं सकता है और मुझे यह पसंद नहीं है।” “क्या तुम्हें अच्छा भोजन पसंद है?” “मुझे अच्छा भोजन भी पसंद नहीं है। मैं कुछ भी खा सकता हूँ। मैं रूखे व्यक्ति के रूप में पैदा हुआ। मैं मक्के का आटा खा सकता हूँ, मैं केक खा सकता हूँ, मैं चीनी भोजन या पश्चिमी भोजन खा सकता हूँ—कुछ भी खा सकता हूँ। और अगर मुझे भूख लगी हो और मेरे पास खाने के लिए कुछ न हो तो मैं कुत्ते का भोजन भी खा सकता हूँ।” ऐसे लोग इस हद तक गँवार होते हैं। कुछ महिलाओं से पूछो, “क्या तुम्हें सौंदर्य-प्रसाधन पसंद हैं?” वे कहती हैं, “मुझे उनमें कोई रुचि नहीं है। मैं जैसी भी पैदा हुई, वैसी ही दिखती हूँ—जो भी मेरी तरफ देखना चाहता हो, देख सकता है और जो भी मेरी तरफ देखना नहीं चाहता हो, वह बस अपनी नजरें फेर सकता है!” कुछ पुरुषों से पूछो, “क्या तुम्हें इलेक्ट्रॉनिक सामान या मशीनी चीजें जैसे कि कार पसंद हैं?” वे कहते हैं, “इन चीजों को पसंद करने का क्या फायदा? ये मानसिक रूप से थकाने वाली हैं और दिमाग को निचोड़ देती हैं। अगर मेरे पास समय हो तो झपकी लेना या यूँ ही गपशप करना बेहतर होगा!” उन्हें कुछ भी अच्छा नहीं लगता है और उनकी कोई रुचि या शौक नहीं होता है। चाहे यह जैविक हो, तकनीकी हो, उच्च-स्तरीय हो या निम्न-स्तरीय हो, उन्हें इनमें से कुछ भी अच्छा नहीं लगता है। जब उनसे पूछा गया, “ये चीजें जो मानवीय गुणों से जुड़ी हैं, चाहे वे परिष्कृत हों या व्यापक आकर्षण वाली हों—तुम्हें इनमें से कुछ भी अच्छी नहीं लगती है। तो क्या तुम्हें छोटे जानवर, जैसे कि बिल्लियाँ, कुत्ते और पक्षी अच्छे लगते हैं?” “वे तो मुझे और भी कम अच्छे लगते हैं। जानवर लोगों से बात नहीं कर सकते हैं—उन्हें पसंद करने का क्या फायदा?” कुछ लोगों को कुत्तों में रुचि होती है। वे अक्सर कुत्तों से बातें करते हैं और कुत्ते तो मनुष्यों की बोली भी समझ सकते हैं। कुछ लोगों का कोई शौक नहीं होता है और उन्हें किसी भी चीज में रुचि नहीं होती है—ऐसे बहुत सारे लोग हैं। कुछ लोग कहते हैं, “हम कुछ रुचियों और शौक के साथ पैदा होते हैं—ये परमेश्वर द्वारा दिए जाते हैं। विशेष रूप से हममें से वे लोग जिनके पास किसी खास क्षेत्र में कोई खूबी है, वे लोग जो इस क्षेत्र में असाधारण और उत्कृष्ट प्रतिभा के साथ पैदा हुए हैं—यह सब परमेश्वर का अनुग्रह है, परमेश्वर का उत्कर्ष है, परमेश्वर का हमें कृपादृष्टि से देखना है। विशेष रूप से आजकल परमेश्वर के घर में हमारी रुचियों, शौक या खूबियों से संबंधित कोई कर्तव्य स्वीकारना हमारी पहचान और मूल्य को बेमिसाल रूप से और भी सम्मानजनक और असाधारण बनाता है। जिनके पास कोई शौक या खूबियाँ नहीं होती हैं, वे सिर्फ कुछ मूलभूत श्रम और ऐसा कार्य कर सकते हैं जिसमें ज्यादा तकनीकी कौशल की जरूरत नहीं होती है, जैसे कि मेजबानी करना, खाना पकाना और सफाई करना या सब्जियाँ उगाना, सूअर पालना और मुर्गियों को खाना खिलाना। तो क्या लोगों की रुचियों, शौक और खूबियों के लिहाज से लोगों में उच्च-निम्न, कुलीन-नीच का भेद नहीं किया जाता है? क्या उनके बीच कोई पदानुक्रमिक अंतर नहीं है?” क्या यह दृष्टिकोण सही है? (नहीं।) देखो, परमेश्वर ने कुछ लोगों को खूबियाँ दी हैं, कुछ लोगों के लिए कुछ विशेष रुचियाँ और शौक नियत किए हैं, जबकि कुछ दूसरे लोगों के लिए परमेश्वर ने कुछ भी नियत नहीं किया है—उनमें बिल्कुल कोई खूबी नहीं है, वे न तो गीत गा सकते हैं और न ही नृत्य कर सकते हैं, वे साहित्य नहीं समझते हैं और वे सभी प्रकारों के व्यावसायिक कौशलों से पूरी तरह से अनजान हैं। इत्तेफाक से हो सकता है कि कोई मेजबान परिवार दो कुत्ते रखता हो, इसलिए ऐसे किसी व्यक्ति से जिसमें कोई खूबी नहीं है, कुत्तों को खाना खिलवाना उपयुक्त होना चाहिए—यह सबसे आसान काम है। लेकिन कुत्तों को खाना खिलाने के अलावा, वह उन्हें सैर के लिए नहीं ले जाता है और उसे उनकी देखभाल करना भी नहीं आता है। एक-दो वर्ष उससे खाना खाने के बाद, कुत्ते भी उसे अपना मालिक नहीं मानते हैं और उसके करीब नहीं आते हैं। मुझे बताओ, यह किस तरह का व्यक्ति है? उन लोगों की तुलना में जिनकी किसी विशेष क्षेत्र में रुचियाँ और शौक या खूबियाँ हैं, क्या इसमें कोई अंतर नहीं है? स्पष्ट रूप से, ये दो प्रकार के लोग हैं जिनकी जन्मजात स्थितियों में भिन्नताएँ हैं : एक प्रकार का व्यक्ति श्रेष्ठता की मजबूत भावना के साथ जीता है, वह समृद्ध और भरपूर जीवन जीता है, जबकि दूसरे प्रकार का व्यक्ति बिना किसी श्रेष्ठता के बोध के खोखला जीवन जीता है। तो अगर इस सिद्धांत के आधार पर रुतबे और मूल्य में भिन्नताओं के अनुसार लोगों में भेद किया जाता है, तो क्या यह उचित है? (नहीं।) तो फिर किस सिद्धांत के अनुसार उनमें भेद करना उचित है? मुझे बताओ, क्या लोगों के बीच भिन्नताएँ होती हैं? (हाँ।) ये भिन्नताएँ कहाँ होती हैं? लोगों में कैसे भेद किया जाना चाहिए? कम से कम यह तो देखना ही चाहिए कि क्या वे सत्य से प्रेम करते हैं—सत्य के प्रति उनके रवैये के आधार पर उनके सार, उनकी उच्चता और निम्नता, उनकी कुलीनता और नीचता और उनकी श्रेणी में भेद किया जाना चाहिए। सैद्धांतिक रूप से, क्या इस तरह से बड़ी आसानी से लोगों में भेद नहीं किया जा सकता है? (हाँ।) क्या लोगों में भेद करने का यह तरीका अच्छा है? (हाँ।) लेकिन क्या इस तरीके से उनमें भेद करना कुछ ज्यादा ही सरल है? कुछ लोगों में कोई जन्मजात खूबियाँ नहीं होती हैं और न ही उनकी कोई रुचियाँ या शौक होते हैं—वे बहुत ही मामूली, बहुत ही सरल लोग होते हैं। हालाँकि वे सत्य से प्रेम करते हैं, सत्य समझते हैं, उन्हें सत्य का अनुभव और समझ होती है और जब वे सत्य के बारे में संगति करते हैं तब वे परमेश्वर के वचनों की अपनी समझ को साझा कर सकते हैं; वे जीवन प्रवेश में औसत व्यक्ति से बेहतर होते हैं। वे बहुत-से लोगों की मदद कर सकते हैं। तो क्या तुम कह सकते हो कि ऐसे लोग नीच और बेकार होते हैं? (नहीं।) सैद्धांतिक रूप से, सत्य के प्रति लोगों के रवैये के आधार पर उनके सार, उनकी उच्चता और निम्नता, उनकी कुलीनता और नीचता और उनकी श्रेणी में भेद किया जाना चाहिए, लेकिन ठीक कैसे उनमें भेद किया जाना चाहिए? आज हम इसी के बारे में संगति करेंगे।

उत्पत्तियों के आधार पर लोगों की तीन श्रेणियाँ

किसी व्यक्ति में सहज रूप से कोई रुचियाँ, शौक और खूबियाँ हैं या नहीं, यह परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत है। अगर परमेश्वर तुम्हें ये चीजें देता है तो तुम्हारे पास वे होती हैं; अगर परमेश्वर तुम्हें ये चीजें नहीं देता है तो तुम्हारे पास वे नहीं होती हैं—तुम उन्हें सीख नहीं सकते हो और न ही अनुकरण के जरिए उन्हें हासिल कर सकते हो। हालाँकि अगर तुम्हारे पास किसी विशेष क्षेत्र में कोई खूबी है और तुम कहते हो, “इस खूबी से संबंधित कर्तव्य करना बहुत ही ज्यादा थका देने वाला है; मुझे यह खूबी नहीं चाहिए” तो भले ही तुम इसे न चाहो, फिर भी तुम इसे हटा नहीं सकते और न ही कोई इसे तुमसे छीन सकता है। जो तुम्हारे पास है उसे दूसरे लोग छीन नहीं सकते हैं; जो तुम्हारे पास नहीं है उसे तुम छीन नहीं सकते और न ही उसके लिए होड़ करके उसे हासिल कर सकते हो। यह सब कुछ परमेश्वर की पूर्वनियति से संबंधित है। हालाँकि, इसके बावजूद परमेश्वर द्वारा तुम्हें कोई विशेष रुचि, शौक या खूबी दिए जाने का यह मतलब नहीं है कि परमेश्वर को तुमसे तुम्हारी रुचि, शौक या खूबी से संबंधित कोई कर्तव्य या कार्य करवाना ही पड़ेगा। कुछ लोग कहते हैं, “चूँकि मुझे इस क्षेत्र में कोई कर्तव्य करने या इससे संबंधित कार्य करने के लिए नहीं कहा गया है, तो फिर मुझे ऐसी रुचि, शौक या खूबी क्यों दी गई?” परमेश्वर ने ज्यादातर लोगों को हर व्यक्ति की विभिन्न स्थितियों के आधार पर कुछ रुचियाँ और शौक दिए हैं। यकीनन ऐसी बहुत-सी चीजें हैं जिन्हें ध्यान में रखा जाता है : एक बात तो यह है कि यह लोगों की आजीविका और उत्तरजीविता के लिए है; दूसरी बात यह है कि यह लोगों के जीवन को समृद्ध बनाने के लिए है। कभी-कभी व्यक्ति के जीवन में कुछ विशेष रुचियाँ और शौक जरूरी होते हैं, वे चाहे मनोरंजन और मनबहलाव के लिए हों या इसलिए हों ताकि वह कुछ उचित काम कर सके जिससे उसका मानव जीवन परिपूर्ण हो जाए। यकीनन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इसे किस पहलू से देखा जाता है, परमेश्वर द्वारा दिए जाने के पीछे कोई कारण होता है और नहीं देने के लिए भी परमेश्वर के अपने कारण और आधार होते हैं। हो सकता है कि तुम्हारे मानव जीवन या तुम्हारी उत्तरजीविता के लिए यह जरूरी न हो कि परमेश्वर तुम्हें रुचियाँ, शौक और खूबियाँ दे, और तुम दूसरे साधनों से अपनी आजीविका बनाए रख सकते हो या अपने मानव जीवन को समृद्ध और सार्थक बना सकते हो। संक्षेप में, चाहे परमेश्वर ने लोगों को रुचियाँ, शौक और खूबियाँ दी हों या न दी हों, यह खुद लोगों के साथ कोई मुद्दा नहीं है। अगर किसी व्यक्ति के पास खूबियाँ न भी हो, तो भी यह उसकी मानवता का दोष नहीं है। लोगों को इसे सही ढंग से समझना चाहिए और इससे सही ढंग से पेश आना चाहिए। अगर व्यक्ति के पास कुछ विशेष रुचियाँ, शौक और खूबियाँ हैं तो उसे उन्हें सँजोना चाहिए और उनका सही ढंग से उपयोग करना चाहिए; अगर उसके पास ये नहीं हैं तो उसे शिकायत नहीं करनी चाहिए। रुचियों, शौक और खूबियों के परिप्रेक्ष्य से यही वास्तविक स्थिति है। हालाँकि किसी व्यक्ति के पास ये चीजें हैं या नहीं, यह बात उसके मूल्य, रुतबे या पहचान को नहीं दर्शाती है। तो यह लोगों को क्या बताती है? भले ही परमेश्वर ने तुम्हें परिष्कृत रुचियाँ, शौक और खूबियाँ दी हों—ये तुम्हारी निजी संपत्ति हैं, ये तुम्हारी लाभप्रद स्थितियाँ हैं—ये तुम्हारे पास होने का मतलब यह नहीं है कि तुम किसी और से ज्यादा श्रेष्ठ हो, तुम्हारे पास किसी और की तुलना में कुछ भी करने के लिए ज्यादा सुविधाएँ या विशेषाधिकार हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि व्यक्ति के पास कौन-सी जन्मजात स्थितियाँ हैं, परमेश्वर की नजर में वह भ्रष्ट मानवजाति का सदस्य है। वैसे तो जन्मजात स्थितियों में भ्रष्टता के तत्व नहीं होते हैं, फिर भी वे सभी लोग जिनके पास जन्मजात स्थितियाँ हैं, वे शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जा चुके हैं और वे शैतानी स्वभावों के अनुसार जीते हैं। उनका जीवन सार उनका शैतानी भ्रष्ट स्वभाव है। इसलिए, तुम्हारी जन्मजात स्थितियाँ चाहे किसी भी तरह की हों और तुम्हारे पास रुचियाँ, शौक और खूबियाँ चाहे हों या न हों, परमेश्वर की नजर में चूँकि सभी लोगों का जीवन सार एक जैसा है, इसलिए तुम्हारा मूल्य दूसरों के मूल्य के समान है। लोगों को यह स्पष्ट रूप से देखना चाहिए कि भले ही उनके पास कुछ लाभप्रद स्थितियाँ हों या कुछ विशेष सुविधाएँ हों, मानव सार और भ्रष्ट स्वभाव के लिहाज से सभी लोगों का सार एक जैसा ही है और सभी लोग एक जैसे ही हैं। उन्हें परमेश्वर की ताड़ना और न्याय से गुजरना होगा और ये सभी वे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर बचाना चाहता है। लोगों के देह के जीवन सार के लिहाज से लोग एक जैसे हैं। हालाँकि दूसरे परिप्रेक्ष्य से लोगों के बीच कुछ भिन्नताएँ होती हैं और हमें इन भिन्नताओं के बारे में विस्तार से संगति करने की जरूरत है। इन भिन्नताओं की पहचान कैसे की जानी चाहिए? उनकी जाँच लोगों की उत्पत्तियों से की जानी चाहिए। “उत्पत्तियों” का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि व्यक्ति ने किससे पुनर्जीवन लिया है—भिन्नताएँ इस आधार पर की जाती हैं कि वह अस्तित्व में कैसे आया और वह किससे आया। मोटे तौर पर कहा जाए तो यह मानवजाति तीन श्रेणियों में विभाजित है। पहली श्रेणी में वे लोग हैं जो जानवरों से पुनर्जन्म लिए हुए हैं, दूसरी श्रेणी में वे हैं जो विभिन्न दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए हैं और तीसरी श्रेणी में वे हैं जो मनुष्यों से पुनर्जन्म लिए हुए हैं। ये तीनों श्रेणियाँ ठीक जड़ से लोगों में भेद करती हैं। उनका लोगों में भेद कर सकने का कारण यह है कि विभिन्न श्रेणियों के लोगों की उत्पत्तियाँ एक जैसी नहीं होती हैं। तो फिर कोई कैसे जान सकता है कि किसने जानवरों से, किसने दानवों से और किसने इंसानों से पुनर्जन्म लिया हुआ है? इसे इस आधार पर निर्धारित किया जाना चाहिए कि वह कैसे जीता है और वह कौन-सी विशेषताएँ प्रदर्शित करता है। क्या तुमने पहले कभी ऐसी जानकारी सुनी है, चाहे लोककथाओं में हो या किसी और माध्यम से? (हाँ।) तो यह विषय तुम लोगों के लिए पूरी तरह से अपरिचित नहीं है, है ना? (नहीं, यह नहीं है।) तुम लोग सबसे पहले किनके बारे में सुनना चाहते हो—जानवरों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों के बारे में, दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों के बारे में, मनुष्यों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों के बारे में? (पहली श्रेणी।) पहली श्रेणी वे हैं जो जानवरों से पुनर्जन्म लिए हुए हैं। अगर तुम लोग इस मामले की सच्चाई सही मायने में जान जाते हो तो क्या तुम लोगों के जीवन पर इसका कोई प्रभाव पड़ेगा? क्या यह परेशानी या बाधाएँ लाएगी? (हो सकता है मैं सोचना शुरू कर दूँ कि मैंने किससे पुनर्जन्म लिया है।) कुछ लोगों के लिए एक बार जब वे सच में जान जाते हैं कि वे किस श्रेणी से हैं और खुद को किसी विशेष श्रेणी के अनुरूप पाते हैं, तब अगर वे सचमुच मनुष्यों से पुनर्जन्म लिए हुए होते हैं तो वे इस बारे में खुशकिस्मत और काफी अच्छा महसूस करते हैं। लेकिन अगर वे मनुष्यों से पुनर्जन्म नहीं लिए हुए होते हैं तो क्या उन्हें ये बात परेशान करने वाली नहीं लगेगी? (हाँ।) इससे कुछ विशेष मुश्किलें और कुछ असहजता भी आएगी, है ना? (हाँ।) चूँकि इससे असहजता और कुछ मुश्किलें आ सकती हैं, तो क्या लोगों के लिए यह जानना बेहतर है या नहीं जानना? (मुझे लगता है कि जानना बेहतर होगा।) यह किस तरीके से बेहतर होगा? (यह जानकर व्यक्ति इस संबंध में सत्य समझ सकता है और इसके अतिरिक्त, वह अपने आस-पास के कुछ लोगों, घटनाओं और चीजों का भेद पहचानने में समर्थ हो जाएगा।) तो फिर चलो हम इस बारे में संगति करें।

पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की विशेषताएँ

आओ, सबसे पहले हम उन लोगों के बारे में संगति करें जो पशुओं से पुनर्जन्म लेते हैं। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, पशुओं से पुनर्जन्म लेने का मतलब है कि ऐसे व्यक्ति ने किसी पशु से पुनर्जन्म लिया है। पशुओं का दायरा काफी व्यापक है—जहाँ तक यह प्रश्न है कि कितने प्रकार के पशु मनुष्यों के रूप में पुनर्जन्म ले सकते हैं, यह हमारी संगति के दायरे में नहीं है। संक्षेप में, ऐसे लोगों की एक श्रेणी है जिनका पिछला अस्तित्व किसी पशु के रूप में था, यानी उनकी मूल पहचान या सृजित श्रेणी सृजित मानवजाति में नहीं आती थी। उनकी शुरुआती, पहली जैविक श्रेणी किसी पशु की थी। इसलिए परमेश्वर की नजर में जैविक जगत के भीतर उनकी पहचान किसी पशु की है। इस पुनर्जन्म में वे मनुष्य बन गए हैं, यानी इस पशु ने अब पशुओं के बीच पुनर्जन्म नहीं लिया है, बल्कि इसके बजाय इसने एक मनुष्य के रूप में पुनर्जन्म लिया है, एक निश्चित समय पर, एक निश्चित परिवार, वंश और देश में जन्म लिया है। किसी पशु का मनुष्य के रूप में पुनर्जन्म लेने का मतलब है कि उसने मनुष्य के रूप में जन्म तो लिया है, लेकिन उसका पिछला अस्तित्व मनुष्य के रूप में नहीं था—वह किसी पशु के रूप में था। इससे पहले उसका अस्तित्व पशु लोक के भीतर था, वह पशुओं के बीच पुनर्जन्म ले रहा था; अब इस पुनर्जन्म में वह पशु लोक के भीतर नहीं रहा। उसकी पहचान बदल गई है और वह मानवजाति का सदस्य बन गया है। इसे ही पशुओं का मनुष्य के रूप में पुनर्जन्म लेना कहते हैं। जब कोई पशु मनुष्य के रूप में पुनर्जन्म लेता है तब उसका रूप-रंग और सहज प्रवृत्तियाँ मूल रूप से मानवजाति के भीतर किसी भी व्यक्ति के समान होती हैं। यानी उसमें मनुष्य की विशेषताएँ पूरी तरह से होती हैं—वह बिल्कुल सीधा चल सकता है, उसमें मानव चेहरे की विशिष्टताएँ और रूप-रंग होते हैं और वह मानव सोच, मानव सहज प्रवृत्तियाँ और एक सामान्य मानव जीवन रख सकता है और उसमें भाषा की अनूठी मानव क्षमता भी होती है। इसे ही किसी पशु का मनुष्य के रूप में पुनर्जन्म लेना कहते हैं। यानी उसके शारीरिक रूप, बाहरी रूप-रंग और शारीरिक जीवन विशेषताओं से तुम सिर्फ मानवीय विशिष्टताएँ ही देख सकते हो; कोई भी पाशविक विशिष्टता दिखाई नहीं देती है। तो तुम यह कैसे जान सकते हो कि उसने किसी पशु से पुनर्जन्म लिया है? लोग इसी के बारे में सबसे ज्यादा चिंतित रहते हैं। यकीनन यह देखना संभव है कि उसने किसी पशु से पुनर्जन्म लिया है। अगर पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों और मनुष्यों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों में कोई अंतर नहीं होता तो इस श्रेणी के लोगों में कोई स्पष्ट विशेषताएँ नहीं होतीं। चूँकि पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों और सच्चे मनुष्यों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों के बीच स्पष्ट अंतर होते हैं, ठीक इसी कारण से लोगों की इन दोनों श्रेणियों की विशेषताओं के आधार पर उनमें आसानी से भेद किया जा सकता है। तो पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की विशेषताएँ क्या हैं? पहली विशेषता यह है कि उनमें विरूपित समझ होती है। दूसरी विशेषता यह है कि वे विशेष रूप से सुन्न होते हैं। तीसरी विशेषता यह है कि वे विशेष रूप से भ्रमित होते हैं। चौथी विशेषता यह है कि वे बेवकूफ होते हैं। ये अकेली चार विशेषताएँ किसी पशु से पुनर्जन्म लिए हुए व्यक्ति और एक सच्चे मनुष्य के बीच के अंतर को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त हैं।

I. पहली विशेषता : विरूपित समझ

पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की पहली विशेषता यह है कि उनमें विरूपित समझ होती है। सबसे पहले, विरूपण में क्या शामिल है? इसमें उनके विचारों और दृष्टिकोणों से जुड़ी समस्याएँ शामिल हैं; इसमें चीजों को देखने, बूझने और समझने की उनकी संज्ञानात्मक क्षमताएँ भी शामिल हैं। इस श्रेणी के लोग न तो किसी चीज को सही ढंग से बूझ सकते हैं और न ही किसी चीज को सही ढंग से देख सकते हैं। लोगों और चीजों को देखने का उनका तरीका और साथ ही उनका स्व-आचरण और क्रियाकलाप विशेष रूप से बेतुके, जिद्दी और बेहूदे होते हैं—जो सामान्य मानवता की सोच और चीजों के बारे में सामान्य मानवता के विचारों और दृष्टिकोणों के साथ पूरी तरह से असंगत होते हैं। यकीनन, विरूपित बूझ वाले लोग सत्य समझने या उसे जानने लगने के आस-पास बिल्कुल नहीं होते हैं। सत्य उनकी पहुँच से पूरी तरह से परे होता है, फिर सत्य सिद्धांतों को समझने की बात तो रहने ही दो। जब यह बात आती है कि वे किसी वस्तु या व्यक्ति से कैसे पेश आते हैं, तब उनके दृष्टिकोण पूरी तरह से विरूपित होते हैं। तुम्हारे उनके साथ संगति करने के बाद वे इसे सिद्धांत के लिहाज से तो समझ जाते हैं, लेकिन बाद में उनका ज्ञान वैसा ही विरूपित बना रहता है। फिर जब तुम उदाहरण देकर चीजों को ज्यादा स्पष्ट और विशिष्ट रूप से समझाते हो तब उस समय तो शायद वे समझ जाएँ, लेकिन बाद में जब उनके सामने उसी तरह की चीज आती है तब उनका दृष्टिकोण ठीक वैसा ही विरूपित बना रहता है, और चाहे उनके साथ किसी भी तरह से संगति की जाए, इससे उनका दृष्टिकोण ठीक नहीं होता है। इसके अलावा, उनकी यह अवस्था—चीजों को बूझने का यह तरीका—बिना बदले अनिश्चित काल तक बना रहेगा। किसी की भी सत्य की संगति उन्हें बदल नहीं सकती; अगर मैं संगति करूँ और धर्मोपदेश दूँ, तो भी उनके विरूपित विचार और दृष्टिकोण और चीजों को समझने का विरूपित तरीका नहीं बदल सकता। ऐसे लोग बहुत परेशान करने वाले लोग होते हैं। उदाहरण के लिए, जब वे कुछ गलत चीज करते हैं और तुम उनसे कहते हो, “तुमने जो किया वह गलत था, यह सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है; इसमें व्यक्तिगत मिलावट थी” तब वे कहेंगे, “मैंने यह जानबूझकर नहीं किया। मैंने उसे इस इरादे से नहीं किया कि उसका यह नतीजा निकले। चूँकि तुम सभी लोग बहुत अच्छे हो, तुम लोगों के पास सत्य है और तुम लोग जानते हो कि चीजें कैसे करनी है, तो इसे मुझसे करवाने के बजाय तुम लोग खुद क्यों नहीं कर लेते? तुम कहते हो कि मैंने इसे गलत तरीके से किया—क्या यह सिर्फ इसलिए नहीं है क्योंकि मैं तुम्हें अप्रिय लगता हूँ? चूँकि तुम सभी लोगों में मानवता है और अकेला मैं ही हूँ जिसमें मानवता नहीं है, इसलिए मैं तो बस नर्क में जाऊँगा और तुम सभी लोग स्वर्ग जा सकते हो!” यहाँ तक कि वे तर्कों से अपना बचाव करने और खुद को सही ठहराने का प्रयास भी कर सकते हैं और जवाबदेही से पल्ला झाड़ने के लिए बहाने भी बना सकते हैं। वे यह मानने से इनकार करते हैं कि उन्होंने गलत किया, उनके पास सही रवैया नहीं होता है और वे भविष्य में खुद को सुधारने का वादा नहीं करते हैं और न ही यह कहते हैं कि वे समझते हैं कि अगली बार उन्हें कैसे कार्य करना चाहिए। वे इस तरीके से कभी नहीं समझेंगे और मानवता के परिप्रेक्ष्य से इस मामले को कभी भी शुद्ध तरीके से नहीं बूझेंगे। कुछ लोग तो ऐसे भी होते हैं जो जब तुम उनके कार्य में समस्याओं की तरफ ध्यान दिलाते हो और उनके साथ सत्य पर संगति करते हो तब कहते हैं, “क्या तुम मुझे नीची नजर से नहीं देख रहे हो? क्या यह सिर्फ इसलिए नहीं है कि मैं अनपढ़ हूँ और देहात से हूँ? क्या यह सिर्फ इसलिए नहीं है कि मेरा रुतबा निम्न है? यहाँ तक कि परमेश्वर भी मेरा तिरस्कार नहीं करता, तो तुम्हें ऐसा करने का क्या अधिकार है?” वे यह कभी नहीं मानेंगे कि उन्होंने गलती की और न ही फिर सत्य की तलाश करेंगे, यह देखने के लिए कभी आत्म-चिंतन नहीं करेंगे कि उन्होंने कहाँ गलती कर दी और न ही उसे हल करने के लिए अभ्यास का सही मार्ग ढूँढ़ेंगे। वे कभी भी ऐसा क्यों नहीं करेंगे? क्योंकि वे मनुष्य नहीं हैं। उनमें सामान्य मानवीय सोच नहीं है और वे उत्पन्न होने वाली गलतियों को उस तरीके से नहीं सँभाल सकते जैसे कोई सामान्य मनुष्य सँभालेगा। गलतियों के प्रति उनका वह रवैया नहीं है जो किसी सामान्य मनुष्य का होना चाहिए। क्या कभी तुम लोगों के सामने ऐसे लोग आए हैं? सबसे बढ़िया यह होगा कि तुम स्वयं भी साथ में आत्म-चिंतन करो, यह देखने के लिए कि तुम्हारा विवेक सामान्य है या नहीं। उदाहरण के लिए, किसी ने फर्श पर पोंछा लगाया है और उसके बाद सतह अभी भी काफी गीली है। कोई दूसरा व्यक्ति इस बात से अनजान है और वह उस पर चलने लगता है और फिसल जाता है। वह व्यक्ति उठता है और दूसरे व्यक्ति से कहता है, “तुमने पोंछा लगाने के बाद फर्श को उचित रूप से नहीं सुखाया। तुम्हें लोगों को याद दिलाने के लिए इस बारे में कुछ हिदायतों वाला बोर्ड लगाना चाहिए था! यह तो शुक्र है कि मैं जवान हूँ—अगर मैं गिर गया, तो वापस उठ सकता हूँ। लेकिन अगर यह कोई बुजुर्ग होता तो क्या उसकी हड्डी नहीं टूट जाती? तुम वाकई पर्याप्त विचारशील नहीं थे!” क्या ये शब्द उचित और सामान्य हैं? (हाँ, ये सामान्य हैं।) पोंछा लगाने वाला व्यक्ति इस काम को करते समय पर्याप्त विचारशील नहीं था, इसलिए अगली बार उसे ज्यादा विचारशील होना चाहिए। चूँकि कोई इसके कारण गिरा, इसलिए यह स्पष्ट है कि उसने इस मामले में गलती की। यह एक चूक थी और किसी ने भी उसकी निंदा नहीं की है—उसे बस इसे सुधारने की जरूरत है। लेकिन वह किसी मनुष्य के परिप्रेक्ष्य से या मनुष्य की सोच के साथ इस मामले पर सही ढंग से और तर्कसंगत रूप से विचार करने या इसे सँभालने में असमर्थ है। इसके बजाय वह पलटकर कहता है, “तुम देख नहीं सकते थे कि फर्श गीला है? तुम अंधे हो क्या? तुम फिसले और गिर गए—तुम्हारे साथ यही होना चाहिए! तुम अपनी आँखों का उपयोग नहीं करते हो तो क्या वह मेरी गलती है? जब फर्श पर पोंछा लगाया जा चुका है तो यकीनन वह गीला होगा—तुम उस पर चले ही क्यों? ऐसा तो है नहीं कि मैंने तुम्हें वहाँ चलने के लिए कहा हो। बस यह मान लो कि यह तुम्हारी बदकिस्मती थी कि तुम गिर गए। इसका मुझसे कोई लेना-देना नहीं है!” क्या ये शब्द तर्कसंगत हैं? (नहीं।) वे तर्कसंगत नहीं हैं—इसे बोलचाल की भाषा में कैसे कहते हैं? वे बेतुके हैं। तुमने फर्श पर पोंछा लगाया लेकिन उसे सुखाया नहीं जिसके कारण कोई फिसल गया—हालाँकि तुम्हारे लिए अपराध बोध और अफसोस व्यक्त करना पूरी तरह से जरूरी नहीं है, फिर भी कम से कम तुम्हें अपनी गलती के संबंध में दूसरों की चेतावनियों और संकेतकों को स्वीकार तो करना चाहिए। तुम्हें पूछना चाहिए, “क्या तुम्हें चोट लगी है? क्या तुम्हें जाँच या इलाज के लिए अस्पताल जाने की जरूरत है? मैं पूरी जिम्मेदारी लेता हूँ।” यही सही रवैया है। व्यक्ति को, ऐसी चीज के साथ जो उसने मानवता के परिप्रेक्ष्य से गलत की, इसी तरीके से तर्कसंगत रूप से पेश आना चाहिए और उस पर आत्म-चिंतन करना चाहिए। लेकिन पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों में कोई मानवता नहीं होती है और उनमें विरूपित समझ होती है। वे कभी भी इस तरीके से बात नहीं करते हैं और न ही वे कभी भी किसी मुद्दे पर इस तरीके से विचार करते हैं। इसके बजाय वे मनमाने ढंग से अतार्किक होते हैं। उन्होंने पोंछा लगाने के बाद फर्श नहीं सुखाया जिसके कारण कोई फिसल गया; तो फिर अगली बार उन्हें बस इसे भिन्न तरीके से करने, ज्यादा ध्यान देने और गलती को ठीक करने की जरूरत है—बस। यह मुद्दा हल हो जाएगा। यह बहुत ही सरल मामला है : किसी ने भी इस बारे में कुछ नहीं कहा है और किसी ने भी इसके लिए उस व्यक्ति की निंदा नहीं की है। उसे कोई कानूनी जिम्मेदारी उठाने के लिए भी नहीं कहा गया है। लेकिन वह तथ्यों को स्वीकार करने से इनकार कर देता है, और बल्कि कहता है, “ओह, तो तुम सब अच्छे लोग हो, सिर्फ तुम लोग ही मानवता वाले हो! मैं जरूर कोई बुरा व्यक्ति हूँ! मैं जानबूझकर दूसरों को नुकसान पहुँचाता हूँ! मेरे बुरे इरादे हैं! तुम सब लोग स्वर्ग जाओगे और मैं नरक में जाऊँगा!” मुझे बताओ, क्या कोई सामान्य व्यक्ति ऐसी बकवास कर सकता है? (नहीं।) सिर्फ वे लोग जिन्होंने पशुओं से पुनर्जन्म लिया है, हर बात को समझते और देखते समय एक बेहद चरम, जिद्दी और बेहूदा परिप्रेक्ष्य अपनाते हैं। मामूली-सी बात पर—ऐसी चीज पर जो पूरी तरह से जायज है—वे अपनी जुबान से अतार्किक, भ्रामक दलीलों की झड़ी लगा सकते हैं जिससे दूसरे लोग समझ नहीं पाते हैं कि वे हँसें या रोएँ। अगर उनकी काट-छाँट की जाती है तो वे कैसे व्यवहार करते हैं? वे खुद को सही ठहराने और अपना बचाव करने के लिए किसी भी हद तक चले जाते हैं, यह समझाते हैं कि उन्होंने जिस तरीके से कार्य किया उसका क्या कारण था और इसके लिए उन्होंने कितना कष्ट सहा, और वे सभी तरह के कारण देते हुए उल्टे बहस करते हैं। जब तुम उनके साथ इस बारे में संगति करते हो कि उनकी काट-छाँट क्यों की गई, जब वे गलतियाँ करते हैं तब उन्हें वे गलतियाँ कैसे ठीक करनी चाहिए और कैसे उन्हें सत्य सिद्धांतों की तलाश करनी चाहिए और इस मामले को सँभालने के क्या सिद्धांत हैं, तब वे एक भी शब्द स्वीकारने से इनकार कर देते हैं। इसके बजाय वे अपने गुस्से और नाराजगी को अपने भीतर रोके रखते हैं और उन्हें लगता है कि उनके साथ अन्याय हुआ है और वे अपमानित महसूस करते हैं। पर्दे के पीछे वे दूसरों से शिकायत तक करते हैं, कहते हैं, “हुँह! मैंने उन मुद्दों पर विचार नहीं किया था और मेरा जानबूझकर उसे उस तरीके से करने का इरादा नहीं था। फिर भी वे मेरी निंदा करते हैं और कहते हैं कि मैं गड़बड़ कर रहा था और बाधा डाल रहा था—क्या मैं सच में इतना बुरा हूँ? क्या मैं बुरा व्यक्ति हूँ?” जब सत्य सिद्धांतों की बात आती है तब वे उन्हें पूरा करने से हमेशा चूक जाएँगे और उन्हें कभी नहीं समझेंगे; उनकी समझ हमेशा विशेष रूप से विरूपित और विशेष रूप से बेहूदी होती है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किस सत्य सिद्धांत पर संगति की जाती है, जब वह उन तक पहुँचता है तब वह एक अकेले वाक्यांश, एक अकेले कार्य करने के तरीके में बदल जाता है—यह एक औपचारिकता, एक अनुष्ठान, एक विनियम बन जाता है। यह सिर्फ सत्य सिद्धांतों को एकतरफा तरीके से समझने का मामला नहीं है; बल्कि उनकी समझ विशेष रूप से बेहूदी और बेतुकी होती है। इस प्रकार का व्यक्ति जिस तरीके से सत्य समझता है वह विशेष रूप से अनाड़ी और बेवकूफी भरा दिखता है। यह किस हद तक बेवकूफी भरा है? इस हद तक कि लोगों को उस पर तरस तक नहीं आता है, बल्कि लोगों को सीधे नफरत महसूस होती है, वे समझ नहीं पाते हैं कि वे हँसें या रोएँ और वे पूरी तरह से निरुत्तर हो जाते हैं। चीजें पहले ही इस हद तक स्पष्ट कर दी गई हैं कि अब कुछ भी और कहना फिजूल है—इसके आगे और शब्द कहना नासमझी होगी। इन लोगों से सत्य सिद्धांतों के बारे में बात करते रहने का कोई मतलब नहीं है। वे चाहे कोई भी मामला सँभालें, यहाँ तक कि दैनिक जीवन की छोटी से छोटी बात भी, वे उसे ऐसे ही असामान्य, बेहूदा और विरूपित तरीके से सँभालते हैं। वे मानव विवेक की सीमाओं के भीतर मामलों को देखने और सँभालने में अक्षम हैं। सभी चीजों पर उनका परिप्रेक्ष्य ऐसा जिद्दी और ऐसा बेहूदा होता है—किसी भी मामले के बारे में वे जो नजरिए व्यक्त कर सकते हैं, उन्हें सुनने के बाद तुम जीवन भर के लिए घिन से भर जाओगे। अगर तुम उनकी बातें सुनते समय भोजन कर रहे हो तो हो सकता है कि तुम्हें तुरंत उल्टी आ जाए। मुझे बताओ, आखिर कितने विरूपित होंगे वे लोग? पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की यह एक प्रमुख विशेषता है—वे जिद्दी और बेहूदे होते हैं। मानवता के परिप्रेक्ष्य से यह जिद्दीपन और बेहूदापन मुख्य रूप से मानवता की सामान्य सोच की कमी है। वे किसी भी मुद्दे पर मानवता की सामान्य सोच के अनुसार विचार करने में असमर्थ होते हैं—वे चरम, विरूपणों की ओर प्रवण और जिद्दी होते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम सत्य, वस्तुनिष्ठ तथ्यों या विशिष्ट स्थितियों के बारे में कैसे संगति करते हो, वे अपने तर्क से कसकर चिपके रहते हैं और उसे छोड़ने से इनकार करते हैं। वे सोचते हैं, “तर्क मेरे पक्ष में है और मैंने तुम्हें ऐसा कुछ नहीं दिया है जिसका तुम मेरे खिलाफ उपयोग कर सको। मैं बस इसी तर्क से चिपका रहूँगा और यही सत्य बन जाएगा। तुम्हारी कही कोई भी बात किसी काम की नहीं होगी!” पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की यह एक विशेषता है—उनकी समझ विरूपित होती है।

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